MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID
मैथिली_साहित्य_का_दबाया_गया_बहुजन_इतिहास.m4a
Timestamped machine output
- 0:00–0:05यहा मैथिली साहित्य के समानान्तर इतिहास पर आपका तवरिद सार है
- 0:05–0:12गजेंद्र ताकृर की किताब अप परलेल लिज़्ी अप मिठिला अन मैथिली लिट्रीचर उजागर करती है,
- 0:12–0:17कि कैसे मुख्ध्यदाराने मैथिली के अस्ली बहुजन इतिहास को दबाया,
- 0:17–0:22और क्यों एक दिजिटल आन्दोलन इस सच्चाई को वापस ला रहा है.
- 0:22–0:24पहला मुख्हे दारा का एक आदिकार.
- 0:24–0:31देखे साहित ते अकादमी जैसी संस्त्ठाओने सर्फ सवरन अख्यानो को बड़ावा दिया.
- 0:31–0:36दूशशन पानजी यानी पूराने वन्शावली रिकोड़्स को चिपा दिया गया,
- 0:36–0:42ताकी महान दाशने गंगेश उपाद्याय की पतनी के चर्मकार होने की सच्चाई दबी रहे.
- 0:42–0:44रूडिवाद पर चोट करने व्यंगेकार
- 0:44–0:47रही मोहनजां को भी पुरसकारों से दूर रख्खागया.
- 0:47–0:51जरा सोच ये क्या संस्त्ठागत इतिहास किसी
- 0:51–0:54वियापी कलप की तरह है, जो अस्ली लेखखों को
- 0:54–0:57बहार ही रोग देता है, दूस्रा अस्ली जने
- 0:57–0:59अर विद्यापती की पुनर खोज
- 0:59–1:01मैठिली का सच्चा आदार
- 1:01–1:04आप्वी से बारवी सदी के बोध चर्यापडो में है
- 1:04–1:07ये इतिहाज मश्हुर कवी विद्यापती को
- 1:07–1:09महस दरबारी ब्रामहन नहीं
- 1:09–1:11बलकी एक विद्रोही मानता है
- 1:11–1:16जिनोंने संख्रिच छोड देसिल भयना यानी आम जन्ता की बाशा चुनी.
- 1:16–1:20तो क्या हम अपने नायकों को उनके अस्ली विद्रो ही रूप में जानते है,
- 1:20–1:24या स्व्फ उस्रूप में जो सत्ता ने हमें परोसा है.
- 1:24–1:26अन्त में, दिजितल क्रानती.
- 1:26–1:30आप को हरानी होगी की मैठली एक डोनर भाशा थी,
- 1:30–1:33जिसने आसम के अंक्या नाट को आखार दिया.
- 1:33–1:38आज विदे ही जरनल प्राछीन, तिरहुतालीपी और किताबों को दिजिटाइस कर के,
- 1:38–1:41इन पहरे दारों को दरकिनार कर रहा है.
- 1:41–1:44ये बिल्कुल अपन सोर्स टेकनोलूँजी कितरा है,
- 1:44–1:47जिसने ग्यान को कुछ लोगों की मुथही से निकाल कर
- 1:47–1:49पूरी तरहल लोप तान्तरिक बना दिया है.
- 1:49–1:54संख्षेप में कहें तो मैह्तिली साहित्तिका ये समानांतर एतिहास
- 1:54–1:56केवल पुरानी किताबों का लेखा जोखा नहीं है,
- 1:57–1:58बलकी ये तकनीग के जरये,
- 1:59–2:01हाश्ये पर पडे वरगों के सम्मान
- 2:01–2:04और सानस्क्रितिक पहचान को वापस चीनने का एक जबर्दध संगर्ष है.
Plain text
यहा मैथिली साहित्य के समानान्तर इतिहास पर आपका तवरिद सार है गजेंद्र ताकृर की किताब अप परलेल लिज़्ी अप मिठिला अन मैथिली लिट्रीचर उजागर करती है, कि कैसे मुख्ध्यदाराने मैथिली के अस्ली बहुजन इतिहास को दबाया, और क्यों एक दिजिटल आन्दोलन इस सच्चाई को वापस ला रहा है. पहला मुख्हे दारा का एक आदिकार. देखे साहित ते अकादमी जैसी संस्त्ठाओने सर्फ सवरन अख्यानो को बड़ावा दिया. दूशशन पानजी यानी पूराने वन्शावली रिकोड़्स को चिपा दिया गया, ताकी महान दाशने गंगेश उपाद्याय की पतनी के चर्मकार होने की सच्चाई दबी रहे. रूडिवाद पर चोट करने व्यंगेकार रही मोहनजां को भी पुरसकारों से दूर रख्खागया. जरा सोच ये क्या संस्त्ठागत इतिहास किसी वियापी कलप की तरह है, जो अस्ली लेखखों को बहार ही रोग देता है, दूस्रा अस्ली जने अर विद्यापती की पुनर खोज मैठिली का सच्चा आदार आप्वी से बारवी सदी के बोध चर्यापडो में है ये इतिहाज मश्हुर कवी विद्यापती को महस दरबारी ब्रामहन नहीं बलकी एक विद्रोही मानता है जिनोंने संख्रिच छोड देसिल भयना यानी आम जन्ता की बाशा चुनी. तो क्या हम अपने नायकों को उनके अस्ली विद्रो ही रूप में जानते है, या स्व्फ उस्रूप में जो सत्ता ने हमें परोसा है. अन्त में, दिजितल क्रानती. आप को हरानी होगी की मैठली एक डोनर भाशा थी, जिसने आसम के अंक्या नाट को आखार दिया. आज विदे ही जरनल प्राछीन, तिरहुतालीपी और किताबों को दिजिटाइस कर के, इन पहरे दारों को दरकिनार कर रहा है. ये बिल्कुल अपन सोर्स टेकनोलूँजी कितरा है, जिसने ग्यान को कुछ लोगों की मुथही से निकाल कर पूरी तरहल लोप तान्तरिक बना दिया है. संख्षेप में कहें तो मैह्तिली साहित्तिका ये समानांतर एतिहास केवल पुरानी किताबों का लेखा जोखा नहीं है, बलकी ये तकनीग के जरये, हाश्ये पर पडे वरगों के सम्मान और सानस्क्रितिक पहचान को वापस चीनने का एक जबर्दध संगर्ष है.