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मैथिली_गजलक_व्याकरण_आ_स्वतंत्र_पहचान.m4a

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Collection
Part 1 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 1
Status
asr-draft
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No
Editorial review
not-reviewed
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small
Detected language
hi (0.560247)
Duration
1:52
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  1. 0:00–0:05मैथिली गजलक व्याकरन आ उकर इतिहासक ये एक तवरित समिक्शा चे
  2. 0:05–0:10आशीश अंचनारा की पोठी उही ब्रान्ती के भिल्कुल दूर कर देता चे
  3. 0:10–0:13जे गजल मात्र वुर्दुदरी सीमिच्छेक
  4. 0:13–0:19आई आई हमरा लोक निक सोजा एक ता एक दम स्वतन्त्र आप रामानेक मेठ्ली व्याक्रन राख हे तच्ये,
  5. 0:19–0:22जा इसा आहा तुरन्त एकर नियम भूजी सकब.
  6. 0:22–0:27तो पहल बात आहा गजल के कोनो सादारन चपल कविता नहीं मानी सके ची,
  7. 0:27–0:32ये तव वेद जका एक ता जिवन्त श्रूती परम्परातेक
  8. 0:32–0:34जक्रा मुख्यरुप से गावल जाएच्छेग
  9. 0:34–0:37आए ही कारन्सश एह में सही उच्चारन
  10. 0:37–0:39आम्मात्रक सतीक प्रयोग पर
  11. 0:39–0:42बहुत बेशी ध्यान देल जाएच्छेग
  12. 0:42–0:44आब जेक्रा गावल जाएच्छेग
  13. 0:57–1:14अग, काफिया सन्नियम अच्छे, तसोचू, ज़ा अन्तमे दोहराएल जाईवाला समान, शब्द, रदीप, गजलक, शरीर थेक, तकी उक्रास पहिल, आबेवाला तुकान्त, स्वर, काफिया के, अकर दधकन नहीं कहल जासके तचे, जाई बिना गजल जीविते नही रहत.
  14. 1:14–1:23आब भेए ची अन्तिम बात पर, बले इविद्धा अरभी अ वर्दुस आयल चिख, मुदा मैठली गजल खोकर कोनो हुभहु नकल बलकल नहीं फिग.
  15. 1:23–1:31अम्रा लोकनिक भाशाक अपन उच्चारन अप्रक्रतिक के द्यान मेराखी एक राप पूणता मैठलिक अनुकुल बनावल गेला चे.
  16. 1:31–1:35इता एक दम कोनो विदेशी भिया के अपन माटी में रूपीक के,
  17. 1:35–1:38अपन पानी हवासे सीचाईजगा अची,
  18. 1:38–1:41जैसे गाज सवब आपन माटी कषुगन्द आवेत अची.
  19. 1:41–1:45तस पश्ट अची, जे मेठली गजल मात्र कोनो आयातित रूप नही,
  20. 1:45–1:49बलकी अपन स्वतन्त्र नियम अब हवात्मक गेराए के संग,
  21. 1:49–1:52ताहर एक ता पूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ

Plain text

मैथिली गजलक व्याकरन आ उकर इतिहासक ये एक तवरित समिक्शा चे आशीश अंचनारा की पोठी उही ब्रान्ती के भिल्कुल दूर कर देता चे जे गजल मात्र वुर्दुदरी सीमिच्छेक आई आई हमरा लोक निक सोजा एक ता एक दम स्वतन्त्र आप रामानेक मेठ्ली व्याक्रन राख हे तच्ये, जा इसा आहा तुरन्त एकर नियम भूजी सकब. तो पहल बात आहा गजल के कोनो सादारन चपल कविता नहीं मानी सके ची, ये तव वेद जका एक ता जिवन्त श्रूती परम्परातेक जक्रा मुख्यरुप से गावल जाएच्छेग आए ही कारन्सश एह में सही उच्चारन आम्मात्रक सतीक प्रयोग पर बहुत बेशी ध्यान देल जाएच्छेग आब जेक्रा गावल जाएच्छेग अग, काफिया सन्नियम अच्छे, तसोचू, ज़ा अन्तमे दोहराएल जाईवाला समान, शब्द, रदीप, गजलक, शरीर थेक, तकी उक्रास पहिल, आबेवाला तुकान्त, स्वर, काफिया के, अकर दधकन नहीं कहल जासके तचे, जाई बिना गजल जीविते नही रहत. आब भेए ची अन्तिम बात पर, बले इविद्धा अरभी अ वर्दुस आयल चिख, मुदा मैठली गजल खोकर कोनो हुभहु नकल बलकल नहीं फिग. अम्रा लोकनिक भाशाक अपन उच्चारन अप्रक्रतिक के द्यान मेराखी एक राप पूणता मैठलिक अनुकुल बनावल गेला चे. इता एक दम कोनो विदेशी भिया के अपन माटी में रूपीक के, अपन पानी हवासे सीचाईजगा अची, जैसे गाज सवब आपन माटी कषुगन्द आवेत अची. तस पश्ट अची, जे मेठली गजल मात्र कोनो आयातित रूप नही, बलकी अपन स्वतन्त्र नियम अब हवात्मक गेराए के संग, ताहर एक ता पूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ

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