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मचण्ड_आ_गंगा_ब्रिजक_मंचीय_समीक्षा.m4a

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Part 1 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 1
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  1. 0:00–0:06अग, मैंने इदुनु नाटक का मंच्या समबभना पर आहसब गब कर अप.
  2. 0:06–0:19इग्दम, ता हमर पहल समिक्षा मचंद के लोक अची, मचंद नाटक में समवाद के माद्यम से कताक प्रिष्ट भूमी अस्पष्ट करबाख शैली द्रिष्ष्प्रबाव के कम कर रहल अची.
  3. 0:19–0:29सही कहलो, नाटक का पहल अ दोसर अंक मैं, जे हम नजर दी, तवकील अख्फिया अदिकालिक भीचक समवाद बहुत भेसी विस्त्रित अची.
  4. 0:29–0:35आजना उ लुल्हाक कता जे लगातार भेस साल सा भावादाम जा रहा लगची.
  5. 0:35–0:38बिल्कुल! वा उ कोट्रूम के लंबा एकालाप,
  6. 0:38–0:47कमजोरी इए ची, जे इ लंबा गप्षप गधना के दिखावाक बदला दर्षक के मात्र सुनावा रहा रहा लची.
  7. 0:47–0:52जैसा नाटक का लेए मने उकर पेसिंग एक्दम दिमा बहुजा एत ची.
  8. 0:52–0:56अपन्यास और रंग मन्च में मूल अंटर एते से असपष्ट हो एची
  9. 0:56–0:57एक दम सही
  10. 0:57–1:02अपन्यास में पाथक लंभा विवरनात्मक हिस्वा पड़बाख लेल तयार रहे थाची
  11. 1:02–1:06मुदा रंग मन्च एक ता द्रष्ष आ अ इस्ठानिक माद्ध्यम अचीना
  12. 1:06–1:10अब भूजलिय, अजगन अखरा केवल सुचनाक भारी भोज बहते तची, तो अखर द्यान भध की जाए तची.
  13. 1:11–1:15मुदा हम एठाम इशुच रहल ची, जे की इ लंभा समवाड वोज बहते तची,
  14. 1:15–1:21भीतल गतनाक विवरन्दे चतिन तम मन्ची ए उर्जा इस्तिर भजाता थाची.
  15. 1:21–1:25दर्षकक अवचेतन मोन गती अद्वन्दुख होजे थाची.
  16. 1:25–1:29उब वुजल ये अजगन अक्रा केवल सुचनाक भारी भोज बहते थाची,
  17. 1:29–1:32तो अकर द्यान भध की जाप्ती जाप्ती.
  18. 1:32–1:39मुदा हम एप हम इसोच रहल ची, जे की इ लंभा समवाद लेखकक उही प्रयासक हिस्सा न नहीं हैं,
  19. 1:39–1:42जते यो पूलिस तन्तरक जडिलता दिखावजा है तची.
  20. 1:42–1:48आहा, माने कखनो कखनो कानुनी दाव पेच भुजेबाक लेल प्रिष्टबूमी ता अवश्षक होईते आची.
  21. 1:48–1:50आप, प्रिष्टबूमी आवश्षक आची.
  22. 1:50–1:56मुदा कमजोरी उही सुचना कप्रस्टूति करन में आची, सुचना अपने आप में आप.
  23. 1:56–2:00सुचना देबाक इप तरीका नाटकक नाटकी दाके खतम कर रहलाची
  24. 2:00–2:03का इल हमर सुजाओ इव आची
  25. 2:03–2:08जे एह लंभा समवाद के चोट-चोट द्वन्वात्मक फिस्सा में बात दिलजाए
  26. 2:08–2:12अथवा, उक्रा कोनो शारीरिक क्रिया कलापक संगे प्रस्तुत काए जाए
  27. 2:12–2:20माने जते सुचना कोनो बहस वा तक्रावक परनामक रूप में बहर आबे, एक रार एक ता कंक्क्रीत उदारन परविजार करेच्छी.
  28. 2:20–2:26आप देको जखन वकील दवारा मुतलिव क्या गिरफ्तारीक विवरन डेल जार अहल अची,
  29. 2:26–2:29उक्रा केवलिक्ता लंबा बहाशनक रूप में नादाअके
  30. 2:29–2:31उक्रा खौफ्या अदिकारी अ वकीलक भीच
  31. 2:31–2:35भहेल तीख भहस के बीच में राखल जासके तची.
  32. 2:35–2:37बलक्ल जेना एडागे तची
  33. 2:37–2:39जे कोनो पूलीस पाणल पडल जार हैल है
  34. 2:39–2:42नकी कोनो जीवन्त पुच्ताच चली रहल है.
  35. 2:42–2:44वकील कोनो पाईलक पन्ना पलताइत,
  36. 2:44–2:46मुतालिफ दिस्तकाइत,
  37. 2:46–2:49तकन खुफ्या अदिकारी पर एक्ता चोट का सवाल दागाई तची.
  38. 2:49–2:54आओकर बाद खुफे आदिकारी ओकर जवाब बचाव के निहार मुद्रा मेदैतची
  39. 2:54–2:59आलबता इ मात्र एक ता उदारन आची जे एक रा कोना काएल जासकेटची
  40. 2:59–3:04आहा चाहब तक कोनो दोसर मनच्ये प्रविधिक उप्योग कै सकेची
  41. 3:04–3:10जेना मुतलिपक गवराहत के समानानतर रूप से कोनु शारीरिक काज से जोडगका
  42. 3:10–3:14मुदा मुल सिद्धानत इजी जे द्रिष्ष में तनाव पएदा करबाक लेल,
  43. 3:14–3:18शारीरिक हाँ बहाव अच्छोट तीक सवाल जबबक प्रहोग हूबाक चाही.
  44. 3:18–3:25एक्दम, जगन वकील आ अदिकारी मात्र गब करे च्छन तम उतलिफक पेना च्छन जाई तची.
  45. 3:25–3:30रंक मंज पर मान कखनो-कखनो समवाद से भेसी वाचाल होई तची.
  46. 3:30–3:37सही गवब, एना करभासव, कैट और माوس गेम जखा एक ता मंच्य गतिषिलता बने तची.
  47. 3:37–3:41दर्सक यी नहीं सोचत जी उक्रा सुचना देल जारहला ची
  48. 3:41–3:44बलकी उएक ता बड्दिक युद्ध का साख ची बनात.
  49. 3:44–3:50माने मुच्चन्द में समवादक सन्रचनापर गब करभा के बाद इचर्चा
  50. 3:50–3:53सबहाविक रूप सज गंगा ब्रिज देस मोडी जाए ची.
  51. 3:53–4:01गंगा ब्रिज नाटक में ब्रज्टाचारक विषे वस्तूके प्रस्तूकर बाखश्यली बहुत प्रत्यक्ष अस्पात बहुगे ल्चे.
  52. 4:01–4:05राद गंगा ब्रिज एक्ता याठार्थ वादि नाटक अची
  53. 4:05–4:10जदें एक ता पूल कर निरमान में भेल ब्रस्ताचार कर देखाओल गेलाची
  54. 4:10–4:16मुदा कमजोरी इए जी तेके बार आ अबहिंता के भीच जी ब्रस्ताचार के गव पची
  55. 4:16–4:20वोकरा बहुत खुजल अख्लनाएके रुपन प्रस्तुत कल गेलाची
  56. 4:20–4:25जेना उसब गब कराई चिष्ठ्हिन, जे सीमेंट में भालु मिलाईब अक्मिशन देप
  57. 4:25–4:35एक दम इज्दार्त वादी नाटक क तोडभेक नाटक ये आ एक तर्फा बनादे तची, जटै पात्र कुनो काटून कलनाएक जका ब्वहार करे तची
  58. 4:35–4:48मुदा एक ता प्रष्न अच्छे, कि एह से लेक्ह कम जे कडा राजनीतिक प्रार करबाक उदेश्छे सिक्व नहीं भोजाई ते, वास्तविक जीवन में तलोक इत्भे प्रत्यक्ष्वोक गुस कगब करे थ शतिन,
  59. 4:48–4:55वास्तविक जीवन में भुज़्क अगटा होगी तची, मुदा रंग मज पर एकर असर उल्टा होगी तची.
  60. 4:55–4:59जखन भ्रष्टचार के एक ता सामान न आदद सन्देख हाँल जाए तची,
  61. 4:59–5:02आप पात्र उक्रा अप्राद नहीं मानी के,
  62. 5:02–5:08अपन रख बुज़़़ची, तची तचन उदर्षक के लेल भेसी दरावा असर्दार साभी तची.
  63. 5:08–5:24वूज्यालिया जखन कोनो पात्र अपन कुक्रित्ते के बहुत सीथा तरीका से दर्षक के सोजा रक्ठ अची, तदर्षक के मस्तिषक उही पात्र के तुरन्त खराब श्रेनी में डाल के उकर गप प पर विचार कर अब बंद का दे टची.
  64. 5:24–5:54अदर बज़ाद बालू मिलैबा के गप नहीं कही के विवाहारेक मजबूरी या रेश्यो ठीक करवाक गब गब बालू मिलैबा के गब नहीं कही के विवावाहारेक मजबूरी या रेश्यो ठीक करवाक गब गब गब गब गब गब गब गब गब गब गब गब गब गब ग
  65. 5:54–6:06बिल्ल्कु उ कही सकेता ची जे साहाब मातिक प्रक्रती बुजाई ते ची इते ता मसाला उही ही सापस रक्वा में बलाई आची अ उपरक दवाब तो अहां जान्वे करे ची
  66. 6:06–6:13इस सुन्बा मे कत्तिक सामानिया लगेतची, मुदा एकर परिनाम पूल्ख रस्बाक रूप में बहयण कर हूई तचे.
  67. 6:13–6:21आप अस्पष्ट रूप से इस सब टेक्स्ट प्रस्थूत करबाक अनगिनत तरीका मेसा मात्र एक ता तरीका आचे.
  68. 6:21–6:29लेखक अपन हिसाब सकोनो आन सामाने अफिसक गबशव के सियो, ब्रस्टाचारक अवरनक रूप में लोज सके चति.
  69. 6:29–6:36सब टेक्स्ट का मुल का ज़ जी बाजल जारहल जी आजी भूजल जारहल जी उकर भीच क्याली जगग.
  70. 6:36–6:41अभी खाली जगग, उही खाली जगग मे दर्षक अपन कलपना सा अधभ़र आत छे.
  71. 6:41–6:47एक दम, हना रंट का एक तब रहुत प्रसिथ विचार अची, बूराई का सामाने करन,
  72. 6:47–6:52जकन कुनो थेकेदार चाः पीवाएत, हसेद बजेएत, बहुत आराम सा,
  73. 6:52–6:59पूलक फाँड़ेशन कमजोर, करबा गब, मसालाक अजस्टमेंत कही का करेच चे, तो अख्रा अपरादक बोध नहीं चे.
  74. 6:59–7:05इछीस दर्षक भीतर सहीला देते ची, के एक तई बूराई कुनो राख्षस सनेई,
  75. 7:05–7:09बल की हम्रा आजका सामाने लागे वाला लोग साभी रहा लची
  76. 7:09–7:13से तच्छे, इप्रत्यक्ष रूपसा हम ब्रष्ट ची,
  77. 7:13–7:17कहबासा हजार गुना भेसी राजनितिक रूपसा मारा कचे,
  78. 7:17–7:21दिश्छ में तनाव बहार सनई भीतर सावे तच्छे.
  79. 7:21–7:25सम्वाद आविशे वस्तुक यतार्थवाद पर चर्चाग बाद
  80. 7:25–7:30गप नाटकक द्रिष्ष शन्रच्ना अट्रान्जीशन दिस बड़ेटच्छे
  81. 7:30–7:35जे यतार्थवाद के मंच्पर किना कायम राखल जाए.
  82. 7:35–7:43गंगा ब्रिज्ँ में वर्तमान द्रिश अ फ्लाश्बैकक बीच अ द्रिश्ष परिवर्तन अचानक भोजाए तच्छे
  83. 7:43–7:46जैए से दर्षकक द्यान भंग भोजाए तच्छे
  84. 7:46–7:55अग, नाटक शुर्वात में मस्दूर सव, पूल पर काजकर रहल चती, गिटी तोडे रहल चती, अटकन अचानक दिष्छ बडलाएत अच्छे.
  85. 7:55–8:03आहम सब फलाश्बाक में स्वतन्त्रता दिवसक दिन बच्चा अशिच्षकक दवारा तिरंगा पहराईबाग द्रिष्ष्यमे चलीजाएच्छे.
  86. 8:03–8:08कमजोरी इई आचे, जे अट्ते कोनो सहज कडी नहीं आचे,
  87. 8:08–8:13जे एक समय काल सां, दोसर समय काल दहरी दर्षक के सुगमता सां लए जाए.
  88. 8:13–8:20बलकल, ये आचानक भेल बडलाव दर्षक जटका देटचे, आन नाटकक लेए तोडी देटचे.
  89. 8:20–8:27रंग मच पर आहां सिन्माग जे का तुरंद कटन ने कर सके ची, जताए वान सक्णड में फ्रेम बडली जायत चे.
  90. 8:27–8:32एक दम सही मच पर समय यात्रा बहुत नाजुख होई टच्छे.
  91. 8:32–8:37दर्षकक अवचेतन मन उही बडलाव लेल तयार ने रहे टच्छे.
  92. 8:37–8:43तैहमर सुज़ाव य अची जे दून्नू द्रिष्य के जोडबाक लिल कोनो दूनी,
  93. 8:43–8:45वा द्रिष्य प्रतीकक उप्योक काईल जाए,
  94. 8:45–8:52जैसा दर्षकक अवचेतन मन उही समयात्र लिल सहेज रूप सतएयार बहुऽ सकें.
  95. 8:52–8:57एक रेक्त तक क्क्रीत उदाहरन हम सब दोनेक माद्यम सलोस सकेची
  96. 8:57–9:01पहल द्रिष्व में जे दंका बजनार अची
  97. 9:01–9:06उक दंकाक अवाज जे मस्दूरा काज कलगत तैक कर अची
  98. 9:06–9:09उ दिरे दिरे इस्कूल के गन्ती
  99. 9:09–9:12वास वतन्त्रता दिवस का मारच का द्रम्बीट में
  100. 9:12–9:13बदली जावाख चाही.
  101. 9:13–9:16वाग, दंकाक ताल अहिना रहे
  102. 9:16–9:18आम वंच का प्रकाष बदली जाए.
  103. 9:18–9:20ये एक ता बहुत नीक सिनेमेटिक तक्नीक अची
  104. 9:20–9:23जे रंग मच पर सो हो बहुत निक काज करत्
  105. 9:23–9:26आपहेर सा एस पश्ट कोडी
  106. 9:26–9:28जे इद्रिष्ष परिवर्तनक का अनेकान
  107. 9:28–9:30समबनाई में सा
  108. 9:30–9:32मात्र एक ता उदारन अची
  109. 9:32–9:33लेखख चाहती
  110. 9:33–9:35तकोनो विषेश गी तक दून
  111. 9:35–9:38वा कोनो बहातिक प्रोप का उप्योख सा से हो
  112. 9:38–9:40इट्रन्जीशन कोसके इच्छती
  113. 9:40–9:44दोनिक संक्रमनक चे इआहा उदारन देलो हूँ
  114. 9:44–9:47उकर मनोवेग्यानेक आसर बहुत गहीर होई तची
  115. 9:47–9:50मनुश्षक मस्तक्ष द्रिश्ष बदलाओ सभेसी
  116. 9:50–9:52दोनी बदलाओ पर भरोसा करे तची
  117. 9:52–9:53से तचे
  118. 9:53–9:56जखन हत्फोडा के अवास बन्द बोजाएत
  119. 9:56–10:01अदंकाक भीट एक ता स्तिर मार्च्यों भीट में बडली जाएत छे
  120. 10:01–10:05ता दर्षक के मस्तिष्ट एक ता अद्रिष्ष्पौल पर चल लगेत
  121. 10:05–10:08औग जखन प्रकाश वापस वाप्सवाई तची
  122. 10:08–10:12अ मच्छ पर मज्दुरक बदला बच्चा सब तिरंगा लोके ताड रहे चतिन,
  123. 10:12–10:16तदर्षक बिना कोन जध्पाक अटीत मे प्रवेश कै जाईत ची.
  124. 10:16–10:20एह से अटीत अवर्त मानक भीचक विरोदा भास,
  125. 10:20–10:24बिना किच्छु बजने एक दम सपष्ट बहुजाएत.
  126. 10:24–10:29उमस्दूर जे आई गिट्टी तोडी रहल चतिन, उहक अकनो बच्चा चला,
  127. 10:29–10:33जकरा स्वत्ट्ट्रताक उजगर भविष्षक सपना देखाल गेल चल.
  128. 10:33–10:40एक दम द्हनी की पुल उही सपना अख्कत्फोर वास्ट्विक्ता के एक तोसरा से जोडी देताची.
  129. 10:40–10:45गजजेंदर ताकृर की इनाटक समाजिक और आजनितिक रूप सब बहुत सचेत अची
  130. 10:45–10:49बसोख्रा रंग मनची अ व्याक्रन के हिसाब समानजावा कावष्ष्च्ता आची
  131. 10:49–10:55तद समिक्षाक अंत में हम सब आपन मुख्यबिन्दू सब की संख्षेप मेराखिदी
  132. 10:55–11:02पहल, मच्चन्द मे समवाद के चोट का द्वन्दात्मक हिस्चा मे बाडी द्रश्षे प्रभाव बड़ाएब.
  133. 11:02–11:07दो सर गंगा ब्रिज में राजनितिग गप के सब टेक्ष्ट के रूप मे रख्खफ,
  134. 11:07–11:11जतिये ब्रष्टा चार एक ता रोज मर्राक व्यवावार जका लागाई
  135. 11:11–11:19आ, तेशर द्रष्ष्य परिवर्टन के आचानक नहीं करके, कोनो द्वनिक माद्ध्यम से सहथ बनाएब
  136. 11:19–11:23इसब कुछ खोस और रचनात्मक सुजावची
  137. 11:23–11:25जही से आही नातकक प्रभाव
  138. 11:25–11:27आवर भेशी सशक्त बहुऽसकेत अचे
  139. 11:27–11:31भिल्कुल, लेककक मूल उदेश बहुत नीक अचे
  140. 11:31–11:33बसी चिटबुत सुदार से
  141. 11:33–11:35मनची यप्रस्तुती निक्धाएत
  142. 11:35–11:49अब और बद़ागा और बद़ागा और बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा

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अग, मैंने इदुनु नाटक का मंच्या समबभना पर आहसब गब कर अप. इग्दम, ता हमर पहल समिक्षा मचंद के लोक अची, मचंद नाटक में समवाद के माद्यम से कताक प्रिष्ट भूमी अस्पष्ट करबाख शैली द्रिष्ष्प्रबाव के कम कर रहल अची. सही कहलो, नाटक का पहल अ दोसर अंक मैं, जे हम नजर दी, तवकील अख्फिया अदिकालिक भीचक समवाद बहुत भेसी विस्त्रित अची. आजना उ लुल्हाक कता जे लगातार भेस साल सा भावादाम जा रहा लगची. बिल्कुल! वा उ कोट्रूम के लंबा एकालाप, कमजोरी इए ची, जे इ लंबा गप्षप गधना के दिखावाक बदला दर्षक के मात्र सुनावा रहा रहा लची. जैसा नाटक का लेए मने उकर पेसिंग एक्दम दिमा बहुजा एत ची. अपन्यास और रंग मन्च में मूल अंटर एते से असपष्ट हो एची एक दम सही अपन्यास में पाथक लंभा विवरनात्मक हिस्वा पड़बाख लेल तयार रहे थाची मुदा रंग मन्च एक ता द्रष्ष आ अ इस्ठानिक माद्ध्यम अचीना अब भूजलिय, अजगन अखरा केवल सुचनाक भारी भोज बहते तची, तो अखर द्यान भध की जाए तची. मुदा हम एठाम इशुच रहल ची, जे की इ लंभा समवाड वोज बहते तची, भीतल गतनाक विवरन्दे चतिन तम मन्ची ए उर्जा इस्तिर भजाता थाची. दर्षकक अवचेतन मोन गती अद्वन्दुख होजे थाची. उब वुजल ये अजगन अक्रा केवल सुचनाक भारी भोज बहते थाची, तो अकर द्यान भध की जाप्ती जाप्ती. मुदा हम एप हम इसोच रहल ची, जे की इ लंभा समवाद लेखकक उही प्रयासक हिस्सा न नहीं हैं, जते यो पूलिस तन्तरक जडिलता दिखावजा है तची. आहा, माने कखनो कखनो कानुनी दाव पेच भुजेबाक लेल प्रिष्टबूमी ता अवश्षक होईते आची. आप, प्रिष्टबूमी आवश्षक आची. मुदा कमजोरी उही सुचना कप्रस्टूति करन में आची, सुचना अपने आप में आप. सुचना देबाक इप तरीका नाटकक नाटकी दाके खतम कर रहलाची का इल हमर सुजाओ इव आची जे एह लंभा समवाद के चोट-चोट द्वन्वात्मक फिस्सा में बात दिलजाए अथवा, उक्रा कोनो शारीरिक क्रिया कलापक संगे प्रस्तुत काए जाए माने जते सुचना कोनो बहस वा तक्रावक परनामक रूप में बहर आबे, एक रार एक ता कंक्क्रीत उदारन परविजार करेच्छी. आप देको जखन वकील दवारा मुतलिव क्या गिरफ्तारीक विवरन डेल जार अहल अची, उक्रा केवलिक्ता लंबा बहाशनक रूप में नादाअके उक्रा खौफ्या अदिकारी अ वकीलक भीच भहेल तीख भहस के बीच में राखल जासके तची. बलक्ल जेना एडागे तची जे कोनो पूलीस पाणल पडल जार हैल है नकी कोनो जीवन्त पुच्ताच चली रहल है. वकील कोनो पाईलक पन्ना पलताइत, मुतालिफ दिस्तकाइत, तकन खुफ्या अदिकारी पर एक्ता चोट का सवाल दागाई तची. आओकर बाद खुफे आदिकारी ओकर जवाब बचाव के निहार मुद्रा मेदैतची आलबता इ मात्र एक ता उदारन आची जे एक रा कोना काएल जासकेटची आहा चाहब तक कोनो दोसर मनच्ये प्रविधिक उप्योग कै सकेची जेना मुतलिपक गवराहत के समानानतर रूप से कोनु शारीरिक काज से जोडगका मुदा मुल सिद्धानत इजी जे द्रिष्ष में तनाव पएदा करबाक लेल, शारीरिक हाँ बहाव अच्छोट तीक सवाल जबबक प्रहोग हूबाक चाही. एक्दम, जगन वकील आ अदिकारी मात्र गब करे च्छन तम उतलिफक पेना च्छन जाई तची. रंक मंज पर मान कखनो-कखनो समवाद से भेसी वाचाल होई तची. सही गवब, एना करभासव, कैट और माوس गेम जखा एक ता मंच्य गतिषिलता बने तची. दर्सक यी नहीं सोचत जी उक्रा सुचना देल जारहला ची बलकी उएक ता बड्दिक युद्ध का साख ची बनात. माने मुच्चन्द में समवादक सन्रचनापर गब करभा के बाद इचर्चा सबहाविक रूप सज गंगा ब्रिज देस मोडी जाए ची. गंगा ब्रिज नाटक में ब्रज्टाचारक विषे वस्तूके प्रस्तूकर बाखश्यली बहुत प्रत्यक्ष अस्पात बहुगे ल्चे. राद गंगा ब्रिज एक्ता याठार्थ वादि नाटक अची जदें एक ता पूल कर निरमान में भेल ब्रस्ताचार कर देखाओल गेलाची मुदा कमजोरी इए जी तेके बार आ अबहिंता के भीच जी ब्रस्ताचार के गव पची वोकरा बहुत खुजल अख्लनाएके रुपन प्रस्तुत कल गेलाची जेना उसब गब कराई चिष्ठ्हिन, जे सीमेंट में भालु मिलाईब अक्मिशन देप एक दम इज्दार्त वादी नाटक क तोडभेक नाटक ये आ एक तर्फा बनादे तची, जटै पात्र कुनो काटून कलनाएक जका ब्वहार करे तची मुदा एक ता प्रष्न अच्छे, कि एह से लेक्ह कम जे कडा राजनीतिक प्रार करबाक उदेश्छे सिक्व नहीं भोजाई ते, वास्तविक जीवन में तलोक इत्भे प्रत्यक्ष्वोक गुस कगब करे थ शतिन, वास्तविक जीवन में भुज़्क अगटा होगी तची, मुदा रंग मज पर एकर असर उल्टा होगी तची. जखन भ्रष्टचार के एक ता सामान न आदद सन्देख हाँल जाए तची, आप पात्र उक्रा अप्राद नहीं मानी के, अपन रख बुज़़़ची, तची तचन उदर्षक के लेल भेसी दरावा असर्दार साभी तची. वूज्यालिया जखन कोनो पात्र अपन कुक्रित्ते के बहुत सीथा तरीका से दर्षक के सोजा रक्ठ अची, तदर्षक के मस्तिषक उही पात्र के तुरन्त खराब श्रेनी में डाल के उकर गप प पर विचार कर अब बंद का दे टची. अदर बज़ाद बालू मिलैबा के गप नहीं कही के विवाहारेक मजबूरी या रेश्यो ठीक करवाक गब गब बालू मिलैबा के गब नहीं कही के विवावाहारेक मजबूरी या रेश्यो ठीक करवाक गब गब गब गब गब गब गब गब गब गब गब गब गब गब ग बिल्ल्कु उ कही सकेता ची जे साहाब मातिक प्रक्रती बुजाई ते ची इते ता मसाला उही ही सापस रक्वा में बलाई आची अ उपरक दवाब तो अहां जान्वे करे ची इस सुन्बा मे कत्तिक सामानिया लगेतची, मुदा एकर परिनाम पूल्ख रस्बाक रूप में बहयण कर हूई तचे. आप अस्पष्ट रूप से इस सब टेक्स्ट प्रस्थूत करबाक अनगिनत तरीका मेसा मात्र एक ता तरीका आचे. लेखक अपन हिसाब सकोनो आन सामाने अफिसक गबशव के सियो, ब्रस्टाचारक अवरनक रूप में लोज सके चति. सब टेक्स्ट का मुल का ज़ जी बाजल जारहल जी आजी भूजल जारहल जी उकर भीच क्याली जगग. अभी खाली जगग, उही खाली जगग मे दर्षक अपन कलपना सा अधभ़र आत छे. एक दम, हना रंट का एक तब रहुत प्रसिथ विचार अची, बूराई का सामाने करन, जकन कुनो थेकेदार चाः पीवाएत, हसेद बजेएत, बहुत आराम सा, पूलक फाँड़ेशन कमजोर, करबा गब, मसालाक अजस्टमेंत कही का करेच चे, तो अख्रा अपरादक बोध नहीं चे. इछीस दर्षक भीतर सहीला देते ची, के एक तई बूराई कुनो राख्षस सनेई, बल की हम्रा आजका सामाने लागे वाला लोग साभी रहा लची से तच्छे, इप्रत्यक्ष रूपसा हम ब्रष्ट ची, कहबासा हजार गुना भेसी राजनितिक रूपसा मारा कचे, दिश्छ में तनाव बहार सनई भीतर सावे तच्छे. सम्वाद आविशे वस्तुक यतार्थवाद पर चर्चाग बाद गप नाटकक द्रिष्ष शन्रच्ना अट्रान्जीशन दिस बड़ेटच्छे जे यतार्थवाद के मंच्पर किना कायम राखल जाए. गंगा ब्रिज्ँ में वर्तमान द्रिश अ फ्लाश्बैकक बीच अ द्रिश्ष परिवर्तन अचानक भोजाए तच्छे जैए से दर्षकक द्यान भंग भोजाए तच्छे अग, नाटक शुर्वात में मस्दूर सव, पूल पर काजकर रहल चती, गिटी तोडे रहल चती, अटकन अचानक दिष्छ बडलाएत अच्छे. आहम सब फलाश्बाक में स्वतन्त्रता दिवसक दिन बच्चा अशिच्षकक दवारा तिरंगा पहराईबाग द्रिष्ष्यमे चलीजाएच्छे. कमजोरी इई आचे, जे अट्ते कोनो सहज कडी नहीं आचे, जे एक समय काल सां, दोसर समय काल दहरी दर्षक के सुगमता सां लए जाए. बलकल, ये आचानक भेल बडलाव दर्षक जटका देटचे, आन नाटकक लेए तोडी देटचे. रंग मच पर आहां सिन्माग जे का तुरंद कटन ने कर सके ची, जताए वान सक्णड में फ्रेम बडली जायत चे. एक दम सही मच पर समय यात्रा बहुत नाजुख होई टच्छे. दर्षकक अवचेतन मन उही बडलाव लेल तयार ने रहे टच्छे. तैहमर सुज़ाव य अची जे दून्नू द्रिष्य के जोडबाक लिल कोनो दूनी, वा द्रिष्य प्रतीकक उप्योक काईल जाए, जैसा दर्षकक अवचेतन मन उही समयात्र लिल सहेज रूप सतएयार बहुऽ सकें. एक रेक्त तक क्क्रीत उदाहरन हम सब दोनेक माद्यम सलोस सकेची पहल द्रिष्व में जे दंका बजनार अची उक दंकाक अवाज जे मस्दूरा काज कलगत तैक कर अची उ दिरे दिरे इस्कूल के गन्ती वास वतन्त्रता दिवस का मारच का द्रम्बीट में बदली जावाख चाही. वाग, दंकाक ताल अहिना रहे आम वंच का प्रकाष बदली जाए. ये एक ता बहुत नीक सिनेमेटिक तक्नीक अची जे रंग मच पर सो हो बहुत निक काज करत् आपहेर सा एस पश्ट कोडी जे इद्रिष्ष परिवर्तनक का अनेकान समबनाई में सा मात्र एक ता उदारन अची लेखख चाहती तकोनो विषेश गी तक दून वा कोनो बहातिक प्रोप का उप्योख सा से हो इट्रन्जीशन कोसके इच्छती दोनिक संक्रमनक चे इआहा उदारन देलो हूँ उकर मनोवेग्यानेक आसर बहुत गहीर होई तची मनुश्षक मस्तक्ष द्रिश्ष बदलाओ सभेसी दोनी बदलाओ पर भरोसा करे तची से तचे जखन हत्फोडा के अवास बन्द बोजाएत अदंकाक भीट एक ता स्तिर मार्च्यों भीट में बडली जाएत छे ता दर्षक के मस्तिष्ट एक ता अद्रिष्ष्पौल पर चल लगेत औग जखन प्रकाश वापस वाप्सवाई तची अ मच्छ पर मज्दुरक बदला बच्चा सब तिरंगा लोके ताड रहे चतिन, तदर्षक बिना कोन जध्पाक अटीत मे प्रवेश कै जाईत ची. एह से अटीत अवर्त मानक भीचक विरोदा भास, बिना किच्छु बजने एक दम सपष्ट बहुजाएत. उमस्दूर जे आई गिट्टी तोडी रहल चतिन, उहक अकनो बच्चा चला, जकरा स्वत्ट्ट्रताक उजगर भविष्षक सपना देखाल गेल चल. एक दम द्हनी की पुल उही सपना अख्कत्फोर वास्ट्विक्ता के एक तोसरा से जोडी देताची. गजजेंदर ताकृर की इनाटक समाजिक और आजनितिक रूप सब बहुत सचेत अची बसोख्रा रंग मनची अ व्याक्रन के हिसाब समानजावा कावष्ष्च्ता आची तद समिक्षाक अंत में हम सब आपन मुख्यबिन्दू सब की संख्षेप मेराखिदी पहल, मच्चन्द मे समवाद के चोट का द्वन्दात्मक हिस्चा मे बाडी द्रश्षे प्रभाव बड़ाएब. दो सर गंगा ब्रिज में राजनितिग गप के सब टेक्ष्ट के रूप मे रख्खफ, जतिये ब्रष्टा चार एक ता रोज मर्राक व्यवावार जका लागाई आ, तेशर द्रष्ष्य परिवर्टन के आचानक नहीं करके, कोनो द्वनिक माद्ध्यम से सहथ बनाएब इसब कुछ खोस और रचनात्मक सुजावची जही से आही नातकक प्रभाव आवर भेशी सशक्त बहुऽसकेत अचे भिल्कुल, लेककक मूल उदेश बहुत नीक अचे बसी चिटबुत सुदार से मनची यप्रस्तुती निक्धाएत अब और बद़ागा और बद़ागा और बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा बद़ागा

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