
संतोष कुमार राय
'बटोही'
लघुकथा - कलेक्टरनी
सतीश जी आजु धन्य भऽ गेलाह । आइ सीता देवी केँ खाता मे छह हजार टाका चलि
गेलै । बिना तनखाह केँ दू बरख सँ इस्कूल मे ओ झाड़ू लगा रहल छलीह । इस्कूल
मे कियो झाड़ू लगेनिहार नहि छेलैक । ई तऽ सतीश छल जे मगुलाहा सँ सीता देवी
केँ खोजिक लौलक । सतीश कतेक आदमी के कहलकै कि इस्कूल मे एकटा झाड़ू
लगेनिहार चाही । कियो झाड़ू लगबै लेल तैयार नहि छल क्याक तऽ तनखाह नहि भेट
रहल छेलैक।
सीता देवी केँ आँखि सँ नोर बहि रहल छै। दू बरख सँ बिना तनखाह केँ काज केलाक
बाद आइ ओकर श्रमक मजूरी भेट गेलैक । ओ कुलहरिया मे पी एन बी पर आयल छथि ।
ओकरा सने कियो मरद सेहो छै।
" चुप न ? कियो आँखिक नोर देख लेतौ ।"
" देख लेतै तऽ देखअ दही ।"
"ठीक छै, ई तऽ काज भऽ गेलौ। चल किछ मिठाई लऽ लैत छियैय छौरा-छौरी लेल ।"
"ठीक छै।"
सीता देवी अपन घरवाला संग अंधरा दिस विदा भेलीह । अंधरा मे मिठाई आओर घरक
किछु जरूरी सामान लऽकऽ आपिस होम लगलीह ।
घरवाला ओकरा कहलकै, "चल, हम अबैत छी ।"
ओ आगा बढ़ि गेलीह । विनोद फोरचून दोकान पर रूक गेल छल । एकटा पानिक बोतल
आओर दाल बूटक छोटका पैकेट किनकऽ गमछा मे बान्हि लेलक। मोगलाहा दिस पैर आगा
बढ़ौलक। अंधरा सँ निकलैत पसीवाखाना छै। ओतऽ रूकि गेल आओर किछु गिलास ढारि
लेलक। ओतऽ आओर लोक सभ छेलैक।
ओ बतिया लागल, " मौगी केँ आई दू बरख पर तनखाह भेटलै । "
" आब तोहर मौगी सरकारी भऽ गेलौ । आब तऽ ओ हाथो नहि लागऽ देतौ ?"
" कियाक हौ ? ऊ कलेक्टर थोड़े बनि गेलै ।"
" ऊ आब कलेक्टरे भऽ गेलौ ।"
विनोद एकटा बोतल ढारलाक बाद पूरा मता गेल छल।
ओ बाजल , " ओ हमर छियैय हमरे रहतै । ऊ चाहे मेम साहेब बनि जाऊ , चाहे किछु
आओर..... ।"
विनोद कलेक्टरनी केँ घरवाला जकाँ लोंगी के ठीक सँ बान्हलक । फाटल कमीज दिस
देखिकऽ मुहँ बिचकौलक । कमीज मे दुटा बटन नहि छेलै । तबो ओकरा ठीक-ठाक केलक
। केश केँ हाथ सँ सीटलक । गमछा के गरदैन मे डाललक । मोंछ केँ पीजबैत
तमतमायल घर दिस विदा भेल । आइ ओ अपन काज भूलिकऽ कलेक्टर जकाँ मोन बनौने अपन
घर पहुँचल ।
अपन विरादरी लोक सभ केँ हाक दैत बाजल , " निकल घर सँ रौ देवना, इंदल आओर
रूदलवा । आई फरछिया ले। आब हम कमजोर नहि छियैय। बड़ तूँ सभ सतौलैं हमरा सभ
केँ । "
विनोदक हाक सुनिकऽ टोलक सभ कियो जमा भऽ गेलै। विनोद सभ केँ गरियबैत अपन पैर
आओर हाथ केँ हवा मे लहरा रहल छेलैक। परञ्च कियो बाजि नहि रहल छेलै ।
अंत मे अपन घर बाली केँ हाक दैत बजौलक, "गे सुनरी केँ माय; अञि आ।"
घरवाली सोझा ऐलै । विनोद घरवाली दिस हाथ देखबैत बाजल, " सुनि ले सभ कोय। आई
दिन सँ हमर घर बाली पर कोय नजर उठा केँ नहि देख सकैं छैं ; नहि तँ दफा लगा
देबौ। सुनरी माय आब सरकारी नौकर भऽ गेलै - 'मेम साहब' । कलेक्टरनी !"
सभ कियो ताली बजौलक । किछु जनानी हँसि देलकै । किछु जनानी फुसफुसैत छेलै ।
सभ कियो अपन-अपन घर दिस विदा भेल ।
- संतोष कुमार राय ' बटोही ';
ग्राम - मंगरौना
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