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SADEHA 26 मैथिली_नाटकक_अपूर्ण_नारी_क्रान्ति.m4a

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Part 1 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 1
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  1. 0:00–0:04सार्थक विचार-विमर्शक इमच ददबेट में आजाक सवगत अचि।
  2. 0:04–0:10खल्पना करू जे आजाक नाम पर एक ता पेग क्रान्ती लडल जार हो लग्छी
  3. 0:10–0:16मुदा आजाक के उही क्रान्ती के इतिहास लिख्वाक लेल मतलब कलम दरी नहीं दिल जाए तच्छी
  4. 0:16–0:22एक दम, आख पीडा, आख संगर्ष, सब किछ कोनो दोसर वेक्ती अपन द्रुष्टी से लिखिर हो लग ची.
  5. 0:22–0:26आई हम्रा लोकनी मैत्ली सहित्यक उही काल्क्चन्डक बात करो रह ची,
  6. 0:26–0:30जखन 1950 अ 60 के दशक में उं
  7. 0:30–0:32स्वातन्त्रियोट्तर मेठली समाजिक नाटक
  8. 0:32–0:34अपन चरमोद कर्ष पर चल
  9. 0:34–0:36जे उ समय चल
  10. 0:36–0:38जखन मेठल समाज भालविवाज
  11. 0:38–0:41दहेज अ अशिक्चचचचक कुप्रताक जनजीर में
  12. 0:41–0:43पुन रोपेन जक्डल चल
  13. 0:43–0:44आ, बलकल
  14. 0:44–0:53आईही अंदकार मैं समय में उं, हमर सपष्ट मानने आची जी मैत्लीक नाटकार लोकनी समाजक जागरित प्रहरी बनी कगाज किलनी.
  15. 0:53–0:59उलोकनी बाल विवाव वा दहेजगा का गमभीर विषे के यदार्थ रूपे समाजक मंच्पर राखलनी.
  16. 0:59–1:00मुदा.
  17. 1:00–1:08उलोकनी शिक्षा अ स्वावलम्मनक मार्ग देखाखर, नारी सशक्ति करनक एक ता सहसिक अक्रान्ति कारी प्रयास केलनी.
  18. 1:08–1:14इक ता बहुत अकर्षक अरोमानी द्रिष्टिकोन छे, मुदा हमेक्रा क्रान्ति नहीं मानत्ची.
  19. 1:14–1:21अदार पर हमर मानना जे यी समपूरन चित्रन पूरुष प्रदान द्रिष्टि कोन्सा गरसिच्छल.
  20. 1:21–1:27आप नाटक सब हमें नारीके के खेल एक ता आदर श्वादी पीडित करुप में देखाल गेल आचे.
  21. 1:27–1:30और नाटक कार लोकनी जे विद्रो का दावे करे चला.
  22. 1:30–1:32अदर स्पश्ट मंच्पर देखाई तची?
  23. 1:32–1:33नहीं नहीं
  24. 1:33–1:35अवास्तम मे एक ता वेंट्री लोकियाजम जगाचल
  25. 1:35–1:38मतलव, नातकार पूरुष चला
  26. 1:38–1:41मदा अव इस्त्री रुपी काथ कपुतलिक मोद से
  27. 1:41–1:43अपन आवाज निकाली रहाल चला
  28. 1:43–1:45नारीक वास्त्विक वियता
  29. 1:45–1:51अखर सहज मनो वग्यानिक यतार्त, आतमियताक एह में सरवता अबहाँ थ्छे
  30. 1:51–2:00यी तब बहुत कतोर समिक्षा बहुगेल, की यहाँ उही समवे क अटिहासिक विवष्ता अ समाज के कतोरता के नजर अंदाज नहीं करो रहल ची
  31. 2:00–2:03अम कोनो विववष्ताके नजर अंदाज नहीं करो रहल ची
  32. 2:04–2:05मदा तनिक विचार करू
  33. 2:06–2:08जगन समाज में चारों दे संदकार चल
  34. 2:08–2:13तकन एहे नाटक कार लोकनिक तमसे कम उही गाव के उगार बाक सहस्त के लेनी
  35. 2:13–2:16आउ, मतलब एकर अग्टो उदारन सब जेए
  36. 2:16–2:18पर मेश्वर मिश्वर्ग्त्रिवेनी नाटक्के लेजा।
  37. 2:18–2:24आच्चा, जटे 14 वर्षक दूर्गाक विवा, 45 वर्षक अदेर मदूकान्त्सा होई तची?
  38. 2:24–2:28भिल्कुल आच्चारी मास में उ विद्वा ब होजाई तची
  39. 2:28–2:33तकर बाद उकर देवर नरेश उक्रा वासनाक शिकार बनावे चाहे तची
  40. 2:33–2:37आ अंतता उक्रा आगी में जली कमरी जाई परे तची
  41. 2:37–2:39इकोनो कलपना नी चल
  42. 2:39–2:43इदकालीन मेठिल समाजक उो सडल यतार्द चल
  43. 2:43–2:46जक्रा लोग गबशव में तक है चल
  44. 2:46–2:50अप देखा विबद्स चेहरा मंच पर देखे चाहर्स केव नी करे चल.
  45. 2:50–2:55नाटक कारियते एक तक कदोर चिकिच्सक जका समाजक शल्ल चिकिच्सा
  46. 2:55–2:57जिक्रा सरजरी कहे ची कर रहाल चला
  47. 2:57–2:58सरजरी
  48. 2:58–3:00अआ, सरजरी
  49. 3:00–3:02उस समाजके मजबूर कर रहाल चला
  50. 3:02–3:09अपन इविबछ्स चेहरा मच्पर देख है, कि आहा एशहसिक कदम के के लोकिजम कही के खारिज कर देप?
  51. 3:09–3:15आप देखो आहा जक्रा शल्ले चिकिच्सा कही रहल ची, हम उक्रा पीडाख तमाशा कहब.
  52. 3:15–3:16तमाशा? एट?
  53. 3:16–3:20रूकु, हम आहा कुप्मा कि तनिक आगु बड़ाई ची
  54. 3:20–3:24आहाक नाटक कार, वास्तप में उही शल्डिखिच्सक जका चला
  55. 3:24–3:29जे आपन तेज्दार वाला चूरी सा रोगीक शरीर तचीरी रहल चाती
  56. 3:29–3:31उगाओ दिखार रहल चाती
  57. 3:31–3:35मुदा उशल लिच किट्सक रोगीक दर्द महसुस नहीं कर रहल चतिः.
  58. 3:35–3:38औ, आहां कोना कही सके ची.
  59. 3:38–3:40के एक तो उटटस्त चतिन.
  60. 3:40–3:44त्रिवेनी का दूर्गा आगी में जली का मरी जात ची
  61. 3:44–3:47इएक टा मेलो ध्रामा आए चे. बूजल लिए.
  62. 3:47–3:54पूरुश नाटक कारक लेल नारीक पीडा केवल समाज के जगगजोरबा केटा उपकरन बनी कर लेए च्ये लेए च्ये.
  63. 3:54–3:58उकर आपन जीवान, उकर आपन मनोवेग्याने गुत्त हुं आची.
  64. 3:58–4:01मुदा प्रतिक का वशकता तो उई युक माँग चल.
  65. 4:01–4:17जखन कोनो पूरुष लेखख, स्त्रीक पीडा लिख़ा ही तची, आवोक्रा एते कचरम पर लोजा थची, जद ते यो आगी में जली जाते ची, तो उस्त्रीक जीवनक दैनिक, मतलप चुट-चुट या तार्थ्वादी संगर्षक के नजरन्दाज का दे तची.
  66. 4:17–4:23जगन समाज गहीर निद्रा में हो, ता चोट्छछट मनूवेग्यनिक संगर्षक बात कोगर। समज में नहाए वात चे.
  67. 4:23–4:28तकन जगज़र्बा किले आहाके दूर्गाक प्रज्वलित चिता मंच्पर दिखावे पर परे थाचे.
  68. 4:28–4:37मुदा आई तरक जे पूरुश नाटक कार इस्त्रीक पीडा नहीं भूजी सके चला से हम्रा तारकिक रूप से पूरन नहीं लागे तची
  69. 4:37–4:41सुदान्शु शेखर चोद्ध्रिक लिटाई ताचर के देखू
  70. 4:41–4:43मम्ताक चरित्र, एक दम.
  71. 4:44–4:48एही नाटक में, मम्ताक जे विक्षिप्त अवस्थाक छित्रना ची,
  72. 4:48–4:50उकोनो शहाद तक प्रतीक नहीं आची.
  73. 4:50–4:54उदहेज के दानवी रूप के दिखा रहा लाची.
  74. 4:54–4:56जकन मम्ता आपन पितास कहे तची,
  75. 4:56–5:00जे जा आहा मोटर साएकिल ने देव तक ही हमर पती हमरा चोडी देता?
  76. 5:01–5:03आना के दें चलते?
  77. 5:03–5:05ता इखोनो मेलो द्रामा नहीं आची?
  78. 5:05–5:08इग्ता इस्त्री के भित्रक दर असुरक्चा
  79. 5:08–5:13आमान्सिक विख्षिप्त ताक अत्यंत सुख्छम आयतारत चित्रान आची?
  80. 5:13–5:17इते नाटक कार इस्त्रीके हिर्देक दधकन सूनी रहाला ची
  81. 5:17–5:22लेटाएत आचर का मम्ताक उदाहरन लगक आहा स्वयम हमर तर्क पुष्ट कर रहा लखची
  82. 5:22–5:23अकना
  83. 5:23–5:26मम्ताक विखसिप्त भाजाना की दिखा रहा लगची
  84. 5:26–5:32यही एक तब बहुत पएग आहा मोमेंत अची जक्राहाम स्रोता लोकनिक सोजा राखे चाब
  85. 5:32–5:36आहाई पूरुश नातक कार सबख मनोविद्यान के समजबख प्रयास करू
  86. 5:36–5:37हम तबूजी तची
  87. 5:37–5:47तक्हन अदेखभ जग्हन हुनका लोकनिक के समाजक कु प्रताक शिकार कुनो इस्त्रिक चित्रन करबाख होई चनी, तो उस्त्री यातम मरी जाई तची.
  88. 5:47–5:52वा लिताएत आचर के मम्ताजका पागल बहजाई तची.
  89. 5:52–5:55वाजना गुन्नाज्या कन्या पुद्राक नाईता
  90. 5:55–5:58यावना वस्तामे दिमागी सन्तुलन गुमाएक क
  91. 5:58–6:00गुड्डा गुडिया से खिले लगाईता चे
  92. 6:00–6:02ते एह में उस्वाभाविक की आची
  93. 6:02–6:04अथ्या चारक परिनाम ता बहयंकर होए चे
  94. 6:04–6:05आहाई सोचु
  95. 6:05–6:12जे इस्त्री सब पागल की एक भरहल च्यतिन, की ओई समःक सब सोषित इस्त्री पागल भागल भाजाई च्यल?
  96. 6:12–6:12नहीं
  97. 6:13–6:17ता आप कहब अ ची जई पागल पन नाटक खारक अपन मनो वेग्यानिक विखलता च्यल?
  98. 6:17–6:18बलकल
  99. 6:18–6:24इप्रुश मान्सिक्ताक सिमान्त बिन्दुचल उई कालक पूरुश मस्तिष्त इग कल्पना कैदरी नहीं सकल,
  100. 6:24–6:27जे एक ता सोषित वा विद्रोही इस्त्री,
  101. 6:27–6:32एक ता सामानिय, मतलव वेवहारिक संगर्ष कका अपन भाट स्वैम निकाली सकत अची
  102. 6:32–6:35मुदा पागल पन त यदार्थ में सिहो हुई तची
  103. 6:35–6:36हुई तची
  104. 6:36–6:41मुदा हुनका लोकनिक द्रुष्टी में जा इस्त्री पर अथ्याचार भहेल अची
  105. 6:41–6:44तो उकर तारकिक परिनती केवल विक्षिप्ता आची
  106. 6:44–6:47पूरुष लेक्हक इक खल्पना नहीं कर सके चला
  107. 6:47–6:50जे इस्त्री रोभए वा पागल होई बाकिस्तान पर
  108. 6:50–6:54विवस्ताक भीतर रही का चतुरता से अपनलिल जगा बना सकत आची
  109. 6:55–6:56आचा
  110. 6:56–7:00ताईले हम कहड ची जे इ नारी चरित्र वास्तविक स्त्री नहीं चथें
  111. 7:00–7:04इ पूरुष द्वारा रचल गेल आदर्ष्वादी पीडच्थें
  112. 7:04–7:08इ नारी के असहाय देख्भाग अव चीतन पूरुष इच्चाक परनाम अची
  113. 7:08–7:11जमा करव
  114. 7:11–7:15मुदा हमहां के, एही तरक से कतो से सैमत ने जी
  115. 7:15–7:15की आख?
  116. 7:15–7:18आखा किवल उही नाटक सब कर चायन कर रहल ची
  117. 7:18–7:20जटे नाए का तुटाल आची
  118. 7:20–7:23मुदा तक हन गोविंद जाक बसात नाटक विशाय मे आखा
  119. 7:23–7:24की कहब?
  120. 7:25–7:27एही नाटक में नाए का फूलेश्वरी
  121. 7:27–7:30नहीं तब आगल होई तची नहीं नहीं नहीं नगी जाई तची
  122. 7:30–7:31नहीं फूलिश्वरीक चरीट्र
  123. 7:31–7:37आआ, उ अशिक्षिता आची मुदा जक्ञन परस्थिती उक्रापर प्रहार करए तची
  124. 7:37–7:40तव उ गर से बहार निकली का शिक्षा गरहन करए तची
  125. 7:40–7:44आएक्ता शषक्त समाज सेविका बनिक तथाड होई तची
  126. 7:44–7:47मुदा अकर शषक्ति करना कमूल कारन की आची
  127. 7:47–7:49रूक।, एक ता आवर उदाग्रन सूनू
  128. 7:49–7:52कालिनात जहा सुदीर का कुसुम मैं
  129. 7:52–7:57नाईका कुसुम आपन माता कमला एक परमपरा वादी सोच कर विरोद करेताची
  130. 7:57–8:02माता कहत छतिन जे मोगी काज अची भानस और गीतनाद
  131. 8:02–8:05मुदा कुसुम शिक्चा गरहन करभा के ले द्रगरेताची
  132. 8:05–8:07सथे अची मुदा
  133. 8:07–8:12इस शिद्द करत अची जे नाटक कार नारी में आतुम निरने एक चमता देखेच चला
  134. 8:12–8:15उलोकनी इस पष्ट रूप से स्थापित करे रहल चला
  135. 8:15–8:19जे नारी क उद्ठान, शिक्चा और स्वाब लंवन से संबवावाची
  136. 8:19–8:22की इ पूरुष नाटक कार अख सीमित कल पना चल?
  137. 8:22–8:30अप देखो, बसात कफुले स्वरेक स्वाब लंवन सूनी में जत्तीक नीग लगाई तची, वोकर प्रिष्ट भूमी उत्बे खोख्लाज.
  138. 8:30–8:32आव, तनी को कर चीर पाड कर अची?
  139. 8:32–8:33करो चीर पाड.
  140. 8:33–8:37पूले स्वलीक शिक्चा गरहन कर बाक प्रेरना कते सावए तची.
  141. 8:37–8:41अगर अखर आपन कोनु स्वतन्त्र अन्तरिक इक्चा नहीं आची
  142. 8:41–8:43पूरुश जखन इस्ट्रीके तूक्रावाई तची
  143. 8:43–8:45अगर अश्विक्षिता कै का थूक्रावे जे बाखपाद
  144. 8:45–8:48तब आप द़िख स्वाब लंवनक उद्प्रेरक से हो पूरुषे आची
  145. 8:48–8:50तआई ही में समस्या की आची
  146. 8:50–8:52गदना तगडी सकए तची
  147. 8:52–8:57समस्या इची जे उकर आपन कोनु स्वतन्त्र अन्तरिक इक्चा नहीं आची
  148. 8:57–9:02पूरुश्जगन इस्ट्रिके तूक्रावए तच्रिन इस्ट्रिक भीतर चेतना जगए तच्ची
  149. 9:02–9:06इक ता पूरुश्च निरमित क्रित्रिम विद्रो है ची
  150. 9:06–9:08इत आहाक आपन व्यक्या जी
  151. 9:08–9:12आजगनो स्वाव लंभी भोसे हो जाए तच्छी
  152. 9:12–9:14तो उकर स्वरुब की होई ता ची?
  153. 9:14–9:17उक्ता समाज सेविका बनी जाई ता ची?
  154. 9:17–9:18एक ता सन्यासिनी जका,
  155. 9:18–9:20जकर अपन कुनो व्यक्तिगत इच्छा,
  156. 9:20–9:24मतलब दैहिक यदार्त्त नहीं बचाई ता ची?
  157. 9:24–9:26उक्रा एक ता मदर अद्धिया जका
  158. 9:26–9:56वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दो�
  159. 9:56–10:00अखार समाज सेविका बनवक बात अखाँ अखार सन्यासनी कही रहाची
  160. 10:00–10:02मुदा हम अखार एक्ता लीटर कहव.
  161. 10:02–10:05एक्ता लीटर जकर निज्ता कतम वोगेल.
  162. 10:05–10:07उही 1960 कदसक में
  163. 10:07–10:11जदे इस्त्री गर का चोकचट सम भाहर न निकले पावे चल
  164. 10:11–10:18उते एक ता इस्त्रीप सरवजनिक जीवन में समाज करनेट्रिथव करे देखाईब इक्रानती नहीं ता और की चल?
  165. 10:18–10:23आहाक अपेक्शाई लागे तची, जे 1960 का नाटक कार,
  166. 10:23–10:262026 का नारीवादिक चस्मापहर के नाटक लिखते,
  167. 10:26–10:29जे अटिहासिक रुपसा असमबहवाजे.
  168. 10:29–10:33नहीं नहीं, हम कोनो आदूनिक नारीवादा का पेक्षाने कर होल चे.
  169. 10:33–10:36हम केवल यतार्त वाद गूज रहल चे.
  170. 10:36–10:43हमरा पत्ती यह आचे, जे एही पूरुष नाटक कार लोकने कलेल, यस्तरी केवल दूये तारूप समबचल.
  171. 10:43–10:44दूये तारूप?
  172. 10:44–10:48आप, याता उ पूर्ँपन विक्षिप्त आए असहाय बजाय,
  173. 10:48–10:53वा उ समपुन लोकिक इक्षा त्यागिका देविवा समाज सेविका बन जाए.
  174. 10:53–10:56एक तद समान नेस्त्री, जए पन गर मेर है तच्छी,
  175. 10:56–11:01आपन पतिसन लड़े तच्छी, आपन अदिकारक लेल चोट-चोट जहाद करे तच्छी,
  176. 11:01–11:03अएक तश्खिख, स्वावलंबी जीवन जीबे तची
  177. 11:04–11:06इं मद्दिमार्ग पूरुस लेक्खा कलपने सबाहर चल.
  178. 11:07–11:09आहा मानो वा नहीं मानो
  179. 11:10–11:13मुदा इस्ट्रीक वेथा के इतेक आदर्ष्वादी
  180. 11:13–11:15वच्चरम रूप में प्रस्थूत करेना
  181. 11:15–11:19अकर सहज यत्हार्थ वादी जीवन से अकरा दूर लोजाई तची
  182. 11:19–11:26इक टा पूरुश वादी चश्माचल, जते इस्त्री केवल एक टा विशेचल, एक टा मनुश्षे नहीं
  183. 11:26–11:28इआक अपन द्रिष्टी कोन भोसा के तची
  184. 11:28–11:32तो उप्रध्छम्च्रन में प्राया मुखर और चरम्द्रूप में आबाई ताची.
  185. 11:32–11:35तकी चरम्द्रूप में यधार्थ मरी जाई ताची.
  186. 11:35–11:38प्राया मुखर और चरम रूप में आभाई ताछी
  187. 11:38–11:41तकी चरम रूप में यधार्त मरी जाई ताछी
  188. 11:41–11:47सत्ये यह आची जे एक ता पूरश पूर रूप से इस्त्रीक अंटर मनाक सुख्ष मनोविग्यान के शत प्रतीषत नहीं जीसा कै ताछी
  189. 11:47–11:51उद्या एकर आरत्ती ही नहीं जोहें का लोकने प्रयास निष्पर योजनी आच्फल
  190. 11:51–11:55आव, एक ता आव नाटक परचर्चा करे ची, नाची के ताख नाटक लेल
  191. 11:55–11:58आव, एम शंकर अ सती का थाच
  192. 11:58–12:04इक दम सही, एक नाटक में शंकर पदोनती के लिलपन पतनी सती के विशाव्रूती में दखे लैताटी,
  193. 12:04–12:09सती जकन विद्रोही भोका चितकार करे थाची, जि आहा हमर समस्त प्रेम प्रीती के गलाग होड देने ची,
  194. 12:09–12:12तो यह सीदा पूर्श्वादी मान्सिक्तापर सबल तंप्रहार आची
  195. 12:13–12:15यह तै एक तो पूर्श नाटक कार
  196. 12:16–12:20सवयम पूर्श्वर्गक स्वार्थ और नीच्ताक पर्दापाश कर रहल चला
  197. 12:21–12:23आहा एक रा वेंट्रिलोक्विस्म कोना कहब
  198. 12:23–12:53अदे स्ट्रिक विद्रो क्रत्रिम नहीं अद्यान्त्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्�
  199. 12:53–12:58दूनु मंच्पर उपस्तित अची, मुदा इणाटक अंतता कखकर विशे में आची.
  200. 12:58–12:59दूनो गोते पर आची.
  201. 12:59–13:04नहीं, ए अदेक मात्रा में शंकरक नयतिक पतनक विमर्ष लागत अची.
  202. 13:04–13:07सतिक अन्तरिक जीवनक विमर्ष कम.
  203. 13:07–13:11जेहिना चोद्री यदूना थाकूरक नाटक देहेज में
  204. 13:11–13:15जगन रगुनन्दन आपन पतनी दुलरीक चोड वेश्यालग जाई तची
  205. 13:15–13:18तची नाटक कार पूरुष केंद्रित वासना
  206. 13:18–13:21अकर कुपरेडाम पर भेसी केंद्रित हो इच्छती
  207. 13:21–13:21मुदा
  208. 13:21–13:25इस्त्री एतहु एक ता रीयाक्षन देवाग पात्र मात्र बनी जाई तची
  209. 13:25–13:29अकर आपन अस्तित्व पूरुष्षे बाहर कत्ताय आची
  210. 13:29–13:34अब देखू कि कोनो शोषित वर्ग आपन उत्पीडक का संदर्भज भीना
  211. 13:34–13:36आपन स्थन्द्र पहचान बना सके तची
  212. 13:36–13:41समाज में स्त्रीक अस्तित्व, औही समें पूरुष्सा एतेक गहन रूप से जोडल चल,
  213. 13:41–13:46जे पूरुष्प्रवर्ती का चित्रन का विना, इस्त्रीक एखार्त्वादी पीडा देखाभे समबव नहीं चल.
  214. 13:46–13:56समबावेचल, बिलकल समबावेचल, मुदा उकर लेल नाटक कार के अपन पूरुष वादी चश्मा उतारे का, इस तरीक माँन के सुन्बाक चम्ता हो बाख चाही चल.
  215. 13:56–14:08इई नाटक कार लोकने समाज के बन्धन के तोडबा के तु नारी के उच्छरिंकल रूप में देखागे ता चालीन मुद-वास्तविक आत्मियताक अबहाव में ए प्रेयास एकंगी भोगेल.
  216. 14:08–14:12जखन कोनो इस्त्री समाजके बन्धन तोड़ाई तची
  217. 14:12–14:17तपूरुश नाटक कार उक्रा सुखी वासन्तुलित नहीं देखावे सके तची
  218. 14:17–14:20उक्रा व्यवाहारिक जीवन में एक अंगी देखादाई तची
  219. 14:20–14:25सहित्तिक समग्र विष्लेशन एस पष्ट रूप से इसिद्ध करेता ची,
  220. 14:25–14:27जे नारीग जे तेक आदर्ष्वादी चित्रन भेल अची,
  221. 14:27–14:30तेक सहज या थार्थ्वादी नहीं.
  222. 14:30–14:32आआ, हम भूजी रहल ची,
  223. 14:32–14:34आहा काश्य इय ची,
  224. 14:34–14:38जे नाटक कार लोकनीस समाजक बहाई धाचापरत प्रहार किलनीस
  225. 14:38–14:41उकुप्रत्ह सब के छिन्हांकिच से हो किलनीस
  226. 14:41–14:43मुदाजकन बात स्त्रीक भित्रीया अत्मियता
  227. 14:44–14:45अवकर निच्ता काल
  228. 14:46–14:49तो अपन पुरुश होई बाक सीमाक पार नही कर सकला
  229. 14:49–14:51एक दम यही हमर कहब आची
  230. 14:51–14:54ये एक ता बहुत गंभीर सहित्तिक अदार्सनिक प्रशन आची
  231. 14:54–15:00तता पी, हमरा इस्विकार करे परत, जिस्वा तंत्रोतर मेठली नाटक जा एडेग नहीं उठोने रहीते
  232. 15:00–15:03ता इस्ट्ट्री विमर्ष्शक उजमीन नहीं बन सकी दे
  233. 15:03–15:07जक्रा पराई हम आहा थारबहोकाई बहस कर रहल ची
  234. 15:07–15:08आई इत अचे
  235. 15:08–15:11ओब लोकनी समाजक अंद्यार कोना में प्रकाश आन्लीस
  236. 15:11–15:15सिक्षा स्वावलंबन अख्वुप्रताग विरोंदख
  237. 15:15–15:17जिस्वर एहनाटक सम्मेची
  238. 15:17–15:21उ मैठिल समाज में नारी चेतनाक पहल सशक्त प्रस्वुटन चल
  239. 15:21–15:25उ सहसिक चल आवकर एतिहासिक महत्वो सर्वो परी आची
  240. 15:25–15:28उ सहसिक चल एह में कोनो सन्देहना ही
  241. 15:28–15:33आई हो सत्ते आची जे आदूनिक चेतनाक भीज ओते से अंकुरित भेल
  242. 15:33–15:38मुदे एक टक गंभीर पाथे कक रूप में, हम्रा लोकनी के इनहीं भिसर बाख चाही,
  243. 15:38–15:43जे ओ भीज जही माटी मे भोडल गयल चल, ओ माटी पूरुष प्रदान चल.
  244. 15:43–15:53वर्ग कदा कोनो दोसर वर्चस्ववादी वर्ग लिखे तजी तजी उच्ट्रन कते एक प्रामानिक भूसके तजी.
  245. 15:53–16:02वो इस्त्रिक आसुथ देखी शक्ला मुदा उही आसुख पच्फाडिक समपुन मनोगयानिक परत के अपन आत्मियता में नहीं समेटी सक्ला.
  246. 16:02–16:05इक रान्ती तच्छल मुदा एक ता अपुर्ण क्रान्ती
  247. 16:05–16:09आसमबथ तश्विते क साअंदरे वोखर अपुर्णता मेही आची
  248. 16:09–16:15इवास्तो मेक ता एहन विमर्ष अची जब ते कोनो एक ता विजेता गोषीत नहीं केल जासके तची
  249. 16:15–16:18स्वातन्त्रियत्तर मैठ्ट्हली नाटक कार लोकनी,
  250. 16:18–16:21ज़ एक दे समाजक जाग्रित प्रहरी चला,
  251. 16:21–16:23तदुसर दिस यहो सत्या ची,
  252. 16:23–16:27जो अपन युग का आपन पुरुश्वादी द्रिष्टिक सीमा से बान्द्लो चला.
  253. 16:27–16:29इदूनो एतिहासिक सत्या ची.
  254. 16:29–16:31इक दम सही.
  255. 16:45–16:49अगर शल्यजि किच्सा स्वेम करू आआ आपन निश्कर्ष निकालो
  256. 16:50–16:54आई एह विचारनी अ प्रश्न साहित्तिक उही मुकाम पर हम्रालोकनिके चोडी देताची
  257. 16:55–16:58जते सावागु विचार करवाक बार आब हम्रालोकनिक समाज आन्नोग का पीडिक पाथक पर अची
  258. 16:58–17:02विचारनिया प्रश्न साहित्यक उही मुकाम पर हम्रालोकनीके चोडी देताची
  259. 17:03–17:09जते सा आगु विचार करवाक भार आब हम्रालोकनीक समाज आन्नोग का पीडिक पाथक पर अची
  260. 17:09–17:15साहित्य केवल दर्पन नहीं अची, येक्त समवाद अची, जे निरन्तर चलेत रहवाख चाही.
  261. 17:15–17:21यही विचार आम मन्तन सं, हम्रालोकनी आई विदालेब. विचार करेत रहु, पडेत रहु.

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सार्थक विचार-विमर्शक इमच ददबेट में आजाक सवगत अचि। खल्पना करू जे आजाक नाम पर एक ता पेग क्रान्ती लडल जार हो लग्छी मुदा आजाक के उही क्रान्ती के इतिहास लिख्वाक लेल मतलब कलम दरी नहीं दिल जाए तच्छी एक दम, आख पीडा, आख संगर्ष, सब किछ कोनो दोसर वेक्ती अपन द्रुष्टी से लिखिर हो लग ची. आई हम्रा लोकनी मैत्ली सहित्यक उही काल्क्चन्डक बात करो रह ची, जखन 1950 अ 60 के दशक में उं स्वातन्त्रियोट्तर मेठली समाजिक नाटक अपन चरमोद कर्ष पर चल जे उ समय चल जखन मेठल समाज भालविवाज दहेज अ अशिक्चचचचक कुप्रताक जनजीर में पुन रोपेन जक्डल चल आ, बलकल आईही अंदकार मैं समय में उं, हमर सपष्ट मानने आची जी मैत्लीक नाटकार लोकनी समाजक जागरित प्रहरी बनी कगाज किलनी. उलोकनी बाल विवाव वा दहेजगा का गमभीर विषे के यदार्थ रूपे समाजक मंच्पर राखलनी. मुदा. उलोकनी शिक्षा अ स्वावलम्मनक मार्ग देखाखर, नारी सशक्ति करनक एक ता सहसिक अक्रान्ति कारी प्रयास केलनी. इक ता बहुत अकर्षक अरोमानी द्रिष्टिकोन छे, मुदा हमेक्रा क्रान्ति नहीं मानत्ची. अदार पर हमर मानना जे यी समपूरन चित्रन पूरुष प्रदान द्रिष्टि कोन्सा गरसिच्छल. आप नाटक सब हमें नारीके के खेल एक ता आदर श्वादी पीडित करुप में देखाल गेल आचे. और नाटक कार लोकनी जे विद्रो का दावे करे चला. अदर स्पश्ट मंच्पर देखाई तची? नहीं नहीं अवास्तम मे एक ता वेंट्री लोकियाजम जगाचल मतलव, नातकार पूरुष चला मदा अव इस्त्री रुपी काथ कपुतलिक मोद से अपन आवाज निकाली रहाल चला नारीक वास्त्विक वियता अखर सहज मनो वग्यानिक यतार्त, आतमियताक एह में सरवता अबहाँ थ्छे यी तब बहुत कतोर समिक्षा बहुगेल, की यहाँ उही समवे क अटिहासिक विवष्ता अ समाज के कतोरता के नजर अंदाज नहीं करो रहल ची अम कोनो विववष्ताके नजर अंदाज नहीं करो रहल ची मदा तनिक विचार करू जगन समाज में चारों दे संदकार चल तकन एहे नाटक कार लोकनिक तमसे कम उही गाव के उगार बाक सहस्त के लेनी आउ, मतलब एकर अग्टो उदारन सब जेए पर मेश्वर मिश्वर्ग्त्रिवेनी नाटक्के लेजा। आच्चा, जटे 14 वर्षक दूर्गाक विवा, 45 वर्षक अदेर मदूकान्त्सा होई तची? भिल्कुल आच्चारी मास में उ विद्वा ब होजाई तची तकर बाद उकर देवर नरेश उक्रा वासनाक शिकार बनावे चाहे तची आ अंतता उक्रा आगी में जली कमरी जाई परे तची इकोनो कलपना नी चल इदकालीन मेठिल समाजक उो सडल यतार्द चल जक्रा लोग गबशव में तक है चल अप देखा विबद्स चेहरा मंच पर देखे चाहर्स केव नी करे चल. नाटक कारियते एक तक कदोर चिकिच्सक जका समाजक शल्ल चिकिच्सा जिक्रा सरजरी कहे ची कर रहाल चला सरजरी अआ, सरजरी उस समाजके मजबूर कर रहाल चला अपन इविबछ्स चेहरा मच्पर देख है, कि आहा एशहसिक कदम के के लोकिजम कही के खारिज कर देप? आप देखो आहा जक्रा शल्ले चिकिच्सा कही रहल ची, हम उक्रा पीडाख तमाशा कहब. तमाशा? एट? रूकु, हम आहा कुप्मा कि तनिक आगु बड़ाई ची आहाक नाटक कार, वास्तप में उही शल्डिखिच्सक जका चला जे आपन तेज्दार वाला चूरी सा रोगीक शरीर तचीरी रहल चाती उगाओ दिखार रहल चाती मुदा उशल लिच किट्सक रोगीक दर्द महसुस नहीं कर रहल चतिः. औ, आहां कोना कही सके ची. के एक तो उटटस्त चतिन. त्रिवेनी का दूर्गा आगी में जली का मरी जात ची इएक टा मेलो ध्रामा आए चे. बूजल लिए. पूरुश नाटक कारक लेल नारीक पीडा केवल समाज के जगगजोरबा केटा उपकरन बनी कर लेए च्ये लेए च्ये. उकर आपन जीवान, उकर आपन मनोवेग्याने गुत्त हुं आची. मुदा प्रतिक का वशकता तो उई युक माँग चल. जखन कोनो पूरुष लेखख, स्त्रीक पीडा लिख़ा ही तची, आवोक्रा एते कचरम पर लोजा थची, जद ते यो आगी में जली जाते ची, तो उस्त्रीक जीवनक दैनिक, मतलप चुट-चुट या तार्थ्वादी संगर्षक के नजरन्दाज का दे तची. जगन समाज गहीर निद्रा में हो, ता चोट्छछट मनूवेग्यनिक संगर्षक बात कोगर। समज में नहाए वात चे. तकन जगज़र्बा किले आहाके दूर्गाक प्रज्वलित चिता मंच्पर दिखावे पर परे थाचे. मुदा आई तरक जे पूरुश नाटक कार इस्त्रीक पीडा नहीं भूजी सके चला से हम्रा तारकिक रूप से पूरन नहीं लागे तची सुदान्शु शेखर चोद्ध्रिक लिटाई ताचर के देखू मम्ताक चरित्र, एक दम. एही नाटक में, मम्ताक जे विक्षिप्त अवस्थाक छित्रना ची, उकोनो शहाद तक प्रतीक नहीं आची. उदहेज के दानवी रूप के दिखा रहा लाची. जकन मम्ता आपन पितास कहे तची, जे जा आहा मोटर साएकिल ने देव तक ही हमर पती हमरा चोडी देता? आना के दें चलते? ता इखोनो मेलो द्रामा नहीं आची? इग्ता इस्त्री के भित्रक दर असुरक्चा आमान्सिक विख्षिप्त ताक अत्यंत सुख्छम आयतारत चित्रान आची? इते नाटक कार इस्त्रीके हिर्देक दधकन सूनी रहाला ची लेटाएत आचर का मम्ताक उदाहरन लगक आहा स्वयम हमर तर्क पुष्ट कर रहा लखची अकना मम्ताक विखसिप्त भाजाना की दिखा रहा लगची यही एक तब बहुत पएग आहा मोमेंत अची जक्राहाम स्रोता लोकनिक सोजा राखे चाब आहाई पूरुश नातक कार सबख मनोविद्यान के समजबख प्रयास करू हम तबूजी तची तक्हन अदेखभ जग्हन हुनका लोकनिक के समाजक कु प्रताक शिकार कुनो इस्त्रिक चित्रन करबाख होई चनी, तो उस्त्री यातम मरी जाई तची. वा लिताएत आचर के मम्ताजका पागल बहजाई तची. वाजना गुन्नाज्या कन्या पुद्राक नाईता यावना वस्तामे दिमागी सन्तुलन गुमाएक क गुड्डा गुडिया से खिले लगाईता चे ते एह में उस्वाभाविक की आची अथ्या चारक परिनाम ता बहयंकर होए चे आहाई सोचु जे इस्त्री सब पागल की एक भरहल च्यतिन, की ओई समःक सब सोषित इस्त्री पागल भागल भाजाई च्यल? नहीं ता आप कहब अ ची जई पागल पन नाटक खारक अपन मनो वेग्यानिक विखलता च्यल? बलकल इप्रुश मान्सिक्ताक सिमान्त बिन्दुचल उई कालक पूरुश मस्तिष्त इग कल्पना कैदरी नहीं सकल, जे एक ता सोषित वा विद्रोही इस्त्री, एक ता सामानिय, मतलव वेवहारिक संगर्ष कका अपन भाट स्वैम निकाली सकत अची मुदा पागल पन त यदार्थ में सिहो हुई तची हुई तची मुदा हुनका लोकनिक द्रुष्टी में जा इस्त्री पर अथ्याचार भहेल अची तो उकर तारकिक परिनती केवल विक्षिप्ता आची पूरुष लेक्हक इक खल्पना नहीं कर सके चला जे इस्त्री रोभए वा पागल होई बाकिस्तान पर विवस्ताक भीतर रही का चतुरता से अपनलिल जगा बना सकत आची आचा ताईले हम कहड ची जे इ नारी चरित्र वास्तविक स्त्री नहीं चथें इ पूरुष द्वारा रचल गेल आदर्ष्वादी पीडच्थें इ नारी के असहाय देख्भाग अव चीतन पूरुष इच्चाक परनाम अची जमा करव मुदा हमहां के, एही तरक से कतो से सैमत ने जी की आख? आखा किवल उही नाटक सब कर चायन कर रहल ची जटे नाए का तुटाल आची मुदा तक हन गोविंद जाक बसात नाटक विशाय मे आखा की कहब? एही नाटक में नाए का फूलेश्वरी नहीं तब आगल होई तची नहीं नहीं नहीं नगी जाई तची नहीं फूलिश्वरीक चरीट्र आआ, उ अशिक्षिता आची मुदा जक्ञन परस्थिती उक्रापर प्रहार करए तची तव उ गर से बहार निकली का शिक्षा गरहन करए तची आएक्ता शषक्त समाज सेविका बनिक तथाड होई तची मुदा अकर शषक्ति करना कमूल कारन की आची रूक।, एक ता आवर उदाग्रन सूनू कालिनात जहा सुदीर का कुसुम मैं नाईका कुसुम आपन माता कमला एक परमपरा वादी सोच कर विरोद करेताची माता कहत छतिन जे मोगी काज अची भानस और गीतनाद मुदा कुसुम शिक्चा गरहन करभा के ले द्रगरेताची सथे अची मुदा इस शिद्द करत अची जे नाटक कार नारी में आतुम निरने एक चमता देखेच चला उलोकनी इस पष्ट रूप से स्थापित करे रहल चला जे नारी क उद्ठान, शिक्चा और स्वाब लंवन से संबवावाची की इ पूरुष नाटक कार अख सीमित कल पना चल? अप देखो, बसात कफुले स्वरेक स्वाब लंवन सूनी में जत्तीक नीग लगाई तची, वोकर प्रिष्ट भूमी उत्बे खोख्लाज. आव, तनी को कर चीर पाड कर अची? करो चीर पाड. पूले स्वलीक शिक्चा गरहन कर बाक प्रेरना कते सावए तची. अगर अखर आपन कोनु स्वतन्त्र अन्तरिक इक्चा नहीं आची पूरुश जखन इस्ट्रीके तूक्रावाई तची अगर अश्विक्षिता कै का थूक्रावे जे बाखपाद तब आप द़िख स्वाब लंवनक उद्प्रेरक से हो पूरुषे आची तआई ही में समस्या की आची गदना तगडी सकए तची समस्या इची जे उकर आपन कोनु स्वतन्त्र अन्तरिक इक्चा नहीं आची पूरुश्जगन इस्ट्रिके तूक्रावए तच्रिन इस्ट्रिक भीतर चेतना जगए तच्ची इक ता पूरुश्च निरमित क्रित्रिम विद्रो है ची इत आहाक आपन व्यक्या जी आजगनो स्वाव लंभी भोसे हो जाए तच्छी तो उकर स्वरुब की होई ता ची? उक्ता समाज सेविका बनी जाई ता ची? एक ता सन्यासिनी जका, जकर अपन कुनो व्यक्तिगत इच्छा, मतलब दैहिक यदार्त्त नहीं बचाई ता ची? उक्रा एक ता मदर अद्धिया जका वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दोगा वो दो� अखार समाज सेविका बनवक बात अखाँ अखार सन्यासनी कही रहाची मुदा हम अखार एक्ता लीटर कहव. एक्ता लीटर जकर निज्ता कतम वोगेल. उही 1960 कदसक में जदे इस्त्री गर का चोकचट सम भाहर न निकले पावे चल उते एक ता इस्त्रीप सरवजनिक जीवन में समाज करनेट्रिथव करे देखाईब इक्रानती नहीं ता और की चल? आहाक अपेक्शाई लागे तची, जे 1960 का नाटक कार, 2026 का नारीवादिक चस्मापहर के नाटक लिखते, जे अटिहासिक रुपसा असमबहवाजे. नहीं नहीं, हम कोनो आदूनिक नारीवादा का पेक्षाने कर होल चे. हम केवल यतार्त वाद गूज रहल चे. हमरा पत्ती यह आचे, जे एही पूरुष नाटक कार लोकने कलेल, यस्तरी केवल दूये तारूप समबचल. दूये तारूप? आप, याता उ पूर्ँपन विक्षिप्त आए असहाय बजाय, वा उ समपुन लोकिक इक्षा त्यागिका देविवा समाज सेविका बन जाए. एक तद समान नेस्त्री, जए पन गर मेर है तच्छी, आपन पतिसन लड़े तच्छी, आपन अदिकारक लेल चोट-चोट जहाद करे तच्छी, अएक तश्खिख, स्वावलंबी जीवन जीबे तची इं मद्दिमार्ग पूरुस लेक्खा कलपने सबाहर चल. आहा मानो वा नहीं मानो मुदा इस्ट्रीक वेथा के इतेक आदर्ष्वादी वच्चरम रूप में प्रस्थूत करेना अकर सहज यत्हार्थ वादी जीवन से अकरा दूर लोजाई तची इक टा पूरुश वादी चश्माचल, जते इस्त्री केवल एक टा विशेचल, एक टा मनुश्षे नहीं इआक अपन द्रिष्टी कोन भोसा के तची तो उप्रध्छम्च्रन में प्राया मुखर और चरम्द्रूप में आबाई ताची. तकी चरम्द्रूप में यधार्थ मरी जाई ताची. प्राया मुखर और चरम रूप में आभाई ताछी तकी चरम रूप में यधार्त मरी जाई ताछी सत्ये यह आची जे एक ता पूरश पूर रूप से इस्त्रीक अंटर मनाक सुख्ष मनोविग्यान के शत प्रतीषत नहीं जीसा कै ताछी उद्या एकर आरत्ती ही नहीं जोहें का लोकने प्रयास निष्पर योजनी आच्फल आव, एक ता आव नाटक परचर्चा करे ची, नाची के ताख नाटक लेल आव, एम शंकर अ सती का थाच इक दम सही, एक नाटक में शंकर पदोनती के लिलपन पतनी सती के विशाव्रूती में दखे लैताटी, सती जकन विद्रोही भोका चितकार करे थाची, जि आहा हमर समस्त प्रेम प्रीती के गलाग होड देने ची, तो यह सीदा पूर्श्वादी मान्सिक्तापर सबल तंप्रहार आची यह तै एक तो पूर्श नाटक कार सवयम पूर्श्वर्गक स्वार्थ और नीच्ताक पर्दापाश कर रहल चला आहा एक रा वेंट्रिलोक्विस्म कोना कहब अदे स्ट्रिक विद्रो क्रत्रिम नहीं अद्यान्त्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्� दूनु मंच्पर उपस्तित अची, मुदा इणाटक अंतता कखकर विशे में आची. दूनो गोते पर आची. नहीं, ए अदेक मात्रा में शंकरक नयतिक पतनक विमर्ष लागत अची. सतिक अन्तरिक जीवनक विमर्ष कम. जेहिना चोद्री यदूना थाकूरक नाटक देहेज में जगन रगुनन्दन आपन पतनी दुलरीक चोड वेश्यालग जाई तची तची नाटक कार पूरुष केंद्रित वासना अकर कुपरेडाम पर भेसी केंद्रित हो इच्छती मुदा इस्त्री एतहु एक ता रीयाक्षन देवाग पात्र मात्र बनी जाई तची अकर आपन अस्तित्व पूरुष्षे बाहर कत्ताय आची अब देखू कि कोनो शोषित वर्ग आपन उत्पीडक का संदर्भज भीना आपन स्थन्द्र पहचान बना सके तची समाज में स्त्रीक अस्तित्व, औही समें पूरुष्सा एतेक गहन रूप से जोडल चल, जे पूरुष्प्रवर्ती का चित्रन का विना, इस्त्रीक एखार्त्वादी पीडा देखाभे समबव नहीं चल. समबावेचल, बिलकल समबावेचल, मुदा उकर लेल नाटक कार के अपन पूरुष वादी चश्मा उतारे का, इस तरीक माँन के सुन्बाक चम्ता हो बाख चाही चल. इई नाटक कार लोकने समाज के बन्धन के तोडबा के तु नारी के उच्छरिंकल रूप में देखागे ता चालीन मुद-वास्तविक आत्मियताक अबहाव में ए प्रेयास एकंगी भोगेल. जखन कोनो इस्त्री समाजके बन्धन तोड़ाई तची तपूरुश नाटक कार उक्रा सुखी वासन्तुलित नहीं देखावे सके तची उक्रा व्यवाहारिक जीवन में एक अंगी देखादाई तची सहित्तिक समग्र विष्लेशन एस पष्ट रूप से इसिद्ध करेता ची, जे नारीग जे तेक आदर्ष्वादी चित्रन भेल अची, तेक सहज या थार्थ्वादी नहीं. आआ, हम भूजी रहल ची, आहा काश्य इय ची, जे नाटक कार लोकनीस समाजक बहाई धाचापरत प्रहार किलनीस उकुप्रत्ह सब के छिन्हांकिच से हो किलनीस मुदाजकन बात स्त्रीक भित्रीया अत्मियता अवकर निच्ता काल तो अपन पुरुश होई बाक सीमाक पार नही कर सकला एक दम यही हमर कहब आची ये एक ता बहुत गंभीर सहित्तिक अदार्सनिक प्रशन आची तता पी, हमरा इस्विकार करे परत, जिस्वा तंत्रोतर मेठली नाटक जा एडेग नहीं उठोने रहीते ता इस्ट्ट्री विमर्ष्शक उजमीन नहीं बन सकी दे जक्रा पराई हम आहा थारबहोकाई बहस कर रहल ची आई इत अचे ओब लोकनी समाजक अंद्यार कोना में प्रकाश आन्लीस सिक्षा स्वावलंबन अख्वुप्रताग विरोंदख जिस्वर एहनाटक सम्मेची उ मैठिल समाज में नारी चेतनाक पहल सशक्त प्रस्वुटन चल उ सहसिक चल आवकर एतिहासिक महत्वो सर्वो परी आची उ सहसिक चल एह में कोनो सन्देहना ही आई हो सत्ते आची जे आदूनिक चेतनाक भीज ओते से अंकुरित भेल मुदे एक टक गंभीर पाथे कक रूप में, हम्रा लोकनी के इनहीं भिसर बाख चाही, जे ओ भीज जही माटी मे भोडल गयल चल, ओ माटी पूरुष प्रदान चल. वर्ग कदा कोनो दोसर वर्चस्ववादी वर्ग लिखे तजी तजी उच्ट्रन कते एक प्रामानिक भूसके तजी. वो इस्त्रिक आसुथ देखी शक्ला मुदा उही आसुख पच्फाडिक समपुन मनोगयानिक परत के अपन आत्मियता में नहीं समेटी सक्ला. इक रान्ती तच्छल मुदा एक ता अपुर्ण क्रान्ती आसमबथ तश्विते क साअंदरे वोखर अपुर्णता मेही आची इवास्तो मेक ता एहन विमर्ष अची जब ते कोनो एक ता विजेता गोषीत नहीं केल जासके तची स्वातन्त्रियत्तर मैठ्ट्हली नाटक कार लोकनी, ज़ एक दे समाजक जाग्रित प्रहरी चला, तदुसर दिस यहो सत्या ची, जो अपन युग का आपन पुरुश्वादी द्रिष्टिक सीमा से बान्द्लो चला. इदूनो एतिहासिक सत्या ची. इक दम सही. अगर शल्यजि किच्सा स्वेम करू आआ आपन निश्कर्ष निकालो आई एह विचारनी अ प्रश्न साहित्तिक उही मुकाम पर हम्रालोकनिके चोडी देताची जते सावागु विचार करवाक बार आब हम्रालोकनिक समाज आन्नोग का पीडिक पाथक पर अची विचारनिया प्रश्न साहित्यक उही मुकाम पर हम्रालोकनीके चोडी देताची जते सा आगु विचार करवाक भार आब हम्रालोकनीक समाज आन्नोग का पीडिक पाथक पर अची साहित्य केवल दर्पन नहीं अची, येक्त समवाद अची, जे निरन्तर चलेत रहवाख चाही. यही विचार आम मन्तन सं, हम्रालोकनी आई विदालेब. विचार करेत रहु, पडेत रहु.

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