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अरब_से_मिथिला_तक_गजल_का_सफर.m4a
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- 0:00–0:09बालेवुट की फिल्मों और मशूर गानों दश्षों को तक हमारे दिमाग में एक एक खास तरा की चवी बिटादी है
- 0:09–0:11आ, बलकुल एक बहुती रूडी वादी चवी
- 0:11–0:12सविका
- 0:12–0:18मतलब, हमें हमेशा यही लखता है कि साकी कोई बहध खुबसुरत महीला होती है,
- 0:18–0:20जो मैं खाने में शराब परोसती है.
- 0:20–0:23जो की अटिहासिक रूप से एक दं गलत है?
- 0:23–0:24बिलकोल.
- 0:24–0:26लेकिन क्या हो अगर मैं कहुए,
- 0:26–0:30की अस्ली अर्भी गजलो में साकी हमेशा एक पूरुष होता ता
- 0:30–0:35और जब यही गजल अरब के रेगिस्तानो से सफर करती हुई
- 0:35–0:38भिहार के मित्ला अंचल तक पूँची
- 0:38–0:42तो वो शराब ताडी बन गई और वो साकी पासी बन गया
- 0:42–0:46ये सच में एक बहुत ही अदबुत सांसक्रतिक यात्रहें
- 0:46–0:47है ना
- 0:47–0:49तो आज के जेहन अद्द्दियन में
- 0:49–0:51हम एक बहुत ही दिल्चस्प
- 0:51–0:54और अटिहासिक स्रोज समगरी पर चर्चा कर रहे है
- 0:54–0:57आशीश अचिनाहर जी दवारा लिकित पुस्तक
- 0:57–1:00मैत्ली गजलक व्याकरन उईतिहास
- 1:00–1:02और ये कोई सादारन किताब नहीं है दिखिया?
- 1:02–1:03नहीं
- 1:03–1:06ये किताब स्रफ एक काव्य विदा के नियम नहीं बताती हैं
- 1:06–1:08तो फिर इसका मुख्यो देशि क्या है?
- 1:08–1:12ये असल में इस बात का एक शान्दार एतिहासिक दस्तावीज है
- 1:12–1:18कि कैसे कोई एक कला का रूप अपनी बहगुलिक और सांसक्रतिक सीमाई पार करता है
- 1:18–1:21मतलब एक जगग से जगगा द्श्री जगा डल जाना
- 1:21–1:26एक दम सही ये कुछ वैसा ही है ज़ैसे आप फारस की किसी शान्दार मसजित का ब्लुप्रिंट लें
- 1:26–1:28लेक्हक ने श्वर्वात मेही ये बाद बहुत स्पष्ट कर दी है,
- 1:28–1:30कि ये पुस तक उन्लोगों के लेही है,
- 1:30–1:32जो बिना पडे किसी बाद पर बहेस करते हैं.
- 1:32–1:34आच्छ, तो ये गंभीर पाटखों के लेही हैं?
- 1:34–1:35जी भिल्कुल.
- 1:35–1:37तो वो बहुत बाटखों के लेही है.
- 1:56–2:02ये उन गंभीर ग्यान प्पासुमों किलिए है तो किसी विदा की ज़़ों तक गज्राई में जाना चाथे हैं
- 2:02–2:04तो चलिए हम भीज गज्राई में चलते हैं
- 2:04–2:08व्म खिसी भी बहरी दाचे को जब हम अपनी जमीं पर उतारते हैं
- 2:08–2:11तो सब से पहले उसका नाम करन अपने तरीके से करते हैं
- 2:11–2:13हां, शुर्वाद तो नाम से होती है
- 2:13–2:16तो स्रोथ में सब से पहला
- 2:16–2:19और सब से मुखर विवाद इसी बात पर है
- 2:19–2:22की इसे गजल कहा जाए, या गजल
- 2:22–2:24मतलब अरभी और उर्दू में तो
- 2:24–2:27ज़ की दूनी के लिए अखषर की नुक्ता लगा जाता है नहीं?
- 2:27–2:57ज़ और गज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज
- 2:57–3:02या ज़ ज़ ज़ एसे अख्षरों के निचे नुक्ता लगाकर उच्चारन करने की कोई प्राक्रितिक परमपरा नहीं.
- 3:03–3:06बड़ब वहां की फिस्ठानिया बोली में वो दूनिया है ही नहीं.
- 3:06–3:09बलकल! मैठली की अपनी एक अलग मिटास और गुलाई है,
- 3:09–3:12तो जब कोई विद्हा आपकी बहाशा में आगी है,
- 3:12–3:16तो उसे आपकी बहाशा के व्याकरन और उच्चारन के निमों के सामने जुकना ही होगा.
- 3:16–3:18ये तो बहुती तार्खिग बात है.
- 3:18–3:21आप तो अरभी का शबद जब मैठली में आता है,
- 3:21–3:25तो वियाकरनिक और दून्ने आत्मक रूप से गजली बन जाता है.
- 3:25–3:29नुक्ता हता देना असल में ये गोशना है,
- 3:29–3:31कि अब ये विद्धा पराए नहीं रहीं.
- 3:31–3:33ये अब हमारी अपनी हो चुकिये.
- 3:33–3:37मतलब नाम से ही देसी करन की एक पक्कि शुर्वात हो गए.
- 3:37–3:39तो इसका जन मसल में कहां वाथ हो था?
- 3:39–3:43इस याद्रा को समजने किलिए हमें इसलाम के उदेसे भी पहले के अरब में जाना होगा
- 3:43–3:47उस युख को जाहिलिया या अंद्खार युग कहा जाता है
- 3:47–3:53कोई भी ये सोथ सकता है कि मद्द्यपूर्फ की ये विद्धा, मित्ला के खेटो और खलियानो तक कैसे पहुज गय?
- 3:54–3:56ये एक बोथ लंबा और दिल्चास्प सफर रहा है.
- 3:56–3:59तो इसका जन मसल में कहां वा था?
- 3:59–4:03अँ इस्यात्रा को समजने किले हमें इस्लाम के उदे से भी पहले के अरब में जाना होगा.
- 4:03–4:08उस्युख को जाहिलिया या अंदकार योग कहा जाता है.
- 4:08–4:11अच्छा अंदकार योग. वहां क्या उता तो तो समें?
- 4:11–4:13उस समें वहां कबिलाई संसक्रिती ती.
- 4:13–4:15और लोग अपने कभीले के सर्दारों
- 4:15–4:17या योध्दावो की प्रशन्सा में
- 4:17–4:19जो लंबे लंबे गीट गाते ते
- 4:19–4:21उने कसीदा काह जाता था
- 4:21–4:25एक मिनेट तो एक कभीलाई प्रष्ष्तिगान
- 4:25–4:28यानी कसीदा गजल में कैसे बड़ल गया
- 4:28–4:31ये दोनो तो बहत अलग विदान लकती है.
- 4:31–4:34यही पर मानव मनोविग्यान काम करता है.
- 4:34–4:37देखे कसीदे के शुर्वात अकसर प्रेम कवरनन से होती थी.
- 4:37–4:39अच्छा प्रेम प्रसंग से.
- 4:39–4:41आजिसे तश्भीभ कहते थे.
- 4:41–4:44तो जब कसीदे को उसी प्रेम वाले हिससे ने
- 4:44–4:47अपना एक अलग स्वतन्त्र और अदिक व्यक्तिगत रूब ले लिया
- 4:47–4:48तब गजल कजन हूँँँँ
- 4:48–4:49औरे वा!
- 4:49–4:52तो इसका को एक जन्डाता भी रहा होगा?
- 4:52–4:53जी भिल्कुल
- 4:53–4:56इम्रूल कैस नाम के बहुत बड़े अरभी शावर को
- 4:56–4:57गजल कजन्डाता माना जाता है
- 4:57–4:59तो उनो ने शुर्वात केसे की ती?
- 4:59–5:03खल्पना गी जे, के एक शाएर अपनी प्रेमिका के उज़े हुए गर
- 5:03–5:05या बस्ती के खंडरो के पास खडा है.
- 5:05–5:09उसके जाने के गम में रोर है, और कविता कह रहा है.
- 5:09–5:11बहुती बहावुग द्रिष्चे है.
- 5:11–5:16बस वही से सविद्धा मे विरह अर प्रेम की गेरी समवेदना जुड़गगग.
- 5:16–5:19यानी एक तरह की काना बदोश विरह कवीटा.
- 5:19–5:23आप फिर अरब से ये फारस कैसे पहुझी?
- 5:23–5:29जैसे जेसे यसलाम का विस्तार हुँआ ये विदा एराक और इरान यानी फारस पहुची
- 5:29–5:31और फारस में तो इसका रूपी बड़ल गया होगा
- 5:31–5:33बलकल बडल गया
- 5:33–5:37फारस में रुद की रूमी और हापिस जैसे महान शाएरोने से
- 5:37–5:39पूरी तरे से नया आयाम दे दिया
- 5:39–5:41मतला उन्लों इस में कुछ नया जोड दिया
- 5:41–5:44आँ, उन्लों इस सानसारेक विरहे में
- 5:44–5:47सूफीवाद, दर्षन और रहेसिवाद को जोड दिया
- 5:47–5:50अब महभुब स्रफ को इनसान न नहीं ता
- 5:50–5:52बलके इश्वर करुब बन गया था
- 5:52–5:53सूफीवाद का प्रभाव
- 5:53–5:55और भारत में ये का बाई?
- 5:55–5:57पारस सी ये विदा आमीर खुस्रो के साथ बारत आई
- 5:57–6:00और जहां तक मित्ला की बात है
- 6:00–6:03इस विदान आप मैतली की दरती पर अपना पहला प्रामानिक कडम
- 6:03–6:05उननिस सो पाच मे रखा
- 6:05–6:06उननिस सो पाच में
- 6:06–6:08किसने की आता ये प्रेओग?
- 6:08–6:11पन्टिट जीवनजाने अपने नाटक सुन्दर सयोग में
- 6:11–6:12इसका सब से पहले प्रहो किया था
- 6:12–6:15अरब के रेगिस्तान से शुरू हो कर
- 6:15–6:17पन्टिट जीवनजाने नाटक तक का सपर
- 6:17–6:19वं, कमाल है
- 6:19–6:21लेकिन यहा एक बहुत बड़ा
- 6:21–6:23व्यवाहरिक सवाल उटता है
- 6:23–6:31जब गजल मित्ला पूची, तो वो आरब के खजुर या आंगुर की शराब या फारस के प्रतीको के साथ,
- 6:31–6:34तो मित्ला के लोगो से समवाद नहीं कर सकती ती ना?
- 6:34–6:36बलकल नहीं, बलकल नहीं कर सकती ती.
- 6:36–6:43मित्फला के एक किसान के लिए अंगूर की शराब का वो सानसक्रतिक महत्वा कैसे हो सकता है,
- 6:43–6:45जो किसी इरानी शायर के लिए था.
- 6:45–6:50और दिक इसी जगा इस रोट समगरी का सबसे शान्दार हिस्वा सामने आता है.
- 6:50–6:52प्रतीकों का पुरी तरह से दिसी करन.
- 6:52–6:57आँ, कुई कि गजल में मैं काने और शराब का तो बड़ बड़ा प्रतिकात्मक महत्वा है?
- 6:57–6:59बड़ बड़ा महत्वा है.
- 6:59–7:04ये वो जगा मानी जाती है जाथा है जान अपने सानसारिक बंधनो और जुटे आंकार को बूल कर
- 7:04–7:08उच्छ अद्दाद्मिक अवस्था में पूशता है
- 7:08–7:11तो अर्भी या उर्दू शाईरी में शराब को मैं कहा जाता है?
- 7:11–7:16आप, लेक्हक आशीश अंचिनार जी ने बुत मस्बूती से ये तर्ग दिया है,
- 7:16–7:18कि मैतली में इसके लिए ताडी शब्द का परुँग,
- 7:18–7:20सबसे सतीख और प्राक्रतिक है.
- 7:20–7:23ताडी? यह तो एक देट शब्द है?
- 7:23–7:25जी, एक दम जमीनी शब्द.
- 7:25–7:28लिकिन स्रोथ में एक जगा ये भी बहेस है,
- 7:28–7:30के अगर देसी नशाही चाही चाही था,
- 7:30–7:33तो बाँग शब्द का इस्तमाल क्यो नी क्या गया?
- 7:33–7:38मितला में तो शिव की पूजा और बाँग का बहुत पूअडना सम्मन्द है?
- 7:38–7:44ये बहुत यी वाधिब सवाल है, लेकन इसके पीछे का तर्क, बहुत यी दिल्च्ष्प और तर्किक है.
- 7:44–7:45अचा क्या तर्किः?
- 7:45–7:49देखे गजल के पूरे दाचे में, शराप पिलाने वाले का,
- 7:49–7:53यहने साकी का, एक बहुत महतोपूर्ँज्थान होता है.
- 7:53–7:57आशिक खुछ शराप नहीं पीता, उसे साकी पिलाता है.
- 7:57–8:01और वो साकी की आँखो, यह उसके हातो की तारीव करता है.
- 8:01–8:07बलकुल. आब भांक के साथ समस्स्या यह इंजान उसे खुद सिलबटे पर गिसता है,
- 8:07–8:08चानता है और पीलेता है.
- 8:08–8:12और है हा, उस में कोई तुसरा इंसान तुशामिली नहीं होता.
- 8:12–8:16सही कहा. उस में वो सामाजे किया दूी पकषिय संबन रही नहीं
- 8:16–8:21जब की ताडी कोई और पेड़ पर च़ग़कर उतारता है और ताजा ताजा पिलाता है
- 8:21–8:24तो ताडी में पिलाने वाले की वो भूमिका मोजुद है
- 8:24–8:28जो गजल की सन्रचना के लिए बहुत जरूरी है
- 8:28–8:29एक दम सभजे आप
- 8:29–8:31आप बाथ समझ में आई आई
- 8:31–8:35तो आरभी का साकी मेठिली में आके पासी बनजें.
- 8:35–8:40पासी वो स्थानिया समवदाय है, जो पारमपरे क्रूप से ताडी उतारने का काम करता है.
- 8:40–8:43ये तो एक पूरी की पूरी सांसक्रितिक शिझ्टिंग हो गए,
- 8:43–8:47और जैसा के हमने शुर्वात में बात की ती
- 8:47–8:49कि साकी मुल्रुप से पूरुष होता था
- 8:49–8:54तो ये पासी शब्द उस अटिहासेक सतीक्ता को भी बनाय रकता है
- 8:54–8:55बिलकुल बनाय रकता है
- 8:55–8:57साकी का ये देसी करन
- 8:57–9:00ये सावित करता है के गजल अप किसी महमान की तरह नहीं
- 9:00–9:05बल की मित्ला की जमीन के एक सबवावेख हिस्से की तरह रहे रही है
- 9:05–9:08या इसके साथ बर्टनो के नाम भी बदल गय?
- 9:08–9:09आप, बलकोल बदल गय.
- 9:09–9:11अरभी में जो सुराही मीना के लाती ती
- 9:11–9:16मैठली गजल में उसे दाबा कत्या या लबनी कहागे है.
- 9:16–9:19अच्छा, ये सब ताडी रक्ने वाले स्थानी एं मिट्टी के बर्टन है?
- 9:19–9:23जी, और जार है, मैए खाना अप पासी खाना या ताडी खाना बन गय?
- 9:23–9:27मैए खाने और पासी खाने की ये जमीनी बात तो बहुत इ दिल्चास्प है.
- 9:27–9:32उम लेकिन गजल की उसल आत्मा है, उम तो शराब नहीं बल की इश्क है.
- 9:32–9:34आप, इश्क ही उसकी बून्याद है.
- 9:34–9:37और जैसा के आप ने पहले रूमी और हाफिज का जिक्र किया,
- 9:37–9:42उम ये इश्क सिफ किसी अनसान से शारी रिक प्रेम की बात तो नहीं,
- 9:42–9:44ये उसे कही अदेक गहरा है.
- 9:44–9:45इं।
- 9:45–9:48ये गजल का सब से गुड़ पहलू है.
- 9:48–9:50दिकि गजल में जो इश्क है,
- 9:50–9:52वो सर्फ इश्के मजाजी,
- 9:52–9:54यहनी सानसारिक प्रेम नहीं है.
- 9:54–9:55तो फिर क्या है?
- 9:55–9:57वो इश्के हखीकी,
- 9:57–10:00यह आप इश्वर यह प्रेम की तरव जाने के एक रास्ता है
- 10:01–10:05इस्लाम और सूफी वाद में इस रूहानी इश्क के साथ मुकाम
- 10:05–10:07यह आप विस्तार से बताए गय हैं
- 10:07–10:11साथ स्तर, मतलवे एक सच्चा आशिक वही है
- 10:11–10:12जो इस सातोस तरों की
- 10:13–10:14कथन्यात्रा तैकरे है
- 10:14–10:15बलकोल सेई.
- 10:15–10:18स्रोथ में उन सातो स्तरों का बहुत बारीकी से जिकर है.
- 10:18–10:24अगर मुने समजने की कोशिष करें, तो ये एक अनसान के मनोविग्यान के चरम पर पोचने की कहानी लकती है.
- 10:24–10:29इसे एसे समजी, पहला स्तर है हब, जिस का मतलब है आकरषन.
- 10:29–10:59किसी को बस एक नजर देखा और उसकी तरफ खिचाओ मैहसुस हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 10:59–11:29जो था अद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा
- 11:29–11:59अद्द बवाद बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाश
- 11:59–12:00वो कुन्सा बिन्दू?
- 12:00–12:04इस पुरे अद्ध्धियन का सब से विस्मैकारी और सुन्दर इस्सा है
- 12:04–12:07रूप गो सुमी जीने जो साथस्तर बताए है
- 12:07–12:14वे है सनेह, मान, प्रनै, राग, अनुराग, बहाव, और अन्त्मे महाबहाव
- 12:14–12:20अगर आप दियान दे, तो ये यात्रा भी उसी तरा आखर्षन यानी सनेहे से शूरो तीए,
- 12:20–12:21और महाभाव पर कफत्मो तीए.
- 12:21–12:26और महाभाव थीक वही अवस्ता है, जो सूफी वाद में फना है.
- 12:26–12:27एक दम सही.
- 12:27–12:30जहां रादा और क्रिषन इतने एक रूप हो जाते है,
- 12:30–12:34रादा कुतको क्रिष्न और क्रिष्न कुतको रादा समजने लकते हैं
- 12:34–12:36चेतना का पुरी तरहे से विलै हो जाता है
- 12:36–12:40लेकिन क्या ये सर्फ एक इत्फाक है
- 12:40–12:43कि दू बिलकुल रवग रवग हिस्सो में
- 12:43–12:45तो रवग रवग ध्रमो में
- 12:45–12:47प्रेम के मनो विग्यान को लेकर
- 12:47–12:50बलकुल एक जैसा दाचा विखसित हूँ?
- 12:50–12:52ये इसकी पीचे कोई अतिहासे कनेक्ष्छन है?
- 12:52–12:53रहा, वोई.
- 12:53–12:55या कोई कनेक्ष्छन है?
- 12:55–12:56ये जे अज इत्तिफाक नी लखता.
- 12:56–12:57अच्छा, एसा क्यो?
- 12:57–13:01संत रुप को स्वामी व्रिंदावन में सादू बनने से पहले
- 13:01–13:04पंगाल के शासक हुसेंच्छाए के दर्बार में
- 13:04–13:06एक बहुत उचे पदपर मंत्री � thay.
- 13:06–13:08औरे मुझे ये नहीं पता था.
- 13:08–13:10उनका तत्काली नाम दबीर खास था.
- 13:10–13:12और वो अरभी फारसी भाशा
- 13:12–13:14और सूफी दर्शन के बहुत बड़े
- 13:14–13:18अगर बाद्ती बखती परमप्रागे दर्षन को एक दुसरे में पिरो दिया हो
- 13:18–13:20ये तो सच्छ में कमाल की बात है
- 13:20–13:23गयान जब बदत्ता है, तो वो दारमिक सीमाय नहीं देक्ता
- 13:23–13:24बिल्ग्ल नहीं देक्ता
- 13:24–13:26ये बहुती खुबसूरत बात है
- 13:26–13:29कि उनोंने सूफी वाद के फना वाले दर्षन
- 13:29–13:32और भारतिय भकती परमपरा के दर्षन को
- 13:32–13:34एक दुसरे में पिरोद्या हो
- 13:34–13:36ये तो सच्छ में कमाल की बात है
- 13:36–13:37गयान जब बटता है
- 13:37–13:39तो वो दारमिक सीमाय नहीं देखता
- 13:39–13:40बलकल नहीं देखता
- 13:40–13:46ये बवाथी खुबसुरत बात है, कि कैसे सूफी सन्त और वेशनव भखत एक ही आद्यात्मिक भाशा बोल रहे थे.
- 13:46–13:52लिकिन इस पूरी चर्चा मे एक एक विरोदाबास नजर आता है.
- 13:52–13:53कैसा विरोदाबास?
- 13:53–13:57अगर गर गस्ल आत्मा ये फना ये महाभाव है,
- 13:57–14:02तो ये कितनी बडी विटम बना है, के इस आसीम प्रेम को विक्त करने के लिए,
- 14:02–14:05जिस विद्हा का जुनाव की आगया, यानी गजल,
- 14:05–14:09उसका व्याक्रन तुन्या कि सबसे सथ व्याक्रनो में से एक है.
- 14:09–14:11रहा, ये बात तो है.
- 14:11–14:15उसका व्याक्रन दून्या के सबसे सच्थ व्याक्रनो में से एक है?
- 14:15–14:17आँ ये बात तो है
- 14:17–14:20असीम आत्मा के लिए इतना कत्होर शरीर क्यो?
- 14:20–14:24व्यरोदा भासी गजल की अस्ली ताकत
- 14:24–14:27देखे जब भावनाय बहुत उफान पर हूं
- 14:27–14:29जब प्रेम असीम हो जाए
- 14:29–14:31तो उसे बहेज आने से रोकने के लिए,
- 14:31–14:34एक बहुत ही मजबूद बांद की ज़ोड़त होती है.
- 14:34–14:37आच्छा, तो गजल का व्याक्रन वो बांद है.
- 14:37–14:40जी, गजल का सक्थ व्याक्रन वो ही बांद है.
- 14:40–14:42ये उर्जा को बिखरने नहीं देता.
- 14:42–14:46बलकि उसे एक लेजर भीम कितर तीखा और असर्दार बना देता है
- 14:46–14:48तो इसका बून्यादी धाहाचा क्या होता है?
- 14:48–14:51इसका बून्यादी धाहाचा शेर पर तिका होता है
- 14:51–14:54एक शेर में केवल दो पंक्तिया होती हैं
- 14:54–14:55और?
- 14:55–15:01ये दोनो पंक्तिया आपस में बहुती खास तरीके से बात करती हैं बिल्कुल
- 15:01–15:06पहली पंक्ति को मिस्राय ओला कैतें इसका काम है एक जमीन तयार करना
- 15:06–15:12या एक सवाल क़ा करना ये कुछ वैसा है जैसे आप तीर चलाने के लिए कमान को पीचे कीच रहे हूं
- 15:12–15:14बवध हुब और दूस्री पंक्ती
- 15:14–15:17और दूस्री पंक्ती को मिस्राय सानी कैते हैं
- 15:17–15:20ये वो पंक्ती है जिस में आस्ली पंच या निशकर्ष होता है
- 15:20–15:23ये खिची हुई कमान से चूटा हुए तीर है
- 15:23–15:26जो सीडा सुन्ने वाले के दिल पर लगता है
- 15:26–15:30और मुशायरो में जब दूस्री पंक्ती पर लोग वावा करते हैं,
- 15:30–15:34तो असल में उसी तीर के निशाने पर लगने की दाध हुती है.
- 15:34–15:35बलकुल सही.
- 15:35–15:41श्रोथ में गजल की सन्रच्ना को लेकर दो बहुत महतुपों शब्डो का विस्तार से जिक रहें.
- 15:41–15:42विस्तार जी.
- 15:42–15:47गजल का जो सब से पहला शेर होता है, उदै होने की जगा.
- 15:47–15:49और इसकी क्या कासिध होती है?
- 15:49–15:55इसकी कासिध यह है के इसके दोनो मिस्रों के अंथ में, काफ्या और रदीप समान रुप से आता है.
- 15:55–15:57और मक्ता क्या होता है?
- 15:57–15:59रदीप समान रुब से आता है.
- 15:59–16:01और मक्ता क्या होता है?
- 16:01–16:03गजल का जो अक्री शेर होता है,
- 16:03–16:05जिस में शायर अपना नाम
- 16:05–16:08या अपना उपनाम जिसे तखलूस कैते है,
- 16:08–16:10उसका इस्तमाल करता है,
- 16:10–16:12उसे मक्ता गा जाता है.
- 16:12–16:14मक्ता का अर्थ है कातनी की जगा,
- 16:14–16:44अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ�
- 16:44–16:49वर्तनी का नहीं ये बाशा की मुल दूनियो और उसकी ज़ों को बचाने का विवाद है.
- 16:49–16:51तोड़ा विस्तार से समझाए एए.
- 16:51–16:55दिके बहेस ये है कि ज़े से एक शबद है जिसे हम को आएल लिकते है,
- 16:55–16:57जिस का मतलब है किया हूँँँँँँँ.
- 16:57–16:59प्राचीन मेठली में एक अपरेवोग हूता था
- 16:59–17:02ज़से आएल, गाए, काएल
- 17:02–17:02वुँँँ
- 17:02–17:03तो फिर विवाद क्या है?
- 17:03–17:07मद्दिकाल मे आखर इसकि स्थान पर यव कचलन बडगया
- 17:07–17:09ज़से आएल, गाए, काएल
- 17:10–17:11लेखग ने अपनी किताब में
- 17:11–17:18बवोट्स्पष्ट और कडा रुक अपनाया है कि एक प्रेएोगी अदिक प्रामानेक और दन्ने आत्मक रुप से सही है.
- 17:18–17:23लेकिन यहा मैं लेक्हक के विचार से थोडा असहमत होना चाहूंगी
- 17:23–17:25यह कम सिकम एक सवाल तो उठाना चाहूंगी.
- 17:25–17:26जी, बलकल पुचिए.
- 17:26–17:28बाशा तो समें कि साथ बदलती हैं ना?
- 17:28–17:30इक बहती हुई नदी कितरा है
- 17:30–17:32अगर आज मैठली बोलने लोग
- 17:32–17:34यव बोल रहे हैं
- 17:34–17:35और कयल लिख रहे है
- 17:35–17:38तो लेखख पुरानी एव आली विवस्थापर ही
- 17:38–17:39क्यों अडे है?
- 17:39–18:09तो आप यह तो बज़ादा था जब बज़ादा था जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ा�
- 18:09–18:14तो आप स्वर की मिथास और उसकी सतीक मात्रा को बचाट रहे होते हैं
- 18:14–18:17जो गजल की बहर में एक दम सही बटती है
- 18:17–18:22या का इस्तमाल उस गनित को और दूनी की उस गुलाई को बिगार देता है
- 18:22–18:24आप समझी
- 18:24–18:27इसलिये लेकख का ये आग्रा बाशा को शुद रखने
- 18:27–18:30और गजल के कडे मीटर को सादने के लिए बहुत जरूरी है
- 18:30–18:33मतलब ये महेज व्याकरन का नीम नहीं है
- 18:34–18:37ये गजल के संगीट को बचाने के कोशिष है
- 18:37–18:38एक दम सेई
- 18:38–18:41और जब बाट संगीट और मीटर की आती है
- 18:41–18:44तो किताब में गजल लिखने की ट्रेनिंग का जो हिस्चा है,
- 18:44–18:47वो मुझे सब से ज़ादा रोमान्चित करता है.
- 18:47–18:50हाँ, वो हिस्चा बहुत खास है.
- 18:50–18:53मुझे अमेश लकता था की कविता बस दिल से निकलती है,
- 18:53–18:54और कागस पर उतर आती है.
- 18:54–18:58लिकिन यहां तो इसके बाकाइदा रियाज की बात की गगे है?
- 18:58–19:01गजल के दूनिया में यह रियाज बहुत कथोर हूटा है
- 19:01–19:05इसके लिए साटी मुशाईरा और तराई मुशाईरा का आयोजन हूटा है
- 19:05–19:06साटी मुशाईरा क्या हूटा है?
- 19:06–19:10साथती मुशायरा गजल सीकने की पहली सीटी है
- 19:10–19:12इस में एक अजीब अगरीब नियम होता है
- 19:12–19:15की शायर को गजल लिखनी होती है
- 19:15–19:18लेकिन उस में शब्दों का कोई अर्थ होना जरूरी नहीं है
- 19:18–19:20ये तो बहुत ही अनोखी बात है
- 19:20–19:22बिना अर्थ की गजल
- 19:22–19:28जब मैंने इस रोत में पड़ा तो मुझे तुरन्त शास्त्रिय संगीत की यादा गगी
- 19:28–19:29आच्छ वो कैसे
- 19:29–19:33ये बिलकुल वैसा ही है जएसे शास्त्रिय संगीत सीकते समए
- 19:33–19:37गायक सर्फ सारे गामा पाक खार्यास करता है
- 19:37–19:41सार ए गामा का अपने अपने कोई शाबदिक अर्ठ तो नहीं होता
- 19:41–19:45लेकिन वो गायक के गले की माशपेशियों को तगयार करता है
- 19:45–19:47उसके सुरों को पक्का करता है
- 19:47–19:48बहुति खुबसुरत उप्मा है
- 19:48–19:54तो सोती मुशाईरा भी शायएद शायर के दिमाग की मास पेशीों को मीटर के लिए तेयार करता होगा.
- 19:54–19:57बलकोल, सोती मुशाईरा शायर की बहर पकी करता है.
- 19:57–20:06इसका मकसत स्र्फ ले मात्रा और शब्दों के वजन को गजल के एक दम सतीक साच्छे में ड़ालने की प्रक्तिस करना होता है.
- 20:06–20:09और जब सुर पक्का हो जाता है तब क्या होता है?
- 20:09–20:13जब शायर का सुर पक्का हो जाता है, जब उसे मीटर की नस समज में आजाती है,
- 20:13–20:16तब वो तरही मुशारा में जाता हैं.
- 20:16–20:19जगां उसे एक लाईन देदी जाती है.
- 20:19–20:22आयोजक की तरव से एक पंकती देदी जाती है,
- 20:22–20:23जिसे तरहे ए विस्रा कैते हैं,
- 20:23–20:26अप सभी शायरों को उसी पंकती की ले,
- 20:26–20:31उसके काफिया और रदीप की जमीन पर अपनी अपनी नगगजल लिखनी होती है.
- 20:31–20:34ये तो शायर की असली परिक्षा होती होगी.
- 20:34–20:38भिलकल कि वो एक तैसीमा के भीतर अपनी कितनी मोलिक उडान बहर सकता है.
- 20:38–20:40लेखव ने इस बात पर बहुत जोर दिया है,
- 20:40–20:47अज के दोर में जो लोग बिना भेहर या बिना मीटर के खुज भी लिखकर उसे गजल कनाम दे देटे हैं.
- 20:47–20:49उस सहिथ्ये के सात अन्याय हैं.
- 20:49–20:51नियम जरूरी हैं.
- 20:51–20:54जी. नियम आपकी आजादी को चींते नहीं हैं.
- 20:54–20:57बलकी वे उसाजादी को एक असा खुबसुरत आकार देते हैं,
- 20:57–20:59जो सदियों तक जिंदा रहे सके.
- 20:59–21:01ये एक बहुत ही शव्षक्त विचार है.
- 21:01–21:04स्वतन्त्रता और अनुशासन का बहतरीन संटुलन.
- 21:05–21:08तो अगर हम इस पूरी चर्चा को समेटें,
- 21:08–21:12तो आशीश अंचिनार जी की ये किताब
- 21:12–21:15मैत्टिली गजलक व्याकरन अ एतिहास
- 21:15–21:19सर्फ काफ्या रदीप और मात्राँ की इस गिन्ती करना नहीं सिक्हाती.
- 21:19–21:24बलकल नहीं, ये किताब हमें एक बड़ा सांस्क्रितिक पाट पडाती है.
- 21:24–21:25वो पाट क्या है?
- 21:25–21:32ये दिकाती है के से कला की कोई एक विदा, अरब के गरम इतिखास से निकलती है,
- 21:32–21:36सूफी सन्तों और अवेशनव भक्तों के दर्षन से गुजरती है,
- 21:36–21:43और अंतता ता हम मिठला के ताडे के पेडों और पासी खाने की स्थानियता में अपनी गेरी ज़ने जमा लेती है.
- 21:43–21:49ये मानव सब्विता के जुडने और एक दूसर को अपनाने का सब से सुन्दर दारने है.
- 21:49–21:52तच में, ये एक अधबूत यात्रा है.
- 21:52–21:56और ये हमें ये भी सोचने पर मजबोर करता है,
- 21:56–21:59की बाशा कितनी लचीली और शकती शाली होती है.
- 21:59–22:04लेकिन इं सब बातों के बीच मेरे दिमाग में एक और विचार गूम रहा है
- 22:04–22:04वो क्या?
- 22:04–22:06जो मैं श्रोताव के लिए चोडना चाहूंगी
- 22:06–22:09इस पुस्तक में इस बात का भी जिक्र है
- 22:09–22:13कि कैसे लेक्हक ने अपने ब्लोग अंचिनार अखर के जर ये
- 22:13–22:16इंटनेट का बर्पूर इस्तमाल करते हुए
- 22:16–22:19इस विद्धा को और लोगो तक पहचाया
- 22:19–22:20राद इंटनेट ने बहुत मदद की है
- 22:20–22:23तो आज जब हम इस दिजटल युग में जी रहें
- 22:23–22:25जहां इंटनेट ने दूनिया की
- 22:25–22:29रहाँ रहाँ बहुगोलिक सीमा को मिता दिया है
- 22:29–22:34तो क्या आने वाले कल में हमें कोई आईसी नई वेश्विक कावे विद्धा देखने को मिलेगी
- 22:34–22:37जिसकी आपनी कोई सरहद ही नहों?
- 22:37–22:39यह तो बविश्ठी ही बताएगा
- 22:39–22:44अग, बविश्या का एक बलकुल नया व्याक्रन लिखेगा,
- 22:44–22:50जहां शाएद पूरी दुन्या की संस्कितिया एक ही समय में एक दुस्रे में गुल्मिल रही हूंगी.
- 22:50–22:52ये सुचने माली बात है
Plain text
बालेवुट की फिल्मों और मशूर गानों दश्षों को तक हमारे दिमाग में एक एक खास तरा की चवी बिटादी है आ, बलकुल एक बहुती रूडी वादी चवी सविका मतलब, हमें हमेशा यही लखता है कि साकी कोई बहध खुबसुरत महीला होती है, जो मैं खाने में शराब परोसती है. जो की अटिहासिक रूप से एक दं गलत है? बिलकोल. लेकिन क्या हो अगर मैं कहुए, की अस्ली अर्भी गजलो में साकी हमेशा एक पूरुष होता ता और जब यही गजल अरब के रेगिस्तानो से सफर करती हुई भिहार के मित्ला अंचल तक पूँची तो वो शराब ताडी बन गई और वो साकी पासी बन गया ये सच में एक बहुत ही अदबुत सांसक्रतिक यात्रहें है ना तो आज के जेहन अद्द्दियन में हम एक बहुत ही दिल्चस्प और अटिहासिक स्रोज समगरी पर चर्चा कर रहे है आशीश अचिनाहर जी दवारा लिकित पुस्तक मैत्ली गजलक व्याकरन उईतिहास और ये कोई सादारन किताब नहीं है दिखिया? नहीं ये किताब स्रफ एक काव्य विदा के नियम नहीं बताती हैं तो फिर इसका मुख्यो देशि क्या है? ये असल में इस बात का एक शान्दार एतिहासिक दस्तावीज है कि कैसे कोई एक कला का रूप अपनी बहगुलिक और सांसक्रतिक सीमाई पार करता है मतलब एक जगग से जगगा द्श्री जगा डल जाना एक दम सही ये कुछ वैसा ही है ज़ैसे आप फारस की किसी शान्दार मसजित का ब्लुप्रिंट लें लेक्हक ने श्वर्वात मेही ये बाद बहुत स्पष्ट कर दी है, कि ये पुस तक उन्लोगों के लेही है, जो बिना पडे किसी बाद पर बहेस करते हैं. आच्छ, तो ये गंभीर पाटखों के लेही हैं? जी भिल्कुल. तो वो बहुत बाटखों के लेही है. ये उन गंभीर ग्यान प्पासुमों किलिए है तो किसी विदा की ज़़ों तक गज्राई में जाना चाथे हैं तो चलिए हम भीज गज्राई में चलते हैं व्म खिसी भी बहरी दाचे को जब हम अपनी जमीं पर उतारते हैं तो सब से पहले उसका नाम करन अपने तरीके से करते हैं हां, शुर्वाद तो नाम से होती है तो स्रोथ में सब से पहला और सब से मुखर विवाद इसी बात पर है की इसे गजल कहा जाए, या गजल मतलब अरभी और उर्दू में तो ज़ की दूनी के लिए अखषर की नुक्ता लगा जाता है नहीं? ज़ और गज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज या ज़ ज़ ज़ एसे अख्षरों के निचे नुक्ता लगाकर उच्चारन करने की कोई प्राक्रितिक परमपरा नहीं. बड़ब वहां की फिस्ठानिया बोली में वो दूनिया है ही नहीं. बलकल! मैठली की अपनी एक अलग मिटास और गुलाई है, तो जब कोई विद्हा आपकी बहाशा में आगी है, तो उसे आपकी बहाशा के व्याकरन और उच्चारन के निमों के सामने जुकना ही होगा. ये तो बहुती तार्खिग बात है. आप तो अरभी का शबद जब मैठली में आता है, तो वियाकरनिक और दून्ने आत्मक रूप से गजली बन जाता है. नुक्ता हता देना असल में ये गोशना है, कि अब ये विद्धा पराए नहीं रहीं. ये अब हमारी अपनी हो चुकिये. मतलब नाम से ही देसी करन की एक पक्कि शुर्वात हो गए. तो इसका जन मसल में कहां वाथ हो था? इस याद्रा को समजने किलिए हमें इसलाम के उदेसे भी पहले के अरब में जाना होगा उस युख को जाहिलिया या अंद्खार युग कहा जाता है कोई भी ये सोथ सकता है कि मद्द्यपूर्फ की ये विद्धा, मित्ला के खेटो और खलियानो तक कैसे पहुज गय? ये एक बोथ लंबा और दिल्चास्प सफर रहा है. तो इसका जन मसल में कहां वा था? अँ इस्यात्रा को समजने किले हमें इस्लाम के उदे से भी पहले के अरब में जाना होगा. उस्युख को जाहिलिया या अंदकार योग कहा जाता है. अच्छा अंदकार योग. वहां क्या उता तो तो समें? उस समें वहां कबिलाई संसक्रिती ती. और लोग अपने कभीले के सर्दारों या योध्दावो की प्रशन्सा में जो लंबे लंबे गीट गाते ते उने कसीदा काह जाता था एक मिनेट तो एक कभीलाई प्रष्ष्तिगान यानी कसीदा गजल में कैसे बड़ल गया ये दोनो तो बहत अलग विदान लकती है. यही पर मानव मनोविग्यान काम करता है. देखे कसीदे के शुर्वात अकसर प्रेम कवरनन से होती थी. अच्छा प्रेम प्रसंग से. आजिसे तश्भीभ कहते थे. तो जब कसीदे को उसी प्रेम वाले हिससे ने अपना एक अलग स्वतन्त्र और अदिक व्यक्तिगत रूब ले लिया तब गजल कजन हूँँँँ औरे वा! तो इसका को एक जन्डाता भी रहा होगा? जी भिल्कुल इम्रूल कैस नाम के बहुत बड़े अरभी शावर को गजल कजन्डाता माना जाता है तो उनो ने शुर्वात केसे की ती? खल्पना गी जे, के एक शाएर अपनी प्रेमिका के उज़े हुए गर या बस्ती के खंडरो के पास खडा है. उसके जाने के गम में रोर है, और कविता कह रहा है. बहुती बहावुग द्रिष्चे है. बस वही से सविद्धा मे विरह अर प्रेम की गेरी समवेदना जुड़गगग. यानी एक तरह की काना बदोश विरह कवीटा. आप फिर अरब से ये फारस कैसे पहुझी? जैसे जेसे यसलाम का विस्तार हुँआ ये विदा एराक और इरान यानी फारस पहुची और फारस में तो इसका रूपी बड़ल गया होगा बलकल बडल गया फारस में रुद की रूमी और हापिस जैसे महान शाएरोने से पूरी तरे से नया आयाम दे दिया मतला उन्लों इस में कुछ नया जोड दिया आँ, उन्लों इस सानसारेक विरहे में सूफीवाद, दर्षन और रहेसिवाद को जोड दिया अब महभुब स्रफ को इनसान न नहीं ता बलके इश्वर करुब बन गया था सूफीवाद का प्रभाव और भारत में ये का बाई? पारस सी ये विदा आमीर खुस्रो के साथ बारत आई और जहां तक मित्ला की बात है इस विदान आप मैतली की दरती पर अपना पहला प्रामानिक कडम उननिस सो पाच मे रखा उननिस सो पाच में किसने की आता ये प्रेओग? पन्टिट जीवनजाने अपने नाटक सुन्दर सयोग में इसका सब से पहले प्रहो किया था अरब के रेगिस्तान से शुरू हो कर पन्टिट जीवनजाने नाटक तक का सपर वं, कमाल है लेकिन यहा एक बहुत बड़ा व्यवाहरिक सवाल उटता है जब गजल मित्ला पूची, तो वो आरब के खजुर या आंगुर की शराब या फारस के प्रतीको के साथ, तो मित्ला के लोगो से समवाद नहीं कर सकती ती ना? बलकल नहीं, बलकल नहीं कर सकती ती. मित्फला के एक किसान के लिए अंगूर की शराब का वो सानसक्रतिक महत्वा कैसे हो सकता है, जो किसी इरानी शायर के लिए था. और दिक इसी जगा इस रोट समगरी का सबसे शान्दार हिस्वा सामने आता है. प्रतीकों का पुरी तरह से दिसी करन. आँ, कुई कि गजल में मैं काने और शराब का तो बड़ बड़ा प्रतिकात्मक महत्वा है? बड़ बड़ा महत्वा है. ये वो जगा मानी जाती है जाथा है जान अपने सानसारिक बंधनो और जुटे आंकार को बूल कर उच्छ अद्दाद्मिक अवस्था में पूशता है तो अर्भी या उर्दू शाईरी में शराब को मैं कहा जाता है? आप, लेक्हक आशीश अंचिनार जी ने बुत मस्बूती से ये तर्ग दिया है, कि मैतली में इसके लिए ताडी शब्द का परुँग, सबसे सतीख और प्राक्रतिक है. ताडी? यह तो एक देट शब्द है? जी, एक दम जमीनी शब्द. लिकिन स्रोथ में एक जगा ये भी बहेस है, के अगर देसी नशाही चाही चाही था, तो बाँग शब्द का इस्तमाल क्यो नी क्या गया? मितला में तो शिव की पूजा और बाँग का बहुत पूअडना सम्मन्द है? ये बहुत यी वाधिब सवाल है, लेकन इसके पीछे का तर्क, बहुत यी दिल्च्ष्प और तर्किक है. अचा क्या तर्किः? देखे गजल के पूरे दाचे में, शराप पिलाने वाले का, यहने साकी का, एक बहुत महतोपूर्ँज्थान होता है. आशिक खुछ शराप नहीं पीता, उसे साकी पिलाता है. और वो साकी की आँखो, यह उसके हातो की तारीव करता है. बलकुल. आब भांक के साथ समस्स्या यह इंजान उसे खुद सिलबटे पर गिसता है, चानता है और पीलेता है. और है हा, उस में कोई तुसरा इंसान तुशामिली नहीं होता. सही कहा. उस में वो सामाजे किया दूी पकषिय संबन रही नहीं जब की ताडी कोई और पेड़ पर च़ग़कर उतारता है और ताजा ताजा पिलाता है तो ताडी में पिलाने वाले की वो भूमिका मोजुद है जो गजल की सन्रचना के लिए बहुत जरूरी है एक दम सभजे आप आप बाथ समझ में आई आई तो आरभी का साकी मेठिली में आके पासी बनजें. पासी वो स्थानिया समवदाय है, जो पारमपरे क्रूप से ताडी उतारने का काम करता है. ये तो एक पूरी की पूरी सांसक्रितिक शिझ्टिंग हो गए, और जैसा के हमने शुर्वात में बात की ती कि साकी मुल्रुप से पूरुष होता था तो ये पासी शब्द उस अटिहासेक सतीक्ता को भी बनाय रकता है बिलकुल बनाय रकता है साकी का ये देसी करन ये सावित करता है के गजल अप किसी महमान की तरह नहीं बल की मित्ला की जमीन के एक सबवावेख हिस्से की तरह रहे रही है या इसके साथ बर्टनो के नाम भी बदल गय? आप, बलकोल बदल गय. अरभी में जो सुराही मीना के लाती ती मैठली गजल में उसे दाबा कत्या या लबनी कहागे है. अच्छा, ये सब ताडी रक्ने वाले स्थानी एं मिट्टी के बर्टन है? जी, और जार है, मैए खाना अप पासी खाना या ताडी खाना बन गय? मैए खाने और पासी खाने की ये जमीनी बात तो बहुत इ दिल्चास्प है. उम लेकिन गजल की उसल आत्मा है, उम तो शराब नहीं बल की इश्क है. आप, इश्क ही उसकी बून्याद है. और जैसा के आप ने पहले रूमी और हाफिज का जिक्र किया, उम ये इश्क सिफ किसी अनसान से शारी रिक प्रेम की बात तो नहीं, ये उसे कही अदेक गहरा है. इं। ये गजल का सब से गुड़ पहलू है. दिकि गजल में जो इश्क है, वो सर्फ इश्के मजाजी, यहनी सानसारिक प्रेम नहीं है. तो फिर क्या है? वो इश्के हखीकी, यह आप इश्वर यह प्रेम की तरव जाने के एक रास्ता है इस्लाम और सूफी वाद में इस रूहानी इश्क के साथ मुकाम यह आप विस्तार से बताए गय हैं साथ स्तर, मतलवे एक सच्चा आशिक वही है जो इस सातोस तरों की कथन्यात्रा तैकरे है बलकोल सेई. स्रोथ में उन सातो स्तरों का बहुत बारीकी से जिकर है. अगर मुने समजने की कोशिष करें, तो ये एक अनसान के मनोविग्यान के चरम पर पोचने की कहानी लकती है. इसे एसे समजी, पहला स्तर है हब, जिस का मतलब है आकरषन. किसी को बस एक नजर देखा और उसकी तरफ खिचाओ मैहसुस हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� जो था अद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा अद्द बवाद बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाश वो कुन्सा बिन्दू? इस पुरे अद्ध्धियन का सब से विस्मैकारी और सुन्दर इस्सा है रूप गो सुमी जीने जो साथस्तर बताए है वे है सनेह, मान, प्रनै, राग, अनुराग, बहाव, और अन्त्मे महाबहाव अगर आप दियान दे, तो ये यात्रा भी उसी तरा आखर्षन यानी सनेहे से शूरो तीए, और महाभाव पर कफत्मो तीए. और महाभाव थीक वही अवस्ता है, जो सूफी वाद में फना है. एक दम सही. जहां रादा और क्रिषन इतने एक रूप हो जाते है, रादा कुतको क्रिष्न और क्रिष्न कुतको रादा समजने लकते हैं चेतना का पुरी तरहे से विलै हो जाता है लेकिन क्या ये सर्फ एक इत्फाक है कि दू बिलकुल रवग रवग हिस्सो में तो रवग रवग ध्रमो में प्रेम के मनो विग्यान को लेकर बलकुल एक जैसा दाचा विखसित हूँ? ये इसकी पीचे कोई अतिहासे कनेक्ष्छन है? रहा, वोई. या कोई कनेक्ष्छन है? ये जे अज इत्तिफाक नी लखता. अच्छा, एसा क्यो? संत रुप को स्वामी व्रिंदावन में सादू बनने से पहले पंगाल के शासक हुसेंच्छाए के दर्बार में एक बहुत उचे पदपर मंत्री � thay. औरे मुझे ये नहीं पता था. उनका तत्काली नाम दबीर खास था. और वो अरभी फारसी भाशा और सूफी दर्शन के बहुत बड़े अगर बाद्ती बखती परमप्रागे दर्षन को एक दुसरे में पिरो दिया हो ये तो सच्छ में कमाल की बात है गयान जब बदत्ता है, तो वो दारमिक सीमाय नहीं देक्ता बिल्ग्ल नहीं देक्ता ये बहुती खुबसूरत बात है कि उनोंने सूफी वाद के फना वाले दर्षन और भारतिय भकती परमपरा के दर्षन को एक दुसरे में पिरोद्या हो ये तो सच्छ में कमाल की बात है गयान जब बटता है तो वो दारमिक सीमाय नहीं देखता बलकल नहीं देखता ये बवाथी खुबसुरत बात है, कि कैसे सूफी सन्त और वेशनव भखत एक ही आद्यात्मिक भाशा बोल रहे थे. लिकिन इस पूरी चर्चा मे एक एक विरोदाबास नजर आता है. कैसा विरोदाबास? अगर गर गस्ल आत्मा ये फना ये महाभाव है, तो ये कितनी बडी विटम बना है, के इस आसीम प्रेम को विक्त करने के लिए, जिस विद्हा का जुनाव की आगया, यानी गजल, उसका व्याक्रन तुन्या कि सबसे सथ व्याक्रनो में से एक है. रहा, ये बात तो है. उसका व्याक्रन दून्या के सबसे सच्थ व्याक्रनो में से एक है? आँ ये बात तो है असीम आत्मा के लिए इतना कत्होर शरीर क्यो? व्यरोदा भासी गजल की अस्ली ताकत देखे जब भावनाय बहुत उफान पर हूं जब प्रेम असीम हो जाए तो उसे बहेज आने से रोकने के लिए, एक बहुत ही मजबूद बांद की ज़ोड़त होती है. आच्छा, तो गजल का व्याक्रन वो बांद है. जी, गजल का सक्थ व्याक्रन वो ही बांद है. ये उर्जा को बिखरने नहीं देता. बलकि उसे एक लेजर भीम कितर तीखा और असर्दार बना देता है तो इसका बून्यादी धाहाचा क्या होता है? इसका बून्यादी धाहाचा शेर पर तिका होता है एक शेर में केवल दो पंक्तिया होती हैं और? ये दोनो पंक्तिया आपस में बहुती खास तरीके से बात करती हैं बिल्कुल पहली पंक्ति को मिस्राय ओला कैतें इसका काम है एक जमीन तयार करना या एक सवाल क़ा करना ये कुछ वैसा है जैसे आप तीर चलाने के लिए कमान को पीचे कीच रहे हूं बवध हुब और दूस्री पंक्ती और दूस्री पंक्ती को मिस्राय सानी कैते हैं ये वो पंक्ती है जिस में आस्ली पंच या निशकर्ष होता है ये खिची हुई कमान से चूटा हुए तीर है जो सीडा सुन्ने वाले के दिल पर लगता है और मुशायरो में जब दूस्री पंक्ती पर लोग वावा करते हैं, तो असल में उसी तीर के निशाने पर लगने की दाध हुती है. बलकुल सही. श्रोथ में गजल की सन्रच्ना को लेकर दो बहुत महतुपों शब्डो का विस्तार से जिक रहें. विस्तार जी. गजल का जो सब से पहला शेर होता है, उदै होने की जगा. और इसकी क्या कासिध होती है? इसकी कासिध यह है के इसके दोनो मिस्रों के अंथ में, काफ्या और रदीप समान रुप से आता है. और मक्ता क्या होता है? रदीप समान रुब से आता है. और मक्ता क्या होता है? गजल का जो अक्री शेर होता है, जिस में शायर अपना नाम या अपना उपनाम जिसे तखलूस कैते है, उसका इस्तमाल करता है, उसे मक्ता गा जाता है. मक्ता का अर्थ है कातनी की जगा, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ� वर्तनी का नहीं ये बाशा की मुल दूनियो और उसकी ज़ों को बचाने का विवाद है. तोड़ा विस्तार से समझाए एए. दिके बहेस ये है कि ज़े से एक शबद है जिसे हम को आएल लिकते है, जिस का मतलब है किया हूँँँँँँँ. प्राचीन मेठली में एक अपरेवोग हूता था ज़से आएल, गाए, काएल वुँँँ तो फिर विवाद क्या है? मद्दिकाल मे आखर इसकि स्थान पर यव कचलन बडगया ज़से आएल, गाए, काएल लेखग ने अपनी किताब में बवोट्स्पष्ट और कडा रुक अपनाया है कि एक प्रेएोगी अदिक प्रामानेक और दन्ने आत्मक रुप से सही है. लेकिन यहा मैं लेक्हक के विचार से थोडा असहमत होना चाहूंगी यह कम सिकम एक सवाल तो उठाना चाहूंगी. जी, बलकल पुचिए. बाशा तो समें कि साथ बदलती हैं ना? इक बहती हुई नदी कितरा है अगर आज मैठली बोलने लोग यव बोल रहे हैं और कयल लिख रहे है तो लेखख पुरानी एव आली विवस्थापर ही क्यों अडे है? तो आप यह तो बज़ादा था जब बज़ादा था जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ादा जब बज़ा� तो आप स्वर की मिथास और उसकी सतीक मात्रा को बचाट रहे होते हैं जो गजल की बहर में एक दम सही बटती है या का इस्तमाल उस गनित को और दूनी की उस गुलाई को बिगार देता है आप समझी इसलिये लेकख का ये आग्रा बाशा को शुद रखने और गजल के कडे मीटर को सादने के लिए बहुत जरूरी है मतलब ये महेज व्याकरन का नीम नहीं है ये गजल के संगीट को बचाने के कोशिष है एक दम सेई और जब बाट संगीट और मीटर की आती है तो किताब में गजल लिखने की ट्रेनिंग का जो हिस्चा है, वो मुझे सब से ज़ादा रोमान्चित करता है. हाँ, वो हिस्चा बहुत खास है. मुझे अमेश लकता था की कविता बस दिल से निकलती है, और कागस पर उतर आती है. लिकिन यहां तो इसके बाकाइदा रियाज की बात की गगे है? गजल के दूनिया में यह रियाज बहुत कथोर हूटा है इसके लिए साटी मुशाईरा और तराई मुशाईरा का आयोजन हूटा है साटी मुशाईरा क्या हूटा है? साथती मुशायरा गजल सीकने की पहली सीटी है इस में एक अजीब अगरीब नियम होता है की शायर को गजल लिखनी होती है लेकिन उस में शब्दों का कोई अर्थ होना जरूरी नहीं है ये तो बहुत ही अनोखी बात है बिना अर्थ की गजल जब मैंने इस रोत में पड़ा तो मुझे तुरन्त शास्त्रिय संगीत की यादा गगी आच्छ वो कैसे ये बिलकुल वैसा ही है जएसे शास्त्रिय संगीत सीकते समए गायक सर्फ सारे गामा पाक खार्यास करता है सार ए गामा का अपने अपने कोई शाबदिक अर्ठ तो नहीं होता लेकिन वो गायक के गले की माशपेशियों को तगयार करता है उसके सुरों को पक्का करता है बहुति खुबसुरत उप्मा है तो सोती मुशाईरा भी शायएद शायर के दिमाग की मास पेशीों को मीटर के लिए तेयार करता होगा. बलकोल, सोती मुशाईरा शायर की बहर पकी करता है. इसका मकसत स्र्फ ले मात्रा और शब्दों के वजन को गजल के एक दम सतीक साच्छे में ड़ालने की प्रक्तिस करना होता है. और जब सुर पक्का हो जाता है तब क्या होता है? जब शायर का सुर पक्का हो जाता है, जब उसे मीटर की नस समज में आजाती है, तब वो तरही मुशारा में जाता हैं. जगां उसे एक लाईन देदी जाती है. आयोजक की तरव से एक पंकती देदी जाती है, जिसे तरहे ए विस्रा कैते हैं, अप सभी शायरों को उसी पंकती की ले, उसके काफिया और रदीप की जमीन पर अपनी अपनी नगगजल लिखनी होती है. ये तो शायर की असली परिक्षा होती होगी. भिलकल कि वो एक तैसीमा के भीतर अपनी कितनी मोलिक उडान बहर सकता है. लेखव ने इस बात पर बहुत जोर दिया है, अज के दोर में जो लोग बिना भेहर या बिना मीटर के खुज भी लिखकर उसे गजल कनाम दे देटे हैं. उस सहिथ्ये के सात अन्याय हैं. नियम जरूरी हैं. जी. नियम आपकी आजादी को चींते नहीं हैं. बलकी वे उसाजादी को एक असा खुबसुरत आकार देते हैं, जो सदियों तक जिंदा रहे सके. ये एक बहुत ही शव्षक्त विचार है. स्वतन्त्रता और अनुशासन का बहतरीन संटुलन. तो अगर हम इस पूरी चर्चा को समेटें, तो आशीश अंचिनार जी की ये किताब मैत्टिली गजलक व्याकरन अ एतिहास सर्फ काफ्या रदीप और मात्राँ की इस गिन्ती करना नहीं सिक्हाती. बलकल नहीं, ये किताब हमें एक बड़ा सांस्क्रितिक पाट पडाती है. वो पाट क्या है? ये दिकाती है के से कला की कोई एक विदा, अरब के गरम इतिखास से निकलती है, सूफी सन्तों और अवेशनव भक्तों के दर्षन से गुजरती है, और अंतता ता हम मिठला के ताडे के पेडों और पासी खाने की स्थानियता में अपनी गेरी ज़ने जमा लेती है. ये मानव सब्विता के जुडने और एक दूसर को अपनाने का सब से सुन्दर दारने है. तच में, ये एक अधबूत यात्रा है. और ये हमें ये भी सोचने पर मजबोर करता है, की बाशा कितनी लचीली और शकती शाली होती है. लेकिन इं सब बातों के बीच मेरे दिमाग में एक और विचार गूम रहा है वो क्या? जो मैं श्रोताव के लिए चोडना चाहूंगी इस पुस्तक में इस बात का भी जिक्र है कि कैसे लेक्हक ने अपने ब्लोग अंचिनार अखर के जर ये इंटनेट का बर्पूर इस्तमाल करते हुए इस विद्धा को और लोगो तक पहचाया राद इंटनेट ने बहुत मदद की है तो आज जब हम इस दिजटल युग में जी रहें जहां इंटनेट ने दूनिया की रहाँ रहाँ बहुगोलिक सीमा को मिता दिया है तो क्या आने वाले कल में हमें कोई आईसी नई वेश्विक कावे विद्धा देखने को मिलेगी जिसकी आपनी कोई सरहद ही नहों? यह तो बविश्ठी ही बताएगा अग, बविश्या का एक बलकुल नया व्याक्रन लिखेगा, जहां शाएद पूरी दुन्या की संस्कितिया एक ही समय में एक दुस्रे में गुल्मिल रही हूंगी. ये सुचने माली बात है