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मैथिली_गज़ल_का_व्याकरण_और_देसी_मिजाज.mp4

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Part 1 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 1
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  1. 0:00–0:07जरा सोचे, एक तरव आरब का तप्ता हुवा खजूर का रेगिस्तान, जहां दूर-दूर तक सिझ रेद के तुफान आते हैं.
  2. 0:07–0:08बलकुल.
  3. 0:08–0:17और दूसरी तरव, हमारे भारत में भिहार के मिठलाक शेट्र के एक दम हरे-ब़रे तार के पेड, वूपोकर और दान के केट.
  4. 0:17–0:21मतलब भगोले किया बाशाई रूब से देकें,
  5. 0:21–0:24तो इन दोनो दून्याँ में कोई सीदा ताल में नजर ही नहीं आता.
  6. 0:24–0:28आप खुई भी देखेगा तो यह एक आगा कि नहीं में क्या ही समानता हो सकती हैं.
  7. 0:28–0:29बिलकल.
  8. 0:29–0:32लेकिन क्या हो अगर अगर ये कहाजाए,
  9. 0:32–0:36कि अरब के उसी तबते रेगिस्टान में जन्मी जो गजल है,
  10. 0:36–0:41उसे अपना अस्ली सुकून मित्ला के तार के पेडो की च्याँ में मिलता है.
  11. 0:41–0:44औरे वाज, यह तो बहुती दिल्च्यस बात कै दिया दिया आपने.
  12. 0:44–0:51हैंग? तो आजकी इस गहन चर्चा में हम बलकुल इसी जादूई सांस्क्रिति क्यात्रा को समजने वाले है.
  13. 0:51–0:55हमारे पास जो स्रोथ समगरी हैंग, वो है आशीश अनचिनहार दुआरा लिकित,
  14. 0:55–0:58मैत्ली गजलक व्याकरन औ इतिहास.
  15. 0:58–1:01यानी मेठली गजल का व्याक्रन और इतिहास.
  16. 1:01–1:04जी. और ये कोई सादारन व्याक्रन की किताब नहीं है.
  17. 1:04–1:09बिलक्ल नहीं. तो इस चर्चा का हमारा मुक्योदेशे आज यही समझना है,
  18. 1:09–1:14कि कैसे अरभी और फारसी जैसी विदेशी बाशाँ में जन्मी ये गजल,
  19. 1:14–1:19तेट, मीटी और जोस्तानिया मेठली बाशा है,
  20. 1:19–1:22उस में खुद को पूरी तरहा से कैसे डाल लेती हैं?
  21. 1:22–1:27एक दम सही खेरी हैं आप ये सरफ एक बाशा से दुसरी बाशा का अनुवाद नी हैं
  22. 1:27–1:32मतलब ये एक पूरी के पूरी संसक्रती का उसके जैस्बातों का मैठिली करन है
  23. 1:32–1:34आप, मैठिली करन.
  24. 1:34–1:41अकसर मैं सुचती हूँ के जब कोई विद्हापनी जन्मबूमी चोडगर किसी नहीं जमीन पर जाती है,
  25. 1:41–1:43तो वो आपना मूल स्वरुब को देती है
  26. 1:43–1:47या फिर नहीं जमीन पर एक अजनबी की तरह रहती है
  27. 1:47–1:48आप बलकुल
  28. 1:48–1:50लेकिन ये दस्तावेज हमे बताता है
  29. 1:50–1:52कि गजल ने मिखला में एक महमान की तरा नहीं
  30. 1:52–1:55बलकी उस गर के एक सदस्से की तर आपनी जगा बना है
  31. 1:55–1:58ज़े इस पर थोडी गेराई से बात करते हैं.
  32. 1:58–2:03देखे कोई भी कावियविदा जब दूसरी जगा का सफरत तैकरती है,
  33. 2:03–2:05तो वो खाली हाथ नहीं जाती.
  34. 2:05–2:09वो अपना पुरा एक खाछते हैं उसे एक सुट केस लेकर चलती हैं.
  35. 2:09–2:12जिस में उसके अपने मुहावरे होते हैं.
  36. 2:25–2:27यह समजना बहुत जरूरी है.
  37. 2:27–2:28एक दम सही.
  38. 2:28–2:31वोकी गजल की पूरी दून्याना कुछ खास प्रतीकों परे टिकी है.
  39. 2:31–2:35मैया खाना याने मधूशाला, मैयाने शराब, सुराही
  40. 2:35–2:37और वो शराब पिलाने वाला.
  41. 2:37–2:38आवो साकी.
  42. 2:38–2:39बिलकुल.
  43. 2:39–2:40ये सरफ शबद नहीं है.
  44. 2:40–2:43ये स्रिव शब्द नहीं है, ये पुरा महाल बनाते हैं.
  45. 2:44–2:46तो जब गजल ने मितला कियो रूख किया,
  46. 2:46–2:47तो सबसे बडी चुनोती यही ती,
  47. 2:47–2:49के ये विदेशी प्रतीकों को,
  48. 2:49–2:51वहा के स्थानी ये,
  49. 2:52–2:53जो ग्रामीलोगे,
  50. 2:53–2:54वो कैसे समझेंगे?
  51. 2:54–2:57यहां बात सच्छ में बहुत दिल्चास तो जाती है,
  52. 2:57–2:59कुई कि लेक हक ने विदेशी शब्डो को बस
  53. 2:59–3:03शब्द कोर्ष से निकाल कर मेठली पर ठोप नहीं दिया.
  54. 3:03–3:05मतलब अगर एक उदाहरन्ट से समजें,
  55. 3:05–3:05जैसे?
  56. 3:05–3:07तो ये बिलकल वैसा ही है.
  57. 3:07–3:08जैसे क्या?
  58. 3:08–3:13जैसे किसी होलीवुट फिल्मे विदेशी जासुस जेमस बोड़ के हाथ से
  59. 3:13–3:16उसकी मशुर माटीनी का गलास चीन लिया जाए.
  60. 3:16–3:17हा, हा, अचा.
  61. 3:17–3:21हा, और उसके हाथ में किसी गानो के कुलहडवाला मत्ठा
  62. 3:21–3:23या देसी ताडी तमादी जाए.
  63. 3:23–3:27जाहर है बर्तन बदल गया है, स्वाद बिलकुल बदल गया है,
  64. 3:27–3:32लिकिं जो खुमार है ना जो नशा है, वो जस का तस रहता है.
  65. 3:32–3:37ये तुलना उस पूरी प्रक्रिया की एक दम सतीक तस्वीर पेष करती है.
  66. 3:37–3:42अगर अगर निस किताब के पन्नो को पलतें, तो आशीश अचिन हार ने अरभी के शब्द मैं,
  67. 3:42–3:47यहनी मदिरा की जगा मैठली में, ताडी शब्द को उप्यो करने का बहुती वेग्यानिक तर्क दिया है.
  68. 3:47–3:50वेग्यानिक अचान्सक्रितिक तर्क दोनो?
  69. 3:50–3:54बिल्कोल, तार्दी मित्ला के ग्रामीड परिवेश का एक बहुती अबहिन नहिस्सा है
  70. 3:54–3:59उसी तरा पार्सी गजलो में शराब रक्ने के लिए मीना शब्द के अईठमाल होता है
  71. 3:59–4:04ये मीना अकसर चांदी या रंगीन काच का एक बेहद नक्काशीदार सुंदर बरतन होता है
  72. 4:20–4:24बर्तन होता है, जिस में ताडी बूंद बूंद कर के इकथा की जाती है,
  73. 4:24–4:28ये महलो मेरके काज के मीना से एक दम उलत है.
  74. 4:28–4:30सीदे पक्रती से जुडवा बर्तन है?
  75. 4:30–4:30एक दम.
  76. 4:30–4:32और सफर यही नहीं रुकता.
  77. 4:32–4:34अरभी का सागर, यान प्याला,
  78. 4:34–4:36वो मेठली में आखर बाटी बन जाता है
  79. 4:36–4:39स्रोत में एक और बहुती दिल्चास बाद बताई गय है
  80. 4:39–4:40चनेक्स के बारे में
  81. 4:40–4:42आच्छ? मैए कहने वाली चनेक्स?
  82. 4:42–4:46आखसर मैए कहने में शराब के सात कुछ चनेक्स कहाए जाते हैं
  83. 4:46–4:49मेतली में इस नमकीन या सनाखस को चिखना कहा जाता है
  84. 4:49–4:50औहो चिखना
  85. 4:50–4:51जी
  86. 4:51–4:54जिस में बूना हुए चना या तलीवी मचली शामिल होती है
  87. 4:54–4:56दिल्च्यस बात यह की इसे
  88. 4:56–4:58आजके आदूनिक होटलो की बाशा में
  89. 4:58–5:00अदेशी श्वाल है ये वोगत आहें सबाल है
  90. 5:00–5:09कि लिक्यों जब आम हिंदी और दूक लोगप्रिय संसक्रिति की बात करते है तु साकी सूनते ही दिमाग में क्रहेस्स्यमएई बेहत खुबसुरत महला की तस्वीर उबरती है
  91. 5:09–5:11अग़ा एक बडा सवाल है के क्या इगजल के मुल दाचे के साथ एक तरे की चिरचानी हो जाएगी?
  92. 5:11–5:14वही तो मैं सोच रही तो यहां जो बात सब से दिल्चासपे है के
  93. 5:14–5:17लोगप्री संसक्रिती ने साखी की जो तस्वीर बनाईएना
  94. 5:17–5:19वो एदे प्रोसने वाला कोन है
  95. 5:19–5:22वहस्यमएई बेहत खुबसुरत महला की तस्वीर उबहरती है
  96. 5:22–5:24अब मित्ला के तेंट्क्रामीन परीवेश में
  97. 5:24–5:26ये रूमानी साकी कहा से लाएंगे?
  98. 5:26–5:28आई एक बडा सवाल है
  99. 5:28–5:32के क्या ये गजल के मुल दाचे के साथ एक तरे की चिडचानी हो जाएगी?
  100. 5:32–5:33वही तो मैं सोच रही ती.
  101. 5:33–5:35तो यहां जो बाथ सब से दिल्चास पै वो यहें
  102. 5:35–5:38के लोगप्री संसक्रिती ने साकी की जो तस्वीर बनाईएना
  103. 5:38–5:40वो अटिहासिक रूप से पुरी तरा सही नहीं हैं.
  104. 5:40–5:42अच्छ में?
  105. 5:42–5:42जी.
  106. 5:42–5:49अगर हम शास्त्रिय अरभी परमपरा और जाही लियाए के दोर की कविताँ को देखें तो साकी असल में एक पूरुष होता था.
  107. 5:49–5:54उगर कभीले का वो वेक्ती होता था जो मजलिसो में शराप परुसने का काम करता था.
  108. 5:54–5:55औरे ये तो मुझे पताई नी था?
  109. 5:55–6:25अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ�
  110. 6:25–6:27बाशी भाई ही हो सकता है
  111. 6:27–6:28क्या बाद है
  112. 6:28–6:30ये गजल की ज़ों को
  113. 6:30–6:32मित्ला की मिट्टी में गड़ाई तक रोपने का
  114. 6:32–6:33सच में बहुती शांदार काम है
  115. 6:33–6:35एक दम सही कहा आप आपने
  116. 6:35–6:36लेकिन देखे
  117. 6:36–6:38ये तो होगए मैए खाने और प्रतीकों की बाध
  118. 6:38–6:44यहां एक सबाल हुजे परिशान करता है, क्या गजल का मतलप स्र्फ प्रेमी प्रेमिका का संसारिक प्रेम,
  119. 6:44–6:46शराब, बाटी और पासी ही है?
  120. 6:46–6:50नहीं नहीं, गजल स्र्फ इतनी सी तो नहीं है
  121. 6:50–6:51वोई ना
  122. 6:51–6:54क्योंकि अगर गजल केवल मैखाने के नशे तक सीमित होती,
  123. 6:54–6:56तो ये सद्यों तक जिन्दा नहीं रहती.
  124. 6:56–6:59क्या इन भहातिक प्रतीकों के पीचे
  125. 6:59–7:02कोई बहुत गेहरी अद्ध्यात्मिक साईन्स
  126. 7:02–7:04या दर्षन काम कर रहा है?
  127. 7:05–7:08आपका ये सवाल हमें गजल की अस्ली रूइब तक लेजाता है.
  128. 7:08–7:13सूफी इस्लाम में इश्क की अवदारना महेज एक बहुतिक अकर्षन नहीं हैं.
  129. 7:13–7:14तो फिर क्या है?
  130. 7:14–7:21मैं काने का नशा दरसल सानसारिक नशे से अद्धियात्मिक नशे की और जाने का एक रूपाक है.
  131. 7:21–7:22एक मेटाफर है.
  132. 7:22–7:30सूफी दर्शन में किसी भी अनसान के इश्क में पडने और फिर इश्वर तक पहुचने के सात मोकाम,
  133. 7:30–7:32यहनी सात स्तर बताएगे हैं.
  134. 7:32–7:34आप और यह कोई सीथी रेखा नहीं है,
  135. 7:34–7:36श्रोथ में जो बताया गया है,
  136. 7:36–7:40ये आकर्शन्द से शुरू हो कर एक पूरी मनोवे ज्यानेक और अद्यात्मिक यात्रा है
  137. 7:40–7:41बिलकुल
  138. 7:41–7:43मतलब पहले हुब आता है
  139. 7:43–7:45यानिक हलका सा आकर्शन्द
  140. 7:45–7:48तो फिर उन्स, यानिक गेरे लगाव में बडलता है
  141. 7:48–7:50फिर वो इश्क बनता है
  142. 7:50–7:52ज़हां प्रेम बिल्कुल एक निष्ट हो जाता है
  143. 7:52–7:53जी
  144. 7:53–7:55और वहां से बात अकीदत
  145. 7:55–7:56यानी सम्मान
  146. 7:56–7:58और इबादत यानी पुजा तक पूजती है
  147. 7:58–7:59आं
  148. 7:59–8:00फिर अनसान
  149. 8:00–8:02जुनुन की सनक से गुजरता है
  150. 8:02–8:04और अन्त में साथवे मुकाम पर पहुचता है
  151. 8:04–8:06मुध या फना
  152. 8:06–8:10वो अस्तिती जहाँ प्रेमी का अपना कोई वजुद नहीं बच्च्टा
  153. 8:10–8:13वो अपने प्रेम में पुरी तरहा मिट जाता है
  154. 8:13–8:15ये सोचकर इ मेरे रोंग्टे खडे हो जाते हैं
  155. 8:15–8:17और अगर आम इसे बड़े सन्दरभ में देखेना
  156. 8:17–8:22तो यहां दो सब्यताँ का एक बहुती जादूई संगम देखने को मिलता है.
  157. 8:22–8:23वो कैसे?
  158. 8:23–8:25लेक्खा काशीश अंचिनेहार ने,
  159. 8:25–8:31इस अरभी सूफी दर्षन को सीधे तोर पर लिए वैश्णाव परमपरा से जोडा है.
  160. 8:31–8:38सोल्वी सदी के महान वैश्नव सन्त रूप गो स्वामी ने एक बेहत प्रसिदध गरन्त लिखा था बबकती रसाम्रित सिंदु
  161. 8:38–8:41अच्छा इस में क्या है?
  162. 8:41–8:44इस गरन्त में जब वैश्नव बबकती की व्याख्या की गई गई गई,
  163. 8:44–8:49तो उस में भी इश्वर के प्रती प्रेम के तीक अईसे ही साथ अस्टर बताए गये हैं.
  164. 8:49–8:58औरे वा! मतलप सने, मान, प्रने, राग, अनुराग, भाव, और अंत में महाबहाव.
  165. 8:58–9:03क्या ये महाबहाव वही अवस्ता है? जिसे सूफी फना कहते हैं.
  166. 9:03–9:07लगबभग वही महाभाव हिंदू दर्षन की वो चरम अवस्था है
  167. 9:07–9:09जहां प्रेमी और प्रेमिका
  168. 9:09–9:12या कहले भक्त और भगवान के भीच का सारा भेद
  169. 9:12–9:14सारा द्वैट खत्म हो जाता है
  170. 9:14–9:17मतलवे एका कार हो जाते है
  171. 9:17–9:19तीक अर्दनारी श्वर की तरहा
  172. 9:19–9:20एक दम सही
  173. 9:20–9:23अर पता है, ये समान्ता कोई हवामे तीर नहीं है,
  174. 9:23–9:27रूप गोस्वामी सन्यास लेने से पहले कोई आम अन्सान नहीं ते,
  175. 9:27–9:31वे बंगाल के शासक हुसैंशा के दरबार में एक बछद बड़े मंत्री ते,
  176. 9:31–9:35और पारसी भाशा के जाने माने चोटी के विद्वान थे.
  177. 9:35–9:38अहो अप समज मे आईा कनेक्ष्छन
  178. 9:38–9:39जी
  179. 9:39–9:41तो ये सपाश्ट है के
  180. 9:41–9:42सूफी अस्लाम के
  181. 9:42–9:43इश्क के मुखाम
  182. 9:43–9:46और वैश्नव भक्ती के प्रेम के स्थर
  183. 9:46–9:49एक दूस्रे से पुरी तरा समवात कर रहे थे
  184. 9:49–9:51ये सच में बहुत ही अद्बोट इतिहास है
  185. 9:51–9:54मतलब जब गजल का इश्क मिठिला पहुटचता है,
  186. 9:54–9:57तो वो किसी आजनभी जमीन पर नहीं उतरता.
  187. 9:57–10:01बलके वेश्नव भक्ती के महाभाव में अपना ही अख्स देखता है.
  188. 10:01–10:02बलकल.
  189. 10:02–10:09लेकिन देक्ये, जब इश्क सूफी के चरम पना या वैशनव के महाबहाव तक पहचजाए,
  190. 10:09–10:12जब हाँ बहावनाई असीमित और आन्यंट्रित हो,
  191. 10:12–10:17तो एक कवी उस अथा समदर को कागस के चोटे से तुक्डे पर कैसे बाँणता है.
  192. 10:17–10:19आप गजल के येदाचा कोई एक एक दिन में नहीं बना है
  193. 10:19–10:24अगर अगर इसकी इत्यास पर नजर डालें तो अस्लाम के उदेर से पहले के समें को
  194. 10:24–10:27जाहिल्या या अंदकार युख कहा जाता था
  195. 10:27–10:30आपके कथोर रेगिस्तानो वाला समें
  196. 10:30–10:33अगर आपके कथोर रेगिस्टानो वाला समः
  197. 10:33–10:36अगर वागा कबीले आपस में लड़ते रहते रहते थे
  198. 10:36–10:38और कबीले के सरदारों की तारीफ में
  199. 10:38–10:40यापनी वाफादारी साभिट करने किलिए
  200. 10:40–10:43जो कविताए पडी जाती ती उने कसीदा कहाँ जाता था
  201. 10:43–10:48और कभीले के सर्दारों की तारीफ में यापनी वाफादारी साभिद करने किलिए,
  202. 10:48–10:51जो कविताई पडी जाती ती उने कसीदा कहा जाता ता.
  203. 10:51–10:53तो फिर कसीदा से गजल कैसे बनी?
  204. 10:53–10:56फिर इम्रुल कैस नाम के एक शाएर आई.
  205. 10:56–10:58उने पहला शाएर मना जाता है,
  206. 10:58–11:00जिसने इस सखत राजनी कि कसीदे में,
  207. 11:00–11:03कोमलता और प्रेम के तत्वों को पिरोया,
  208. 11:03–11:05अर बस वहीं से गजल का जन्वा.
  209. 11:05–11:10वाओ और ये वास्तु कला किन इप गारे से बनती है.
  210. 11:10–11:13स्रोथ में कुछ तकनी की शब दिये गए है जिन इस समजना जरूरी है.
  211. 11:13–11:15जी जएसे शेर?
  212. 11:15–11:16राए.
  213. 11:16–11:19एक शेर महेज दो पंक्तिों का जोडा होता है.
  214. 11:19–11:22पहली पंक्ती को मिस्राय उला कहते है
  215. 11:22–11:26और दूसरी पंक्ती को मिस्राय सानी
  216. 11:26–11:31इसके लावा मतला होता है, जो गजल का सब से पहला शेर होता है
  217. 11:31–11:35और मक्ता आखरी शेर होता है, जिस में शायर अपनाम
  218. 11:35–11:37यानी तखलुस लिकता है
  219. 11:37–11:41लिकिन इन सब में जो चीस सब से ज़ादा तकनी की और महतुपून है,
  220. 11:41–11:43वो है रदीप और काफिया.
  221. 11:43–11:45तीक है, इसे तोडा समझते है.
  222. 11:45–11:48जी, ये दोनो गजल की इमारत की रीड की हद्टी हैं,
  223. 11:48–11:53जो उन असीमद बावनाओ को एक सकत नियम में बांद कर रकते हैं.
  224. 11:53–12:00अगर इसे आसान शब्डो में खुलकर देखाए, तो रदीप वो शबद या शबडो का समू है,
  225. 12:00–12:07जो गजल के हर शेर के अंप में भिल्कुल वैसे ही, मिरा मतलब है बिना एक अखषर बदले बार बार दोरा या जाता है.
  226. 12:07–12:13जेसे अगर रदीप कोना है, तो हर शेर कोना पर ही खतम होगा.
  227. 12:13–12:17और काफिया वो शबद है जिसकी तुगबंदी होती है,
  228. 12:17–12:19जो रदीप से टीक पहले आता है.
  229. 12:19–12:22जेसे रोना दोना कोना.
  230. 12:22–12:27आँ, तो रोना कोना दोना कोना ये वो खूटे है,
  231. 12:27–12:31तो अगर उज़े सोर और ताल में किसी राग में गाखर पडाजाए तो उज़े तरन्नुम कैतें।
  232. 12:31–12:34और मुशाईरे का माहोल? या वो भी मैफिल में बड़ल जाता है।
  233. 12:34–12:35विलकुल बड़लता है।
  234. 12:35–12:38तो उनके भी अपने कडे नियम और आदाब हुतें
  235. 12:38–12:39अच्छ?
  236. 12:39–12:42अगर मुशाईरे में कवीता को समाने तरीके से पड़ाई,
  237. 12:42–12:44तो उसे तहत केतें.
  238. 12:44–12:48और अगर उसे सूर और ताल में किसी राग में गाकर पड़ाई,
  239. 12:48–12:49तो उसे तरनुम केतें.
  240. 12:49–12:51और मुशाईरे का माहोल?
  241. 13:05–13:10लेक्खाक ने एर्शात की जगा थेट मेठली शब्द जरूर का प्रस्ताव रख्खा है.
  242. 13:10–13:14जर अज़ा सोची उस द्रिष्चे को एक कवी तरनुम में गजल पड़रा है.
  243. 13:14–13:17और सामने से दर्षक पूरे उच्साः से कैरे हैं.
  244. 13:17–13:18जरूर जरूर.
  245. 13:18–13:24ये कवी तरनूम में गजल पड़रा है और सामने से दरशक पूरे उच्साः से कै रहें
  246. 13:24–13:25जरूर जरूर
  247. 13:25–13:28आप ये पूरी तरा से एक नया देसी माहाल रच देता है
  248. 13:28–13:34आप लिकिन देख है, महाल के देसी होने से व्याक्रन के नियम अपने आपनी बड़ल जाते
  249. 13:34–13:38अर्भी और फार्सी में गजल लिखने के नियम बहुत सकत होते है,
  250. 13:38–13:42जिने बहेर या मीटर कहा जाता है, एक तराका गनितिये तराजू।
  251. 13:42–13:46तागा जिस में हर शब्द का, हर अक्षर का एक ताईवजन होता है.
  252. 13:46–13:53सबसे बडी च्नोती ये दी के इन अरभी गन्टीय नियमों को मेठली जैसी स्वतन्त्र लोक भाशा में कैसे लागु किया जाए?
  253. 13:53–13:58सही बात है किकि मेठली तो व्याक्रन्थ से जाए लोक विवावार पर चलती है.
  254. 13:58–13:59इक दम सईए.
  255. 13:59–14:03और यही से मेठली गजल का एक नया युख शुरूए रहा है.
  256. 14:03–14:08स्रोथ के मुताबेक, लेखक आशीश अंचिन हारने मेठली गजल के इतिहास को दो मुख्य युगो मे बाता है.
  257. 14:08–14:15रहा है, पहला है जीवन युग, जो 1905-2007 तक माना गया है.
  258. 14:15–14:19इसका नाम पहले मैठली गजल कार पन्धित जीवन जाके नाम पर अगगाए है
  259. 14:19–14:19जी
  260. 14:19–14:24और दूस्रा है 2008 से शुरूब हुने वाला अच्चिन हार्योग
  261. 14:24–14:27जिसने मैठली गजल को महेज भावनाउं से निकाल कर
  262. 14:27–14:30तकनी की रुप से बहुत सुद्द्रन की है
  263. 14:30–14:36अगद पते है, इस अच्छनाहार युख की जो सबसे बड़ी और क्रान्तिकारी खासियत है, वो क्या है?
  264. 14:36–14:37या है?
  265. 14:37–14:42वो ये है कि इस में ये ताय कि आगया कि गजल के अरभी मीटर या बहर किलिए,
  266. 14:42–14:46शबद की स्पलिंग, यानी वर्तनी माइने नहीं रकती,
  267. 14:46–14:49बलकी उसका उचारन या फूनेटिक्स मैंने रकता है
  268. 14:49–14:51जो दूनी निकल रहे है
  269. 14:51–14:52वो ही मीटर का वजन्ताए करेगी
  270. 14:53–14:55रूको रूको ये तोडा पेचीदा है
  271. 14:55–14:59अगर हम सर्फ उचारन या दूनी के ले वरतनी को दरकिनार कर देंगे
  272. 14:59–15:02तो क्या इसे बहाशा का मुल व्याकरन ब्रष्ट नहीं हो जाएगा?
  273. 15:02–15:04आई ये सवाल लाजमी है?
  274. 15:04–15:07या पुराने और रूडी वादी विद्वानो ने इस पर आपती नहीं जताए हो गी?
  275. 15:07–15:09इस से एक बहुत आहिम सवाल उबताएं
  276. 15:09–15:12अगर उज़ाँ बाद़ा बीच ये बहस का विशे भी रहा है
  277. 15:12–15:15इसे हम स्रोत में दिए गय एक उदारन से समचते हैं
  278. 15:15–15:15हा बताएए
  279. 15:15–15:18एक मैठली शब है जिसका मतलब होता है कोई
  280. 15:18–15:20अब इसे दो तरीको से लिखा जाता हैं
  281. 15:20–15:22कियो और कियो
  282. 15:22–15:29अगर आप इसे क्यो लिखते हैं, तो व्याकरन और भेहर के नियम के अनुसार, इसकी मात्रा दो दो गी नियाएगी.
  283. 15:29–15:33क्योंकी के और यो दोनो दीर या लंबे अख्षर हैं.
  284. 15:33–15:33अच्छा.
  285. 15:33–15:37लेकिन अगर उसी शब्द को तेजी से क्यों बोलाजाएं और लिखाजाएं,
  286. 15:37–15:44तो उसकी मात्रा एक दो हो जाएगी, अन छिनहार का तरक है, अप शब्द को लिकते कैसे हैं,
  287. 15:44–15:50इस से जादा फरक इस बाथ से परता है कि आप उसे बोलते कैसे हैं, दूनी शास्तर ही अंतिम राजा है.
  288. 15:50–15:56अहो! और इसी बात पर मेठली का एक बहुती मशुर और पुराना विवाद बी सामने आता है ना?
  289. 15:56–15:59एक और योग के अच्तमाल का विवाद येग दम सही पक्डा आपने
  290. 16:00–16:03जैसे किसी शब्द को केल ल लिखाजाए या केल लिखाजाए
  291. 16:03–16:06बलकुल ये स्व दो अख्शरो का विवाद नहीं है,
  292. 16:06–16:08ये इस बात का वैचारिक संगर्ष है,
  293. 16:08–16:10की बाशक किसके करीब होनी चाहीं?
  294. 16:10–16:14किताभी व्याक्रन्के, या आम जन्ता की जुबान्के.
  295. 16:14–16:16वह द गेहरी बात है.
  296. 16:16–16:20लेखक आशीश अचिन्चिन्हार सब श्पष्ट्रूप से पुरानी पद्दती
  297. 16:20–16:21यानी एक अ समर्ठन करते हैं.
  298. 16:21–16:25उदारन किलिये कायल जोय जेसे शब्द.
  299. 16:25–16:27उनका तरक बहुत ठोस है.
  300. 16:27–16:28क्या तरक है उनका?
  301. 16:28–16:32पहली बात ये एवाला रूप मेठली के आम जन मानस के सुबभावेक
  302. 16:32–16:35और लोक उचारन के जाडा करीव है
  303. 16:35–16:37और दूसरी सबसे बडी बात
  304. 16:37–16:41इसी एवाले उचारन से गजल के अरभी मीटर
  305. 16:41–16:43या बहर में एक दम सही वजन आता है
  306. 16:43–16:44औरे वा!
  307. 16:44–16:51बलकी ये अपने लोक मुल की तरफ लोटना है, ताकी एक अरभी गनितिये नियम को संतुष्ट किया जासके.
  308. 16:51–16:58बलकी ये अपने लोक मुल की तरफ लोटना है, ताकी एक अरभी गनितिये नियम को संथुष्ट किया जासके.
  309. 16:58–16:59आल मेल है.
  310. 16:59–17:00जी.
  311. 17:00–17:03यह साभित करता है कि लोक भाशा और शास्त्री ये अरभी नियम
  312. 17:03–17:05एक दूसरे के दूश्मन नहीं है.
  313. 17:05–17:08वलकी अगर उने सहीं से समजाजा है तो वे एक दूसरे के
  314. 17:08–17:09पूरक बन सकते हैं.
  315. 17:09–17:12तो, इस सब का मतलप क्या है.
  316. 17:12–17:16आजकी इस गहन चर्चा में हमने बहुत सी पर्तें खोली है
  317. 17:16–17:21हमने अरब के रेगिस्तानो से लेकर, मित्फिलाके तार्गे पेडो तक्का सपर तैकिया
  318. 17:21–17:23बलको लिएक लंबा और खुबसुरद सपर
  319. 17:23–17:26हमने देखा की कैसे गजजल ने अपने विदेशी सुट्केस को खोला
  320. 17:26–17:33और मदिरा को तारी में, सुराही को लबनी में, और साकी को पासी में बडल दिया.
  321. 17:33–17:37हमने ये बी समजा कि कैसे सूफी अस्लाम का इश्क,
  322. 17:37–17:42बिना किसी तक्राव के वैशनव भकती के महाभाव के साथ जाकर बैट कया.
  323. 17:42–17:44हां, जो की सब से हैरान करने वाड थी.
  324. 17:44–17:48और अन्त में हम देखा की मात्राँ के सख्थ गणत ने
  325. 17:48–17:51कैसे मेठली के स्वबाविक दूनी शास्थर के सामने
  326. 17:51–17:53एक बहुत ही सम्मान जनक समजवाता किया
  327. 17:53–17:57ये पुरी प्रक्रिया ये दिखाती है के गजल कोई बंद दिभबा
  328. 17:57–18:01अगजल पानी कीतरा नहीं है, जुबस बहेजाती है,
  329. 18:01–18:05बलकी गजल एक बेल कीतरा है, एक क्रीपर कीतरा है.
  330. 18:05–18:08बीज भले ही विदेशी हो, अरब से आया हो,
  331. 18:08–18:12लेकिन जब बेल मित्ला की जमीन पर अंकुरित होती है ना,
  332. 18:12–18:15तो उसी पेड का अकार ले ले लेती है,
  333. 18:15–18:19तो उसी पेड का अकार ले लेती है, जिस पर वो चटी है.
  334. 18:19–18:23लेक्ख आशीश अंचिनोर की सब से बडी उपलप्डी यही है,
  335. 18:23–18:26कि उनो आरभी व्याक्रन के सक्त नियमो को,
  336. 18:26–18:30मैठली बहाशा पर एक बोज या जनजीर कितरा थोपा नही है.
  337. 18:30–18:37बलकी उन न्यमों को बहुत्ती खुबसुर्ती से मैठली की प्रक्रती उसके लोक मिजाज के अनुसार द्हाल दिया है.
  338. 18:37–18:42और यही अनुकुलन, यही लचीला पन किसी भी कला या भाशा को सद्विएं तक जीवित रकता है.
  339. 18:42–18:45विदेशी रूप्रेखा और देशी यात्मा का ये मिलन,
  340. 18:45–18:48हमें ये सिकहाता है, कि जब दो बिलकुल अलक संस्क्रतिया,
  341. 18:48–18:51अपस में बिना किसी एहंकार के समात करती है,
  342. 18:51–18:55तो कुछ बहुती नया अनुथा और सुंदर जनम लिता है.
  343. 18:55–18:59इक्दम सही कहा अपने और इसी खुपसुरत विचार के साथ
  344. 18:59–19:02इस लंबि और रोमाँचक चर्चा के अंद पर आने का समय होगया है
  345. 19:02–19:06लेकिन इस बादचीद को खतन करने से पहले
  346. 19:06–19:08एक आज्सा विचार है
  347. 19:08–19:12जो सच में गेराई सोचने पे मजबूर कर देता है
  348. 19:12–19:18आजके इस दोर में, जब हर तरव, भाशाँ, संसक्रतियों और दरमों के भीच,
  349. 19:18–19:23बहुत सक्त और उची दिवारें कडि करने की होड मची है,
  350. 19:23–19:28तो क्या इस मेठली गजल का ये सबफर कोई संदेश नहीं देता?
  351. 19:28–19:29बहुत गेरा सवाल है.
  352. 19:29–19:39ज़र विचार करने वाली बात है, कि अगर एक सुदूर अरब के कथोर समाज में जन्मी काविविदा बिना अपना वजुद कोए, दिना अपनी आत्मा को मारे,
  353. 19:39–19:46मिठ्रा के पासी, लबनी और ताडी के सात इतने प्यार से इतनी गेराए से गुल मिल सकती है.
  354. 19:46–19:47बलकल.
  355. 19:47–19:54अगर कवीता कला और भाशाई इतनी आसानी से सरहदे पार कर के एक दुस्रे में समा सकती हैं
  356. 19:54–19:56तो फिर इनसानी सुच कियो नहीं

Plain text

जरा सोचे, एक तरव आरब का तप्ता हुवा खजूर का रेगिस्तान, जहां दूर-दूर तक सिझ रेद के तुफान आते हैं. बलकुल. और दूसरी तरव, हमारे भारत में भिहार के मिठलाक शेट्र के एक दम हरे-ब़रे तार के पेड, वूपोकर और दान के केट. मतलब भगोले किया बाशाई रूब से देकें, तो इन दोनो दून्याँ में कोई सीदा ताल में नजर ही नहीं आता. आप खुई भी देखेगा तो यह एक आगा कि नहीं में क्या ही समानता हो सकती हैं. बिलकल. लेकिन क्या हो अगर अगर ये कहाजाए, कि अरब के उसी तबते रेगिस्टान में जन्मी जो गजल है, उसे अपना अस्ली सुकून मित्ला के तार के पेडो की च्याँ में मिलता है. औरे वाज, यह तो बहुती दिल्च्यस बात कै दिया दिया आपने. हैंग? तो आजकी इस गहन चर्चा में हम बलकुल इसी जादूई सांस्क्रिति क्यात्रा को समजने वाले है. हमारे पास जो स्रोथ समगरी हैंग, वो है आशीश अनचिनहार दुआरा लिकित, मैत्ली गजलक व्याकरन औ इतिहास. यानी मेठली गजल का व्याक्रन और इतिहास. जी. और ये कोई सादारन व्याक्रन की किताब नहीं है. बिलक्ल नहीं. तो इस चर्चा का हमारा मुक्योदेशे आज यही समझना है, कि कैसे अरभी और फारसी जैसी विदेशी बाशाँ में जन्मी ये गजल, तेट, मीटी और जोस्तानिया मेठली बाशा है, उस में खुद को पूरी तरहा से कैसे डाल लेती हैं? एक दम सही खेरी हैं आप ये सरफ एक बाशा से दुसरी बाशा का अनुवाद नी हैं मतलब ये एक पूरी के पूरी संसक्रती का उसके जैस्बातों का मैठिली करन है आप, मैठिली करन. अकसर मैं सुचती हूँ के जब कोई विद्हापनी जन्मबूमी चोडगर किसी नहीं जमीन पर जाती है, तो वो आपना मूल स्वरुब को देती है या फिर नहीं जमीन पर एक अजनबी की तरह रहती है आप बलकुल लेकिन ये दस्तावेज हमे बताता है कि गजल ने मिखला में एक महमान की तरा नहीं बलकी उस गर के एक सदस्से की तर आपनी जगा बना है ज़े इस पर थोडी गेराई से बात करते हैं. देखे कोई भी कावियविदा जब दूसरी जगा का सफरत तैकरती है, तो वो खाली हाथ नहीं जाती. वो अपना पुरा एक खाछते हैं उसे एक सुट केस लेकर चलती हैं. जिस में उसके अपने मुहावरे होते हैं. यह समजना बहुत जरूरी है. एक दम सही. वोकी गजल की पूरी दून्याना कुछ खास प्रतीकों परे टिकी है. मैया खाना याने मधूशाला, मैयाने शराब, सुराही और वो शराब पिलाने वाला. आवो साकी. बिलकुल. ये सरफ शबद नहीं है. ये स्रिव शब्द नहीं है, ये पुरा महाल बनाते हैं. तो जब गजल ने मितला कियो रूख किया, तो सबसे बडी चुनोती यही ती, के ये विदेशी प्रतीकों को, वहा के स्थानी ये, जो ग्रामीलोगे, वो कैसे समझेंगे? यहां बात सच्छ में बहुत दिल्चास तो जाती है, कुई कि लेक हक ने विदेशी शब्डो को बस शब्द कोर्ष से निकाल कर मेठली पर ठोप नहीं दिया. मतलब अगर एक उदाहरन्ट से समजें, जैसे? तो ये बिलकल वैसा ही है. जैसे क्या? जैसे किसी होलीवुट फिल्मे विदेशी जासुस जेमस बोड़ के हाथ से उसकी मशुर माटीनी का गलास चीन लिया जाए. हा, हा, अचा. हा, और उसके हाथ में किसी गानो के कुलहडवाला मत्ठा या देसी ताडी तमादी जाए. जाहर है बर्तन बदल गया है, स्वाद बिलकुल बदल गया है, लिकिं जो खुमार है ना जो नशा है, वो जस का तस रहता है. ये तुलना उस पूरी प्रक्रिया की एक दम सतीक तस्वीर पेष करती है. अगर अगर निस किताब के पन्नो को पलतें, तो आशीश अचिन हार ने अरभी के शब्द मैं, यहनी मदिरा की जगा मैठली में, ताडी शब्द को उप्यो करने का बहुती वेग्यानिक तर्क दिया है. वेग्यानिक अचान्सक्रितिक तर्क दोनो? बिल्कोल, तार्दी मित्ला के ग्रामीड परिवेश का एक बहुती अबहिन नहिस्सा है उसी तरा पार्सी गजलो में शराब रक्ने के लिए मीना शब्द के अईठमाल होता है ये मीना अकसर चांदी या रंगीन काच का एक बेहद नक्काशीदार सुंदर बरतन होता है बर्तन होता है, जिस में ताडी बूंद बूंद कर के इकथा की जाती है, ये महलो मेरके काज के मीना से एक दम उलत है. सीदे पक्रती से जुडवा बर्तन है? एक दम. और सफर यही नहीं रुकता. अरभी का सागर, यान प्याला, वो मेठली में आखर बाटी बन जाता है स्रोत में एक और बहुती दिल्चास बाद बताई गय है चनेक्स के बारे में आच्छ? मैए कहने वाली चनेक्स? आखसर मैए कहने में शराब के सात कुछ चनेक्स कहाए जाते हैं मेतली में इस नमकीन या सनाखस को चिखना कहा जाता है औहो चिखना जी जिस में बूना हुए चना या तलीवी मचली शामिल होती है दिल्च्यस बात यह की इसे आजके आदूनिक होटलो की बाशा में अदेशी श्वाल है ये वोगत आहें सबाल है कि लिक्यों जब आम हिंदी और दूक लोगप्रिय संसक्रिति की बात करते है तु साकी सूनते ही दिमाग में क्रहेस्स्यमएई बेहत खुबसुरत महला की तस्वीर उबरती है अग़ा एक बडा सवाल है के क्या इगजल के मुल दाचे के साथ एक तरे की चिरचानी हो जाएगी? वही तो मैं सोच रही तो यहां जो बात सब से दिल्चासपे है के लोगप्री संसक्रिती ने साखी की जो तस्वीर बनाईएना वो एदे प्रोसने वाला कोन है वहस्यमएई बेहत खुबसुरत महला की तस्वीर उबहरती है अब मित्ला के तेंट्क्रामीन परीवेश में ये रूमानी साकी कहा से लाएंगे? आई एक बडा सवाल है के क्या ये गजल के मुल दाचे के साथ एक तरे की चिडचानी हो जाएगी? वही तो मैं सोच रही ती. तो यहां जो बाथ सब से दिल्चास पै वो यहें के लोगप्री संसक्रिती ने साकी की जो तस्वीर बनाईएना वो अटिहासिक रूप से पुरी तरा सही नहीं हैं. अच्छ में? जी. अगर हम शास्त्रिय अरभी परमपरा और जाही लियाए के दोर की कविताँ को देखें तो साकी असल में एक पूरुष होता था. उगर कभीले का वो वेक्ती होता था जो मजलिसो में शराप परुसने का काम करता था. औरे ये तो मुझे पताई नी था? अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ� बाशी भाई ही हो सकता है क्या बाद है ये गजल की ज़ों को मित्ला की मिट्टी में गड़ाई तक रोपने का सच में बहुती शांदार काम है एक दम सही कहा आप आपने लेकिन देखे ये तो होगए मैए खाने और प्रतीकों की बाध यहां एक सबाल हुजे परिशान करता है, क्या गजल का मतलप स्र्फ प्रेमी प्रेमिका का संसारिक प्रेम, शराब, बाटी और पासी ही है? नहीं नहीं, गजल स्र्फ इतनी सी तो नहीं है वोई ना क्योंकि अगर गजल केवल मैखाने के नशे तक सीमित होती, तो ये सद्यों तक जिन्दा नहीं रहती. क्या इन भहातिक प्रतीकों के पीचे कोई बहुत गेहरी अद्ध्यात्मिक साईन्स या दर्षन काम कर रहा है? आपका ये सवाल हमें गजल की अस्ली रूइब तक लेजाता है. सूफी इस्लाम में इश्क की अवदारना महेज एक बहुतिक अकर्षन नहीं हैं. तो फिर क्या है? मैं काने का नशा दरसल सानसारिक नशे से अद्धियात्मिक नशे की और जाने का एक रूपाक है. एक मेटाफर है. सूफी दर्शन में किसी भी अनसान के इश्क में पडने और फिर इश्वर तक पहुचने के सात मोकाम, यहनी सात स्तर बताएगे हैं. आप और यह कोई सीथी रेखा नहीं है, श्रोथ में जो बताया गया है, ये आकर्शन्द से शुरू हो कर एक पूरी मनोवे ज्यानेक और अद्यात्मिक यात्रा है बिलकुल मतलब पहले हुब आता है यानिक हलका सा आकर्शन्द तो फिर उन्स, यानिक गेरे लगाव में बडलता है फिर वो इश्क बनता है ज़हां प्रेम बिल्कुल एक निष्ट हो जाता है जी और वहां से बात अकीदत यानी सम्मान और इबादत यानी पुजा तक पूजती है आं फिर अनसान जुनुन की सनक से गुजरता है और अन्त में साथवे मुकाम पर पहुचता है मुध या फना वो अस्तिती जहाँ प्रेमी का अपना कोई वजुद नहीं बच्च्टा वो अपने प्रेम में पुरी तरहा मिट जाता है ये सोचकर इ मेरे रोंग्टे खडे हो जाते हैं और अगर आम इसे बड़े सन्दरभ में देखेना तो यहां दो सब्यताँ का एक बहुती जादूई संगम देखने को मिलता है. वो कैसे? लेक्खा काशीश अंचिनेहार ने, इस अरभी सूफी दर्षन को सीधे तोर पर लिए वैश्णाव परमपरा से जोडा है. सोल्वी सदी के महान वैश्नव सन्त रूप गो स्वामी ने एक बेहत प्रसिदध गरन्त लिखा था बबकती रसाम्रित सिंदु अच्छा इस में क्या है? इस गरन्त में जब वैश्नव बबकती की व्याख्या की गई गई गई, तो उस में भी इश्वर के प्रती प्रेम के तीक अईसे ही साथ अस्टर बताए गये हैं. औरे वा! मतलप सने, मान, प्रने, राग, अनुराग, भाव, और अंत में महाबहाव. क्या ये महाबहाव वही अवस्ता है? जिसे सूफी फना कहते हैं. लगबभग वही महाभाव हिंदू दर्षन की वो चरम अवस्था है जहां प्रेमी और प्रेमिका या कहले भक्त और भगवान के भीच का सारा भेद सारा द्वैट खत्म हो जाता है मतलवे एका कार हो जाते है तीक अर्दनारी श्वर की तरहा एक दम सही अर पता है, ये समान्ता कोई हवामे तीर नहीं है, रूप गोस्वामी सन्यास लेने से पहले कोई आम अन्सान नहीं ते, वे बंगाल के शासक हुसैंशा के दरबार में एक बछद बड़े मंत्री ते, और पारसी भाशा के जाने माने चोटी के विद्वान थे. अहो अप समज मे आईा कनेक्ष्छन जी तो ये सपाश्ट है के सूफी अस्लाम के इश्क के मुखाम और वैश्नव भक्ती के प्रेम के स्थर एक दूस्रे से पुरी तरा समवात कर रहे थे ये सच में बहुत ही अद्बोट इतिहास है मतलब जब गजल का इश्क मिठिला पहुटचता है, तो वो किसी आजनभी जमीन पर नहीं उतरता. बलके वेश्नव भक्ती के महाभाव में अपना ही अख्स देखता है. बलकल. लेकिन देक्ये, जब इश्क सूफी के चरम पना या वैशनव के महाबहाव तक पहचजाए, जब हाँ बहावनाई असीमित और आन्यंट्रित हो, तो एक कवी उस अथा समदर को कागस के चोटे से तुक्डे पर कैसे बाँणता है. आप गजल के येदाचा कोई एक एक दिन में नहीं बना है अगर अगर इसकी इत्यास पर नजर डालें तो अस्लाम के उदेर से पहले के समें को जाहिल्या या अंदकार युख कहा जाता था आपके कथोर रेगिस्तानो वाला समें अगर आपके कथोर रेगिस्टानो वाला समः अगर वागा कबीले आपस में लड़ते रहते रहते थे और कबीले के सरदारों की तारीफ में यापनी वाफादारी साभिट करने किलिए जो कविताए पडी जाती ती उने कसीदा कहाँ जाता था और कभीले के सर्दारों की तारीफ में यापनी वाफादारी साभिद करने किलिए, जो कविताई पडी जाती ती उने कसीदा कहा जाता ता. तो फिर कसीदा से गजल कैसे बनी? फिर इम्रुल कैस नाम के एक शाएर आई. उने पहला शाएर मना जाता है, जिसने इस सखत राजनी कि कसीदे में, कोमलता और प्रेम के तत्वों को पिरोया, अर बस वहीं से गजल का जन्वा. वाओ और ये वास्तु कला किन इप गारे से बनती है. स्रोथ में कुछ तकनी की शब दिये गए है जिन इस समजना जरूरी है. जी जएसे शेर? राए. एक शेर महेज दो पंक्तिों का जोडा होता है. पहली पंक्ती को मिस्राय उला कहते है और दूसरी पंक्ती को मिस्राय सानी इसके लावा मतला होता है, जो गजल का सब से पहला शेर होता है और मक्ता आखरी शेर होता है, जिस में शायर अपनाम यानी तखलुस लिकता है लिकिन इन सब में जो चीस सब से ज़ादा तकनी की और महतुपून है, वो है रदीप और काफिया. तीक है, इसे तोडा समझते है. जी, ये दोनो गजल की इमारत की रीड की हद्टी हैं, जो उन असीमद बावनाओ को एक सकत नियम में बांद कर रकते हैं. अगर इसे आसान शब्डो में खुलकर देखाए, तो रदीप वो शबद या शबडो का समू है, जो गजल के हर शेर के अंप में भिल्कुल वैसे ही, मिरा मतलब है बिना एक अखषर बदले बार बार दोरा या जाता है. जेसे अगर रदीप कोना है, तो हर शेर कोना पर ही खतम होगा. और काफिया वो शबद है जिसकी तुगबंदी होती है, जो रदीप से टीक पहले आता है. जेसे रोना दोना कोना. आँ, तो रोना कोना दोना कोना ये वो खूटे है, तो अगर उज़े सोर और ताल में किसी राग में गाखर पडाजाए तो उज़े तरन्नुम कैतें। और मुशाईरे का माहोल? या वो भी मैफिल में बड़ल जाता है। विलकुल बड़लता है। तो उनके भी अपने कडे नियम और आदाब हुतें अच्छ? अगर मुशाईरे में कवीता को समाने तरीके से पड़ाई, तो उसे तहत केतें. और अगर उसे सूर और ताल में किसी राग में गाकर पड़ाई, तो उसे तरनुम केतें. और मुशाईरे का माहोल? लेक्खाक ने एर्शात की जगा थेट मेठली शब्द जरूर का प्रस्ताव रख्खा है. जर अज़ा सोची उस द्रिष्चे को एक कवी तरनुम में गजल पड़रा है. और सामने से दर्षक पूरे उच्साः से कैरे हैं. जरूर जरूर. ये कवी तरनूम में गजल पड़रा है और सामने से दरशक पूरे उच्साः से कै रहें जरूर जरूर आप ये पूरी तरा से एक नया देसी माहाल रच देता है आप लिकिन देख है, महाल के देसी होने से व्याक्रन के नियम अपने आपनी बड़ल जाते अर्भी और फार्सी में गजल लिखने के नियम बहुत सकत होते है, जिने बहेर या मीटर कहा जाता है, एक तराका गनितिये तराजू। तागा जिस में हर शब्द का, हर अक्षर का एक ताईवजन होता है. सबसे बडी च्नोती ये दी के इन अरभी गन्टीय नियमों को मेठली जैसी स्वतन्त्र लोक भाशा में कैसे लागु किया जाए? सही बात है किकि मेठली तो व्याक्रन्थ से जाए लोक विवावार पर चलती है. इक दम सईए. और यही से मेठली गजल का एक नया युख शुरूए रहा है. स्रोथ के मुताबेक, लेखक आशीश अंचिन हारने मेठली गजल के इतिहास को दो मुख्य युगो मे बाता है. रहा है, पहला है जीवन युग, जो 1905-2007 तक माना गया है. इसका नाम पहले मैठली गजल कार पन्धित जीवन जाके नाम पर अगगाए है जी और दूस्रा है 2008 से शुरूब हुने वाला अच्चिन हार्योग जिसने मैठली गजल को महेज भावनाउं से निकाल कर तकनी की रुप से बहुत सुद्द्रन की है अगद पते है, इस अच्छनाहार युख की जो सबसे बड़ी और क्रान्तिकारी खासियत है, वो क्या है? या है? वो ये है कि इस में ये ताय कि आगया कि गजल के अरभी मीटर या बहर किलिए, शबद की स्पलिंग, यानी वर्तनी माइने नहीं रकती, बलकी उसका उचारन या फूनेटिक्स मैंने रकता है जो दूनी निकल रहे है वो ही मीटर का वजन्ताए करेगी रूको रूको ये तोडा पेचीदा है अगर हम सर्फ उचारन या दूनी के ले वरतनी को दरकिनार कर देंगे तो क्या इसे बहाशा का मुल व्याकरन ब्रष्ट नहीं हो जाएगा? आई ये सवाल लाजमी है? या पुराने और रूडी वादी विद्वानो ने इस पर आपती नहीं जताए हो गी? इस से एक बहुत आहिम सवाल उबताएं अगर उज़ाँ बाद़ा बीच ये बहस का विशे भी रहा है इसे हम स्रोत में दिए गय एक उदारन से समचते हैं हा बताएए एक मैठली शब है जिसका मतलब होता है कोई अब इसे दो तरीको से लिखा जाता हैं कियो और कियो अगर आप इसे क्यो लिखते हैं, तो व्याकरन और भेहर के नियम के अनुसार, इसकी मात्रा दो दो गी नियाएगी. क्योंकी के और यो दोनो दीर या लंबे अख्षर हैं. अच्छा. लेकिन अगर उसी शब्द को तेजी से क्यों बोलाजाएं और लिखाजाएं, तो उसकी मात्रा एक दो हो जाएगी, अन छिनहार का तरक है, अप शब्द को लिकते कैसे हैं, इस से जादा फरक इस बाथ से परता है कि आप उसे बोलते कैसे हैं, दूनी शास्तर ही अंतिम राजा है. अहो! और इसी बात पर मेठली का एक बहुती मशुर और पुराना विवाद बी सामने आता है ना? एक और योग के अच्तमाल का विवाद येग दम सही पक्डा आपने जैसे किसी शब्द को केल ल लिखाजाए या केल लिखाजाए बलकुल ये स्व दो अख्शरो का विवाद नहीं है, ये इस बात का वैचारिक संगर्ष है, की बाशक किसके करीब होनी चाहीं? किताभी व्याक्रन्के, या आम जन्ता की जुबान्के. वह द गेहरी बात है. लेखक आशीश अचिन्चिन्हार सब श्पष्ट्रूप से पुरानी पद्दती यानी एक अ समर्ठन करते हैं. उदारन किलिये कायल जोय जेसे शब्द. उनका तरक बहुत ठोस है. क्या तरक है उनका? पहली बात ये एवाला रूप मेठली के आम जन मानस के सुबभावेक और लोक उचारन के जाडा करीव है और दूसरी सबसे बडी बात इसी एवाले उचारन से गजल के अरभी मीटर या बहर में एक दम सही वजन आता है औरे वा! बलकी ये अपने लोक मुल की तरफ लोटना है, ताकी एक अरभी गनितिये नियम को संतुष्ट किया जासके. बलकी ये अपने लोक मुल की तरफ लोटना है, ताकी एक अरभी गनितिये नियम को संथुष्ट किया जासके. आल मेल है. जी. यह साभित करता है कि लोक भाशा और शास्त्री ये अरभी नियम एक दूसरे के दूश्मन नहीं है. वलकी अगर उने सहीं से समजाजा है तो वे एक दूसरे के पूरक बन सकते हैं. तो, इस सब का मतलप क्या है. आजकी इस गहन चर्चा में हमने बहुत सी पर्तें खोली है हमने अरब के रेगिस्तानो से लेकर, मित्फिलाके तार्गे पेडो तक्का सपर तैकिया बलको लिएक लंबा और खुबसुरद सपर हमने देखा की कैसे गजजल ने अपने विदेशी सुट्केस को खोला और मदिरा को तारी में, सुराही को लबनी में, और साकी को पासी में बडल दिया. हमने ये बी समजा कि कैसे सूफी अस्लाम का इश्क, बिना किसी तक्राव के वैशनव भकती के महाभाव के साथ जाकर बैट कया. हां, जो की सब से हैरान करने वाड थी. और अन्त में हम देखा की मात्राँ के सख्थ गणत ने कैसे मेठली के स्वबाविक दूनी शास्थर के सामने एक बहुत ही सम्मान जनक समजवाता किया ये पुरी प्रक्रिया ये दिखाती है के गजल कोई बंद दिभबा अगजल पानी कीतरा नहीं है, जुबस बहेजाती है, बलकी गजल एक बेल कीतरा है, एक क्रीपर कीतरा है. बीज भले ही विदेशी हो, अरब से आया हो, लेकिन जब बेल मित्ला की जमीन पर अंकुरित होती है ना, तो उसी पेड का अकार ले ले लेती है, तो उसी पेड का अकार ले लेती है, जिस पर वो चटी है. लेक्ख आशीश अंचिनोर की सब से बडी उपलप्डी यही है, कि उनो आरभी व्याक्रन के सक्त नियमो को, मैठली बहाशा पर एक बोज या जनजीर कितरा थोपा नही है. बलकी उन न्यमों को बहुत्ती खुबसुर्ती से मैठली की प्रक्रती उसके लोक मिजाज के अनुसार द्हाल दिया है. और यही अनुकुलन, यही लचीला पन किसी भी कला या भाशा को सद्विएं तक जीवित रकता है. विदेशी रूप्रेखा और देशी यात्मा का ये मिलन, हमें ये सिकहाता है, कि जब दो बिलकुल अलक संस्क्रतिया, अपस में बिना किसी एहंकार के समात करती है, तो कुछ बहुती नया अनुथा और सुंदर जनम लिता है. इक्दम सही कहा अपने और इसी खुपसुरत विचार के साथ इस लंबि और रोमाँचक चर्चा के अंद पर आने का समय होगया है लेकिन इस बादचीद को खतन करने से पहले एक आज्सा विचार है जो सच में गेराई सोचने पे मजबूर कर देता है आजके इस दोर में, जब हर तरव, भाशाँ, संसक्रतियों और दरमों के भीच, बहुत सक्त और उची दिवारें कडि करने की होड मची है, तो क्या इस मेठली गजल का ये सबफर कोई संदेश नहीं देता? बहुत गेरा सवाल है. ज़र विचार करने वाली बात है, कि अगर एक सुदूर अरब के कथोर समाज में जन्मी काविविदा बिना अपना वजुद कोए, दिना अपनी आत्मा को मारे, मिठ्रा के पासी, लबनी और ताडी के सात इतने प्यार से इतनी गेराए से गुल मिल सकती है. बलकल. अगर कवीता कला और भाशाई इतनी आसानी से सरहदे पार कर के एक दुस्रे में समा सकती हैं तो फिर इनसानी सुच कियो नहीं

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