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मैथिली_गजलक_व्याकरणक_एक्स-रे.m4a

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Part 1 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 1
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  1. 0:00–0:08जे हम कहब जे मैंने बहावना, प्रेम अ तुतल मोन, जक्रा हम्रा सब अक्सर कविता कविता कोहसा में हेरायल मानेच्छी,
  2. 0:08–0:13उक्रो एक ता एक्सरे रिपोट बहुत बहुत सके च्या, तक की इपत्याए बो योग्या च्?
  3. 0:13–0:15उ पत्याएप तकनी मुष्किल चाहें
  4. 0:15–0:19करन साहित्यक दून्या क्या अविषेश का कविता के
  5. 0:19–0:23सादारन तया एक ता मैंने दाइगनोस्टिक मर्टी वाटर्स
  6. 0:23–0:25या अस्पष्ट ताक प्रतिक मानल जाईतें
  7. 0:25–0:26आग्दम
  8. 0:26–0:28जद ते सब किष आमुर्त आची
  9. 0:28–0:58या दो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
  10. 0:58–1:01मेठली गजलक व्याक्रन और इतिहास
  11. 1:01–1:04इप वो थी इब्रम पुन रुपन तोड देताची
  12. 1:04–1:08जगजल बस किछ सुन्दर शबदक जोड वा प्रेम गीत आच
  13. 1:08–1:12औह, मने गजल सर्फ प्रेम गीत नहीं आची
  14. 1:12–1:14नहीं, एक दम नहीं
  15. 1:14–1:16इई स्पस्ट करे तची के गजल एक ता
  16. 1:16–1:20अगर उगर कछोर व्याक्रन के बहुत सुगम्तासा हम्रा सब के समख्ष रख है तची.
  17. 1:20–1:23अगर इविमर्श हमरा सब के इदिखावत
  18. 1:23–1:25जे कोना एक ता विदेशी काभ्यविदा
  19. 1:25–1:27मितलाक माटी में रच्भसी गल
  20. 1:27–1:29अच्छा, आई बहत महत्वोपोण आची
  21. 1:29–1:31दिखो, ग्यान उही समय
  22. 1:31–1:34सब से बेसी मुल्यवान होई तची
  23. 1:34–1:36जखन उक्रा बुजल आ लागु कल जाए.
  24. 1:36–1:37से तचाय?
  25. 1:37–1:40इपोती गजल को उही जटिलता के
  26. 1:40–1:41उकर इतिहास के
  27. 1:41–1:43आवकर कत्हुर व्याक्रन के
  28. 1:43–1:46बहुत सुगमतासा हमरा सब के समक्ष रखगत आजी.
  29. 1:46–1:47हाँ.
  30. 1:47–1:49मुदा एक ता बाज जे पोती खोलताई
  31. 1:49–1:51सब से पहले द्याना कर्षिट करे तची
  32. 1:51–1:53औह आची लेक्खक तेवर
  33. 1:53–1:55तेवर? माने कोहन देवर?
  34. 1:55–1:58मैंने सदारना काद्मिक पोती बहुत विनम्र होई तची ना
  35. 1:58–2:00हमर चोट सन प्रयास अची वला बहु
  36. 2:00–2:02मुदा अचिनार जिक सुवात
  37. 2:02–2:04इक्दम सख्त चेतावनी से होईता ची
  38. 2:04–2:06अच्छा, की लिख़े चाती ही हो?
  39. 2:06–2:08उस पष्ट लिख़े चाती,
  40. 2:08–2:10जे जे बिना पडे तर्क्वितर करे चाती
  41. 2:10–2:12या जे जात, दर्म, उम्र
  42. 2:12–2:14वापप देक्कर बात माने चाती
  43. 2:14–2:16तिनका लेल इपोती नही आची
  44. 2:16–2:19बापरे, इतो बदाक्रामक शुर्वात भेल
  45. 2:19–2:25ये ता, मुदद तनी सुचु की इत फोरे भीसी आहंकार पूरन न नहीं लागी रहल चे
  46. 2:25–2:30कोनो नवका लेखख, वरष्लोकनिक के एना सीधही नकारी देई
  47. 2:30–2:34इत यह यह नाजनिती जका भेल, एकर अखे रर्थध की भेल
  48. 2:34–2:37उ प्रद्द्द्र्ष्ट्या इहांके अहंकार लागी सकेता ची
  49. 2:37–2:41मुदे एकर पाच्टा एक दाईटा बहुत बाएक पीला असंगर्ष अचे
  50. 2:41–2:43पीडा, के हन पीडा?
  51. 2:43–2:47मने लेक्खक बहुत निदरता सां साहिट्यक दून्याक
  52. 2:47–2:50एक तक कतु सत्यके त्ुजागर कर रहल चती
  53. 2:50–2:55औव आची गजल कार सबक भीचक बहावनात्मक ब्लाक्मेलिं
  54. 2:55–2:59है बहावनात्मक ब्लाक्मेलिं सहित में
  55. 2:59–3:01इतो कुठ्रिलर सिन्माजका भेल
  56. 3:01–3:03आप सुनी में अजीब लगे चे
  57. 3:03–3:05एक रा तनी विस्तार ससमजाओ
  58. 3:05–3:10जए इखुना काज करेतचे, मेंने कविता लिख़ावाक लिल के कख्रा ब्लैक्मेल कर रहलचे.
  59. 3:10–3:14देखु, जगन कोनो विद्धान नुका नुका आवी रहल होई तची,
  60. 3:14–3:19वा उकर व्याक्रन तबहरल होई तची, तक किचु अस्थापित वरष्ट लोक,
  61. 3:19–3:23अगरा आपन हिसाप समोड़ चाहे चथी
  62. 3:23–3:26आचा आपन वर्च्छवा दिखावा चाहे चथी
  63. 3:26–3:30बलकुल अन चिनार जी बतभैच्चतीन जे किचु लोक कही चला
  64. 3:30–3:34जे जगजालक व्याक्रन में हुनका चुट नहीं देलगेल
  65. 3:34–3:39वा हुनक गलत व्याक्रन के मानी नहीं लेल गेल, ता उ गजल लिख़ चोड देता.
  66. 3:39–3:45अहो! माने हमर बात मानु, नेत हम खेलगे न करव वलागव?
  67. 3:45–3:49एक दम सही पकल लहु आपर लेखखक रवाया इस पष्ट आची,
  68. 3:49–4:19जे कोनो एक व्यक्तिक एमोट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट
  69. 4:19–4:24तश्स्स्स्स्साथ द्हरी जीवन्युग जे कविष्वर जीवन्जाक नाम पर अची
  70. 4:24–4:27और 2008 अईचिनहार युग
  71. 4:27–4:30एक दम सही, इज्ग विबाजन बड महत्वो पूँच़,
  72. 4:30–4:35इदेखा रहा लगची, जे गजजल कोना एक ता नव्रुप लव रहा लगची.
  73. 4:35–4:39मैं, जीवन जा मेठलिक पहिल गजल कार मनल जैट चतिना
  74. 4:39–4:44हा, मोदा 2008 का बाद जे अंचिनार युग आची
  75. 4:44–4:48उ मेठलिग गजल के उर्दूव लहिंदी का चाहुर सां
  76. 4:48–4:53निकाल क, उक्रा पोड रुपेण मेठलिक कष्वतन्त्र अन्यम बद्ध,
  77. 4:53–4:57बद्ध, विद्धा करुप में स्थापित करवा क्रान्ती आचे
  78. 4:57–4:58कमाल चे
  79. 4:59–5:01और इक रान्ती कोना बहुर आचे
  80. 5:01–5:04उकर तरीका हमरा बहुत रुमाचित के लग
  81. 5:04–5:05कोना?
  82. 5:05–5:06की निक लागल हैं के?
  83. 5:06–5:10मने गजल, मुल रुप सा, अरभी, और फारसिक माटी सा आए लग चे
  84. 5:10–5:16अखर आपन प्रतिक वा सिम्बल्स आफी जेना सराब, सुराही, साकी
  85. 5:16–5:20मुदा अचिनार जीजे मेठली करन केली हैज, उ कमाल आफी
  86. 5:20–5:23आप उ थेट मेठली में परिनत कदेल निएगरा
  87. 5:23–5:28इत जेना कोनो विदेशी पक्वान के आपन गाँँ का मसाला देका बनावजे का भाल
  88. 5:40–5:41तफिर कखर होई चे
  89. 5:41–5:43ओ अनुवाज संस्क्रते कोई तची
  90. 5:43–5:47इक दम पोथी में जिना मैं माने शराब के लेल
  91. 5:47–5:49ताली शबद के सुजाओ दिल गे लेची
  92. 5:49–5:51ताली बद्स थानी ये शबद चबद चे
  93. 5:51–5:55आ, मीना वा सुराही जे गजल मे बहुत प्रेउग होई चे
  94. 5:55–5:59अखरा मेतली में दाबा, कथिया वलबनी कहवाग बाध बहल अचे
  95. 5:59–6:01और साकी कलेल
  96. 6:01–6:04साकी जे शराब परसेवाला होई तचे
  97. 6:04–6:05अखरा लिल पासी बहाई
  98. 6:05–6:09बाप्रे, इत आए गदम गाँवोग द्रिष्ष बनीगल
  99. 6:09–6:12आँ मैखाना बनीगल ताडी काना वब पस काना
  100. 6:12–6:16देखू जखन के हो मीना वा मैखाना पडेतचे
  101. 6:16–6:20ता एक ता मैठल पाटख कमोन में उ चित्र बोछद पराया लगे तचे
  102. 6:20–6:22आप, कनेट नहीं भापाबी चे
  103. 6:22–6:27मुदा लबनी आ ताडी काना कहतें उ सीधा मिठला के गाँउक गाची
  104. 6:27–6:30अदे का परिवेर्से जुड़ायता ची
  105. 6:30–6:34गजलक भावना सीदे पाथक का माटी सन जुड़ायता ची
  106. 6:34–6:38मने इग गजलक आतमाक ठेट मेठली करना चे
  107. 6:38–6:39बिल्ल्कुल
  108. 6:39–6:42मुदा सबस भेशी जाम्रा सोचबा पर मजबोर के लग
  109. 6:42–6:43औग रुस्न कपरिबाशा चाल
  110. 6:43–6:45अज्छन, माने, बूटी, ना?
  111. 6:45–6:48आम तोर पर गजल में जूजन सूनके,
  112. 6:48–6:51कोनो सुन्दर स्त्रीक कलपना मान में होईता चे.
  113. 6:51–6:55आँ, जूजन के लेका एक ता बहुत प्यग ब्रानती आ ची,
  114. 6:55–6:58जे ई मात्र स्त्रीक सुन्दरता क लेल प्रहोग होईता चे.
  115. 6:58–7:01मुता लेखा के क्या सुन्राई कही चत्थी?
  116. 7:01–7:04सुन्राई इस शब्द कतिक मीट है.
  117. 7:04–7:07आँ अस्पस्ट करी चत्थी, जे सुन्राई मात्र स्त्रीक नहीं,
  118. 7:07–7:10बलकी कोनो भी सजी वनिर्जी वस्तुक बहुसकी चे.
  119. 7:10–7:12मने जना अप्रक्रतिक के सुन्राई.
  120. 7:12–7:19यक दम गाजबिलिच, नदी, माटी, भोरक रोद, सबबख आपन हुसना ची, आपन सुनराय आची.
  121. 7:19–7:22इगजलक परिदिके बहुत व्यापक कदे तची.
  122. 7:22–7:28इगजलक बहुत आवश्यक चल, इस्तानिय प्रतिक गजलके मैठिलिक आपन अबहिन आंग बनाबा में,
  123. 7:28–7:30बहुत प्यग भूमिकाने बहुवाईता ची
  124. 7:30–7:32इजे व्यापकता आची
  125. 7:32–7:34इज श्रफ प्रतीक दरी सीमित नहीं चे
  126. 7:34–7:36अच्छा, तो और को टे चे?
  127. 7:36–7:40जखन पोठी में गजलक मूल विश्य इश्क वाप्रेम प्रचर्चा आब इच्छे
  128. 7:40–7:45अग, आगा का की शारा उही तुलना दिसची नहीं, आग, एठ हम बाता ब और भीशी रोचक बजाइच्छे,
  129. 7:45–7:50इदेखी का आश्चरे होई चे, जे दुन्याक दूटा बिलकुल अलक कुना में,
  130. 7:50–7:54अलक दर्म में प्रेमग गेराई के एके तरहे श्कुना दिखल गेल.
  131. 7:54–7:59अलक कुना में, अलक दर्म में, प्रेमग गेराई के एकके तरहे सकुना देखाल गेल.
  132. 7:59–8:06आहा के इशारा अस्लाम में, इश्क्क के साथ स्थर, और वैश्नव परमपराग साथस्थरक तुलना दिस अच्छे,
  133. 8:06–8:09इटुलना अपने आप में बहुत अबुत अच्छे.
  134. 8:09–8:15इश्क के जे अवद्दारना गजल में आची उ मात्र लोके कवा सनसारेक प्रेम नहीं आची
  135. 8:15–8:21दूनु दर्षन में प्रेम के क्रम्मिक विकास के बहुद सुक्ष्मता से परिबहाशित के लगे लगे लगे लगे
  136. 8:21–8:27जेना पोती मे बतायल गेल अची, जी अस्लाम मे इश्क के सात अस्तर अची,
  137. 8:27–8:35पहल अची हब माने अकर्षन, तो सर उन्स माने मोह, अत्तेसर इश्क माने एक निष्त प्रेम.
  138. 8:35–8:36आ अकर्बाद
  139. 8:36–8:43अकर्बाज चारी मची अकीदत माने इजजत वा सम्मान, पाचम इबादत माने पूजा,
  140. 8:43–8:48चटम जुनुन माने पागलपन, असातम अर अन्ती मची पना,
  141. 8:48–8:51माने विलीन भोजायब वमोध.
  142. 8:51–8:55और एकर थीक समानानतर, भारतक महान वैश्नव संथ,
  143. 8:55–9:00उप गो स्वामी दूरा बक्ती रसाम्रच् सिंदू में प्रेम कर सात अस्टर्ब देल गिल अची.
  144. 9:00–9:07अआ, हूंका अनुसार अची सनेज मान प्रने, राग, अनुराग, बहाव और महाबहाव.
  145. 9:07–9:09महाबहाव, एकर माने की भिल?
  146. 9:09–9:17महाभावक अर्थ से हो ये आची जे प्रेमी प्रेमी का दूनू समरपन कर एक दूसर में मिली जाएच्छती
  147. 9:17–9:25जिना उता पना आची, सूफी वाद, अववेशनवाद दूनू में प्रेम कर चरम सीमाक इस समानता अचमवित कर एच्छी
  148. 9:25–9:29मुद़ एक रा स्वट एक ता स्विखट संयोग मानिकत ता नहीं चोडल जासके चे.
  149. 9:29–9:31नहीं नहीं एक दम नहीं
  150. 9:31–9:35की इदूता दर्षन एक दूसर से कतो मिलल चल
  151. 9:35–9:38करन एक ता अरब का मलु बूमी से निकलाला चे
  152. 9:38–9:41आदूसर भारत तक हर्यर बूमी से
  153. 9:41–9:44इग्ता बहुत महत्वपुन प्रष्ने तार करत थे
  154. 9:44–9:47इँ मात्र संयोग नहीं आची
  155. 9:47–9:48तो फिर की आचे
  156. 9:48–9:52इतिहासिक तत्यक विष्लेशन करत लेक्हक बतबैद चती
  157. 9:52–9:55जे रुप गुस्वामी सन्यास लेवास पूर्व
  158. 9:55–9:59बंगाल के शासक रूसें शाहक मंत्री चलाहा
  159. 9:59–9:59आज्थः
  160. 9:59–10:00आज्थः
  161. 10:00–10:01आज्थः पएग बात
  162. 10:01–10:03औफ फार्सी क प्रकान्ड विद्वान चला
  163. 10:03–10:04बाप्रे
  164. 10:04–10:05तो मतलब रुसेन
  165. 10:05–10:06शाहक दर्बार
  166. 10:06–10:08एक ता मेल्टिंग पोट्जक आच्छल
  167. 10:08–10:10जत्ते फार्सी सूफिवाद
  168. 10:10–10:12अबहारतिय दर्षनक
  169. 10:12–10:13भीज वेचारिक
  170. 10:13–10:18उख्रा ब्ली भाटी बुजगयते ता इत इतिहासक एक ता गजब का क्रोसोवर भिल
  171. 10:18–10:19निष्चित रूपेन
  172. 10:19–10:23इप्रमानेत करे तचीजा ज्यान अविचार कोनो एक ता द्रम वा शेट्र का संपती नहीं होए तची
  173. 10:23–10:25एक दम सही बाजलीय
  174. 10:25–10:33निश्छित रूपेन, इप्रमानेत करे तची ज़्यान अविचार कोनो एकता दर्म वा शेत्र का समपती नहीं होई तची.
  175. 10:33–10:35एक दम सही भाजलीय.
  176. 10:35–10:41कोना फारसी का ज्यान वेशनव दर्षन के प्रभावित के लक, वा उक्रा नव शब्द देलक,
  177. 10:41–10:43इएक दूस्रसे ग्रहन काईल जाई तची
  178. 10:43–10:46आन नव रूप में प्रस्पूटित होए तची
  179. 10:46–10:47वाके
  180. 10:47–10:51तब हावना आप प्रेम के दर्षनिक गेह्राई भुज्लाग बाद
  181. 10:51–10:54आब हम उही एकस्रे मशीन पर भुरी काईल जे
  182. 10:54–10:55मने
  183. 10:55–10:57उही कतोर व्याक्रन पर
  184. 10:57–10:57आप
  185. 10:57–11:00जकर बात हमरा सब शुर्वाते में किने रही
  186. 11:00–11:02गजलक शरीर रच्ना
  187. 11:02–11:04वा वास्तू कला
  188. 11:04–11:05अखिर अच्छे की
  189. 11:05–11:07गजलक वास्तू कला में
  190. 11:07–11:09सबस मुल एकाई अच्छे शेईर
  191. 11:09–11:10शेईर
  192. 11:10–11:11जंगल वाला शेईर नहीं न?
  193. 11:11–11:12नहीं नहीं
  194. 11:12–11:15एकता शेर में दू पाथी होएत छे
  195. 11:27–11:31उही शेरक अंतिम दरी मुकम्मल भजावाग चाही.
  196. 11:31–11:33मुता इई सन्रचना बनेद कुना ची
  197. 11:33–11:38पोठी में मने मतला, मकता, रदीफ अकाफ्या का जी जिक्र अच्याई
  198. 11:38–11:40उक्राजे हम वास्तू कलास जोडी
  199. 11:40–11:42तक कुना जोड़ वहां एक्रा?
  200. 11:42–11:49तद रदीप उ शब्द ची जे शेरक अंतिम पांती में बार-बार एक ही समान वईत चे
  201. 11:49–11:53जिना मानिलियो जा हम एक तपांती लिखी रोहल ची
  202. 11:53–11:56जाही में अंतिम शब्द ची नहीं जायाब
  203. 11:56–11:59आहर शेरक अंत में नहीं जायाब आभी रोहल चे
  204. 11:59–12:00तव रदीप बहल
  205. 12:00–12:06आप आप दिवाल के इट जका जी जे आपना जगो से नहीं गजस के तची
  206. 12:06–12:11कमाल कैनालोगी आची ए गजल का पहल शेर जिक्रा मतला कहे ची
  207. 12:11–12:15उकर दूनो पाती में रदीख अ काफिया समान होगी तची
  208. 12:15–12:17आप मकता कहे चे
  209. 12:17–12:24अन्तिम शेर जते शायर अपन उपनाम वा तखलूस रख है चातें उक्रा मक्ता कहल जाईता ची.
  210. 12:24–12:27अच्छा जेना शायर अपन सिएँनेचर कदे लगोते.
  211. 12:27–12:57अदोनु का अंत्मेतन ना अची चन जुन तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना ची त�
  212. 12:57–13:01अगरा से पहलु को स्वर वावल से हो समान हेवाग चाही
  213. 13:01–13:02अच्चा
  214. 13:02–13:05मडलब चन में चो कसंग अग कमात्रा जी
  215. 13:05–13:07चो अ नो
  216. 13:07–13:10अज्चुन में जो कसंग उख कमात्रा जी
  217. 13:10–13:13अज्चुन में जो कसंग उग कमात्रा जी
  218. 13:13–13:16अज्चुन में जो कसंग उग कमात्रा जी
  219. 13:16–13:18वाँचाही
  220. 13:18–13:19अच्छा
  221. 13:19–13:20वाँचाही
  222. 13:20–13:21अच्छा
  223. 13:21–13:22वाँचाही
  224. 13:22–13:23अच्छा
  225. 13:23–13:24वाँचाही
  226. 13:24–13:25अच्छा
  227. 13:25–13:26वाँचाही
  228. 13:26–13:27अच्छा
  229. 13:27–13:28वाँचाही
  230. 13:28–13:29अच्छा
  231. 13:29–13:30वाँचाही
  232. 13:30–13:31अच्छा
  233. 13:31–13:32वाँचाही
  234. 13:32–13:33अच्छा
  235. 13:33–13:34वाँचाही
  236. 13:34–13:35अच्छा
  237. 13:35–13:36वाँचाही
  238. 13:36–13:37अच्छा
  239. 13:37–13:39अगो
  240. 13:39–13:45जुन और चन का मेल गजल का व्याक्रन में चटाक बर सयो स्विकार या नहीं आची
  241. 13:45–13:49इई अनुशासन गजल के गजल बनवए तची
  242. 13:49–13:50बहाप रे
  243. 13:50–13:52मुदा के उई पुच सकते थची
  244. 13:52–13:55जे इते क कतोर अनुशासन का की गाज
  245. 13:55–13:58खवी के च्यन में बांद कर बाग जगा भेल?
  246. 13:58–14:00आप, लोग अखसर इज शोच़े था ची.
  247. 14:00–14:02बहावना ता स्वतन्त्र उडान भरी च्छ,
  248. 14:03–14:05उक्रा स्वर अव्यन्जनक गनित में की एक बांदब?
  249. 14:05–14:09की गजल लिख़ा एक दगनी तक सवाल सोल्व कर अज़ का जे?
  250. 14:09–14:12इए अनुशासन हिनाई की एक आवश्षक आची
  251. 14:12–14:15एकर एक दब होत गजेर मनोविज्जानिक कारन आची
  252. 14:15–14:16की कारन चे हो?
  253. 14:16–14:19इजे गनितिया सन्रचना आची
  254. 14:19–14:23एकरे कारने गजल सदीकन लएबद्ध्ध रहताची
  255. 14:23–14:28जकन कोनो विचार, एते कसल, अस सदल रूप में कहल जाई तची
  256. 14:28–14:33तची उश्रोता का मन्मस्तिष्ट पर गहेर प्रभाव चोड़ई तची
  257. 14:33–14:34एक दम निशाना पर
  258. 14:34–14:37आई, इकोनो बेटर्तीभ गद्यन है
  259. 14:37–14:41बलकी एक ता सदल तीर आची, जिस सीदियान निशाना पर लागगी तची.
  260. 14:41–14:46आए एह कारनच है, जिग गजल के पदवाक शैली से हो खास होगे तची.
  261. 14:47–14:49पोठी में ताध अतरनुम के चर्चा ची.
  262. 14:50–14:52हा, इदोनो अलक शैली आची.
  263. 14:52–14:57ताहत मतलब जखन आहा गजल के कवीता जखन लैए में पाट करे ची
  264. 14:57–15:01आद तरनुम मतलब जखन उकरा गाएक का प्रस्थुत क्या जाएत ची
  265. 15:01–15:06आद मजग बात इए ची जि दुनो शेलिक आपन आपन सुन्दरी आची
  266. 15:06–15:11मुदा जग गजल आपन व्याक्रन माने बहर, काफ्या, रदीफ में सही आची
  267. 15:11–15:12तकि हो इच्छे
  268. 15:12–15:16तो उ तहत में पडल जाए, वटरन्नुम में गावल जाए
  269. 15:16–15:18उकर लैग कही औं नहीं तूटक
  270. 15:18–15:21इओही मजबुत वास्तुकलाक परिनाम आची
  271. 15:21–15:22अधबुत
  272. 15:22–15:29इजे एते कथोर गनिती या नियम छी, इग रातो राती तनई बना लेते, इग कते से आएल.
  273. 15:29–15:32एकर इतिहास बड पुरान अची.
  274. 15:32–15:38कारन, मितलाक आपन लोक गीत वा विद्द्यापतिक पद्मेता इए आरेभी फारसी शेली नहीं चे.
  275. 15:38–15:42इए आटिहासिक यात्रा पोठी में कुना वरनित अचे
  276. 15:42–15:46ए यात्रा कुनो पैग महाकाविय से कम ने यची
  277. 15:46–15:51गजलक जन्, इस्लाम से पुर्व अरबक जाहिलियत काल में भेल
  278. 15:51–15:54जक्रा अंदार युग से हो कहल जाए ची
  279. 15:54–15:56आच्छा अरबसा
  280. 15:56–16:05उआई ही समय कसीदा लिख़ा जाएच्छल, जे मुख्य रूप से आपन कबीलाग प्रषंचा आदो सरक निंदा मे होईच्छल.
  281. 16:05–16:10ते एक ता कबीलाई प्रषस्ती गान से प्रेम के चरम रूप दर इक सफर कोना भेल.
  282. 16:10–16:14एक श्रे इम्रुल कैस जेहिन शायर के जाएच्चनी
  283. 16:14–16:17उक खसीदा में प्रेम कर प्रसंग जोडल नहीं
  284. 16:17–16:18कोना जोडल है?
  285. 16:18–16:21उक अपन प्रेमिका देलगेल इस्ठान
  286. 16:21–16:25वा उकर उज़ल गर ख़न्दर पर थालवाईकड
  287. 16:25–16:28कानी कप्रेम कर कविता कहल हैनी
  288. 16:28–16:30अगरा बाद इी आरब कम रुबहुमी से निकल कड़ा पहुझल
  289. 16:30–16:32अखरा बाद इी इरान मने पारसी पहुझल
  290. 16:32–16:34जते रुद की सादी
  291. 16:34–16:36अहापिस जहन महान सूफी शायर
  292. 16:36–16:38एक्रा अद्धियातमेक उचाएदिल नहीं
  293. 16:38–16:40अगरा बाद इी अगाले बकाथे
  294. 16:40–16:47रूद की सादी आहापिस जहन महान सूफी शायर एक्रा अद्यात्मिक उचाई दिलने ही
  295. 16:47–16:50अपिस अ गजलत विष्वप्रसिद दाची
  296. 16:50–16:51आब भारत को ना आली
  297. 16:51–16:53फेर यी भारत आवी
  298. 16:53–16:55आमीर खुस्रो से होएत
  299. 16:55–16:58मीर आगालिब खातें उर्दू में सजल
  300. 16:58–17:02गालिब जहनशायर गजल के नव उचाईग पर पहुचा दिल नहीं
  301. 17:02–17:05उद वो द मितलाक हीर्यन केट दरी एकोना पहुचल?
  302. 17:05–17:06उनिस सो पाच में
  303. 17:06–17:08उनिस सो पाच में
  304. 17:08–17:09के अनल नहीं करा
  305. 17:09–17:12कबिश्वर जीवनजाएक सुंदर संयोग नाटकग माद्ध्यम सा
  306. 17:12–17:15उ पहल भेर मैठली में गजलक प्रेवक रें
  307. 17:15–17:19और उही तामसा इं मैठली क्माटी में अपन जरजमल
  308. 17:19–17:23इं निष्कार्ष नकाला बहुत उची तचे जे कोनो भी विदाक महांता
  309. 17:23–17:26उकर अनुकुलन्वा अदाब्टेबिलीटी में होए तचे
  310. 17:26–17:33वाखेई, यात्रा एक ता महां कावेजा का जा ची, अरब से फारस, फारस से दिल्ली, अदिल्ली से मित्ला.
  311. 17:33–17:34एक दम.
  312. 17:34–17:40गजल आपन बाशा बदल्लक, अरभी से फारसी, फिर उर्दू अफिर मेठली.
  313. 17:40–17:45अपन रूप किचु हत बदल्लक, मुदा अपन आत्मा आमुल व्याकरन के निचूर लक.
  314. 17:45–17:47ये कर सब सब हैक विषिष्ता आची.
  315. 17:47–17:52ये कारन आची, ज़ाई जखन क्यो मेत्ली में लबनी आ ताडी के संग गजल लिखे तची,
  316. 17:52–17:59तो उक्रा इने लागे ताची, जो उक्रो विदेशी सहीते पडी रहो लाची, उ मेठलिक आपन संपती लागे ताची.
  317. 17:59–18:00एगम सही.
  318. 18:00–18:04ता आप जकन हमरा सब आपन इविस्त्रत विमर्ष समेटी रहल ची,
  319. 18:04–18:13तई इ अस्पष्ट आजी ज़ आशीश अंचिनार जीक मेठली गजलक व्याकरन औई तिहास मात्र किचु नियम कानुनक शुष्क पोती ना आची
  320. 18:13–18:15इ एक ता सांस्क्रतिक से तु आची
  321. 18:15–18:16बिल्कोल
  322. 18:16–18:32इपोत्थी इबतारहल ची, जे गजलक एक तक कद्फोर, लगभग गनिती एवास्तू कला आचे, मुदा उईवास्तू कलाआक भीतर, जे भावना अस्पन्दित होगी तची, उखोनो सीमा में नहीं बान्दल जासके तची.
  323. 18:32–18:39आई पोतिक सब सब पएक देन ये है जी जे यी मेठली गजल के एक ता शास्ट्र प्रदान करे ता ची.
  324. 18:39–18:41आई नवका लोक लेली बद्काजक चै.
  325. 18:41–18:47एक दम, इण नवका गजल कार सब के एक ता शपप्ष्ट दिशा दिशा देखा रहा ला ची,
  326. 18:47–18:51जे आहा मात्र तुकान्त मिला के गजल नहीं लिखिसकाइ ची.
  327. 18:51–18:54आहा के उकर विग्यान, उकर व्याक्रन बुजगे पडद.
  328. 18:54–18:57अमरा पूतिक एक तत्ते बहुत जगजोर लक
  329. 18:57–19:02मने गजल कषाभिक अर्ठ शवदेन के अनबहवेस तुनव
  330. 19:02–19:05वो इस्त्री से प्रेमा लाप करव हो इचे
  331. 19:05–19:07आप येकर मुल आर्ठ अचे
  332. 19:07–19:10मुदा सद्यक ये एतेहासिक यात्रा देखूँ
  333. 19:10–19:13एक ता सदहरन प्रेमलाप से स्रुब है का
  334. 19:13–19:16इश्वर्ये प्रेम, समाजिक विद्रो है
  335. 19:16–19:19और मानविय सम्वेदना के वेक्त करबाक
  336. 19:19–19:22सबस शषक्त गनिति रूप बनी गल
  337. 19:22–19:25आआ, और रूई तुनबाक उप्मा बहुत सतीक अचे
  338. 19:25–19:30अनुबहावक रूई से शब्द के तूनी का एक ता सुन्दर लैबद्ध वस्ट्र तैयार करब.
  339. 19:30–19:34तईही तो हमर अन्तिम उतेजक विचार ये आचे,
  340. 19:34–19:40जे आरब तप मरु भूमी सा आईल गजल, मेठलीक, लबनी, ताडी खाना,
  341. 19:40–19:44या वास्तब में एक ता बहुत गज़ेर सोच्वाक विश्या आचे
  342. 19:44–19:48जगन कला सीमा तोडे तचे तकन उनव इतिहास रचे तचे
  343. 19:48–19:52शुर्वात में हम जे कहलू जे भावना वावना वावना वावना
  344. 19:52–19:56वावना वावना वावना वावना वावना वावना वावना वावना
  345. 19:56–20:00अगर रदी वेक्रन्क गनीज से बनल अगर रक्त मित्लाक माथी सजुडल बहुना आची
  346. 20:00–20:03इद्गना वाँना वाँना आप देखा नव जीवन देल जासके ताची
  347. 20:03–20:08जखन कला सीमा तोडे तचे तखन उन्नव इतिहास रचे तचे
  348. 20:08–20:10शुर्वात मे हम जे कहलूं
  349. 20:10–20:13जे बहुनाक दून्यामे एकसरे मशीन काजने करे तची
  350. 20:13–20:16आशीस अनजिनार जी इपोती उकर गलत साभिद कर दिलेक
  351. 20:16–20:19गजलक दून्याक एकसरे बिलकुल सबष्ट अची
  352. 20:19–20:22उकर हद्दी व्यक्रन्क गनीज्से बनल आची
  353. 20:22–20:25उकर रक्त मित्लाक माटी सजुडल बहुना आची
  354. 20:25–20:28इद्धिणाश्टिक मदी वाटर्स आप बलकोल साफ आची

Plain text

जे हम कहब जे मैंने बहावना, प्रेम अ तुतल मोन, जक्रा हम्रा सब अक्सर कविता कविता कोहसा में हेरायल मानेच्छी, उक्रो एक ता एक्सरे रिपोट बहुत बहुत सके च्या, तक की इपत्याए बो योग्या च्? उ पत्याएप तकनी मुष्किल चाहें करन साहित्यक दून्या क्या अविषेश का कविता के सादारन तया एक ता मैंने दाइगनोस्टिक मर्टी वाटर्स या अस्पष्ट ताक प्रतिक मानल जाईतें आग्दम जद ते सब किष आमुर्त आची या दो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � मेठली गजलक व्याक्रन और इतिहास इप वो थी इब्रम पुन रुपन तोड देताची जगजल बस किछ सुन्दर शबदक जोड वा प्रेम गीत आच औह, मने गजल सर्फ प्रेम गीत नहीं आची नहीं, एक दम नहीं इई स्पस्ट करे तची के गजल एक ता अगर उगर कछोर व्याक्रन के बहुत सुगम्तासा हम्रा सब के समख्ष रख है तची. अगर इविमर्श हमरा सब के इदिखावत जे कोना एक ता विदेशी काभ्यविदा मितलाक माटी में रच्भसी गल अच्छा, आई बहत महत्वोपोण आची दिखो, ग्यान उही समय सब से बेसी मुल्यवान होई तची जखन उक्रा बुजल आ लागु कल जाए. से तचाय? इपोती गजल को उही जटिलता के उकर इतिहास के आवकर कत्हुर व्याक्रन के बहुत सुगमतासा हमरा सब के समक्ष रखगत आजी. हाँ. मुदा एक ता बाज जे पोती खोलताई सब से पहले द्याना कर्षिट करे तची औह आची लेक्खक तेवर तेवर? माने कोहन देवर? मैंने सदारना काद्मिक पोती बहुत विनम्र होई तची ना हमर चोट सन प्रयास अची वला बहु मुदा अचिनार जिक सुवात इक्दम सख्त चेतावनी से होईता ची अच्छा, की लिख़े चाती ही हो? उस पष्ट लिख़े चाती, जे जे बिना पडे तर्क्वितर करे चाती या जे जात, दर्म, उम्र वापप देक्कर बात माने चाती तिनका लेल इपोती नही आची बापरे, इतो बदाक्रामक शुर्वात भेल ये ता, मुदद तनी सुचु की इत फोरे भीसी आहंकार पूरन न नहीं लागी रहल चे कोनो नवका लेखख, वरष्लोकनिक के एना सीधही नकारी देई इत यह यह नाजनिती जका भेल, एकर अखे रर्थध की भेल उ प्रद्द्द्र्ष्ट्या इहांके अहंकार लागी सकेता ची मुदे एकर पाच्टा एक दाईटा बहुत बाएक पीला असंगर्ष अचे पीडा, के हन पीडा? मने लेक्खक बहुत निदरता सां साहिट्यक दून्याक एक तक कतु सत्यके त्ुजागर कर रहल चती औव आची गजल कार सबक भीचक बहावनात्मक ब्लाक्मेलिं है बहावनात्मक ब्लाक्मेलिं सहित में इतो कुठ्रिलर सिन्माजका भेल आप सुनी में अजीब लगे चे एक रा तनी विस्तार ससमजाओ जए इखुना काज करेतचे, मेंने कविता लिख़ावाक लिल के कख्रा ब्लैक्मेल कर रहलचे. देखु, जगन कोनो विद्धान नुका नुका आवी रहल होई तची, वा उकर व्याक्रन तबहरल होई तची, तक किचु अस्थापित वरष्ट लोक, अगरा आपन हिसाप समोड़ चाहे चथी आचा आपन वर्च्छवा दिखावा चाहे चथी बलकुल अन चिनार जी बतभैच्चतीन जे किचु लोक कही चला जे जगजालक व्याक्रन में हुनका चुट नहीं देलगेल वा हुनक गलत व्याक्रन के मानी नहीं लेल गेल, ता उ गजल लिख़ चोड देता. अहो! माने हमर बात मानु, नेत हम खेलगे न करव वलागव? एक दम सही पकल लहु आपर लेखखक रवाया इस पष्ट आची, जे कोनो एक व्यक्तिक एमोट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट तश्स्स्स्स्साथ द्हरी जीवन्युग जे कविष्वर जीवन्जाक नाम पर अची और 2008 अईचिनहार युग एक दम सही, इज्ग विबाजन बड महत्वो पूँच़, इदेखा रहा लगची, जे गजजल कोना एक ता नव्रुप लव रहा लगची. मैं, जीवन जा मेठलिक पहिल गजल कार मनल जैट चतिना हा, मोदा 2008 का बाद जे अंचिनार युग आची उ मेठलिग गजल के उर्दूव लहिंदी का चाहुर सां निकाल क, उक्रा पोड रुपेण मेठलिक कष्वतन्त्र अन्यम बद्ध, बद्ध, विद्धा करुप में स्थापित करवा क्रान्ती आचे कमाल चे और इक रान्ती कोना बहुर आचे उकर तरीका हमरा बहुत रुमाचित के लग कोना? की निक लागल हैं के? मने गजल, मुल रुप सा, अरभी, और फारसिक माटी सा आए लग चे अखर आपन प्रतिक वा सिम्बल्स आफी जेना सराब, सुराही, साकी मुदा अचिनार जीजे मेठली करन केली हैज, उ कमाल आफी आप उ थेट मेठली में परिनत कदेल निएगरा इत जेना कोनो विदेशी पक्वान के आपन गाँँ का मसाला देका बनावजे का भाल तफिर कखर होई चे ओ अनुवाज संस्क्रते कोई तची इक दम पोथी में जिना मैं माने शराब के लेल ताली शबद के सुजाओ दिल गे लेची ताली बद्स थानी ये शबद चबद चे आ, मीना वा सुराही जे गजल मे बहुत प्रेउग होई चे अखरा मेतली में दाबा, कथिया वलबनी कहवाग बाध बहल अचे और साकी कलेल साकी जे शराब परसेवाला होई तचे अखरा लिल पासी बहाई बाप्रे, इत आए गदम गाँवोग द्रिष्ष बनीगल आँ मैखाना बनीगल ताडी काना वब पस काना देखू जखन के हो मीना वा मैखाना पडेतचे ता एक ता मैठल पाटख कमोन में उ चित्र बोछद पराया लगे तचे आप, कनेट नहीं भापाबी चे मुदा लबनी आ ताडी काना कहतें उ सीधा मिठला के गाँउक गाची अदे का परिवेर्से जुड़ायता ची गजलक भावना सीदे पाथक का माटी सन जुड़ायता ची मने इग गजलक आतमाक ठेट मेठली करना चे बिल्ल्कुल मुदा सबस भेशी जाम्रा सोचबा पर मजबोर के लग औग रुस्न कपरिबाशा चाल अज्छन, माने, बूटी, ना? आम तोर पर गजल में जूजन सूनके, कोनो सुन्दर स्त्रीक कलपना मान में होईता चे. आँ, जूजन के लेका एक ता बहुत प्यग ब्रानती आ ची, जे ई मात्र स्त्रीक सुन्दरता क लेल प्रहोग होईता चे. मुता लेखा के क्या सुन्राई कही चत्थी? सुन्राई इस शब्द कतिक मीट है. आँ अस्पस्ट करी चत्थी, जे सुन्राई मात्र स्त्रीक नहीं, बलकी कोनो भी सजी वनिर्जी वस्तुक बहुसकी चे. मने जना अप्रक्रतिक के सुन्राई. यक दम गाजबिलिच, नदी, माटी, भोरक रोद, सबबख आपन हुसना ची, आपन सुनराय आची. इगजलक परिदिके बहुत व्यापक कदे तची. इगजलक बहुत आवश्यक चल, इस्तानिय प्रतिक गजलके मैठिलिक आपन अबहिन आंग बनाबा में, बहुत प्यग भूमिकाने बहुवाईता ची इजे व्यापकता आची इज श्रफ प्रतीक दरी सीमित नहीं चे अच्छा, तो और को टे चे? जखन पोठी में गजलक मूल विश्य इश्क वाप्रेम प्रचर्चा आब इच्छे अग, आगा का की शारा उही तुलना दिसची नहीं, आग, एठ हम बाता ब और भीशी रोचक बजाइच्छे, इदेखी का आश्चरे होई चे, जे दुन्याक दूटा बिलकुल अलक कुना में, अलक दर्म में प्रेमग गेराई के एके तरहे श्कुना दिखल गेल. अलक कुना में, अलक दर्म में, प्रेमग गेराई के एकके तरहे सकुना देखाल गेल. आहा के इशारा अस्लाम में, इश्क्क के साथ स्थर, और वैश्नव परमपराग साथस्थरक तुलना दिस अच्छे, इटुलना अपने आप में बहुत अबुत अच्छे. इश्क के जे अवद्दारना गजल में आची उ मात्र लोके कवा सनसारेक प्रेम नहीं आची दूनु दर्षन में प्रेम के क्रम्मिक विकास के बहुद सुक्ष्मता से परिबहाशित के लगे लगे लगे लगे जेना पोती मे बतायल गेल अची, जी अस्लाम मे इश्क के सात अस्तर अची, पहल अची हब माने अकर्षन, तो सर उन्स माने मोह, अत्तेसर इश्क माने एक निष्त प्रेम. आ अकर्बाद अकर्बाज चारी मची अकीदत माने इजजत वा सम्मान, पाचम इबादत माने पूजा, चटम जुनुन माने पागलपन, असातम अर अन्ती मची पना, माने विलीन भोजायब वमोध. और एकर थीक समानानतर, भारतक महान वैश्नव संथ, उप गो स्वामी दूरा बक्ती रसाम्रच् सिंदू में प्रेम कर सात अस्टर्ब देल गिल अची. अआ, हूंका अनुसार अची सनेज मान प्रने, राग, अनुराग, बहाव और महाबहाव. महाबहाव, एकर माने की भिल? महाभावक अर्थ से हो ये आची जे प्रेमी प्रेमी का दूनू समरपन कर एक दूसर में मिली जाएच्छती जिना उता पना आची, सूफी वाद, अववेशनवाद दूनू में प्रेम कर चरम सीमाक इस समानता अचमवित कर एच्छी मुद़ एक रा स्वट एक ता स्विखट संयोग मानिकत ता नहीं चोडल जासके चे. नहीं नहीं एक दम नहीं की इदूता दर्षन एक दूसर से कतो मिलल चल करन एक ता अरब का मलु बूमी से निकलाला चे आदूसर भारत तक हर्यर बूमी से इग्ता बहुत महत्वपुन प्रष्ने तार करत थे इँ मात्र संयोग नहीं आची तो फिर की आचे इतिहासिक तत्यक विष्लेशन करत लेक्हक बतबैद चती जे रुप गुस्वामी सन्यास लेवास पूर्व बंगाल के शासक रूसें शाहक मंत्री चलाहा आज्थः आज्थः आज्थः पएग बात औफ फार्सी क प्रकान्ड विद्वान चला बाप्रे तो मतलब रुसेन शाहक दर्बार एक ता मेल्टिंग पोट्जक आच्छल जत्ते फार्सी सूफिवाद अबहारतिय दर्षनक भीज वेचारिक उख्रा ब्ली भाटी बुजगयते ता इत इतिहासक एक ता गजब का क्रोसोवर भिल निष्चित रूपेन इप्रमानेत करे तचीजा ज्यान अविचार कोनो एक ता द्रम वा शेट्र का संपती नहीं होए तची एक दम सही बाजलीय निश्छित रूपेन, इप्रमानेत करे तची ज़्यान अविचार कोनो एकता दर्म वा शेत्र का समपती नहीं होई तची. एक दम सही भाजलीय. कोना फारसी का ज्यान वेशनव दर्षन के प्रभावित के लक, वा उक्रा नव शब्द देलक, इएक दूस्रसे ग्रहन काईल जाई तची आन नव रूप में प्रस्पूटित होए तची वाके तब हावना आप प्रेम के दर्षनिक गेह्राई भुज्लाग बाद आब हम उही एकस्रे मशीन पर भुरी काईल जे मने उही कतोर व्याक्रन पर आप जकर बात हमरा सब शुर्वाते में किने रही गजलक शरीर रच्ना वा वास्तू कला अखिर अच्छे की गजलक वास्तू कला में सबस मुल एकाई अच्छे शेईर शेईर जंगल वाला शेईर नहीं न? नहीं नहीं एकता शेर में दू पाथी होएत छे उही शेरक अंतिम दरी मुकम्मल भजावाग चाही. मुता इई सन्रचना बनेद कुना ची पोठी में मने मतला, मकता, रदीफ अकाफ्या का जी जिक्र अच्याई उक्राजे हम वास्तू कलास जोडी तक कुना जोड़ वहां एक्रा? तद रदीप उ शब्द ची जे शेरक अंतिम पांती में बार-बार एक ही समान वईत चे जिना मानिलियो जा हम एक तपांती लिखी रोहल ची जाही में अंतिम शब्द ची नहीं जायाब आहर शेरक अंत में नहीं जायाब आभी रोहल चे तव रदीप बहल आप आप दिवाल के इट जका जी जे आपना जगो से नहीं गजस के तची कमाल कैनालोगी आची ए गजल का पहल शेर जिक्रा मतला कहे ची उकर दूनो पाती में रदीख अ काफिया समान होगी तची आप मकता कहे चे अन्तिम शेर जते शायर अपन उपनाम वा तखलूस रख है चातें उक्रा मक्ता कहल जाईता ची. अच्छा जेना शायर अपन सिएँनेचर कदे लगोते. अदोनु का अंत्मेतन ना अची चन जुन तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना अची तुक्तमे ना ची त� अगरा से पहलु को स्वर वावल से हो समान हेवाग चाही अच्चा मडलब चन में चो कसंग अग कमात्रा जी चो अ नो अज्चुन में जो कसंग उख कमात्रा जी अज्चुन में जो कसंग उग कमात्रा जी अज्चुन में जो कसंग उग कमात्रा जी वाँचाही अच्छा वाँचाही अच्छा वाँचाही अच्छा वाँचाही अच्छा वाँचाही अच्छा वाँचाही अच्छा वाँचाही अच्छा वाँचाही अच्छा वाँचाही अच्छा वाँचाही अच्छा अगो जुन और चन का मेल गजल का व्याक्रन में चटाक बर सयो स्विकार या नहीं आची इई अनुशासन गजल के गजल बनवए तची बहाप रे मुदा के उई पुच सकते थची जे इते क कतोर अनुशासन का की गाज खवी के च्यन में बांद कर बाग जगा भेल? आप, लोग अखसर इज शोच़े था ची. बहावना ता स्वतन्त्र उडान भरी च्छ, उक्रा स्वर अव्यन्जनक गनित में की एक बांदब? की गजल लिख़ा एक दगनी तक सवाल सोल्व कर अज़ का जे? इए अनुशासन हिनाई की एक आवश्षक आची एकर एक दब होत गजेर मनोविज्जानिक कारन आची की कारन चे हो? इजे गनितिया सन्रचना आची एकरे कारने गजल सदीकन लएबद्ध्ध रहताची जकन कोनो विचार, एते कसल, अस सदल रूप में कहल जाई तची तची उश्रोता का मन्मस्तिष्ट पर गहेर प्रभाव चोड़ई तची एक दम निशाना पर आई, इकोनो बेटर्तीभ गद्यन है बलकी एक ता सदल तीर आची, जिस सीदियान निशाना पर लागगी तची. आए एह कारनच है, जिग गजल के पदवाक शैली से हो खास होगे तची. पोठी में ताध अतरनुम के चर्चा ची. हा, इदोनो अलक शैली आची. ताहत मतलब जखन आहा गजल के कवीता जखन लैए में पाट करे ची आद तरनुम मतलब जखन उकरा गाएक का प्रस्थुत क्या जाएत ची आद मजग बात इए ची जि दुनो शेलिक आपन आपन सुन्दरी आची मुदा जग गजल आपन व्याक्रन माने बहर, काफ्या, रदीफ में सही आची तकि हो इच्छे तो उ तहत में पडल जाए, वटरन्नुम में गावल जाए उकर लैग कही औं नहीं तूटक इओही मजबुत वास्तुकलाक परिनाम आची अधबुत इजे एते कथोर गनिती या नियम छी, इग रातो राती तनई बना लेते, इग कते से आएल. एकर इतिहास बड पुरान अची. कारन, मितलाक आपन लोक गीत वा विद्द्यापतिक पद्मेता इए आरेभी फारसी शेली नहीं चे. इए आटिहासिक यात्रा पोठी में कुना वरनित अचे ए यात्रा कुनो पैग महाकाविय से कम ने यची गजलक जन्, इस्लाम से पुर्व अरबक जाहिलियत काल में भेल जक्रा अंदार युग से हो कहल जाए ची आच्छा अरबसा उआई ही समय कसीदा लिख़ा जाएच्छल, जे मुख्य रूप से आपन कबीलाग प्रषंचा आदो सरक निंदा मे होईच्छल. ते एक ता कबीलाई प्रषस्ती गान से प्रेम के चरम रूप दर इक सफर कोना भेल. एक श्रे इम्रुल कैस जेहिन शायर के जाएच्चनी उक खसीदा में प्रेम कर प्रसंग जोडल नहीं कोना जोडल है? उक अपन प्रेमिका देलगेल इस्ठान वा उकर उज़ल गर ख़न्दर पर थालवाईकड कानी कप्रेम कर कविता कहल हैनी अगरा बाद इी आरब कम रुबहुमी से निकल कड़ा पहुझल अखरा बाद इी इरान मने पारसी पहुझल जते रुद की सादी अहापिस जहन महान सूफी शायर एक्रा अद्धियातमेक उचाएदिल नहीं अगरा बाद इी अगाले बकाथे रूद की सादी आहापिस जहन महान सूफी शायर एक्रा अद्यात्मिक उचाई दिलने ही अपिस अ गजलत विष्वप्रसिद दाची आब भारत को ना आली फेर यी भारत आवी आमीर खुस्रो से होएत मीर आगालिब खातें उर्दू में सजल गालिब जहनशायर गजल के नव उचाईग पर पहुचा दिल नहीं उद वो द मितलाक हीर्यन केट दरी एकोना पहुचल? उनिस सो पाच में उनिस सो पाच में के अनल नहीं करा कबिश्वर जीवनजाएक सुंदर संयोग नाटकग माद्ध्यम सा उ पहल भेर मैठली में गजलक प्रेवक रें और उही तामसा इं मैठली क्माटी में अपन जरजमल इं निष्कार्ष नकाला बहुत उची तचे जे कोनो भी विदाक महांता उकर अनुकुलन्वा अदाब्टेबिलीटी में होए तचे वाखेई, यात्रा एक ता महां कावेजा का जा ची, अरब से फारस, फारस से दिल्ली, अदिल्ली से मित्ला. एक दम. गजल आपन बाशा बदल्लक, अरभी से फारसी, फिर उर्दू अफिर मेठली. अपन रूप किचु हत बदल्लक, मुदा अपन आत्मा आमुल व्याकरन के निचूर लक. ये कर सब सब हैक विषिष्ता आची. ये कारन आची, ज़ाई जखन क्यो मेत्ली में लबनी आ ताडी के संग गजल लिखे तची, तो उक्रा इने लागे ताची, जो उक्रो विदेशी सहीते पडी रहो लाची, उ मेठलिक आपन संपती लागे ताची. एगम सही. ता आप जकन हमरा सब आपन इविस्त्रत विमर्ष समेटी रहल ची, तई इ अस्पष्ट आजी ज़ आशीश अंचिनार जीक मेठली गजलक व्याकरन औई तिहास मात्र किचु नियम कानुनक शुष्क पोती ना आची इ एक ता सांस्क्रतिक से तु आची बिल्कोल इपोत्थी इबतारहल ची, जे गजलक एक तक कद्फोर, लगभग गनिती एवास्तू कला आचे, मुदा उईवास्तू कलाआक भीतर, जे भावना अस्पन्दित होगी तची, उखोनो सीमा में नहीं बान्दल जासके तची. आई पोतिक सब सब पएक देन ये है जी जे यी मेठली गजल के एक ता शास्ट्र प्रदान करे ता ची. आई नवका लोक लेली बद्काजक चै. एक दम, इण नवका गजल कार सब के एक ता शपप्ष्ट दिशा दिशा देखा रहा ला ची, जे आहा मात्र तुकान्त मिला के गजल नहीं लिखिसकाइ ची. आहा के उकर विग्यान, उकर व्याक्रन बुजगे पडद. अमरा पूतिक एक तत्ते बहुत जगजोर लक मने गजल कषाभिक अर्ठ शवदेन के अनबहवेस तुनव वो इस्त्री से प्रेमा लाप करव हो इचे आप येकर मुल आर्ठ अचे मुदा सद्यक ये एतेहासिक यात्रा देखूँ एक ता सदहरन प्रेमलाप से स्रुब है का इश्वर्ये प्रेम, समाजिक विद्रो है और मानविय सम्वेदना के वेक्त करबाक सबस शषक्त गनिति रूप बनी गल आआ, और रूई तुनबाक उप्मा बहुत सतीक अचे अनुबहावक रूई से शब्द के तूनी का एक ता सुन्दर लैबद्ध वस्ट्र तैयार करब. तईही तो हमर अन्तिम उतेजक विचार ये आचे, जे आरब तप मरु भूमी सा आईल गजल, मेठलीक, लबनी, ताडी खाना, या वास्तब में एक ता बहुत गज़ेर सोच्वाक विश्या आचे जगन कला सीमा तोडे तचे तकन उनव इतिहास रचे तचे शुर्वात में हम जे कहलू जे भावना वावना वावना वावना वावना वावना वावना वावना वावना वावना वावना वावना अगर रदी वेक्रन्क गनीज से बनल अगर रक्त मित्लाक माथी सजुडल बहुना आची इद्गना वाँना वाँना आप देखा नव जीवन देल जासके ताची जखन कला सीमा तोडे तचे तखन उन्नव इतिहास रचे तचे शुर्वात मे हम जे कहलूं जे बहुनाक दून्यामे एकसरे मशीन काजने करे तची आशीस अनजिनार जी इपोती उकर गलत साभिद कर दिलेक गजलक दून्याक एकसरे बिलकुल सबष्ट अची उकर हद्दी व्यक्रन्क गनीज्से बनल आची उकर रक्त मित्लाक माटी सजुडल बहुना आची इद्धिणाश्टिक मदी वाटर्स आप बलकोल साफ आची

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