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मैथिली_वेब_पत्रकारिता_का_डिजिटल_सफर.mp4
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- 0:00–0:07अग, खल्पना कीजे की कोई आप से आखर कहे, के उसने ना चान्द पर नीलाम स्टोंग से भी पहले कदम रखखगा था
- 0:07–0:08अच्छा?
- 0:08–0:12और सबसे मजदार बाद, वो भी एक बेलगाडी में बेटकर
- 0:12–0:14रहा, मजद भी एक खोई भी सुलेगा तो हसे गई
- 0:14–0:16बिल्कोल, आप यही केंगे ना
- 0:16–0:19किबे जिस समें तुम चान्द पर जाने का दावा कर रेव
- 0:19–0:22उस समें तु रोक्कित तक्निक मोजुदी नहीं तु तु महां पूँचे कैसे?
- 0:22–0:26सईबात है, और सुन्ने में दावा जितना भेतु का लकता है ना
- 0:26–0:29दिजितल दुन्या के श्वाटी दोर में लोग एक्दम अज़ाई कर रहे थे
- 0:29–0:30एक्दम सही
- 0:30–0:33तो आज की हमारी इस दीब डाईव में
- 0:33–0:36हम एक अज़ी कहानी पर चर्चा कर रहे है
- 0:36–0:39आदार है, आशीश अचिनार जी की
- 0:39–0:41एक बहुत ही कमाल की किताब
- 0:41–0:44मेठली वेप पत्रकारिता के इतिहास
- 0:44–0:47अम और ये किता अप सरफ कुछ तारीकों या गधनाो के लिस्ट नहीं है
- 0:47–0:48बलकोल नहीं
- 0:48–0:53ये दर सल इस बात का बहुती सती कद्दियन है कि जब कोई भी नहीं तकनी काती है
- 0:53–0:55तो इनसानी मनोविग्यान उसके सात कैसे कहिलता है
- 0:55–1:04अग और शुर्वात में श्रोताव को लक्सकता है के ख्षेत्रिये वेप पत्रकारिता के इतिहास में अज़ा क्या ध्रिलर होगा.
- 1:04–1:34लिकिन मेरा यकीन मानिय, जब आब देकते हैं कि मेठली जैसी एक खषेत्री अबहाशाने इन्ट्रनेत कि उस दीमे डालप वाले दोर से लेकर आजके एए एए यानी आर्टिफिश्टलिजन्स के युग तक का सफर कैसे तैक्या, तो ये किसी सस्पैंस फिल्म से कम नहीं ल�
- 1:34–1:39अगर बदाई की शुवात करते है, सब से पहला और बून्यादी सवाल,
- 1:39–1:46अगर अगर आई कब किताब में साल दोहाजार के असपास का जो जिक्र है,
- 1:46–1:49वो तकनी की रुब से बहुत ही चुनाती पून समय था.
- 1:49–1:52बहुत जादद चुनातिपून वूड डालब कनेक्षन का जमाना था
- 1:52–1:56आव वुड टेलिफोन वाली अजीप सी आवाजे आती जब यंटनेट कनेक्ट होता था
- 1:56–2:00बिल्कुल और एक सादारन सा वेपेच खुलने में भीना कई मिनेट लग जाते थे
- 2:00–2:12तो किताब सपष्ट रूप से बताती है, कि वर्ष दोहाजार में याहु जीो सिटीस पर गजेंद्र ताकुर दूरा शूरू किया बहाल सरी गाच ये अंटनेट पर मैठली की पहली प्रामाने को पस्ती ती थी.
- 2:12–2:17श्रोताव की जानकारी किलि तोड़ा सा बतादुं की याहु जीो सिटीज अगर था क्या?
- 2:17–2:23इसे आप नहीं नद नद की श्रुवाती दोर का एक दिजितल खाली पलोट समच सकते हैं.
- 2:23–2:25आप नहीं खाली जमीं कितबा?
- 2:25–2:29बिल्कुल, याहु लोगों को अंट्रनेट पर थोडीसी मुझ्त जगे देता ता,
- 2:29–2:32जगा आप बेसिक आज्टीमल कोडिं कर के,
- 2:32–2:35अपना कुदका एक चोता सा वेप बेज बना सकते थे.
- 2:35–2:38आपको लेयाूट से लेके टेक्स्ट तक,
- 2:38–2:40सब कुछ मैनूली ताईप कना परताता.
- 2:40–2:41इक दम सही का आपने.
- 2:41–2:43कोई रेटी में तेम्ठलेत नी होते ते उसमें.
- 2:43–2:45गजेंद्र ताखौल जी का वो प्रयास,
- 2:45–2:48इसी तरान की तकनी की जद्दो जहत का नतीजा था.
- 2:48–2:51और इसके बात दिरे दिरे विकास हूँँँ.
- 2:51–2:53अच्छा और क्या क्या आई आई आई आई आई आई आई?
- 2:53–2:56तो, 2003 में पल्लो मिखिला नाम की वेप्साइत आई,
- 2:56–2:59जिसे आप एक दिजितल पत्रिका के सकते है,
- 2:59–3:03और फिर 2004 में समद्या नाम का पहला समचार बलोग शुवहा.
- 3:03–3:07रूग तो ये एक बहुती स्वबहाविक क्रमिक विकास था.
- 3:07–3:11पहले वेब पेज फिर वेब साइट और फिर बलोग.
- 3:11–3:14आप लेकिन इसी स्वबहाविक विकास के बीच में
- 3:14–3:16कुछ लोगोने अपनी अलगी ताईमशीन चलादी
- 3:16–3:17हाहाहा
- 3:17–3:22और किता पर तेवेग बात मुदे सब से जाडा हेरान करने लगीना
- 3:22–3:26वो ता कतिक रास बात नामक बलोग का विवाद
- 3:27–3:32मतलप कुछ लोगोने कुछ को इंटनेट पर पहला मेठली बलोगर साभित करने किलिए
- 3:32–3:35अपने ब्लोक पोस्ट की तारीको मेही हेर फेर कर दी.
- 3:35–3:38और यही पर आपकी वो चानपर भेलगाडी वाले बात
- 3:38–3:39एक दम सतिक बेटती है.
- 3:39–3:42अन्छिनार जीने अपनी किताब में पूरे फर्जीवाडे को
- 3:42–3:45बहुत थाखनी की और विष्लेश नात्मक
- 3:45–3:46तरीके से बेनाखाब किया है
- 3:46–3:50मैं चाती हों के हम इस तकनीकी हिसे को तो और बारीकी से समझें
- 3:50–3:55आखर उनो नहीं पक्डा कै से कियों कि आम अँ अन्सान तो ब्लोक पर जो तारीक लिकिया बस उसे इस जच मान लिता है
- 3:55–4:00दिए खुगा ये था के कते एक रास पात ब्लोक के संचालोगो ने, तो हाँजार तेरा में एक पोस्त लिखा.
- 4:00–4:01तीख है.
- 4:01–4:06लिए नो नो ने ब्लोक की सेटिंज में जागगर उस पोस्त की पबलिष देट को बैक देट कर दिया.
- 4:06–4:09मदद पुरानी तारीक डाल्दी वश्व उन्निस्वनिन्न्यान्वे की
- 4:09–4:12बाप्रे सीदे चोड़ा साल पीचे
- 4:12–4:18आप ये दिखाना उनका मक्सध था के वे उन्निस्वनिन्यान्वे से ही अई इंट्रनेट पर मैठली में लिक रहे हैं
- 4:18–4:23लेखक ने तकनी की सबूतो के साथ दिखाया
- 4:23–4:26की गोगल ने ब्लोगर सरविस को तो जोजार तीन में ख़ीदा था
- 4:26–4:27औरे
- 4:27–4:30यानी जिस प्लट्फाम परभे निन्न्यानवे में पोष्ट करनेगा दावा कर रहे थे
- 4:30–4:33उस रूप मे वो प्लट्फाँं तो वजुद में नहीं था?
- 4:33–4:33बलकल नहीं
- 4:33–4:35और उस से भी बड़ी बात
- 4:35–4:36कस्टम यौर्ल का फीच्चर
- 4:36–4:39जिस में आप किसी लिंक के अंदर पुरानी तारीए दिखा सकते हैं
- 4:39–4:43वो फीच्छर ब्लोगर पर 2008 और उसके बात के वर्षो में आया था
- 4:43–4:44अच्छा
- 4:44–4:48मतलब तकनी की रूप से सवर के दिसाईन में ये समब ही नहीं था
- 4:48–4:49एक दम असमब
- 4:49–4:53लेखवक ने ये अंटनेट आरकाईव और सर्वर देटा का इस तमाल कर के
- 4:53–4:55इस जुट को पूरी तरह से पखर लिया.
- 4:55–4:58ये जो दिजितल दून्या में अपना जंडा गारने की,
- 4:58–5:02खुद को स्थापित करने की, मनोवेग्यानिक भुक है ना?
- 5:02–5:06ये बडी अजीब है. मड़ब लोग एक अईसे इतिहास में अपना नाम
- 5:06–5:08सूनेजरे अखषरो में दरज कराना चातें,
- 5:09–5:11तो पुरी तरा से स्थ कोड़ज पतिका है.
- 5:11–5:11हाँ.
- 5:12–5:14और ये बूक सर्फ तारीक है बडलने तक सीमित नहीं है.
- 5:15–5:18किताब हमें अंटनेट के एक और बहुती क्ष्टरनाग धिजान की तरफ लेजाती है.
- 5:18–5:21वलेडेशिन या सत्यापन की भूख
- 5:21–5:24वह दे बहुती महतपून बिन्दू है
- 5:24–5:26जब हम यंटनेट के सफर की बात करते हैं
- 5:26–5:29तो अकसर हम सर्फ फाइदों पर बात करते हैं
- 5:29–5:32कि सुचना तुरन्त मिल जाती हैं बंकिं आसान हो गई हैं
- 5:32–5:36लेकिन दिजिटल मनोविग्यान समाज को भीतर से कैसे बडल रहा है?
- 5:36–5:38किताब इस पर गेहरी चोट करती है.
- 5:38–5:42हा! और किताब में, फेसबुक के लाएक बडन बनाने वाले,
- 5:42–5:44जस्टिन रोसन्स्टीन का जिक रहे है.
- 5:44–5:46ये पडकर मैं सच्मे चोंक गई थी.
- 5:46–6:16वुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 6:16–6:18अर लंबे विमर्ष्की मांग करता हैं.
- 6:18–6:19हैंग?
- 6:19–6:20आप बलकुल.
- 6:20–6:23लेकिन अब वो साहित्य एक अज़्ेजिटल अखाडे मे दھखेल दिया गया है,
- 6:23–6:29जिस से सर्फ तीं सेकं के दोपमाएं हिट्स और तुरंत मिलने वाले लाएक्स के लेदिजाएं कि अग्टाग.
- 6:29–6:34मतलब लोग कोई अच्छी कविता लिकने से जाड़ा इस बाद पर दियान देते हैं कि उस पर कितनी जल्दी लाएक साइंगे
- 6:34–6:34दलकोल
- 6:35–6:36और ये सव्साहित दे किस तर पर नहीं हो रा
- 6:37–6:39सोचल मीट्या के इस आख्टेक्च्या का आसर सीधे समाज पर पड़ रा है
- 6:39–6:40अग
- 6:40–6:48किताब में बहुत स्पष्ट्रूप से बताया गया है कि कैसे राजनी तिग्दल और उनके अईटी सेल इंटिनेट के इसी जिजाईन का उप्योग करते हैं
- 6:48–6:51वेक नुस प्यलाने और समाज में उन्माद बवडखाने किलिए
- 6:51–6:56जी, किताब में उत्तर प्रदेश के दंगो का उदारन देकर समजाया गया है,
- 6:56–7:00के कैसे इंटिनेट पर फलाइ गए जुटी सुचनाों ने,
- 7:00–7:02असल दून्या में हिंसा बभडकाने का काम किया.
- 7:02–7:05और शूताओ को यहा मैं साव कर दूं,
- 7:05–7:09के हम यहां किसी राजनी तिगदल का पक्ष नहीं ले रहे है,
- 7:09–7:12बलकी निशपक्ष रूप से सर्व वही बतारे है,
- 7:12–7:15जो लेकखक ने अपनी शोद में दरज की आ है.
- 7:15–7:15सही कहा.
- 7:15–7:17यहां यहां यह समझना जरूरी है,
- 7:17–7:19की प्लाट्फोम कर दिसाइन इस आजा है,
- 7:19–7:23तो सत्तिकी तुलना में आख्रोष यानी, गुस्से को जाडा ब़ावा देता है.
- 7:23–7:25कुईकी आख्रोष से इंगेज्मिन बड़ता है,
- 7:25–7:27और इंगेज्मिन से उनका व्यापार चलता है.
- 7:27–7:27एक दम सेई.
- 7:27–7:32और तकनी के इस शस्त्री करन ने ना एक बड़ विरोदा बास पड़ा कर दिया है.
- 7:32–7:34इसने हमें बहुत ग्यानी बना दिया है.
- 7:34–7:38लेकिन लेखख के तरख है के अंट्टनेट ने अंसान को ग्यानी के साथ साथ
- 7:38–7:40अग्यानी बी बना दिया है.
- 7:40–7:44वो इसलिए, कुकि अब हमारी स्मिती, हमारी याद रखनेगी शम्ता,
- 7:44–7:46गुगल के सरवर पर निरभर होगगगगगग.
- 7:46–7:49हम जानकरी को अपने दिमाग में प्रोठस करनेगे बजाए,
- 7:49–7:51सरज यंजन पर चोर देते हैं.
- 7:51–7:53और गुगल की अपनी एक रगी समस्स्स्या है,
- 7:53–7:57मतलब अगर आप Google पे search करें के दर्ती गोल है
- 7:58–8:01तो algorithm आप को उसके sacro-vegyanik सबुध देतेगा
- 8:01–8:04अगर अप के search करें के दर्ती चब्टी है
- 8:05–8:08तो वही internet आप को उसके भी sacro articles of video देतेगा
- 8:08–8:09भिलकल
- 8:09–8:12तो यह आप आप वहा के एकी शल्फ पर
- 8:12–8:42अपकी आपकी आपकी आपकी आब अपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आ�
- 8:42–8:46तव कईईगुना बड़जाता है. इक जिम्डार संपादक सरफ जानकारी नी देता.
- 8:46–8:49वो उस कूडे के देर से आस्ली ग्यान को चाटकर,
- 8:49–8:51उसे एक सही संदरब के साथ आप तक लाता है.
- 8:51–8:53ये बहुती गेहरी बात कही आपने.
- 8:53–8:57और इसी शोरगुल, फेख नुूज,
- 8:57–9:01अप विदे है इप पत्रिका और उसके महाभियान के बात करनी हैं।
- 9:01–9:05बिलकुल! 2008 में शुरू हुई इस पत्रिका का काम
- 9:05–9:09किसी बिब आदे संस्थान के काम से कम नहीं है।
- 9:09–9:12अप विदे है अई पत्रिका और उसके महाबियान के बात करनी है।
- 9:12–9:15तो मुझे लगा के आस्ली जिटल क्रान्ती तो यहां हो रही है
- 9:15–9:19आप विदेह एई पत्रिका और उसके महाभियान के बात करनी है
- 9:19–9:24बिलकुल! 2008 में शुरूग हुई इस पत्रिका का काम
- 9:24–9:27किसी भी बड़े संस्ठान के काम से कम नहीं है
- 9:27–9:31इनुने 15 सो से अदेक मेतली पुस्तकों और पत्रिकांों का
- 9:31–9:33मुझ्त दिजितल आरकाईव बना दिया
- 9:33–9:35आप एक पुरा एक औनलाई पुस्तकाल आप
- 9:35–9:36जी
- 9:36–9:39लिकिन जो बात मुझे सब से जादा चोंका गगे
- 9:39–9:43उ ये थी की विदे है सर्फ देवनागरी लिपी में पबलिष नहीं हो रही है
- 9:43–9:44नहीं बलकल नहीं
- 9:44–9:46वे अग्ख तिरुहुता
- 9:46–9:48जो मैठली की मुल लिपी है
- 9:48–9:49के ती, निवाडी
- 9:49–9:51और यहां तक की नेट्रहीनो के लिए
- 9:51–9:53ब्रेर एपी में भी प्रकाषित करते हैं
- 9:53–10:23भी भी बाशा अज़ा देखाई बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी �
- 10:23–10:53वो विज़ाई विज़ाई विज़ाई वोज़े पर सके और नेत्रहीन शुटाई तक वो साहित दे पहुट्टे पहुटे पहुटे पहुटे पहुटे विज़ाई बहुटे विज़ाई विज़ाई बहुटे विज़ाई विज़ाई विज़ाई विज़ाई विज़ाई व
- 10:53–10:55जिसके पास करोडो का बजध हो
- 10:55–10:57लिकिन इसे एक समवदाय
- 10:57–10:59कुछ समर्पित लोग
- 10:59–11:00अपने दंपर कर रहे है
- 11:00–11:02वो भी बिना किसी फाइदे के
- 11:02–11:05यही एक कम्युन्टी प्रोजट की अस्ली ताकत होती है
- 11:05–11:07कोई भी बाशा तब तक जीवित रहती है
- 11:07–11:09जब तक उसका समवदाय उस्वेज़े ज़ूए है.
- 11:09–11:12किताब में मैत्फिली विकी पीटिया के समवदायक संगषका
- 11:12–11:14भी बहुत विस्तार से जिक्र है.
- 11:14–11:17अम अखसर विकी पीटिया को बहुत हलके में लिते है,
- 11:17–11:20जैसे की ये कोई अप्टमाटिक मशीन हो.
- 11:20–11:22आप रे जानकरी अप आप आजाती है.
- 11:22–11:23बलक्ल.
- 11:23–11:24लिकन आजा नहीं है.
- 11:24–11:272008 में जब मैठली विकी पीडिया के लिप्रे आज श्वरूए,
- 11:27–11:30तो आजा नहीं ता किसी ने एक बटन दबाया और विकी पीडिया बन गया.
- 11:30–11:32तो क्या प्रक्रीया थी उसकी?
- 11:32–11:35लोगों को विकी मीट्टिया इन्कौबेटर में जाना पडा
- 11:35–11:37ये विकी पीटिया का वो तेस्टिंग ग्राण्ड है
- 11:37–11:39जान नहीं बहाशाँ का प्रक्षन होता है
- 11:39–11:43स्वायम सेवकोने बिना पैसे लिए अपनी रातों की नींद कहराब करके
- 11:43–12:13रव बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ ब�
- 12:13–12:18मुखेदारा से अलक जागर मैठली गजल को इंटनेट पर एक नहीं पहझान दी.
- 12:18–12:23उनहोंने नहीं लेख को को जोडा और यहाद ता की समानानतर,
- 12:23–12:26साहित यह अकादमी सम्मान भी शुरू कर दीए.
- 12:26–12:31इसका सीदा समतलव यह आगर पारमपरिक संस्थान आपको जगा नहीं देरें हैं
- 12:32–12:35तो इंटरनेट आपको अपना कुद का मंज ख़डा करने की आजादी देता हैं
- 12:35–12:36एक दम सहीं
- 12:36–12:40और ये निस्वार्थ भाँ से किया गया काम ही अस्ली वेप पत्र कारिता हैं
- 12:40–12:50ये लोग उन लाएक्स के ले खाम नहीं कर रहे हैं, बलकी आने वली पीडियों के लिए एक दिजिटल द्रोहर तेरार कर रहे हैं, ताकि उनकी भाशा सरवर के किसी कोने में कोने जाए.
- 12:50–12:55अब यहाँ से ना कहानी एक अज़े मोड पर आती है, जो सीदे बहविष्षी की और इशारा करता है.
- 12:55–13:01दिके जब कोई समुडाय अपनी भाशा का इतना बड़ा दिजितल डेटाबेईस तभाशा कर लेता है
- 13:01–13:06जिस में पन्द्रा सो किताबे हो, लाको विकिपीटि आर्टिकल्स हो
- 13:06–13:10मिरा मतलब है, तो उस सारे डेटा का अगला पडाफ क्या होता है?
- 13:10–13:14उसका अगला पडाव है वो तकनीक जो आज पुरी दुनिया को बड़ल रही है
- 13:14–13:16अट्फिशल अंटलगेंस अर मशीन लेनिग
- 13:16–13:18पिलकोल
- 13:18–13:22किताब का ये आख्री हिस्सा तकनीकी रूप से बहुत ही अधवांस है
- 13:22–13:27आई आई अब मैठली बाशा के लिए एक नयाक शितच खूल रहा है.
- 13:27–13:33किताब में बताया गया है कि कैसे आई आई बारत की कषेत्री इ बाशाँ के लिए काम कर रहा है.
- 13:33–13:35आँ, इस में सबसे प्रमोग उदारन है,
- 13:35–13:37अईटी मद्रास के नीलेकनी संटर का,
- 13:37–13:42या अगर नादी चाए बाद़ा प्रजेक्त तो ये प्रजेक्त अखिर करता क्या है
- 13:42–13:45इनका इंडिक ट्रान्स्टू मोडल बहुती क्रान्तिकारी है
- 13:45–13:51ये एक अपन सूर्स याए मोडल है जिसने अंग्रेजी और बाइस भारती ये भाशाँँँ के साथ साथ
- 13:51–13:56अब मेठली में भी बहुत सतीक और हैं खाई कौलेती अनुवाद को समबहो बना दिया है.
- 13:56–13:57और वाए.
- 13:57–14:00और इस के लावा कोई और प्रोजेक भी है?
- 14:00–14:00जी.
- 14:00–14:03GNU के प्रोटेसर गरीषनात जहा के निरदेशन में
- 14:03–14:07मिक्रो सोथ्ट का बिंग च्रन्सलेट प्रोज्ट भी चल्ड़ा है,
- 14:07–14:10जो मेठली को सीदे गलोबल टेक एको सिस्टम से जोड़ रहा है.
- 14:10–14:16यहा मैं आप से इन तकनीकी शब्डों के पीचे का विग्यान समझना चाती हूँ.
- 14:16–14:46किताब में, स्पीच्रेकिणिष्चन और स्पीच्सिन्तिस्सिस जैसे शब्दों का इस्तमाल हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 14:46–15:16अगर बाद़़ बाद़़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बा�
- 15:16–15:20तो बज़न एक पाटख के तोर पर, मुझे सच में दर भी लग राए.
- 15:20–15:21कैसे दर?
- 15:21–15:24दिके मैठली बहती मीटी बहाशा है.
- 15:24–15:28इस में चंदाजा की कविताव के खलग लै है.
- 15:28–15:30लोक गीतों के अपनी एक आत्मा है.
- 15:30–15:32शब्दों के गेराए है.
- 15:32–15:37अपका ये ये दर बहुत स्वाबहाविक है, और दून्या बहर के बहाशावे इंआनी इस पर चर्चा कर रहे हैं,
- 15:37–15:40लेकिन अमें एए एक खाम करने के तरीके को समजना होगा,
- 15:40–15:43या प्र वो बस दिक्षनरी से एक शब्द उठाएंगे?
- 15:43–15:45उसकी जगा दुस्रा शब्द रख्ठंगे?
- 15:45–15:49और एक बहुत फीजान रबाटिक सा अनुवाद कर के चोर देंगे?
- 15:49–15:51आपका एदर बहुत स्वाबहाविक है
- 15:51–15:54और दून्या बर के बाशावे इंज्यानी इस पर चर्चा कर रहे हैं.
- 15:54–15:58लेकिन हमें एएएएके काम करने के तरीके को समजना होगा.
- 15:58–16:00एएएएएए आपने अपने कोई जादुई दिमाग नहीं है.
- 16:00–16:04आप इसे एक बहुत बड़े आईने की तरा देख सकते हैं.
- 16:04–16:06अच्छा एक आईना?
- 16:06–16:09आई वही दिखाता है जो आप इसके समने रकते हैं
- 16:09–16:12एएएएए पूरी तरा से उस देटा पर निरभर है
- 16:12–16:14जो इनसानो ने उसे फीट किया है
- 16:14–16:17मतलब जो जानकारी निटनेट पर है
- 16:17–16:19एएएए बस उसी को पडकर सीक रहा है
- 16:19–16:23अगर अप मशीन को स्वफ रूके सरकारी दस्तावेस पड़ाएंगे
- 16:23–16:25तो वो किसी बाबू की तर अनुवात करेगी
- 16:25–16:26प्लकुल
- 16:26–16:27लेकिन
- 16:27–16:29क्यों कि विकी पीड्या के लेक्हों
- 16:29–16:30अर अन गिनध ब्लोगर्स की
- 16:30–16:32वो दश्खों की महनत काम आती है
- 16:32–16:37अप पक इन लोगोने अपनी बाशा की जो कविताए, कहानिया और मुहावरे अंट्रनेट पडाले है,
- 16:37–16:40वही एएएएए की असली खुराग है.
- 16:40–16:44अगर अप मशीन को स्विष्ट रूके सरकारी दस्टावेस पडाएंगे,
- 16:44–16:46तो उ किसी बाबु की तरग अनुवाद करेगी
- 16:46–16:47आ, बिलकुल
- 16:47–16:52लेकिन, क्यों कि मेठली समुदाय ने अपना बहेतरीं साहित्ते अंट्रनेट पर डाला है
- 16:52–16:55इसली मशीन जब उसे प्रोसेस करती है
- 16:55–17:01तो वो उस ले ए उस मिट्हास और उस सांस्क्रतिक संदरब को भी सीखने की कोशिष करती है.
- 17:01–17:03ये तो बहुती शंदर नजर्या है.
- 17:03–17:06मतलब, अगर आपको AI को अपनी भाशा सिकानी है,
- 17:06–17:08तो ये कोई तकनी की लड़ाई नहीं है,
- 17:08–17:10ये एक सहित्तिक लड़ाई है.
- 17:10–17:12बिलकुल सही पक्डा आपने.
- 17:12–17:16आपको पहले खुद अपनी भाशा का अच्छा सहित्तिय अंट्टनेट पर डालना होगा.
- 17:16–17:20यह आई इन्सानो के ले कोई खट्रा नहीं है, बलकी यह एक पाटनशिप है.
- 17:20–17:23रहा है, यह आई बस एक रिफलेक्ष्छन है.
- 17:23–17:27समवुदाय अपनी भाशा के साथ दिजितल सबेस में जैसा व्यवावार करेगा,
- 17:27–17:57वहाँ तो बज़ागा बज़ागा लगा बज़ागा लगा तो बज़ागा वहाँ तो वहाँ बज़ागा वहाँ तो वहाँ तो वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहा
- 17:57–18:01अप से अच्छे और सब से बुरे दोनो रूपो को बाहर लाती है.
- 18:01–18:05अपने अईन्सानी कमजोरिया भी देखी जैसे पहले नमबर पराने के लिए
- 18:05–18:08ब्लोक की तारीखे बड़लना, क्रेटिट की चोरी करना
- 18:08–18:10और लाएक्स के भीछे बागना.
- 18:10–18:15लेकिन उसी के समानानतर, हमने इनसाली जस्भे की वो जजद बी देखी
- 18:15–18:21जहां कुछ लोगोने बिना किसी लालगजके, अपनी भाशा को जिन्दा रकने के लिए दिन रात एक कर दिया,
- 18:21–18:25नहीं लिपियों को कोड किया और इक पूरी जिजिटल लाएबरेरी कडी कर दी.
- 18:25–18:27और यही इस किताप की सबसे बडीजीद है
- 18:27–18:28एकदम
- 18:28–18:32और आब आजकी इस दीप डाइप को खद्म करने से पहले
- 18:32–18:35मैं श्रोताओ को एक एसे विचार के साथ चोडना चाती हो
- 18:35–18:39जो इस पूरी यात्रा को देखने के बाद मेरे दिमाग में आप्तक गया है
- 18:39–18:40विचार वो?
- 18:40–18:49अमने शुर्वात में बात की ती के कैसे लोग अंटनेट पर पहला मानव लेख हा क्या पहला बलोगर बनने के लिए जुटी लडाया लड़ रहे थे.
- 18:49–18:51लेकिन जरा इस बारे में सोचीए.
- 18:51–18:56जिस गती से एए मेठिली और अन्यक शित्रिये बाशाये सीक रहा है,
- 18:56–19:00उस में लाको पन्नो का साहित ते फीट की आ जा रहा है
- 19:00–19:07क्या वो दिन दूर है, जब हमें इंटनेट पर मेठली की पहली पुरी तरह से एएए दवारा रचित नोवल
- 19:07–19:10या कविताओ का संग्रह देखने को मिलेगा
- 19:10–19:13तकनीकी रुब से दिखें तो ये अब सर विग्यान कता नहीं है
- 19:13–19:16बलकी ये बवडी नस्दी की समभावना है
- 19:16–19:17और जब वो दिन आएगा
- 19:17–19:21चब एक मशीन मेठिली में कोई एसी कविता लिखेगी
- 19:21–19:22चो आप को रुला दे
- 19:22–19:24या कोई एसी कहानी लिखेगी
- 19:24–19:54तो थो जोगा तो बज़़़ पर प्रज़़ दे तो थो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो त
- 19:54–19:59अपनी खुतकी बाशा के बारे में सोचे, उसका दिजिटल अस्तित्व कहा है,
- 19:59–20:02अवो न्ट्टेट क्यों पुराने सरवरो में कही खो रही है,
- 20:02–20:06या वो एएएए के साथ मिलकर अपना एक नया इतिहास लिक रही है.
- 20:06–20:09आजकी इस गहन चर्चा में बस इतना ही.
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अग, खल्पना कीजे की कोई आप से आखर कहे, के उसने ना चान्द पर नीलाम स्टोंग से भी पहले कदम रखखगा था अच्छा? और सबसे मजदार बाद, वो भी एक बेलगाडी में बेटकर रहा, मजद भी एक खोई भी सुलेगा तो हसे गई बिल्कोल, आप यही केंगे ना किबे जिस समें तुम चान्द पर जाने का दावा कर रेव उस समें तु रोक्कित तक्निक मोजुदी नहीं तु तु महां पूँचे कैसे? सईबात है, और सुन्ने में दावा जितना भेतु का लकता है ना दिजितल दुन्या के श्वाटी दोर में लोग एक्दम अज़ाई कर रहे थे एक्दम सही तो आज की हमारी इस दीब डाईव में हम एक अज़ी कहानी पर चर्चा कर रहे है आदार है, आशीश अचिनार जी की एक बहुत ही कमाल की किताब मेठली वेप पत्रकारिता के इतिहास अम और ये किता अप सरफ कुछ तारीकों या गधनाो के लिस्ट नहीं है बलकोल नहीं ये दर सल इस बात का बहुती सती कद्दियन है कि जब कोई भी नहीं तकनी काती है तो इनसानी मनोविग्यान उसके सात कैसे कहिलता है अग और शुर्वात में श्रोताव को लक्सकता है के ख्षेत्रिये वेप पत्रकारिता के इतिहास में अज़ा क्या ध्रिलर होगा. लिकिन मेरा यकीन मानिय, जब आब देकते हैं कि मेठली जैसी एक खषेत्री अबहाशाने इन्ट्रनेत कि उस दीमे डालप वाले दोर से लेकर आजके एए एए यानी आर्टिफिश्टलिजन्स के युग तक का सफर कैसे तैक्या, तो ये किसी सस्पैंस फिल्म से कम नहीं ल� अगर बदाई की शुवात करते है, सब से पहला और बून्यादी सवाल, अगर अगर आई कब किताब में साल दोहाजार के असपास का जो जिक्र है, वो तकनी की रुब से बहुत ही चुनाती पून समय था. बहुत जादद चुनातिपून वूड डालब कनेक्षन का जमाना था आव वुड टेलिफोन वाली अजीप सी आवाजे आती जब यंटनेट कनेक्ट होता था बिल्कुल और एक सादारन सा वेपेच खुलने में भीना कई मिनेट लग जाते थे तो किताब सपष्ट रूप से बताती है, कि वर्ष दोहाजार में याहु जीो सिटीस पर गजेंद्र ताकुर दूरा शूरू किया बहाल सरी गाच ये अंटनेट पर मैठली की पहली प्रामाने को पस्ती ती थी. श्रोताव की जानकारी किलि तोड़ा सा बतादुं की याहु जीो सिटीज अगर था क्या? इसे आप नहीं नद नद की श्रुवाती दोर का एक दिजितल खाली पलोट समच सकते हैं. आप नहीं खाली जमीं कितबा? बिल्कुल, याहु लोगों को अंट्रनेट पर थोडीसी मुझ्त जगे देता ता, जगा आप बेसिक आज्टीमल कोडिं कर के, अपना कुदका एक चोता सा वेप बेज बना सकते थे. आपको लेयाूट से लेके टेक्स्ट तक, सब कुछ मैनूली ताईप कना परताता. इक दम सही का आपने. कोई रेटी में तेम्ठलेत नी होते ते उसमें. गजेंद्र ताखौल जी का वो प्रयास, इसी तरान की तकनी की जद्दो जहत का नतीजा था. और इसके बात दिरे दिरे विकास हूँँँ. अच्छा और क्या क्या आई आई आई आई आई आई आई? तो, 2003 में पल्लो मिखिला नाम की वेप्साइत आई, जिसे आप एक दिजितल पत्रिका के सकते है, और फिर 2004 में समद्या नाम का पहला समचार बलोग शुवहा. रूग तो ये एक बहुती स्वबहाविक क्रमिक विकास था. पहले वेब पेज फिर वेब साइट और फिर बलोग. आप लेकिन इसी स्वबहाविक विकास के बीच में कुछ लोगोने अपनी अलगी ताईमशीन चलादी हाहाहा और किता पर तेवेग बात मुदे सब से जाडा हेरान करने लगीना वो ता कतिक रास बात नामक बलोग का विवाद मतलप कुछ लोगोने कुछ को इंटनेट पर पहला मेठली बलोगर साभित करने किलिए अपने ब्लोक पोस्ट की तारीको मेही हेर फेर कर दी. और यही पर आपकी वो चानपर भेलगाडी वाले बात एक दम सतिक बेटती है. अन्छिनार जीने अपनी किताब में पूरे फर्जीवाडे को बहुत थाखनी की और विष्लेश नात्मक तरीके से बेनाखाब किया है मैं चाती हों के हम इस तकनीकी हिसे को तो और बारीकी से समझें आखर उनो नहीं पक्डा कै से कियों कि आम अँ अन्सान तो ब्लोक पर जो तारीक लिकिया बस उसे इस जच मान लिता है दिए खुगा ये था के कते एक रास पात ब्लोक के संचालोगो ने, तो हाँजार तेरा में एक पोस्त लिखा. तीख है. लिए नो नो ने ब्लोक की सेटिंज में जागगर उस पोस्त की पबलिष देट को बैक देट कर दिया. मदद पुरानी तारीक डाल्दी वश्व उन्निस्वनिन्न्यान्वे की बाप्रे सीदे चोड़ा साल पीचे आप ये दिखाना उनका मक्सध था के वे उन्निस्वनिन्यान्वे से ही अई इंट्रनेट पर मैठली में लिक रहे हैं लेखक ने तकनी की सबूतो के साथ दिखाया की गोगल ने ब्लोगर सरविस को तो जोजार तीन में ख़ीदा था औरे यानी जिस प्लट्फाम परभे निन्न्यानवे में पोष्ट करनेगा दावा कर रहे थे उस रूप मे वो प्लट्फाँं तो वजुद में नहीं था? बलकल नहीं और उस से भी बड़ी बात कस्टम यौर्ल का फीच्चर जिस में आप किसी लिंक के अंदर पुरानी तारीए दिखा सकते हैं वो फीच्छर ब्लोगर पर 2008 और उसके बात के वर्षो में आया था अच्छा मतलब तकनी की रूप से सवर के दिसाईन में ये समब ही नहीं था एक दम असमब लेखवक ने ये अंटनेट आरकाईव और सर्वर देटा का इस तमाल कर के इस जुट को पूरी तरह से पखर लिया. ये जो दिजितल दून्या में अपना जंडा गारने की, खुद को स्थापित करने की, मनोवेग्यानिक भुक है ना? ये बडी अजीब है. मड़ब लोग एक अईसे इतिहास में अपना नाम सूनेजरे अखषरो में दरज कराना चातें, तो पुरी तरा से स्थ कोड़ज पतिका है. हाँ. और ये बूक सर्फ तारीक है बडलने तक सीमित नहीं है. किताब हमें अंटनेट के एक और बहुती क्ष्टरनाग धिजान की तरफ लेजाती है. वलेडेशिन या सत्यापन की भूख वह दे बहुती महतपून बिन्दू है जब हम यंटनेट के सफर की बात करते हैं तो अकसर हम सर्फ फाइदों पर बात करते हैं कि सुचना तुरन्त मिल जाती हैं बंकिं आसान हो गई हैं लेकिन दिजिटल मनोविग्यान समाज को भीतर से कैसे बडल रहा है? किताब इस पर गेहरी चोट करती है. हा! और किताब में, फेसबुक के लाएक बडन बनाने वाले, जस्टिन रोसन्स्टीन का जिक रहे है. ये पडकर मैं सच्मे चोंक गई थी. वुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� अर लंबे विमर्ष्की मांग करता हैं. हैंग? आप बलकुल. लेकिन अब वो साहित्य एक अज़्ेजिटल अखाडे मे दھखेल दिया गया है, जिस से सर्फ तीं सेकं के दोपमाएं हिट्स और तुरंत मिलने वाले लाएक्स के लेदिजाएं कि अग्टाग. मतलब लोग कोई अच्छी कविता लिकने से जाड़ा इस बाद पर दियान देते हैं कि उस पर कितनी जल्दी लाएक साइंगे दलकोल और ये सव्साहित दे किस तर पर नहीं हो रा सोचल मीट्या के इस आख्टेक्च्या का आसर सीधे समाज पर पड़ रा है अग किताब में बहुत स्पष्ट्रूप से बताया गया है कि कैसे राजनी तिग्दल और उनके अईटी सेल इंटिनेट के इसी जिजाईन का उप्योग करते हैं वेक नुस प्यलाने और समाज में उन्माद बवडखाने किलिए जी, किताब में उत्तर प्रदेश के दंगो का उदारन देकर समजाया गया है, के कैसे इंटिनेट पर फलाइ गए जुटी सुचनाों ने, असल दून्या में हिंसा बभडकाने का काम किया. और शूताओ को यहा मैं साव कर दूं, के हम यहां किसी राजनी तिगदल का पक्ष नहीं ले रहे है, बलकी निशपक्ष रूप से सर्व वही बतारे है, जो लेकखक ने अपनी शोद में दरज की आ है. सही कहा. यहां यहां यह समझना जरूरी है, की प्लाट्फोम कर दिसाइन इस आजा है, तो सत्तिकी तुलना में आख्रोष यानी, गुस्से को जाडा ब़ावा देता है. कुईकी आख्रोष से इंगेज्मिन बड़ता है, और इंगेज्मिन से उनका व्यापार चलता है. एक दम सेई. और तकनी के इस शस्त्री करन ने ना एक बड़ विरोदा बास पड़ा कर दिया है. इसने हमें बहुत ग्यानी बना दिया है. लेकिन लेखख के तरख है के अंट्टनेट ने अंसान को ग्यानी के साथ साथ अग्यानी बी बना दिया है. वो इसलिए, कुकि अब हमारी स्मिती, हमारी याद रखनेगी शम्ता, गुगल के सरवर पर निरभर होगगगगगग. हम जानकरी को अपने दिमाग में प्रोठस करनेगे बजाए, सरज यंजन पर चोर देते हैं. और गुगल की अपनी एक रगी समस्स्स्या है, मतलब अगर आप Google पे search करें के दर्ती गोल है तो algorithm आप को उसके sacro-vegyanik सबुध देतेगा अगर अप के search करें के दर्ती चब्टी है तो वही internet आप को उसके भी sacro articles of video देतेगा भिलकल तो यह आप आप वहा के एकी शल्फ पर अपकी आपकी आपकी आपकी आब अपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आपकी आ� तव कईईगुना बड़जाता है. इक जिम्डार संपादक सरफ जानकारी नी देता. वो उस कूडे के देर से आस्ली ग्यान को चाटकर, उसे एक सही संदरब के साथ आप तक लाता है. ये बहुती गेहरी बात कही आपने. और इसी शोरगुल, फेख नुूज, अप विदे है इप पत्रिका और उसके महाभियान के बात करनी हैं। बिलकुल! 2008 में शुरू हुई इस पत्रिका का काम किसी बिब आदे संस्थान के काम से कम नहीं है। अप विदे है अई पत्रिका और उसके महाबियान के बात करनी है। तो मुझे लगा के आस्ली जिटल क्रान्ती तो यहां हो रही है आप विदेह एई पत्रिका और उसके महाभियान के बात करनी है बिलकुल! 2008 में शुरूग हुई इस पत्रिका का काम किसी भी बड़े संस्ठान के काम से कम नहीं है इनुने 15 सो से अदेक मेतली पुस्तकों और पत्रिकांों का मुझ्त दिजितल आरकाईव बना दिया आप एक पुरा एक औनलाई पुस्तकाल आप जी लिकिन जो बात मुझे सब से जादा चोंका गगे उ ये थी की विदे है सर्फ देवनागरी लिपी में पबलिष नहीं हो रही है नहीं बलकल नहीं वे अग्ख तिरुहुता जो मैठली की मुल लिपी है के ती, निवाडी और यहां तक की नेट्रहीनो के लिए ब्रेर एपी में भी प्रकाषित करते हैं भी भी बाशा अज़ा देखाई बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी तो बाशानी � वो विज़ाई विज़ाई विज़ाई वोज़े पर सके और नेत्रहीन शुटाई तक वो साहित दे पहुट्टे पहुटे पहुटे पहुटे पहुटे विज़ाई बहुटे विज़ाई विज़ाई बहुटे विज़ाई विज़ाई विज़ाई विज़ाई विज़ाई व जिसके पास करोडो का बजध हो लिकिन इसे एक समवदाय कुछ समर्पित लोग अपने दंपर कर रहे है वो भी बिना किसी फाइदे के यही एक कम्युन्टी प्रोजट की अस्ली ताकत होती है कोई भी बाशा तब तक जीवित रहती है जब तक उसका समवदाय उस्वेज़े ज़ूए है. किताब में मैत्फिली विकी पीटिया के समवदायक संगषका भी बहुत विस्तार से जिक्र है. अम अखसर विकी पीटिया को बहुत हलके में लिते है, जैसे की ये कोई अप्टमाटिक मशीन हो. आप रे जानकरी अप आप आजाती है. बलक्ल. लिकन आजा नहीं है. 2008 में जब मैठली विकी पीडिया के लिप्रे आज श्वरूए, तो आजा नहीं ता किसी ने एक बटन दबाया और विकी पीडिया बन गया. तो क्या प्रक्रीया थी उसकी? लोगों को विकी मीट्टिया इन्कौबेटर में जाना पडा ये विकी पीटिया का वो तेस्टिंग ग्राण्ड है जान नहीं बहाशाँ का प्रक्षन होता है स्वायम सेवकोने बिना पैसे लिए अपनी रातों की नींद कहराब करके रव बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ ब� मुखेदारा से अलक जागर मैठली गजल को इंटनेट पर एक नहीं पहझान दी. उनहोंने नहीं लेख को को जोडा और यहाद ता की समानानतर, साहित यह अकादमी सम्मान भी शुरू कर दीए. इसका सीदा समतलव यह आगर पारमपरिक संस्थान आपको जगा नहीं देरें हैं तो इंटरनेट आपको अपना कुद का मंज ख़डा करने की आजादी देता हैं एक दम सहीं और ये निस्वार्थ भाँ से किया गया काम ही अस्ली वेप पत्र कारिता हैं ये लोग उन लाएक्स के ले खाम नहीं कर रहे हैं, बलकी आने वली पीडियों के लिए एक दिजिटल द्रोहर तेरार कर रहे हैं, ताकि उनकी भाशा सरवर के किसी कोने में कोने जाए. अब यहाँ से ना कहानी एक अज़े मोड पर आती है, जो सीदे बहविष्षी की और इशारा करता है. दिके जब कोई समुडाय अपनी भाशा का इतना बड़ा दिजितल डेटाबेईस तभाशा कर लेता है जिस में पन्द्रा सो किताबे हो, लाको विकिपीटि आर्टिकल्स हो मिरा मतलब है, तो उस सारे डेटा का अगला पडाफ क्या होता है? उसका अगला पडाव है वो तकनीक जो आज पुरी दुनिया को बड़ल रही है अट्फिशल अंटलगेंस अर मशीन लेनिग पिलकोल किताब का ये आख्री हिस्सा तकनीकी रूप से बहुत ही अधवांस है आई आई अब मैठली बाशा के लिए एक नयाक शितच खूल रहा है. किताब में बताया गया है कि कैसे आई आई बारत की कषेत्री इ बाशाँ के लिए काम कर रहा है. आँ, इस में सबसे प्रमोग उदारन है, अईटी मद्रास के नीलेकनी संटर का, या अगर नादी चाए बाद़ा प्रजेक्त तो ये प्रजेक्त अखिर करता क्या है इनका इंडिक ट्रान्स्टू मोडल बहुती क्रान्तिकारी है ये एक अपन सूर्स याए मोडल है जिसने अंग्रेजी और बाइस भारती ये भाशाँँँ के साथ साथ अब मेठली में भी बहुत सतीक और हैं खाई कौलेती अनुवाद को समबहो बना दिया है. और वाए. और इस के लावा कोई और प्रोजेक भी है? जी. GNU के प्रोटेसर गरीषनात जहा के निरदेशन में मिक्रो सोथ्ट का बिंग च्रन्सलेट प्रोज्ट भी चल्ड़ा है, जो मेठली को सीदे गलोबल टेक एको सिस्टम से जोड़ रहा है. यहा मैं आप से इन तकनीकी शब्डों के पीचे का विग्यान समझना चाती हूँ. किताब में, स्पीच्रेकिणिष्चन और स्पीच्सिन्तिस्सिस जैसे शब्दों का इस्तमाल हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� अगर बाद़़ बाद़़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बा� तो बज़न एक पाटख के तोर पर, मुझे सच में दर भी लग राए. कैसे दर? दिके मैठली बहती मीटी बहाशा है. इस में चंदाजा की कविताव के खलग लै है. लोक गीतों के अपनी एक आत्मा है. शब्दों के गेराए है. अपका ये ये दर बहुत स्वाबहाविक है, और दून्या बहर के बहाशावे इंआनी इस पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन अमें एए एक खाम करने के तरीके को समजना होगा, या प्र वो बस दिक्षनरी से एक शब्द उठाएंगे? उसकी जगा दुस्रा शब्द रख्ठंगे? और एक बहुत फीजान रबाटिक सा अनुवाद कर के चोर देंगे? आपका एदर बहुत स्वाबहाविक है और दून्या बर के बाशावे इंज्यानी इस पर चर्चा कर रहे हैं. लेकिन हमें एएएएके काम करने के तरीके को समजना होगा. एएएएएए आपने अपने कोई जादुई दिमाग नहीं है. आप इसे एक बहुत बड़े आईने की तरा देख सकते हैं. अच्छा एक आईना? आई वही दिखाता है जो आप इसके समने रकते हैं एएएएए पूरी तरा से उस देटा पर निरभर है जो इनसानो ने उसे फीट किया है मतलब जो जानकारी निटनेट पर है एएएए बस उसी को पडकर सीक रहा है अगर अप मशीन को स्वफ रूके सरकारी दस्तावेस पड़ाएंगे तो वो किसी बाबू की तर अनुवात करेगी प्लकुल लेकिन क्यों कि विकी पीड्या के लेक्हों अर अन गिनध ब्लोगर्स की वो दश्खों की महनत काम आती है अप पक इन लोगोने अपनी बाशा की जो कविताए, कहानिया और मुहावरे अंट्रनेट पडाले है, वही एएएएए की असली खुराग है. अगर अप मशीन को स्विष्ट रूके सरकारी दस्टावेस पडाएंगे, तो उ किसी बाबु की तरग अनुवाद करेगी आ, बिलकुल लेकिन, क्यों कि मेठली समुदाय ने अपना बहेतरीं साहित्ते अंट्रनेट पर डाला है इसली मशीन जब उसे प्रोसेस करती है तो वो उस ले ए उस मिट्हास और उस सांस्क्रतिक संदरब को भी सीखने की कोशिष करती है. ये तो बहुती शंदर नजर्या है. मतलब, अगर आपको AI को अपनी भाशा सिकानी है, तो ये कोई तकनी की लड़ाई नहीं है, ये एक सहित्तिक लड़ाई है. बिलकुल सही पक्डा आपने. आपको पहले खुद अपनी भाशा का अच्छा सहित्तिय अंट्टनेट पर डालना होगा. यह आई इन्सानो के ले कोई खट्रा नहीं है, बलकी यह एक पाटनशिप है. रहा है, यह आई बस एक रिफलेक्ष्छन है. समवुदाय अपनी भाशा के साथ दिजितल सबेस में जैसा व्यवावार करेगा, वहाँ तो बज़ागा बज़ागा लगा बज़ागा लगा तो बज़ागा वहाँ तो वहाँ बज़ागा वहाँ तो वहाँ तो वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहाँ वहा अप से अच्छे और सब से बुरे दोनो रूपो को बाहर लाती है. अपने अईन्सानी कमजोरिया भी देखी जैसे पहले नमबर पराने के लिए ब्लोक की तारीखे बड़लना, क्रेटिट की चोरी करना और लाएक्स के भीछे बागना. लेकिन उसी के समानानतर, हमने इनसाली जस्भे की वो जजद बी देखी जहां कुछ लोगोने बिना किसी लालगजके, अपनी भाशा को जिन्दा रकने के लिए दिन रात एक कर दिया, नहीं लिपियों को कोड किया और इक पूरी जिजिटल लाएबरेरी कडी कर दी. और यही इस किताप की सबसे बडीजीद है एकदम और आब आजकी इस दीप डाइप को खद्म करने से पहले मैं श्रोताओ को एक एसे विचार के साथ चोडना चाती हो जो इस पूरी यात्रा को देखने के बाद मेरे दिमाग में आप्तक गया है विचार वो? अमने शुर्वात में बात की ती के कैसे लोग अंटनेट पर पहला मानव लेख हा क्या पहला बलोगर बनने के लिए जुटी लडाया लड़ रहे थे. लेकिन जरा इस बारे में सोचीए. जिस गती से एए मेठिली और अन्यक शित्रिये बाशाये सीक रहा है, उस में लाको पन्नो का साहित ते फीट की आ जा रहा है क्या वो दिन दूर है, जब हमें इंटनेट पर मेठली की पहली पुरी तरह से एएए दवारा रचित नोवल या कविताओ का संग्रह देखने को मिलेगा तकनीकी रुब से दिखें तो ये अब सर विग्यान कता नहीं है बलकी ये बवडी नस्दी की समभावना है और जब वो दिन आएगा चब एक मशीन मेठिली में कोई एसी कविता लिखेगी चो आप को रुला दे या कोई एसी कहानी लिखेगी तो थो जोगा तो बज़़़ पर प्रज़़ दे तो थो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो त अपनी खुतकी बाशा के बारे में सोचे, उसका दिजिटल अस्तित्व कहा है, अवो न्ट्टेट क्यों पुराने सरवरो में कही खो रही है, या वो एएएए के साथ मिलकर अपना एक नया इतिहास लिक रही है. आजकी इस गहन चर्चा में बस इतना ही.