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मैथिली_साहित्यक_वैज्ञानिक_एक्स-रे.m4a
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- 0:00–0:08सदारन ते जगन कोनो मेटिकल डाइएक बात हुई तची, तमने उते एक ता पाथर संस पष्टताक उम्मिद रहे तची.
- 0:08–0:10आ, एक दम, एक दम बाईनरी आची.
- 0:10–0:17सत्य. मனे एकदम इंजेनरिंग जगा जे हाथ तुतल आची ता एकश्रे में तुतल उ जर रेखा साप दिखा जाई तची.
- 0:17–0:20आ दोक्तर उक्रा दिखा का कहे चतिंजे दिखु एतचे पातल.
- 0:20–0:24बिल्कुल, उते कुनो कन्फुज्झन नहुए तची, शायद वला बात नहुए तची.
- 0:24–0:28मुदा, मुदा तचन साहित्तिः विचार असमिक्षाक दून्या में,
- 0:28–0:34जकन हमरा सब कदम रखाई ची, आजानक सो एकस्रे मशीन काजकर बंद कर दे तची.
- 0:34–0:37अदे सब कुछ दूंदला बहुजाई ता ची
- 0:37–0:38एक दम दूंदला
- 0:38–0:42कोनो कवीता वा कतात मुल्यांकनक परद्रष्य दिस देखाई ची
- 0:42–0:45जे इमान्दारी सा कहल जाई तब दब वेक्ती परध कची
- 0:45–0:47हम्रा मन में प्रषन उठाई ता ची
- 0:47–0:52जे उ की साहित्तेके एकस्रे करबा कोनो वेग्यानिक तरीका नेभहसकता ची
- 0:52–0:54नहीं बड नीक प्रश्ना ची
- 0:54–0:58की कोनो कविता वा कता के मापीक कहल जासकता ची
- 0:58–1:00जे इपुरना ची वा अपुरना
- 1:00–1:03देखू, सदारनत या लोक माने ता ची
- 1:03–1:07जे साहित्तिक मुल्ल्यांकन केवल भावना पर निरभर करेता ची
- 1:08–1:11माने कोनो गणितिये फरमूला वा एकसरे जका नहीं
- 1:12–1:16लोग कही ता ची, जे नीक लागल ता नीक अची
- 1:16–1:18मुदा एही ताम गजिंद्र ताकुरग लिखित
- 1:19–1:21मेठली समिक्षा शास्ट्र जका पोती
- 1:21–1:24हम्रा सबवक सोचकिन बदल देटाची
- 1:24–1:29एज पोठी आची, इज साहित्तिक उही धुन्धलापन के साफ करबाक
- 1:29–1:32एक ता एकसरे मशींजका काच करेचे
- 1:32–1:36इज हम्रा सबवके एक वैचारिक तराजो देटाची
- 1:36–1:40यही बात हम्रा सबवके आजके एही गहीर अद्धेन
- 1:40–1:43माने, आजके एही विस्त्रित चर्चा दिस लोजाई तछी,
- 1:43–1:47गजेंद्र ताकुरक इपोति कोनो सादारन समिक्षा नहीं आची.
- 1:47–1:49एक दम नहीं यी बहुत व्यापक आची.
- 1:49–1:53आआ, इस शाहित तिक विभिन्न विदा जिना, वेहनी कता,
- 1:53–1:57लगु कता, कविता, कजल, अहाईक।
- 1:57–2:00किर मुल्ल्यांकनक, इक तविस्त्रित, वेद्यानिक
- 2:00–2:02अदाशनिक आदार तध्यार करीताची.
- 2:02–2:06आई देखा बड़ रोचा काची, जे कोना चोट से चोट कता
- 2:06–2:09वक कविताक पच्जा, कते गहीर गनीत
- 2:09–2:12अ मनो विग्यान नुकाल रहाईता ची
- 2:12–2:15तजव हम रा सब गद्यका सब से चुट रूप से शूरू करी
- 2:15–2:17मने एक ता पैग अपन्यास्ता
- 2:17–2:20साथ सपाईसो प्रिष्टदरी कोईत ची
- 2:20–2:20हा
- 2:20–2:23उतो एक ता महाक अब विसन भोगिलक
- 2:23–2:24बलकल
- 2:24–2:29आएक्त सादारन कता वाल लगु कता उ तीं चार प्रिष्टक बहुसके दची
- 2:29–2:34मुदा इविहनी कता जी आची उ मातर एक से चार प्रिष्टक होई तची
- 2:34–2:37आकार मे इज़ सबसा चोट आची
- 2:37–2:40मुदा विश्वास करु एक रा भुजब उते के जटी लची
- 2:40–2:46मुदा प्रष्ने इए आजी जे मने एते चोट कता मे पुरनता कोना आवी सकते जे.
- 2:46–2:49लोकक मन में इशंका अवेट आवेट आजे
- 2:49–2:54आव, मने एक दू प्रिष्ट में ता मात्र कोनो गतनाक जिक्र भहसा के तचे
- 2:54–2:57इत तक उनो चुट्कुला वा हासे कनिका जका बहुगल नहीं
- 2:57–3:00जे सुनलू आजासी कबसी रिगलो
- 3:00–3:03आव, इब हम बहुत लोकन के होई तची
- 3:03–3:05जे चोट कता मने चुटकुला
- 3:05–3:08मुदा विहनी कता आजाशे कनी का
- 3:08–3:09मने जोग होगी तच्छ
- 3:09–3:11उही में जमीन आस्मान कनतर जे
- 3:11–3:14औना अनतर की आची मुख्य रूप से
- 3:14–3:15देखो जाशे कनी का
- 3:15–3:18केवल एक ता पन्चलाइन पर निरभर करे तच्छी
- 3:18–3:20अखर अंद में हसी आवे चाही
- 3:20–3:25मुदा विहनी कता कलेल एक ता पूँड गटना चकर की आवशकता होई देची
- 3:25–3:29मैं गटना क पूँड ता आवशक अजे एक दम
- 3:29–3:34औही एक दू प्रिष्ट में लेक्ख के पूरा संसार ताड करे पडेच चनी
- 3:34–3:40विहनी कता में जे चीज सब सब महत्वा पून अचे उआचे तवरित विचार
- 3:40–3:43माने कुएक प्रेज्टेशन्टेशन अगट तवरित विचार
- 3:43–4:13आदार अदार बादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्र�
- 4:13–4:15उभी आपीफेनीक आवष्खता होई तचाई
- 4:15–4:17एक ता एहन जदका
- 4:17–4:20जे पाथकक सोचने पर मजबोर कर दैई
- 4:20–4:22जदे पाथक के एके बेर में पुरा समाज
- 4:22–4:25वा व्यक्तिक मान्सिक स्थी भुजहा जाए
- 4:25–4:26एक रा भुजवाग लिल
- 4:26–4:28मैंने हम्रा मुन में एक ता अनलोजी आभी रहा लवे
- 4:28–4:29आप खफु?
- 4:29–4:32विहनी कत्हा एक ता एस्प्रेसो शोट जखाच
- 4:32–4:35जखन क्योपन्यास एक ता पैक जग फिल्टर कोफी जखाच
- 4:35–4:38औहो! बडणीक द्रिष्टान!
- 4:38–4:41प्र्स्शो में पानी वा दूद नहीं मिलाल जाई तची
- 4:42–4:44उई में कता कोनो फैलाव नहीं आची
- 4:44–4:47मुदा उई में कैफीन के पुरन जथका होई तची
- 4:47–4:50आओजे कैफीन अग जथका आची
- 4:50–4:52सई साहित में एपीफीनी आची
- 4:52–4:54आदूनिक मैठली गद्द
- 4:54–5:01अब दिरगा कार उपन्यासक परमपरास निकलीक, एही एसप्रेसो शोट दिस बद्रालाचे.
- 5:01–5:05मने आप केवल पएग पएग पोठी नहीं लिखल जाराची?
- 5:05–5:13ना, पोठी में मुन्नाजी कता रेवाज कजे द्रिष्टान्त देल गेलाचे, उ एकर सर्व श्रेस्ट हुदारन आचे.
- 5:13–5:43उप, उगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग
- 5:43–5:47जे का कता सब एह विद्धाक शकती के प्रमानित करेता चे
- 5:47–5:50मुदा एते हम एक ता प्रष्नुथा वे चाहा ची
- 5:50–5:51हा खाल जाय?
- 5:51–5:54जा बहनीत कता मे तवरित उपस्तापना
- 5:54–5:58या मने बभर्द सबात क्वाग जित तडाहुडी रही ता चे
- 5:58–6:04तक वही तडागुडी में लेखा कहानिक मुल बाव औस थाइतु के नस्ट नहीं का देच्टीं।
- 6:04–6:06औफ, ये एक तप पयुख शंका जे
- 6:06–6:10मने की हमरा सब गेराए गमा नहीं रहल ची?
- 6:10–6:15जल्द भाजी में तो रस्गुल्ला गोटे निंगल बासन बहजाई तच्छ, स्वाथ तबुजबा में नहीं बे तच्छ.
- 6:15–6:21इग खत्रा निष्चद रूप से आच्छ, अप पोथी एहे पर भुथ विस्तार से चर्चा करे तच्छ.
- 6:21–6:27पोदिक तर्क अची जे यदी तवरित उपस्थापना के चकर में कता खस थाई तवव,
- 6:27–6:31या जे लिंगरिंग अप्ष्ट अचे जे प्रभाव रही जाई तचे.
- 6:31–6:37एक दम जा उ नश्ट बहजाए ता उश्रिष्ट वेहनीट कता बही ही नी सके तचे.
- 6:37–6:41अद्क्रिष्ट वेहनीट कता खुना लगा चे
- 6:41–6:45अद्क्रिष्ट वेहनीट कता उगी तवरित विचार के
- 6:45–6:48एहन सीजल तरीका से पेष करे तचे
- 6:48–6:52जे पढवाग बादो उकर गुज पाट्खक मस्तिष्क में बनल रहे तचे
- 6:52–6:55उब भर्दसा सखतम जरूर भजायत चे
- 6:55–6:58उ बददसा खटम ज़ोर बजायता चे
- 6:58–7:02मुदा मस्तिष्क में उकर प्रभाव बददस खटम नहीं होई ता चे
- 7:02–7:08अहो तमानी लेला हूं, जे लेक्हक एक ता एसप्रेसो शोड जाकां कता लिख लेलान ही
- 7:08–7:10जाही में लिंगरिंग अप्टागत आईच
- 7:10–7:16उद्या आप प्रष्न उद्याए जी उगदा कता कते क उद्क्रिष्ट आची एत एक अगरत?
- 7:16–7:18एह तो समिक्षाक का जज़े?
- 7:18–7:21उगदा एकर मुल्यां कनक माप्दन्द की हो यद?
- 7:21–7:25एक ता पाज सो प्रिष्टक उपन्यासक परगबाक जी तराजू अची
- 7:25–7:28तो उग़ा तो एक से चार प्रिष्टक कता नहीं तोलल जासकई तचे
- 7:28–7:29बलकल नहीं
- 7:29–7:33आ एते से हमरा सब समिक्षाक उही जटिल जाल दिस बड़ेची
- 7:33–7:36जटे साहिट्तिक परखवा किलेल पाश्षात दरषन
- 7:36–7:39मैत्ली साइत दबीच एक ता अदुथ तालमेल दिखाएल जे
- 7:39–7:43कारन जे समिक्षाक अर्थ मात्र इखभ नहीं
- 7:43–7:46जे इग कता नीक लागल, वाइग खराब जे
- 7:46–7:49प्या, नीक अखराब तवेक्ती परख भगल,
- 7:49–7:52हम राजे नीक लागल आहा के खराब लागी सकते जे
- 7:52–7:53यक दम
- 7:53–7:55तहीले बग्यानिक माब्दन्द चाई
- 7:55–7:58पोत्ती एही ताम देरी दाए कविखंडन वाद
- 7:58–8:00मिशल फुको कषत्ता संदरचना
- 8:00–8:05आमाक्सवाज्यका बहरी भरकं पष्ष्ट्वी सद्धान्त के मेठलीक संदर्भ में उतारे तची
- 8:05–8:09मुदा एही भारी भरकम सिद्धान्त सब के तनी विस्तार से बुजगवे परत,
- 8:09–8:13देरी दाक जे विखंडन वाद अची उ कोना काज करत अची.
- 8:13–8:17देगो देरी दाक विख्चन्दन वाद
- 8:17–8:19मने दीकन्स्ट्रक्ष्छन
- 8:19–8:21मुलता ही कहेत आची
- 8:21–8:26जे कोनो भी पाट, तेक्स्ट, केवल एक ता सीथा अर्ठ नहीं हुए तची
- 8:26–8:30माने जे लिखा लची वोकर पाचा किचु आवर आची
- 8:30–8:30हा
- 8:30–8:38जे लिखाल आची उकर पाचाक पुर्वागर, उकर समाजक मान्सिक्ता अच्षुपल आप्त के उखाडक देखबा,
- 8:38–8:42उकर खंद-खंद का उकर आप्त निकालब आवश्यक आची.
- 8:42–8:46पोती में एकर बर्स टीक अख़वा उदाहरन आची.
- 8:46–8:47औग़ाहरन की आची?
- 8:47–8:53तारनन्द व्योगी द्रार कम्रुद्दीन कता नमाजे शुक्राना कसमिक्षक जी विश्लेशन आची
- 8:53–8:55उविक्श्ण्डन वादक एक्दम साफ कर देताची
- 8:55–8:58उख़ो उख़ो कता अवकर समिक्षा
- 8:58–9:00उख़ो हम्रा मान आची
- 9:00–9:03जते हाजी साहेबक नमाज के समय में
- 9:03–9:06एक ता सुगा सीता राम बज़ेता ची
- 9:06–9:07एक दाम
- 9:07–9:11आहाजी साहेब नमाज में खलल पडवा करन रुदबो का
- 9:11–9:14उही सुगा के दिवाल पर पटकी का मारी देच छती
- 9:14–9:17इते एक ता क्रूरा हिंसक दूष्या ची
- 9:17–9:18चत्य बाजिल हो
- 9:18–9:20मुर आब समिक्षका के पूर्वाग्रह देखू,
- 9:20–9:25एक ता समिक्षक एक अत्ठा के समप्रदाएक सवहार्द का था कही देच्छती।
- 9:25–9:28बाप्रे, इतो हास्यास्पड आची,
- 9:28–9:30सूवा का हत्या बहे रहले ची,
- 9:30–9:34नमाजग भीच मे सीता राम सुन्ला पर गुस्सा आभी रहले चै,
- 9:34–9:37अ समिक्षक उक्रा सुवहार्द कै रहल चतीन.
- 9:37–9:39इख कोना समब है ची?
- 9:39–9:41इह देरीदाख का सिद्दान्त बुज्वेत अची.
- 9:41–9:42मने कोना?
- 9:42–9:44समिक्षक अक मोन में,
- 9:44–9:47पहिनी ही से एक टाचा बनाल चल,
- 9:47–9:53जे मुस्लिम लेखा कची, हिन्दु मुस्लिम तत्वा चे, ता इी जरुर सोहार्द कचा टेक.
- 9:53–9:57समिक्षा कचा के यतार्थ वादी क्रूर पाट के लिन नहीं.
- 9:57–9:59उबस शब्द के अपर से देखलिलनी.
- 9:59–10:03औह, मने उआपन चश्मा से दिखलनीं यतार्थ से नहीं.
- 10:03–10:08एक्दम! गजेंद्र ताकुर दे विख्ण्ण्वादाक प्रियोक्का के दिखावे चतिन,
- 10:08–10:15जे बिना पाथ्खे गैराई से चीर पार्ड किने, समिक्षा किना अनेतिक अपुर्वाग रही भहुसके तची.
- 10:15–10:16सत्या ची.
- 10:16–10:24विक्हन्दन बाद उप्री सवहार्द का अव्रनक फाडेक कता के अकर नगन आहिनसक यदारत में पडबाक साहस देप अची
- 10:24–10:26इबडद दम्दार विष्लेशन अची
- 10:26–10:31माने जिना कोनो एकसरे मशीन सा रद्दीक वीत्रक टुमर दिखार रहल होए
- 10:31–10:32बलकोल
- 10:32–10:37मुदा, अद्ते हम फेर सा नम्रता पुरवक एक ता प्रतिवाद करव.
- 10:37–10:38आप, की शंकार ची?
- 10:39–10:41की फोकोल्ट आदेरी दाजका.
- 10:41–10:43पश्च्वी विचारक के चच्मा पहरिका,
- 10:44–10:47जे हमरा सव गाम गरक मेठली कता का समिक्षा करी,
- 10:47–10:51तकि उईसा मुल देशी ए बहाँ नय हुं देरा जायत
- 10:51–10:53इप्रश्न प्राया उठाई तची
- 10:53–10:58मने कि हम पाश्टाते फ्रेमवर्क के जबर्दस्ती देशी साहित्ये पर नहीं थोपी रहल ची
- 10:58–11:01एक ता थेट दिहाती काका कव्यता
- 11:01–11:06वा जमिन्दारक अट्याचार के फोकोल्ट कर लेंस नापव्त की बेमानी नाया ची
- 11:06–11:09हम्रा लगाई तची जे इज़ववर्दस्ती के बाद्धिक थोपव अची
- 11:09–11:14आहां की दर स्वबावेग आची, आईईबहस सहित्यमे बहुत पुरान आची
- 11:14–11:18मुदा फोकोल्ट वा माक्स कोनो पश्चिमी बपोती नहीं चतिन
- 11:18–11:20माने उस सारवभामिग चतिन
- 11:20–11:21रहा हा
- 11:21–11:26फोकोल्ट का मुख्छ सद्धानत आची सत्टा का विमर्ष पावर धिनेमिक्स
- 11:26–11:30प्र्कोल्ट का एच्छतिन ज़ि सत्ता मात्र सरकार वा पुलिस नहीं चलावे तछी
- 11:30–11:33सत्ता समाजक हर रिष्ता मे आची
- 11:33–11:35जना गाँँ के मुखिया किसानक बीच
- 11:35–11:42इग्दम जगन गाम वीटा जमिंदार कोनो गरीब किसान पर अथ्तिआचार करेत अची
- 11:42–11:47तकन उते जे सत्ता खेले ची, जे भाशा आश्वक्ती के असन्तुलन आची,
- 11:47–11:51उक्रा फोकोल्त के लेंस सां बर्स पष्तता समबुजल जाज सके तची.
- 11:51–11:54मुदाओ त हम्रा सब अपन भारत्ये द्रिष्टी कोंसा,
- 11:54–11:57आपन माटिक समस सा से हो भुजी सक अची,
- 11:57–12:00माक्स मा पुकोल्तक मुताज की अग बनी?
- 12:00–12:02हम्रा सा मुताज नहीं बनी रहाल ची
- 12:02–12:05बलकी उपकरन तूल्स के अपना रहाल ची
- 12:05–12:09जे गुरुत्वा कर्षन के खोज नुटन केल नहीं
- 12:09–12:10जे पश्च्मी चला
- 12:10–12:13तक की हम्रा साभ इखहाप जे आम ख़साएत छी
- 12:13–12:17तवोक्रा हम देसी तरीका सा व्याक्या करब नूटन के नाम नहीलेब
- 12:17–12:19हो, हो, यी बला सतीक तरक अच्छे
- 12:19–12:23गुरुत्वा कर्शन जैना भहुतिक निज्यानक सत्य आच्छी
- 12:23–12:27तहीना फुकुल्तक सत्ता विमर्ष समाजा गुरुत्वा कर्शन आच्छी
- 12:27–12:35पोथी के तर्क इए ची, जे मानविय वेबार, शोषक अशोषित कर, जे मनो विग्यान अची, उसार वो में कची.
- 12:35–12:44हमहां के तर्क साँमत भाराल ची, जे हमरा सबक कता विष्वस तर्ग ची, ता उकर परिक्षन से हो विष्वस तर्ये उपकरन से हे वाग चाही.
- 12:44–12:54इक्दम, मैठ्ली साहित्ते एते क्परिपक्व अची जे उक्रा विष्व का कोनो भी बोद्धिक माप दन्द पर कसल जासकता ची.
- 12:54–12:59सत्यकालो, आपन साहित्ते के कुवाक मिधख बनाकर रक्भ, सही नहीं.
- 12:59–13:03तग गद्य कविसले शन में तदेरीदा आ फुकाल्त आवीगेला,
- 13:03–13:06मुदा जखन विषे पद्ध मने कविता दीस गुरे तची,
- 13:06–13:10तचन समीक्षाक इ एकस्रे मशीन कोना काच करे तची?
- 13:10–13:12उते बात बदले तची.
- 13:12–13:13आँ.
- 13:13–13:17करन कविता में तले चन्द आव आर्थक प्रकती करन सब समहत पुरना चे
- 13:18–13:20उते की मारक्स वाप फुकाल्ट काज करे चती
- 13:21–13:23इते पोथी आपन द्रुष्टिकों बडले तची
- 13:23–13:27आ एक दम सा प्राचीन भारत्या सिद्धान्त दिस मुडी जाए तची
- 13:27–13:29प्राजीन भार्त्या सिद्धान्त?
- 13:29–13:31रच सिद्धान्त तबुजबा में आवाईत छी.
- 13:31–13:35बबरत्मूनी आ लोलतक, रच सिद्धान्त हमरा सब जानेच्छी.
- 13:35–13:39जे कोना कोनो इस्थाई बाव रच में परनेत होई तछी.
- 13:39–13:40बलकुल.
- 13:40–13:42तो थी बद्दान्त फम्रा सब जानेच्छी
- 13:42–13:44जे कोना कोनु इस्थाई बहाँ
- 13:44–13:46रस्मे परने थोई तची
- 13:46–13:47बलकुल
- 13:47–13:49मुदजे सब सब भेसी गही रची
- 13:49–13:51उआची बबरत्री हरीक
- 13:51–13:53सपोट सद्दान्त
- 13:53–13:55सपोट सद्दान्त
- 13:55–13:57पहोट सद्दान्त
- 13:57–14:06जते दरी हम भूज़ेई ची इसी दान्त कोई तचे जे उ खोना अक्चर से सबद, अश्वद से वाख्यक निरमान से पहिनहे ए,
- 14:06–14:10एक तो समपूरन अर्ठ मस्तिष्क में विस्फोट जगा प्रस्फुटित होई तची.
- 14:10–14:11पूरन रूपेन.
- 14:11–14:14मैं आर्द खंद खंद में आवाई तची
- 14:14–14:15इक दम नहीं
- 14:15–14:16शब्द कुछारनक संगे
- 14:16–14:19जे आखंद आर्द का बूद होई तची
- 14:19–14:22उ एक्के बेर में मस्तिषक में पूटे तची
- 14:22–14:24उक्रा आहां अलगलग नहीं कर सके ची
- 14:24–14:26एक रहा में ता अनलोगी से बूजवग़ जाहाब़
- 14:26–14:27आप ख़ो
- 14:27–14:28इए उहिना आची
- 14:28–14:30जेना आख मूह में
- 14:30–14:32रस गुला जवाख संगे
- 14:32–14:33बिना चबोने
- 14:33–14:35एक भे रोकर पूरा मिठासक अनुबूती
- 14:35–14:37मस्तिषक में विस्फोट कजाई तची
- 14:37–14:38बाए
- 14:38–14:40बड़ मदूर उदारन ची
- 14:40–14:43आजा की सोचबाक अवष्चकता नहीं पड़े तची
- 14:43–14:46जे इचीनी आची, इचेना आची, इ़ रष आची
- 14:46–14:49शबदक पूरा अथ सुन्बाक संगे
- 14:49–14:51मस्टिषक में पूरन चीट्र बनादे तची
- 14:51–14:52बलकोल
- 14:52–14:54आजा इ कविता नीक नहीं आची
- 14:54–14:59उ इना अची जना मूह में कच्छा आटा और चीनी राख दिल येल होई, उते सवोट नी भेल.
- 14:59–15:03एक्दम सहीद रष्टान्त, आए हे सवोट सिद्दान्तक प्रेयोग पोठी में,
- 15:03–15:08बच्चुं जीक, कविता सब, जना, स्वागत, बेटी बनली पहाड,
- 15:08–15:11गाँ में मों पड़े ए, पर कैल गेल अची.
- 15:11–15:12औहो!
- 15:12–15:17पोठी दिखावे तची, जि कोना उ कविता सब मस्तिष्ट में अद्ख सबोट करे तची.
- 15:17–15:22पोठी एतिःदरी दिखावे तची, जि कोना एह सिद्दान्त का माद्ध्यम से
- 15:22–15:29इकta कविता के माक्स वादी, रूप वादी, नारी वादी, और अस्तित्तो वादी द्रिष्टिकोंचा �alag-alag-padhal-jaasakai-tachi.
- 15:29–15:33मुदद, एही कहन्द में एकta-brat-tikshna-alochna-si ho-achhi-nai.
- 15:33–15:38आदूलिक मेठली कविता कतता कतित सुखल मुख्यदारा पर प्रहार.
- 15:38–15:43आँ, एब बहुत ज़ोरी प्रार्चल, पोठी उही कवी लोकनी दिस इशारा करे तची,
- 15:43–15:46जे केवल पुरसकार वा सेमिनारक ले लिख़े च्छती.
- 15:46–15:49माने जे बोद्दिक विलासिता में लागल च्छती.
- 15:49–15:55इक्दम! एहन सहिट्ते ग्रामीन वद्दलिद समाजक यतार्त सब पुन ता कतल अची.
- 15:55–15:58जगन सहिट्ते केवल बोदिक विलासिता बनी जाई तची.
- 15:58–16:04और जमीन का दूरी सा उकरनाता तुटी जातची, तकन औरस विहीन असुकल बहजातची.
- 16:04–16:05सत्टिवाजलों?
- 16:05–16:09उही में उरस गुल्लावाला स्पोटक का गुन्जाइष नहीं रहाता ची
- 16:09–16:12मने कविता में प्रान नहीं बचाई ता ची
- 16:12–16:15केवल शब्दक सजावद रही जाई ता ची
- 16:15–16:19तद जं कविता क वियाकरन उकर दहनी विग्यान
- 16:19–16:21इते क वेग्यानी कची
- 16:21–16:24जे उ मस्तिष्क में आर्थक विस्झोट का सकेता ची
- 16:24–16:30तकी इ देसी विग्यान, विदेसी विद्ह सबवपर सए रागुबा सकेता ची
- 16:30–16:34इ प्रष्न हम्रा सबवके गजल आ जबानी हाईकुक
- 16:34–16:36मेतली समस्करण में प्रवेश करावेता ची
- 16:36–16:40मैं पास्चात्त्या सिद्द्धान्त सद्देशी कता के मापी सकईची
- 16:40–16:44तकी देशी भाशा सब विदेशी विदाखे अपना सकईची
- 16:44–16:44एक दम
- 16:45–16:49आई पोठिक सब से बेशीक तकनी की और रोचाख हिसा आचे
- 16:49–16:52गजल लिखवाक आर्थ मात्र तुखबंदी नहीं आचे
- 16:52–16:53तक्ये जे
- 16:53–16:55आर भी फार्सिक जिब भेहर आचे
- 16:55–16:58जक्रा हमरा सब छन्द वा मीटर कही ची
- 16:58–17:00आद ताफ्या रदीप आची
- 17:00–17:02उकर कडाई से पालन कर अब आवश्षक आचे
- 17:02–17:06आई ही बात पर मैठली साहित्ते में विवाद सीहो भेल आची
- 17:06–17:24पोथि में 2 युख के चर्चा जे, एक ता जीवन्युग, जता एक गजल बिना बाहरक, बिना गनेतिय नियमक लिखल जाएचे, अदो सर अंछिन एक जाएँग, जता एक वेब पोटल अंछिन अगर कमाद्द्यम सा बहर में गजल लिखवा कडा नियम लागु कल गेल.
- 17:24–17:28संगे संग, जापानी विदा हैकू कसे हो चर्चा आचे
- 17:28–17:33हैकू पाज सात पाज सात पाज वरन के सन्रचना में लिखल जाएत आची
- 17:33–17:38एक दम, जापानी विदाक इग कला गडनती ए सन्रचना आचे
- 17:38–17:44इते आ, मैत्टिली भाशा का द्वनी विग्यान, फोनेटिक्स का जादू देखे में आवेताच.
- 17:44–17:47जिना, हमरा सब बात करी अंगरेजी वा हिंदिक,
- 17:47–17:51अते जे लिखल जाईते छे, आवश्षक नही, जिस सही भाजल जाई.
- 17:51–17:55सत्यकाल हो, अंग्रेजी में साईलिंट लेटवाजाई जे.
- 17:55–17:59अर हिंदी में से हो अंप्मे आगा उचारन लुप्त बहुजाई तची.
- 17:59–18:03जेना हिंदी में कमल लिख़े ची तचा मा लग,
- 18:03–18:06मुदा बाजे काल उख्कमल जगा का सूनाई तची.
- 18:06–18:08अन्तिम आमान बवजाईताची
- 18:08–18:11मुदा मेत्फिली में जेना लिखल जाईताची
- 18:11–18:13इक्दम उहेना बाजल जाईताची
- 18:13–18:15स्वर आव्यनजना कस पस्टता
- 18:15–18:17माने जब कमल लिखल अचे
- 18:17–18:19उच्चारन पूरा
- 18:19–18:21का मा लगे ते
- 18:21–18:22बिल्कुल
- 18:22–18:23एही कारन्सा
- 18:23–18:53ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
- 18:53–18:55बवावनाग ये बहुगिल
- 18:55–18:57नहीं नहीं
- 18:57–18:59एक राएक्ता दोसर अनलोगी से बुजु
- 18:59–19:01राएक्ता बुजु
- 19:01–19:03बवावनाग ये बहुगिल
- 19:03–19:05नहीं नहीं
- 19:05–19:07एक राएक्ता दोसर अनलोगी से बुजु
- 19:07–19:09राएक्ता बुजु
- 19:09–19:11बवावनाग ये बहुगिल
- 19:11–19:11कहु?
- 19:12–19:17बहर वच्छन्द, उ कार चैसिस अफ्रेम जगाएज
- 19:17–19:20जे कार में चैसिस मजबूत नहीं होएद,
- 19:20–19:23तए इंजन जित्टेख भी शक्तिषाली की एक नहीं होएग,
- 19:23–19:25गाडी कापी का बिखर जाएज.
- 19:25–19:25औहो!
- 19:25–19:30गनित्या बहर, औही भावनाक इंजन के इस फिरता देटचे,
- 19:30–19:33जाएसा उस सही दिशा में तीवरता सा आगु बहर सके,
- 19:33–19:38बिना बहर अग गजल उही कार जका एच जकर कोनो दाचा नही आचे.
- 19:38–19:41गजल कु दारड, चेसी सा इंजन ताल मेल,
- 19:41–19:44बिना मज्बुद दाचाक बहावना बिख़ड जाएत
- 19:45–19:48इब बहर और चन्दग गनी तक बुजवाग सब सनिक तरीका आचे
- 19:49–19:53एक दम और ये कारन अची जे मेत्हली में गजल वा हाएकु
- 19:54–19:56कोनो विदेशी महमान जका नहीं लगगे तचे
- 19:56–20:01बलकी उ मेठलिक अपन द्वनिक विग्यान में पूरी तरा से रची बसी जाई तचे.
- 20:02–20:05अखत कुल मिलाकर यह अद्दियन हमरा सब केल हूँ
- 20:06–20:11इबुजवे तची जे साहित ते केबल पडबाक अबहावना में बभाबाक वस्तू नई आचे.
- 20:12–20:13सत्या ची
- 20:13–20:21इएक ता एहन प्रियोक शाला आची, जतः भाशा, समाज, दर्षन, अविग्यान का मिलन होई तची.
- 20:22–20:26गजेंद्र ताकृ का मेठली समिक्षा शास्त्र इब भली भाती देखावे तची,
- 20:26–20:31जे मेठली साहित्ति, मात्र अपन परमपराक महिमा मन्डन न नहाए लची,
- 20:31–20:37बलकी विश्वक नुगका से नुगका विमर्ष्खे आपन बोद्धिक कसी पर कसी रहे लची
- 20:37–20:43आप चाहे ओ देरी दाक विखंडन वाद होए, वा जापानी हाईकु गनितिय गडना
- 20:43–20:48सप्ता के मेठली आपन अनुसार आपना रहो लची औगर परिच्छन को रहो लची
- 20:48–20:54ता आब जगन इच्चर्चा आपन वासांक दिस आची जे श्रोता लोकने सुनी रहल चती,
- 20:54–20:57उनका लेल हमर मन में एक ता विचार आवी रहल आची.
- 20:57–20:59आई, की विचार आची?
- 20:59–21:04आई हमरा सब देख्लू, जे कोना मेठली भाशा आपन दोनिक इसपष्टता कारन,
- 21:04–21:10जबापनी हाएकु अप फर्सी गजल का गनिती या सन्द्रचना में एक दं फिट बशी जात अची
- 21:10–21:19तक की एकर आर्ठ एब हेल जे दुन्याक सबता भाशाक पाचा एक ता अद्द्रिश्ष, सर्वो भोमिक, उनिवर्सल गनित काच कर अची
- 21:19–21:49और बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बा�
- 21:49–21:51उही आद्रिश्य गनित के माद्ध्धम सा,
- 21:51–21:55जे लोग सनएच्छति उसाभेही पर विचार अवष्चे कर थी.
Plain text
सदारन ते जगन कोनो मेटिकल डाइएक बात हुई तची, तमने उते एक ता पाथर संस पष्टताक उम्मिद रहे तची. आ, एक दम, एक दम बाईनरी आची. सत्य. मனे एकदम इंजेनरिंग जगा जे हाथ तुतल आची ता एकश्रे में तुतल उ जर रेखा साप दिखा जाई तची. आ दोक्तर उक्रा दिखा का कहे चतिंजे दिखु एतचे पातल. बिल्कुल, उते कुनो कन्फुज्झन नहुए तची, शायद वला बात नहुए तची. मुदा, मुदा तचन साहित्तिः विचार असमिक्षाक दून्या में, जकन हमरा सब कदम रखाई ची, आजानक सो एकस्रे मशीन काजकर बंद कर दे तची. अदे सब कुछ दूंदला बहुजाई ता ची एक दम दूंदला कोनो कवीता वा कतात मुल्यांकनक परद्रष्य दिस देखाई ची जे इमान्दारी सा कहल जाई तब दब वेक्ती परध कची हम्रा मन में प्रषन उठाई ता ची जे उ की साहित्तेके एकस्रे करबा कोनो वेग्यानिक तरीका नेभहसकता ची नहीं बड नीक प्रश्ना ची की कोनो कविता वा कता के मापीक कहल जासकता ची जे इपुरना ची वा अपुरना देखू, सदारनत या लोक माने ता ची जे साहित्तिक मुल्ल्यांकन केवल भावना पर निरभर करेता ची माने कोनो गणितिये फरमूला वा एकसरे जका नहीं लोग कही ता ची, जे नीक लागल ता नीक अची मुदा एही ताम गजिंद्र ताकुरग लिखित मेठली समिक्षा शास्ट्र जका पोती हम्रा सबवक सोचकिन बदल देटाची एज पोठी आची, इज साहित्तिक उही धुन्धलापन के साफ करबाक एक ता एकसरे मशींजका काच करेचे इज हम्रा सबवके एक वैचारिक तराजो देटाची यही बात हम्रा सबवके आजके एही गहीर अद्धेन माने, आजके एही विस्त्रित चर्चा दिस लोजाई तछी, गजेंद्र ताकुरक इपोति कोनो सादारन समिक्षा नहीं आची. एक दम नहीं यी बहुत व्यापक आची. आआ, इस शाहित तिक विभिन्न विदा जिना, वेहनी कता, लगु कता, कविता, कजल, अहाईक। किर मुल्ल्यांकनक, इक तविस्त्रित, वेद्यानिक अदाशनिक आदार तध्यार करीताची. आई देखा बड़ रोचा काची, जे कोना चोट से चोट कता वक कविताक पच्जा, कते गहीर गनीत अ मनो विग्यान नुकाल रहाईता ची तजव हम रा सब गद्यका सब से चुट रूप से शूरू करी मने एक ता पैग अपन्यास्ता साथ सपाईसो प्रिष्टदरी कोईत ची हा उतो एक ता महाक अब विसन भोगिलक बलकल आएक्त सादारन कता वाल लगु कता उ तीं चार प्रिष्टक बहुसके दची मुदा इविहनी कता जी आची उ मातर एक से चार प्रिष्टक होई तची आकार मे इज़ सबसा चोट आची मुदा विश्वास करु एक रा भुजब उते के जटी लची मुदा प्रष्ने इए आजी जे मने एते चोट कता मे पुरनता कोना आवी सकते जे. लोकक मन में इशंका अवेट आवेट आजे आव, मने एक दू प्रिष्ट में ता मात्र कोनो गतनाक जिक्र भहसा के तचे इत तक उनो चुट्कुला वा हासे कनिका जका बहुगल नहीं जे सुनलू आजासी कबसी रिगलो आव, इब हम बहुत लोकन के होई तची जे चोट कता मने चुटकुला मुदा विहनी कता आजाशे कनी का मने जोग होगी तच्छ उही में जमीन आस्मान कनतर जे औना अनतर की आची मुख्य रूप से देखो जाशे कनी का केवल एक ता पन्चलाइन पर निरभर करे तच्छी अखर अंद में हसी आवे चाही मुदा विहनी कता कलेल एक ता पूँड गटना चकर की आवशकता होई देची मैं गटना क पूँड ता आवशक अजे एक दम औही एक दू प्रिष्ट में लेक्ख के पूरा संसार ताड करे पडेच चनी विहनी कता में जे चीज सब सब महत्वा पून अचे उआचे तवरित विचार माने कुएक प्रेज्टेशन्टेशन अगट तवरित विचार आदार अदार बादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्रदादा प्र� उभी आपीफेनीक आवष्खता होई तचाई एक ता एहन जदका जे पाथकक सोचने पर मजबोर कर दैई जदे पाथक के एके बेर में पुरा समाज वा व्यक्तिक मान्सिक स्थी भुजहा जाए एक रा भुजवाग लिल मैंने हम्रा मुन में एक ता अनलोजी आभी रहा लवे आप खफु? विहनी कत्हा एक ता एस्प्रेसो शोट जखाच जखन क्योपन्यास एक ता पैक जग फिल्टर कोफी जखाच औहो! बडणीक द्रिष्टान! प्र्स्शो में पानी वा दूद नहीं मिलाल जाई तची उई में कता कोनो फैलाव नहीं आची मुदा उई में कैफीन के पुरन जथका होई तची आओजे कैफीन अग जथका आची सई साहित में एपीफीनी आची आदूनिक मैठली गद्द अब दिरगा कार उपन्यासक परमपरास निकलीक, एही एसप्रेसो शोट दिस बद्रालाचे. मने आप केवल पएग पएग पोठी नहीं लिखल जाराची? ना, पोठी में मुन्नाजी कता रेवाज कजे द्रिष्टान्त देल गेलाचे, उ एकर सर्व श्रेस्ट हुदारन आचे. उप, उगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग जे का कता सब एह विद्धाक शकती के प्रमानित करेता चे मुदा एते हम एक ता प्रष्नुथा वे चाहा ची हा खाल जाय? जा बहनीत कता मे तवरित उपस्तापना या मने बभर्द सबात क्वाग जित तडाहुडी रही ता चे तक वही तडागुडी में लेखा कहानिक मुल बाव औस थाइतु के नस्ट नहीं का देच्टीं। औफ, ये एक तप पयुख शंका जे मने की हमरा सब गेराए गमा नहीं रहल ची? जल्द भाजी में तो रस्गुल्ला गोटे निंगल बासन बहजाई तच्छ, स्वाथ तबुजबा में नहीं बे तच्छ. इग खत्रा निष्चद रूप से आच्छ, अप पोथी एहे पर भुथ विस्तार से चर्चा करे तच्छ. पोदिक तर्क अची जे यदी तवरित उपस्थापना के चकर में कता खस थाई तवव, या जे लिंगरिंग अप्ष्ट अचे जे प्रभाव रही जाई तचे. एक दम जा उ नश्ट बहजाए ता उश्रिष्ट वेहनीट कता बही ही नी सके तचे. अद्क्रिष्ट वेहनीट कता खुना लगा चे अद्क्रिष्ट वेहनीट कता उगी तवरित विचार के एहन सीजल तरीका से पेष करे तचे जे पढवाग बादो उकर गुज पाट्खक मस्तिष्क में बनल रहे तचे उब भर्दसा सखतम जरूर भजायत चे उ बददसा खटम ज़ोर बजायता चे मुदा मस्तिष्क में उकर प्रभाव बददस खटम नहीं होई ता चे अहो तमानी लेला हूं, जे लेक्हक एक ता एसप्रेसो शोड जाकां कता लिख लेलान ही जाही में लिंगरिंग अप्टागत आईच उद्या आप प्रष्न उद्याए जी उगदा कता कते क उद्क्रिष्ट आची एत एक अगरत? एह तो समिक्षाक का जज़े? उगदा एकर मुल्यां कनक माप्दन्द की हो यद? एक ता पाज सो प्रिष्टक उपन्यासक परगबाक जी तराजू अची तो उग़ा तो एक से चार प्रिष्टक कता नहीं तोलल जासकई तचे बलकल नहीं आ एते से हमरा सब समिक्षाक उही जटिल जाल दिस बड़ेची जटे साहिट्तिक परखवा किलेल पाश्षात दरषन मैत्ली साइत दबीच एक ता अदुथ तालमेल दिखाएल जे कारन जे समिक्षाक अर्थ मात्र इखभ नहीं जे इग कता नीक लागल, वाइग खराब जे प्या, नीक अखराब तवेक्ती परख भगल, हम राजे नीक लागल आहा के खराब लागी सकते जे यक दम तहीले बग्यानिक माब्दन्द चाई पोत्ती एही ताम देरी दाए कविखंडन वाद मिशल फुको कषत्ता संदरचना आमाक्सवाज्यका बहरी भरकं पष्ष्ट्वी सद्धान्त के मेठलीक संदर्भ में उतारे तची मुदा एही भारी भरकम सिद्धान्त सब के तनी विस्तार से बुजगवे परत, देरी दाक जे विखंडन वाद अची उ कोना काज करत अची. देगो देरी दाक विख्चन्दन वाद मने दीकन्स्ट्रक्ष्छन मुलता ही कहेत आची जे कोनो भी पाट, तेक्स्ट, केवल एक ता सीथा अर्ठ नहीं हुए तची माने जे लिखा लची वोकर पाचा किचु आवर आची हा जे लिखाल आची उकर पाचाक पुर्वागर, उकर समाजक मान्सिक्ता अच्षुपल आप्त के उखाडक देखबा, उकर खंद-खंद का उकर आप्त निकालब आवश्यक आची. पोती में एकर बर्स टीक अख़वा उदाहरन आची. औग़ाहरन की आची? तारनन्द व्योगी द्रार कम्रुद्दीन कता नमाजे शुक्राना कसमिक्षक जी विश्लेशन आची उविक्श्ण्डन वादक एक्दम साफ कर देताची उख़ो उख़ो कता अवकर समिक्षा उख़ो हम्रा मान आची जते हाजी साहेबक नमाज के समय में एक ता सुगा सीता राम बज़ेता ची एक दाम आहाजी साहेब नमाज में खलल पडवा करन रुदबो का उही सुगा के दिवाल पर पटकी का मारी देच छती इते एक ता क्रूरा हिंसक दूष्या ची चत्य बाजिल हो मुर आब समिक्षका के पूर्वाग्रह देखू, एक ता समिक्षक एक अत्ठा के समप्रदाएक सवहार्द का था कही देच्छती। बाप्रे, इतो हास्यास्पड आची, सूवा का हत्या बहे रहले ची, नमाजग भीच मे सीता राम सुन्ला पर गुस्सा आभी रहले चै, अ समिक्षक उक्रा सुवहार्द कै रहल चतीन. इख कोना समब है ची? इह देरीदाख का सिद्दान्त बुज्वेत अची. मने कोना? समिक्षक अक मोन में, पहिनी ही से एक टाचा बनाल चल, जे मुस्लिम लेखा कची, हिन्दु मुस्लिम तत्वा चे, ता इी जरुर सोहार्द कचा टेक. समिक्षा कचा के यतार्थ वादी क्रूर पाट के लिन नहीं. उबस शब्द के अपर से देखलिलनी. औह, मने उआपन चश्मा से दिखलनीं यतार्थ से नहीं. एक्दम! गजेंद्र ताकुर दे विख्ण्ण्वादाक प्रियोक्का के दिखावे चतिन, जे बिना पाथ्खे गैराई से चीर पार्ड किने, समिक्षा किना अनेतिक अपुर्वाग रही भहुसके तची. सत्या ची. विक्हन्दन बाद उप्री सवहार्द का अव्रनक फाडेक कता के अकर नगन आहिनसक यदारत में पडबाक साहस देप अची इबडद दम्दार विष्लेशन अची माने जिना कोनो एकसरे मशीन सा रद्दीक वीत्रक टुमर दिखार रहल होए बलकोल मुदा, अद्ते हम फेर सा नम्रता पुरवक एक ता प्रतिवाद करव. आप, की शंकार ची? की फोकोल्ट आदेरी दाजका. पश्च्वी विचारक के चच्मा पहरिका, जे हमरा सव गाम गरक मेठली कता का समिक्षा करी, तकि उईसा मुल देशी ए बहाँ नय हुं देरा जायत इप्रश्न प्राया उठाई तची मने कि हम पाश्टाते फ्रेमवर्क के जबर्दस्ती देशी साहित्ये पर नहीं थोपी रहल ची एक ता थेट दिहाती काका कव्यता वा जमिन्दारक अट्याचार के फोकोल्ट कर लेंस नापव्त की बेमानी नाया ची हम्रा लगाई तची जे इज़ववर्दस्ती के बाद्धिक थोपव अची आहां की दर स्वबावेग आची, आईईबहस सहित्यमे बहुत पुरान आची मुदा फोकोल्ट वा माक्स कोनो पश्चिमी बपोती नहीं चतिन माने उस सारवभामिग चतिन रहा हा फोकोल्ट का मुख्छ सद्धानत आची सत्टा का विमर्ष पावर धिनेमिक्स प्र्कोल्ट का एच्छतिन ज़ि सत्ता मात्र सरकार वा पुलिस नहीं चलावे तछी सत्ता समाजक हर रिष्ता मे आची जना गाँँ के मुखिया किसानक बीच इग्दम जगन गाम वीटा जमिंदार कोनो गरीब किसान पर अथ्तिआचार करेत अची तकन उते जे सत्ता खेले ची, जे भाशा आश्वक्ती के असन्तुलन आची, उक्रा फोकोल्त के लेंस सां बर्स पष्तता समबुजल जाज सके तची. मुदाओ त हम्रा सब अपन भारत्ये द्रिष्टी कोंसा, आपन माटिक समस सा से हो भुजी सक अची, माक्स मा पुकोल्तक मुताज की अग बनी? हम्रा सा मुताज नहीं बनी रहाल ची बलकी उपकरन तूल्स के अपना रहाल ची जे गुरुत्वा कर्षन के खोज नुटन केल नहीं जे पश्च्मी चला तक की हम्रा साभ इखहाप जे आम ख़साएत छी तवोक्रा हम देसी तरीका सा व्याक्या करब नूटन के नाम नहीलेब हो, हो, यी बला सतीक तरक अच्छे गुरुत्वा कर्शन जैना भहुतिक निज्यानक सत्य आच्छी तहीना फुकुल्तक सत्ता विमर्ष समाजा गुरुत्वा कर्शन आच्छी पोथी के तर्क इए ची, जे मानविय वेबार, शोषक अशोषित कर, जे मनो विग्यान अची, उसार वो में कची. हमहां के तर्क साँमत भाराल ची, जे हमरा सबक कता विष्वस तर्ग ची, ता उकर परिक्षन से हो विष्वस तर्ये उपकरन से हे वाग चाही. इक्दम, मैठ्ली साहित्ते एते क्परिपक्व अची जे उक्रा विष्व का कोनो भी बोद्धिक माप दन्द पर कसल जासकता ची. सत्यकालो, आपन साहित्ते के कुवाक मिधख बनाकर रक्भ, सही नहीं. तग गद्य कविसले शन में तदेरीदा आ फुकाल्त आवीगेला, मुदा जखन विषे पद्ध मने कविता दीस गुरे तची, तचन समीक्षाक इ एकस्रे मशीन कोना काच करे तची? उते बात बदले तची. आँ. करन कविता में तले चन्द आव आर्थक प्रकती करन सब समहत पुरना चे उते की मारक्स वाप फुकाल्ट काज करे चती इते पोथी आपन द्रुष्टिकों बडले तची आ एक दम सा प्राचीन भारत्या सिद्धान्त दिस मुडी जाए तची प्राजीन भार्त्या सिद्धान्त? रच सिद्धान्त तबुजबा में आवाईत छी. बबरत्मूनी आ लोलतक, रच सिद्धान्त हमरा सब जानेच्छी. जे कोना कोनो इस्थाई बाव रच में परनेत होई तछी. बलकुल. तो थी बद्दान्त फम्रा सब जानेच्छी जे कोना कोनु इस्थाई बहाँ रस्मे परने थोई तची बलकुल मुदजे सब सब भेसी गही रची उआची बबरत्री हरीक सपोट सद्दान्त सपोट सद्दान्त पहोट सद्दान्त जते दरी हम भूज़ेई ची इसी दान्त कोई तचे जे उ खोना अक्चर से सबद, अश्वद से वाख्यक निरमान से पहिनहे ए, एक तो समपूरन अर्ठ मस्तिष्क में विस्फोट जगा प्रस्फुटित होई तची. पूरन रूपेन. मैं आर्द खंद खंद में आवाई तची इक दम नहीं शब्द कुछारनक संगे जे आखंद आर्द का बूद होई तची उ एक्के बेर में मस्तिषक में पूटे तची उक्रा आहां अलगलग नहीं कर सके ची एक रहा में ता अनलोगी से बूजवग़ जाहाब़ आप ख़ो इए उहिना आची जेना आख मूह में रस गुला जवाख संगे बिना चबोने एक भे रोकर पूरा मिठासक अनुबूती मस्तिषक में विस्फोट कजाई तची बाए बड़ मदूर उदारन ची आजा की सोचबाक अवष्चकता नहीं पड़े तची जे इचीनी आची, इचेना आची, इ़ रष आची शबदक पूरा अथ सुन्बाक संगे मस्टिषक में पूरन चीट्र बनादे तची बलकोल आजा इ कविता नीक नहीं आची उ इना अची जना मूह में कच्छा आटा और चीनी राख दिल येल होई, उते सवोट नी भेल. एक्दम सहीद रष्टान्त, आए हे सवोट सिद्दान्तक प्रेयोग पोठी में, बच्चुं जीक, कविता सब, जना, स्वागत, बेटी बनली पहाड, गाँ में मों पड़े ए, पर कैल गेल अची. औहो! पोठी दिखावे तची, जि कोना उ कविता सब मस्तिष्ट में अद्ख सबोट करे तची. पोठी एतिःदरी दिखावे तची, जि कोना एह सिद्दान्त का माद्ध्यम से इकta कविता के माक्स वादी, रूप वादी, नारी वादी, और अस्तित्तो वादी द्रिष्टिकोंचा �alag-alag-padhal-jaasakai-tachi. मुदद, एही कहन्द में एकta-brat-tikshna-alochna-si ho-achhi-nai. आदूलिक मेठली कविता कतता कतित सुखल मुख्यदारा पर प्रहार. आँ, एब बहुत ज़ोरी प्रार्चल, पोठी उही कवी लोकनी दिस इशारा करे तची, जे केवल पुरसकार वा सेमिनारक ले लिख़े च्छती. माने जे बोद्दिक विलासिता में लागल च्छती. इक्दम! एहन सहिट्ते ग्रामीन वद्दलिद समाजक यतार्त सब पुन ता कतल अची. जगन सहिट्ते केवल बोदिक विलासिता बनी जाई तची. और जमीन का दूरी सा उकरनाता तुटी जातची, तकन औरस विहीन असुकल बहजातची. सत्टिवाजलों? उही में उरस गुल्लावाला स्पोटक का गुन्जाइष नहीं रहाता ची मने कविता में प्रान नहीं बचाई ता ची केवल शब्दक सजावद रही जाई ता ची तद जं कविता क वियाकरन उकर दहनी विग्यान इते क वेग्यानी कची जे उ मस्तिष्क में आर्थक विस्झोट का सकेता ची तकी इ देसी विग्यान, विदेसी विद्ह सबवपर सए रागुबा सकेता ची इ प्रष्न हम्रा सबवके गजल आ जबानी हाईकुक मेतली समस्करण में प्रवेश करावेता ची मैं पास्चात्त्या सिद्द्धान्त सद्देशी कता के मापी सकईची तकी देशी भाशा सब विदेशी विदाखे अपना सकईची एक दम आई पोठिक सब से बेशीक तकनी की और रोचाख हिसा आचे गजल लिखवाक आर्थ मात्र तुखबंदी नहीं आचे तक्ये जे आर भी फार्सिक जिब भेहर आचे जक्रा हमरा सब छन्द वा मीटर कही ची आद ताफ्या रदीप आची उकर कडाई से पालन कर अब आवश्षक आचे आई ही बात पर मैठली साहित्ते में विवाद सीहो भेल आची पोथि में 2 युख के चर्चा जे, एक ता जीवन्युग, जता एक गजल बिना बाहरक, बिना गनेतिय नियमक लिखल जाएचे, अदो सर अंछिन एक जाएँग, जता एक वेब पोटल अंछिन अगर कमाद्द्यम सा बहर में गजल लिखवा कडा नियम लागु कल गेल. संगे संग, जापानी विदा हैकू कसे हो चर्चा आचे हैकू पाज सात पाज सात पाज वरन के सन्रचना में लिखल जाएत आची एक दम, जापानी विदाक इग कला गडनती ए सन्रचना आचे इते आ, मैत्टिली भाशा का द्वनी विग्यान, फोनेटिक्स का जादू देखे में आवेताच. जिना, हमरा सब बात करी अंगरेजी वा हिंदिक, अते जे लिखल जाईते छे, आवश्षक नही, जिस सही भाजल जाई. सत्यकाल हो, अंग्रेजी में साईलिंट लेटवाजाई जे. अर हिंदी में से हो अंप्मे आगा उचारन लुप्त बहुजाई तची. जेना हिंदी में कमल लिख़े ची तचा मा लग, मुदा बाजे काल उख्कमल जगा का सूनाई तची. अन्तिम आमान बवजाईताची मुदा मेत्फिली में जेना लिखल जाईताची इक्दम उहेना बाजल जाईताची स्वर आव्यनजना कस पस्टता माने जब कमल लिखल अचे उच्चारन पूरा का मा लगे ते बिल्कुल एही कारन्सा ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ बवावनाग ये बहुगिल नहीं नहीं एक राएक्ता दोसर अनलोगी से बुजु राएक्ता बुजु बवावनाग ये बहुगिल नहीं नहीं एक राएक्ता दोसर अनलोगी से बुजु राएक्ता बुजु बवावनाग ये बहुगिल कहु? बहर वच्छन्द, उ कार चैसिस अफ्रेम जगाएज जे कार में चैसिस मजबूत नहीं होएद, तए इंजन जित्टेख भी शक्तिषाली की एक नहीं होएग, गाडी कापी का बिखर जाएज. औहो! गनित्या बहर, औही भावनाक इंजन के इस फिरता देटचे, जाएसा उस सही दिशा में तीवरता सा आगु बहर सके, बिना बहर अग गजल उही कार जका एच जकर कोनो दाचा नही आचे. गजल कु दारड, चेसी सा इंजन ताल मेल, बिना मज्बुद दाचाक बहावना बिख़ड जाएत इब बहर और चन्दग गनी तक बुजवाग सब सनिक तरीका आचे एक दम और ये कारन अची जे मेत्हली में गजल वा हाएकु कोनो विदेशी महमान जका नहीं लगगे तचे बलकी उ मेठलिक अपन द्वनिक विग्यान में पूरी तरा से रची बसी जाई तचे. अखत कुल मिलाकर यह अद्दियन हमरा सब केल हूँ इबुजवे तची जे साहित ते केबल पडबाक अबहावना में बभाबाक वस्तू नई आचे. सत्या ची इएक ता एहन प्रियोक शाला आची, जतः भाशा, समाज, दर्षन, अविग्यान का मिलन होई तची. गजेंद्र ताकृ का मेठली समिक्षा शास्त्र इब भली भाती देखावे तची, जे मेठली साहित्ति, मात्र अपन परमपराक महिमा मन्डन न नहाए लची, बलकी विश्वक नुगका से नुगका विमर्ष्खे आपन बोद्धिक कसी पर कसी रहे लची आप चाहे ओ देरी दाक विखंडन वाद होए, वा जापानी हाईकु गनितिय गडना सप्ता के मेठली आपन अनुसार आपना रहो लची औगर परिच्छन को रहो लची ता आब जगन इच्चर्चा आपन वासांक दिस आची जे श्रोता लोकने सुनी रहल चती, उनका लेल हमर मन में एक ता विचार आवी रहल आची. आई, की विचार आची? आई हमरा सब देख्लू, जे कोना मेठली भाशा आपन दोनिक इसपष्टता कारन, जबापनी हाएकु अप फर्सी गजल का गनिती या सन्द्रचना में एक दं फिट बशी जात अची तक की एकर आर्ठ एब हेल जे दुन्याक सबता भाशाक पाचा एक ता अद्द्रिश्ष, सर्वो भोमिक, उनिवर्सल गनित काच कर अची और बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बा� उही आद्रिश्य गनित के माद्ध्धम सा, जे लोग सनएच्छति उसाभेही पर विचार अवष्चे कर थी.