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मैथिली_साहित्य_का_समानांतर_इतिहास.m4a
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- 0:00–0:02जब हम किसी यह तिहासिक एमारत को देखते हैं,
- 0:02–0:05तो हमारी नजर सब से पहले कहाजाती हैं.
- 0:05–0:07सब हविख है कि उसके बवे गुमबद पर,
- 0:07–0:10या उन चिकनी सतो हो पर,
- 0:10–0:11जो दूर से ही चमकती हैं.
- 0:11–0:13भिलकुर.
- 0:13–0:14हमें लखता है कि मतलब,
- 0:14–0:16यही उ स्वास्तुकला की पूरी सच्चाई है
- 0:16–0:18सब कुछ एक दं स्पष्ट और सुन्दर
- 0:19–0:20देबेट में आप का स्वागत है
- 0:20–0:22आज हम गजेंदर ताकृर की किताब
- 0:23–0:24अप पारलल लिए फिस्ट्री अप मित्छीला
- 0:24–0:26अन मैत्ली लिट्रिचर की नजरये से
- 0:26–0:30ये बवड़ी बुनियादी और जटल सवाल पर च़चा करने वाले है
- 0:30–0:32और वो सवाल वाखई बहड गेहरा है
- 0:32–0:37बलकुल, सवाल ये है कि मेतली साहित्रि का असली इतिहास अखर बस्ता कहा है
- 0:37–0:41क्या इसका वास्तविक स्वरूप उस मुख्यदारा के शास्त्रिये इतिहास में है,
- 0:41–0:45जिसे ब्रम्हवादी परम्पराव, दर्बारों,
- 0:45–0:48और सहित्य अकाद्मी जैसी आदूनिक संस्तावने ग़ा है,
- 0:48–1:18मैं इस चर्चा में इस शास्त्रिया और संस्तागत इतिहास का पक्ष्ष्ष्वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 1:18–1:21आम हाशेए पर दखेल देगे दलत विमर्ष्छ में
- 1:21–1:25और निपाल और असम में फैले इसके प्रवासी साइत्ते में द़गते हैं
- 1:25–1:29और यही से हमारे भीच एक सपष्ट वेचारिक वेचारिक विभाजन रेखा किचती है
- 1:29–1:31मेरा रुक बहुत साव फैं
- 1:31–1:43मैं मानता हूं कि किसी भी भाशा को महस एक बोली या डालेक्त के सटर से उठाकर उसे सद्धियों तक जीवित रक्ने के लिए एक बहुत फीज्द्द्रद संस्तागर दाचे की आवशकता होती है.
- 1:43–1:45लेकिन क्या वो दाचा दमन कारी नहीं था?
- 1:45–1:49अप उसे शास्त्रिये या ब्रामवादी कहे सकती हैं.
- 1:49–1:53लिकिन इसी कठोर दाचे ने मेठली को नश्त होने से बचाया.
- 1:53–1:56जोर्ज ग्रीर्सन दूरा की आगया इसका मानकी करन,
- 1:56–2:01चंदा जाका इसे नया व्याकरन देना और मतलप सहिती अकाटमी के प्रयास.
- 2:01–2:08ये वो स्तम लेए जिनों अंतताः भार्तिः समविदान की आप्वी अनुसुची में मेतली को मानेता लेए.
- 2:08–2:13मैं इस पूरे परिद्रुष्य को भिलकुल एक दुस्रे नजर्ये से देकती हूँ.
- 2:13–2:14बताएए.
- 2:14–2:18अब जिस कठोर तनी या संस्त्थगत एतिहास की वकालत कर रहे हैं ना
- 2:19–2:22स्रोथ सामुडरी उसे एक सुखावा मुख्ये नाला कहती है.
- 2:23–2:25औरे सुखावा नाला ये तो बहुत सक्त टिपनी है.
- 2:26–2:27पर ये बहुत सती कुप्मा है.
- 2:27–2:31इस मुखेदारा के दानचे ने बाशा को संगरक्षित कम किया है
- 2:31–2:36बलकी उसे खास संब्रान्त वर्ग की जागीर बनाकर जीादा रक्तिया है
- 2:36–2:41अगर हमें में में डर्बारों से बहार आना होगा
- 2:41–2:43तो आपके ही साप से वो उदगम कहा है?
- 2:43–2:47इसके ज़े आत्वी से बार्वी सदी के उन बोध सिद्धों में हैं,
- 2:47–2:51जैसे सरहपा और कानहपा, जिनोंने चर्या पद्रचे,
- 2:51–2:54उनोंने जिस संद्या बाशा का अस्तमाल किया,
- 2:54–2:57वो कोई देव बाशा नहीं ती.
- 2:57–3:04उआम जन की बाशा थी, जू निछले तबके के लोगो से सीदे समवाद करती थी,
- 3:04–3:08लेकिन इस संस्त्था गत इतिहास ने मतलब लोक विमर्ष को ही काड दिया.
- 3:08–3:13यिस सन्रक्षन नहीं बलकी एक व्यवस्तित बाशाई दमन है.
- 3:13–3:19दिके बोद्ध सिद्दों की संद्धाबाशा का इतिहासिक महत्व है, इसे मैं इंकार नहीं कर रहा हूं,
- 3:19–3:23लिकिन संद्धाबाशा अपने बेहत गुड और प्रतिकात्मक ती,
- 3:23–3:28उसे हम सीधे तोर पर आज की मेठिली का पुरन विखसित रुप तो नहीं मान सकते ना?
- 3:28–3:29पर वो शुरुवात तो थी?
- 3:29–3:35आप, लेकिन अगर न इतिहास की ज़ों और भाशा के सबसे बड़े प्रतीक की ही बात कर रहे है,
- 3:35–3:37तो हम विद्यापती को कैसे नजर अंदास कर सकते हैं.
- 3:37–3:42मेठली साहित्ते की पहचान तो विद्यापती के देसल भयाना से ही स्थापत होती है ना
- 3:42–3:44जो राजा शिव्सिंक के दरबारी थे
- 3:44–3:50रुके, यही पर समानान्तर इतिहास का सबसे बड़ा और शाएथ सबसे च्वंकाने वाला
- 3:50–3:52रच्तक्षेप सामने आता है
- 3:52–3:54अम जिस विद्यापती को आज पुछते है,
- 3:54–3:56मुख्यदारा के इतिहास कारोंने,
- 3:56–4:01उनके इर्द गिर्द एक बहुड बडा इतिहासक ब्रम पैडा किया है.
- 4:01–4:02ब्रम कैसा ब्रम?
- 4:02–4:05संस्तागत इतिहास ने बहुत ही चालाकी से,
- 4:05–4:09तो गलक-लक पहचानों को आपस में मिला दिया है
- 4:09–4:12तो गलक पहचान? आपका मतलब है कि विद्ध्यापती यह वेकती नहीं ते?
- 4:12–4:17बलकल नहीं, स्रोथ सामगरी इस बात को बहुत प्रमुखता से उठाती है
- 4:17–4:20एक तरव ते दरबारी विद्वान विद्ध्यापती ताकुल
- 4:20–4:26जो एक समभ्रान्त परिवेश में ते, जे नोने संस्क्रित और अवहत में पुरुश परीक्षा जैसी रचनाय लिखी.
- 4:26–4:28आप जो एतिहासिक रूप से दरज है?
- 4:28–4:34सही कहा, और दूस्री तरव एक समानान्तर एतिहास है, जो एक दूस्रे विद्ध्यापती की बात करता है.
- 4:34–4:39वो लोक कवी जिसने वास्टव में वो पदावली रची जो आम लोगो के दिलो में बस कैई.
- 4:40–4:43इस दुस्रे विध्ध्यापती की जाती तक एतिहासिक रुप से अनिष्चित है.
- 4:44–4:47आचा तो आप पनकलाल मंडल के उसे सिद्दान्त की बात कर रही है.
- 4:47–4:57बिलकुल, पनक्लाल मंडल ने जिस सबाल्टन विद्ध्यापती का चित्रोकेरा है, वो इसी आम जन के कवी का प्रतिनिदिद्व करता है.
- 4:57–5:01लेकिन इन ब्रहम्मडवादी इतिहास कारोने क्या क्या?
- 5:01–5:07उनो ने इस आम जन के कवी के रच्नाउ को उस दरबारी विद्यापती के नाम पर मड़ दिया.
- 5:07–5:10ताकि उसे एक दाचे में फिट किया जासके.
- 5:10–5:19आााा, ताकी लोग संस्क्रती के इस सब से बड़े प्रतीक को एक विषुद्धश्यव और सवरन दाचे के भीतर कैद किया जा सके.
- 5:20–5:26निचले तबके के लोग अपनी ही कवीपर दावा ना कर सकें इस के लिए वैचारिक अपहरन किया गया.
- 5:26–5:35ये एक बहुत एक क्रान्तिकारी दावा है, लेकिन देके अगर हम इसे अटिहासे क्यदार्त की कसोती पर कसे, तो मुझे इस में कुछ खाम्या नजर आती है.
- 5:35–5:36वो कैसे?
- 5:36–5:40अगन लीजे कि तोडी देर के लिए हम इस दो विद्ध्यपती वाले सिद्धान्त को सबकार लेएएएएए.
- 5:40–5:43एक जो शास्त्री एखा और एक जो लोग कवी ता.
- 5:43–5:48लेकिन मेरे सवाल यह एक कि राजा श्व्सिंग के उस दरबारी सन्रक्षन के बिना
- 5:48–6:18अग, तो तो तो बग़ागा बगादा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़
- 6:18–6:21गलोब थीआटर जैसा हिक दाचा ता, और बाद में,
- 6:21–6:24अकाटमिक संस्ताऊने उनके फोलियो को सन्रक्षिट किया?
- 6:24–6:28क्या विद्ध्यापती की कलाग को पुरे पूरवी भारत में फैलाने के लिए,
- 6:28–6:31उस दरबारी दाचे का हुना निवारे नहीं था?
- 6:31–6:34उगर शेक्सपीर का उदारन सुन्ने में भगत तारकिक लकता है.
- 6:34–6:40लेकिन ये उस दमन की यान्त्रिकी को नहीं समजाता जो यहां काम कर रही थी.
- 6:40–6:42दमन की यान्त्रिकी?
- 6:42–6:46प्रच्पीर के नाटकों को अकादमियों ने उनके मूल रूप में सहेजा.
- 6:46–6:50अप लोरी का सलहेस और दीना भद्री जैसे महाखावियों को देखिये।
- 6:50–6:52अग, वो मोखिक परमपरा का हिसा है।
- 6:52–6:56अप लोरी का सलहेस और दीना भद्री जैसे महाखावियों को देखिये
- 6:56–6:58अग, वो मोखिक परमप्रा काहिसा है
- 6:58–7:00और ये आज भी जीविध हैं
- 7:00–7:04कैसे? ये किसी राजा के अभिलेक्हागार में नहीं सहेजे गया
- 7:04–7:06अप बच्टे कैसे
- 7:06–7:09उ किसी दर्बार्या कागस की मुधाजी नहीं करता
- 7:09–7:11आप लोरी का सलहेस
- 7:11–7:14और दीना भद्री जैसे महाखावियों को देखिये
- 7:14–7:16आप वो मोखिक परमप्रा का हिसा है
- 7:16–7:18और ये आज भी जीवित हैं
- 7:18–7:22कैसे? ये किसी राजा के अभिलेक्हागार में नहीं सहेजे गय?
- 7:22–7:29ये दलितों मुसहरों और यादों की सामोहिक मोखिक सम्रती में पीडिदर पीडि प्रवाहित होते रहे
- 7:29–7:36यही बाशा के अस्ली दधगन है, जिसे आपके उस कथोर तने ने कभी अपनी शाक्धा नहीं माना
- 7:36–7:39मैं मोखिक सम्रती की शकती को पुरी तरह सविकार करता हों
- 7:39–7:43लिकिन देकिए जब भाशागों के भीच अस्तित्व का संगर शुरू होता है
- 7:43–7:46तब लडाई सर्फ मोक्धिक स्म्रित्ती के सहारे नहीं जीती जासकती
- 7:46–7:49आपका इशारा मान की करन की तरव है?
- 7:49–7:49बिलकुल
- 7:49–7:52बीस्वी सदी की शुवात का समय याद की जीए
- 7:52–7:59इक बड़ा राजनीतिक प्रयास चल रहा था, ये सावित करने का, की मैठली महेज हिंदी की एक विक्रुत बोली है.
- 7:59–8:04अगर उस समें जयाकान्त मिष्र और रमानाद जाए से विद्वान आगे नहीं आते,
- 8:04–8:08तो ये बाशा हिंदी के विशाल समवद्र में विलीन हो चुकी होती
- 8:08–8:11मैं मानती हो, कि उनका योगदान ता, लेकिन
- 8:11–8:17और अगर हम थोडा और पीछे जाएं, तो आपने एक दमनकारी विवस्ता की बात की थी
- 8:17–8:20अकसर पनजी प्रबंद को इसी नजरये से देखा जाता है
- 8:20–8:25वह तो बज़ागा बज़ागा दश्टावेजी करन ता जब बाहरी आक्रमड हो रहे थे,
- 8:25–8:29तब इस पनजी प्रबंदने मेठिल समाज को बिखरने से रोका.
- 8:29–8:36मुझे ये कहना पडेगा कि ये पनजी प्रबंद का एक बहुत ही सुविदाजनक और रोमानी विष्लेशन है.
- 8:50–9:20अगर बाद़ान बाद़ा दो बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान
- 9:20–9:28उदारन लीजे वे नव्यनयाई दर्षन के इतने महान दार्षनिक थे कि उनका दंका पूरे भारत में बच्टा था
- 9:28–9:32लेकिन इस महान संस्थागत इतिहास ने उनके रेकोट की सात क्या किया
- 9:32–9:35उनकी जानकारी दूश़ पंजी में डाल दी गयी
- 9:35–10:05उआँ ख़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ�
- 10:05–10:35अगर बाद्यान बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा
- 10:35–10:39उसी इसाहित त्याकाद्मीने उने पूरसकार के योगे नहीं माना
- 10:40–10:41अग, उननीसो सरसच्ट्ट का वो विवाद
- 10:42–10:42बलकुल
- 10:43–10:46उननीसो सरसच्ट्ट मे तो अकाद्मीने ये तेखिया
- 10:46–10:49कि उस वर्ष किसी को भी पूरसकार नदेना बहतर है
- 10:49–10:53बजगाय इसके कि वो पुरसकार हरी मोहन जागो दिया जाए
- 10:53–10:57किंकि वे उस संस्तागड धाचे को असहेज कर रहे थे
- 10:57–10:59वो एक अटिहासिक बूल फी फी मैं वानता हूं
- 10:59–11:02और अगर आप को लकता है, कि ये सर्फ पुरानी बात है
- 11:02–11:07तो 2011 से 2014 के भीच अर्टीःाई कार्या करताओ
- 11:07–11:11आम्विनी तुट्पल और आशीश अंचिनाहार के खॉलासों पर गॉर कीजे
- 11:11–11:16उनो ने दस्तावेजों से साभिट किया कि अकाद्मी के नबभे प्रतिषत से अदिक कार्या
- 11:16–11:19केवल सलाहकार बोड के रिष्तटारो को दिये गय.
- 11:20–11:24जो दहाचा ब्रुष्ताचार और भाई भतीजवावाद पर खडा है,
- 11:24–11:26क्या हम उसे भाशा कर अख्षक मान ले?
- 11:26–11:27ये एक बंद कम्रा है,
- 11:27–11:30जाजा सर्फ कुछ खास लोग ही सांस ले रहे है.
- 11:30–12:00अगर बवादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा
- 12:00–12:30अद्वाशाखाखागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागाग
- 12:30–12:34उस्छने अपने आस्पास के पूरे जंगल को ही सुखा दिया है
- 12:34–12:37और जब हम भाशा के विस्टार की बात करते हैं
- 12:37–12:39तो हमें उस भूगोल की वूर देखना होगा
- 12:39–12:42जिसे इन मुख्यदारा के इतिहास कारोंने
- 12:42–12:44पूरी तरह से नक्षे से ही मिता दिया है
- 12:44–12:47अपका मतलब है कि यह सर्फ भिहार तकसीमित नहीं ता?
- 12:47–12:48बलकोल नहीं
- 12:48–12:53स्रोट समगरी एक बहुड बड़े समनानतर एतिहास का खुलासा करती है
- 12:53–12:56जिसे महान प्रवासी साहिट तिकहा गया है
- 12:56–13:00क्या जानते है कि जब भारत में मितला के राजवन्ष कमजोर हो रहे थे
- 13:00–13:03तब मैत्टली बाशा कहाँ पल फूल रही थी?
- 13:03–13:06आप नेपाल के मल लकाल की बाद कर रही है.
- 13:06–13:11हाँ. चोदवी से आप्टार्मी सदी तक नेपाल के मल ले राजाँँ का दरभार देखिए.
- 13:11–13:16कात्मान्दु पातन भद्रपूर उनहुने मेठली मे विपुल साहित्तिकी रच्ना की.
- 13:16–13:20राजा भूपतेंद्र मलने अकेले ही मेठली में चब्वीस नाट्टक लिख है.
- 13:20–13:22वो एक बहुत सम्व्रुद्द्द दोर था.
- 13:22–13:52और कहानी स्र्व नेपाल पर आगर नहीं रुकती, आसम में श्रीमन्त शंकर देव ने जो अंक्या नाथ की परमपरा शुरूकी, उसके लिए उनो ने कुन्सी बाशा चुनी ब्रजावली, जिसका मुल आदार मैठली ही ता. मैठली उस दोर में एक डोनर बाशा थी, जिस ने
- 13:52–13:54अपना बूल स्वरूब कुने लकती है
- 13:54–13:56इसे अज़े समजीए
- 13:56–13:58लेटिन भाशा का पूरे योरोपपर प्रजाथ
- 13:58–14:00पूरे इतिहास को मेठली की जरों से काट दिया
- 14:00–14:02मैं इस तत्थे का समान करता हूँ
- 14:02–14:04की मद्धे काल में
- 14:04–14:06मेठली एक प्रस्टीज लंवच थी
- 14:06–14:10ब्रजावली और बंगाल की ब्रज्बूली की बात करती हैं,
- 14:10–14:12तो हमे एक कठोर याठार्त समजना होगा.
- 14:12–14:13कैसा याठार्त?
- 14:13–14:16जब कोई भाशा एक लिंवा फ्रंका बन जाती है,
- 14:16–14:18तो वो अपना मूल स्वरुब खोने लकती है.
- 14:18–14:20इसे एसे समझे,
- 14:20–14:23लेटिन बाशा का पुरे योरोपपर प्रभाव दा
- 14:23–14:26लेकिन जब लेटिन तूटकर स्थानी ए बोलियो से मिली
- 14:26–14:29तो उसने फ्रेंच और स्पनेश को जन दिया
- 14:29–14:32क्या पंद्रवी सदी के किसी फ्रेंच नाटक को
- 14:32–14:33लेटिन साहित ते कहेंगी?
- 14:33–14:35नहीं, लेकिन वो स्तिति अलग है,
- 14:35–14:38ब्रज्बोली और ब्रजावली भी मूल रूप से,
- 14:38–14:41क्रित्रिम या मिश्रिद भाशाये तीं,
- 14:41–14:44जिने अन्ने कव्यों ने अपनी सुविदान उसर गड़ा था,
- 14:44–14:48वे बाशाये अंत धा, बंगाली और अस्मी मेही विलीन होगगगग.
- 15:03–15:33तता कतित पुनर्जागरन असल में एक बहुत फीचोटे सवर्ण वर्ब का अपनी सत्ता स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्�
- 15:33–15:40तो उख्छला किया, लेकिन आज समः बडल चुका है, विदेज एजरनल जैसे समानानतर आंदोलनो को देखिए.
- 15:40–15:43तो जिटल अरकाइविंग ने बहुत कुछ बडला है.
- 15:43–15:47बलकुल, उनहोंने अंट्रनेट की लोक तन्द्रिक शक्ती का इस्तमाल करके,
- 15:47–15:49तिरुब्ता लिपि को यूनी कोड तक पहुचाया
- 15:49–15:52और उन हाजारो लोग पान्दू लिपियो
- 15:52–15:55और हाजे के लेखकों को एक मंच दिया
- 15:55–15:57जिने अकाटमियों ने सथने के लिए चोर दिया था
- 15:57–16:00इस में कोई शक नहीं कि अमें बहुत लिए दिल्चस मुकाम पर कडे हैं
- 16:00–16:03तो दोनो ही पक्षों के बेहत तोस तरक हैं.
- 16:03–16:07अगर मैं आपनी बाद समझतन चाहूँँ तो मैंरा अभी आभी आपना है कि
- 16:07–16:11आजके इस भाशाई पारिसेति की तन्दर में तिकर अईनक लिए एक शास्त्री यादार आवश्षक है.
- 16:11–16:17जोर्ज ग्रीएर्सन से लेकर साहित्तिया काद्मी और आथवी अनुसुची में मानने ता
- 16:17–16:20ये प्रमान है कि एक मानकिक्रित रूप रेखा के बेना
- 16:20–16:24किसी भी भाशा को वैग कानुनी सुरक्षा नहीं मिल सकती.
- 16:24–16:26आप उच्छाक हाँ को नुक्सान पाचा होगा
- 16:26–16:29लेकिन इस तनी नहीं पेड़़ो करने से बचाया
- 16:29–16:32और मेरी योर से निषकार्ष बहुत सीडा है
- 16:32–16:34एक आँसा मंच किस काम का
- 16:34–16:38जो अपनी ही बाशा के अस्ली वारिसों को बेदखल कर दे
- 16:38–16:41उस तने ने पेड़ो एक गमले में कैद कर दिया है
- 16:41–16:45मैतली का असली बविश्य, विदेहे आरकाव की उस लोग तान्तरिक शकती में है,
- 16:45–16:49और जग्टीश प्रसाद मन्डल जैसे दलित लेखो के साइत्ते में है.
- 16:49–16:50मतलः प्रतीरोद में है?
- 16:50–16:55बलकुल कोईबी जीवन भाशा सथ्ता के खिलाफ अपने प्रतिरोद में सांस लेती है.
- 16:55–16:58दिल्ली में बेटे किसी सलागार बोड के वातानुकुलि दव्टर में नहीं?
- 16:59–17:02मुझे लगता है कि इस टीक ही लेकिन जरूरी बहिज्ज के बाद
- 17:02–17:05अम एक बिन्दुपर तो सहमत हो ही सकते हैं.
- 17:05–17:09वो ये कि मैतली सहिते का इतिहास एक रेख्ये नहीं है.
- 17:09–17:13इसकी पुरी भव्यता और जटिल्ता को समझने के लिये,
- 17:13–17:15अमे इसके संस्तागत तने कि साथ साथ
- 17:15–17:19इसकी समानान्तर शाक्वों कभी गेराई से अद्द्धन करना होगा.
- 17:19–17:24इक्दम सही कहा, हमें उन आवाजों को भी पूरी तरहाग गले लगाना होगा,
- 17:24–17:27जिने अप तक हाँशिये पर रख्खा गया था.
- 17:27–17:30और इसलिये हम अपने श्रोटावो पर ये चोडते है,
- 17:30–17:35कि वेश्रोथ समगरी मुजुद इन विबिनने इतिहासिक द्रिष्टिकोनो को स्वैम पड़ें
- 17:35–17:38जब आप किसी भी इतिहासिक दाचे को देखते हैं,
- 17:38–17:42तो केवल उसके चम्चमाते गुमबत को देखकर मत लोट आए.
- 17:42–17:47नीचे उतर ये और उन खुडरे अनाम पत्टरो को तटोलिए
- 17:47–17:54क्योंकि कई बार असल में वही खुडरे पत्टर उस पूरी शान्दार इमारत का असली वजन अपने कनडो पर उठाये होते हैं
- 17:54–17:59एक जीवन्त बाशा का इतियास कभी किसी एक किताब में खत्म नहीं होता
- 17:59–18:02तब दिबेट से जुडने के लिए बहुत-बहुत दश्निवाद
Plain text
जब हम किसी यह तिहासिक एमारत को देखते हैं, तो हमारी नजर सब से पहले कहाजाती हैं. सब हविख है कि उसके बवे गुमबद पर, या उन चिकनी सतो हो पर, जो दूर से ही चमकती हैं. भिलकुर. हमें लखता है कि मतलब, यही उ स्वास्तुकला की पूरी सच्चाई है सब कुछ एक दं स्पष्ट और सुन्दर देबेट में आप का स्वागत है आज हम गजेंदर ताकृर की किताब अप पारलल लिए फिस्ट्री अप मित्छीला अन मैत्ली लिट्रिचर की नजरये से ये बवड़ी बुनियादी और जटल सवाल पर च़चा करने वाले है और वो सवाल वाखई बहड गेहरा है बलकुल, सवाल ये है कि मेतली साहित्रि का असली इतिहास अखर बस्ता कहा है क्या इसका वास्तविक स्वरूप उस मुख्यदारा के शास्त्रिये इतिहास में है, जिसे ब्रम्हवादी परम्पराव, दर्बारों, और सहित्य अकाद्मी जैसी आदूनिक संस्तावने ग़ा है, मैं इस चर्चा में इस शास्त्रिया और संस्तागत इतिहास का पक्ष्ष्ष्वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� आम हाशेए पर दखेल देगे दलत विमर्ष्छ में और निपाल और असम में फैले इसके प्रवासी साइत्ते में द़गते हैं और यही से हमारे भीच एक सपष्ट वेचारिक वेचारिक विभाजन रेखा किचती है मेरा रुक बहुत साव फैं मैं मानता हूं कि किसी भी भाशा को महस एक बोली या डालेक्त के सटर से उठाकर उसे सद्धियों तक जीवित रक्ने के लिए एक बहुत फीज्द्द्रद संस्तागर दाचे की आवशकता होती है. लेकिन क्या वो दाचा दमन कारी नहीं था? अप उसे शास्त्रिये या ब्रामवादी कहे सकती हैं. लिकिन इसी कठोर दाचे ने मेठली को नश्त होने से बचाया. जोर्ज ग्रीर्सन दूरा की आगया इसका मानकी करन, चंदा जाका इसे नया व्याकरन देना और मतलप सहिती अकाटमी के प्रयास. ये वो स्तम लेए जिनों अंतताः भार्तिः समविदान की आप्वी अनुसुची में मेतली को मानेता लेए. मैं इस पूरे परिद्रुष्य को भिलकुल एक दुस्रे नजर्ये से देकती हूँ. बताएए. अब जिस कठोर तनी या संस्त्थगत एतिहास की वकालत कर रहे हैं ना स्रोथ सामुडरी उसे एक सुखावा मुख्ये नाला कहती है. औरे सुखावा नाला ये तो बहुत सक्त टिपनी है. पर ये बहुत सती कुप्मा है. इस मुखेदारा के दानचे ने बाशा को संगरक्षित कम किया है बलकी उसे खास संब्रान्त वर्ग की जागीर बनाकर जीादा रक्तिया है अगर हमें में में डर्बारों से बहार आना होगा तो आपके ही साप से वो उदगम कहा है? इसके ज़े आत्वी से बार्वी सदी के उन बोध सिद्धों में हैं, जैसे सरहपा और कानहपा, जिनोंने चर्या पद्रचे, उनोंने जिस संद्या बाशा का अस्तमाल किया, वो कोई देव बाशा नहीं ती. उआम जन की बाशा थी, जू निछले तबके के लोगो से सीदे समवाद करती थी, लेकिन इस संस्त्था गत इतिहास ने मतलब लोक विमर्ष को ही काड दिया. यिस सन्रक्षन नहीं बलकी एक व्यवस्तित बाशाई दमन है. दिके बोद्ध सिद्दों की संद्धाबाशा का इतिहासिक महत्व है, इसे मैं इंकार नहीं कर रहा हूं, लिकिन संद्धाबाशा अपने बेहत गुड और प्रतिकात्मक ती, उसे हम सीधे तोर पर आज की मेठिली का पुरन विखसित रुप तो नहीं मान सकते ना? पर वो शुरुवात तो थी? आप, लेकिन अगर न इतिहास की ज़ों और भाशा के सबसे बड़े प्रतीक की ही बात कर रहे है, तो हम विद्यापती को कैसे नजर अंदास कर सकते हैं. मेठली साहित्ते की पहचान तो विद्यापती के देसल भयाना से ही स्थापत होती है ना जो राजा शिव्सिंक के दरबारी थे रुके, यही पर समानान्तर इतिहास का सबसे बड़ा और शाएथ सबसे च्वंकाने वाला रच्तक्षेप सामने आता है अम जिस विद्यापती को आज पुछते है, मुख्यदारा के इतिहास कारोंने, उनके इर्द गिर्द एक बहुड बडा इतिहासक ब्रम पैडा किया है. ब्रम कैसा ब्रम? संस्तागत इतिहास ने बहुत ही चालाकी से, तो गलक-लक पहचानों को आपस में मिला दिया है तो गलक पहचान? आपका मतलब है कि विद्ध्यापती यह वेकती नहीं ते? बलकल नहीं, स्रोथ सामगरी इस बात को बहुत प्रमुखता से उठाती है एक तरव ते दरबारी विद्वान विद्ध्यापती ताकुल जो एक समभ्रान्त परिवेश में ते, जे नोने संस्क्रित और अवहत में पुरुश परीक्षा जैसी रचनाय लिखी. आप जो एतिहासिक रूप से दरज है? सही कहा, और दूस्री तरव एक समानान्तर एतिहास है, जो एक दूस्रे विद्ध्यापती की बात करता है. वो लोक कवी जिसने वास्टव में वो पदावली रची जो आम लोगो के दिलो में बस कैई. इस दुस्रे विध्ध्यापती की जाती तक एतिहासिक रुप से अनिष्चित है. आचा तो आप पनकलाल मंडल के उसे सिद्दान्त की बात कर रही है. बिलकुल, पनक्लाल मंडल ने जिस सबाल्टन विद्ध्यापती का चित्रोकेरा है, वो इसी आम जन के कवी का प्रतिनिदिद्व करता है. लेकिन इन ब्रहम्मडवादी इतिहास कारोने क्या क्या? उनो ने इस आम जन के कवी के रच्नाउ को उस दरबारी विद्यापती के नाम पर मड़ दिया. ताकि उसे एक दाचे में फिट किया जासके. आााा, ताकी लोग संस्क्रती के इस सब से बड़े प्रतीक को एक विषुद्धश्यव और सवरन दाचे के भीतर कैद किया जा सके. निचले तबके के लोग अपनी ही कवीपर दावा ना कर सकें इस के लिए वैचारिक अपहरन किया गया. ये एक बहुत एक क्रान्तिकारी दावा है, लेकिन देके अगर हम इसे अटिहासे क्यदार्त की कसोती पर कसे, तो मुझे इस में कुछ खाम्या नजर आती है. वो कैसे? अगन लीजे कि तोडी देर के लिए हम इस दो विद्ध्यपती वाले सिद्धान्त को सबकार लेएएएएए. एक जो शास्त्री एखा और एक जो लोग कवी ता. लेकिन मेरे सवाल यह एक कि राजा श्व्सिंग के उस दरबारी सन्रक्षन के बिना अग, तो तो तो बग़ागा बगादा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ागा तो बग़ गलोब थीआटर जैसा हिक दाचा ता, और बाद में, अकाटमिक संस्ताऊने उनके फोलियो को सन्रक्षिट किया? क्या विद्ध्यापती की कलाग को पुरे पूरवी भारत में फैलाने के लिए, उस दरबारी दाचे का हुना निवारे नहीं था? उगर शेक्सपीर का उदारन सुन्ने में भगत तारकिक लकता है. लेकिन ये उस दमन की यान्त्रिकी को नहीं समजाता जो यहां काम कर रही थी. दमन की यान्त्रिकी? प्रच्पीर के नाटकों को अकादमियों ने उनके मूल रूप में सहेजा. अप लोरी का सलहेस और दीना भद्री जैसे महाखावियों को देखिये। अग, वो मोखिक परमपरा का हिसा है। अप लोरी का सलहेस और दीना भद्री जैसे महाखावियों को देखिये अग, वो मोखिक परमप्रा काहिसा है और ये आज भी जीविध हैं कैसे? ये किसी राजा के अभिलेक्हागार में नहीं सहेजे गया अप बच्टे कैसे उ किसी दर्बार्या कागस की मुधाजी नहीं करता आप लोरी का सलहेस और दीना भद्री जैसे महाखावियों को देखिये आप वो मोखिक परमप्रा का हिसा है और ये आज भी जीवित हैं कैसे? ये किसी राजा के अभिलेक्हागार में नहीं सहेजे गय? ये दलितों मुसहरों और यादों की सामोहिक मोखिक सम्रती में पीडिदर पीडि प्रवाहित होते रहे यही बाशा के अस्ली दधगन है, जिसे आपके उस कथोर तने ने कभी अपनी शाक्धा नहीं माना मैं मोखिक सम्रती की शकती को पुरी तरह सविकार करता हों लिकिन देकिए जब भाशागों के भीच अस्तित्व का संगर शुरू होता है तब लडाई सर्फ मोक्धिक स्म्रित्ती के सहारे नहीं जीती जासकती आपका इशारा मान की करन की तरव है? बिलकुल बीस्वी सदी की शुवात का समय याद की जीए इक बड़ा राजनीतिक प्रयास चल रहा था, ये सावित करने का, की मैठली महेज हिंदी की एक विक्रुत बोली है. अगर उस समें जयाकान्त मिष्र और रमानाद जाए से विद्वान आगे नहीं आते, तो ये बाशा हिंदी के विशाल समवद्र में विलीन हो चुकी होती मैं मानती हो, कि उनका योगदान ता, लेकिन और अगर हम थोडा और पीछे जाएं, तो आपने एक दमनकारी विवस्ता की बात की थी अकसर पनजी प्रबंद को इसी नजरये से देखा जाता है वह तो बज़ागा बज़ागा दश्टावेजी करन ता जब बाहरी आक्रमड हो रहे थे, तब इस पनजी प्रबंदने मेठिल समाज को बिखरने से रोका. मुझे ये कहना पडेगा कि ये पनजी प्रबंद का एक बहुत ही सुविदाजनक और रोमानी विष्लेशन है. अगर बाद़ान बाद़ा दो बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान बाद़ान उदारन लीजे वे नव्यनयाई दर्षन के इतने महान दार्षनिक थे कि उनका दंका पूरे भारत में बच्टा था लेकिन इस महान संस्थागत इतिहास ने उनके रेकोट की सात क्या किया उनकी जानकारी दूश़ पंजी में डाल दी गयी उआँ ख़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उग़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ़़ाँ उ� अगर बाद्यान बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा बाद्यागा उसी इसाहित त्याकाद्मीने उने पूरसकार के योगे नहीं माना अग, उननीसो सरसच्ट्ट का वो विवाद बलकुल उननीसो सरसच्ट्ट मे तो अकाद्मीने ये तेखिया कि उस वर्ष किसी को भी पूरसकार नदेना बहतर है बजगाय इसके कि वो पुरसकार हरी मोहन जागो दिया जाए किंकि वे उस संस्तागड धाचे को असहेज कर रहे थे वो एक अटिहासिक बूल फी फी मैं वानता हूं और अगर आप को लकता है, कि ये सर्फ पुरानी बात है तो 2011 से 2014 के भीच अर्टीःाई कार्या करताओ आम्विनी तुट्पल और आशीश अंचिनाहार के खॉलासों पर गॉर कीजे उनो ने दस्तावेजों से साभिट किया कि अकाद्मी के नबभे प्रतिषत से अदिक कार्या केवल सलाहकार बोड के रिष्तटारो को दिये गय. जो दहाचा ब्रुष्ताचार और भाई भतीजवावाद पर खडा है, क्या हम उसे भाशा कर अख्षक मान ले? ये एक बंद कम्रा है, जाजा सर्फ कुछ खास लोग ही सांस ले रहे है. अगर बवादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा अद्वाशाखाखागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागाग उस्छने अपने आस्पास के पूरे जंगल को ही सुखा दिया है और जब हम भाशा के विस्टार की बात करते हैं तो हमें उस भूगोल की वूर देखना होगा जिसे इन मुख्यदारा के इतिहास कारोंने पूरी तरह से नक्षे से ही मिता दिया है अपका मतलब है कि यह सर्फ भिहार तकसीमित नहीं ता? बलकोल नहीं स्रोट समगरी एक बहुड बड़े समनानतर एतिहास का खुलासा करती है जिसे महान प्रवासी साहिट तिकहा गया है क्या जानते है कि जब भारत में मितला के राजवन्ष कमजोर हो रहे थे तब मैत्टली बाशा कहाँ पल फूल रही थी? आप नेपाल के मल लकाल की बाद कर रही है. हाँ. चोदवी से आप्टार्मी सदी तक नेपाल के मल ले राजाँँ का दरभार देखिए. कात्मान्दु पातन भद्रपूर उनहुने मेठली मे विपुल साहित्तिकी रच्ना की. राजा भूपतेंद्र मलने अकेले ही मेठली में चब्वीस नाट्टक लिख है. वो एक बहुत सम्व्रुद्द्द दोर था. और कहानी स्र्व नेपाल पर आगर नहीं रुकती, आसम में श्रीमन्त शंकर देव ने जो अंक्या नाथ की परमपरा शुरूकी, उसके लिए उनो ने कुन्सी बाशा चुनी ब्रजावली, जिसका मुल आदार मैठली ही ता. मैठली उस दोर में एक डोनर बाशा थी, जिस ने अपना बूल स्वरूब कुने लकती है इसे अज़े समजीए लेटिन भाशा का पूरे योरोपपर प्रजाथ पूरे इतिहास को मेठली की जरों से काट दिया मैं इस तत्थे का समान करता हूँ की मद्धे काल में मेठली एक प्रस्टीज लंवच थी ब्रजावली और बंगाल की ब्रज्बूली की बात करती हैं, तो हमे एक कठोर याठार्त समजना होगा. कैसा याठार्त? जब कोई भाशा एक लिंवा फ्रंका बन जाती है, तो वो अपना मूल स्वरुब खोने लकती है. इसे एसे समझे, लेटिन बाशा का पुरे योरोपपर प्रभाव दा लेकिन जब लेटिन तूटकर स्थानी ए बोलियो से मिली तो उसने फ्रेंच और स्पनेश को जन दिया क्या पंद्रवी सदी के किसी फ्रेंच नाटक को लेटिन साहित ते कहेंगी? नहीं, लेकिन वो स्तिति अलग है, ब्रज्बोली और ब्रजावली भी मूल रूप से, क्रित्रिम या मिश्रिद भाशाये तीं, जिने अन्ने कव्यों ने अपनी सुविदान उसर गड़ा था, वे बाशाये अंत धा, बंगाली और अस्मी मेही विलीन होगगगग. तता कतित पुनर्जागरन असल में एक बहुत फीचोटे सवर्ण वर्ब का अपनी सत्ता स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्थाँ स्� तो उख्छला किया, लेकिन आज समः बडल चुका है, विदेज एजरनल जैसे समानानतर आंदोलनो को देखिए. तो जिटल अरकाइविंग ने बहुत कुछ बडला है. बलकुल, उनहोंने अंट्रनेट की लोक तन्द्रिक शक्ती का इस्तमाल करके, तिरुब्ता लिपि को यूनी कोड तक पहुचाया और उन हाजारो लोग पान्दू लिपियो और हाजे के लेखकों को एक मंच दिया जिने अकाटमियों ने सथने के लिए चोर दिया था इस में कोई शक नहीं कि अमें बहुत लिए दिल्चस मुकाम पर कडे हैं तो दोनो ही पक्षों के बेहत तोस तरक हैं. अगर मैं आपनी बाद समझतन चाहूँँ तो मैंरा अभी आभी आपना है कि आजके इस भाशाई पारिसेति की तन्दर में तिकर अईनक लिए एक शास्त्री यादार आवश्षक है. जोर्ज ग्रीएर्सन से लेकर साहित्तिया काद्मी और आथवी अनुसुची में मानने ता ये प्रमान है कि एक मानकिक्रित रूप रेखा के बेना किसी भी भाशा को वैग कानुनी सुरक्षा नहीं मिल सकती. आप उच्छाक हाँ को नुक्सान पाचा होगा लेकिन इस तनी नहीं पेड़़ो करने से बचाया और मेरी योर से निषकार्ष बहुत सीडा है एक आँसा मंच किस काम का जो अपनी ही बाशा के अस्ली वारिसों को बेदखल कर दे उस तने ने पेड़ो एक गमले में कैद कर दिया है मैतली का असली बविश्य, विदेहे आरकाव की उस लोग तान्तरिक शकती में है, और जग्टीश प्रसाद मन्डल जैसे दलित लेखो के साइत्ते में है. मतलः प्रतीरोद में है? बलकुल कोईबी जीवन भाशा सथ्ता के खिलाफ अपने प्रतिरोद में सांस लेती है. दिल्ली में बेटे किसी सलागार बोड के वातानुकुलि दव्टर में नहीं? मुझे लगता है कि इस टीक ही लेकिन जरूरी बहिज्ज के बाद अम एक बिन्दुपर तो सहमत हो ही सकते हैं. वो ये कि मैतली सहिते का इतिहास एक रेख्ये नहीं है. इसकी पुरी भव्यता और जटिल्ता को समझने के लिये, अमे इसके संस्तागत तने कि साथ साथ इसकी समानान्तर शाक्वों कभी गेराई से अद्द्धन करना होगा. इक्दम सही कहा, हमें उन आवाजों को भी पूरी तरहाग गले लगाना होगा, जिने अप तक हाँशिये पर रख्खा गया था. और इसलिये हम अपने श्रोटावो पर ये चोडते है, कि वेश्रोथ समगरी मुजुद इन विबिनने इतिहासिक द्रिष्टिकोनो को स्वैम पड़ें जब आप किसी भी इतिहासिक दाचे को देखते हैं, तो केवल उसके चम्चमाते गुमबत को देखकर मत लोट आए. नीचे उतर ये और उन खुडरे अनाम पत्टरो को तटोलिए क्योंकि कई बार असल में वही खुडरे पत्टर उस पूरी शान्दार इमारत का असली वजन अपने कनडो पर उठाये होते हैं एक जीवन्त बाशा का इतियास कभी किसी एक किताब में खत्म नहीं होता तब दिबेट से जुडने के लिए बहुत-बहुत दश्निवाद