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मैथिली_का_समानांतर_इतिहास_और_डिजिटल_विद्रोह.m4a
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- 0:00–0:04अछि। कल्पना कीजी कि जिस महान कवि की कविता है पीडियो से गाई जारी है,
- 0:04–0:08जिसके नाम पर आजज भी चोक-चोराहे बने हुए है,
- 0:08–0:11वो असल में मतलब कुई एक अन्सान थाए नहीं.
- 0:11–0:14आच्ठ? एक अन्सान नहीं था?
- 0:14–0:17आआ, बलके इतिहास के पन्नो में,
- 0:17–0:21तो बिल्कुल अलग गलग लोगो को मिलागर एक चेहरा गर दिया गया हो
- 0:21–0:25और वो बी इसले ताकी एक बड़े लोग विद्रोग को
- 0:25–0:28सथा के साचे में आसानी से फिट किया जासके.
- 0:28–0:31रहें तो यह एक यसी सस्पैंस ध्रिलर की कहानी लगरे रहे है?
- 0:31–0:32है ना?
- 0:32–0:35लिकिन भाशा और साहित्ते के इतिहास में
- 0:35–0:37आजे रहेसे अकसर सच्साबित होते हैं
- 0:37–0:40और आजके इस गेहन विषलेशन में
- 0:40–0:43हम कुछ आजे ही इतिहासे क रहेसे परदा उटाने वाले है
- 0:43–0:44बलकुल
- 0:44–0:47और ये सब हम एक बहत खास स्रोथ के जरिये करेंगे
- 0:47–1:00आज हमारे सामने गजेंदर ताकुर दूरा रचिते किताब है, अपारलेल फिस्ट्री अप मित्ला आन मात्ली लिट्रचटर, यानी मित्ला और मात्ली साहित्ते का एक समनांतर इतिहास.
- 1:00–1:05अदिकारिक इतिहास कुछ खास वर्गोने स्वप अपने नजर्ये से लिखा,
- 1:06–1:08और कैसे एक समानानतर इतिहास ने,
- 1:09–1:13राश्ये पर पडे लोगों, लोग कतावं और दिजिटल क्रान्ती की मददद से,
- 1:14–1:15उस चिपे हुए सच को बार निकाला.
- 1:16–1:17बिल्कोल.
- 1:17–1:19उस च्पे हुए सच को बार निकाला.
- 1:19–1:20बिलकोल.
- 1:20–1:23पर देखे आगे बडने से पहले एक बाज स्पष्ट करना बहुत जरूरी है.
- 1:23–1:25आप वो दिस्कलेमर देना सही रहेगा.
- 1:25–1:29आप इस श्रोट सामगरी में साहित ये अकाद्मी पर,
- 1:29–1:35पक्ष्पात, ब्रामभ़वादी वर्चस्व, और सन्स्तागत भेदबाव के कई कडे दावे की एगे हैं.
- 1:35–1:42तो हम यहां यहां राजनीतिक यह जातिगद दावो का, नहीं तो समर्ठन कर रहे है, नहीं विरोद कर रहे हैं.
- 1:42–1:42यही का?
- 1:42–1:46हमारा मकसत सर्व मूल पाथ में दिये गय तत्फ्यों
- 1:46–1:49और विचारों को पुरी निश्पक्ष्टा के साथ सामने रकना है
- 1:49–1:53बस ताकी इस पूरे विषै की एक स्पष्ट तस्वीर मिल सके
- 1:53–2:00तो ज़िए सीदे उस दोर में चलते है, जहां से इस पूरी कहानी की शुर्वात होती है.
- 2:00–2:04तो दिके इस कहानी की जडेना बहुत गेरी है.
- 2:04–2:08आदिकारे के तिहास अकसर कई चीजों को दरकिनार कर देता है.
- 2:08–2:15स्रोथके अनुसार मैठिली भाशा की उत्पती आप्टीं से बारवी शताबदी के भीच मागदी प्राक्रत से हुई ती
- 2:15–2:17मागदी प्राक्रत से
- 2:17–2:23आप, लेकिन इसकी सबसे पहली और प्रमानेग जलक हमे चर्या पद में दिखने को मिलती है
- 2:23–2:29ये कानहापा और सरहापा जैसे तेइस वज्रेयान सिद्छों दों दोरा रचे गय रहेस से मैं गीत हैं
- 2:29–2:33वुजे यहां थोडा रुकना होगा ये सिद आकिर ते कोन?
- 2:33–2:34बताता हूँ
- 2:34–2:37और इनका साहित्य इतना रहेस से मैं किों ता?
- 2:37–2:41की मुक्khidhara ke itihasne isse nazarandaas karna hi bahitar samja?
- 2:41–2:44देखे ये सिद कोई राजद़बारो में बैटने लोग नहीं ते
- 2:44–2:47ये तो गूमते फिरते भिख्षू थे
- 2:47–2:49जो समाजके निचले तपको से आते थे
- 2:49–2:51उनहुने अपने गीतों के लिए जान बुचकर
- 2:51–2:55संद्या बाशा या तौएलाइत लंग़े का स्तमाल किया
- 2:55–2:57अच्छ तौएलाइत लंग़े ये क्या हुती है
- 2:57–3:03संद्या बाशा का मतलब है, एक अईसी बाशा जो ना पूरी तरान से दिन के उजाले जैसी साफ है
- 3:03–3:05और नहीं राद के अंदेरे जैसी चुपी हुए है
- 3:05–3:06अहो!
- 3:06–3:09मडदब येग तर से कुट बद या कोड़़ भाशा थी
- 3:09–3:09दि बलकल सही
- 3:09–3:12इसे आम जनता जो उन सिद़ों के करीब थी
- 3:12–3:14वो तो समझ सकती थी
- 3:14–3:17लेकिन सत्ता और दरभार के रूदी वादी लोग
- 3:17–3:19इसे आसानी से पकर नहीं पाते थे
- 3:19–3:20क्या बाते?
- 3:20–3:26ये उस उमें के संस्क्रित, वर्च्ष्व, और दार्मिक पाक्श्ण्ड के खिलाफ एक बहुत बभी भाशाई बगावध थी
- 3:26–3:56ये तो एक तर से अंट्ग्राँउंट रीश्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट
- 3:56–4:01यह किसी लिपी को रातो रात कैसे मिताया जासकता, यह कोई एक दिन का काम तो नहीं रहा होगा?
- 4:01–4:31अगर बाशा लगा प्रजाद लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा ल�
- 4:31–4:32केती लिपी भी ती
- 4:32–4:36जिसका इस्तमाल व्यापारी और आम लोग अपने रोज मराके बहीख हातो में करते ते
- 4:36–4:38उसे तो पुरी तरे से ही बला दिया डिया
- 4:38–4:41मतलब लिपी बड़लना सर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं ता
- 4:41–4:46ये तो आजा जाए से किसी प्रानी अटिहासक इमारत की नीव ही बडल दिना.
- 4:46–4:47बिलकु.
- 4:47–4:54या तिरहुता से देवनागरी की ओर जाने से, मैठली का असल जो दीने है, वो नहीं बडल गया.
- 4:54–5:00यहां जो सब से रोचक बात है वो यही है, समवनानतर इतिहास कार पिलकोल यही तरक देते हैं.
- 5:00–5:04इस बदलाव ने मैठली को एक स्वतन्त्र और प्राचीन बाशा के दरजे से गिराकर,
- 5:04–5:08उसे बस हिंदी की एक बोली या डालेक्त के रूप में पेशकरने का रास्ता साव कर दिया.
- 5:08–5:38वुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 5:38–5:44उसके उनुसार वे उच्छ जाती के राज दर्बार में रहने वाले महान बखत कवी थे.
- 5:44–5:49लेकिन श्रोथ इस थापिट सत्तिपर एक बहुत बडाँ सवाल्या निशान लगाता है.
- 5:49–5:53और ये सवाल्या निशान इस पूरी चर्चा का सबसे चोकाने बाहलो है.
- 5:53–6:23अद्वाँट बाशा बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लग
- 6:23–6:53ये मुख्य रूप से विद्वानो और दरबारो में अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप
- 6:53–6:57या हाश्ये के विद्यबती का एक लोगो तक तग्ते आर किया है
- 6:57–7:00बाप्रे तु क्या हम ये कहे रहे हैं
- 7:00–7:04कि इतिहास ने एक विद्रोही लोक कवी और एक दरबारी विध्वान
- 7:04–7:07को मिलाकर एक ही वेकती बना दिया बस फिलिए
- 7:07–7:11या कि उस लोग साहिते पर उच्वर अपना दावा पेश कर सके?
- 7:11–7:14दिए समानान्तर इतिहास सीदा सीदा यही शारा करता है
- 7:14–7:18येक तरा का संसक्रितिक विनियोग या कल्ट्रल अप्रुप्रीएशन था
- 7:18–7:22असली विद्यापती की महांत संसक्रित के बारी बरकम शब्डों में नहीं ती
- 7:22–7:25वो तो केतों और गाँवाई जाने वाले गितों में ती
- 7:25–7:28यहाप बात आकर सच्छ में बहुत दिल्चास पूजाती है
- 7:28–7:32ये एक बाशा के साथ होने वाले खिल्वाड का बड़ा उदारन है
- 7:32–7:34लेकिन कहानी सर्फ सिकुडने की नहीं है ना?
- 7:34–7:35नहीं बिलकुडने है
- 7:35–7:39एक समय अज़ा भी ता जब मेठली सर्फ एक शेत्रिय बाशा नहीं ती
- 7:39–7:45बलकी पूरे पूरवी भारत के ले एक दोनर सबभिता की तरहे खाम कर रही थी
- 7:45–7:48मैं तो इसे एक अपन सोर्स कोट की तरह देकती हूँ
- 7:48–7:49अपन सोर्स कोट
- 7:49–7:56आँ जैसे कोई सुब्ट्वेर जिसे हर कोई अपनी अपनी लगा बना सकता है
- 7:56–8:26अगर आम इसे बड़े प्यमाने पर देखें तो ये अपन सोर्स कोडवाल अदारन बहुत फीजद बड़ागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागा
- 8:26–8:56तो ये बहाशा एक अँईसा संस्क्रितिक खजाना थी जिसे कई अन्ने संस्क्रितिक खजाना थी जिसे कई अन्ने संस्क्रितिक खजाना थी जिसे कई अन्ने संस्क्रितिक खजाना थी जिसे कई अन्ने संस्क्रितिक खजाना थी खजाना थी खजाना थी खजाना थी खजाना �
- 8:56–8:58यो ने अपना साहित्ते ग़ा
- 8:58–9:00लेकिन यहाए एक बड़ भड़ा विरोदा वाज एए
- 9:00–9:02जो बात मुझे खखटक रही है
- 9:02–9:03वो क्या
- 9:03–9:05एक बाशा जो इतनी प्रभावषाली ती
- 9:05–9:07कि नेपाल के राजा उस में नाटक लिक रहे हैं
- 9:07–9:10बंगाल और असम के संट उसे नहीं बाशाँ इंग़ रहा हैं
- 9:10–9:13वो बाशा अपने ही गर में हाशेप रहा गया दھकिल दिगाई
- 9:13–9:15मतलब एक दोनर बाशा सिकोड के से गयाई
- 9:15–9:19देखे जब किसी बाशा का प्रबाव इतना व्यापक होता ना
- 9:19–9:21तो उसे न्यन्त्रन बहुत एहम हो जाता है
- 9:22–9:25बाशा को सिकोडने का काम अकसर लेई संस्ताइ करती है
- 9:25–9:27जो उसके मानक तैकरती है
- 9:27–9:28व्म न्द रही हो
- 9:28–9:31जो लोग ये तैकरने की कुर्सी पर बैट्ते हैं
- 9:31–9:33कि क्या शुद द है क्या चबेगा
- 9:34–9:35और किसे पुरसकार मिलेगा
- 9:35–9:38वेदिरे-दिरे बाशा की बाशागे तहेटेटे हैं
- 9:38–9:40तो इस सब काहिर मतलप क्या है
- 9:40–9:43यही से हम उस इस से में प्रवेश करते है
- 9:43–9:46जहां संस्तागत, भेदबहाव, और गेट कीपिंकी बात आती है
- 9:46–9:47बलकोब
- 9:47–9:52स्रोथ में साहित्ति अकाद्मी की कार्ये प्रनाली पर गंभी रारोप लगाए गे हैं.
- 9:52–9:561965 में अकाद्मी ने मैठली को मानेता दी,
- 9:56–10:00लेकिन विनीत उत्पल और आशीश अंचिनार दवारा
- 10:00–10:04RTI के जर ये जो खलासे हुए वो किसी को भी हेरान कर देंगे.
- 10:04–10:34अँ उन अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ
- 10:34–10:36अपर जगे बनाना जाते ते
- 10:36–10:38उने पुरी तरे से सिझ्टम से बहार कर दिया गया
- 10:39–10:41ये तो वही भाज़।वी की जब गेट कीपर खुदी खिलारी बन जाएं
- 10:41–10:44तो बाकी लोगों के लिए मेदान के दरवाजे कवी नी खुलते
- 10:44–10:45सही कहा
- 10:45–10:47इसका एक बड़ा और दुखद उदारन रही मोहन जा का है
- 10:48–10:52वे कन्यादान और खट्र कगा के तरंग जैसे उपन्यासोगे बहुत प्रसिथ तर लोप्री वेंगे कार थे
- 10:52–10:56रही मोहन जा उनकी किताबे तो गर-गर में पडी जाती ती
- 10:56–10:58उनकी शेली बहुत तीची ती
- 10:58–11:28आप आप आप बज़ादी तो बज़ादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो जदी तो �
- 11:28–11:28बिल्कोल
- 11:28–11:31और जो लेख्ह कसल में उस पूरी पार्टी की जान हैं
- 11:31–11:34जिसकी किताबे लोग सब से जाडा पड़रें
- 11:34–11:36उसे कलब से ही बहार निकाल दिया जाता हैं
- 11:36–11:38इस से एक बहत महत्पुन सवाल पड़ा होता हैं
- 11:38–11:41ये आदनिक संस्तागत राजनी दी तो है
- 11:41–11:46लेकिन स्रोथ बताता है कि ये गेट कीपिंग सर्फ भीस्वी सदी की अपज नहीं है
- 11:46–11:52इसके तार सदीो पुराने इतिहास और दूशन पंजी यानी दब ब्लाक बुक तक जाते हैं
- 11:52–11:55ये ब्लाक बुक वाला हिस्सा वाके किसी दाक मिस्टी जैसा है
- 11:55–12:01तो जोंगाई नाँ में विदेहा आन्दोलन ने वन्शावली के कुछ गुप्ट रिकोट्स को सरवजनिक कर दिया
- 12:01–12:04और इसके केंदर में ते गंगेश उपाद्धयाई
- 12:04–12:07आँ गंगेश उपाद्धयाई कोई साद्धारन नाम नाम नहीं ते
- 12:07–12:16वे चोदवी शताभ्दिक एक महान दार्षनिक �the, उनोने तत्व चिंतामनी जैसी कालजेई रचना लिखी, जो नव्या नयाय दर्षन का अदार है.
- 12:16–12:24नव्या न्याय के बारे में ने पडा है कि ये बारतिया तर्क शास्त्र और ग्यान मिमान्सा का एक बेहज जटिल और कठोर सिस्तम है.
- 12:24–12:24जी.
- 12:24–12:27इसे दर्षन शास्त्र का गणेद भी कहा जाता है.
- 12:27–12:32तो आजे महान व्यक्ती के जीवन में आजा क्या था जीसे चिपाने की तनी जरूरत पड़गेई?
- 12:32–12:40तो देके गुब्ठ पनजी रेकोट से ये सच्च्सामने आया की गंगेष उपाद्धयाई ने एक चर्म कारिनी यानी निच्ली जाती की महिला से शादी की ती.
- 12:40–12:41अख़़!
- 12:41–12:43अर इसे भी जादा चोकाने वाली बात ये थी
- 12:43–12:48कि उनके परिवार का जन्म, उनके पिटा की म्रित्विए के पाथ साल बाद हुए था
- 12:48–12:49अहो!
- 12:49–12:54तो इसका मतलब है कि वन्शावली और जातिगत शुद्द्दधा के जोभी दावे किये जाते थे
- 12:54–12:57गंगेश उपाद्धयाय का जीवन उन सारे दावों को तो तो तोड़ राथा.
- 12:57–12:58बलकुल.
- 12:58–13:00और इसिलिये संस्तागत इतिहास कारों
- 13:00–13:02जैसे रमनाज्जा और अन्ने ने
- 13:02–13:06जातिगगच्छुद्टा और उच्वर्ग का ब्रहम बनाय रखने किलिए
- 13:06–13:08इस सच्च्चाई को पूरी तरसे दबा दिया?
- 13:08–13:09उं।
- 13:09–13:12स्रोथ इसे इतिहास की अनर किलिंग कहता है
- 13:12–13:15एक महन दार्षनिक के जीवन की सच्च्चाई को
- 13:15–13:17सर्फ इसलिये मार दिया गया
- 13:17–13:20कुकि वो समाज के बनाएगे साचो में फिट नहीं बैट्रा था
- 13:20–13:21ये दरी तो है
- 13:21–13:27सच्च्चाई सामने आने का दर, और ये दर राजनीती को किस्टरे से चलाता है, इसका भी स्रोथ में काफी जिक्र है.
- 13:27–13:32समाज शास्तरी ती के अमन का एक विष्लेशन इस में दिया गया है,
- 13:32–13:37जब गलग मैठली राज़ी की मांग। ती तो उसका विरोद किसी बाहरी ने नहीं
- 13:37–13:41बलकी खुद मैठली बाशी खष्ट्र के ही अन्ने वरगो ने किया
- 13:41–13:46ये बहुत जीब लकता है कि कोई अपनी बाशा के राज़े का विरोद क्यों करेगा
- 13:46–13:48कुकी वुसर भाशा कर आज्य नहीं होताना?
- 13:49–13:52ती के अमन का तरक है, की अनने वरगों को ये साव दिख्रा था,
- 13:52–13:56कि अगर अलग राज्य बना, तो राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता,
- 13:56–13:58उसी उच्छ वर्क के हातों लिए चली जाएगी,
- 13:58–14:03जिसने साहित्य, वन्शावली और इतिहास पर अपना कबजा कर रखगा है
- 14:03–14:04बलकुल
- 14:04–14:09तो बहाशा की वो लड़ाई, असल में सामाजिक वर्च्ष्व और दर की लड़ाई बन लिए थी
- 14:09–14:13तो आसे में, मिरा मतलब है, जब अकादमी ने दरवाजे बन्द कर लिए
- 14:13–14:16जब वन्शावलीोंने सच्छ को दबादिया
- 14:16–14:18और जब लिपी को ही बड़ल दिया गया
- 14:18–14:20तो आसे में लोग क्या करतें?
- 14:20–14:21जो हाँश्ये पर दھकेल दिये गये हैं
- 14:21–14:24वे क्या करतें?
- 14:24–14:26वे अपनी खुद की एक नहीं दूनिया बना लेतें
- 14:26–14:31अर यही से समानान्तर इतिहास के असली लोक नायक सामने आते है.
- 14:31–14:32सही का.
- 14:32–14:35मुख्धारा के इतिहास में जहां राजाओं,
- 14:35–14:38दरबारियों और उच्वरग के नायकों की चर्चा होती है,
- 14:38–14:42वहे समानान्तर इतिहास में वो जगा लोक नायकों लिए.
- 14:42–14:43जैसे कि सलहेस.
- 14:43–14:47अआ, सलहेस जिने दूसाथ समुदाय का रक्षक दिव्टा माना जाता है,
- 14:47–14:50दीना भद्द्दी, जो मुसहर समुदाय के नायक ते,
- 14:50–14:52और जिनों ने बंदुवा मस्दूरी के किलाग,
- 14:52–14:54लंभी और एतिहासेक लडाय लगी.
- 14:54–14:56और लोरीका भी?
- 14:56–15:26अपने लोक साहित्ते को हमेशा के लिए बचाने का अँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 15:26–15:29मुझे ये समजने की जरूरत है, स्रोथ कैता है,
- 15:29–15:31के उनहोंने 11,000, ।
- 15:31–15:34तार्ब पत्र पांडूलिप्यों को जिजिटाइस कर दिया.
- 15:34–15:35जी.
- 15:35–15:36ये कैसे समबव है?
- 15:36–15:38बिना किसी सरकारी मदध के,
- 15:38–15:40बिना किसी बड़े फश्ण्ट के,
- 15:40–15:42कोई एसा कैसे कर सकता है?
- 15:42–15:48तो बारी बर्कं स्कनर्स, सन्रक्षन की तक्नीक और अनुवादकों की फोडच्चाई यह होती है.
- 15:48–15:51यही तो जिजिटल विद्रों की सबसे हुबसुरत बात है.
- 15:51–15:54यह काम किसी वातानो कुलित सरकारी दब्तर में बैटकर नहीं हूँँ.
- 15:54–15:58ये क्मौन्टी सूर्सिंग और लोगों की असीं इच्छा सक्ती का नतीजा ता
- 15:58–16:02लोगोंने खुद आगे आखर अपनी पुरानी पोठ्विए को निकाला
- 16:02–16:08सामाने सकानर्स और कम्रो की मदद्ड ली और इंट्रनेट पर एक स्वतन्त्र आप्काइइप क्ड़ा कर दिया
- 16:08–16:11उनो उस सथ्ता के दाचे को पूरी तरसे बाईपास कर दिया
- 16:11–16:14जो ये तैक रखा ता की क्या चबईगा?
- 16:14–16:17और इसी जिद का नतीजा ता की 2014 में
- 16:17–16:20तिरहुता लिपी को यूनिकोड में शामिल कर रगा गय.
- 16:20–16:25इसका मतलब है कि अब दूनिया के किसी भी कोने में बआटा अन
- 16:25–16:29कमपुटर या मोबायल पर अपनी पुरानी खोचुकी लिपी में लिख सकता है.
- 16:29–16:33यूनी कोड में आना सरफ एक तकनीकी उपलब्दी नहीं ती.
- 16:33–16:35ये एक पहचान की बापसी ती.
- 16:35–16:40इंटरनेट दर्वाजा कोल दिया जो अकादमियों ने सालों से बंद कर रखगा दागा.
- 16:40–16:42अब नहीं आवाजे सामने आए हैं.
- 16:42–16:47आदूनी कुपन्यासो में आज़े विषे उच्छे उच्छे जिने पहले साहिते में अचुत माना जाता था.
- 16:47–16:54जैसे की सुभिमानी जिंगी जो तर्जगंडर या किननर समवुदाए के संगर्ष और जीवन की बात करता है,
- 16:54–17:01केक्रा लेल केलो जो गाहू से शहरों की तरव हो रहे भेताहाशा पलाएन के दर्थ को सामने रकता है.
- 17:01–17:08अर जग्दीश प्रसाद मन्डल का अपन्यास पंगु जिसे आख्विर कार 2021 में जाकर पहचान मिली,
- 17:08–17:13जो दलितो के संगरष की जमीनी हकीकत को बेना किसी लाग लपेट के बयां करता है।
- 17:13–17:16यसके लावा विभारानी जैसी कई महिला लेकि काए,
- 17:16–17:19जिने मुख्यदाराने शाएदी कभी गमविर्ता से लिया दा,
- 17:19–17:21वे भी अबिस दिजिटल करानती के जरिये,
- 17:21–17:24अपना साहित्तिजजणजन तक पहुचा रही है।
- 17:24–17:28और इस दिजिटल फेलाव में एक और बहुत महतुपुन बिंदू है,
- 17:28–17:30जो नेपाल से जोडा है।
- 17:30–17:37अच्छ, नेपाल से, राजनेट्तिक सीमाँ के अदार पर काम करती हैं.
- 17:38–17:40वे बहारती मेठली लेखुको को तो प्रकाषित करती है,
- 17:40–17:42लेके नेपाल के मेठली लेखुकों,
- 17:42–17:44जैसे राम बहरोस, कापडी, भहमर,
- 17:44–17:46उनको पुरी तरा नजर अंदास कर देती हैं.
- 17:46–17:52जब की हम ने पहले बात की कि नेपाल के मलर आजाँ का मैठली के विकास में कितना बड़ा योगदान ता.
- 17:52–17:53यही तो विटम बना है.
- 17:53–17:59और इसी लिए अब नेपाल में भी इस संस्तागत बट्वारे के किलाफ विरोद के सुर उट्रेए हैं.
- 17:59–18:05समवानान्तर इतियास का मानन है, कि साहित्ते और भाशा को दो देशों की सरहदों में नहीं बान्दा जासकता.
- 18:05–18:07बलकुल नहीं बान्दा जासकता.
- 18:07–18:10तो अगर अम यं सारी कड्यों को जोडें,
- 18:10–18:13चर्यापद के रहस्सिमए गीतों से लेकर,
- 18:13–18:17तिरहुता लिपी के मिटने तक, विद्यापती के विन्योग से लेकर
- 18:17–18:19साहित याकादमी की गेट कीपिंक तक,
- 18:19–18:22और गंगेश उपाद्याय के चिपे हुए सच से लेकर
- 18:22–18:25विदेह के दिजिटल विद्रो तक,
- 18:25–18:28तो जो तस्वीर उबहरती है, वो बहुती शक्तिषाली है.
- 18:28–18:58भी बद्दागाँ तर बद्दागाँ तर बद्दागाँ तर बद्दागाँ तर बद्दागाँ तर बद्दागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददाद
- 18:58–18:59तो उने मोखे गीत गाए
- 19:00–19:01और जब उने तकनीक मिली
- 19:01–19:04तो उने पुरा का पुरा दिजिटल आरकाईव कडाईग कर दिया
- 19:04–19:05सच में
- 19:05–19:08ये दीब डाईग सर्फ मेठली बहाशा की कहानी नहीं है
- 19:09–19:10ये सोचने पर मजबोर करता है
- 19:10–19:14कि जो इतिहास हम स्कूलों या कोलेजों की कितावों में पडते है,
- 19:14–19:16वो असल में किसने लिखा है.
- 19:16–19:17बलकुल?
- 19:17–19:19क्यों लिखा है, और उसे भी ज़ोरी सवाल.
- 19:19–19:22उस में से किसे जान भुजकर मिता दिया डिया है.
- 19:22–19:25और ये भी कि जो मिता डिया डिया डिया ता,
- 19:25–19:55उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उ�
- 19:55–20:00तो बविश्य में इं तथाखध सहीपे अकादमियो की क्या प्रसांगिक्ता रहा जाएगी?
- 20:00–20:08ये वाखे बविश्य की आहत है, क्या आने वाले दशको में आधिफिश्यल अंटलिजन्स और अंट्रनेट की विकंद्रिक्र दूनिया
- 20:08–20:34तब आप बज़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़�
Plain text
अछि। कल्पना कीजी कि जिस महान कवि की कविता है पीडियो से गाई जारी है, जिसके नाम पर आजज भी चोक-चोराहे बने हुए है, वो असल में मतलब कुई एक अन्सान थाए नहीं. आच्ठ? एक अन्सान नहीं था? आआ, बलके इतिहास के पन्नो में, तो बिल्कुल अलग गलग लोगो को मिलागर एक चेहरा गर दिया गया हो और वो बी इसले ताकी एक बड़े लोग विद्रोग को सथा के साचे में आसानी से फिट किया जासके. रहें तो यह एक यसी सस्पैंस ध्रिलर की कहानी लगरे रहे है? है ना? लिकिन भाशा और साहित्ते के इतिहास में आजे रहेसे अकसर सच्साबित होते हैं और आजके इस गेहन विषलेशन में हम कुछ आजे ही इतिहासे क रहेसे परदा उटाने वाले है बलकुल और ये सब हम एक बहत खास स्रोथ के जरिये करेंगे आज हमारे सामने गजेंदर ताकुर दूरा रचिते किताब है, अपारलेल फिस्ट्री अप मित्ला आन मात्ली लिट्रचटर, यानी मित्ला और मात्ली साहित्ते का एक समनांतर इतिहास. अदिकारिक इतिहास कुछ खास वर्गोने स्वप अपने नजर्ये से लिखा, और कैसे एक समानानतर इतिहास ने, राश्ये पर पडे लोगों, लोग कतावं और दिजिटल क्रान्ती की मददद से, उस चिपे हुए सच को बार निकाला. बिल्कोल. उस च्पे हुए सच को बार निकाला. बिलकोल. पर देखे आगे बडने से पहले एक बाज स्पष्ट करना बहुत जरूरी है. आप वो दिस्कलेमर देना सही रहेगा. आप इस श्रोट सामगरी में साहित ये अकाद्मी पर, पक्ष्पात, ब्रामभ़वादी वर्चस्व, और सन्स्तागत भेदबाव के कई कडे दावे की एगे हैं. तो हम यहां यहां राजनीतिक यह जातिगद दावो का, नहीं तो समर्ठन कर रहे है, नहीं विरोद कर रहे हैं. यही का? हमारा मकसत सर्व मूल पाथ में दिये गय तत्फ्यों और विचारों को पुरी निश्पक्ष्टा के साथ सामने रकना है बस ताकी इस पूरे विषै की एक स्पष्ट तस्वीर मिल सके तो ज़िए सीदे उस दोर में चलते है, जहां से इस पूरी कहानी की शुर्वात होती है. तो दिके इस कहानी की जडेना बहुत गेरी है. आदिकारे के तिहास अकसर कई चीजों को दरकिनार कर देता है. स्रोथके अनुसार मैठिली भाशा की उत्पती आप्टीं से बारवी शताबदी के भीच मागदी प्राक्रत से हुई ती मागदी प्राक्रत से आप, लेकिन इसकी सबसे पहली और प्रमानेग जलक हमे चर्या पद में दिखने को मिलती है ये कानहापा और सरहापा जैसे तेइस वज्रेयान सिद्छों दों दोरा रचे गय रहेस से मैं गीत हैं वुजे यहां थोडा रुकना होगा ये सिद आकिर ते कोन? बताता हूँ और इनका साहित्य इतना रहेस से मैं किों ता? की मुक्khidhara ke itihasne isse nazarandaas karna hi bahitar samja? देखे ये सिद कोई राजद़बारो में बैटने लोग नहीं ते ये तो गूमते फिरते भिख्षू थे जो समाजके निचले तपको से आते थे उनहुने अपने गीतों के लिए जान बुचकर संद्या बाशा या तौएलाइत लंग़े का स्तमाल किया अच्छ तौएलाइत लंग़े ये क्या हुती है संद्या बाशा का मतलब है, एक अईसी बाशा जो ना पूरी तरान से दिन के उजाले जैसी साफ है और नहीं राद के अंदेरे जैसी चुपी हुए है अहो! मडदब येग तर से कुट बद या कोड़़ भाशा थी दि बलकल सही इसे आम जनता जो उन सिद़ों के करीब थी वो तो समझ सकती थी लेकिन सत्ता और दरभार के रूदी वादी लोग इसे आसानी से पकर नहीं पाते थे क्या बाते? ये उस उमें के संस्क्रित, वर्च्ष्व, और दार्मिक पाक्श्ण्ड के खिलाफ एक बहुत बभी भाशाई बगावध थी ये तो एक तर से अंट्ग्राँउंट रीश्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट यह किसी लिपी को रातो रात कैसे मिताया जासकता, यह कोई एक दिन का काम तो नहीं रहा होगा? अगर बाशा लगा प्रजाद लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा ल� केती लिपी भी ती जिसका इस्तमाल व्यापारी और आम लोग अपने रोज मराके बहीख हातो में करते ते उसे तो पुरी तरे से ही बला दिया डिया मतलब लिपी बड़लना सर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं ता ये तो आजा जाए से किसी प्रानी अटिहासक इमारत की नीव ही बडल दिना. बिलकु. या तिरहुता से देवनागरी की ओर जाने से, मैठली का असल जो दीने है, वो नहीं बडल गया. यहां जो सब से रोचक बात है वो यही है, समवनानतर इतिहास कार पिलकोल यही तरक देते हैं. इस बदलाव ने मैठली को एक स्वतन्त्र और प्राचीन बाशा के दरजे से गिराकर, उसे बस हिंदी की एक बोली या डालेक्त के रूप में पेशकरने का रास्ता साव कर दिया. वुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� उसके उनुसार वे उच्छ जाती के राज दर्बार में रहने वाले महान बखत कवी थे. लेकिन श्रोथ इस थापिट सत्तिपर एक बहुत बडाँ सवाल्या निशान लगाता है. और ये सवाल्या निशान इस पूरी चर्चा का सबसे चोकाने बाहलो है. अद्वाँट बाशा बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लगाट बाशा लग ये मुख्य रूप से विद्वानो और दरबारो में अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप या हाश्ये के विद्यबती का एक लोगो तक तग्ते आर किया है बाप्रे तु क्या हम ये कहे रहे हैं कि इतिहास ने एक विद्रोही लोक कवी और एक दरबारी विध्वान को मिलाकर एक ही वेकती बना दिया बस फिलिए या कि उस लोग साहिते पर उच्वर अपना दावा पेश कर सके? दिए समानान्तर इतिहास सीदा सीदा यही शारा करता है येक तरा का संसक्रितिक विनियोग या कल्ट्रल अप्रुप्रीएशन था असली विद्यापती की महांत संसक्रित के बारी बरकम शब्डों में नहीं ती वो तो केतों और गाँवाई जाने वाले गितों में ती यहाप बात आकर सच्छ में बहुत दिल्चास पूजाती है ये एक बाशा के साथ होने वाले खिल्वाड का बड़ा उदारन है लेकिन कहानी सर्फ सिकुडने की नहीं है ना? नहीं बिलकुडने है एक समय अज़ा भी ता जब मेठली सर्फ एक शेत्रिय बाशा नहीं ती बलकी पूरे पूरवी भारत के ले एक दोनर सबभिता की तरहे खाम कर रही थी मैं तो इसे एक अपन सोर्स कोट की तरह देकती हूँ अपन सोर्स कोट आँ जैसे कोई सुब्ट्वेर जिसे हर कोई अपनी अपनी लगा बना सकता है अगर आम इसे बड़े प्यमाने पर देखें तो ये अपन सोर्स कोडवाल अदारन बहुत फीजद बड़ागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागा तो ये बहाशा एक अँईसा संस्क्रितिक खजाना थी जिसे कई अन्ने संस्क्रितिक खजाना थी जिसे कई अन्ने संस्क्रितिक खजाना थी जिसे कई अन्ने संस्क्रितिक खजाना थी जिसे कई अन्ने संस्क्रितिक खजाना थी खजाना थी खजाना थी खजाना थी खजाना � यो ने अपना साहित्ते ग़ा लेकिन यहाए एक बड़ भड़ा विरोदा वाज एए जो बात मुझे खखटक रही है वो क्या एक बाशा जो इतनी प्रभावषाली ती कि नेपाल के राजा उस में नाटक लिक रहे हैं बंगाल और असम के संट उसे नहीं बाशाँ इंग़ रहा हैं वो बाशा अपने ही गर में हाशेप रहा गया दھकिल दिगाई मतलब एक दोनर बाशा सिकोड के से गयाई देखे जब किसी बाशा का प्रबाव इतना व्यापक होता ना तो उसे न्यन्त्रन बहुत एहम हो जाता है बाशा को सिकोडने का काम अकसर लेई संस्ताइ करती है जो उसके मानक तैकरती है व्म न्द रही हो जो लोग ये तैकरने की कुर्सी पर बैट्ते हैं कि क्या शुद द है क्या चबेगा और किसे पुरसकार मिलेगा वेदिरे-दिरे बाशा की बाशागे तहेटेटे हैं तो इस सब काहिर मतलप क्या है यही से हम उस इस से में प्रवेश करते है जहां संस्तागत, भेदबहाव, और गेट कीपिंकी बात आती है बलकोब स्रोथ में साहित्ति अकाद्मी की कार्ये प्रनाली पर गंभी रारोप लगाए गे हैं. 1965 में अकाद्मी ने मैठली को मानेता दी, लेकिन विनीत उत्पल और आशीश अंचिनार दवारा RTI के जर ये जो खलासे हुए वो किसी को भी हेरान कर देंगे. अँ उन अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अँ अपर जगे बनाना जाते ते उने पुरी तरे से सिझ्टम से बहार कर दिया गया ये तो वही भाज़।वी की जब गेट कीपर खुदी खिलारी बन जाएं तो बाकी लोगों के लिए मेदान के दरवाजे कवी नी खुलते सही कहा इसका एक बड़ा और दुखद उदारन रही मोहन जा का है वे कन्यादान और खट्र कगा के तरंग जैसे उपन्यासोगे बहुत प्रसिथ तर लोप्री वेंगे कार थे रही मोहन जा उनकी किताबे तो गर-गर में पडी जाती ती उनकी शेली बहुत तीची ती आप आप आप बज़ादी तो बज़ादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो बजादी तो जदी तो � बिल्कोल और जो लेख्ह कसल में उस पूरी पार्टी की जान हैं जिसकी किताबे लोग सब से जाडा पड़रें उसे कलब से ही बहार निकाल दिया जाता हैं इस से एक बहत महत्पुन सवाल पड़ा होता हैं ये आदनिक संस्तागत राजनी दी तो है लेकिन स्रोथ बताता है कि ये गेट कीपिंग सर्फ भीस्वी सदी की अपज नहीं है इसके तार सदीो पुराने इतिहास और दूशन पंजी यानी दब ब्लाक बुक तक जाते हैं ये ब्लाक बुक वाला हिस्सा वाके किसी दाक मिस्टी जैसा है तो जोंगाई नाँ में विदेहा आन्दोलन ने वन्शावली के कुछ गुप्ट रिकोट्स को सरवजनिक कर दिया और इसके केंदर में ते गंगेश उपाद्धयाई आँ गंगेश उपाद्धयाई कोई साद्धारन नाम नाम नहीं ते वे चोदवी शताभ्दिक एक महान दार्षनिक �the, उनोने तत्व चिंतामनी जैसी कालजेई रचना लिखी, जो नव्या नयाय दर्षन का अदार है. नव्या न्याय के बारे में ने पडा है कि ये बारतिया तर्क शास्त्र और ग्यान मिमान्सा का एक बेहज जटिल और कठोर सिस्तम है. जी. इसे दर्षन शास्त्र का गणेद भी कहा जाता है. तो आजे महान व्यक्ती के जीवन में आजा क्या था जीसे चिपाने की तनी जरूरत पड़गेई? तो देके गुब्ठ पनजी रेकोट से ये सच्च्सामने आया की गंगेष उपाद्धयाई ने एक चर्म कारिनी यानी निच्ली जाती की महिला से शादी की ती. अख़़! अर इसे भी जादा चोकाने वाली बात ये थी कि उनके परिवार का जन्म, उनके पिटा की म्रित्विए के पाथ साल बाद हुए था अहो! तो इसका मतलब है कि वन्शावली और जातिगत शुद्द्दधा के जोभी दावे किये जाते थे गंगेश उपाद्धयाय का जीवन उन सारे दावों को तो तो तोड़ राथा. बलकुल. और इसिलिये संस्तागत इतिहास कारों जैसे रमनाज्जा और अन्ने ने जातिगगच्छुद्टा और उच्वर्ग का ब्रहम बनाय रखने किलिए इस सच्च्चाई को पूरी तरसे दबा दिया? उं। स्रोथ इसे इतिहास की अनर किलिंग कहता है एक महन दार्षनिक के जीवन की सच्च्चाई को सर्फ इसलिये मार दिया गया कुकि वो समाज के बनाएगे साचो में फिट नहीं बैट्रा था ये दरी तो है सच्च्चाई सामने आने का दर, और ये दर राजनीती को किस्टरे से चलाता है, इसका भी स्रोथ में काफी जिक्र है. समाज शास्तरी ती के अमन का एक विष्लेशन इस में दिया गया है, जब गलग मैठली राज़ी की मांग। ती तो उसका विरोद किसी बाहरी ने नहीं बलकी खुद मैठली बाशी खष्ट्र के ही अन्ने वरगो ने किया ये बहुत जीब लकता है कि कोई अपनी बाशा के राज़े का विरोद क्यों करेगा कुकी वुसर भाशा कर आज्य नहीं होताना? ती के अमन का तरक है, की अनने वरगों को ये साव दिख्रा था, कि अगर अलग राज्य बना, तो राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता, उसी उच्छ वर्क के हातों लिए चली जाएगी, जिसने साहित्य, वन्शावली और इतिहास पर अपना कबजा कर रखगा है बलकुल तो बहाशा की वो लड़ाई, असल में सामाजिक वर्च्ष्व और दर की लड़ाई बन लिए थी तो आसे में, मिरा मतलब है, जब अकादमी ने दरवाजे बन्द कर लिए जब वन्शावलीोंने सच्छ को दबादिया और जब लिपी को ही बड़ल दिया गया तो आसे में लोग क्या करतें? जो हाँश्ये पर दھकेल दिये गये हैं वे क्या करतें? वे अपनी खुद की एक नहीं दूनिया बना लेतें अर यही से समानान्तर इतिहास के असली लोक नायक सामने आते है. सही का. मुख्धारा के इतिहास में जहां राजाओं, दरबारियों और उच्वरग के नायकों की चर्चा होती है, वहे समानान्तर इतिहास में वो जगा लोक नायकों लिए. जैसे कि सलहेस. अआ, सलहेस जिने दूसाथ समुदाय का रक्षक दिव्टा माना जाता है, दीना भद्द्दी, जो मुसहर समुदाय के नायक ते, और जिनों ने बंदुवा मस्दूरी के किलाग, लंभी और एतिहासेक लडाय लगी. और लोरीका भी? अपने लोक साहित्ते को हमेशा के लिए बचाने का अँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� मुझे ये समजने की जरूरत है, स्रोथ कैता है, के उनहोंने 11,000, । तार्ब पत्र पांडूलिप्यों को जिजिटाइस कर दिया. जी. ये कैसे समबव है? बिना किसी सरकारी मदध के, बिना किसी बड़े फश्ण्ट के, कोई एसा कैसे कर सकता है? तो बारी बर्कं स्कनर्स, सन्रक्षन की तक्नीक और अनुवादकों की फोडच्चाई यह होती है. यही तो जिजिटल विद्रों की सबसे हुबसुरत बात है. यह काम किसी वातानो कुलित सरकारी दब्तर में बैटकर नहीं हूँँ. ये क्मौन्टी सूर्सिंग और लोगों की असीं इच्छा सक्ती का नतीजा ता लोगोंने खुद आगे आखर अपनी पुरानी पोठ्विए को निकाला सामाने सकानर्स और कम्रो की मदद्ड ली और इंट्रनेट पर एक स्वतन्त्र आप्काइइप क्ड़ा कर दिया उनो उस सथ्ता के दाचे को पूरी तरसे बाईपास कर दिया जो ये तैक रखा ता की क्या चबईगा? और इसी जिद का नतीजा ता की 2014 में तिरहुता लिपी को यूनिकोड में शामिल कर रगा गय. इसका मतलब है कि अब दूनिया के किसी भी कोने में बआटा अन कमपुटर या मोबायल पर अपनी पुरानी खोचुकी लिपी में लिख सकता है. यूनी कोड में आना सरफ एक तकनीकी उपलब्दी नहीं ती. ये एक पहचान की बापसी ती. इंटरनेट दर्वाजा कोल दिया जो अकादमियों ने सालों से बंद कर रखगा दागा. अब नहीं आवाजे सामने आए हैं. आदूनी कुपन्यासो में आज़े विषे उच्छे उच्छे जिने पहले साहिते में अचुत माना जाता था. जैसे की सुभिमानी जिंगी जो तर्जगंडर या किननर समवुदाए के संगर्ष और जीवन की बात करता है, केक्रा लेल केलो जो गाहू से शहरों की तरव हो रहे भेताहाशा पलाएन के दर्थ को सामने रकता है. अर जग्दीश प्रसाद मन्डल का अपन्यास पंगु जिसे आख्विर कार 2021 में जाकर पहचान मिली, जो दलितो के संगरष की जमीनी हकीकत को बेना किसी लाग लपेट के बयां करता है। यसके लावा विभारानी जैसी कई महिला लेकि काए, जिने मुख्यदाराने शाएदी कभी गमविर्ता से लिया दा, वे भी अबिस दिजिटल करानती के जरिये, अपना साहित्तिजजणजन तक पहुचा रही है। और इस दिजिटल फेलाव में एक और बहुत महतुपुन बिंदू है, जो नेपाल से जोडा है। अच्छ, नेपाल से, राजनेट्तिक सीमाँ के अदार पर काम करती हैं. वे बहारती मेठली लेखुको को तो प्रकाषित करती है, लेके नेपाल के मेठली लेखुकों, जैसे राम बहरोस, कापडी, भहमर, उनको पुरी तरा नजर अंदास कर देती हैं. जब की हम ने पहले बात की कि नेपाल के मलर आजाँ का मैठली के विकास में कितना बड़ा योगदान ता. यही तो विटम बना है. और इसी लिए अब नेपाल में भी इस संस्तागत बट्वारे के किलाफ विरोद के सुर उट्रेए हैं. समवानान्तर इतियास का मानन है, कि साहित्ते और भाशा को दो देशों की सरहदों में नहीं बान्दा जासकता. बलकुल नहीं बान्दा जासकता. तो अगर अम यं सारी कड्यों को जोडें, चर्यापद के रहस्सिमए गीतों से लेकर, तिरहुता लिपी के मिटने तक, विद्यापती के विन्योग से लेकर साहित याकादमी की गेट कीपिंक तक, और गंगेश उपाद्याय के चिपे हुए सच से लेकर विदेह के दिजिटल विद्रो तक, तो जो तस्वीर उबहरती है, वो बहुती शक्तिषाली है. भी बद्दागाँ तर बद्दागाँ तर बद्दागाँ तर बद्दागाँ तर बद्दागाँ तर बद्दागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददागाँ तर ददाद तो उने मोखे गीत गाए और जब उने तकनीक मिली तो उने पुरा का पुरा दिजिटल आरकाईव कडाईग कर दिया सच में ये दीब डाईग सर्फ मेठली बहाशा की कहानी नहीं है ये सोचने पर मजबोर करता है कि जो इतिहास हम स्कूलों या कोलेजों की कितावों में पडते है, वो असल में किसने लिखा है. बलकुल? क्यों लिखा है, और उसे भी ज़ोरी सवाल. उस में से किसे जान भुजकर मिता दिया डिया है. और ये भी कि जो मिता डिया डिया डिया ता, उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उगर उ� तो बविश्य में इं तथाखध सहीपे अकादमियो की क्या प्रसांगिक्ता रहा जाएगी? ये वाखे बविश्य की आहत है, क्या आने वाले दशको में आधिफिश्यल अंटलिजन्स और अंट्रनेट की विकंद्रिक्र दूनिया तब आप बज़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़�