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SADEHA 25 मैथिली_साहित्य_आ_बीहनि_कथाक_यथार्थ.m4a

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Part 1 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 1
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  1. 0:00–0:13ता दिबेट में आहाक स्वागत छे, आहाक कलपना करूं, जे एक ता कथा अते क्चोट ची, जे करा पडवा में औहे सा कम समें लगे चे, जे तेक समें चुलहापर एक कप चाए बनवा में लगे चे.
  2. 0:13–0:15माने मात्र एक सो शब्द?
  3. 0:15–0:17एक दम, मात्र एक सो शब्द.
  4. 0:17–0:22मुदा आ आबी कल्पना करूँ, जे वही एक सो शब्दक कता
  5. 0:22–0:26साहित्तिक दुन्या में मैत्ली भाशक अस्तित्व जातिवाद
  6. 0:26–0:32अस्सान्सक्रितिक भविश्ष्यक लोका एक ता बयंकर वैचारी क्युद ताल कर देला का चे.
  7. 0:32–0:36अ, ये सच्छ्मुच एक ता बहुत महत्वपूर्ण स्तिति आची.
  8. 0:36–0:43ता आई हमर विमर्ष्यक केंद्र मे आची, सम्कालीन मैत्ली साइत दे अब भाशक वर्त्मान स्तिति.
  9. 0:43–0:48मुक्ये रूप सा विदेहा सदे पचीस, पत्रकाक संकलित रचना सब का आदार पर.
  10. 0:48–0:53जदे प्रश्न यह आची जे की मैत्ली साइद ते आपन यी नव विदाक माद्धिम सा,
  11. 0:53–0:57जना भिहन कता बहुगले कुनु नव शिकर पर पूछी रहा लची.
  12. 0:57–1:03वहा फेर यी मात्र मान की करनाक नाम पर आम जन मानस सकती का,
  13. 1:03–1:07अग, कुछ उ सीमित लोकक पूरस्कार बाद्बाक व्यवस्ता बन कर अगला ची?
  14. 1:07–1:12हमर अस्परस्ट मानम अची, जे हां, साहित्ते निरन्तर गतिषी लची
  15. 1:12–1:16इन वव विद्धा अ विदेजे का मंज कम माद्धिम से
  16. 1:16–1:22महीला रच्नाकार आप्रवासी समस्या सब के अथ्यान्त सशक्त रूप से उठाई रहला च्ये.
  17. 1:22–1:25आप हमर द्रिष्टिकोन एह सा पूनता भिन्ना च्ये.
  18. 1:25–1:29मैठिली सहित्यक विकासक जी चित्रहा प्रस्त॥कर रहल च्ये.
  19. 1:29–1:32उ वास्तिक्ता मेक्ता क्रित्रिम सजावत आची
  20. 1:32–1:35आचा ता हा की सब क्रित्रिम लागेट आची
  21. 1:35–1:38एक दम, देखु साहित्यक संस्ता सब
  22. 1:38–1:40आई जातिवादी एक आदिकार्
  23. 1:40–1:43आस्तानिय बूली जेना बज्जि का आवा अंगेका
  24. 1:43–1:46के यूजना बद्तरीका से दरकिनार के बाग करने
  25. 1:46–1:49अपन मूल यचार्त से बहुत दूर बह चुकल आची
  26. 1:49–1:51या ब आम लोक अग दरपन नहीं आची
  27. 1:51–1:54हम भुजी रहल ची जे आजाक छिन्ता कते से आवी रहल आची
  28. 1:54–2:00मुदद तनिक पहीने उही नवव विदापर बाद करे दिया जेकर हम चर्चा किल हूं भिहानी कता
  29. 2:00–2:03रहा, जेकर आहा सब माएक्रो फिक्षिन कहे ची
  30. 2:03–2:10सही, जखन हम पहिलभेर एकर बारे में सुन लहूं, ता हमरा लागल जे एकुनो अंटनेट वला गिमे का ची
  31. 2:10–2:18मुता जखनम गजंदर ताकोर के समपाद की अ सज्या रोपनी पडल हो, उते तेतालिस्ता लेक्ध काजके एक्टा की अल गेल अची?
  32. 2:18–2:19तेतालिस्?
  33. 2:19–2:28आँ, इकोनो चोट गप नहीं आची, इप रमानित करे तची, जी मैठली साहित तिरुकल नहीं आची, उआपन स्वरुप वडले रहल आची.
  34. 2:28–2:33मुदा स्वरुप बडलनाई आप पतन कदिस जैनाई, दुनु में बहुत अंतर होई तची.
  35. 2:33–2:37अहां, एक रविकास मानी रहल ची, मुदा एकर यदार्थ की आचे.
  36. 2:37–2:40यदार्थ? अहां के कहवा की आचे?
  37. 2:40–2:44अहां, अहां के दुक्तर प्रमोथ कुमार जाक अबात मोन होएत,
  38. 2:44–2:49जते अबिहनी कताक तुन्ना, दू मिनेट नुडल्स अ केलनी आचे.
  39. 2:49–2:51ये नूडल सहित्या जे
  40. 2:51–2:54दू मिनेट नूडल्स ये तकनेग भेशी भागल
  41. 2:54–2:58नहीं, सूनू, ये भोखत तुरन्त मिता देता जे
  42. 2:58–3:01मुदा, शरीर के कोनो पोषन न देता जे
  43. 3:01–3:06एक सोचब्द में, आहा कोनो पात्रक मनो वैज्यानेक विष्लेषन केना करब
  44. 3:06–3:08अगरा में गेराई नहीं आजे?
  45. 3:08–3:10ता आजा क्यो ही में गेराई भीटल?
  46. 3:10–3:13अवश्छ, गन शाम, गने रोक, अनोप वा,
  47. 3:13–3:16सतेंद्र, करनक, दिमाग, पजुभ जका भिहनी कता देखू,
  48. 3:16–3:19इगता सब समाजक पाक्श्ण्ड पर जे आचुक प्रहाँईग,
  49. 3:19–3:21अप पास फुट्से करहल थी?
  50. 3:21–3:23एक सो शब्द का मतलब इने आची
  51. 3:23–3:25जे उक्रा में ग़राई नहीं आचे
  52. 3:25–3:27ता आजा कियो ही में ग़राई भीटल?
  53. 3:27–3:29अवश गन शाम गने रोक अनोप वा
  54. 3:29–3:31सतेंद्र करनक दिमाग भजुब
  55. 3:31–3:33जका भिहनी कता देखू
  56. 3:33–3:39इकत्हा सब समाजक पाक्हन्द पर जे आचुक प्रहार करेतची उ अगल्पनी है ची
  57. 3:39–3:43आईकाल एक पाट्खलक पाट्खलक पाट्खलक पोथी पड़बाक समय नहीं आची
  58. 3:43–4:13माने आाके लागे तची जे अटेंष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट
  59. 4:13–4:16देन्नक अबहाव येक्त पेग आरोप अची
  60. 4:16–4:19ये आरोप ने यातार था ची
  61. 4:19–4:22साहित्ते मात्र व्यक्ति केंद्रित बहुगे लचे
  62. 4:22–4:28यात्री जी माने नागार जुन का अगनी जीवी कवितावाला क्रान्ती कतम बहुगे लची
  63. 4:28–4:32अग्रान्ती एही नूडल से साहिट्त में कताया जी
  64. 4:32–4:37अम्रा लागाई तची आहा भिहनी कता के एक तबहुत पेग समाजिक प्रभावक अंदेखा कोरोहल ची
  65. 4:37–4:41जो आहा उही तेतालिष्ता लेक्ख्सुची के देख्वा
  66. 4:41–4:43तो उही में बीस्ता महिला रच्नाकार चती
  67. 4:43–4:52अग, मैठली साहित्यक यतिहास में यतेक पाएग संख्या में महिला रच्नाकारको पस्तेती सामान्य बात नहीं आचे
  68. 4:52–4:58महिला रच्नाकारक प्रवेश के ता हम हो स्वागत करे ची, इनिस चे ये एक ता नीक बात चे
  69. 4:58–5:06ता देखूं, एहन की एक भेल? कारन इचे जे एक सो शबद कता लिखवाक ले लहा, के हबता बरक फुर्सत नहीं चाही?
  70. 5:06–5:10एक ता काज करे वाली महिला समाथ फोंझपर ताईप को सकात अचे.
  71. 5:10–5:15अगर नाव बादल्ला सा परम्पारिक साइट्ट्यक दर्वाजा किछ नवो लोकक लेल हुजल
  72. 5:16–5:22मुदद जखन हम संश्थागत यखार्थ के बात करे ची तकन वास्ट्विक्ता बहुत डर्वान अचे
  73. 5:23–5:25संस्थागत यखार्थ आहाक इशारा कते एची
  74. 5:25–5:55अगर नाद़ा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा
  75. 5:55–6:00पेक्षित वापिछ्डल वर्ग के लेल होईत आची,
  76. 6:00–6:03जक्रा सवर्ना समाज पारमपर एक रूपसा,
  77. 6:03–6:06साहित्या आम मुख्य दारासा दूर राखलने आचे.
  78. 6:06–6:09आचा, जे हार तोर काज करे इच्छती.
  79. 6:09–6:12एक दम मुदा साहित्यक मंच पर,
  80. 6:12–6:14उनकर प्रतिनिदित्वश्वून्या थी
  81. 6:14–6:17दोक्तर किषिन कारिगर अपन व्यंग्य
  82. 6:17–6:21पूरस्कार बता डकायत में एही बात के उगारि कराखे च्छत
  83. 6:22–6:25संस्ता सब मैं एक ता गिरो बन्दी चलेदा थी
  84. 6:25–6:29अम भूजी रहल ची जी संस्तागत अस्तर पर किचु त्रूटी आची
  85. 6:29–6:33मुदा पूरस्कार बटा दकायत संशब्द बहुत कतहुर नहीं बोगेल
  86. 6:33–6:36कतहुर मुदा सत्यता कतहुर होईत ची
  87. 6:36–6:38मुदा आहाई केना भीसरी सकेट ची
  88. 6:38–6:42ये विदेज़का इपत्रिका बिना कोनो पारिष्ट्रमिकक वर्ष्
  89. 6:42–6:44दो हाँजार सन निरन्तर चली रहा लगची
  90. 6:44–6:49राजनन्दन लाल दास का उदारन लिया उनिशकाम भाव्से समपादन के लेने
  91. 6:49–6:53जा सगरी विवस्ता मात्र डलाली अची ते एहन् तपस्वी केना चती
  92. 7:08–7:10अगा की तर्क अतिन्त विचारनी आखी
  93. 7:10–7:12हम इमानेद खी जी
  94. 7:12–7:14आप्दिक प्रोट्साहनक अबहाँ में
  95. 7:14–7:16प्रज्यक लोकक प्रभेश कतिन बोजाईद
  96. 7:16–7:21जक्र आर्टिक स्तिती पहले समजबूत अची माने आलीट वर्ग
  97. 7:21–7:28एक ता गरीब युवा जक्र दूी जूनकर रोटिक जुगाड कर वाख अची उ भिना रोयल्टिक तपस्या के ना करत
  98. 7:28–7:32आहाक यी तर्क अत्तिन्त विचारनी आची
  99. 7:32–7:36अम इमानेद खी जी आर्थिक प्रोट्सानक अबहाँ में
  100. 7:36–7:38रहास्यक लोकक प्रवेश कतिन बोजाए तखी
  101. 7:38–7:42या करना खी जी साहित्यमे समावेशी पन नहीं आखी
  102. 7:42–7:47दोक्तर कारीगर कहे चतिन जी इक ता बाटर सिस्तम जकाची
  103. 7:47–7:50आहा हम्रा चेत्ना समेटी में पुरस्कार दियाव,
  104. 7:50–7:53हम आहा के विद्यार्ती के अकाद्मी में भैसा दिप.
  105. 7:53–7:57माने आग कहब अची जी इसब आपसी सहमती से होई तची,
  106. 7:57–7:58मुदा पाट्खक के की?
  107. 7:58–8:00वैइता पाट्खक कते चती,
  108. 8:00–8:02पोथी केक ने बेकाई तची.
  109. 8:02–8:06दोक्तर कारीगर एक्रा बाँँपात भोवाक बखाखारी कहे चतिन
  110. 8:06–8:08बाँँपात भोवाक बखारी
  111. 8:08–8:10एक्रा अर्थ भेल, खाली बखारी
  112. 8:10–8:13जे बाहर से पैग लागगे, मुदा भीतर अन्ने होई
  113. 8:13–8:14एक्दम सही
  114. 8:14–8:21संस्ता सबख बाहर सब भव्या दिखावा आची पाग दूपट्टक समान आची मुदा भीतर कोनो पाटख नहीं आची
  115. 8:21–8:25आएकर सब सब पैग कारन आची भाशा तका कतित मानकी करन
  116. 8:25–8:29मानकी करन पर ता हमार सब के बाद करे परत
  117. 8:29–8:32आहा एक राप पतन का कारन की आख माने ची
  118. 8:44–8:46अगरा अहा राड कैदल हूँ
  119. 8:46–8:48राड माने गवारू
  120. 8:48–8:50जकन अहा एक ता किसान के कहच्छे
  121. 8:50–8:52जे तोब हाशा अशुद़ है
  122. 8:52–8:54तकन अहा अखर स्वाभिमान मारे च्छे
  123. 8:54–8:56हम बुजे रहल ची
  124. 8:56–8:58जस्तानिया बोली का राड कहव
  125. 8:58–9:00अप मान जना कच्छे
  126. 9:00–9:02राद माने गवारु
  127. 9:02–9:04जखन आहा एक ता किसान के कहत चे
  128. 9:04–9:06जे तोर भाशा अशुदद है
  129. 9:06–9:09तकन आहा वोकर स्वाभिमान मारे ची
  130. 9:09–9:10हम भुजे रहल ची
  131. 9:10–9:12जे अस्तानिया बोली का राड कहव
  132. 9:12–9:14अप्मान जनक अची
  133. 9:14–9:16एक रासम वेग्यानिक दूरी बनेल
  134. 9:16–9:20मुदा विदेजका मंज एदूरी का कम करवाक प्रैयास करो रहा लचे
  135. 9:20–9:22के ना प्रैयास करो रहा लचे
  136. 9:22–9:27देखू, साहित्यता एकनो समाजक पीरा के प्रतिविम्बित करो रहा लची
  137. 9:27–9:32दोक्तर योगानन्द जाका उपन्यास मात्री भूमिलिया
  138. 9:32–9:42एकर पात्र जयन्त आसुदाकर जे प्रवासी मेठिल चती उआपन गाम गूरी का अवएच्छती आप विश्विद्याले बनेवाक संग्रष करएच्छती.
  139. 9:42–9:45इप पलायंस लडबाक यतार थाची
  140. 9:45–9:49जयन्त आसुदाकर विश्विद्याले बनारहल चती.
  141. 9:49–9:52यादार्त था ची वा एलीटवर्क का फेंतेसी
  142. 9:52–9:54आहा एक रा फेंतेसी की अख खच्छी
  143. 9:54–9:57यीता एक ता सकरात्मक विजन आची
  144. 9:57–10:04वास्तिकता बुज्वाक लेल आहा की सन्तोष् कुमार राए बतो ही कव्यंग बक्री संस्क्रिती परहे परद
  145. 10:04–10:06अगर उद़्ाई बाखरी पोसी रहल आची
  146. 10:06–10:08बच्चा इस्कूल नहीं जाए तची
  147. 10:08–10:10कारन उक्रा बख्री चराभे लेल एक ता अद्मी चाही
  148. 10:10–10:12पैक भखः अपंजाब खधे लेल पलायन करे तची
  149. 10:12–10:14इप पलायन एक टराउन महामारी आची
  150. 10:14–10:16हम्रा लागत आची
  151. 10:16–10:19जदे गरीद लोग बंग से लों लगक बक्री पोषी रहल अची
  152. 10:19–10:21बच्चा इस्कूल नहीं जाएत छी
  153. 10:21–10:24कारन उक्रा बक्री चराभे लेल एक ता अद्मी चाही
  154. 10:24–10:28पैक भख को पंजाब खधे लेल पलायन करे तची
  155. 10:28–10:31इप पलायन एक टराउन महामारी अची
  156. 10:31–10:35अम्रा लागत अची आहा साहित्ति के जादू के चफरी माने लेल हूँची
  157. 10:35–10:38साहित्ति कोनो सरकार नहीं आची जे फैक्त्री लगा देत
  158. 10:38–10:41साहित्ति के काज अची प्रष्नुथा वब
  159. 10:41–10:45मुदा उगाय संसक्रिति का जूथा चेत्रता नहीं बना बै
  160. 10:45–10:49मुदा सूनो, जे बखरी संस्क्रिती के बात आख कर रहल ची
  161. 10:49–10:53वियंग से हो तव विदे हे पत्रिका में प्रकाषिद बहल आची नहीं
  162. 10:53–10:55इत यह साहित्ते के सफलता आची
  163. 10:55–10:57आ, यह बात आची
  164. 10:57–10:59आ, जे उसंस्तागत भेमानी
  165. 10:59–11:02आ, एलीट फन्तासी के तोडी का
  166. 11:02–11:06या तार्थक के आपन मन्च पर जगादार है लजी यी प्रमानित करेत अजी
  167. 11:06–11:10जे साहिट्ते में सेल्ट्करेक्षन के शम्ता मोजुद अजी
  168. 11:10–11:13दिखूं, एक ता पत्रिका में कोन व्यंग चापी जैनाय
  169. 11:13–11:17आज समगरे संस्तागत धाचा में परिवर्तन आनाय
  170. 11:17–11:18तुनु दुई बात अची
  171. 11:18–11:23जावद्दरी एकादमिक पूरस्कार बक्री संस्क्रिती भोगे भाला कात में नेजाएत
  172. 11:23–11:26इसाहित दे मुथ्फरी लोकक बद्धिक व्यायाम अची
  173. 11:26–11:29आहाक के चतावनी भोज्पष्त अची
  174. 11:29–11:31आएकर गंविर्ता के हम स्विकार करेच्छी
  175. 11:31–12:01मुदा हमराई हो माने पडद, जे बदलाव रातो राती नही हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  176. 12:01–12:05अगर जरी के अस्तानिये माटिक जर्वत होई तची
  177. 12:05–12:08आए दरी हम्रा लोकनी जे विमर्ष के लू
  178. 12:08–12:09उ एस पस्ट करे तची
  179. 12:09–12:13जे मैतली साहित ते एक ता नाजुक मुदा महत पून पथाल अची
  180. 12:13–12:17एक दम आईही पर विमर्ष जारी रहा बाक चाही
  181. 12:17–12:21अदिनु गोते का आहमर सब शोताक द्ड़ेवाद
  182. 12:21–12:24हमरा लोकनी जल्दिये बेटव एक ता नविमर्ष कसंग

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ता दिबेट में आहाक स्वागत छे, आहाक कलपना करूं, जे एक ता कथा अते क्चोट ची, जे करा पडवा में औहे सा कम समें लगे चे, जे तेक समें चुलहापर एक कप चाए बनवा में लगे चे. माने मात्र एक सो शब्द? एक दम, मात्र एक सो शब्द. मुदा आ आबी कल्पना करूँ, जे वही एक सो शब्दक कता साहित्तिक दुन्या में मैत्ली भाशक अस्तित्व जातिवाद अस्सान्सक्रितिक भविश्ष्यक लोका एक ता बयंकर वैचारी क्युद ताल कर देला का चे. अ, ये सच्छ्मुच एक ता बहुत महत्वपूर्ण स्तिति आची. ता आई हमर विमर्ष्यक केंद्र मे आची, सम्कालीन मैत्ली साइत दे अब भाशक वर्त्मान स्तिति. मुक्ये रूप सा विदेहा सदे पचीस, पत्रकाक संकलित रचना सब का आदार पर. जदे प्रश्न यह आची जे की मैत्ली साइद ते आपन यी नव विदाक माद्धिम सा, जना भिहन कता बहुगले कुनु नव शिकर पर पूछी रहा लची. वहा फेर यी मात्र मान की करनाक नाम पर आम जन मानस सकती का, अग, कुछ उ सीमित लोकक पूरस्कार बाद्बाक व्यवस्ता बन कर अगला ची? हमर अस्परस्ट मानम अची, जे हां, साहित्ते निरन्तर गतिषी लची इन वव विद्धा अ विदेजे का मंज कम माद्धिम से महीला रच्नाकार आप्रवासी समस्या सब के अथ्यान्त सशक्त रूप से उठाई रहला च्ये. आप हमर द्रिष्टिकोन एह सा पूनता भिन्ना च्ये. मैठिली सहित्यक विकासक जी चित्रहा प्रस्त॥कर रहल च्ये. उ वास्तिक्ता मेक्ता क्रित्रिम सजावत आची आचा ता हा की सब क्रित्रिम लागेट आची एक दम, देखु साहित्यक संस्ता सब आई जातिवादी एक आदिकार् आस्तानिय बूली जेना बज्जि का आवा अंगेका के यूजना बद्तरीका से दरकिनार के बाग करने अपन मूल यचार्त से बहुत दूर बह चुकल आची या ब आम लोक अग दरपन नहीं आची हम भुजी रहल ची जे आजाक छिन्ता कते से आवी रहल आची मुदद तनिक पहीने उही नवव विदापर बाद करे दिया जेकर हम चर्चा किल हूं भिहानी कता रहा, जेकर आहा सब माएक्रो फिक्षिन कहे ची सही, जखन हम पहिलभेर एकर बारे में सुन लहूं, ता हमरा लागल जे एकुनो अंटनेट वला गिमे का ची मुता जखनम गजंदर ताकोर के समपाद की अ सज्या रोपनी पडल हो, उते तेतालिस्ता लेक्ध काजके एक्टा की अल गेल अची? तेतालिस्? आँ, इकोनो चोट गप नहीं आची, इप रमानित करे तची, जी मैठली साहित तिरुकल नहीं आची, उआपन स्वरुप वडले रहल आची. मुदा स्वरुप बडलनाई आप पतन कदिस जैनाई, दुनु में बहुत अंतर होई तची. अहां, एक रविकास मानी रहल ची, मुदा एकर यदार्थ की आचे. यदार्थ? अहां के कहवा की आचे? अहां, अहां के दुक्तर प्रमोथ कुमार जाक अबात मोन होएत, जते अबिहनी कताक तुन्ना, दू मिनेट नुडल्स अ केलनी आचे. ये नूडल सहित्या जे दू मिनेट नूडल्स ये तकनेग भेशी भागल नहीं, सूनू, ये भोखत तुरन्त मिता देता जे मुदा, शरीर के कोनो पोषन न देता जे एक सोचब्द में, आहा कोनो पात्रक मनो वैज्यानेक विष्लेषन केना करब अगरा में गेराई नहीं आजे? ता आजा क्यो ही में गेराई भीटल? अवश्छ, गन शाम, गने रोक, अनोप वा, सतेंद्र, करनक, दिमाग, पजुभ जका भिहनी कता देखू, इगता सब समाजक पाक्श्ण्ड पर जे आचुक प्रहाँईग, अप पास फुट्से करहल थी? एक सो शब्द का मतलब इने आची जे उक्रा में ग़राई नहीं आचे ता आजा कियो ही में ग़राई भीटल? अवश गन शाम गने रोक अनोप वा सतेंद्र करनक दिमाग भजुब जका भिहनी कता देखू इकत्हा सब समाजक पाक्हन्द पर जे आचुक प्रहार करेतची उ अगल्पनी है ची आईकाल एक पाट्खलक पाट्खलक पाट्खलक पोथी पड़बाक समय नहीं आची माने आाके लागे तची जे अटेंष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट देन्नक अबहाव येक्त पेग आरोप अची ये आरोप ने यातार था ची साहित्ते मात्र व्यक्ति केंद्रित बहुगे लचे यात्री जी माने नागार जुन का अगनी जीवी कवितावाला क्रान्ती कतम बहुगे लची अग्रान्ती एही नूडल से साहिट्त में कताया जी अम्रा लागाई तची आहा भिहनी कता के एक तबहुत पेग समाजिक प्रभावक अंदेखा कोरोहल ची जो आहा उही तेतालिष्ता लेक्ख्सुची के देख्वा तो उही में बीस्ता महिला रच्नाकार चती अग, मैठली साहित्यक यतिहास में यतेक पाएग संख्या में महिला रच्नाकारको पस्तेती सामान्य बात नहीं आचे महिला रच्नाकारक प्रवेश के ता हम हो स्वागत करे ची, इनिस चे ये एक ता नीक बात चे ता देखूं, एहन की एक भेल? कारन इचे जे एक सो शबद कता लिखवाक ले लहा, के हबता बरक फुर्सत नहीं चाही? एक ता काज करे वाली महिला समाथ फोंझपर ताईप को सकात अचे. अगर नाव बादल्ला सा परम्पारिक साइट्ट्यक दर्वाजा किछ नवो लोकक लेल हुजल मुदद जखन हम संश्थागत यखार्थ के बात करे ची तकन वास्ट्विक्ता बहुत डर्वान अचे संस्थागत यखार्थ आहाक इशारा कते एची अगर नाद़ा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा दादा पेक्षित वापिछ्डल वर्ग के लेल होईत आची, जक्रा सवर्ना समाज पारमपर एक रूपसा, साहित्या आम मुख्य दारासा दूर राखलने आचे. आचा, जे हार तोर काज करे इच्छती. एक दम मुदा साहित्यक मंच पर, उनकर प्रतिनिदित्वश्वून्या थी दोक्तर किषिन कारिगर अपन व्यंग्य पूरस्कार बता डकायत में एही बात के उगारि कराखे च्छत संस्ता सब मैं एक ता गिरो बन्दी चलेदा थी अम भूजी रहल ची जी संस्तागत अस्तर पर किचु त्रूटी आची मुदा पूरस्कार बटा दकायत संशब्द बहुत कतहुर नहीं बोगेल कतहुर मुदा सत्यता कतहुर होईत ची मुदा आहाई केना भीसरी सकेट ची ये विदेज़का इपत्रिका बिना कोनो पारिष्ट्रमिकक वर्ष् दो हाँजार सन निरन्तर चली रहा लगची राजनन्दन लाल दास का उदारन लिया उनिशकाम भाव्से समपादन के लेने जा सगरी विवस्ता मात्र डलाली अची ते एहन् तपस्वी केना चती अगा की तर्क अतिन्त विचारनी आखी हम इमानेद खी जी आप्दिक प्रोट्साहनक अबहाँ में प्रज्यक लोकक प्रभेश कतिन बोजाईद जक्र आर्टिक स्तिती पहले समजबूत अची माने आलीट वर्ग एक ता गरीब युवा जक्र दूी जूनकर रोटिक जुगाड कर वाख अची उ भिना रोयल्टिक तपस्या के ना करत आहाक यी तर्क अत्तिन्त विचारनी आची अम इमानेद खी जी आर्थिक प्रोट्सानक अबहाँ में रहास्यक लोकक प्रवेश कतिन बोजाए तखी या करना खी जी साहित्यमे समावेशी पन नहीं आखी दोक्तर कारीगर कहे चतिन जी इक ता बाटर सिस्तम जकाची आहा हम्रा चेत्ना समेटी में पुरस्कार दियाव, हम आहा के विद्यार्ती के अकाद्मी में भैसा दिप. माने आग कहब अची जी इसब आपसी सहमती से होई तची, मुदा पाट्खक के की? वैइता पाट्खक कते चती, पोथी केक ने बेकाई तची. दोक्तर कारीगर एक्रा बाँँपात भोवाक बखाखारी कहे चतिन बाँँपात भोवाक बखारी एक्रा अर्थ भेल, खाली बखारी जे बाहर से पैग लागगे, मुदा भीतर अन्ने होई एक्दम सही संस्ता सबख बाहर सब भव्या दिखावा आची पाग दूपट्टक समान आची मुदा भीतर कोनो पाटख नहीं आची आएकर सब सब पैग कारन आची भाशा तका कतित मानकी करन मानकी करन पर ता हमार सब के बाद करे परत आहा एक राप पतन का कारन की आख माने ची अगरा अहा राड कैदल हूँ राड माने गवारू जकन अहा एक ता किसान के कहच्छे जे तोब हाशा अशुद़ है तकन अहा अखर स्वाभिमान मारे च्छे हम बुजे रहल ची जस्तानिया बोली का राड कहव अप मान जना कच्छे राद माने गवारु जखन आहा एक ता किसान के कहत चे जे तोर भाशा अशुदद है तकन आहा वोकर स्वाभिमान मारे ची हम भुजे रहल ची जे अस्तानिया बोली का राड कहव अप्मान जनक अची एक रासम वेग्यानिक दूरी बनेल मुदा विदेजका मंज एदूरी का कम करवाक प्रैयास करो रहा लचे के ना प्रैयास करो रहा लचे देखू, साहित्यता एकनो समाजक पीरा के प्रतिविम्बित करो रहा लची दोक्तर योगानन्द जाका उपन्यास मात्री भूमिलिया एकर पात्र जयन्त आसुदाकर जे प्रवासी मेठिल चती उआपन गाम गूरी का अवएच्छती आप विश्विद्याले बनेवाक संग्रष करएच्छती. इप पलायंस लडबाक यतार थाची जयन्त आसुदाकर विश्विद्याले बनारहल चती. यादार्त था ची वा एलीटवर्क का फेंतेसी आहा एक रा फेंतेसी की अख खच्छी यीता एक ता सकरात्मक विजन आची वास्तिकता बुज्वाक लेल आहा की सन्तोष् कुमार राए बतो ही कव्यंग बक्री संस्क्रिती परहे परद अगर उद़्ाई बाखरी पोसी रहल आची बच्चा इस्कूल नहीं जाए तची कारन उक्रा बख्री चराभे लेल एक ता अद्मी चाही पैक भखः अपंजाब खधे लेल पलायन करे तची इप पलायन एक टराउन महामारी आची हम्रा लागत आची जदे गरीद लोग बंग से लों लगक बक्री पोषी रहल अची बच्चा इस्कूल नहीं जाएत छी कारन उक्रा बक्री चराभे लेल एक ता अद्मी चाही पैक भख को पंजाब खधे लेल पलायन करे तची इप पलायन एक टराउन महामारी अची अम्रा लागत अची आहा साहित्ति के जादू के चफरी माने लेल हूँची साहित्ति कोनो सरकार नहीं आची जे फैक्त्री लगा देत साहित्ति के काज अची प्रष्नुथा वब मुदा उगाय संसक्रिति का जूथा चेत्रता नहीं बना बै मुदा सूनो, जे बखरी संस्क्रिती के बात आख कर रहल ची वियंग से हो तव विदे हे पत्रिका में प्रकाषिद बहल आची नहीं इत यह साहित्ते के सफलता आची आ, यह बात आची आ, जे उसंस्तागत भेमानी आ, एलीट फन्तासी के तोडी का या तार्थक के आपन मन्च पर जगादार है लजी यी प्रमानित करेत अजी जे साहिट्ते में सेल्ट्करेक्षन के शम्ता मोजुद अजी दिखूं, एक ता पत्रिका में कोन व्यंग चापी जैनाय आज समगरे संस्तागत धाचा में परिवर्तन आनाय तुनु दुई बात अची जावद्दरी एकादमिक पूरस्कार बक्री संस्क्रिती भोगे भाला कात में नेजाएत इसाहित दे मुथ्फरी लोकक बद्धिक व्यायाम अची आहाक के चतावनी भोज्पष्त अची आएकर गंविर्ता के हम स्विकार करेच्छी मुदा हमराई हो माने पडद, जे बदलाव रातो राती नही हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ अगर जरी के अस्तानिये माटिक जर्वत होई तची आए दरी हम्रा लोकनी जे विमर्ष के लू उ एस पस्ट करे तची जे मैतली साहित ते एक ता नाजुक मुदा महत पून पथाल अची एक दम आईही पर विमर्ष जारी रहा बाक चाही अदिनु गोते का आहमर सब शोताक द्ड़ेवाद हमरा लोकनी जल्दिये बेटव एक ता नविमर्ष कसंग

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