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मैथिली_गजलक_व्याकरण_आ_स्वतंत्र_पहचान.mp4
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- 0:00–0:05मैथिली गजलक व्याकरन आवकर इतिहासक ये एक तवरिद समिखशा चे
- 0:05–0:10आशीश अंचनारा की पोठी उही ब्रान्ती के भिल्कुल दूर कर देता चे
- 0:10–0:15जे गजल मात्र वुर्दुदरी सीमिच्छेक आ ई फम्रा लोक निक सोजा
- 0:15–0:19इक ता एक दम स्वत्तन्त्र आप रामानेक मेठ्ली व्याक्रन राख हेता चे,
- 0:19–0:22जा इसा आहा तुरन्त एकर नियम भूजी सकब.
- 0:22–0:27तो पहल बात आहा गजल के कोनो सादारन चपल कविता नहीं मानी सके ची,
- 0:27–0:31इत वेद जका एक ता जीवन्त श्रुती प्रम्परात्थे,
- 0:31–0:34जग्रा मुख्यरुप से गावल जाएच्छेग
- 0:34–0:37आई ही कारन्सश एह में सही उच्चारन
- 0:37–0:39आम्मात्रक सतीक प्रयोग पर
- 0:39–0:41बहुत बेशी द्यान देल जाएच्छेग
- 0:41–0:44आब जेक्रा गावल जाएच्छेग
- 0:44–0:45तलगे ताल तहुबे करत
- 0:45–0:50आयात्या बाईतसि दोसर बात गजलक गजबक बनावद
- 0:50–0:55एकडज मुख्या अंग चे शेर उ मात्र दू पांतिक पून कविता हो इच्छेग
- 0:55–0:59एक रा सजेवाक लेल रदीप आख काफिया सन्नियम अच्छे
- 0:59–1:06तज्सोचु, जग अन्तमे दोहराएल जाईवाला समान, शब्द, रदीप, गजलक, शरीर थेख,
- 1:06–1:10तकी उक्रा सपहिल आबेवाला तुकान्त, स्वर, काफिया के,
- 1:10–1:14उकर दधकन नहीं कहल जासके तच्छे, जाई बिना गजल जीविते नहीं रहत.
- 1:14–1:23आब भेएची अन्तिम बात पर, भले इविद्धा अरभी आ वर्दुस आयल चेक, मुदा मैठली गजल खोकर कोनो हुबहु नकल बलकु नहीं थेग.
- 1:23–1:27अपन बाँदि के दियान मेराखी एक्रा पूणता मैठलिक अनुकूल बनावल गेला चे.
- 1:28–1:31इता एक्दम कोनो विदेशी भिया के, अपन बाटी मेरोपीक के,
- 1:32–1:37अपन पानी हवासे सीचाईजका अची, जैसे गाच सा अपन बाटी का सुगन्द आवेत अचे.
- 1:37–1:41जए से गाज सव आपन माटी कषुगन्त आवेत आजे
- 1:41–1:45तस पष्ट आजी जे मेठली गजल मात्र कोनो आयातित रुप नहीं
- 1:45–1:49बलकी आपन स्वतन्त्र नियम अबहावात्मक गेराए के संग
- 1:49–1:52ताहर एक तप पुशन आस्टषक्त काविविदा थेख
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मैथिली गजलक व्याकरन आवकर इतिहासक ये एक तवरिद समिखशा चे आशीश अंचनारा की पोठी उही ब्रान्ती के भिल्कुल दूर कर देता चे जे गजल मात्र वुर्दुदरी सीमिच्छेक आ ई फम्रा लोक निक सोजा इक ता एक दम स्वत्तन्त्र आप रामानेक मेठ्ली व्याक्रन राख हेता चे, जा इसा आहा तुरन्त एकर नियम भूजी सकब. तो पहल बात आहा गजल के कोनो सादारन चपल कविता नहीं मानी सके ची, इत वेद जका एक ता जीवन्त श्रुती प्रम्परात्थे, जग्रा मुख्यरुप से गावल जाएच्छेग आई ही कारन्सश एह में सही उच्चारन आम्मात्रक सतीक प्रयोग पर बहुत बेशी द्यान देल जाएच्छेग आब जेक्रा गावल जाएच्छेग तलगे ताल तहुबे करत आयात्या बाईतसि दोसर बात गजलक गजबक बनावद एकडज मुख्या अंग चे शेर उ मात्र दू पांतिक पून कविता हो इच्छेग एक रा सजेवाक लेल रदीप आख काफिया सन्नियम अच्छे तज्सोचु, जग अन्तमे दोहराएल जाईवाला समान, शब्द, रदीप, गजलक, शरीर थेख, तकी उक्रा सपहिल आबेवाला तुकान्त, स्वर, काफिया के, उकर दधकन नहीं कहल जासके तच्छे, जाई बिना गजल जीविते नहीं रहत. आब भेएची अन्तिम बात पर, भले इविद्धा अरभी आ वर्दुस आयल चेक, मुदा मैठली गजल खोकर कोनो हुबहु नकल बलकु नहीं थेग. अपन बाँदि के दियान मेराखी एक्रा पूणता मैठलिक अनुकूल बनावल गेला चे. इता एक्दम कोनो विदेशी भिया के, अपन बाटी मेरोपीक के, अपन पानी हवासे सीचाईजका अची, जैसे गाच सा अपन बाटी का सुगन्द आवेत अचे. जए से गाज सव आपन माटी कषुगन्त आवेत आजे तस पष्ट आजी जे मेठली गजल मात्र कोनो आयातित रुप नहीं बलकी आपन स्वतन्त्र नियम अबहावात्मक गेराए के संग ताहर एक तप पुशन आस्टषक्त काविविदा थेख