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SADEHA 27 निरालाक_कविताक_अनुवाद_आ_परकाय_प्रवेश.m4a
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- 0:00–0:11विमर्शक इं मंज पर आजक स्वागत आची, जखन हमरा सब सरजरी, वषल्य जिकिच्साक बात करे ची, उता एक ता यान्त्रिक सतीक्ता कपेचा हुई तचे.
- 0:11–0:14रहा, उते गुन्जाएष नहीं रहाद चे गल्तीक.
- 0:14–0:26इक्दम, मने बूजु जे देख कोनो हद्दी तूटल, तद दोक्तर एकसरे में उज़र रेखा के देख लेकिन, अस्पष्ट कही दे लेकिन, जे देखु एत एस समस्या आची.
- 0:26–0:30सही बात, इप्रक्रियात पुणत भूथि का चे, दिश्यमान आचे.
- 0:30–0:47बलकुल, मुदा जकन हा एक ता बाशाक आत्मा के, तो तो तो बाशाक देहि में प्रत्या रोपित करबाक प्रयास करे ची, तकन औए एकस्रे मशिन काज नहीं करे ता ची. बाशाक भीटरक जे प्रान वायु आचे उकुन तस्वीर में नहीं आब आचे.
- 0:47–0:50अगर अख्र अख्रे सा नहीं पक्रडल जासके तची
- 0:50–0:53ता लेल, हम्रा सब आई, अनुवाद विग्यान,
- 0:53–0:57अशाहित्यक एक ता एहन परित्रुष्यमे प्रवेश कर रहल ची,
- 0:57–0:59जे बद जती लचे.
- 0:59–1:03आई, हम्रा सब, विदेः सदे सथ्ट्फीस में संकलित,
- 1:03–1:11रवी भूशन पाथक अट्यंत विचारोथ तेजक निबंद निराला दे विदे का अदार पर चर्चा करे रहल ची.
- 1:11–1:14आई निबंद अनुवादक बहुत रास परद खोले तची.
- 1:14–1:15एक दंब खोले तची.
- 1:15–1:23आद ताही सा हमर आजदरिक जे मुल प्रशन आची उई आची जे जकन दूटा भासाक उपत्ती एक रेंगे भाल हो.
- 1:23–1:26जे नहींदिया मैठ्छली तोनु संस्क्री दक अप भ्रहन्सा आची.
- 1:26–1:29रहा है, बाशिक जडी समान आची.
- 1:29–1:34तए एहन स्तिती में की अनुवादक लेल शब्दानुवाद अदिक प्रमानि कचे
- 1:34–1:39वा बहुवावाद अनिमारे आची जकर लेल अनुवादक के पर काई प्रवेश करे पडेचे
- 1:39–1:41इब रोट बेएक प्रश्न चे
- 1:41–1:48अमर स्प्ष्ट मानेता आची जे समान भाशिक ज़ी रहला पर सहो भावानुवाद अनिवारे आचे
- 1:48–1:54करन बिना अनुवादक कक पर काई प्रवेशक अनुवाद मात्र शब्दक ककंकार बनी कर अई जाएचे
- 1:54–1:58दिख।, हम एक रा एक दा भिन दिशा सदेखाद जी
- 1:58–2:28अखर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ�
- 2:28–2:30अद अद अदिक सुरक्षेत अचे
- 2:30–2:33इन निष्थावान आप्रमानिक पद्दती अचे
- 2:33–2:35आहा शब्दक के बदल्लासा
- 2:35–2:38मुल क्रितिक वास्तू कला के बद्खा देच्ची
- 2:38–2:41मुदा क्या अनुवादक के केवल वास्तू कलावा
- 2:41–2:43इटा पातर दरी सिमित केल जाए सके तची
- 2:58–3:00अदिक वाबिदात्मक बासकेत था ची
- 3:00–3:02अदे आहाके एकस्रे मशिन काज कर जाएत
- 3:02–3:04मुदा बहाँ प्रदान कविता
- 3:04–3:07मुदा कविता में से हुत शब्दक चैन महत्पून होईच्छी
- 3:07–3:12होईच्छे, मुदा उक्रा आहा केवल शब्द कोष सन नही उतारी सकच्छी
- 3:12–3:20जखन हमरा सब हिंदी आ मेठलिक बात करे ची, तदून्नू भाशा संस्क्रित अप ब्रन्शक उत्तर अदिकारी एची.
- 3:20–3:24राती वद दिनजका हजारों शब्द दुन्नुठाम समान अची
- 3:24–3:26इजे भाशिक सामिप प्या ची
- 3:26–3:27बुजलिये ना
- 3:27–3:29इवास्तब मेक ता पैग ब्रहम अची
- 3:29–3:31ब्रहम कोना भासके तेची
- 3:31–3:32इट सूविदा आची
- 3:32–3:33नहीं
- 3:33–3:37इच समानता अनुवादक के आलसी बना देचे
- 3:37–3:42अनुवादक सुचे च्ठिन जे हिन्दिक शब्द के मेठली जका लिख देल हूं, तानुवाद बोगेल,
- 3:42–3:49मुलक जे उदात भाव अची, अख्रा पक्डबाक लेल भावानुवादक प्रग्या अनिवारी अची.
- 3:49–4:19अनुवादक के इब श्री जी बाखच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्�
- 4:19–4:22दोसर भाशाक शब्दिक प्रतिक संप्रतिस थापित करब अची
- 4:22–4:25मुदा भाशाक किवल प्रतिक त नहीं आची ना?
- 4:25–4:26रुकु
- 4:26–4:29अनुवाद कोनो रहसे मैं जादू नहीं आची
- 4:29–4:31इब भाशा विद्ग्यान आची
- 4:31–4:32जकन मेठिली
- 4:32–4:35आहिन्दिक शब्द भंदार समान अची
- 4:35–4:37तकन भावानुवादक नाम पर
- 4:37–4:38मूलक शब्द योजना
- 4:38–4:42लए आद्वनी सविनुख होबा कि आवश्षकता चे
- 4:42–4:44कारन बाव हीराज़ाई तची
- 4:44–4:46नहीं हीराई तची
- 4:46–4:48कविताक समग्र प्रभाव
- 4:48–4:51उकर शब्द दूनी असंगीत पर निरभर करेचे.
- 4:51–4:55जो निराला जी कोनो विषिष्ट तद्सम शब्दक चयन केल आची,
- 4:55–4:58उकर एक ता नादात्म कारन आची.
- 4:58–5:00उद्छनी आहाक कान में कोना परत,
- 5:00–5:02एकर विचार केल गेल आचे.
- 5:02–5:06शब्दानुवाद एही द्हनेक सन्रक्षित रखाईताची
- 5:06–5:12आहापर काई प्रवेशक नाम पर रचीताक मुल वास्तुकलासब बहुत दूर चलीजाएची
- 5:12–5:15जे अनुवादके प्रामानेक नहीं रहे देताची
- 5:15–5:18आहाची द्हनिक तरक्सूनी में बेस नीक लगे तची
- 5:18–5:20वास्तम एक्ता जाल आची
- 5:20–5:22पात्ख जी आपन निबंद में
- 5:22–5:24इटा शब्दक सती कुदारन दैचती
- 5:24–5:26इटा शब्दक सती कुदारन दैचत्छती
- 5:26–5:28आ, इटा टबवषवदची
- 5:28–5:30इटा टबवषवदची
- 5:30–5:32जे मित्लाक व्यापक भूबाग में स्विक्रित आची
- 5:32–5:34जकना हा अनवाद करे ची
- 5:34–5:36तो अनवादक के शबदकोश सागु बड़ी के
- 5:36–5:38अर्थ के बिविन्नस्तर
- 5:38–5:42अगर स्थानी एडा के समजे परएचे
- 5:42–5:46मुदा इंटा अ इईट मे तमात्र उचारनक भेद अची
- 5:46–5:51नहीं जा आहा हिंदीक इट केन केबल मैठलीक इटा कदिल हूँ
- 5:51–5:53तो उशब्दानुवाद भेल
- 5:53–5:57मुदा की उही वाग्य मे इटा उही अज्ट मे बजल जार है लच
- 5:57–6:00अही वाग्य मे इटा उही आर्ठ मे बजल जार है लगछ
- 6:01–6:03अनवादक के इब जेपरत
- 6:03–6:05जे कोनो शब्दक प्रयोग कोना कैल गे लगछी
- 6:06–6:09पर काय प्रवेश कोनो रहस्से मैं जादू नहीं आची
- 6:09–6:11इएक ता बोद्धिक अनिवारे ता आची
- 6:11–6:15वहांगा नहीं लगेत अची जे ये टिक अनिवारे अची
- 6:15–6:18आहा उमर हयाम कर रुबाएक उदारन देखू
- 6:18–6:21फिट जराल एकरा फंगरेजी मानवाद के लखी
- 6:21–6:23आहा उबहुत प्रसिद दबाल चलेन
- 6:23–6:26आहिन्दी में मैत्ली शरन गुप्त, बच्चन जी,
- 6:26–6:30असुमित्रा नन्दन पन्सन दिगगज लोकनिक एकर अन्वाद केल कान
- 6:30–6:34सबखक अन्वाद में भाँ भंगिमा अगुन्वत्तक जो अन्तर अची
- 6:34–6:38उआन्वादक के परकाई प्रवेषके प्रमानित करे तची
- 6:38–6:40मने आहा कहव अची जे
- 6:40–6:45जजद्तिक गेह्राईसा उमर ख्यामक मनो विग्यान में प्रवेश के लक,
- 6:45–6:47उकर अनुवाद उत्वे जीवन्त भेल.
- 6:47–6:52मात्र शब्दक के एक तो सदोसर तां गस्के बसं कविताने बनेत अची.
- 6:52–6:56मुदा उही पर काई प्रवेशक जे आहा वकालत करहल चाए,
- 6:56–6:59उता अनुवादक कोनो सीमा में नहीं बान देच्छे?
- 6:59–7:02सीमा का वच्च्ता की अच्छे, जखन भाउ पूँची रहा लगचे.
- 7:02–7:07आई चे आवच्च्ता, इवनुवादक के एते कती सुत्टरता दोदेच्छे,
- 7:07–7:09जे उ मुल रचेटा के ही पाचा चुड़ देच्छती.
- 7:09–7:11अगर इटाक अकार प्रकार बदलल जायात्त्।
- 7:11–7:13नहीं अगर जरोखा के दिशा बदलल जायात्।
- 7:13–7:14नहीं
- 7:14–7:16अगर मुल सन्रचना के सन्रक्षित करबाक पुन प्रयास करव।
- 7:16–7:18बहावानुवादक नाम पर जे अती सुत्ट्रता बहते तची
- 7:18–7:19अवाद नहीं
- 7:19–7:21अगर ज़रोखा के दिशा बदलल जायत?
- 7:21–7:25आहा अगर मुल सन्रचना के सन्रक्छित करबाक पून प्रयास करव.
- 7:25–7:29बहावानुवादक नाम पर जे अती सुत्ट्द्रता बेटे तची,
- 7:29–7:34अगनुवाद नहीं च्यानुवाद या अदाप्तेशन करुप लोसके तची.
- 7:34–7:37च्यानुवाद या अदाप्तेशन करूप लोसके तची
- 7:37–7:39च्यानुवाद यी तबेशी बहुगेल
- 7:39–7:40एक दम नहीं
- 7:40–7:44निबंद में उलेख आची जे भबवती चरन वरमा के चित्र लेखा
- 7:44–7:47वास्तो में आनातोले फ्रांस का उपन्यास थाया परादारी तची
- 7:47–7:49मुदा की आहाँ कर अनुवाद कहब?
- 7:49–7:52आ, उक्रा ता प्रेरिद कहल जाईता जै.
- 7:52–7:57ये ता, उनुवाद नहीं आची, उ एक ता नवस्रिजन भूगे लचे.
- 7:57–8:01जखन पाथक कोनो अनुदित क्रिती पड़िट ची,
- 8:01–8:05उ उ इजाने चाहताची जे मुल रचेता की कहलनी आची
- 8:05–8:08उ उ अनुवादकक निजद्द्व नहीं पड़ाई चाहताची
- 8:08–8:13शब्दानुवाद अनुवादकक के अपन सीमा के इस्मरन करवेट रहाताची
- 8:13–8:17आहा की इज अथे हासिक भवनक द्रिष्टानत बेस नी कचे
- 8:17–8:23मुदा, जखनहा उई भवन के नव ठाम, नव माटी पर रखख ची,
- 8:23–8:27ता उत्बा हवापानी वा वाता वरन बिनर है चेना?
- 8:27–8:29मुदा भवन त भवन अची.
- 8:29–8:31जगा केवल एटा मिला रहल ची,
- 8:31–8:33मुदा उई नुतन जरोखा से,
- 8:33–8:35जे हवा भीदर आईब रहल ची,
- 8:35–8:41उक्रा महसुस नहीं कर सकल हूँ, ता भवन ने एक ता कंकाल ताड कर रहल ची.
- 8:41–8:45कवीता कनवाद केवल वास्तु कला का प्रतिस थापन नहीं आची.
- 8:45–8:50इए उई भवनक भीतर के प्रकाष आजवा के महसुस कर अचे.
- 8:50–8:53मुदव बिना इटाक हवा अ प्रकाष कोना टिकत?
- 8:53–8:58जारा निराला कवीता सने निरजर बहग गया है के देखू?
- 8:58–9:00एकर जे आरंभिख पांती अचे?
- 9:00–9:04आप सने निरजर बहग गया है, रेथ ज्योंतन रहग गया है.
- 9:04–9:09एक्दम आप जाहा एकर शाभ्दिक अनवाद मेठली में करब तकी है तै
- 9:09–9:14सनियक जरना बही गेल अची बालुजका का देह रही गेल अची
- 9:14–9:24एह ना अब कहु कि एह में उदर्द अची कि एक रापभधे का निरालाक उशुन्नेता और उदात पीरा बेटेट अची
- 9:24–9:30अगर सगन वरन मेट्डी और दोन्यात्मक्ता के मेठली में जीवन्त रख्वाक लेल आहा के शाब्दिक अनुवाथ से बहर आबई परत.
- 9:30–9:33मुदद तकन उन्निरालाक शब्द नहीं रहत.
- 9:33–9:42अखर सगन वरन मेट्ष्डी और दोने आत्मकता के मेठ्डली में जीवन्त रख्वाक लेल आहा के शाभ्दिक अनुवाद से बाहर आबई परत्द.
- 9:42–9:45मुदद तकन उन निरालाक शब्द नहीं रहात.
- 9:45–9:51पाथक जी जगन एक्रा मेठली में उमुदित करेच थें, ता उश्वद प्रती शबद नहीं जाई च्छतें.
- 9:51–9:56उन निराला के मेठलीक देज में एक ता नव विदेज़का अस्थापिद करेच थें.
- 9:56–10:02अब हावानु वादक साहसिक निरने लए चतिन जाएसक कवीताक मुल आत्मा बची सकै.
- 10:02–10:08हम माने जी, जिस नहक जरना बही गेल अची सूनी में समतल लगचे.
- 10:08–10:13अल्ले अट्यन्त महत्पूरन जे, मुडा एते हमर प्रतिवाद जे.
- 10:13–10:14की प्रतिवाद जे?
- 10:14–10:21दान्ते अस्सर्फिलिप् सिडनीजका दिगज विद्वान काव्यानुवाद के असमभो माने चला
- 10:21–10:23आवकर कारन ये चल
- 10:23–10:27आवकनी अनुवाद के लैए बहंग माने चला
- 10:27–10:29उई लोकनिक अस्पष्ट मत चल
- 10:29–10:37जिच्ण्द, लए, आब बिम्भ युजना, मुल भाशक शब्दक के बदल्ला सा पुणता नष्ट बोजाईता ची.
- 10:37–10:44आहा भावानु अज्सा अर्थत पोचादेब मुदा कविताक आत्मा उकर रूप सा �alag नई भहसकईता ची.
- 10:44–10:45मने रूप है आत्मा ची?
- 10:45–10:56बवहुत हद्द्ख, निराला जखन रेद जवूतन रहा गया है, कहाई चति, तर रेद शब्दक संजि खुड़ुरापनक द्वनी आचे उशाभ्दिक चाएनक परिनाम आचे.
- 10:56–11:03आप पाट में देलगे लिक्ता उत्क्रिष्टूदारन के देखू, सुरेंद्र जा सुमन का अनु गितानजली.
- 11:03–11:05उत बहुत नीक अनुवाद अची.
- 11:05–11:09इग रविंद्रनात ताकृ के गितानजली के ख्स्रेष्ट भावनुवाद अची,
- 11:09–11:12जकर प्रश्ण्सा बांगला विद्वान लोक्नी से होके लिखी,
- 11:12–11:14मुदा एक ता मुलबूत प्रश्न उठे तची,
- 11:14–11:17जो हमरा सब के स्वयम्सा पुजबाख चाही.
- 11:17–11:17की प्रश्न?
- 11:17–11:20की उ रविद्र नाता क्रिती रही भील,
- 11:20–11:22वा सुमन्जिक आपन क्रिती बनी गले.
- 11:22–11:25बावनुवादक ये सब सब पढिक खदरा थी
- 11:25–11:28इं मूल क्रितिके अपहरित कर लेत आची
- 11:28–11:32जखना हा सनेह निरजर भही गेलाई पडेचची
- 11:32–11:36ता आहा निराला के नहीं, रवी भूशन पाथके पडी रहल ची
- 11:36–11:40अनुवादक का आत्मा मुल कविक आत्मा पर हावी बोजायता ची.
- 11:40–11:45आहा के इख कहब जे भावानुबाद मुलके अपहरित को लेची, इब रहुत कठोर दिष्टी कोना ची.
- 11:45–11:48कठोर आची मुदा यधारत आचे.
- 11:48–11:52अनु गितान्जली सुमन्जीक प्रतिबाग परीचायक अवश्यची
- 11:52–11:56मुदा बिचार करू जे सुमन्जीक के लिखिन
- 11:56–11:59और रविंद्रनात्ख दर्षन का मैइत्टिली पाथक के
- 11:59–12:02रदेदधरी एहन जीवन्त रुपे पहुषे लिखिन
- 12:02–12:05जे शाब्दिक अनुवात कहीो नहीं कर सकचल
- 12:05–12:09मुदाउ गीतानजली कम अस्सुमन गीतानजली बेसी भोगेल
- 12:09–12:12जो उ केवल शब्द के प्रती स्थापित करेत रहित दिन
- 12:12–12:16तब गीतानजलीक रहस्स्यवाद मेत्फिली में म्रित्ब हो जाएत
- 12:16–12:19निरालाक प्रसंग में आहाके एब उज़ेः परत,
- 12:19–12:24जे मैठिलीक प्राछीन संसकार अर आदूनिक तक जे आन्दोलन मैइद्हाराची,
- 12:24–12:31उई सामर्त रकहेत जे उनिरालाक शब्द और आर्थक सवर्गिक संसारक आपन भीतर समहित कसुकए.
- 12:31–12:32सवर्गिक संसार
- 12:32–12:37अगाड, अखाट, अखाट, अखाट, अगापईत पेर, इसब शाबदिक अनुवाज समात्र सुचना बनत्त,
- 12:37–12:40एही त्रा नाव बानु, एक ता अदेश जकान लगगत अच्छे.
- 12:40–12:45अवरिहत काव्यात्मक पर्यावरन के रच्ना करे चती
- 12:45–12:49अवरिहत काव्यात्मक पर्यावरन तदनिराला बनोने चला ना
- 12:49–12:52मुदा अनुवाद में उक्रावतारब असान नहीं अचे
- 12:52–12:59अग गाद, अग हासी, अग काँपएद पेर, इसब शाभ्दिक अनुवाद सा मातर सुछना बनत,
- 12:59–13:02एही त्रा नाव बानु, एक ता अदेज जकान लगगे था चे.
- 13:02–13:04अदा चे.
- 13:04–13:08मुदा भावानुवाद सा, इक ता सगन छित्रपडवा इमेज्री बनी जाई था चे.
- 13:08–13:13अनुवादक के इब वोद्दिक जोखिम लेभे पडद, अहाके परकाई प्रवेश करे पडद,
- 13:13–13:18नहींता कविता अहाके हात में मरी जाएत, अहाकेवल अकर पोस्प्मोड़म रिपोड़ पड़ेत रहाँ.
- 13:18–13:25अम एही बात के स्विकार करत जी, जे पाटगजीक अनुवाद उत्क्रिष्ट जी, मुदा आहा के सावदान करे चाहे जी.
- 13:25–13:26कहु?
- 13:26–13:29जखन गद्य अनुवादक के निक्रिष्ट मानल गेल अची,
- 13:29–13:34कारन उही में कविताक अर्ठ, वव्यंग्यार्त बाहर नहीं आवे पावे तचे.
- 13:34–13:38तखन शब्दानुवाद के पुनता खारिज नहीं के लगा जासके तचे.
- 13:38–13:43शब्दानुवाद कम से कम मुल्क्रितिक सनरजनात्मक गवाहीत दएत अची
- 13:43–13:46गवाही? माने कोट कचेरीक दस्टावेज?
- 13:46–13:50माने, इग्टा एतिहासिक दस्टावेज जका काज करे तचे
- 13:50–13:54जे बतावेट अचे जे निराला वास्तव में की शब्द चुनलक
- 13:54–13:57ब्हावनुवादक संख सब सम्प्यक समस्या एजे,
- 13:57–14:01जे इवनुवादक के ब्रम्त दिशा में लोजा सके तचे.
- 14:01–14:03ब्रम्त दिशा कोना
- 14:03–14:09दिखु, इवष्यक नहीं चे जे हर अनुवादक रवी भूशन पाथधख वा सुरेंद्र जा सुमन होएद.
- 14:09–14:14जा अनुवादक करचेताक मनोविच्यानक पुन ज्यान नहीं चे,
- 14:14–14:17तो अ परकाई प्रवेशक नाम पर अपन पूर्वागर,
- 14:17–14:20अपन विचार दारा मुल कविपर थोपी देद.
- 14:20–14:22उत खराब अनुवादक कबाद भेल.
- 14:22–14:25मुदा इब रहुत कष्तरनाक स्तिती अची.
- 14:25–14:29शब्दानुवाद आहाके ओई पूर्वाग्रहस बजबैत आची
- 14:29–14:32इई अनुवादक पर एक ता अनुशासन लागु करे तची
- 14:32–14:37इई मुल्क्रुतिक नादात्मकता अशाब्दिक प्रतिक संद्रक्षित रख्खे तची
- 14:37–14:41जास्स्पात्ख् स्वयम आपन निश्रस्ष्निकाली सके
- 14:41–14:44नकी अनुवादक दवारा पूर्वपचाल अर्थख के ग्रहन करए
- 14:44–14:47मुदकी अनुशासनब कन नाम पर हम्रा सब के
- 14:47–14:50कविता कदध्धन वस्पन्दने के रोक देबाक चाही
- 14:50–14:56हमरा इबुजहाई परित जे भाशा केवल शब्द्कोष नहीं चे भाशा संसक्रती अचे
- 14:56–15:00विदे सदे 27 में केवल हिन्दी मैठिलीम नहीं अचे ना
- 15:00–15:03हा उही में आनान भाशा के सहो अनवाद अचे
- 15:03–15:08एक दम निराला क्या तिरेक तेल्गु, और्या अ गुज्राती कविताक से हो अनुवाज चे.
- 15:09–15:11यते हा आहा के एक तोस उदारन देची.
- 15:12–15:16तेल्गु कवित्री शीला सुभद्रा देवी के कविता पसीजा कांट के लिया.
- 15:16–15:18अचा, उई कविता में कि एचा.
- 15:18–15:25तेल्गुक वाके दिल्न्यास, वासिन्तेक्स, आमेठलिक वाके विन्यास में आकाश पातालक अन्तर चे,
- 15:25–15:33तिल्गु में करता कर्म आक्रिया का जे क्रम चे, आविशेशनक जे प्रयोग चे, उ मेठलि से सरवता बिन्नचे.
- 15:33–15:38ज़ा आहा तिल्गुक शाब्दिक अनवाद मेठली में करव तब वाखे तुटी जायत
- 15:38–15:40आव व्याक्रन तब एन चे वैंटाम
- 15:40–15:44पाथखक मन वाखे के सोज करबाक कस्रत में लागी जायत
- 15:44–15:47अग कविता क दर्द पुरनता हेरा जायत
- 15:47–15:55या तिल्गु कता जुम्मा के देखू, जते मक्का मसजिदक विस्पोट आयेक प्माएक मनोविग्यानक वरनन अचे.
- 15:55–15:57उ बहुत मार्मेक कता आचे.
- 15:57–16:04उई बम्विस्पोट से उप्जल संट्रास, उ माएक भित्रक चीटकार, उगर आहा शाभ्दिक अनवाद से कोना उतारव.
- 16:04–16:11उई आगहात के पर काई प्रवेष से महसुस के लापर ही उखरा मैठलिक महावरामे धाल जासके तचे.
- 16:11–16:15अवादक के उई माय क दर्दक अपना दर्द बनावे परच्चे
- 16:15–16:18इप ववाग्र नहीं अची इज्समान उबुती अचे
- 16:18–16:23आहा तेल्गु आ उड्याएग जे प्रसंग उठेलो हू उ पूरनता भिन अचे
- 16:23–16:26कारन उकर भाशिक सन्रचना मेठिलिसा अलग चे
- 16:26–16:29तनीम तव अनुवादक ले लिक्ता हे बाख चाही ना?
- 16:29–16:33नहीं, जटे व्याकरनिक धाचा इ अनुमती नहीं देई तजी,
- 16:33–16:36उते आहाके वाख्य विन्यास बदलिए परत,
- 16:36–16:40मुदा हमर मुल विमर्ष लिए न्दी आ मेठ्दे आची,
- 16:40–16:42जते बारी भाशिक सामिप प्यच
- 16:42–16:44मुदा उ सामिप प्यच में कहिल्यन जे ब्रामच
- 16:44–16:46हम्रा नहें लगेत
- 16:46–16:48जते सामिप प्यच अची
- 16:48–16:51उते शब्दानुवाद से अर्थक हानी नहीं होगे तची
- 16:51–16:55बरु उ अपन प्रामानिक्ता बनोने रख ही तची
- 16:55–17:01आहा पसीजग काट का बात के लू, हम मानेत ची जे अनुवाद मे भाव का रक्षा हे बाखचाही,
- 17:01–17:04मुदा उकर शर्ट यी नहीं भहसके तची,
- 17:04–17:08जहां मुलक शब्द योजना के पुनता बद्का दी,
- 17:08–17:10बद्का या ब नहीं उकर नव्रुप देप.
- 17:10–17:15मुदा आहा भूजु, जे कविताक जे द्रष्श्व्य आश्व्य भिम्ब होई तची,
- 17:15–17:19उबहुदा शब्द का नादात्मकतासा निंट्रित होई तची,
- 17:19–17:23जा निराला वकोनो तेल्गु कवी अपन कविता में,
- 17:23–17:31उक्र विकल्प दोसर बाशा में स्रिजित करव अत्यंत कतिनच्छ।
- 17:31–17:33कतिनच्छी मुदा असमबव नहीं
- 17:33–17:37ताही लेल रचेता जे वास्तू कला तयार के लक अख्ची
- 17:37–17:41उक्रा जुं कत्यू सम्मान देब अनुवादक कप प्रथम्द्ध्र्म अची
- 17:41–17:45बाव के रक्षाक नाम पर शिलप हत्या नहीं काईल जासकत अच्छे
- 17:45–17:51इबवद्धिक विमर्ष वास्टव में अख्ट्यंत जटिल आ अनन्द डाया कचे
- 17:51–17:53आए एक्दम
- 17:53–17:58इएक्टा एहन द्वन्द्व अच्छी जकर कोनो एक्टा उतर समब हव नहीं
- 17:58–18:01मुदा अब हम्रा सब निषकर्ष दिस बड़ी रहल ची.
- 18:01–18:03हमर पक्ष एक दम्स पष्ट ची.
- 18:03–18:06अनुवाद कुनो मशिनरी काज नहीं आची.
- 18:06–18:11अनुवादक के पर काए प्रवेश अब हावानुवाद के माद्धियम सा
- 18:11–18:13एक तनव जीवन देवा का विष्चकता ची.
- 18:13–18:25विशेश का कवीटा में, जत्या व्व, मात्र शब्द कोष्दरी सीमित नहीं अची, अनुवादक के रचए ताक आत्मा में प्रवेश करे पड़ाएचे.
- 18:25–18:30जोई हिन्दी अ मैठली निकत अची, तए निकत ता ब्रहम अची.
- 18:30–19:00इई आँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 19:00–19:02अच्तित्वके संकत
- 19:02–19:15अग, अनुवाद एक ता एतिहासेक अ साहित गवाही आची, जक्रा प्रामानेक रहबाक चाही, रचेताजी गर बनिलनी, अनुवाद अक रक्वार आची नव निरमाड करता नहीं.
- 19:15–19:20अमरा सब दून्नुगोते कम्स्कम एही बात पर पुर्न सहमत ची जे अनुवाद,
- 19:20–19:26विषेश रुप से कविता कनुवाद, एक ता अछ्ट्यंत जतिल, बोद्धिक अर अच्नात्मक संगर्ष आची,
- 19:26–19:30जामे आलस्यव वस सत्फी पनक कोनो स्थान नही आची.
- 19:30–19:40पुणता इक्ता एहन्पूल आची जक्रा बनावे मे दूनो देस का माटी के दूनो भाशा का ग़राए के नीक जका बुजर पडे तची.
- 19:40–19:44कोनो एक्ता चुक आपुरा पुल खसिसा कै तची.
- 19:44–19:45एक्टम सही का लिया.
- 19:45–19:51श्रोता लोक्नी के हम आमन्त्रत करे ची जे उ विदेः सदेः सथ्ट्टीस में उपलब्द अन्ने अन्वाद
- 19:51–20:00जेना तेल्गु कता जुम्मा, एपसिता सारंगिक उड्या कविता, आहिमांग आश्विन कुमार देसाएक गुज्राति कविता के सुईम पर्ठ्ठिन.
- 20:00–20:08आप पदक ए विचार कर थिन जे अनुवादक मुल आत्मा शब्द में बसेत चै वब हाव में.
- 20:08–20:13कारिक्रमक प्रारंभ में हम्रा सब शल्य चिकिच्सा आ एक स्रे मशीनक जे द्रस्टान्त देल हूँ,
- 20:13–20:16उक्रापर एक भेड पुनह विचार करूू.
- 20:16–20:21जखनाहा एक ता बाशासा दोसर बाशा में कोनो कविता के प्रत्त्या रोपित करेट ची,
- 20:21–20:25ता कि आहा मात्र हद्डी आम मान सक स्थान बडलेट ची,
- 20:25–20:32वा आहा उही देहक भीत्रक प्रानवाय। अस पन्दने किसे हो दोसर देह में जीवित रक्बाक प्रयास करेट ची.
- 20:32–20:37एक ता एहन प्रष्न अची जे पाथकक के स्वयम तभी करे परत
- 20:37–20:39एक स्वे में तमातर हद्दी देखाए ते
- 20:39–20:43मुदा जीभाई लेल तो उई अद्द्रिष्य प्राणक अवष्ष्च्ताच है
- 20:43–20:45निरने आहां कची
- 20:45–20:48की अनुवाद एक ता सफल शल जिकिच्सा अची
- 20:48–20:50वाईक्त सफल पुनर्जन
- 20:50–20:51बेसनीक
- 20:51–20:54एही प्रष्नक कसंव, आई दھरी के लेल बस एदबे
- 20:54–20:57विमर्ष्कक इज्मन्सा हम्रा सब के विदा दिया
Plain text
विमर्शक इं मंज पर आजक स्वागत आची, जखन हमरा सब सरजरी, वषल्य जिकिच्साक बात करे ची, उता एक ता यान्त्रिक सतीक्ता कपेचा हुई तचे. रहा, उते गुन्जाएष नहीं रहाद चे गल्तीक. इक्दम, मने बूजु जे देख कोनो हद्दी तूटल, तद दोक्तर एकसरे में उज़र रेखा के देख लेकिन, अस्पष्ट कही दे लेकिन, जे देखु एत एस समस्या आची. सही बात, इप्रक्रियात पुणत भूथि का चे, दिश्यमान आचे. बलकुल, मुदा जकन हा एक ता बाशाक आत्मा के, तो तो तो बाशाक देहि में प्रत्या रोपित करबाक प्रयास करे ची, तकन औए एकस्रे मशिन काज नहीं करे ता ची. बाशाक भीटरक जे प्रान वायु आचे उकुन तस्वीर में नहीं आब आचे. अगर अख्र अख्रे सा नहीं पक्रडल जासके तची ता लेल, हम्रा सब आई, अनुवाद विग्यान, अशाहित्यक एक ता एहन परित्रुष्यमे प्रवेश कर रहल ची, जे बद जती लचे. आई, हम्रा सब, विदेः सदे सथ्ट्फीस में संकलित, रवी भूशन पाथक अट्यंत विचारोथ तेजक निबंद निराला दे विदे का अदार पर चर्चा करे रहल ची. आई निबंद अनुवादक बहुत रास परद खोले तची. एक दंब खोले तची. आद ताही सा हमर आजदरिक जे मुल प्रशन आची उई आची जे जकन दूटा भासाक उपत्ती एक रेंगे भाल हो. जे नहींदिया मैठ्छली तोनु संस्क्री दक अप भ्रहन्सा आची. रहा है, बाशिक जडी समान आची. तए एहन स्तिती में की अनुवादक लेल शब्दानुवाद अदिक प्रमानि कचे वा बहुवावाद अनिमारे आची जकर लेल अनुवादक के पर काई प्रवेश करे पडेचे इब रोट बेएक प्रश्न चे अमर स्प्ष्ट मानेता आची जे समान भाशिक ज़ी रहला पर सहो भावानुवाद अनिवारे आचे करन बिना अनुवादक कक पर काई प्रवेशक अनुवाद मात्र शब्दक ककंकार बनी कर अई जाएचे दिख।, हम एक रा एक दा भिन दिशा सदेखाद जी अखर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ� अद अद अदिक सुरक्षेत अचे इन निष्थावान आप्रमानिक पद्दती अचे आहा शब्दक के बदल्लासा मुल क्रितिक वास्तू कला के बद्खा देच्ची मुदा क्या अनुवादक के केवल वास्तू कलावा इटा पातर दरी सिमित केल जाए सके तची अदिक वाबिदात्मक बासकेत था ची अदे आहाके एकस्रे मशिन काज कर जाएत मुदा बहाँ प्रदान कविता मुदा कविता में से हुत शब्दक चैन महत्पून होईच्छी होईच्छे, मुदा उक्रा आहा केवल शब्द कोष सन नही उतारी सकच्छी जखन हमरा सब हिंदी आ मेठलिक बात करे ची, तदून्नू भाशा संस्क्रित अप ब्रन्शक उत्तर अदिकारी एची. राती वद दिनजका हजारों शब्द दुन्नुठाम समान अची इजे भाशिक सामिप प्या ची बुजलिये ना इवास्तब मेक ता पैग ब्रहम अची ब्रहम कोना भासके तेची इट सूविदा आची नहीं इच समानता अनुवादक के आलसी बना देचे अनुवादक सुचे च्ठिन जे हिन्दिक शब्द के मेठली जका लिख देल हूं, तानुवाद बोगेल, मुलक जे उदात भाव अची, अख्रा पक्डबाक लेल भावानुवादक प्रग्या अनिवारी अची. अनुवादक के इब श्री जी बाखच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्� दोसर भाशाक शब्दिक प्रतिक संप्रतिस थापित करब अची मुदा भाशाक किवल प्रतिक त नहीं आची ना? रुकु अनुवाद कोनो रहसे मैं जादू नहीं आची इब भाशा विद्ग्यान आची जकन मेठिली आहिन्दिक शब्द भंदार समान अची तकन भावानुवादक नाम पर मूलक शब्द योजना लए आद्वनी सविनुख होबा कि आवश्षकता चे कारन बाव हीराज़ाई तची नहीं हीराई तची कविताक समग्र प्रभाव उकर शब्द दूनी असंगीत पर निरभर करेचे. जो निराला जी कोनो विषिष्ट तद्सम शब्दक चयन केल आची, उकर एक ता नादात्म कारन आची. उद्छनी आहाक कान में कोना परत, एकर विचार केल गेल आचे. शब्दानुवाद एही द्हनेक सन्रक्षित रखाईताची आहापर काई प्रवेशक नाम पर रचीताक मुल वास्तुकलासब बहुत दूर चलीजाएची जे अनुवादके प्रामानेक नहीं रहे देताची आहाची द्हनिक तरक्सूनी में बेस नीक लगे तची वास्तम एक्ता जाल आची पात्ख जी आपन निबंद में इटा शब्दक सती कुदारन दैचती इटा शब्दक सती कुदारन दैचत्छती आ, इटा टबवषवदची इटा टबवषवदची जे मित्लाक व्यापक भूबाग में स्विक्रित आची जकना हा अनवाद करे ची तो अनवादक के शबदकोश सागु बड़ी के अर्थ के बिविन्नस्तर अगर स्थानी एडा के समजे परएचे मुदा इंटा अ इईट मे तमात्र उचारनक भेद अची नहीं जा आहा हिंदीक इट केन केबल मैठलीक इटा कदिल हूँ तो उशब्दानुवाद भेल मुदा की उही वाग्य मे इटा उही अज्ट मे बजल जार है लच अही वाग्य मे इटा उही आर्ठ मे बजल जार है लगछ अनवादक के इब जेपरत जे कोनो शब्दक प्रयोग कोना कैल गे लगछी पर काय प्रवेश कोनो रहस्से मैं जादू नहीं आची इएक ता बोद्धिक अनिवारे ता आची वहांगा नहीं लगेत अची जे ये टिक अनिवारे अची आहा उमर हयाम कर रुबाएक उदारन देखू फिट जराल एकरा फंगरेजी मानवाद के लखी आहा उबहुत प्रसिद दबाल चलेन आहिन्दी में मैत्ली शरन गुप्त, बच्चन जी, असुमित्रा नन्दन पन्सन दिगगज लोकनिक एकर अन्वाद केल कान सबखक अन्वाद में भाँ भंगिमा अगुन्वत्तक जो अन्तर अची उआन्वादक के परकाई प्रवेषके प्रमानित करे तची मने आहा कहव अची जे जजद्तिक गेह्राईसा उमर ख्यामक मनो विग्यान में प्रवेश के लक, उकर अनुवाद उत्वे जीवन्त भेल. मात्र शब्दक के एक तो सदोसर तां गस्के बसं कविताने बनेत अची. मुदा उही पर काई प्रवेशक जे आहा वकालत करहल चाए, उता अनुवादक कोनो सीमा में नहीं बान देच्छे? सीमा का वच्च्ता की अच्छे, जखन भाउ पूँची रहा लगचे. आई चे आवच्च्ता, इवनुवादक के एते कती सुत्टरता दोदेच्छे, जे उ मुल रचेटा के ही पाचा चुड़ देच्छती. अगर इटाक अकार प्रकार बदलल जायात्त्। नहीं अगर जरोखा के दिशा बदलल जायात्। नहीं अगर मुल सन्रचना के सन्रक्षित करबाक पुन प्रयास करव। बहावानुवादक नाम पर जे अती सुत्ट्रता बहते तची अवाद नहीं अगर ज़रोखा के दिशा बदलल जायत? आहा अगर मुल सन्रचना के सन्रक्छित करबाक पून प्रयास करव. बहावानुवादक नाम पर जे अती सुत्ट्द्रता बेटे तची, अगनुवाद नहीं च्यानुवाद या अदाप्तेशन करुप लोसके तची. च्यानुवाद या अदाप्तेशन करूप लोसके तची च्यानुवाद यी तबेशी बहुगेल एक दम नहीं निबंद में उलेख आची जे भबवती चरन वरमा के चित्र लेखा वास्तो में आनातोले फ्रांस का उपन्यास थाया परादारी तची मुदा की आहाँ कर अनुवाद कहब? आ, उक्रा ता प्रेरिद कहल जाईता जै. ये ता, उनुवाद नहीं आची, उ एक ता नवस्रिजन भूगे लचे. जखन पाथक कोनो अनुदित क्रिती पड़िट ची, उ उ इजाने चाहताची जे मुल रचेता की कहलनी आची उ उ अनुवादकक निजद्द्व नहीं पड़ाई चाहताची शब्दानुवाद अनुवादकक के अपन सीमा के इस्मरन करवेट रहाताची आहा की इज अथे हासिक भवनक द्रिष्टानत बेस नी कचे मुदा, जखनहा उई भवन के नव ठाम, नव माटी पर रखख ची, ता उत्बा हवापानी वा वाता वरन बिनर है चेना? मुदा भवन त भवन अची. जगा केवल एटा मिला रहल ची, मुदा उई नुतन जरोखा से, जे हवा भीदर आईब रहल ची, उक्रा महसुस नहीं कर सकल हूँ, ता भवन ने एक ता कंकाल ताड कर रहल ची. कवीता कनवाद केवल वास्तु कला का प्रतिस थापन नहीं आची. इए उई भवनक भीतर के प्रकाष आजवा के महसुस कर अचे. मुदव बिना इटाक हवा अ प्रकाष कोना टिकत? जारा निराला कवीता सने निरजर बहग गया है के देखू? एकर जे आरंभिख पांती अचे? आप सने निरजर बहग गया है, रेथ ज्योंतन रहग गया है. एक्दम आप जाहा एकर शाभ्दिक अनवाद मेठली में करब तकी है तै सनियक जरना बही गेल अची बालुजका का देह रही गेल अची एह ना अब कहु कि एह में उदर्द अची कि एक रापभधे का निरालाक उशुन्नेता और उदात पीरा बेटेट अची अगर सगन वरन मेट्डी और दोन्यात्मक्ता के मेठली में जीवन्त रख्वाक लेल आहा के शाब्दिक अनुवाथ से बहर आबई परत. मुदद तकन उन्निरालाक शब्द नहीं रहत. अखर सगन वरन मेट्ष्डी और दोने आत्मकता के मेठ्डली में जीवन्त रख्वाक लेल आहा के शाभ्दिक अनुवाद से बाहर आबई परत्द. मुदद तकन उन निरालाक शब्द नहीं रहात. पाथक जी जगन एक्रा मेठली में उमुदित करेच थें, ता उश्वद प्रती शबद नहीं जाई च्छतें. उन निराला के मेठलीक देज में एक ता नव विदेज़का अस्थापिद करेच थें. अब हावानु वादक साहसिक निरने लए चतिन जाएसक कवीताक मुल आत्मा बची सकै. हम माने जी, जिस नहक जरना बही गेल अची सूनी में समतल लगचे. अल्ले अट्यन्त महत्पूरन जे, मुडा एते हमर प्रतिवाद जे. की प्रतिवाद जे? दान्ते अस्सर्फिलिप् सिडनीजका दिगज विद्वान काव्यानुवाद के असमभो माने चला आवकर कारन ये चल आवकनी अनुवाद के लैए बहंग माने चला उई लोकनिक अस्पष्ट मत चल जिच्ण्द, लए, आब बिम्भ युजना, मुल भाशक शब्दक के बदल्ला सा पुणता नष्ट बोजाईता ची. आहा भावानु अज्सा अर्थत पोचादेब मुदा कविताक आत्मा उकर रूप सा �alag नई भहसकईता ची. मने रूप है आत्मा ची? बवहुत हद्द्ख, निराला जखन रेद जवूतन रहा गया है, कहाई चति, तर रेद शब्दक संजि खुड़ुरापनक द्वनी आचे उशाभ्दिक चाएनक परिनाम आचे. आप पाट में देलगे लिक्ता उत्क्रिष्टूदारन के देखू, सुरेंद्र जा सुमन का अनु गितानजली. उत बहुत नीक अनुवाद अची. इग रविंद्रनात ताकृ के गितानजली के ख्स्रेष्ट भावनुवाद अची, जकर प्रश्ण्सा बांगला विद्वान लोक्नी से होके लिखी, मुदा एक ता मुलबूत प्रश्न उठे तची, जो हमरा सब के स्वयम्सा पुजबाख चाही. की प्रश्न? की उ रविद्र नाता क्रिती रही भील, वा सुमन्जिक आपन क्रिती बनी गले. बावनुवादक ये सब सब पढिक खदरा थी इं मूल क्रितिके अपहरित कर लेत आची जखना हा सनेह निरजर भही गेलाई पडेचची ता आहा निराला के नहीं, रवी भूशन पाथके पडी रहल ची अनुवादक का आत्मा मुल कविक आत्मा पर हावी बोजायता ची. आहा के इख कहब जे भावानुबाद मुलके अपहरित को लेची, इब रहुत कठोर दिष्टी कोना ची. कठोर आची मुदा यधारत आचे. अनु गितान्जली सुमन्जीक प्रतिबाग परीचायक अवश्यची मुदा बिचार करू जे सुमन्जीक के लिखिन और रविंद्रनात्ख दर्षन का मैइत्टिली पाथक के रदेदधरी एहन जीवन्त रुपे पहुषे लिखिन जे शाब्दिक अनुवात कहीो नहीं कर सकचल मुदाउ गीतानजली कम अस्सुमन गीतानजली बेसी भोगेल जो उ केवल शब्द के प्रती स्थापित करेत रहित दिन तब गीतानजलीक रहस्स्यवाद मेत्फिली में म्रित्ब हो जाएत निरालाक प्रसंग में आहाके एब उज़ेः परत, जे मैठिलीक प्राछीन संसकार अर आदूनिक तक जे आन्दोलन मैइद्हाराची, उई सामर्त रकहेत जे उनिरालाक शब्द और आर्थक सवर्गिक संसारक आपन भीतर समहित कसुकए. सवर्गिक संसार अगाड, अखाट, अखाट, अखाट, अगापईत पेर, इसब शाबदिक अनुवाज समात्र सुचना बनत्त, एही त्रा नाव बानु, एक ता अदेश जकान लगगत अच्छे. अवरिहत काव्यात्मक पर्यावरन के रच्ना करे चती अवरिहत काव्यात्मक पर्यावरन तदनिराला बनोने चला ना मुदा अनुवाद में उक्रावतारब असान नहीं अचे अग गाद, अग हासी, अग काँपएद पेर, इसब शाभ्दिक अनुवाद सा मातर सुछना बनत, एही त्रा नाव बानु, एक ता अदेज जकान लगगे था चे. अदा चे. मुदा भावानुवाद सा, इक ता सगन छित्रपडवा इमेज्री बनी जाई था चे. अनुवादक के इब वोद्दिक जोखिम लेभे पडद, अहाके परकाई प्रवेश करे पडद, नहींता कविता अहाके हात में मरी जाएत, अहाकेवल अकर पोस्प्मोड़म रिपोड़ पड़ेत रहाँ. अम एही बात के स्विकार करत जी, जे पाटगजीक अनुवाद उत्क्रिष्ट जी, मुदा आहा के सावदान करे चाहे जी. कहु? जखन गद्य अनुवादक के निक्रिष्ट मानल गेल अची, कारन उही में कविताक अर्ठ, वव्यंग्यार्त बाहर नहीं आवे पावे तचे. तखन शब्दानुवाद के पुनता खारिज नहीं के लगा जासके तचे. शब्दानुवाद कम से कम मुल्क्रितिक सनरजनात्मक गवाहीत दएत अची गवाही? माने कोट कचेरीक दस्टावेज? माने, इग्टा एतिहासिक दस्टावेज जका काज करे तचे जे बतावेट अचे जे निराला वास्तव में की शब्द चुनलक ब्हावनुवादक संख सब सम्प्यक समस्या एजे, जे इवनुवादक के ब्रम्त दिशा में लोजा सके तचे. ब्रम्त दिशा कोना दिखु, इवष्यक नहीं चे जे हर अनुवादक रवी भूशन पाथधख वा सुरेंद्र जा सुमन होएद. जा अनुवादक करचेताक मनोविच्यानक पुन ज्यान नहीं चे, तो अ परकाई प्रवेशक नाम पर अपन पूर्वागर, अपन विचार दारा मुल कविपर थोपी देद. उत खराब अनुवादक कबाद भेल. मुदा इब रहुत कष्तरनाक स्तिती अची. शब्दानुवाद आहाके ओई पूर्वाग्रहस बजबैत आची इई अनुवादक पर एक ता अनुशासन लागु करे तची इई मुल्क्रुतिक नादात्मकता अशाब्दिक प्रतिक संद्रक्षित रख्खे तची जास्स्पात्ख् स्वयम आपन निश्रस्ष्निकाली सके नकी अनुवादक दवारा पूर्वपचाल अर्थख के ग्रहन करए मुदकी अनुशासनब कन नाम पर हम्रा सब के कविता कदध्धन वस्पन्दने के रोक देबाक चाही हमरा इबुजहाई परित जे भाशा केवल शब्द्कोष नहीं चे भाशा संसक्रती अचे विदे सदे 27 में केवल हिन्दी मैठिलीम नहीं अचे ना हा उही में आनान भाशा के सहो अनवाद अचे एक दम निराला क्या तिरेक तेल्गु, और्या अ गुज्राती कविताक से हो अनुवाज चे. यते हा आहा के एक तोस उदारन देची. तेल्गु कवित्री शीला सुभद्रा देवी के कविता पसीजा कांट के लिया. अचा, उई कविता में कि एचा. तेल्गुक वाके दिल्न्यास, वासिन्तेक्स, आमेठलिक वाके विन्यास में आकाश पातालक अन्तर चे, तिल्गु में करता कर्म आक्रिया का जे क्रम चे, आविशेशनक जे प्रयोग चे, उ मेठलि से सरवता बिन्नचे. ज़ा आहा तिल्गुक शाब्दिक अनवाद मेठली में करव तब वाखे तुटी जायत आव व्याक्रन तब एन चे वैंटाम पाथखक मन वाखे के सोज करबाक कस्रत में लागी जायत अग कविता क दर्द पुरनता हेरा जायत या तिल्गु कता जुम्मा के देखू, जते मक्का मसजिदक विस्पोट आयेक प्माएक मनोविग्यानक वरनन अचे. उ बहुत मार्मेक कता आचे. उई बम्विस्पोट से उप्जल संट्रास, उ माएक भित्रक चीटकार, उगर आहा शाभ्दिक अनवाद से कोना उतारव. उई आगहात के पर काई प्रवेष से महसुस के लापर ही उखरा मैठलिक महावरामे धाल जासके तचे. अवादक के उई माय क दर्दक अपना दर्द बनावे परच्चे इप ववाग्र नहीं अची इज्समान उबुती अचे आहा तेल्गु आ उड्याएग जे प्रसंग उठेलो हू उ पूरनता भिन अचे कारन उकर भाशिक सन्रचना मेठिलिसा अलग चे तनीम तव अनुवादक ले लिक्ता हे बाख चाही ना? नहीं, जटे व्याकरनिक धाचा इ अनुमती नहीं देई तजी, उते आहाके वाख्य विन्यास बदलिए परत, मुदा हमर मुल विमर्ष लिए न्दी आ मेठ्दे आची, जते बारी भाशिक सामिप प्यच मुदा उ सामिप प्यच में कहिल्यन जे ब्रामच हम्रा नहें लगेत जते सामिप प्यच अची उते शब्दानुवाद से अर्थक हानी नहीं होगे तची बरु उ अपन प्रामानिक्ता बनोने रख ही तची आहा पसीजग काट का बात के लू, हम मानेत ची जे अनुवाद मे भाव का रक्षा हे बाखचाही, मुदा उकर शर्ट यी नहीं भहसके तची, जहां मुलक शब्द योजना के पुनता बद्का दी, बद्का या ब नहीं उकर नव्रुप देप. मुदा आहा भूजु, जे कविताक जे द्रष्श्व्य आश्व्य भिम्ब होई तची, उबहुदा शब्द का नादात्मकतासा निंट्रित होई तची, जा निराला वकोनो तेल्गु कवी अपन कविता में, उक्र विकल्प दोसर बाशा में स्रिजित करव अत्यंत कतिनच्छ। कतिनच्छी मुदा असमबव नहीं ताही लेल रचेता जे वास्तू कला तयार के लक अख्ची उक्रा जुं कत्यू सम्मान देब अनुवादक कप प्रथम्द्ध्र्म अची बाव के रक्षाक नाम पर शिलप हत्या नहीं काईल जासकत अच्छे इबवद्धिक विमर्ष वास्टव में अख्ट्यंत जटिल आ अनन्द डाया कचे आए एक्दम इएक्टा एहन द्वन्द्व अच्छी जकर कोनो एक्टा उतर समब हव नहीं मुदा अब हम्रा सब निषकर्ष दिस बड़ी रहल ची. हमर पक्ष एक दम्स पष्ट ची. अनुवाद कुनो मशिनरी काज नहीं आची. अनुवादक के पर काए प्रवेश अब हावानुवाद के माद्धियम सा एक तनव जीवन देवा का विष्चकता ची. विशेश का कवीटा में, जत्या व्व, मात्र शब्द कोष्दरी सीमित नहीं अची, अनुवादक के रचए ताक आत्मा में प्रवेश करे पड़ाएचे. जोई हिन्दी अ मैठली निकत अची, तए निकत ता ब्रहम अची. इई आँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� अच्तित्वके संकत अग, अनुवाद एक ता एतिहासेक अ साहित गवाही आची, जक्रा प्रामानेक रहबाक चाही, रचेताजी गर बनिलनी, अनुवाद अक रक्वार आची नव निरमाड करता नहीं. अमरा सब दून्नुगोते कम्स्कम एही बात पर पुर्न सहमत ची जे अनुवाद, विषेश रुप से कविता कनुवाद, एक ता अछ्ट्यंत जतिल, बोद्धिक अर अच्नात्मक संगर्ष आची, जामे आलस्यव वस सत्फी पनक कोनो स्थान नही आची. पुणता इक्ता एहन्पूल आची जक्रा बनावे मे दूनो देस का माटी के दूनो भाशा का ग़राए के नीक जका बुजर पडे तची. कोनो एक्ता चुक आपुरा पुल खसिसा कै तची. एक्टम सही का लिया. श्रोता लोक्नी के हम आमन्त्रत करे ची जे उ विदेः सदेः सथ्ट्टीस में उपलब्द अन्ने अन्वाद जेना तेल्गु कता जुम्मा, एपसिता सारंगिक उड्या कविता, आहिमांग आश्विन कुमार देसाएक गुज्राति कविता के सुईम पर्ठ्ठिन. आप पदक ए विचार कर थिन जे अनुवादक मुल आत्मा शब्द में बसेत चै वब हाव में. कारिक्रमक प्रारंभ में हम्रा सब शल्य चिकिच्सा आ एक स्रे मशीनक जे द्रस्टान्त देल हूँ, उक्रापर एक भेड पुनह विचार करूू. जखनाहा एक ता बाशासा दोसर बाशा में कोनो कविता के प्रत्त्या रोपित करेट ची, ता कि आहा मात्र हद्डी आम मान सक स्थान बडलेट ची, वा आहा उही देहक भीत्रक प्रानवाय। अस पन्दने किसे हो दोसर देह में जीवित रक्बाक प्रयास करेट ची. एक ता एहन प्रष्न अची जे पाथकक के स्वयम तभी करे परत एक स्वे में तमातर हद्दी देखाए ते मुदा जीभाई लेल तो उई अद्द्रिष्य प्राणक अवष्ष्च्ताच है निरने आहां कची की अनुवाद एक ता सफल शल जिकिच्सा अची वाईक्त सफल पुनर्जन बेसनीक एही प्रष्नक कसंव, आई दھरी के लेल बस एदबे विमर्ष्कक इज्मन्सा हम्रा सब के विदा दिया