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मैथिली_साहित्य_का_समानांतर_इतिहास.mp4

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Part 1 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 1
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  1. 0:00–0:02जब हम किसी यह तिहासिक एमारत को देकते है,
  2. 0:02–0:05तो हमारी नजर सब से पहले कहाजाती है,
  3. 0:05–0:07सब हविक है कि उसके बव्ये गुमबद पर,
  4. 0:07–0:10या उन चिकनी सतोंवोंपर,
  5. 0:10–0:11जो दूर से ही चमकती हैं.
  6. 0:11–0:12भिलकुर.
  7. 0:12–0:14हमें लगता है कि मतलब,
  8. 0:14–0:16यही उ स्वास्तुकला की पूरी सच्चाई है
  9. 0:16–0:18सब कुछ एक दं सबश्ट और सुन्दर
  10. 0:18–0:20देबेट में आपका स्वागत है
  11. 0:20–0:22आज हम गजेंदर ताकृर की किताब
  12. 0:22–0:24अप पारलल फिस्ट्री अप मित्छीला
  13. 0:24–0:26अन मैत्ली लिट्रेचर के नजरये से
  14. 0:26–0:30ये बवहती बुनियादी और जटल सवाल पर चर्चा करने वाले है
  15. 0:30–0:32और वो सवाल वाखई बहत गेरा है
  16. 0:32–0:33बलकल
  17. 0:33–0:37सवाल यह की मेतली साहित्रि का असली इतिहास आखर बस्ता कहा है
  18. 0:37–0:41क्या इसका वास्तविक स्वरूप उस मुक्छेदारा के शास्तरी ए इतिहास में है
  19. 0:41–0:48जिसे ब्रम्हणवादी परम्पराँ, दर्बारों और सहित यकाद्मी जैसी आदूनिक संस्ताँने गडा है,
  20. 0:48–0:53मैं इस चर्चा में इस शास्त्रिया और संस्तागत इतिहास का पक्ष्ष्ट्गुए।
  21. 0:53–0:56और मैं इसका एक वेक्कल्पिक नजर्या सामने रखुगुए।
  22. 0:56–1:00कुई कि देखे, कोई भी इमारत सिर गुमबत से नहीं तिक्ती.
  23. 1:00–1:02अगर आप उस चिकने फर्ष को खोदें,
  24. 1:02–1:06तो नीचे आपको वो खुडरे बिना तराशे गय पत्धर मिलेंगे,
  25. 1:06–1:09जिनुने आसल में उस दाचे का बार उठाया है।
  26. 1:09–1:11आब उनीव के पत्टर
  27. 1:11–1:16भिल्कुल, मैह्ठिली के संदर में ये खुडरे पत्टर वो समानानतर इतिहास है,
  28. 1:16–1:21जो लोग परमपराव में वाश्ये पर दھकेल दिएगे दलित विमर्ष में
  29. 1:21–1:25और निपाल और असम में पहले इसके प्रवासी साइत्ते में द़गते हैं
  30. 1:25–1:29और यही से हमारे भीच एक सपष्ट वेचारिक-वेचारिक-विबाजन रेखा किचती है
  31. 1:29–1:31मेरा रुक बहुत साव है
  32. 1:31–1:38मैं मानता हूँ कि किसी भी भाशा को महस एक भोली या दालेक्त के सटर से उठाकर,
  33. 1:38–1:43उसे सद्यों तक जीवित रक्ने के लिए एक बहुत फीज्द्रड संस्तागर दाचे की आवशकता होती है.
  34. 1:43–1:46लेकिन क्या वो दाचा दमन कारी नहीं था?
  35. 1:46–1:49आप उसे शास्त्रिये या ब्रामवादी कहे सकती हैं.
  36. 1:49–1:53लिकिन इसी कठोर दाचे ने मैठली को नश्थ होने से बचाया.
  37. 1:53–1:56जोर्ज ग्रीर सं दूरा की आगा इसका मानकी करन,
  38. 1:56–2:01चंदा जाका इसे नया व्याकरन देना और मतलप सहिती अकाटमी के प्रयास.
  39. 2:01–2:08ये वो स्तम आई, जिनों अंतता हब भार्तिय समविदान की आप्वी अनुसुची में मेतली को मानेता दिलाई.
  40. 2:08–2:13मैं अप पूरे परिद्रुष्य को भिलकुल एक दूसरे नजर्ये से देकती हूँ.
  41. 2:13–2:14बताएए.
  42. 2:14–2:18अप जिस कठोर तनी या संस्त्थखत एतिहास की वकालत कर रहे हैं ना
  43. 2:18–2:22स्रोथ सामुडरी उसे एक सुखावा मुख्ये नाला कहती है.
  44. 2:22–2:25औरे सुखावा नाला ये तो बहुत सक्त टिपनी है.
  45. 2:25–2:27पर ये बहुत सती कुप्मा है.
  46. 2:27–2:31इस मुखेदारा के दानचे ने बाशा को संगरक्षित कम किया है,
  47. 2:31–2:37बलकी उसे खास संब्रान्त वर्ग की जागीर बनाकर जीादा रक्तिया है.
  48. 2:37–2:40अगर हमें में मेठली का आस्ली उद्गम कुजना है,
  49. 2:40–2:42तो हमें दर्बारो से बहार आना होगा.
  50. 2:42–2:44तो आपके ही साब से वो उद्गम कहा है?
  51. 2:44–2:48इसकी ज़े आप्वी से बार्वी सदी के उन भोद्ध सिद्धों में हैं
  52. 2:48–2:50जैसे सरहपा और कानहपा
  53. 2:50–2:52जिनोंने चर्या पद्रचे
  54. 2:52–2:55उनोंने जिस सन्द्या बाशा का अस्तमाल किया
  55. 2:55–2:57वो कोई देव बाशा नहीं ती
  56. 2:57–3:04उआम जन की बाशा थी जू निचले तबके के लोगो से सीदे समवाद करती थी
  57. 3:04–3:08लेकिन इस संस्त्ता गत इतिहास ने मतलब लोक विमर्ष को ही काट दिया
  58. 3:08–3:13यिस सन्रक्षन नहीं बलकी एक व्यवस्तित बाशाइ दमन है
  59. 3:13–3:19दिके बोध्द्द सिद्दों की संद्द्याबाशा का इतिहासिक महत्व है, इस से मैंगार नहीं कर रहा हूं,
  60. 3:19–3:23लिकिन संद्द्याबाशा अपने बेहत, गूड और प्रतिकात्मक ती,
  61. 3:23–3:28उसे हम सीदे तोर पर आजकी मैठिली का पूरन विखसित रूप तो नहीं मान सकते ना?
  62. 3:28–3:30पर वो शुरुवात तो थी?
  63. 3:30–3:35आप, लिकिन अगर न मैठिहास की जडों और भाशा के सबसे बड़े प्रतीक की ही बात कर रहे है,
  64. 3:35–3:37तो हम विद्यापती को कैसे नजर अंदास कर सकते हैं?
  65. 3:37–3:40मैत्हिली साहित्ते की पहचान तो विद्यापती के
  66. 3:40–3:42देसिल बयाना से ही स्थापत होती है ना?
  67. 3:42–3:44जो राजा शिव्सिंग के दरबारी थे?
  68. 3:44–3:47रूके, यही पर समानान्तर इतिहास का
  69. 3:47–3:51अद्यापती तो बज़ागी से दो अलग अलक पहचानो को अपस में मिला दियापती लिए नहीं जागापा
  70. 3:51–3:53अपका मतलब है कि विड्द्यापती यह जब वेकती नहीं बिलक्तुल नहीं
  71. 3:53–3:55श्रोथ सामगरी इस बात को बहुत प्रमुखता से उठाती है
  72. 3:55–3:57एक तरव ते दरबारी विद्वान विद्वापती ताकुल
  73. 3:57–3:59जो एक समब्रान्त पर पर पर प्राज़ान पर प्राज़ान
  74. 3:59–4:01अद्यापती ताकुल जो एक समब्रान्त परिवेश में ते
  75. 4:01–4:05जिनोंने संस्क्रित और अवहट में पूरुश परीक्षा जैसी रचनाय लिक ही
  76. 4:05–4:09तो आपकी से दो गलग गलक पहचानो को आपस में मिला दिया है
  77. 4:09–4:12दो आलक पहचान? आपका मतलब है की विद्द्यापती यह एक वेकती नहीं ते?
  78. 4:12–4:17बिलकल नहीं, स्रोथ सामगरी इस बात को बहुत प्रमुखता से उठाती है
  79. 4:17–4:20इक तरव ते दर्बारी विद्वान विद्ध्वापती ताकूल,
  80. 4:20–4:22जो एक समब्रान्त परिवेश में ते,
  81. 4:22–4:25जे नोने संस्क्रित और अवहट्ट में,
  82. 4:25–4:27पूरुश परीक्षा जैसी रचनाय लिखी.
  83. 4:27–4:29आप, जो एतिहासिक रूप से दर्ज है.
  84. 4:29–4:34अदुस्री तरव एक समानान्तर यहतिहास है, जो एक दुस्रे विद्ध्यापती की बात करता है.
  85. 4:35–4:40वो लोक कवी जिसने वास्तम में, वो पदावली रची जो आम लोगो के दिलो में बस कै.
  86. 4:40–4:44इस दुस्रे विद्यपती की जाती तक एतिहासिक रूप से अनिष्चित है.
  87. 4:44–4:48आच्छा तो आप पनकलाल मंडल के उसे सद्दान्त की बात कर रही है?
  88. 4:48–4:54बिल्कुल पनकलाल मंडल ने जिस सबाल्टन विद्यपती का चित्रोकेरा है
  89. 4:54–4:57उसी आम जन के कवी का प्रतिनदिद्व करता है.
  90. 4:57–5:01लेकिन इन ब्रहम्मडवादी इतिहास कारोने क्या क्या?
  91. 5:01–5:05उनो ने इस आम जन के कवी के रचनाउ को
  92. 5:05–5:08उस दरबारी विद्यापती के नाम पर मद दिया.
  93. 5:08–5:10ताकि उसे एक दाचे में फिट किया जासके.
  94. 5:10–5:19आा ताकी लोग संस्क्रती के इस सब से बड़े प्रतीक को एक विषुद्द, शैव, और सवरन दाचे के भीतर कैद किया जासके.
  95. 5:19–5:26निचले तबके के लोग आपनी ही कवीपर दावा ना कर सकें, इस के लिए वैचारिक अपहरन की आगया.
  96. 5:26–5:56ये एक बहुत एक क्रान्तिकारी दावा है, लिकिन देके अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर �
  97. 5:56–5:59मैं इसे एक उपमा से समजाना चाहूंगा.
  98. 5:59–6:02विलिम शेक्सपीर ने किस के लिए लिखा?
  99. 6:02–6:05उनो ने सड़कोपर चलने वाले आम लोगों के लिए नाटक लिखे.
  100. 6:05–6:08उनका साहित पूरी तरह से पोपिलर था.
  101. 6:08–6:10राँ लोग किंद्रित था.
  102. 6:10–6:11बलकुल.
  103. 6:11–6:14अब का अपका शेक्षपिर का उदारें सुन्ने में बहुत तारकिक लकता है
  104. 6:14–6:17लेकिन ये उस दमन की यान्तरिकी कु नहीं समजाता जो यहां काम कर रही थी
  105. 6:17–6:20दमन की यान्तरिकी कु नहीं समजाता जो यहां काम कर रही थी
  106. 6:20–6:24अब बाद में, अकाडमिक संस्ताऊने उनके फोलियो को सन्रक्षिट किया,
  107. 6:25–6:28क्या विद्द्यापती कि कला को पुरे पूरवी भारत में फैलाने किलिए,
  108. 6:29–6:31उस दरबारी धाचे कहुना निवारे नहीं फाँज्टुग?
  109. 6:31–6:34अपका शेक्सपिर का उदारन्च शून्ने में बहुत तारकिक लकता है.
  110. 6:34–6:40लेकिन ये उस दमन की यान्त्रेकी को नहीं समजाता जो यहां काम कर रही थी.
  111. 6:40–6:42दमन की यान्त्रेकी?
  112. 6:42–6:47रहाँ. शेक्सपिर के नाटकों को अकादमियोंने उनके मूल रूप में सहेजा.
  113. 6:47–6:51लेकिन विद्यापदी के मामले में संस्तागत ताकतों ने सर्फ ने सहेजा नहीं
  114. 6:51–6:54बलकी उनका पवित्री करन किया
  115. 6:54–6:59उनो ने उन हिस्सों को कार्ट्शार्ट दिया जो उनके स्थापित समाजिक दाचे को चुनाती देते थे
  116. 6:59–7:03लेकिन बिना कागस या राज्जाश़्े के वो बच्टे कैसे?
  117. 7:03–7:06आसल में, जो सच्च्चा लोग सहिट्ते होता है,
  118. 7:06–7:09वो किसी दर्बार्या कागस की मुधाजी नहीं करता.
  119. 7:09–7:14आप लोरी का सलहेस और दीना भद्री जैसे महाकावियों को देखिये?
  120. 7:14–7:16आप वो मोखिक परमपरा का हिसा है
  121. 7:16–7:18और ये आज भी जीविद हैं
  122. 7:18–7:19कैसे?
  123. 7:19–7:22ये किसी राजा के अभिलेकागार में नहीं सहेजे गय?
  124. 7:22–7:26ये दलितों, मुसहरों और यादों की सामोहिक
  125. 7:26–7:29मोखिक सम्रती में पीडिदर पीडि प्रवाहित होते रहे
  126. 7:29–7:31यही बाशा के अस्ली दड़कन है,
  127. 7:31–7:36जिसे आपके उस कथोर तने ने कभी अपनी शाक्खा नहीं माना.
  128. 7:36–7:39मैं मोक्खिक स्म्रित्ती की शक्ती को पुरी तरह स्विकार करता हूँ.
  129. 7:39–7:43लेकिन देकिए जब बाशावों के बीच अस्तित्व का संगर शुरू होता है,
  130. 7:43–7:46तब लड़ाई स्र्फ मोखिक स्म्रित्ती के सहारे नहीं जीती जासकती.
  131. 7:46–7:49आपका इशारा मान की करन की तरव है?
  132. 7:49–7:50बिलकुल.
  133. 7:50–7:52बीस्वी सदी की शुरुवात का समय यात की जीए.
  134. 7:52–7:55एक बहुत बडा राजनीतिक प्रयास चल रहा था
  135. 7:55–7:59ये साभित करने का की मैत्टिली महेज हिंदी की एक विक्रत बोली है.
  136. 7:59–8:04अगर उस समें जयाकान्त मिष्र और रमानाद जाजे से विद्वान आगे नहीं आते,
  137. 8:04–8:08तो ये भाशा हिंदी के विशाल समुद्दर में विलीन हो चुकी होती.
  138. 8:08–8:12वूँ, मैं मानती हूँ, कि उनका योगदान था, लेकिन...
  139. 8:12–8:17और अगर हम थोडा और पीचे जाएं, तो आपने एक दमनकारी विवस्ता की बात की थी.
  140. 8:17–8:20अखसर पनजी प्रबंद को इसी नजरिये से देखा जाता है.
  141. 8:21–8:23क्योगी वो दमनकारी ही थी.
  142. 8:23–8:29अगर अप इसके तन्त्र को गेराई से समजें, तो चोदवी सदी में शुरू हुई ये वन्शावली विवस था,
  143. 8:29–8:36दर सल शेत्र की सांस्क्रितिक विषिष्त्ता को बचाने का एक बेहत परिष्क्रित दस्तावेजी करन था.
  144. 8:36–8:42जब बाहरी आक्रमड हो रहे थे, तब इस पनजी प्रबंदने मेठिल समाज को बिखरने से रोका.
  145. 8:42–8:49मुझे ये कहना पडेगा कि ये पनजी प्रबंदन् का एक बहुत ही सूविद्दाजनक और रोमानी विष्लेशन है.
  146. 8:49–8:53ये कोई सान्स्क्रितिक विष्ष्ट्ता बचाने का उत्करन नहीं ता.
  147. 8:53–8:54तो फिर क्या था?
  148. 8:54–9:00ये समाजिक वर्च्यस्व और शुद्द्द्था को बनाय रक्ने का एक निर्मम हत्यार था.
  149. 9:00–9:05श्रोथ समगरी इसे स्पष्ट्रूप से ब्राम्हवादी पित्र सत्ता का तूल मानती है.
  150. 9:06–9:09चली ये में बताती हूँ कि ये जमीनी स्तर पर कैसे काम करताता.
  151. 9:10–9:14इसका काम ये ताए करना था कि इतिहास में कोन याडरक्चा जाएगा
  152. 9:15–9:16और किसे मिता दिया जाएगा.
  153. 9:16–9:18अप किसी विषिष्ट उदारन की बात कर रही है?
  154. 9:18–9:21आ, गंगेश उपादहे का उदारन लीजिये
  155. 9:21–9:25वे नविन्याए दरशन के इतने महान दाशनिक �the
  156. 9:25–9:27कि उनका दंका पूरे भारत में बच्टा था
  157. 9:27–9:30लेकिन इस महान संस्थागत इतिहास ने
  158. 9:30–9:32इतिहास ने उनके रेकोट की सात क्या किया?
  159. 9:33–9:35उनकी जानकारी दूशन पंजी में डाल दी गयी?
  160. 9:36–9:37उंग, क्यों की उनो ने?
  161. 9:37–9:41सर्फ इसलिए क्यों की उनो ने एक चर्म कारेनी से विवाह किया था.
  162. 9:41–9:45उस वन्शावली विवस्थाने उनके दाशनिक योग्दान को नहीं देखा
  163. 9:45–9:47बलकि उनकी सामाजिक अशुद्द्था को देखा
  164. 9:47–9:50और उने मुख्ध्ये दारा के रिकोट से गाएप कर दिया
  165. 9:50–9:52ये यी तिहास का सन्रक्षन है?
  166. 9:52–9:53नहीं
  167. 9:53–9:56ये किसी की विरासत की वेचारिक अनर किलिंग है
  168. 9:56–9:59देके गंगेश उपाद्धयाय के साथ जो हुँआ
  169. 9:59–10:02वो उस दोर के रूदिवादी समाज की एक कदवी सच्चाई है
  170. 10:02–10:03मैं इसका बचाओ नी करूंगा
  171. 10:03–10:08संस्तायं हमेशा अपने समय की समाजिक कुरीतियो से अचुती नहीं रहे पाती.
  172. 10:08–10:11लेकिन ये स्रिव चोद्वी सदी की बात नहीं है ना?
  173. 10:11–10:14ये रवया आदूनिक संस्तानो में भी जों कत्यो मोजुद है.
  174. 10:14–10:17आपने साहिते काद्मी की बहुत तारीव की.
  175. 10:17–10:19ज़े उसी अकाद्मी कटंद्र देकते हैं
  176. 10:19–10:20तेके पताएए
  177. 10:20–10:22बीस्वी सदी में
  178. 10:22–10:25हरी मोहन जहासे बड़ा व्यंग्यकार
  179. 10:25–10:27मेठली में कोई नहीं हुए
  180. 10:27–10:30उनके उपन्न्याज कन्यादान ने
  181. 10:30–10:33समाज की जडद्टापर इतने गेरे प्रहार किये
  182. 10:33–10:35कि पुरा समाज हिल गया
  183. 10:47–10:49उसी को भी पुरसकार नदेना बहतर है
  184. 10:49–10:53बजाए इसके वो पुरसकार हरी मोहन जाए को दिया जाए
  185. 10:53–10:57किंकि वे उस संस्तागद द्धाचे को असहेज कर रहे थे
  186. 10:57–10:59वो एक अटियासिक भूल थी मैं बानता हूं
  187. 10:59–11:01और अगर आपको लकता है
  188. 11:01–11:02कि ये सर्फ पुरानी बात है
  189. 11:02–11:11तो 2011 से 2014 के भीछ RTI कार्या करता हो आम्, विनी तुपल और आशीश अंचिनाहार के खलासों पर गुर कीजे,
  190. 11:11–11:19उनो ने दस्तावेजों से साभिट किया कि अकाद्मी के नभबे प्रतिष्चत से अदिक कार्या केवल सलाहकार बोड के रिष्तेदारों को दिये गै.
  191. 11:19–11:24जो दहाचा ब्रुष्टाचार और भाई भतीजवावाद पर ख़डा है,
  192. 11:24–11:26किया हम उसे बाशा कर अच्षक मान ले?
  193. 11:26–11:30ये एक बंद कम्रा है, जगा सर्फ कुछ खास लोग ही साँस ले रहे हैं.
  194. 11:30–11:33मैं उन अर्टी आई ख्लासो को खारिज नहीं कर रहा हू.
  195. 11:33–11:37किसी भी संस्ताः में जब सत्ताग का केंद्री करण होता है,
  196. 11:37–11:39तो मान्विय कम्या पेडा होती है.
  197. 11:39–11:41लेकिन, मतलब मेरा एक सवाल है,
  198. 11:41–11:47आप इन कम्यों के आदार पर पूरी संस्तागत विवस्ताग को ही कट्गरे में कड़ा कर रही है।
  199. 11:47–11:54विज़ना की जीए, एक विशाल पेड की, उस पेड को विबिन न शाक्फाँँ,
  200. 11:54–12:01जैसे आपके द़ारा बतायगे लोक महाकाविय, या दलिद �theater इन सभी शाक्फाँँ का बार सहने के लिए,
  201. 12:01–12:05एक मस्वुथ और कदोर तने की आवश्वक्ता होती है.
  202. 12:05–12:09अब जिस तने की बात कर हैं ना उसने अपने आस्पास के पूरे जंगल को ही सुखा दिया है।
  203. 12:09–12:13अगर साहित या अकाटमी जैसा मानकी क्रित मंच नहीं होता,
  204. 12:13–12:17तो क्या मैठिली को समझदान की आप्टमी अनुसुची में जगा मिल पाती?
  205. 12:17–12:21आप्टमी अनुसुची में शामिल होना महेज एक प्रतीक नहीं है.
  206. 12:21–12:24ये सरकारी बजेट और पटन पाटन की रीड है.
  207. 12:24–12:28उसकत्होर तने नहीं भाशा को भाशाई मरत्तिव से बचाया
  208. 12:28–12:30आप जिस तने की बात कर हैं आप
  209. 12:30–12:33उसने अपने आस्पास के पूरे जंगल को ही सुखा दिया है
  210. 12:34–12:37और जब हम भाशा के विस्तार की बात करते हैं
  211. 12:37–12:39तो हमें उस भुगोल की उर देखना होगा
  212. 12:39–12:44जिसे इन मुख्यदारा के इतिहास कारों पूरी तरह से नक्षे से ही मिता दिया है
  213. 12:44–12:47आपका मतलब है कि यह सर्फ भिहार तकसीमित नहीं ता?
  214. 12:47–12:48बिलकोल नहीं
  215. 12:48–12:53स्रोट समगरी एक बहुड बड़े समनानतर इतिहास का खुलासा करती है
  216. 12:53–12:56जिसे महान प्रवासी साहिट्ति कहा गया है
  217. 12:56–13:00क्या जानते है के जब भारत्रत में मित्ला के राजवन्च कमजोर हो रहे थे
  218. 13:00–13:03तब मेठली बाशा कहां पल फूल रही थी
  219. 13:03–13:06आप नेपाल के मल्ल काल की बात कर रही है
  220. 13:06–13:36अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या दिए अद्या दिए अद्या दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए
  221. 13:36–13:43मैठली उस दोर में एक दोनर भाशा थी जिसने अनने संस्क्रितियों को सम्रिद्ध्धिया.
  222. 13:43–13:50लेकिन इन सम्ब्रान्त इतिहास कारों ने बहुत ही चालाकी से नेपाल के उस साहित्ते को नेपाली
  223. 13:50–13:57अद़्ाली और असम के उस सहिट्टे को असमी कहेकर इस पूरे इतिहास को मेठली की ज़रों से काट दिया
  224. 13:57–14:02मैं इस तत्ट्टे का समान करता हूं की मद्धे काल में मेठली एक प्रस्टीज लंगज ती
  225. 14:02–14:06लेकिन देक्ये, जबाप, नेपाल, या आसम की ब्रजावली
  226. 14:06–14:09और बंगाल की ब्रज्बूली की बात करती है,
  227. 14:09–14:12तो हमें एक कछोर याठार्त समजना होगा.
  228. 14:12–14:13कैसा याठार्त?
  229. 14:13–14:16जब कोई भाशा एक लिंवा फ्रंका बन जाती है,
  230. 14:16–14:19तो तो आपना मूल स्वरूब कोने लकती है.
  231. 14:19–14:23इसे एसे समजीए, लेटिन बाशा का पूरे योरोपपप्र प्रबाव था.
  232. 14:23–14:26लेकिन जब लेटिन तूटकर स्थानी ए बोलियो से मिली,
  233. 14:26–14:29तो उसने फ्रेंच और स्पनेश को जन दिया.
  234. 14:29–14:33अद्रावी सदी किसी फ्रेंज नाटक को लेटें साइट्ते कहेंगी?
  235. 14:33–14:35नहीं, लेकिन वो स्तिती अलग है.
  236. 14:35–14:41ब्रज्बोली और ब्रजावली भी मूल रूप से क्रित्रिम या मिश्रिद भाशाये ती,
  237. 14:41–14:44जिने अन्ने कव्यों ने अपनी सुविदान उसर ग़ाथा.
  238. 14:44–14:48वे बाशाय अंतता बंगाली और असमी मेही विलीन हो गई
  239. 14:48–14:52मैठली का असली पुनर जागरन तो उनीस्वी सदी मेही हुए
  240. 14:52–14:56जब चंदाजा ने अपनी ही मिठला की दरती पर उसका व्याखरन तै किया
  241. 14:56–14:59इज़ोपका पुनर जागरन का सिथ्दानत है
  242. 14:59–15:01मैं इसे पूरी तरा से खारेज करती हूं
  243. 15:01–15:04चंदाजा और उनका वो तताकतिद पूनर जागरन
  244. 15:04–15:06आसल में एक बहुत ही चोटे
  245. 15:06–15:10सवर्ड वर्ब का अपनी सत्टा स्था च्थापित करने का प्रयास था
  246. 15:10–15:13आप उसे महез एक सत्टा का प्रयास कह रही है?
  247. 15:13–15:13आप
  248. 15:13–15:15वीदेज एज़रनल जैसे समानान्तर अंदोलनों को देखिये
  249. 15:15–15:17लिए दिजटल अरकाइविंग ने बहुत कुछ बडला है
  250. 15:17–15:18बलकुल
  251. 15:18–15:20अगर वाशी साहित ते को ख्रित्रिम कह रहे हैं
  252. 15:20–15:23कुछ वो आपके व्याक्रन के साचो में फित नहीं बैट्ता
  253. 15:23–15:28उन्निस्वी सदी के उस पुनर जागरन में उन मुसहरो की अवाज कहा ती
  254. 15:28–15:29जो दीना भद्री गार आए थे
  255. 15:29–15:32वो सहीट दे तो मोक्किक रूप से चली रहा था ना
  256. 15:32–15:34वीतर से खोखला किया
  257. 15:34–15:36लेकिन आज समय बडल चुका है
  258. 15:36–15:40विदेज येजरनल जैसे समानानतर आंदोलनो को देखिए?
  259. 15:40–15:42आँ, दिजितल आरकाईविंग ने बहुत कुछ बदला है.
  260. 15:42–15:47बलकुल. उनहोने न्टनेट की लोक तन्टरिक शक्ती का इस्तमाल करके,
  261. 15:47–15:49तिरुहुता लिपी को यूनीकोड तक पहुचाया.
  262. 15:49–15:54और उन हाजारो लोग पन्दूलिपियो और हाश्ये के लेखों को एक मंच दिया,
  263. 15:55–15:57जिने अकाटमियो ने सटने के लिए चोड दिया था.
  264. 15:57–16:00इस में कोई शक नहीं कि अमें बहुत ही दिल्चस मुकाम पर ख़े हैं.
  265. 16:01–16:03तोनो ही पक्षों के अपने भेहत थोस तरक हैं.
  266. 16:03–16:11अगर मैं आपनी बाद समझतन चाहूं तो मैरा अभी आभी आपने है कि आजके इस भाशाई पारिसेति की तनद्र में तिके रहने किलि एक शास्त्री यादार आवश्षक है.
  267. 16:11–16:16जोर्ज ग्री आर्षन से लेकव, सहित्य अकाद्मी और आप्वी अनुसुची में मानने ता.
  268. 16:33–16:38किस काम का, जो अपनी ही बाशा के अस्ली वारिसों को बेदखल कर दे.
  269. 16:38–16:40उस तनेने पेड को एक गमले में कैद कर दिया है.
  270. 16:41–16:45मैठली का अस्ली भविष्य विदेहे आरकाव की उस लोग तान्तरिक शकती में,
  271. 16:45–16:49अर जग्दीश प्रसाद मंडल जैसे दलित लेखो के साइत्ते में है
  272. 16:49–16:50मतला प्रतीरोद में है
  273. 16:50–16:55बलकुल, कोई भी जीवन भाशा सत्ता के खिलाग अपने प्रतीरोद में साँस लेती है
  274. 16:55–16:59दिल्ली में बैटे किसी सलागार बोड के वातानुकूलि दफ्तर में नहीं
  275. 16:59–17:02मुझे लगता है कि इस तीखी लेकिन जरूरी भहस के बाद
  276. 17:02–17:05हम एक बिन्दूपर तो सहमत हो ही सकते हैं
  277. 17:05–17:09वो ये कि मैतली सहित्यका इतिहास एक रेख्ये न नही है
  278. 17:09–17:13इसकी पुरी भव्यता और जटिल्ता को समझने के लिय
  279. 17:13–17:15हमें इसके संस्तागत तने कि साथ सात
  280. 17:15–17:19इसकी समानान्तर शाक्वों कभी गेराई से अद्द्दिन करना होगा.
  281. 17:19–17:20इक्दम सही कहा,
  282. 17:21–17:24हमें उन आवाजों को भी पूरी तरह गले लगाना होगा,
  283. 17:24–17:27जिने अप तक हाँशिये पर रख्खा गया था.
  284. 17:27–17:30और इसिल यह, हम अपने श्रोतावोपर ये चोडते है,
  285. 17:30–17:35कि वेश्रोथ समगरी मुजुद इन विबहिन ले टिहासिक द्रिष्टिकोनो को स्वैम पड़ें.
  286. 17:35–17:38जब आप किसी भी इतिहासिक दाचे को देकते है,
  287. 17:38–17:41तो केवल उसके चम्चमाते गुमबत को देख कर मत लोड आए.
  288. 17:41–17:46बिल्कुल नीचे उतर ये और उन खुर्दरे अनाम पत्टरो को तटोलिए
  289. 17:46–17:54क्योंकि कई बार असल मे वही खुर्दरे पत्टर उस पूरी शान्दार इमारत का असली वजन अपने कंदो पर उठाये होते हैं
  290. 17:54–17:59अग जीवन्त भाशा का इतियास कभी किसी एक किताब में खत्म नहीं होता
  291. 17:59–18:02ददीबेट से जुडने के लिए बहुत-बहुत दश्निवाद

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जब हम किसी यह तिहासिक एमारत को देकते है, तो हमारी नजर सब से पहले कहाजाती है, सब हविक है कि उसके बव्ये गुमबद पर, या उन चिकनी सतोंवोंपर, जो दूर से ही चमकती हैं. भिलकुर. हमें लगता है कि मतलब, यही उ स्वास्तुकला की पूरी सच्चाई है सब कुछ एक दं सबश्ट और सुन्दर देबेट में आपका स्वागत है आज हम गजेंदर ताकृर की किताब अप पारलल फिस्ट्री अप मित्छीला अन मैत्ली लिट्रेचर के नजरये से ये बवहती बुनियादी और जटल सवाल पर चर्चा करने वाले है और वो सवाल वाखई बहत गेरा है बलकल सवाल यह की मेतली साहित्रि का असली इतिहास आखर बस्ता कहा है क्या इसका वास्तविक स्वरूप उस मुक्छेदारा के शास्तरी ए इतिहास में है जिसे ब्रम्हणवादी परम्पराँ, दर्बारों और सहित यकाद्मी जैसी आदूनिक संस्ताँने गडा है, मैं इस चर्चा में इस शास्त्रिया और संस्तागत इतिहास का पक्ष्ष्ट्गुए। और मैं इसका एक वेक्कल्पिक नजर्या सामने रखुगुए। कुई कि देखे, कोई भी इमारत सिर गुमबत से नहीं तिक्ती. अगर आप उस चिकने फर्ष को खोदें, तो नीचे आपको वो खुडरे बिना तराशे गय पत्धर मिलेंगे, जिनुने आसल में उस दाचे का बार उठाया है। आब उनीव के पत्टर भिल्कुल, मैह्ठिली के संदर में ये खुडरे पत्टर वो समानानतर इतिहास है, जो लोग परमपराव में वाश्ये पर दھकेल दिएगे दलित विमर्ष में और निपाल और असम में पहले इसके प्रवासी साइत्ते में द़गते हैं और यही से हमारे भीच एक सपष्ट वेचारिक-वेचारिक-विबाजन रेखा किचती है मेरा रुक बहुत साव है मैं मानता हूँ कि किसी भी भाशा को महस एक भोली या दालेक्त के सटर से उठाकर, उसे सद्यों तक जीवित रक्ने के लिए एक बहुत फीज्द्रड संस्तागर दाचे की आवशकता होती है. लेकिन क्या वो दाचा दमन कारी नहीं था? आप उसे शास्त्रिये या ब्रामवादी कहे सकती हैं. लिकिन इसी कठोर दाचे ने मैठली को नश्थ होने से बचाया. जोर्ज ग्रीर सं दूरा की आगा इसका मानकी करन, चंदा जाका इसे नया व्याकरन देना और मतलप सहिती अकाटमी के प्रयास. ये वो स्तम आई, जिनों अंतता हब भार्तिय समविदान की आप्वी अनुसुची में मेतली को मानेता दिलाई. मैं अप पूरे परिद्रुष्य को भिलकुल एक दूसरे नजर्ये से देकती हूँ. बताएए. अप जिस कठोर तनी या संस्त्थखत एतिहास की वकालत कर रहे हैं ना स्रोथ सामुडरी उसे एक सुखावा मुख्ये नाला कहती है. औरे सुखावा नाला ये तो बहुत सक्त टिपनी है. पर ये बहुत सती कुप्मा है. इस मुखेदारा के दानचे ने बाशा को संगरक्षित कम किया है, बलकी उसे खास संब्रान्त वर्ग की जागीर बनाकर जीादा रक्तिया है. अगर हमें में मेठली का आस्ली उद्गम कुजना है, तो हमें दर्बारो से बहार आना होगा. तो आपके ही साब से वो उद्गम कहा है? इसकी ज़े आप्वी से बार्वी सदी के उन भोद्ध सिद्धों में हैं जैसे सरहपा और कानहपा जिनोंने चर्या पद्रचे उनोंने जिस सन्द्या बाशा का अस्तमाल किया वो कोई देव बाशा नहीं ती उआम जन की बाशा थी जू निचले तबके के लोगो से सीदे समवाद करती थी लेकिन इस संस्त्ता गत इतिहास ने मतलब लोक विमर्ष को ही काट दिया यिस सन्रक्षन नहीं बलकी एक व्यवस्तित बाशाइ दमन है दिके बोध्द्द सिद्दों की संद्द्याबाशा का इतिहासिक महत्व है, इस से मैंगार नहीं कर रहा हूं, लिकिन संद्द्याबाशा अपने बेहत, गूड और प्रतिकात्मक ती, उसे हम सीदे तोर पर आजकी मैठिली का पूरन विखसित रूप तो नहीं मान सकते ना? पर वो शुरुवात तो थी? आप, लिकिन अगर न मैठिहास की जडों और भाशा के सबसे बड़े प्रतीक की ही बात कर रहे है, तो हम विद्यापती को कैसे नजर अंदास कर सकते हैं? मैत्हिली साहित्ते की पहचान तो विद्यापती के देसिल बयाना से ही स्थापत होती है ना? जो राजा शिव्सिंग के दरबारी थे? रूके, यही पर समानान्तर इतिहास का अद्यापती तो बज़ागी से दो अलग अलक पहचानो को अपस में मिला दियापती लिए नहीं जागापा अपका मतलब है कि विड्द्यापती यह जब वेकती नहीं बिलक्तुल नहीं श्रोथ सामगरी इस बात को बहुत प्रमुखता से उठाती है एक तरव ते दरबारी विद्वान विद्वापती ताकुल जो एक समब्रान्त पर पर पर प्राज़ान पर प्राज़ान अद्यापती ताकुल जो एक समब्रान्त परिवेश में ते जिनोंने संस्क्रित और अवहट में पूरुश परीक्षा जैसी रचनाय लिक ही तो आपकी से दो गलग गलक पहचानो को आपस में मिला दिया है दो आलक पहचान? आपका मतलब है की विद्द्यापती यह एक वेकती नहीं ते? बिलकल नहीं, स्रोथ सामगरी इस बात को बहुत प्रमुखता से उठाती है इक तरव ते दर्बारी विद्वान विद्ध्वापती ताकूल, जो एक समब्रान्त परिवेश में ते, जे नोने संस्क्रित और अवहट्ट में, पूरुश परीक्षा जैसी रचनाय लिखी. आप, जो एतिहासिक रूप से दर्ज है. अदुस्री तरव एक समानान्तर यहतिहास है, जो एक दुस्रे विद्ध्यापती की बात करता है. वो लोक कवी जिसने वास्तम में, वो पदावली रची जो आम लोगो के दिलो में बस कै. इस दुस्रे विद्यपती की जाती तक एतिहासिक रूप से अनिष्चित है. आच्छा तो आप पनकलाल मंडल के उसे सद्दान्त की बात कर रही है? बिल्कुल पनकलाल मंडल ने जिस सबाल्टन विद्यपती का चित्रोकेरा है उसी आम जन के कवी का प्रतिनदिद्व करता है. लेकिन इन ब्रहम्मडवादी इतिहास कारोने क्या क्या? उनो ने इस आम जन के कवी के रचनाउ को उस दरबारी विद्यापती के नाम पर मद दिया. ताकि उसे एक दाचे में फिट किया जासके. आा ताकी लोग संस्क्रती के इस सब से बड़े प्रतीक को एक विषुद्द, शैव, और सवरन दाचे के भीतर कैद किया जासके. निचले तबके के लोग आपनी ही कवीपर दावा ना कर सकें, इस के लिए वैचारिक अपहरन की आगया. ये एक बहुत एक क्रान्तिकारी दावा है, लिकिन देके अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर � मैं इसे एक उपमा से समजाना चाहूंगा. विलिम शेक्सपीर ने किस के लिए लिखा? उनो ने सड़कोपर चलने वाले आम लोगों के लिए नाटक लिखे. उनका साहित पूरी तरह से पोपिलर था. राँ लोग किंद्रित था. बलकुल. अब का अपका शेक्षपिर का उदारें सुन्ने में बहुत तारकिक लकता है लेकिन ये उस दमन की यान्तरिकी कु नहीं समजाता जो यहां काम कर रही थी दमन की यान्तरिकी कु नहीं समजाता जो यहां काम कर रही थी अब बाद में, अकाडमिक संस्ताऊने उनके फोलियो को सन्रक्षिट किया, क्या विद्द्यापती कि कला को पुरे पूरवी भारत में फैलाने किलिए, उस दरबारी धाचे कहुना निवारे नहीं फाँज्टुग? अपका शेक्सपिर का उदारन्च शून्ने में बहुत तारकिक लकता है. लेकिन ये उस दमन की यान्त्रेकी को नहीं समजाता जो यहां काम कर रही थी. दमन की यान्त्रेकी? रहाँ. शेक्सपिर के नाटकों को अकादमियोंने उनके मूल रूप में सहेजा. लेकिन विद्यापदी के मामले में संस्तागत ताकतों ने सर्फ ने सहेजा नहीं बलकी उनका पवित्री करन किया उनो ने उन हिस्सों को कार्ट्शार्ट दिया जो उनके स्थापित समाजिक दाचे को चुनाती देते थे लेकिन बिना कागस या राज्जाश़्े के वो बच्टे कैसे? आसल में, जो सच्च्चा लोग सहिट्ते होता है, वो किसी दर्बार्या कागस की मुधाजी नहीं करता. आप लोरी का सलहेस और दीना भद्री जैसे महाकावियों को देखिये? आप वो मोखिक परमपरा का हिसा है और ये आज भी जीविद हैं कैसे? ये किसी राजा के अभिलेकागार में नहीं सहेजे गय? ये दलितों, मुसहरों और यादों की सामोहिक मोखिक सम्रती में पीडिदर पीडि प्रवाहित होते रहे यही बाशा के अस्ली दड़कन है, जिसे आपके उस कथोर तने ने कभी अपनी शाक्खा नहीं माना. मैं मोक्खिक स्म्रित्ती की शक्ती को पुरी तरह स्विकार करता हूँ. लेकिन देकिए जब बाशावों के बीच अस्तित्व का संगर शुरू होता है, तब लड़ाई स्र्फ मोखिक स्म्रित्ती के सहारे नहीं जीती जासकती. आपका इशारा मान की करन की तरव है? बिलकुल. बीस्वी सदी की शुरुवात का समय यात की जीए. एक बहुत बडा राजनीतिक प्रयास चल रहा था ये साभित करने का की मैत्टिली महेज हिंदी की एक विक्रत बोली है. अगर उस समें जयाकान्त मिष्र और रमानाद जाजे से विद्वान आगे नहीं आते, तो ये भाशा हिंदी के विशाल समुद्दर में विलीन हो चुकी होती. वूँ, मैं मानती हूँ, कि उनका योगदान था, लेकिन... और अगर हम थोडा और पीचे जाएं, तो आपने एक दमनकारी विवस्ता की बात की थी. अखसर पनजी प्रबंद को इसी नजरिये से देखा जाता है. क्योगी वो दमनकारी ही थी. अगर अप इसके तन्त्र को गेराई से समजें, तो चोदवी सदी में शुरू हुई ये वन्शावली विवस था, दर सल शेत्र की सांस्क्रितिक विषिष्त्ता को बचाने का एक बेहत परिष्क्रित दस्तावेजी करन था. जब बाहरी आक्रमड हो रहे थे, तब इस पनजी प्रबंदने मेठिल समाज को बिखरने से रोका. मुझे ये कहना पडेगा कि ये पनजी प्रबंदन् का एक बहुत ही सूविद्दाजनक और रोमानी विष्लेशन है. ये कोई सान्स्क्रितिक विष्ष्ट्ता बचाने का उत्करन नहीं ता. तो फिर क्या था? ये समाजिक वर्च्यस्व और शुद्द्द्था को बनाय रक्ने का एक निर्मम हत्यार था. श्रोथ समगरी इसे स्पष्ट्रूप से ब्राम्हवादी पित्र सत्ता का तूल मानती है. चली ये में बताती हूँ कि ये जमीनी स्तर पर कैसे काम करताता. इसका काम ये ताए करना था कि इतिहास में कोन याडरक्चा जाएगा और किसे मिता दिया जाएगा. अप किसी विषिष्ट उदारन की बात कर रही है? आ, गंगेश उपादहे का उदारन लीजिये वे नविन्याए दरशन के इतने महान दाशनिक �the कि उनका दंका पूरे भारत में बच्टा था लेकिन इस महान संस्थागत इतिहास ने इतिहास ने उनके रेकोट की सात क्या किया? उनकी जानकारी दूशन पंजी में डाल दी गयी? उंग, क्यों की उनो ने? सर्फ इसलिए क्यों की उनो ने एक चर्म कारेनी से विवाह किया था. उस वन्शावली विवस्थाने उनके दाशनिक योग्दान को नहीं देखा बलकि उनकी सामाजिक अशुद्द्था को देखा और उने मुख्ध्ये दारा के रिकोट से गाएप कर दिया ये यी तिहास का सन्रक्षन है? नहीं ये किसी की विरासत की वेचारिक अनर किलिंग है देके गंगेश उपाद्धयाय के साथ जो हुँआ वो उस दोर के रूदिवादी समाज की एक कदवी सच्चाई है मैं इसका बचाओ नी करूंगा संस्तायं हमेशा अपने समय की समाजिक कुरीतियो से अचुती नहीं रहे पाती. लेकिन ये स्रिव चोद्वी सदी की बात नहीं है ना? ये रवया आदूनिक संस्तानो में भी जों कत्यो मोजुद है. आपने साहिते काद्मी की बहुत तारीव की. ज़े उसी अकाद्मी कटंद्र देकते हैं तेके पताएए बीस्वी सदी में हरी मोहन जहासे बड़ा व्यंग्यकार मेठली में कोई नहीं हुए उनके उपन्न्याज कन्यादान ने समाज की जडद्टापर इतने गेरे प्रहार किये कि पुरा समाज हिल गया उसी को भी पुरसकार नदेना बहतर है बजाए इसके वो पुरसकार हरी मोहन जाए को दिया जाए किंकि वे उस संस्तागद द्धाचे को असहेज कर रहे थे वो एक अटियासिक भूल थी मैं बानता हूं और अगर आपको लकता है कि ये सर्फ पुरानी बात है तो 2011 से 2014 के भीछ RTI कार्या करता हो आम्, विनी तुपल और आशीश अंचिनाहार के खलासों पर गुर कीजे, उनो ने दस्तावेजों से साभिट किया कि अकाद्मी के नभबे प्रतिष्चत से अदिक कार्या केवल सलाहकार बोड के रिष्तेदारों को दिये गै. जो दहाचा ब्रुष्टाचार और भाई भतीजवावाद पर ख़डा है, किया हम उसे बाशा कर अच्षक मान ले? ये एक बंद कम्रा है, जगा सर्फ कुछ खास लोग ही साँस ले रहे हैं. मैं उन अर्टी आई ख्लासो को खारिज नहीं कर रहा हू. किसी भी संस्ताः में जब सत्ताग का केंद्री करण होता है, तो मान्विय कम्या पेडा होती है. लेकिन, मतलब मेरा एक सवाल है, आप इन कम्यों के आदार पर पूरी संस्तागत विवस्ताग को ही कट्गरे में कड़ा कर रही है। विज़ना की जीए, एक विशाल पेड की, उस पेड को विबिन न शाक्फाँँ, जैसे आपके द़ारा बतायगे लोक महाकाविय, या दलिद �theater इन सभी शाक्फाँँ का बार सहने के लिए, एक मस्वुथ और कदोर तने की आवश्वक्ता होती है. अब जिस तने की बात कर हैं ना उसने अपने आस्पास के पूरे जंगल को ही सुखा दिया है। अगर साहित या अकाटमी जैसा मानकी क्रित मंच नहीं होता, तो क्या मैठिली को समझदान की आप्टमी अनुसुची में जगा मिल पाती? आप्टमी अनुसुची में शामिल होना महेज एक प्रतीक नहीं है. ये सरकारी बजेट और पटन पाटन की रीड है. उसकत्होर तने नहीं भाशा को भाशाई मरत्तिव से बचाया आप जिस तने की बात कर हैं आप उसने अपने आस्पास के पूरे जंगल को ही सुखा दिया है और जब हम भाशा के विस्तार की बात करते हैं तो हमें उस भुगोल की उर देखना होगा जिसे इन मुख्यदारा के इतिहास कारों पूरी तरह से नक्षे से ही मिता दिया है आपका मतलब है कि यह सर्फ भिहार तकसीमित नहीं ता? बिलकोल नहीं स्रोट समगरी एक बहुड बड़े समनानतर इतिहास का खुलासा करती है जिसे महान प्रवासी साहिट्ति कहा गया है क्या जानते है के जब भारत्रत में मित्ला के राजवन्च कमजोर हो रहे थे तब मेठली बाशा कहां पल फूल रही थी आप नेपाल के मल्ल काल की बात कर रही है अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या अद्या दिए अद्या दिए अद्या दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए मैठली उस दोर में एक दोनर भाशा थी जिसने अनने संस्क्रितियों को सम्रिद्ध्धिया. लेकिन इन सम्ब्रान्त इतिहास कारों ने बहुत ही चालाकी से नेपाल के उस साहित्ते को नेपाली अद़्ाली और असम के उस सहिट्टे को असमी कहेकर इस पूरे इतिहास को मेठली की ज़रों से काट दिया मैं इस तत्ट्टे का समान करता हूं की मद्धे काल में मेठली एक प्रस्टीज लंगज ती लेकिन देक्ये, जबाप, नेपाल, या आसम की ब्रजावली और बंगाल की ब्रज्बूली की बात करती है, तो हमें एक कछोर याठार्त समजना होगा. कैसा याठार्त? जब कोई भाशा एक लिंवा फ्रंका बन जाती है, तो तो आपना मूल स्वरूब कोने लकती है. इसे एसे समजीए, लेटिन बाशा का पूरे योरोपपप्र प्रबाव था. लेकिन जब लेटिन तूटकर स्थानी ए बोलियो से मिली, तो उसने फ्रेंच और स्पनेश को जन दिया. अद्रावी सदी किसी फ्रेंज नाटक को लेटें साइट्ते कहेंगी? नहीं, लेकिन वो स्तिती अलग है. ब्रज्बोली और ब्रजावली भी मूल रूप से क्रित्रिम या मिश्रिद भाशाये ती, जिने अन्ने कव्यों ने अपनी सुविदान उसर ग़ाथा. वे बाशाय अंतता बंगाली और असमी मेही विलीन हो गई मैठली का असली पुनर जागरन तो उनीस्वी सदी मेही हुए जब चंदाजा ने अपनी ही मिठला की दरती पर उसका व्याखरन तै किया इज़ोपका पुनर जागरन का सिथ्दानत है मैं इसे पूरी तरा से खारेज करती हूं चंदाजा और उनका वो तताकतिद पूनर जागरन आसल में एक बहुत ही चोटे सवर्ड वर्ब का अपनी सत्टा स्था च्थापित करने का प्रयास था आप उसे महез एक सत्टा का प्रयास कह रही है? आप वीदेज एज़रनल जैसे समानान्तर अंदोलनों को देखिये लिए दिजटल अरकाइविंग ने बहुत कुछ बडला है बलकुल अगर वाशी साहित ते को ख्रित्रिम कह रहे हैं कुछ वो आपके व्याक्रन के साचो में फित नहीं बैट्ता उन्निस्वी सदी के उस पुनर जागरन में उन मुसहरो की अवाज कहा ती जो दीना भद्री गार आए थे वो सहीट दे तो मोक्किक रूप से चली रहा था ना वीतर से खोखला किया लेकिन आज समय बडल चुका है विदेज येजरनल जैसे समानानतर आंदोलनो को देखिए? आँ, दिजितल आरकाईविंग ने बहुत कुछ बदला है. बलकुल. उनहोने न्टनेट की लोक तन्टरिक शक्ती का इस्तमाल करके, तिरुहुता लिपी को यूनीकोड तक पहुचाया. और उन हाजारो लोग पन्दूलिपियो और हाश्ये के लेखों को एक मंच दिया, जिने अकाटमियो ने सटने के लिए चोड दिया था. इस में कोई शक नहीं कि अमें बहुत ही दिल्चस मुकाम पर ख़े हैं. तोनो ही पक्षों के अपने भेहत थोस तरक हैं. अगर मैं आपनी बाद समझतन चाहूं तो मैरा अभी आभी आपने है कि आजके इस भाशाई पारिसेति की तनद्र में तिके रहने किलि एक शास्त्री यादार आवश्षक है. जोर्ज ग्री आर्षन से लेकव, सहित्य अकाद्मी और आप्वी अनुसुची में मानने ता. किस काम का, जो अपनी ही बाशा के अस्ली वारिसों को बेदखल कर दे. उस तनेने पेड को एक गमले में कैद कर दिया है. मैठली का अस्ली भविष्य विदेहे आरकाव की उस लोग तान्तरिक शकती में, अर जग्दीश प्रसाद मंडल जैसे दलित लेखो के साइत्ते में है मतला प्रतीरोद में है बलकुल, कोई भी जीवन भाशा सत्ता के खिलाग अपने प्रतीरोद में साँस लेती है दिल्ली में बैटे किसी सलागार बोड के वातानुकूलि दफ्तर में नहीं मुझे लगता है कि इस तीखी लेकिन जरूरी भहस के बाद हम एक बिन्दूपर तो सहमत हो ही सकते हैं वो ये कि मैतली सहित्यका इतिहास एक रेख्ये न नही है इसकी पुरी भव्यता और जटिल्ता को समझने के लिय हमें इसके संस्तागत तने कि साथ सात इसकी समानान्तर शाक्वों कभी गेराई से अद्द्दिन करना होगा. इक्दम सही कहा, हमें उन आवाजों को भी पूरी तरह गले लगाना होगा, जिने अप तक हाँशिये पर रख्खा गया था. और इसिल यह, हम अपने श्रोतावोपर ये चोडते है, कि वेश्रोथ समगरी मुजुद इन विबहिन ले टिहासिक द्रिष्टिकोनो को स्वैम पड़ें. जब आप किसी भी इतिहासिक दाचे को देकते है, तो केवल उसके चम्चमाते गुमबत को देख कर मत लोड आए. बिल्कुल नीचे उतर ये और उन खुर्दरे अनाम पत्टरो को तटोलिए क्योंकि कई बार असल मे वही खुर्दरे पत्टर उस पूरी शान्दार इमारत का असली वजन अपने कंदो पर उठाये होते हैं अग जीवन्त भाशा का इतियास कभी किसी एक किताब में खत्म नहीं होता ददीबेट से जुडने के लिए बहुत-बहुत दश्निवाद

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