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मैथिली_गजलमे_साकी_कि_पासी.m4a

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Part 1 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 1
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  1. 0:00–0:06वल्क्म तो देबेट, भाषाक साहित्य, कि आहा के कहो लागल अची, जे मैठली में गजल लिखेंट काल,
  2. 0:06–0:10ज़ा साखी के पासी कही दिलजाए, तग गजल के आत्मा मरी जाए च्छे.
  3. 0:10–0:14वह मतलब यी मैठली साहित्य के एक तपेग क्रान्ती थीक.
  4. 0:14–0:16इबहुत गमहीर प्रश्नाच
  5. 0:16–0:17इब्दम
  6. 0:17–0:19तविचार विमर्सक एप मनज पर
  7. 0:19–0:21आई हम्रा लोकनी साहिटके
  8. 0:21–0:24एक दा अथ्तेंत ज्वलन्त विश्या पर गबसव कर रहल ची
  9. 0:24–0:26हमरा एदहरीग विमर्सक का आदार आची
  10. 0:26–0:29आशीश अचिनारक के बहुचर्चित पोती
  11. 0:29–0:31अब प्रश्न इई उड़ेत आजी,
  12. 0:31–0:37जगन आर्भी फार्सिक के सुगन्द से बहरल इविदा मैठलीक माटी परवेत आजी,
  13. 0:37–0:38तकी होई तची.
  14. 0:38–0:40हमर्स पष्ट माना बची,
  15. 0:40–0:42जगजल जे मैठली मेडली आजी,
  16. 0:42–0:44ता अप आप प्रष्ट मैठली आजी,
  17. 0:44–0:52अब प्रश्न इई उठ़ेत आची, जगखन आरभी फार्सिक के सुगन्द से भरल एविदा मैत्लिक माटी परवेत आची तक्की होए तची.
  18. 0:52–0:56अद्रिद मताची जे गजल कोनो सादारन कविता नहीं
  19. 0:56–1:01बलकी मतल बेक्ता वैग्यानिक अगनितिया कविविदा आची
  20. 1:01–1:05आर भी अप फारसीक इल्म ए अरुपन दाली लेवाख जाही
  21. 1:05–1:08अपनेही पर एक तदोसर दिशा साभी रहा लग ची
  22. 1:08–1:09कहो
  23. 1:09–1:11हमर इद्रद मता ची
  24. 1:11–1:14जे गजल कोनो सादारन कविता नहीं
  25. 1:14–1:16बलकी मतलब एक ता
  26. 1:16–1:19वैग्यानिक अगनितिय कविविदा जी
  27. 1:19–1:22आरभी आप फारसीक इल्म ए अरुज
  28. 1:22–1:26उज, अथा थ, च्ण्द शास्ट्र कद्वर नियमक पालन केला बिना,
  29. 1:26–1:31ज्य आहा गजल लिखे ची, ता आहा गजल क मुल आतमा के नष्ट करो रहल ची.
  30. 1:31–1:34विदात नियम उकर पहचान होए चे.
  31. 1:34–1:39मुदा की, नियमक नाम पर हम भाशाक स्वाबाविक प्रक्रतिक मार दे.
  32. 1:39–1:44अचिन्हारक पोथी अस्पष्ट कराई तची, जे मैठली गजल अआ रव,
  33. 1:44–1:47रहिन्दी गजल जेका उच्चारनक तवन्द में नई पही से तची.
  34. 1:48–1:49जेना हम इत उदहरन देची.
  35. 1:49–1:50आदियो.
  36. 1:50–1:56रूटुग गजल नहींदी शेहर शब्दक वरतनी एक दूई अथात लगु दीर गोईता ची
  37. 1:56–1:58मुदा जक्हन उव्र्दूग गजल मे जाएच्छे
  38. 1:58–2:04तव व्र्दू उच्चारनक आग्रह में उक्रा शेहर अथात दूई एक मानक का विवाद थाडोई ची
  39. 2:04–2:08दूशन्त कुमार्जका महान गजल कारो के आलोचित कलगल
  40. 2:08–2:12आप इहिंदी अ वूर्दुक भीचक एक ता बहुत पुरान विवात थेक
  41. 2:12–2:15तिक कहलू, मुदा मेठली मेताई समस्या आजीय नहीं
  42. 2:15–2:18मेठली में केवू जेकर मात्रा दूए दूए आची
  43. 2:18–2:23अखी यो जेकर मात्रा एक दूया ची दून्नूवर्तनिक स्वत्न्तर्ता सर्व मान्ने आची.
  44. 2:23–2:32उता ची, ता इजे भाशिक विविद्धा चे उ गजल कारक के मात्रा क्रम निर्दारन में एक ता पाएक सूविद्दा देता चे.
  45. 2:32–2:37दोसर भात, जे गजल के प्रतीको के स्थानी करन करव अद्यन्त आवश्षक अचे,
  46. 2:37–2:42जा हम मैखाना के पीलस काना वा तादी काना कही,
  47. 2:42–2:44मुदा उईस अड़्त बदली जाए चेना?
  48. 2:44–2:50नहीं बदले चे, साकी के पासी आहसीना के सुनडकी वा ललिमुन्या कहब,
  49. 2:50–2:52मेतलिक मातिक सुगंदाने तचे
  50. 2:52–2:56इई पात्खके भेसी अपनापनाख भोद करावाई तचे
  51. 2:56–2:58इदो भेल आहाक दिसक बात
  52. 2:58–2:59मुदा दोसर काच सदेखाब
  53. 2:59–3:03ता आहाक इद्टर्क हम्रा सर्वता उचित नी लागा तचे
  54. 3:03–3:06आहाज इस्ठानिय करन कदर्क दोराल ची
  55. 3:06–3:08उ बावुक्ता कस्तर पर अकर्षक अवष्चे आचे
  56. 3:08–3:11बावुक्ता मात्र नहीं आची इई
  57. 3:11–3:14आची, कारन गजल के वल शब्दावली खेल नहीं आचे
  58. 3:14–3:17इ मात्रा क मतलब लगु अदिर्गक सक्त गनी तचे
  59. 3:17–3:23पोथी में देलगेल काफिया का कला न्यमक द्रिष्टान तक देखू, काफिया अर्ठात स्वर साम्ये युक्त तुकान्त.
  60. 3:23–3:26मुदा काफिया ता मेठिलिक कविता में से हो होई तचे.
  61. 3:26–3:29हम्रा लोकनि तुकान्त मिलावे थ्ची ना?
  62. 3:29–3:30नहीं नहीं
  63. 3:30–3:36गजलक काफिया आँ सादारन कविता तुकान्त में जमीन आसमान काफरा काची
  64. 3:36–3:42जो कोनो गजलक मतला में, मतला पहल शेर में चन आदन काफिया ची
  65. 3:42–3:45तैएक्रा गजलक व्याक्रन में सही आची
  66. 3:45–3:46कि आख सही आची?
  67. 3:46–3:49कारन एते मुल अक्षर नाँ आची
  68. 3:49–3:52अगी से पहिलोक स्वर अव आव आव आव आव
  69. 3:52–3:55मुदा जो आहा उही में दून के मिला देव
  70. 3:55–3:58तक गजलक नजरी में उसर्वता गलत बोजेता है
  71. 3:58–4:03मुदा सादारन मविता में तलोक च्शन आदून आराम से मिला लेज्छती
  72. 4:03–4:07एक्रत्तनी विस्तार से बुजाओ, जे एक गजल में किया गलत भजेता है.
  73. 4:07–4:14कारन, एक आची जे दून में नाउ से पहिने उस्वर आबे गेलें, जकन की च्शन में अद्स्वर चल.
  74. 4:14–4:21इजे स्वरक गनिती अबन्दन अची, इकोनो जिद्दिपन नहीं अची, एकर पाचा दूनिशास्त्रक विग्यान काज करे च्याए.
  75. 4:21–4:23दूनिशास्त्रक विग्यान
  76. 4:23–4:27एक्दम, मानो मस्तिष्क अग्कान गजल सूनीते काल,
  77. 4:27–4:29एक ता निष्चित अकुस्टिक अक्स्टेक्टेशन,
  78. 4:29–4:32मतलब ध्वन्नात्मक आशामे रहेचचे.
  79. 4:32–4:35कान जखन च्ण अद्दन सूने तची,
  80. 4:35–4:37तद समान लैब हेटे तची.
  81. 4:37–4:39तुन अभी ते उलैट तूट जाथचे.
  82. 4:39–4:43मस्तिष्क में एक ता कोगनेटिव दिस्वन्न्स उत्पन्न हुँईच्छे,
  83. 4:43–4:47रुकना और अज्जाक इसन्रचना गजलक प्रान्तिक,
  84. 4:47–4:50एक रा लची लापनक नाम पर शितिल नहीं कियाल जासकेच्छे.
  85. 4:50–4:52आहाक बात अपन तामप ठीक अची,
  86. 4:52–4:55मुदा हमरा एक दा भिन्न परी प्रिक्षर अक्छे दियो.
  87. 4:55–4:58इन्यम पूर्नता अर्भी बाशाक प्रक्रितिक अनुसार बनल अची.
  88. 4:58–5:00आद तो उमुल भिदाज.
  89. 5:00–5:02मुदा जा हम अर्भी चंदक कथोर नियम के
  90. 5:02–5:05मेतली पर पूर्नता थोपी देव
  91. 5:05–5:08तक यी कोनो नवका कमफुटर अक आदूनिक सोफ्ट्वेर के
  92. 5:08–5:12कोनो बहुत पुरानो अपरेटिंँ सिस्टमपर चलाबाजगा का नेभजेते
  93. 5:12–5:14सिस्टम तक ख्रश कर जैते
  94. 5:14–5:15उकोना क्रश करत
  95. 5:15–5:17पोथी क्हन्द चोदा से भीजद हरी
  96. 5:17–5:29बाहरक जे विस्त्रत विमर्ष आची, जाही में लेक्खक स्वयम कहे चद्हन, जे मेंत्लेक अपन निज मात्राक्रम अखन नै आची, मुदे एकर दन्यात्मक लची लापन हम्रा लोगने कक एक ता पैग आस्त्राची.
  97. 5:29–5:34आज्त्राची मुदक की आहा स्पष्ट करव जे इग कोना काज करेताची
  98. 5:34–5:39आवश्छ, जिना मैठ्ली में एक सब दक अनेक उच्चरन स्वाभी कची
  99. 5:39–5:44अम्रा लोकनी च्छट सोहो बजजच्छी च्छट सोहो बजजच्ची अच्छट हो.
  100. 5:44–5:48गजल लेल जे रूप लिखल जेते हूगरे मात्रा क्रम्मानल जेते है.
  101. 5:48–5:49तीख ची.
  102. 5:49–5:53इस्वतन्त्रता अरभीव और्दू में नहीं अच्छी.
  103. 5:53–6:01एकर अत्रिक्त पोठी में रमानाज्जा अकानच्छिनाज्जा किरन के भीज भेल ए आयोग के विवादक संदर्ब सो हो आची.
  104. 6:01–6:10प्राक्रित सम्विकास्क्रम ने केल अगेल में एक अप रयोग द्हन्यात्मक रूप से अदिक सती कची बनिस्पत कयल का.
  105. 6:10–6:15जगजल कारग के इप्रवाह बादित करे परत, तो उ नीक शेर कोना कहत?
  106. 6:15–6:17हम्रा इबात पच रहल नहीं आची.
  107. 6:17–6:18केख नहें?
  108. 6:18–6:23कारन, लजीला पनक अर्थ व्याक्रनेक अराजकता नहीं बहसाके तची.
  109. 6:23–6:28पोथी आईदित पर जोड देत जे व्याक्रन मानकी क्रित हैबाक चाही
  110. 6:28–6:31इकोनो वक्तिगत उचारनक विषे नहीं आची
  111. 6:31–6:35जकर जेना मोंबहल उहीना मात्रा खसाले लक
  112. 6:35–6:38मुदा बहु संख्या के उचारनत भीन भासके तची ना
  113. 6:38–6:55दूनी बा बोनिक अदाय पर व्याक्रन नहीं बने चे, लेखक स्वेम स्विकार करे च्छती, जे दूनी शास्त्रक फिसाब से एक लाक लोकक एक लाक उच्चारन बहूसके चे, मुदा की व्याक्रन मे एक लाक नियम बना एल जात, बिल्ल्कुल नहीं.
  114. 6:55–7:04मुदा, जा एक ता शब्दक दूईता सरवमान ने रूप आची, तो गजल कार दूनू कप प्रेुग आपन सुविदान उसर क्या एक नि कर सके ताची?
  115. 7:04–7:08कर सकेता ची, मुदा उकर मात्रात्मक मुल्ले निस्छित हो बाक चाही,
  116. 7:08–7:12जकन आहा शब्दक अन्त में विकारीक प्रेउक करे ची,
  117. 7:12–7:18जिना कर वा जा तो लगु हे ते वा दिर्ग इन्नियम से तै हो बाक चाही.
  118. 7:18–7:19उता आची.
  119. 7:19–7:20उता आची
  120. 7:20–7:25गजल की सन्रचना में लगु आदिरगग जे शाब्दिक वजन आची
  121. 7:25–7:27उतराजुग बदख्राजगा आची
  122. 7:27–7:30उक्रा सां समजवोता नहीं के लिए जासकई तची
  123. 7:30–7:34जा आहा इ नियम नहीं मानव, तो उ पद्द्य बहुसकई तची
  124. 7:34–8:04उगर उगर उगर बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बा�
  125. 8:04–8:13ताल ताल होएचे, जो आहा तबला पर दा, दिन, दिन, दा, बजा रहे लची, इएक ता निष्छित लै आची.
  126. 8:13–8:34अब भीच में जो आहा एक टेन छोडी देव वा एक टा एक स्वादा देव तकी है तै, पूरा लैए बिगर जेतै आ गावे वालाक सुर्ख हसी परतै, गजल में सदर, हष्व, अरुज, इप्तदा इसब उही तालक अलगलग हिस्सा थिक.
  127. 8:34–8:37अग, मतलवी सब भीट्ष जगा चे
  128. 8:37–8:42एक दम प्रतेक पाती एही रुक्न रुपी भीट्ष पर आदारित होईता चे
  129. 8:42–8:45ताईलेलम कही रहल ची जे इग गनितीया ची
  130. 8:45–8:48आहा अपन मन्स ताल नहीं बदली सकत ची
  131. 8:48–8:51हम आहा की तबला कुदारन भूजी रहल ची
  132. 8:51–8:57मुदा देखु, स्पैलिंग ब्याकरन अरुकन के इमान्की करन तब हिल गजलक शरीर अगबाद.
  133. 8:58–9:01गजलक आत्मा उकर प्रतीका भिम्ब मे बसेचे.
  134. 9:02–9:06जखनम भाशाक शरीर बदलाए चे, तक इ आत्मा सियो बदल वाख चाही.
  135. 9:06–9:12मान் की करनक नाम पर, जाहम अपना के सीमित कालेव, तगजलक परम परागत प्रतिका की है ते?
  136. 9:12–9:14आहा, कह बाक मतलप?
  137. 9:14–9:20मतलप जखनम प्रतिका के अपना समाजा कनुसार धालाई ची, तो अगजल के बेसी जीवन्त बनवै तची.
  138. 9:20–9:23चामा करव, मुदाहा एही बात के नहीं माने ची,
  139. 9:23–9:25कि आगा के फुर्सुते लागे तची,
  140. 9:25–9:29जे साकी के पासी कही देलासा गजल जीवन्त बहुजे ते?
  141. 9:29–9:31आप, बिल्कुल.
  142. 9:31–9:33हम बताबे ची जी की एक.
  143. 9:33–9:37अचिनाहर जिक पोठी में एक तब बहुत सुन्दर तुलना दिल गेल अची.
  144. 9:37–9:40दर्षन के अस्तर पर हम सब पहले से समझ ची.
  145. 9:40–9:45पोठी में अस्लाम में वरनेद सूफी प्रेम के साथ स्तरक चर्चा आची.
  146. 9:45–9:47रब उन्स अश्क
  147. 9:47–9:52अब उन्स, इश्क, अकीदत, इबादत, जुनुन, अपना.
  148. 9:52–9:55आप देखो, एकर समनान्तर मेतलिक माती पर,
  149. 9:55–9:58रूप गुस्वामिक भक्ती रसाम्रित सिंदूक,
  150. 9:58–10:00प्रेमा भक्तिक अस्तर अची,
  151. 10:00–10:06सने, मान, प्रने, राग, अनुराग, भाव, अमहाब हाव.
  152. 10:06–10:09समान्ता आची मुदैकर अर्थी नहीं
  153. 10:09–10:13मुदा सुनुत सआई की इसमानान्तर अद्बूत नहीं आची
  154. 10:13–10:17जखन सूफी मे हा बची ता हम्रा लोकनिक लग सनेहा ची
  155. 10:17–10:20जखन उते फना हे नाई आची ते एते महाब हाव आची
  156. 10:20–10:23जदे भक्त बगवान में विलीन भोजाई तची
  157. 10:23–10:24तची कची
  158. 10:24–10:28तखन हम महभुब ववःश्क सन्विदेशी शब्दक मोग कियक करी
  159. 10:28–10:32इस्तानिय प्रतिकक प्रयोख सक गजल के गेराई कत्हो सनेई ग़तल आची
  160. 10:32–10:35उआम्रा लोकनी करदाएक भीशी समी पावी गे लची
  161. 10:35–10:40अगाक इपासी वला उदारन्सा कतो साहमत नहीं ची
  162. 10:40–10:46दर्षनक समानता कारती नहीं जे कोनो वीशव्द कोनो वीशव्दक स्थान लासकई तची
  163. 10:46–10:48क्यक नहीं लासकई तची
  164. 10:48–10:52करन्च्वदक अपनेक्ता एतिहासिक असानस्क्रतिक वजन होईच्छै
  165. 10:52–10:58जक्रा मेतट्फौरिकल देप्त्छ वा अर्थात्मक विस्तार कहल जाईत आची
  166. 10:58–11:02जो आहा साकी के पासी कही देव तकी उ अर्थ रहत
  167. 11:02–11:05केएग ने रहत, दूनो तप पिलावे वले आचेन है
  168. 11:05–11:07इब हुत उतला तुल्ना भेल
  169. 11:07–11:11अगर दूशाईरी में साखी मात्र शराब पर सैबला कोनो वेक्ती नहीं आची
  170. 11:11–11:17सदियोंक परमप्रासा अपरमात माक गुरु वाचक अग्यान दैवला प्रतिक बन चुकाल आची
  171. 11:17–11:21गजल में साखी साशिकायत करब मतलब इश्वर सवमवाद करब
  172. 11:21–11:23मुद अ पासी सोथा?
  173. 11:23–11:29वो सर्दीस पासी मेठली समाज में ताडी उतारे वला एक ता विष्छ्ट जातिक बोद कराईवाईत ची
  174. 11:30–11:33ताडी शब्द में उ अद्द्यात्मिक रह्स्वाद नहीं आची
  175. 11:33–11:37जे मैं वा शराब में हादार सालक सूफी परमपरास आची
  176. 11:37–11:40इरुपान्त्रन गजल के उठला कर आजी
  177. 11:40–11:43आवकर बोद्धिक वजन कम कर आजी
  178. 11:43–11:45इद्टरक हम्रा कतो सद्टिकएत नहीं लगे ताजे
  179. 11:45–11:46कोना
  180. 11:46–11:49आजे तरक एह माननेता पर आदारिता जै
  181. 11:49–11:52केवल साकी वा काफिर शब्द में
  182. 11:52–11:54इश्वरिय रहस ये नुका आजे
  183. 11:54–11:59यह आमार पन साहित्ते में श्रिंगारिक प्रतीक आद्यात्निक अर्थ नही राखध आचे?
  184. 11:59–12:00राखध आचे मुदा
  185. 12:00–12:06कि विद्यापतिक पडावली में शारीरिक प्रतीक रादा क्रिष्नक आद्यात्निक प्रेम के नहीं दर्षावे तचे?
  186. 12:06–12:09विद्यापतिक समय अ समाज भिन्न चल
  187. 12:09–12:11मुदा सिद्दान तो ईए जेना
  188. 12:11–12:13पोथी एबातक उलेक करे तचेई
  189. 12:13–12:18जे मेथि लोकनी विद्यापतिक तद्त्विक आ आद्यात्मिक रूपेन ग्रान करे चतिन
  190. 12:18–12:22मुदा जकन गजलक, हुसना आ इश्क कबात बाइ तची
  191. 12:22–12:24तो उक्रा मात्र सान्सारिक माईनलेच छतिन,
  192. 12:24–12:26इदोग्र माब्दन्द आची.
  193. 12:26–12:29हम दोग्र माब्दन्द बात नहीं कर रहल ची.
  194. 12:29–12:32शब्दक वजन पहले से नहीं बनल रहा ची.
  195. 12:32–12:34उपरमपरा से मनाई तची.
  196. 12:34–12:37आई हम पासी वा ललिमुनिया के सादारन भूजी रहल ची.
  197. 12:52–13:22मुदा बर्त्मान में गजल के शिलप आ उकर संगितिक ताक की, आप जगन प्रती का शब्द चयनक बात बहुर अहल आची, तए यी सीथा प्रभाब डालगत आची, जे स्रोताक समक्ष गजल कोना प्रस्त॥ कैल जा अहल आची. पोती मैं तहत अतरन्नुम कर भिस्त्रिच चर
  198. 13:22–13:28अगरा सुर आतालक संगे, हारमोनियम वाकुनो वाद्दे यंप्रक संगे गाय का सुनावब.
  199. 13:28–13:35एक दम, आहमर मानव आची, जे गजल के वास्तविक वजन वोकर बहर आखाफ्याक शब्द चयन में आची,
  200. 13:35–13:38जे ताहत मैं सपष्ट रूप से उबहर के अवैत आची.
  201. 13:38–13:41स्रोता गजल क बोद्धिक अर्थ बुजाईतची
  202. 13:41–13:45मुदा पोदिक संदर भदैद, हम तरनूम के पुण समर्ठन करेच्छी
  203. 13:45–13:47आहा तरनूम के समर्ठन करेच्छी
  204. 13:47–13:51आ, मानव सबहाव सर्वदा विविध्धा चाहतची
  205. 13:51–13:53स्रोताक मनुस्तिती बडलेत रहाचे,
  206. 13:53–13:55कहीो हूंका ताहत नीक लगाएचे,
  207. 13:55–13:57तकहीो तरन्नूम,
  208. 13:57–14:00सांगी तिक्ता सां कुनु विदाक प्रभाव कम नहीं होई दची.
  209. 14:00–14:02जक्ञन गजल तरन्नूम में गावल जायत ची,
  210. 14:02–14:05तो अ भीसी श्रोता दरी पहुजे दची.
  211. 14:05–14:07इगजल के जन्ता सा जोड़े था जी.
  212. 14:07–14:09इएक ता प्रभावशाही तर कचे.
  213. 14:09–14:12मुदा की आहा विचार केने ची,
  214. 14:12–14:16जि तरन्णुम का नाम पर आजुक समय में की बहर रहल आची.
  215. 14:16–14:17की बहर रहल आची?
  216. 14:17–14:20पोथी में लेखख स्वयम चेतावनी दिलनी आची.
  217. 14:20–14:27जि तरन्नुम कनाम पर किचु गजल कार, चुट्कुलाबाजी, असस्ती लोक रनजन शुरू कर दिलनी आची.
  218. 14:27–14:34गजल मे दून के बहर आशेर के बोद्धिग गामविर पर रावी नहो वाख चाही.
  219. 14:34–14:41दून कोना गामभीरे पर हावी भहसा कै तची, जे गजल नी कची तदूंत उकर आवी निकारतना.
  220. 14:41–14:47हम बुजावे ची जे कोना हावी होई तची, गजल का शेर का अपन एकता तारकिक सन्रचना आची.
  221. 14:47–14:52उही में पहल पांती एक ता वैचारिक आदार स्तापित करेता चे
  222. 14:52–14:55अदुसर पांती उकर पंच्लाएन देता ची
  223. 14:55–14:56आई ता आची
  224. 14:56–14:59जकन गायक के बल दून पर द्यान देता ची
  225. 14:59–15:02हरमोनिम पर लाम्टान लेता ची
  226. 15:02–15:04ता शब्दक भीचक दूरी बड़ी जाता ची
  227. 15:04–15:08इव उई बवद्धिक सन्रचना के नष्ट कर दे थची
  228. 15:08–15:11इई इल्म ए आरुज के सुन्दर ये नष्ट बहुजा थची
  229. 15:11–15:15मुदाए तग गयक के कमी भेल ना विदात नहीं
  230. 15:15–15:17केवल गयक के कमी नहीं अची
  231. 15:17–15:20इगजल के व्याकरन का अंदेखी कपरिनाम अची
  232. 15:20–15:24पोठी में तकाबूले रदीप दोष्छ से बजबाक बात कहल गेल अची
  233. 15:24–15:25तकाबूले रदीप?
  234. 15:25–15:26रदीप
  235. 15:26–15:29जा श्रोता नहीं बुजगई च्छतीन, तहम बतादी
  236. 15:29–15:34जा रदीप उशब्द थिक जे शिर्क अंत में बार भार दोह्रावल जाए तची
  237. 15:34–15:37ज़ा रदीव कषब्द गजल के बीचे कतव आबीजाई थची
  238. 15:37–15:39तच्रोता कान ब्रमिद बहुजाई थची
  239. 15:40–15:41एक राद्तकाबूले रदीव का हच्छते
  240. 15:42–15:44तरनुम में गाविते काल जगायक
  241. 15:44–15:46एही सब व्याक्रनिक शुद्द्टाके शिथिल कर देद
  242. 15:46–15:50ता आहा केवल एक ता मदूर गीट सूने रहाल ची गजल नहीं
  243. 15:50–15:52गजल अक आत्मा उकर नियम में बसाइत अची
  244. 15:52–15:57हम्रा लोग किनी एक ता अछ्तिंत जटिल मुदा सुंदर विमर शक्विन्दू पर ची
  245. 15:57–16:01एक देस हमर इद्रिल विश्वास अची
  246. 16:01–16:04जे जां गजल के मेठली में आपना के स्थापिर करवाग अची
  247. 16:04–16:08ता उक्रा मेठलीक बाशिक लचीला पन्सब हरल हो बाखचाही
  248. 16:08–16:13उक्रा विदेशी वेश्भूशा त्यागी कर अपन पहरन अपनाया पडद
  249. 16:13–16:21पासी अलली मुन्या सन्प्रतिक अतरन्नुम का सांगी तिक्ता गजल के समाज में जीवन्त रक्फ्टु।
  250. 16:21–16:28आहमर वीचार एई जे आन भाशाक विधा के अपना बब एक ता सुन्दर प्रक्रिया अवश्ष अची
  251. 16:28–16:33उगजल अद्मा उगर कला व्याक्रन रुक्न अब बहर कगनित में बसाथा ची.
  252. 16:34–16:37अस्तानि करन का अथ विदाक विक्रित करब नहीं बहुसाखे ची.
  253. 16:38–16:40एही बात पर हम्रा लोकनी सहमत बहुसाखे ची.
  254. 16:40–16:44इबहस यते समाप्त न नहीं होईता ची
  255. 16:44–16:48कोनो एक्ता पक्ष पूडता सही फाग गलत नहीं आची
  256. 16:48–16:52दूनुक भीच्क संटूलन आवश्यक अची
  257. 16:52–16:56अगर उद्यागा बादिद बादिद होट एही पर अज़ामती बनाल रहेद.
  258. 16:56–17:00सथे कही रहल चे आहा, इबहस एते समाप्त न नहीं होईता ची,
  259. 17:00–17:05कोनो एक्ता पक्ष पूडता सही वागलत नहीं आची,
  260. 17:05–17:08दूनुक भीच्क संथुलन आवश्यक अची.
  261. 17:08–17:20श्रोता लुक्निके, हमरा आमन्त्रन्चनी, जै आशेश अंचिन रारक्क्या पोती, मैत्ली गजलक व्याकरन अव इतिहास के स्वयम पदी का एही ग़राई में उत्रू।
  262. 17:20–17:23इनवेशन करबाकलेल हम आहा सब चोडे ची।
  263. 17:23–17:25हम्रा संगे ज्रबाकलेल, दन्वाद.
  264. 17:25–17:26भिदा

Plain text

वल्क्म तो देबेट, भाषाक साहित्य, कि आहा के कहो लागल अची, जे मैठली में गजल लिखेंट काल, ज़ा साखी के पासी कही दिलजाए, तग गजल के आत्मा मरी जाए च्छे. वह मतलब यी मैठली साहित्य के एक तपेग क्रान्ती थीक. इबहुत गमहीर प्रश्नाच इब्दम तविचार विमर्सक एप मनज पर आई हम्रा लोकनी साहिटके एक दा अथ्तेंत ज्वलन्त विश्या पर गबसव कर रहल ची हमरा एदहरीग विमर्सक का आदार आची आशीश अचिनारक के बहुचर्चित पोती अब प्रश्न इई उड़ेत आजी, जगन आर्भी फार्सिक के सुगन्द से बहरल इविदा मैठलीक माटी परवेत आजी, तकी होई तची. हमर्स पष्ट माना बची, जगजल जे मैठली मेडली आजी, ता अप आप प्रष्ट मैठली आजी, अब प्रश्न इई उठ़ेत आची, जगखन आरभी फार्सिक के सुगन्द से भरल एविदा मैत्लिक माटी परवेत आची तक्की होए तची. अद्रिद मताची जे गजल कोनो सादारन कविता नहीं बलकी मतल बेक्ता वैग्यानिक अगनितिया कविविदा आची आर भी अप फारसीक इल्म ए अरुपन दाली लेवाख जाही अपनेही पर एक तदोसर दिशा साभी रहा लग ची कहो हमर इद्रद मता ची जे गजल कोनो सादारन कविता नहीं बलकी मतलब एक ता वैग्यानिक अगनितिय कविविदा जी आरभी आप फारसीक इल्म ए अरुज उज, अथा थ, च्ण्द शास्ट्र कद्वर नियमक पालन केला बिना, ज्य आहा गजल लिखे ची, ता आहा गजल क मुल आतमा के नष्ट करो रहल ची. विदात नियम उकर पहचान होए चे. मुदा की, नियमक नाम पर हम भाशाक स्वाबाविक प्रक्रतिक मार दे. अचिन्हारक पोथी अस्पष्ट कराई तची, जे मैठली गजल अआ रव, रहिन्दी गजल जेका उच्चारनक तवन्द में नई पही से तची. जेना हम इत उदहरन देची. आदियो. रूटुग गजल नहींदी शेहर शब्दक वरतनी एक दूई अथात लगु दीर गोईता ची मुदा जक्हन उव्र्दूग गजल मे जाएच्छे तव व्र्दू उच्चारनक आग्रह में उक्रा शेहर अथात दूई एक मानक का विवाद थाडोई ची दूशन्त कुमार्जका महान गजल कारो के आलोचित कलगल आप इहिंदी अ वूर्दुक भीचक एक ता बहुत पुरान विवात थेक तिक कहलू, मुदा मेठली मेताई समस्या आजीय नहीं मेठली में केवू जेकर मात्रा दूए दूए आची अखी यो जेकर मात्रा एक दूया ची दून्नूवर्तनिक स्वत्न्तर्ता सर्व मान्ने आची. उता ची, ता इजे भाशिक विविद्धा चे उ गजल कारक के मात्रा क्रम निर्दारन में एक ता पाएक सूविद्दा देता चे. दोसर भात, जे गजल के प्रतीको के स्थानी करन करव अद्यन्त आवश्षक अचे, जा हम मैखाना के पीलस काना वा तादी काना कही, मुदा उईस अड़्त बदली जाए चेना? नहीं बदले चे, साकी के पासी आहसीना के सुनडकी वा ललिमुन्या कहब, मेतलिक मातिक सुगंदाने तचे इई पात्खके भेसी अपनापनाख भोद करावाई तचे इदो भेल आहाक दिसक बात मुदा दोसर काच सदेखाब ता आहाक इद्टर्क हम्रा सर्वता उचित नी लागा तचे आहाज इस्ठानिय करन कदर्क दोराल ची उ बावुक्ता कस्तर पर अकर्षक अवष्चे आचे बावुक्ता मात्र नहीं आची इई आची, कारन गजल के वल शब्दावली खेल नहीं आचे इ मात्रा क मतलब लगु अदिर्गक सक्त गनी तचे पोथी में देलगेल काफिया का कला न्यमक द्रिष्टान तक देखू, काफिया अर्ठात स्वर साम्ये युक्त तुकान्त. मुदा काफिया ता मेठिलिक कविता में से हो होई तचे. हम्रा लोकनि तुकान्त मिलावे थ्ची ना? नहीं नहीं गजलक काफिया आँ सादारन कविता तुकान्त में जमीन आसमान काफरा काची जो कोनो गजलक मतला में, मतला पहल शेर में चन आदन काफिया ची तैएक्रा गजलक व्याक्रन में सही आची कि आख सही आची? कारन एते मुल अक्षर नाँ आची अगी से पहिलोक स्वर अव आव आव आव आव मुदा जो आहा उही में दून के मिला देव तक गजलक नजरी में उसर्वता गलत बोजेता है मुदा सादारन मविता में तलोक च्शन आदून आराम से मिला लेज्छती एक्रत्तनी विस्तार से बुजाओ, जे एक गजल में किया गलत भजेता है. कारन, एक आची जे दून में नाउ से पहिने उस्वर आबे गेलें, जकन की च्शन में अद्स्वर चल. इजे स्वरक गनिती अबन्दन अची, इकोनो जिद्दिपन नहीं अची, एकर पाचा दूनिशास्त्रक विग्यान काज करे च्याए. दूनिशास्त्रक विग्यान एक्दम, मानो मस्तिष्क अग्कान गजल सूनीते काल, एक ता निष्चित अकुस्टिक अक्स्टेक्टेशन, मतलब ध्वन्नात्मक आशामे रहेचचे. कान जखन च्ण अद्दन सूने तची, तद समान लैब हेटे तची. तुन अभी ते उलैट तूट जाथचे. मस्तिष्क में एक ता कोगनेटिव दिस्वन्न्स उत्पन्न हुँईच्छे, रुकना और अज्जाक इसन्रचना गजलक प्रान्तिक, एक रा लची लापनक नाम पर शितिल नहीं कियाल जासकेच्छे. आहाक बात अपन तामप ठीक अची, मुदा हमरा एक दा भिन्न परी प्रिक्षर अक्छे दियो. इन्यम पूर्नता अर्भी बाशाक प्रक्रितिक अनुसार बनल अची. आद तो उमुल भिदाज. मुदा जा हम अर्भी चंदक कथोर नियम के मेतली पर पूर्नता थोपी देव तक यी कोनो नवका कमफुटर अक आदूनिक सोफ्ट्वेर के कोनो बहुत पुरानो अपरेटिंँ सिस्टमपर चलाबाजगा का नेभजेते सिस्टम तक ख्रश कर जैते उकोना क्रश करत पोथी क्हन्द चोदा से भीजद हरी बाहरक जे विस्त्रत विमर्ष आची, जाही में लेक्खक स्वयम कहे चद्हन, जे मेंत्लेक अपन निज मात्राक्रम अखन नै आची, मुदे एकर दन्यात्मक लची लापन हम्रा लोगने कक एक ता पैग आस्त्राची. आज्त्राची मुदक की आहा स्पष्ट करव जे इग कोना काज करेताची आवश्छ, जिना मैठ्ली में एक सब दक अनेक उच्चरन स्वाभी कची अम्रा लोकनी च्छट सोहो बजजच्छी च्छट सोहो बजजच्ची अच्छट हो. गजल लेल जे रूप लिखल जेते हूगरे मात्रा क्रम्मानल जेते है. तीख ची. इस्वतन्त्रता अरभीव और्दू में नहीं अच्छी. एकर अत्रिक्त पोठी में रमानाज्जा अकानच्छिनाज्जा किरन के भीज भेल ए आयोग के विवादक संदर्ब सो हो आची. प्राक्रित सम्विकास्क्रम ने केल अगेल में एक अप रयोग द्हन्यात्मक रूप से अदिक सती कची बनिस्पत कयल का. जगजल कारग के इप्रवाह बादित करे परत, तो उ नीक शेर कोना कहत? हम्रा इबात पच रहल नहीं आची. केख नहें? कारन, लजीला पनक अर्थ व्याक्रनेक अराजकता नहीं बहसाके तची. पोथी आईदित पर जोड देत जे व्याक्रन मानकी क्रित हैबाक चाही इकोनो वक्तिगत उचारनक विषे नहीं आची जकर जेना मोंबहल उहीना मात्रा खसाले लक मुदा बहु संख्या के उचारनत भीन भासके तची ना दूनी बा बोनिक अदाय पर व्याक्रन नहीं बने चे, लेखक स्वेम स्विकार करे च्छती, जे दूनी शास्त्रक फिसाब से एक लाक लोकक एक लाक उच्चारन बहूसके चे, मुदा की व्याक्रन मे एक लाक नियम बना एल जात, बिल्ल्कुल नहीं. मुदा, जा एक ता शब्दक दूईता सरवमान ने रूप आची, तो गजल कार दूनू कप प्रेुग आपन सुविदान उसर क्या एक नि कर सके ताची? कर सकेता ची, मुदा उकर मात्रात्मक मुल्ले निस्छित हो बाक चाही, जकन आहा शब्दक अन्त में विकारीक प्रेउक करे ची, जिना कर वा जा तो लगु हे ते वा दिर्ग इन्नियम से तै हो बाक चाही. उता आची. उता आची गजल की सन्रचना में लगु आदिरगग जे शाब्दिक वजन आची उतराजुग बदख्राजगा आची उक्रा सां समजवोता नहीं के लिए जासकई तची जा आहा इ नियम नहीं मानव, तो उ पद्द्य बहुसकई तची उगर उगर उगर बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बा� ताल ताल होएचे, जो आहा तबला पर दा, दिन, दिन, दा, बजा रहे लची, इएक ता निष्छित लै आची. अब भीच में जो आहा एक टेन छोडी देव वा एक टा एक स्वादा देव तकी है तै, पूरा लैए बिगर जेतै आ गावे वालाक सुर्ख हसी परतै, गजल में सदर, हष्व, अरुज, इप्तदा इसब उही तालक अलगलग हिस्सा थिक. अग, मतलवी सब भीट्ष जगा चे एक दम प्रतेक पाती एही रुक्न रुपी भीट्ष पर आदारित होईता चे ताईलेलम कही रहल ची जे इग गनितीया ची आहा अपन मन्स ताल नहीं बदली सकत ची हम आहा की तबला कुदारन भूजी रहल ची मुदा देखु, स्पैलिंग ब्याकरन अरुकन के इमान्की करन तब हिल गजलक शरीर अगबाद. गजलक आत्मा उकर प्रतीका भिम्ब मे बसेचे. जखनम भाशाक शरीर बदलाए चे, तक इ आत्मा सियो बदल वाख चाही. मान் की करनक नाम पर, जाहम अपना के सीमित कालेव, तगजलक परम परागत प्रतिका की है ते? आहा, कह बाक मतलप? मतलप जखनम प्रतिका के अपना समाजा कनुसार धालाई ची, तो अगजल के बेसी जीवन्त बनवै तची. चामा करव, मुदाहा एही बात के नहीं माने ची, कि आगा के फुर्सुते लागे तची, जे साकी के पासी कही देलासा गजल जीवन्त बहुजे ते? आप, बिल्कुल. हम बताबे ची जी की एक. अचिनाहर जिक पोठी में एक तब बहुत सुन्दर तुलना दिल गेल अची. दर्षन के अस्तर पर हम सब पहले से समझ ची. पोठी में अस्लाम में वरनेद सूफी प्रेम के साथ स्तरक चर्चा आची. रब उन्स अश्क अब उन्स, इश्क, अकीदत, इबादत, जुनुन, अपना. आप देखो, एकर समनान्तर मेतलिक माती पर, रूप गुस्वामिक भक्ती रसाम्रित सिंदूक, प्रेमा भक्तिक अस्तर अची, सने, मान, प्रने, राग, अनुराग, भाव, अमहाब हाव. समान्ता आची मुदैकर अर्थी नहीं मुदा सुनुत सआई की इसमानान्तर अद्बूत नहीं आची जखन सूफी मे हा बची ता हम्रा लोकनिक लग सनेहा ची जखन उते फना हे नाई आची ते एते महाब हाव आची जदे भक्त बगवान में विलीन भोजाई तची तची कची तखन हम महभुब ववःश्क सन्विदेशी शब्दक मोग कियक करी इस्तानिय प्रतिकक प्रयोख सक गजल के गेराई कत्हो सनेई ग़तल आची उआम्रा लोकनी करदाएक भीशी समी पावी गे लची अगाक इपासी वला उदारन्सा कतो साहमत नहीं ची दर्षनक समानता कारती नहीं जे कोनो वीशव्द कोनो वीशव्दक स्थान लासकई तची क्यक नहीं लासकई तची करन्च्वदक अपनेक्ता एतिहासिक असानस्क्रतिक वजन होईच्छै जक्रा मेतट्फौरिकल देप्त्छ वा अर्थात्मक विस्तार कहल जाईत आची जो आहा साकी के पासी कही देव तकी उ अर्थ रहत केएग ने रहत, दूनो तप पिलावे वले आचेन है इब हुत उतला तुल्ना भेल अगर दूशाईरी में साखी मात्र शराब पर सैबला कोनो वेक्ती नहीं आची सदियोंक परमप्रासा अपरमात माक गुरु वाचक अग्यान दैवला प्रतिक बन चुकाल आची गजल में साखी साशिकायत करब मतलब इश्वर सवमवाद करब मुद अ पासी सोथा? वो सर्दीस पासी मेठली समाज में ताडी उतारे वला एक ता विष्छ्ट जातिक बोद कराईवाईत ची ताडी शब्द में उ अद्द्यात्मिक रह्स्वाद नहीं आची जे मैं वा शराब में हादार सालक सूफी परमपरास आची इरुपान्त्रन गजल के उठला कर आजी आवकर बोद्धिक वजन कम कर आजी इद्टरक हम्रा कतो सद्टिकएत नहीं लगे ताजे कोना आजे तरक एह माननेता पर आदारिता जै केवल साकी वा काफिर शब्द में इश्वरिय रहस ये नुका आजे यह आमार पन साहित्ते में श्रिंगारिक प्रतीक आद्यात्निक अर्थ नही राखध आचे? राखध आचे मुदा कि विद्यापतिक पडावली में शारीरिक प्रतीक रादा क्रिष्नक आद्यात्निक प्रेम के नहीं दर्षावे तचे? विद्यापतिक समय अ समाज भिन्न चल मुदा सिद्दान तो ईए जेना पोथी एबातक उलेक करे तचेई जे मेथि लोकनी विद्यापतिक तद्त्विक आ आद्यात्मिक रूपेन ग्रान करे चतिन मुदा जकन गजलक, हुसना आ इश्क कबात बाइ तची तो उक्रा मात्र सान्सारिक माईनलेच छतिन, इदोग्र माब्दन्द आची. हम दोग्र माब्दन्द बात नहीं कर रहल ची. शब्दक वजन पहले से नहीं बनल रहा ची. उपरमपरा से मनाई तची. आई हम पासी वा ललिमुनिया के सादारन भूजी रहल ची. मुदा बर्त्मान में गजल के शिलप आ उकर संगितिक ताक की, आप जगन प्रती का शब्द चयनक बात बहुर अहल आची, तए यी सीथा प्रभाब डालगत आची, जे स्रोताक समक्ष गजल कोना प्रस्त॥ कैल जा अहल आची. पोती मैं तहत अतरन्नुम कर भिस्त्रिच चर अगरा सुर आतालक संगे, हारमोनियम वाकुनो वाद्दे यंप्रक संगे गाय का सुनावब. एक दम, आहमर मानव आची, जे गजल के वास्तविक वजन वोकर बहर आखाफ्याक शब्द चयन में आची, जे ताहत मैं सपष्ट रूप से उबहर के अवैत आची. स्रोता गजल क बोद्धिक अर्थ बुजाईतची मुदा पोदिक संदर भदैद, हम तरनूम के पुण समर्ठन करेच्छी आहा तरनूम के समर्ठन करेच्छी आ, मानव सबहाव सर्वदा विविध्धा चाहतची स्रोताक मनुस्तिती बडलेत रहाचे, कहीो हूंका ताहत नीक लगाएचे, तकहीो तरन्नूम, सांगी तिक्ता सां कुनु विदाक प्रभाव कम नहीं होई दची. जक्ञन गजल तरन्नूम में गावल जायत ची, तो अ भीसी श्रोता दरी पहुजे दची. इगजल के जन्ता सा जोड़े था जी. इएक ता प्रभावशाही तर कचे. मुदा की आहा विचार केने ची, जि तरन्णुम का नाम पर आजुक समय में की बहर रहल आची. की बहर रहल आची? पोथी में लेखख स्वयम चेतावनी दिलनी आची. जि तरन्नुम कनाम पर किचु गजल कार, चुट्कुलाबाजी, असस्ती लोक रनजन शुरू कर दिलनी आची. गजल मे दून के बहर आशेर के बोद्धिग गामविर पर रावी नहो वाख चाही. दून कोना गामभीरे पर हावी भहसा कै तची, जे गजल नी कची तदूंत उकर आवी निकारतना. हम बुजावे ची जे कोना हावी होई तची, गजल का शेर का अपन एकता तारकिक सन्रचना आची. उही में पहल पांती एक ता वैचारिक आदार स्तापित करेता चे अदुसर पांती उकर पंच्लाएन देता ची आई ता आची जकन गायक के बल दून पर द्यान देता ची हरमोनिम पर लाम्टान लेता ची ता शब्दक भीचक दूरी बड़ी जाता ची इव उई बवद्धिक सन्रचना के नष्ट कर दे थची इई इल्म ए आरुज के सुन्दर ये नष्ट बहुजा थची मुदाए तग गयक के कमी भेल ना विदात नहीं केवल गयक के कमी नहीं अची इगजल के व्याकरन का अंदेखी कपरिनाम अची पोठी में तकाबूले रदीप दोष्छ से बजबाक बात कहल गेल अची तकाबूले रदीप? रदीप जा श्रोता नहीं बुजगई च्छतीन, तहम बतादी जा रदीप उशब्द थिक जे शिर्क अंत में बार भार दोह्रावल जाए तची ज़ा रदीव कषब्द गजल के बीचे कतव आबीजाई थची तच्रोता कान ब्रमिद बहुजाई थची एक राद्तकाबूले रदीव का हच्छते तरनुम में गाविते काल जगायक एही सब व्याक्रनिक शुद्द्टाके शिथिल कर देद ता आहा केवल एक ता मदूर गीट सूने रहाल ची गजल नहीं गजल अक आत्मा उकर नियम में बसाइत अची हम्रा लोग किनी एक ता अछ्तिंत जटिल मुदा सुंदर विमर शक्विन्दू पर ची एक देस हमर इद्रिल विश्वास अची जे जां गजल के मेठली में आपना के स्थापिर करवाग अची ता उक्रा मेठलीक बाशिक लचीला पन्सब हरल हो बाखचाही उक्रा विदेशी वेश्भूशा त्यागी कर अपन पहरन अपनाया पडद पासी अलली मुन्या सन्प्रतिक अतरन्नुम का सांगी तिक्ता गजल के समाज में जीवन्त रक्फ्टु। आहमर वीचार एई जे आन भाशाक विधा के अपना बब एक ता सुन्दर प्रक्रिया अवश्ष अची उगजल अद्मा उगर कला व्याक्रन रुक्न अब बहर कगनित में बसाथा ची. अस्तानि करन का अथ विदाक विक्रित करब नहीं बहुसाखे ची. एही बात पर हम्रा लोकनी सहमत बहुसाखे ची. इबहस यते समाप्त न नहीं होईता ची कोनो एक्ता पक्ष पूडता सही फाग गलत नहीं आची दूनुक भीच्क संटूलन आवश्यक अची अगर उद्यागा बादिद बादिद होट एही पर अज़ामती बनाल रहेद. सथे कही रहल चे आहा, इबहस एते समाप्त न नहीं होईता ची, कोनो एक्ता पक्ष पूडता सही वागलत नहीं आची, दूनुक भीच्क संथुलन आवश्यक अची. श्रोता लुक्निके, हमरा आमन्त्रन्चनी, जै आशेश अंचिन रारक्क्या पोती, मैत्ली गजलक व्याकरन अव इतिहास के स्वयम पदी का एही ग़राई में उत्रू। इनवेशन करबाकलेल हम आहा सब चोडे ची। हम्रा संगे ज्रबाकलेल, दन्वाद. भिदा

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