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मैथिली_गजलक_व्याकरणक_एक्स-रे.mp4
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- 0:00–0:08जे हम कहब जे मैंने बहावना, प्रेम अ तुतल मोन, जक्रा हम्रा सब अक्सर कविता कविता कोहासा में हेरायल माने ची,
- 0:08–0:13उक्रो एक्ता अख्ष्रे रिपोट बहुर सके चाहें, तक की इपत्याय बो योग ये आच्छ?
- 0:13–0:15उ पत्याएप तकनी मुष्किल चाहें
- 0:15–0:19करन साहित्यक दून्या क्या अविषेश का कविता के
- 0:19–0:23सादारन तया एक ता मैंने डाएकनोस्टिक मर्टी वाटर्स
- 0:23–0:25या अस्पष्त ताक प्रतिक मानर जाएतें
- 0:25–0:26आग्दम
- 0:26–0:28जद एस सब किष आमुर्त आची
- 0:28–0:30तो आप आप द़ाई थे ज़ार हैं।
- 0:30–0:34तो आप द़ाई बाश्ट्टाई नियमसे बेसी बहावनाक प्रवाजगे महत्तू देल जाएत आची
- 0:34–0:36मुदा तनीक सोचु, हाथ तूटटेच च्याए
- 0:36–0:38तो आच्च्च्रे बतादेच ज़े हद्दी कते तूटलगच
- 0:38–0:40यह दम श्पष्ट
- 0:40–0:42तूटल आच है वह नहीं तूटल आच
- 0:42–0:43बलकोल
- 0:43–0:44मुदा आई हमरा सब
- 0:44–0:48जे करा इविस्त्रित विमर्श वागण अद्द्धियन कर जारहल ची
- 0:48–0:51उ मने उही बहावनाक एकसरे मशीन आच है
- 0:51–0:52बापरे
- 0:52–0:55तब इए एकसरे मशीन अखिर अची की
- 0:55–1:01इआची आशीश अनशिनार तोर लिक्छत पोठी मेठली गजलक व्याक्रन अव इतिहास
- 1:01–1:04इपोठी इब्रहम पून रुपन तोड़ देटची
- 1:04–1:08जगजल बस किछ सुन्दर शबदक जोड़ वप प्रेम गीटच
- 1:08–1:12औह, मने गजल सर्फ प्रेम गीट नहीं आची
- 1:12–1:14नहीं, एक दम नहीं
- 1:14–1:17इस पष्ट करे तची के गजल एक ता
- 1:17–1:20कठोर गनितिये, आव्याक्रनिक संद्रचनाज
- 1:20–1:22आई विमर्ष हमरा सब के
- 1:22–1:25इदिक हवत, जे कोना एक ता विदेशी काभ्यविदा
- 1:25–1:27मितलाक माटी में रच्भसी गल
- 1:27–1:29आई आई बहत महत्वोण आची
- 1:29–1:36दिकू, ग्यान उही समय, सब से भेसी मुल्यवान होई तची, जखन उक्रा भुजल आ लागु कल जाए.
- 1:36–1:37से तचाय?
- 1:37–1:46इपोठी गजल कोही जटिलता के, उकर इतिहास के, आवकर कत्होर व्याक्रन के, बहुत सुगमता सा हम्रा सब के समक्ष रख ही तची.
- 1:46–1:52मुता, एक ता बाज जे पोथी खोलताई सब से पहले द्याना कर्षिट करे तची, औह आची लेक्खक तेवर.
- 1:52–1:54तेवर? माने कोहन देवर?
- 1:54–1:57मैंने सदारना काद्मिक पोथी बहुत विनम्र होई तची ना,
- 1:57–2:00हमर चोट सन प्रयास अची वला बहु,
- 2:00–2:04मुदा अचिनार जीक स्रूवात एक दम सक्थ चेतावनी से होई तची
- 2:04–2:06अच्छा, की लिख़े च्छती हूँ?
- 2:06–2:10उस पष्ट लिखच्छती, जे जे बिना पडे तरक्वितर करे च्छती
- 2:10–2:15या जे जात, दर्म, औम्र, वा पद देक कर बात माने च्छती
- 2:15–2:16तिनकालेल इपोति नहीं आची
- 2:16–2:19बापरे, इतो बड़ा ख्रामक शुर्वात भेल
- 2:19–2:25इदा, मुदद तनी सुचु कि इथोरेक भीसी आहंकार पूरन न नहीं लागी रहल चे
- 2:25–2:30कोनो नावका लेखख, वरष्लोकनिक के एना सीधही नकारी देई
- 2:30–2:34इत यत सहिट्ते में राजनिती जगा भेल, एकर अखेर अर्ठा की भेल?
- 2:34–2:37उप्रत्हम द्रिष्ट्या यहां के अहंकार लागी सकेता ची,
- 2:37–2:41मुदे एकर पाच्चा एक देब बाएक पीला असंगर्ष छट्ई.
- 2:41–2:43पीडा, के हन पीडा?
- 2:43–2:50मैंने, लेक्हक बहुत निदरता सां साहित्यक दून्याक एक तक कतू सत्यके तूजागर कर रहल चती.
- 2:50–2:55औव आची गजल कार सबक भीचक भावनात्मक ब्लाक्मेलिं.
- 2:55–3:01है, बावनात्मक भ्लाक्मेलिं साहित्त में यी तो कुत्रिलर सिन्माजका भेल.
- 3:01–3:03अ, सुनी में आजीब लगए चे.
- 3:03–3:07एक रा तनी विस्तार ससमजाओ, जे इग कुना काज करे तचे.
- 3:07–3:10मिने कविता लिखहावाक लिल के कख्रा ब्लाक्मेल कर रहल चे.
- 3:10–3:14देखो, जक हन कोनो विदान नुका नुका आवी रहल हुए तची,
- 3:14–3:17वा उकर व्याक्रन तई बहरल हुए तची
- 3:17–3:19तक किचु अस्थापित ववरष्ट लोक
- 3:19–3:22उक्रा अपन हिसाप समोड़ चाहे चथी
- 3:22–3:23आच्छा
- 3:23–3:25माने अपन वर्च्छवा दिखावा चाहे चथी
- 3:25–3:26बलकुल
- 3:26–3:28अन छिनार जी बतभैच्चतीन
- 3:28–3:30जे किचु लोक कहिचला
- 3:30–3:34जे जगजलक व्याक्रन में हुनका छूट नहीं देलगेल
- 3:34–3:37वा हुनक गलत व्याक्रन के मानी नहीं लेलगेल
- 3:37–3:39ता उगजल लिखव चूड देता
- 3:39–3:41औह लो
- 3:41–3:43माने हमर बात मानु
- 3:43–3:45ने ता हम खेलगे न करोव वलागव
- 3:45–3:47इक दम सहीं पकल लोगु
- 3:47–3:49अगर बद्दालोक लिखिरहल चतिन काले पचास्ता लिख्ता
- 3:49–3:50अहो
- 3:50–3:53तम अगर विक्तिसे पएग विद्चा ची
- 3:53–3:55आए एह कारना ची जो पोत्फी में
- 3:55–3:58गजल काल कहन्ड का बाद्टिच चतिन
- 3:58–3:59अगर एक दम
- 3:59–4:01पोत्फी में जिक दर्गाए चाछा ची
- 4:01–4:05अई दूटा लोक लिखिरहल चतिन, काले पचास्ता लिखता
- 4:05–4:09अहो, तम अब व्यक्तिसे पएग विदा ची
- 4:09–4:14आई हे कारन ची जो पोठी में गजल काल कहन्द का बाटेई चतिन
- 4:14–4:16अआ, एक दम
- 4:16–4:20पोठी में जिक्र ची जे 1905-2007 दरी
- 4:20–4:24जीवन युग जे कविष्वर जीवनजाक नाम पर आची
- 4:24–4:27और 2008 अ अईचिनहार युग
- 4:27–4:28एक दम सही
- 4:28–4:30इग युग विबाजन बद महत्व पूँच आई
- 4:30–4:32इदेखा रहा लगची
- 4:32–4:35जे गज़ल कोना एक ता नव रुप लओ रहा लगची
- 4:35–4:39जीवन जा मेठलिक पहिल गजल कार मनल जैच छतिना
- 4:39–4:39आँ
- 4:39–4:44मोदा, 2008 का बाद जे अंचिनार युग आची
- 4:44–4:48उ मेठलिग गजल के उर्दूव लहिन्दी का चाहूर सां
- 4:48–4:53निकाल क, उक्रा पोड रुपेंड मेठलिक कष्वतन्त्र अन्यम बद्ध
- 4:53–4:56विद्धा करुप में स्थापित करवा क्रान्ती आचे
- 4:56–4:58कमाल चे
- 4:58–5:01और इक क्रान्ती कोना भारहल चे
- 5:01–5:03उकर तरीका हमरा बहुत रुमाचित के लग
- 5:03–5:04कोना?
- 5:04–5:06की निक लागल हैं के?
- 5:06–5:10मैंने गजल, मुल, रुप सा, अरभी, और फारसिक माटी सा आए लग चे
- 5:10–5:15उकर आपन प्रतिक वा सिम्बल्स आफी, जेना सराव, सुराही, साकी.
- 5:15–5:20मुदा अचिनार जीजे मेठली करन केली हैंच उ कमाल आचे.
- 5:20–5:23आप, उ थेट मेठली में परिनत कदेल निएक्रा.
- 5:23–5:27इत जिना कोनो विदेशी पक्वान के आपन गाँँ का मसाला देका बनाएपजे का भाल
- 5:27–5:30एक दम सती के आनालजी अची
- 5:30–5:33जा हमरा सभे एक रा पेग परिप्रेक्ष सनजोडी
- 5:33–5:37तई अनुवादक का एक ता उत्क्रिष्टूडारन आची
- 5:37–5:40बाशा का अनुवाद मात्र शब्दक नहीं होई चे
- 5:40–5:41तफिर कखर होई चे
- 5:41–5:43ओ अनुवाद संसक्रतिक होई टची
- 5:43–5:46इक दम पोठी मेजना मैं
- 5:46–5:49माने शराब के लेल ताली शब्द का सुजाओ दिल गे ले ची
- 5:49–5:52ताली बद्च्थानिये शब्द चे
- 5:52–5:55आ, मीना वा सुराही जगजल मे भूध प्रेवोग हुए चे
- 5:55–5:59वोक्रा मेतली मे डाबा, कथिया वा लबनी कावाग बाद बहल अचे
- 5:59–6:01और साकी कलेल
- 6:01–6:04साकी जे शराब परसेवाला होई तचे
- 6:04–6:05वोक्रा लिल पासी भाई
- 6:05–6:09बाप्रे यी ता एक द्वाँवोक द्रिष्छ बनिगल
- 6:09–6:12आम मैखाना बनिगल ताडी काना वा पस काना
- 6:12–6:16देखू जखन के हो मीना वा मैखाना पडेतचे
- 6:16–6:21ता एक ता मैखल पाटख कमान में उचित्र बोथ पराया लगेत चे
- 6:21–6:23आँ, कनेत नहीं भापाबी चे
- 6:23–6:25मुदा लबनी आ ताडी काना कहतें,
- 6:25–6:28उसीदा मित्ला के गाँक गाची,
- 6:28–6:30औते का परवेर से जुड़जाएतची.
- 6:30–6:34गजलक बावना सीदे पाथक का माटी सन जुडजाएतचे.
- 6:34–6:38मने इग गजलक आतमाक छेट मेत्ली करना चे.
- 6:38–6:39बिल्ल्कुल.
- 6:39–6:43मुदा सबस्वेशी जाम्रा सोच्वापर मजबूरके लग औग रूस्न कपरी भाशा चाल
- 6:43–6:46औग रूस्न, माने बूटी, ना?
- 6:46–6:51आम तोर पर गजल में रूस्न सुनके कोनो सुन्दर स्ट्रीक कल्पना मोन में होईता चे
- 6:51–7:21रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रह
- 7:21–7:30यह बवड़़ अबश्शक चल यस्ठानिय प्रतिक गजल के मैठिलिक अपन अबहिन आंग बनाबा में बहुत पैग भूमिका निभववाई तची
- 7:30–7:33यह व्यापकता आची यह स्रव प्रतिक दरी सीमित नहीं चे
- 7:33–7:35अच्छा तो और को ते चे
- 7:35–7:39जखन पोठी में गजलक मुल विषे इश्क वा प्रेम पर चर्चा आबे चे,
- 7:39–7:43तो उते मानविय भावनाक भोगालिक सीमा तुटेत देखा जैत अची.
- 7:43–7:46औहो, आहाका की शारा उही तुलना देस अची नहीं?
- 7:46–7:50आहा, एट हम बाता ब और भीशी रोचक बजाए चे.
- 7:50–7:55इदेखी का आश्चरे होई चे, जे दून्याग दूटा बिलकुल अलक कोना में,
- 7:55–7:59अलक दर्म में प्रेमग गेराई के एकके तरहे सकुना दिखल गेल.
- 7:59–8:06आहा के इशारा इस्लाम में इश्क्के साथस्तर और वैश्नव परमपराग साथस्तर अक तुल्ना दिस अच्छे,
- 8:06–8:08इटूलना अपने आप में बहुत अदबूत अची
- 8:08–8:09इगदा मदबूत अची
- 8:09–8:12इश्क के जे अवद्धारना गजल में आची
- 8:12–8:16उ मात्र लोके क्वा संसारिक प्रेम नहीं आची
- 8:16–8:19दूनू दर्षन में प्रेम के क्रम्मिक विकास के
- 8:19–8:22बहुज शुख्ष्मता से परवभाशित केल गेल आची
- 8:22–8:25जेना पोती में बतायल गेल आची
- 8:25–8:28जी इस्लाम में इश्क के साथ अस्तर आची
- 8:28–8:30पहिल आची हब माने आकरषन
- 8:30–8:32दोसर उनस माने मोहु
- 8:32–8:35अथेसर इश्क माने एक निष्त प्रेम
- 8:35–8:36आअ अकरबाद
- 8:36–9:06अखर बाज चारी मची अकीदत माने इज्ध्ट्वा सम्मान, पाचम इबादत माने पूजा, चटम जुनुन माने पागलपन, असातम, सातम और अन्ती मची पना, माने विलीन भोजायव वमोध, और एकर टीक समानानतर, भारतक महान वैश्नव संथ रूप गो सुमी दोरा ब
- 9:06–9:08बाव और महाभाव
- 9:08–9:09महाभाव
- 9:09–9:10एकर माने की भेल
- 9:10–9:12महाभाव क अर्थ से हो
- 9:12–9:13ये अची
- 9:13–9:15जे प्रेमी प्रेमी का दूनू समरपन कर
- 9:15–9:17एक दूसर में में में लिजा इच्छत्छती
- 9:17–9:19जिना उता पना अची
- 9:19–9:20सूफी वाद
- 9:20–9:21अव वेश्नोवाद
- 9:21–9:23दूनो में प्रेम कर
- 9:23–9:26या दूता दर्शन एक दूसर से कतो मिलल चल
- 9:26–9:29करन एक ता अरब का मलु बूमी से निकलाला चे
- 9:29–9:31आ दूसर भारत तक हर्यर बूमी से
- 9:31–9:34यी एक ता बहुत महत्वपुन प्रष्न ताड कर अचे
- 9:34–9:36यी मात्र संयोग नहीं आची
- 9:36–9:38तो फिर की आचे
- 9:38–9:41अदुसर भारत दक हर्यर भूमी से
- 9:41–9:44ये एक ता बहुत महत्वपन प्रश्न थाड करत चे
- 9:44–9:46ये मात्र सयोग नहीं आची
- 9:46–9:48तो फिर की आचे
- 9:48–9:51अटिहासिक तत्यक विषलेशन करत लेक्खबतबैट चती
- 9:51–9:54जे रुप गुस्वामी सन्यास लेवा सपूर्व
- 9:54–9:59अप्रे तो मतलब वूसें शाहक दर्वार एक ता मेल्टिंग पोट्जा का चल
- 9:59–10:04जत्ते वार्सी सूफिवाद अबहारतीय दर्षनक भीज वेचारिक लेंदेन भाराल चल
- 10:04–10:05बिल्कुल
- 10:05–10:09रूप गो स्वामी जी अस्लामी सूफिवादक जे इश्क का सात्स्तर अच्छे
- 10:09–10:14जत्ते पार्सी सूफिवाद अबहारतिया दर्षनक भीज वेचारिक लेंदेन भरहल चल
- 10:14–10:15बिल्कुल
- 10:15–10:19रूप गो स्वामी जी इस्लामी सूफिवादक जे इश्क का सात स्तर अचे
- 10:19–10:22उक्रा बली भाती बुजगय थे ता
- 10:22–10:25इत इतिहासक एक तक गजब का क्रोसोवर भिल
- 10:25–10:33निश्छित रूपेन, इप्रमानेत करे तची ज़्यान अविचार, कोनो एकता दर्म, वा शेत्र का संपती नहीं होई तची.
- 10:33–10:35एक्दम सही भाजलीय.
- 10:35–10:41कोना फार्सी का ज्यान, वेशनव दर्षन के प्रभाविद के लक, वावक्रा नव शब्द देलक,
- 10:41–10:43इएक दूस्रसे ग्रहन काईल जाई तची
- 10:43–10:46आन नव रूप में प्रस्पूटित होए तची
- 10:46–10:47वाके
- 10:47–10:51तब हावना आप प्रेम के दर्षनिक गेह्राई भुज्लाग बाद
- 10:51–10:54आब हम उही एकस्रे मशीन पर गुरी काई बेजे
- 10:54–10:55मने
- 10:55–10:57उही कथोर व्याक्रन पर
- 10:57–10:57आप
- 10:57–11:00जकर बात हमरा सब शुर्वाते में किने रही
- 11:00–11:02गजलक शरीर रच्ना
- 11:02–11:04वा वास्तू कला
- 11:04–11:05अखिर अच्छे की
- 11:05–11:09गजलक वास्तू कला में सबस मुल एकाई अच्छे शेईर
- 11:09–11:10शेईर
- 11:10–11:11जंगल वाला शेईर नहीं न?
- 11:11–11:12नहीं नहीं
- 11:12–11:15एक्ता शेर में दू पाडी होएत छे
- 11:15–11:20पहल पाती के मिस्रा ए उला, आद दोसर पाती के मिस्रा ए सानी काल जाईत अचे.
- 11:20–11:22आच्छ, दू पातीं कविता बेली.
- 11:22–11:28आप, अन्नियम यह आच्छ, जे एकता शेर में जे विचार वाबात श्रू बेले चे,
- 11:28–11:31उो उही शेरक अन्तिम दरी मुकम्मल भाजावाग चाही.
- 11:45–11:49अगर शेर्क अंतिम पांती में बार-बार एक ही समान अवएत छे
- 11:49–11:53जिना मानिलियो जा हम एक ता पांती लिखी रोहल ची
- 11:53–11:56जाही में अंतिम शव्द छी नहीं जायाब
- 11:56–11:59अगर शेर्क अंत में नहीं जायाब आभी रोहल चे
- 11:59–12:00तो रदीप बेल
- 12:00–12:02अग, एक दम सही
- 12:02–12:06दिवालक इट जका जी, जे आपना जगवसे नहीं गषके तची?
- 12:07–12:08कमाल कैनालोगी आची एख.
- 12:09–12:12गजल का पहल शेर जिक्रा मतला कहे ची,
- 12:12–12:16उकर दूनो पाती में रदीख अ काफिया समान होई तची.
- 12:16–12:18आप मकता करा कहे चे?
- 12:18–12:23अन्तिम शेर जते शायर अपन उपनाम वा तखलूस रख है चातें
- 12:23–12:24उक्रा मक्ता कहल जाईता ची
- 12:24–12:28अच्छा जेना शायर अपन सिएँनेचर कदे लोगोते
- 12:28–12:31मुदा इसबत सादारन बादभेल
- 12:31–12:34असली केल और असली गनी तची काफ्या
- 12:34–12:36यी रदीप से टीक पहने अवेत अची
- 12:36–12:37हा, काफिया
- 12:37–12:40तमानु हम एक दा गजल लिकि रहल ची
- 12:40–12:42हमर एक खाफिया ची पापी
- 12:42–12:43अद दो सर अची कापी
- 12:43–12:45की यी सही आची
- 12:45–12:46हा, यी सही आची
- 12:46–12:47मदा तनी सोचु
- 12:47–12:50जो आहा के एक टा काफिया ची चन
- 12:50–12:52अद दो सर अची जुन
- 13:04–13:08उख्रा से पहिलु को स्वर वावल से हो समान हेवाग चाही
- 13:08–13:09अच्छा
- 13:10–13:13मतलब च्हन में, च्हो कसंग अग कमात्रा ची
- 13:13–13:15च्हो अग नु
- 13:15–13:18अज्चुन में, जो कसंग उखमात्रा ची
- 13:18–13:20जो उ नु
- 13:20–13:21स्वर बदलीगल
- 13:21–13:22बलकुल
- 13:22–13:24इह गनीत अची
- 13:24–13:26जा च्हन अग
- 13:26–13:30जो कसंग उक मात्रा आची, जो उ ना, स्वर बदलीगल.
- 13:30–13:31भलकुल.
- 13:31–13:33इह गनीत आची.
- 13:33–13:38जा च्हन आची, तो उकर संग दन, मन, तन हे बाक चाही.
- 13:38–13:38औह, हो.
- 13:39–13:43जुन, और च्हन का मेल, गजल का व्याक्रन में,
- 13:43–13:45चटाग बर सयो स्विकार या आची.
- 13:45–13:49इई अनुशासन गजल के गजल बनवैं दची
- 13:49–13:50बहाप रे
- 13:50–13:52मुदा के उ ईपूच सकते दची
- 13:52–13:55जे इते कदोर अनुशासन का की गाज
- 13:55–13:58इता कवी के चैन में बांद कर अगजका बेल
- 13:58–14:00रहा, लोग अखसर इज सोचे इट ची
- 14:00–14:02बावना तश्वतन्त्र उडान भरीच्छ,
- 14:03–14:05अक्र श्वर अव्यन्जनक गनित में की एक बान्दब?
- 14:06–14:09की गजल लिखा बेक्ता गनितक सवाल सोल्फ करवजक आच्छे?
- 14:09–14:12इए अनुशासन हिनाई की एक आवश्षक अची?
- 14:12–14:15एकर एक्ता बहुत गजेर मनोविच जानिक कारना ची
- 14:15–14:16की कारन चे हो?
- 14:16–14:19इजे गनितिय सन्रचना आची
- 14:19–14:23एकरे कारने गजल सदीकन लईबद्ध्ध रहात आची
- 14:23–14:24जकन कोनो विचार
- 14:24–14:26एते कसल
- 14:26–14:28आज सदल रूप में कहल जाई तची
- 14:28–14:31तो औश रोता का मन मस्तिष्ट पर
- 14:31–14:33गज़ेर प्रभाव चोड़े तची
- 14:33–14:34एक दम निशानापर
- 14:34–14:34आप
- 14:34–14:37इकोनो बेटर्तीप गद्यन है
- 14:37–14:39बलकी एक ता सदल तीर आची
- 14:39–14:41जिस सीदियान निशानापर लागे तची
- 14:41–14:43आई एह कारनच है
- 14:43–14:46जिग गजल के पदवाख शेली से हो खास हो तची
- 14:46–14:49पोथी में ताहत अतरनूम के चर्चा ची
- 14:49–14:57ताहत मतलब जखन आहा गजल के कवीता जखन लाय में पाट करे ची
- 14:57–15:01आतरनूम मतलब जखन उक्रा गाएक कप्रस्थूत क्याल जायता ची
- 15:01–15:06आमजाएक बात यी जी जी तुनो शेलिक अपन अपन सुन्दरी आची
- 15:06–15:11मुदा जग गजल आपन व्याक्रन माने बहर, काफ्या, रदीप में सही आची
- 15:11–15:12तकि हो इच्छे
- 15:12–15:16तो उ तहत में पडल जाए, वा तरनुम में गावल जाए
- 15:16–15:18उकर लैक कही और नई तूटक
- 15:18–15:21इओही मजबूत वास्तू कलाक परिनाम आची
- 15:21–15:22अदबुत
- 15:22–15:25इजे एते कद्होर गनिती या नियम छी,
- 15:25–15:28इई रातो राती तनाई बनल है ते,
- 15:28–15:29इग कत्ते से आएल.
- 15:30–15:32एकर इतिहास बड पुरान अची.
- 15:32–15:38कारन, मित्लाक आपन लोक गीत वा विद्ध्यापतिक पद्मिता इआरेभी फारसी शेली नहीं चे?
- 15:39–15:42इए आटिहासिक यात्रा पोठी में कुना वरनित अचे?
- 15:43–15:46ए यात्रा कोनो पैग महाकाविय से कम ने आची.
- 15:46–15:54गजलक जन्, इस्लाम से पुर्व अरबक जाहिलियत काल में भेल, जक्रा अंदार युग से हो कहल जाईत छी.
- 15:54–15:56अच्छा अरबसा.
- 15:56–16:05अग, उही समय कसीदा लिख़ा जाएच्छल, जे मुख्य रूप से, अपन कभीलाग प्रष्शन्सा अदो सरक निंदा में होईच्छल.
- 16:16–16:18अखर प्रसंग जोडल नहीं
- 16:18–16:19कुना जोडल है?
- 16:19–16:21अआपन प्रेमिका देलगेल फ्फान
- 16:21–16:24वा अखर उज़ल गर खणदर पर थालवाईक
- 16:24–16:27कानी कप्रेम कर कविता कहल हैनी
- 16:27–16:30आ अगते सं गजलक बावनाक भीज पडल
- 16:30–16:33यी तब बद भाभुक द्रुष्शि अची
- 16:33–16:36अख्राबाद यी आरब कम रूबहुमी से निकल का कत पहुट्टल
- 16:36–16:40अख्राबाद यी इरान मने पारसी पहुटल
- 16:40–16:44जते रूद की सादी अहापिस जहन महान सूफी शायर
- 16:44–16:47एक्रा अद्यात्मिक उचाए दिलने ही
- 16:47–16:50हापिस अगजलत विष्व प्रसिद्ध है
- 16:50–16:51आब भारत को नायली?
- 16:51–16:53फेर यी भारत आवी
- 16:53–16:55आमीर खुस्रो से होएत
- 16:55–16:57मीर आगालेबखात है
- 16:57–16:58उर्दू में सजल
- 16:58–16:59गालेब जहनशायर
- 17:00–17:02गजल के नव उचाई पर पहुषा दिल नहीं
- 17:02–17:05उद वद मितलाक हीर्यन केत दरी इकोना पहुचल?
- 17:05–17:06उनिस सो पाच में
- 17:06–17:08उनिस्वःः पाच में
- 17:08–17:09के अनल नहीं करा
- 17:09–17:12कबिश्वर जीवनजाएक सुंदर सझोग नाटकग माद्ध्यम सा
- 17:12–17:15उ पहल भेर मैठली में गजलक प्रेजोग केलनें
- 17:15–17:19और उही तामसा इं मैठली क माटी में अपन जरजमल
- 17:19–17:21इं इश्काष नकाला बहुत उचे तचे
- 17:21–17:23जे कोनो भी विद्धाक महांता,
- 17:23–17:26उकर अनुकुलन्वा अदाब्टिबिलिती में होएत अचे.
- 17:26–17:27वाखेई,
- 17:27–17:30यात्रा एक ता महां कावेज का आची,
- 17:30–17:34अरब से फारस, फारस से दिल्ली, अदिल्ली से मित्ला.
- 17:34–17:36गजल आपन भाशा बडल्लक,
- 17:36–17:40अर्भी से फार्सी, फिर उर्दू अफिर मैठली,
- 17:40–17:45अपन रूप किचु हत बदल्लक, मुदा अपन आत्मा आमुल व्याक्रन के निचोडलक.
- 17:45–17:47ये कर सब सब है क्विषिष्ता आची.
- 17:47–17:52इह कारन अचे, जे आई जक्ठन क्यो मेठली मे लबनी आ ताडी के संग गजल लिखे तची,
- 17:52–17:57तो उक्रा इन लागे तची, जो अकुनो विदेशी सहीते पडी रहो लगची,
- 17:57–17:59उ मेठली क अपन संपती लागे तची.
- 17:59–18:00एगम सही.
- 18:00–18:04तभाब जखन हमरा सब आपन यी विस्त्रत वेमर्ष समेटी रहल ची
- 18:04–18:09तई इ अस्पष्ट आची जए आशीश अन्चिनार जीक मेठ्ली गजलक व्याकरन औई तिहास
- 18:10–18:12मात्र किचु नियम कानुनक शुष्क पोती ना आची
- 18:13–18:15यी एक ता सांस्क्रतिक सेटु आची
- 18:15–18:16बिल्कोल
- 18:16–18:21इपोति इबतारहल ची जगजलक एक तक कद्फोर
- 18:21–18:24लगबबग गनिति ए वास्तू कला आचे
- 18:24–18:27मुदा उईवास्तू कलाएक भीतर
- 18:27–18:29जे भावना अस्पन्दित होगी तची
- 18:29–18:32उगोनो सीमा में नहीं बान्दल जासके तची
- 18:32–18:35आई हे पोतिक सब सब पएक देन ये है आची
- 18:36–18:39जे यी मेठली गजल के एक ता शास्ट्र प्रदान करे तची
- 18:39–18:41आई, नवका लोक लेली बदका जक्च है
- 18:41–18:47एक दम, यी नवका गजल कार सब के एक ता एक चबच्छ्ट दिशा देखा रहा आची
- 18:47–18:51जे आहा मात्र तुकान्त मिलाके गजल नहीं लिखिसकाई ची
- 18:51–18:54आहा के उकर विग्यान, उकर व्याक्रन भुजगे पडद
- 18:54–18:57हम्रा पूतिक एक तत्ते बहुत जग्जोर लक
- 18:57–19:02मने गजल कषाभिक अर्ठ शव्देन के अनबहवे स्तूनव
- 19:02–19:05वा इस्त्री से प्रेमा लाप करव हूए चे
- 19:05–19:07आँ, ये कर मूल आर्थ है चे
- 19:07–19:10मुदा सद्यक ये टिहासिक यात्रा देखूं
- 19:10–19:13एक ता सद्दारन प्रेमा लाप से स्रूभ है का
- 19:13–19:17ये इश्वर्ये प्रेम, समाजिक विद्रोध
- 19:17–19:19और मानविय सम्वेदना के वेक्त करबाक
- 19:32–19:38अन्तिम उतेजक विचार ये आचे जे आरब्द मरु भूमी सा आईल गजल,
- 19:38–19:45मेठ्लीक, लबनी, ताडी काना, अ सुनराई सा जुडका एतेख जिवन्त आपन बहसाखे दची.
- 19:46–19:49तच्छवाए विशा आची आए कालेक आदूनिक युग में,
- 19:49–19:52हम्रा सब लग आवरहान कोन परमपरिक कला रूप
- 19:52–19:55वा विदेशी विदा जग्रा पुर्न रूपेन
- 19:55–19:59अपन स्थानी रंग रूप देका नव जीवन देल जासके ताची.
- 19:59–20:03ये वास्तव में एक ता बहुत गहीर सोच्वाक विश्या आचे.
- 20:03–20:08जखन कला सीमा तोडे तचे तखन उन्नव इतिहास रचे तचे
- 20:08–20:13शुर्वात मे हम जे कहलू जे बहुनाक दून्या में एकसरे मशीन काजने करे तची
- 20:13–20:16आशीस अंजिनार जी इपोती उक्र गलत साभिद कर दिलेक
- 20:16–20:19गजलक दून्याक एकसरे बिल्कुल सबष्ट आची
- 20:19–20:22उकर हद्दी व्यक्रन्क गनिज्से बनल आची
- 20:22–20:25उकर रक्त मित्लाक माटी सजुडल बहुना आची
- 20:25–20:28इद्गनोस्टिक मदी वाटर्स आप बलकोल साफ आची
Plain text
जे हम कहब जे मैंने बहावना, प्रेम अ तुतल मोन, जक्रा हम्रा सब अक्सर कविता कविता कोहासा में हेरायल माने ची, उक्रो एक्ता अख्ष्रे रिपोट बहुर सके चाहें, तक की इपत्याय बो योग ये आच्छ? उ पत्याएप तकनी मुष्किल चाहें करन साहित्यक दून्या क्या अविषेश का कविता के सादारन तया एक ता मैंने डाएकनोस्टिक मर्टी वाटर्स या अस्पष्त ताक प्रतिक मानर जाएतें आग्दम जद एस सब किष आमुर्त आची तो आप आप द़ाई थे ज़ार हैं। तो आप द़ाई बाश्ट्टाई नियमसे बेसी बहावनाक प्रवाजगे महत्तू देल जाएत आची मुदा तनीक सोचु, हाथ तूटटेच च्याए तो आच्च्च्रे बतादेच ज़े हद्दी कते तूटलगच यह दम श्पष्ट तूटल आच है वह नहीं तूटल आच बलकोल मुदा आई हमरा सब जे करा इविस्त्रित विमर्श वागण अद्द्धियन कर जारहल ची उ मने उही बहावनाक एकसरे मशीन आच है बापरे तब इए एकसरे मशीन अखिर अची की इआची आशीश अनशिनार तोर लिक्छत पोठी मेठली गजलक व्याक्रन अव इतिहास इपोठी इब्रहम पून रुपन तोड़ देटची जगजल बस किछ सुन्दर शबदक जोड़ वप प्रेम गीटच औह, मने गजल सर्फ प्रेम गीट नहीं आची नहीं, एक दम नहीं इस पष्ट करे तची के गजल एक ता कठोर गनितिये, आव्याक्रनिक संद्रचनाज आई विमर्ष हमरा सब के इदिक हवत, जे कोना एक ता विदेशी काभ्यविदा मितलाक माटी में रच्भसी गल आई आई बहत महत्वोण आची दिकू, ग्यान उही समय, सब से भेसी मुल्यवान होई तची, जखन उक्रा भुजल आ लागु कल जाए. से तचाय? इपोठी गजल कोही जटिलता के, उकर इतिहास के, आवकर कत्होर व्याक्रन के, बहुत सुगमता सा हम्रा सब के समक्ष रख ही तची. मुता, एक ता बाज जे पोथी खोलताई सब से पहले द्याना कर्षिट करे तची, औह आची लेक्खक तेवर. तेवर? माने कोहन देवर? मैंने सदारना काद्मिक पोथी बहुत विनम्र होई तची ना, हमर चोट सन प्रयास अची वला बहु, मुदा अचिनार जीक स्रूवात एक दम सक्थ चेतावनी से होई तची अच्छा, की लिख़े च्छती हूँ? उस पष्ट लिखच्छती, जे जे बिना पडे तरक्वितर करे च्छती या जे जात, दर्म, औम्र, वा पद देक कर बात माने च्छती तिनकालेल इपोति नहीं आची बापरे, इतो बड़ा ख्रामक शुर्वात भेल इदा, मुदद तनी सुचु कि इथोरेक भीसी आहंकार पूरन न नहीं लागी रहल चे कोनो नावका लेखख, वरष्लोकनिक के एना सीधही नकारी देई इत यत सहिट्ते में राजनिती जगा भेल, एकर अखेर अर्ठा की भेल? उप्रत्हम द्रिष्ट्या यहां के अहंकार लागी सकेता ची, मुदे एकर पाच्चा एक देब बाएक पीला असंगर्ष छट्ई. पीडा, के हन पीडा? मैंने, लेक्हक बहुत निदरता सां साहित्यक दून्याक एक तक कतू सत्यके तूजागर कर रहल चती. औव आची गजल कार सबक भीचक भावनात्मक ब्लाक्मेलिं. है, बावनात्मक भ्लाक्मेलिं साहित्त में यी तो कुत्रिलर सिन्माजका भेल. अ, सुनी में आजीब लगए चे. एक रा तनी विस्तार ससमजाओ, जे इग कुना काज करे तचे. मिने कविता लिखहावाक लिल के कख्रा ब्लाक्मेल कर रहल चे. देखो, जक हन कोनो विदान नुका नुका आवी रहल हुए तची, वा उकर व्याक्रन तई बहरल हुए तची तक किचु अस्थापित ववरष्ट लोक उक्रा अपन हिसाप समोड़ चाहे चथी आच्छा माने अपन वर्च्छवा दिखावा चाहे चथी बलकुल अन छिनार जी बतभैच्चतीन जे किचु लोक कहिचला जे जगजलक व्याक्रन में हुनका छूट नहीं देलगेल वा हुनक गलत व्याक्रन के मानी नहीं लेलगेल ता उगजल लिखव चूड देता औह लो माने हमर बात मानु ने ता हम खेलगे न करोव वलागव इक दम सहीं पकल लोगु अगर बद्दालोक लिखिरहल चतिन काले पचास्ता लिख्ता अहो तम अगर विक्तिसे पएग विद्चा ची आए एह कारना ची जो पोत्फी में गजल काल कहन्ड का बाद्टिच चतिन अगर एक दम पोत्फी में जिक दर्गाए चाछा ची अई दूटा लोक लिखिरहल चतिन, काले पचास्ता लिखता अहो, तम अब व्यक्तिसे पएग विदा ची आई हे कारन ची जो पोठी में गजल काल कहन्द का बाटेई चतिन अआ, एक दम पोठी में जिक्र ची जे 1905-2007 दरी जीवन युग जे कविष्वर जीवनजाक नाम पर आची और 2008 अ अईचिनहार युग एक दम सही इग युग विबाजन बद महत्व पूँच आई इदेखा रहा लगची जे गज़ल कोना एक ता नव रुप लओ रहा लगची जीवन जा मेठलिक पहिल गजल कार मनल जैच छतिना आँ मोदा, 2008 का बाद जे अंचिनार युग आची उ मेठलिग गजल के उर्दूव लहिन्दी का चाहूर सां निकाल क, उक्रा पोड रुपेंड मेठलिक कष्वतन्त्र अन्यम बद्ध विद्धा करुप में स्थापित करवा क्रान्ती आचे कमाल चे और इक क्रान्ती कोना भारहल चे उकर तरीका हमरा बहुत रुमाचित के लग कोना? की निक लागल हैं के? मैंने गजल, मुल, रुप सा, अरभी, और फारसिक माटी सा आए लग चे उकर आपन प्रतिक वा सिम्बल्स आफी, जेना सराव, सुराही, साकी. मुदा अचिनार जीजे मेठली करन केली हैंच उ कमाल आचे. आप, उ थेट मेठली में परिनत कदेल निएक्रा. इत जिना कोनो विदेशी पक्वान के आपन गाँँ का मसाला देका बनाएपजे का भाल एक दम सती के आनालजी अची जा हमरा सभे एक रा पेग परिप्रेक्ष सनजोडी तई अनुवादक का एक ता उत्क्रिष्टूडारन आची बाशा का अनुवाद मात्र शब्दक नहीं होई चे तफिर कखर होई चे ओ अनुवाद संसक्रतिक होई टची इक दम पोठी मेजना मैं माने शराब के लेल ताली शब्द का सुजाओ दिल गे ले ची ताली बद्च्थानिये शब्द चे आ, मीना वा सुराही जगजल मे भूध प्रेवोग हुए चे वोक्रा मेतली मे डाबा, कथिया वा लबनी कावाग बाद बहल अचे और साकी कलेल साकी जे शराब परसेवाला होई तचे वोक्रा लिल पासी भाई बाप्रे यी ता एक द्वाँवोक द्रिष्छ बनिगल आम मैखाना बनिगल ताडी काना वा पस काना देखू जखन के हो मीना वा मैखाना पडेतचे ता एक ता मैखल पाटख कमान में उचित्र बोथ पराया लगेत चे आँ, कनेत नहीं भापाबी चे मुदा लबनी आ ताडी काना कहतें, उसीदा मित्ला के गाँक गाची, औते का परवेर से जुड़जाएतची. गजलक बावना सीदे पाथक का माटी सन जुडजाएतचे. मने इग गजलक आतमाक छेट मेत्ली करना चे. बिल्ल्कुल. मुदा सबस्वेशी जाम्रा सोच्वापर मजबूरके लग औग रूस्न कपरी भाशा चाल औग रूस्न, माने बूटी, ना? आम तोर पर गजल में रूस्न सुनके कोनो सुन्दर स्ट्रीक कल्पना मोन में होईता चे रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रहा, रह यह बवड़़ अबश्शक चल यस्ठानिय प्रतिक गजल के मैठिलिक अपन अबहिन आंग बनाबा में बहुत पैग भूमिका निभववाई तची यह व्यापकता आची यह स्रव प्रतिक दरी सीमित नहीं चे अच्छा तो और को ते चे जखन पोठी में गजलक मुल विषे इश्क वा प्रेम पर चर्चा आबे चे, तो उते मानविय भावनाक भोगालिक सीमा तुटेत देखा जैत अची. औहो, आहाका की शारा उही तुलना देस अची नहीं? आहा, एट हम बाता ब और भीशी रोचक बजाए चे. इदेखी का आश्चरे होई चे, जे दून्याग दूटा बिलकुल अलक कोना में, अलक दर्म में प्रेमग गेराई के एकके तरहे सकुना दिखल गेल. आहा के इशारा इस्लाम में इश्क्के साथस्तर और वैश्नव परमपराग साथस्तर अक तुल्ना दिस अच्छे, इटूलना अपने आप में बहुत अदबूत अची इगदा मदबूत अची इश्क के जे अवद्धारना गजल में आची उ मात्र लोके क्वा संसारिक प्रेम नहीं आची दूनू दर्षन में प्रेम के क्रम्मिक विकास के बहुज शुख्ष्मता से परवभाशित केल गेल आची जेना पोती में बतायल गेल आची जी इस्लाम में इश्क के साथ अस्तर आची पहिल आची हब माने आकरषन दोसर उनस माने मोहु अथेसर इश्क माने एक निष्त प्रेम आअ अकरबाद अखर बाज चारी मची अकीदत माने इज्ध्ट्वा सम्मान, पाचम इबादत माने पूजा, चटम जुनुन माने पागलपन, असातम, सातम और अन्ती मची पना, माने विलीन भोजायव वमोध, और एकर टीक समानानतर, भारतक महान वैश्नव संथ रूप गो सुमी दोरा ब बाव और महाभाव महाभाव एकर माने की भेल महाभाव क अर्थ से हो ये अची जे प्रेमी प्रेमी का दूनू समरपन कर एक दूसर में में में लिजा इच्छत्छती जिना उता पना अची सूफी वाद अव वेश्नोवाद दूनो में प्रेम कर या दूता दर्शन एक दूसर से कतो मिलल चल करन एक ता अरब का मलु बूमी से निकलाला चे आ दूसर भारत तक हर्यर बूमी से यी एक ता बहुत महत्वपुन प्रष्न ताड कर अचे यी मात्र संयोग नहीं आची तो फिर की आचे अदुसर भारत दक हर्यर भूमी से ये एक ता बहुत महत्वपन प्रश्न थाड करत चे ये मात्र सयोग नहीं आची तो फिर की आचे अटिहासिक तत्यक विषलेशन करत लेक्खबतबैट चती जे रुप गुस्वामी सन्यास लेवा सपूर्व अप्रे तो मतलब वूसें शाहक दर्वार एक ता मेल्टिंग पोट्जा का चल जत्ते वार्सी सूफिवाद अबहारतीय दर्षनक भीज वेचारिक लेंदेन भाराल चल बिल्कुल रूप गो स्वामी जी अस्लामी सूफिवादक जे इश्क का सात्स्तर अच्छे जत्ते पार्सी सूफिवाद अबहारतिया दर्षनक भीज वेचारिक लेंदेन भरहल चल बिल्कुल रूप गो स्वामी जी इस्लामी सूफिवादक जे इश्क का सात स्तर अचे उक्रा बली भाती बुजगय थे ता इत इतिहासक एक तक गजब का क्रोसोवर भिल निश्छित रूपेन, इप्रमानेत करे तची ज़्यान अविचार, कोनो एकता दर्म, वा शेत्र का संपती नहीं होई तची. एक्दम सही भाजलीय. कोना फार्सी का ज्यान, वेशनव दर्षन के प्रभाविद के लक, वावक्रा नव शब्द देलक, इएक दूस्रसे ग्रहन काईल जाई तची आन नव रूप में प्रस्पूटित होए तची वाके तब हावना आप प्रेम के दर्षनिक गेह्राई भुज्लाग बाद आब हम उही एकस्रे मशीन पर गुरी काई बेजे मने उही कथोर व्याक्रन पर आप जकर बात हमरा सब शुर्वाते में किने रही गजलक शरीर रच्ना वा वास्तू कला अखिर अच्छे की गजलक वास्तू कला में सबस मुल एकाई अच्छे शेईर शेईर जंगल वाला शेईर नहीं न? नहीं नहीं एक्ता शेर में दू पाडी होएत छे पहल पाती के मिस्रा ए उला, आद दोसर पाती के मिस्रा ए सानी काल जाईत अचे. आच्छ, दू पातीं कविता बेली. आप, अन्नियम यह आच्छ, जे एकता शेर में जे विचार वाबात श्रू बेले चे, उो उही शेरक अन्तिम दरी मुकम्मल भाजावाग चाही. अगर शेर्क अंतिम पांती में बार-बार एक ही समान अवएत छे जिना मानिलियो जा हम एक ता पांती लिखी रोहल ची जाही में अंतिम शव्द छी नहीं जायाब अगर शेर्क अंत में नहीं जायाब आभी रोहल चे तो रदीप बेल अग, एक दम सही दिवालक इट जका जी, जे आपना जगवसे नहीं गषके तची? कमाल कैनालोगी आची एख. गजल का पहल शेर जिक्रा मतला कहे ची, उकर दूनो पाती में रदीख अ काफिया समान होई तची. आप मकता करा कहे चे? अन्तिम शेर जते शायर अपन उपनाम वा तखलूस रख है चातें उक्रा मक्ता कहल जाईता ची अच्छा जेना शायर अपन सिएँनेचर कदे लोगोते मुदा इसबत सादारन बादभेल असली केल और असली गनी तची काफ्या यी रदीप से टीक पहने अवेत अची हा, काफिया तमानु हम एक दा गजल लिकि रहल ची हमर एक खाफिया ची पापी अद दो सर अची कापी की यी सही आची हा, यी सही आची मदा तनी सोचु जो आहा के एक टा काफिया ची चन अद दो सर अची जुन उख्रा से पहिलु को स्वर वावल से हो समान हेवाग चाही अच्छा मतलब च्हन में, च्हो कसंग अग कमात्रा ची च्हो अग नु अज्चुन में, जो कसंग उखमात्रा ची जो उ नु स्वर बदलीगल बलकुल इह गनीत अची जा च्हन अग जो कसंग उक मात्रा आची, जो उ ना, स्वर बदलीगल. भलकुल. इह गनीत आची. जा च्हन आची, तो उकर संग दन, मन, तन हे बाक चाही. औह, हो. जुन, और च्हन का मेल, गजल का व्याक्रन में, चटाग बर सयो स्विकार या आची. इई अनुशासन गजल के गजल बनवैं दची बहाप रे मुदा के उ ईपूच सकते दची जे इते कदोर अनुशासन का की गाज इता कवी के चैन में बांद कर अगजका बेल रहा, लोग अखसर इज सोचे इट ची बावना तश्वतन्त्र उडान भरीच्छ, अक्र श्वर अव्यन्जनक गनित में की एक बान्दब? की गजल लिखा बेक्ता गनितक सवाल सोल्फ करवजक आच्छे? इए अनुशासन हिनाई की एक आवश्षक अची? एकर एक्ता बहुत गजेर मनोविच जानिक कारना ची की कारन चे हो? इजे गनितिय सन्रचना आची एकरे कारने गजल सदीकन लईबद्ध्ध रहात आची जकन कोनो विचार एते कसल आज सदल रूप में कहल जाई तची तो औश रोता का मन मस्तिष्ट पर गज़ेर प्रभाव चोड़े तची एक दम निशानापर आप इकोनो बेटर्तीप गद्यन है बलकी एक ता सदल तीर आची जिस सीदियान निशानापर लागे तची आई एह कारनच है जिग गजल के पदवाख शेली से हो खास हो तची पोथी में ताहत अतरनूम के चर्चा ची ताहत मतलब जखन आहा गजल के कवीता जखन लाय में पाट करे ची आतरनूम मतलब जखन उक्रा गाएक कप्रस्थूत क्याल जायता ची आमजाएक बात यी जी जी तुनो शेलिक अपन अपन सुन्दरी आची मुदा जग गजल आपन व्याक्रन माने बहर, काफ्या, रदीप में सही आची तकि हो इच्छे तो उ तहत में पडल जाए, वा तरनुम में गावल जाए उकर लैक कही और नई तूटक इओही मजबूत वास्तू कलाक परिनाम आची अदबुत इजे एते कद्होर गनिती या नियम छी, इई रातो राती तनाई बनल है ते, इग कत्ते से आएल. एकर इतिहास बड पुरान अची. कारन, मित्लाक आपन लोक गीत वा विद्ध्यापतिक पद्मिता इआरेभी फारसी शेली नहीं चे? इए आटिहासिक यात्रा पोठी में कुना वरनित अचे? ए यात्रा कोनो पैग महाकाविय से कम ने आची. गजलक जन्, इस्लाम से पुर्व अरबक जाहिलियत काल में भेल, जक्रा अंदार युग से हो कहल जाईत छी. अच्छा अरबसा. अग, उही समय कसीदा लिख़ा जाएच्छल, जे मुख्य रूप से, अपन कभीलाग प्रष्शन्सा अदो सरक निंदा में होईच्छल. अखर प्रसंग जोडल नहीं कुना जोडल है? अआपन प्रेमिका देलगेल फ्फान वा अखर उज़ल गर खणदर पर थालवाईक कानी कप्रेम कर कविता कहल हैनी आ अगते सं गजलक बावनाक भीज पडल यी तब बद भाभुक द्रुष्शि अची अख्राबाद यी आरब कम रूबहुमी से निकल का कत पहुट्टल अख्राबाद यी इरान मने पारसी पहुटल जते रूद की सादी अहापिस जहन महान सूफी शायर एक्रा अद्यात्मिक उचाए दिलने ही हापिस अगजलत विष्व प्रसिद्ध है आब भारत को नायली? फेर यी भारत आवी आमीर खुस्रो से होएत मीर आगालेबखात है उर्दू में सजल गालेब जहनशायर गजल के नव उचाई पर पहुषा दिल नहीं उद वद मितलाक हीर्यन केत दरी इकोना पहुचल? उनिस सो पाच में उनिस्वःः पाच में के अनल नहीं करा कबिश्वर जीवनजाएक सुंदर सझोग नाटकग माद्ध्यम सा उ पहल भेर मैठली में गजलक प्रेजोग केलनें और उही तामसा इं मैठली क माटी में अपन जरजमल इं इश्काष नकाला बहुत उचे तचे जे कोनो भी विद्धाक महांता, उकर अनुकुलन्वा अदाब्टिबिलिती में होएत अचे. वाखेई, यात्रा एक ता महां कावेज का आची, अरब से फारस, फारस से दिल्ली, अदिल्ली से मित्ला. गजल आपन भाशा बडल्लक, अर्भी से फार्सी, फिर उर्दू अफिर मैठली, अपन रूप किचु हत बदल्लक, मुदा अपन आत्मा आमुल व्याक्रन के निचोडलक. ये कर सब सब है क्विषिष्ता आची. इह कारन अचे, जे आई जक्ठन क्यो मेठली मे लबनी आ ताडी के संग गजल लिखे तची, तो उक्रा इन लागे तची, जो अकुनो विदेशी सहीते पडी रहो लगची, उ मेठली क अपन संपती लागे तची. एगम सही. तभाब जखन हमरा सब आपन यी विस्त्रत वेमर्ष समेटी रहल ची तई इ अस्पष्ट आची जए आशीश अन्चिनार जीक मेठ्ली गजलक व्याकरन औई तिहास मात्र किचु नियम कानुनक शुष्क पोती ना आची यी एक ता सांस्क्रतिक सेटु आची बिल्कोल इपोति इबतारहल ची जगजलक एक तक कद्फोर लगबबग गनिति ए वास्तू कला आचे मुदा उईवास्तू कलाएक भीतर जे भावना अस्पन्दित होगी तची उगोनो सीमा में नहीं बान्दल जासके तची आई हे पोतिक सब सब पएक देन ये है आची जे यी मेठली गजल के एक ता शास्ट्र प्रदान करे तची आई, नवका लोक लेली बदका जक्च है एक दम, यी नवका गजल कार सब के एक ता एक चबच्छ्ट दिशा देखा रहा आची जे आहा मात्र तुकान्त मिलाके गजल नहीं लिखिसकाई ची आहा के उकर विग्यान, उकर व्याक्रन भुजगे पडद हम्रा पूतिक एक तत्ते बहुत जग्जोर लक मने गजल कषाभिक अर्ठ शव्देन के अनबहवे स्तूनव वा इस्त्री से प्रेमा लाप करव हूए चे आँ, ये कर मूल आर्थ है चे मुदा सद्यक ये टिहासिक यात्रा देखूं एक ता सद्दारन प्रेमा लाप से स्रूभ है का ये इश्वर्ये प्रेम, समाजिक विद्रोध और मानविय सम्वेदना के वेक्त करबाक अन्तिम उतेजक विचार ये आचे जे आरब्द मरु भूमी सा आईल गजल, मेठ्लीक, लबनी, ताडी काना, अ सुनराई सा जुडका एतेख जिवन्त आपन बहसाखे दची. तच्छवाए विशा आची आए कालेक आदूनिक युग में, हम्रा सब लग आवरहान कोन परमपरिक कला रूप वा विदेशी विदा जग्रा पुर्न रूपेन अपन स्थानी रंग रूप देका नव जीवन देल जासके ताची. ये वास्तव में एक ता बहुत गहीर सोच्वाक विश्या आचे. जखन कला सीमा तोडे तचे तखन उन्नव इतिहास रचे तचे शुर्वात मे हम जे कहलू जे बहुनाक दून्या में एकसरे मशीन काजने करे तची आशीस अंजिनार जी इपोती उक्र गलत साभिद कर दिलेक गजलक दून्याक एकसरे बिल्कुल सबष्ट आची उकर हद्दी व्यक्रन्क गनिज्से बनल आची उकर रक्त मित्लाक माटी सजुडल बहुना आची इद्गनोस्टिक मदी वाटर्स आप बलकोल साफ आची