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मैथिली_का_समानांतर_इतिहास_और_डिजिटल_विद्रोह.mp4

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Part 1 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 1
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  1. 0:00–0:04अग, कल्पना कीजी कि जिस महान कवि की कविता है पीडियो से गाए जारी है,
  2. 0:04–0:08जिसके नाम पर आजज भी चोक-चोराहे बने हुए है,
  3. 0:08–0:11वो आसल में मतलप कोई एक अन्सान थाए नहीं.
  4. 0:11–0:14आच्ठ? एक अन्सान नहीं था?
  5. 0:14–0:21आँ, बलके इतिहास के पन्नो में, दो बिलकुल अलग गलग लोगो को मिलागर एक चेहरा गर दिया गया हो.
  6. 0:21–0:28और वो बी इसले ताकी एक बड़े लोक विद्रोग को सथा के साचे में आसानी से फिट किया जासके.
  7. 0:28–0:58अज तो बज़ाद बादा बादा लगागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागा�
  8. 0:58–1:05अगर दिखार बाद़ा लोग, लोग कताव और दिजिटल क्रान्ती की मददद से उस चिपे हुए सच को बार निकाला.
  9. 1:05–1:09बिलकोल. पर दिखे आगे बडने से पहले एक बाथ सपष्ट करना बहुत जोगी है.
  10. 1:09–1:11आप वो दिस्कलेमर देना सही रहेगा.
  11. 1:11–1:17समआनान्तर इतिहास ने, हाश्विया पर पडे लोगों, लोग कतावं और दिजिटल क्रान्ती की मददत से,
  12. 1:17–1:19उस छिपे हुई सच को बहार निकाला.
  13. 1:19–1:20बिल्कुल.
  14. 1:20–1:24पर दिक्ये आगे बडने से पहले एक बाज स्पष्ट करना बहुत जोरी है.
  15. 1:24–1:26अगर दिस्कलेमर देना सही रहेगा
  16. 1:26–1:31ये श्वोट सामगरी में साहित ये अकादमी पर पक्ष्पात, ब्रामभ़वादी वर्चस्व,
  17. 1:31–1:35और संस्तागत भेदबाव के कई कडे दावे की एगे हैं.
  18. 1:35–1:38तो हम यहां यें राजनीतिक या जातीगद दावो का,
  19. 1:38–1:42ना तो समर्थन कर रहे है, नहीं विरोथ कर रहे हैं.
  20. 1:56–2:01तो दिक्ये इस कहानी की ज़डेना बहुत गेरी हैं
  21. 2:01–2:05अदिकारे के तिहास अकसर कई चीजों को दरकिनार कर देता है
  22. 2:05–2:08स्रोथ के अनसार मैठिली भाशा की उतपती
  23. 2:08–2:12आप्वीं से बारवी शताबदी के भीच मागदी प्राक्रित से हुई ती
  24. 2:12–2:14मागदी प्राक्रित से
  25. 2:14–2:16मागदी प्राक्रिट से हूए ती
  26. 2:16–2:18मागदी प्राक्रिट से
  27. 2:18–2:21अग, लेकिन इसकी सबसे पहली और प्रमानेग जलक हमे
  28. 2:21–2:23चर्या पद में दिखने को मिलती है
  29. 2:23–2:25ये कानापा, और सरहापा जैसे
  30. 2:25–2:27तेइस वज्रेयान सिथों दोड़ा
  31. 2:27–2:29रचे गय, रहेस से मैं गीत हैं
  32. 2:29–2:33अग, मुजे यहां थोडा रुकना होगा. यह सिद आकिर ते कोन?
  33. 2:33–2:34बताता हूँ.
  34. 2:34–2:37और इनका साहिट्य इतना रहेस से मैं कियों ता?
  35. 2:37–2:41की मुख्य दारा के इतिहास ने इसे नजर अंदास करना ही बहतर समजा?
  36. 2:41–2:44देखे ये सिद कोई राज दर्बारो में बैटने लोग नहीं ते
  37. 2:44–2:46ये तो गूमते फिरते भिख्षू थे
  38. 2:46–2:49जो समाजके निचले तबको से आते थे
  39. 2:49–2:51उनहुने अपने गीतों के लिए जान भूचकर
  40. 2:51–2:53संद्या बाशा या
  41. 2:53–2:55तौएलाइट लंबेज के अस्तमाल किया
  42. 2:55–2:57अच्छा त्वालाइत लंगज ये क्या हुती है?
  43. 2:57–3:00सन्द्या बाशा का मतलब है, एक अईसी बाशा,
  44. 3:00–3:03जो ना पूरी तरान से दिन के उजाले जैसी साफ है,
  45. 3:03–3:05और नहीं राद के अंदेरे जैसी चुपी हुए है.
  46. 3:06–3:06औहु.
  47. 3:06–3:09मददब ये एक तर से कुट बंद या कोड़द भाशा थी
  48. 3:09–3:10बिलकुल सही
  49. 3:10–3:12इसे आम जन्ता जो उन सिद्दों के करीब थी
  50. 3:12–3:14वो तो समझ सकती थी
  51. 3:14–3:17लेकिन सत्ता और दरबार के रूदी वादी लोग
  52. 3:17–3:19इसे आसानी से पकड नहीं पाते थे
  53. 3:19–3:20क्या बाते
  54. 3:20–3:26ये उस उमैं के संस्क्रित, वर्च्ष्व, और दार्मिक पाक्श्ण्ड के खिलाद एक बहुद बाशाई बगावद थी
  55. 3:26–3:29ये तो एक तर से अंट्ग्राउंट रीजिटन्स मुम्मिन्ट जैसा लगरे है?
  56. 3:29–3:33मतब सत्ता की नजरों से बचकर अपनी बात कैने का एक शान्दार तरीका.
  57. 3:33–3:34आप बलकल वैसा ही था.
  58. 3:34–3:36तो चली एस को तोडा विस्तार से समझते हैं.
  59. 3:36–3:40सहित سے भी बड़ा मुद्डा मुजे हैं, उस लिपी का लकता है,
  60. 3:40–3:41जिस में ये सब लिखा जारा था.
  61. 3:41–3:43मैंने स्रोत में पडा की,
  62. 3:43–3:47एक हाँजार साल तक मैठली अपनी मुल तिरहुता लिपी में लिखी जाती जाती थी.
  63. 3:47–3:49हाँँजिसे मित लाक्षर भी कैते हैं.
  64. 3:49–3:50सही.
  65. 3:50–3:54लेकिन 20th । सदी में इसे हताखर देवनागरी को अदिकारिग बना दिया गया
  66. 3:55–3:59अब मेरा सवाल यह किसी लिपी को रातो राद कैसे मिताया जासकता
  67. 3:59–4:01यह कोई एक दिन का काम तो नहीं रहा होगा
  68. 4:01–4:03नहीं यह रातो राद बलकुल नहीं हूँ
  69. 4:03–4:07और सच कहुंतो यही समानान्तर इतियाज का सबसे दर्दनाग हिस्चा है
  70. 4:07–4:12जब किसी लिपी को मिताया जातान, तो असल में उस भाशा की द्रिष्श्म्रिती
  71. 4:12–4:14या विज्यल मेमरी को मिताया जाता है
  72. 4:14–4:16विज्यल मेमरी
  73. 4:16–4:18जब स्कूल के ब्लागबोट से त्रहुता गायब होगगग,
  74. 4:19–4:21जब ताई प्रीटर और प्रिंटिंग प्रेस केवल देवनागरी चापने लगे.
  75. 4:22–4:24और सरकारी काम का ज़ेवनागरी में लगा,
  76. 4:24–4:26तो त्रहुता दिरे-दिरे स्थ दार्मिक अनुष्टानो
  77. 4:26–4:56या पुरानी पोठीों तक सिमट कर रहागेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगे�
  78. 4:56–4:59समणान्तर इतिहास कार पिलकुल यही तरक देते हैं
  79. 5:00–5:04इस बदलावने मैठली को एक स्वतन्त्र और प्राचीन भाशा के दरजे से गिराकर
  80. 5:04–5:08उसे बस हिंदी की एक बोली या डालेक्त के रूप में पेश करने का रास्ता साव कर दिया
  81. 5:08–5:10वुद्यपती ताकृर की बात करना चाहूंगी,
  82. 5:10–5:15जो 1350 सी 1450 के भीच्ट का उनका समे था.
  83. 5:15–5:18तो आपकी अपनी स्वतन्तर पहचान दिरे दिंदली पडने लकती है.
  84. 5:18–5:22और अगर लिप्पी और पहचान को इतना दिंदला कर दिया गया,
  85. 5:22–5:26तो जाहर है कि उनलोगों की पहचान भी सुरक्षित नहीं रही होगी,
  86. 5:26–5:29जिनों ले इस भाशा को महान बनाया था.
  87. 5:29–5:59आप बगदागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा द
  88. 5:59–6:29अग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उ�
  89. 6:29–6:35समनानतर इत्यास का दावा है के एक दुसरे विद्यापती भी थे, जो असल में एक लोग कवी थे.
  90. 6:35–6:42उनोने पदाओली रची और उनोने दरभार की संसक्रित चोडगर आम जन की बाशा देसिल भयना को चुना.
  91. 6:42–6:43देसिल भयना.
  92. 6:43–6:44दिसल भयना
  93. 6:44–6:46दिसल भयना का मतलब है
  94. 6:46–6:48देश की या आम लोगों की मीटी बोली
  95. 6:48–6:52विदेहे मुवमिन ने तो इस वैचारिक फर्क को स्थापित करने किलिए
  96. 6:52–6:54बकाईदा एक सबाल्टन विद्यापती
  97. 6:54–6:56या हाशिये की विद्यापती
  98. 6:56–6:58का एक लोगो तक तेयार किया है
  99. 6:58–7:11आप रे तु क्या हम ये कहर रहे हैं कि इतिहास ने एक विद्रोही लोक कवी और एक दरबारी विध्वान को मिला कर एक ही वेक्ती बना दिया बस इसलिए ता कि उस लोक सहते पर उच्वर अपना दावा पेष कर सके.
  100. 7:11–7:14यह तेखे समानान्तर इतिहाज सीदा सीदा यही इशारा करता है
  101. 7:14–7:18येक तरा का संसक्रितिक विनियोग या कल्ट्रल अप्रुप्रीएशन था
  102. 7:18–7:22असली विद्यापती की महांत संसक्रित के बारी बरकम शब्डो में नहीं थी
  103. 7:22–7:25अग तो केतो और गाँवाँ में गाई जाने वाले गितो में थी
  104. 7:25–7:28यहाँ पर बात आकर सच में बहुत दिल्चास फुजाती है
  105. 7:28–7:32ये एक भाशा के साथ होने वाले खिल्वाड का बहुत बड़ा उदारन है
  106. 7:32–7:34लेकिन कहानी सर्फ सिकुडने की नहीं है ना?
  107. 7:34–7:37अगर अपन सोर्स कोड की देकते हों
  108. 7:37–7:39अगर अपन सोर्स कोड अद
  109. 7:39–7:41जैसे कोई सुफ्ट्वार
  110. 7:41–7:43जिसे हर कोई अपन सोल कर सकता है
  111. 7:43–7:45अपने हिसाप से बड़ल सकता है
  112. 7:45–7:47और कुछ नेया बना सकता है
  113. 7:47–7:49अगर अपन सोर्स कोड बड़े पाँमने पर देखे है
  114. 7:49–8:19जेसे कोई सुफ्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्�
  115. 8:19–8:22अद्री कियो इसका असर तो बंगाल अरसम तक था.
  116. 8:22–8:52श्रोद बताता है कि बंगाल में ब्रज्बूली नाम की एक मिष्रिद भाशा का वेकास हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  117. 8:52–8:54ये बाशा एक आज्सा साँस्क्रितिक खजाना ती,
  118. 8:55–8:58जिसे कई अन्ने साँस्क्रितियोंने अपना साहित्ते गडा.
  119. 8:58–9:00लिकिन यहा एक बड़ भड़ विरोदा वास एक,
  120. 9:01–9:02जो बात मुझे कखतक रही है.
  121. 9:02–9:03वो क्या?
  122. 9:03–9:05एक बाशा जो इतनी प्रभावषाली ती,
  123. 9:05–9:07कि नेपाल के राजा उस में नाटक लिक रहे हैं,
  124. 9:07–9:10बंगाल रशम के संट उसे नहीं बहाशाइं गडर रहे हैं,
  125. 9:10–9:13वो बहाशा अपने ही गर में हाँशे पर कैसे दھकिल दिगाई,
  126. 9:13–9:15मतलब एक दोनर बहाशा सिकोड कैसे गए गई.
  127. 9:15–9:21देखे जब किसी बाशा का प्रबाव इतना व्यापक होता ना, तो उस पे निंट्टरन बहुत एहम हो जाता है.
  128. 9:21–9:27बाशा को सिकोडने का काम अकसर लेए संस्ताइ करती है, जो उसके मानक तैकरती है.
  129. 9:27–9:28समज रही हो.
  130. 9:28–9:31जो लोग ये तैखरने की कुर्सी पर बैट्ते हैं,
  131. 9:31–9:34कि क्या शुद हैं, क्या चफेगां,
  132. 9:34–9:35और किसे पुरसकार मिलेगा,
  133. 9:35–9:38वे दिरे-दिरे बाशा की बावन्री तैखे देटें हैं.
  134. 9:38–9:41तो इस सब काहिर मतलप क्या हैं?
  135. 9:41–9:43यही से हम उस फिस्से में प्रवेश करते हैं,
  136. 9:43–9:46ज़ाह संस्तागत भेदबहू और गेट कीपिंकी बात आती है
  137. 9:47–9:47बिलकुड
  138. 9:47–9:52स्रोथ में साहित या अकाद्मी की कार्ये प्रनाली पर गंभी रारोप लगाए गे हैं
  139. 9:52–9:561965 में अकाद्मी ने मैठली को मानेता दी
  140. 9:56–10:00लेकिन विनीत उत्पल और आशीश अंचिनार दवारा
  141. 10:00–10:30अगर दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो वागा दो बवागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा द
  142. 10:30–10:32तो बागी लोगों के लिए मेडान के दरवाजे कवी नी कुलते?
  143. 10:32–10:33सही कहा
  144. 10:33–10:35इसका एक बड़ा और दुख़द उदारन हरी मोहन जा का है
  145. 10:35–10:38वे कन्यादान और खटर कखा के तरंग जैसी उपन्यासोगे
  146. 10:38–10:40बहुत प्रसिथ दो लोगप्री वेंगे कार थे
  147. 10:40–10:41हरी मोहन जा
  148. 10:41–10:44तो बाखी लोगों के लिए मेडान के दरवाजे कभी नी कुलते?
  149. 10:44–10:45सही कहा
  150. 10:45–10:47इसका एक बड़ा और दुखद उदारन रही मोहन्जा का है
  151. 10:47–10:50वे कन्यादान और कट्र कचा के तरंग जैसी उपन्यासोगे
  152. 10:50–10:52बहुत प्रसिथ तो लोगप्री वेंगेकार थे
  153. 10:52–10:53रही मोहन्जा
  154. 10:53–10:56उनकी किताबे तो गर-गर में पडीजाती थी
  155. 10:56–10:58उनकी श्यली भहड तीची ती
  156. 10:58–11:00आँ और यही उनकी सबसे बडीगल्ती बन गय.
  157. 11:00–11:04उनोने समाज की रूडी वादिता और पाकहन्पर तीखा प्रहार किया था.
  158. 11:04–11:07संस्तागड दाचे को सीदे चुनोती दी थी.
  159. 11:07–11:10अदिजा ये हुए कि उने जान बुचकर अकाद्मी पुरस्कार से दूर रखा गया
  160. 11:11–11:12जिस सालोने पुरस्कार मिल सकता ता
  161. 11:12–11:14अज़ा काथा है कि उस साल अकाद्मीने
  162. 11:14–11:16मेठली में किसी को पुरस्कार ही नी दिया
  163. 11:16–11:19सर्फ इसलिया ता की हरी महुंजा को सम्मानित करने से बचाजा जा सके
  164. 11:19–11:22ये तो उसी विःपी कलब वाली बात होगे
  165. 11:22–11:24जाँ बाउन्सर गेट पर खडे है
  166. 11:24–11:28और सर्फ अपने परिवार वालो या जान पैचान वालो को अंदर जाने देर हैं
  167. 11:28–11:28बिल्खोल
  168. 11:28–11:34और जो लेख्ह कसल में उस पूरी पाटी की जान हैं जिसकी किताभे लोग सबसे जाडा पड़रें
  169. 11:34–11:36उसे कलब से ही बहर निकाल दिया जाता है.
  170. 11:36–11:38इस से एक बहत महत्पून सवाल पडा होता है.
  171. 11:38–11:41ये आदनिक संस्तागत राजनी दी तो है.
  172. 11:41–11:45अगर दूशन पन्जी यानी दाब्बुक तक जाते हैं।
  173. 11:45–11:49ये ब्लागबुक वाला हिस्सा वाखे यी किसी दाख मिस्त्री जैसा है।
  174. 11:49–11:552009 में विदेह आन्दोलन ने वन्शावली के कुछ गुप्त रिकोट्स को सरवजनिक कर दिया
  175. 11:55–12:25तो जोगादार नाँगे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बार
  176. 12:25–12:27तो अज़े बी जादावे की जाते थे गवाद वाद वाद हुए ता वाद हूँ
  177. 12:27–12:32तो आजे महान व्यक्ती के जीवन में आजा ख्या जिसे चिपाने की तनी जरूरत पड़गेई.
  178. 12:32–12:40तो देके गुब्थ पनजी रेकोट से ये सच्सामने आया की गंगेष शौपाद्धयाई ने एक चर्म कारिनी यानी निच्ली जाती की महिला से शादी की ती.
  179. 12:40–12:41अच्छा.
  180. 12:57–12:58बिल्कुल!
  181. 12:58–13:00और इसिल्ये संस्तागत इतिहाँस कारों
  182. 13:00–13:02जैसे रमनाज्जा और अन्ने ने
  183. 13:02–13:06जातिगड शुद्द्टा और उच्वर्ग का ब्रहम बनाय रखने किलिए
  184. 13:06–13:08इस सच्चाई को पुरी तरषे दबा दिया?
  185. 13:08–13:09अग!
  186. 13:09–13:12स्रोथ इसे इतिहास की अनर किलिंग कहता है
  187. 13:12–13:15एक महन दार्षनिक के जीवन की सच्चाई को
  188. 13:15–13:16सर्फ इसलिये मार दिया गया
  189. 13:17–13:20कुकि वो समाज के बनाएगे साचो में फिट नहीं बेट्राता
  190. 13:20–13:21ये दरी तो है
  191. 13:21–13:23सच्चाई सामने आने का दर
  192. 13:23–13:27और राजनीती को किस टर से चलाता है, इसका भी स्रोथ में काफी जिक्र है.
  193. 13:27–13:32समाज शास्त्री ती के अमन का एक विष्लेशन इस में दिया गया है,
  194. 13:32–13:37जब गलग मैठली राजनी की मांग। उती, तो उसका विरोद किसी बाहरी ने नहीं,
  195. 13:37–13:41बलकी कुद मैत्ली भाशी कषेत्र के ही अन्नेवर्गोने किया
  196. 13:41–13:43ये बहत जीब लकता है कि
  197. 13:43–13:46कोई अपनी ही बाशा के राजग का विरोद क्यों करेगा
  198. 13:46–13:49किकि वुसर भाशा का राजग नहीं होताना
  199. 13:49–13:52ती के अमन का तरक है कि अन्नेवर्गों कोई ये साप दिक्रा था
  200. 13:52–13:58अगर अलग राज्जे बना, तो राजनीतिक और प्रशास्निक सत्ता उसी उच्छवर के हाथो में चली जाएगी,
  201. 13:58–14:02जिसने साहित्य, वन्शावली और इतिहास पर अपना कबजा कर रखगा है.
  202. 14:02–14:03बिलकुल.
  203. 14:03–14:33यह आप दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल
  204. 14:33–14:38यह अद्वाजाँ, दर्बारियों, और उच्वर्ग के नायकों की चर्चा होती है,
  205. 14:38–14:42वहे समझनतर यह यह यह जगा लोक नायकों लिए.
  206. 14:42–14:43जैसे कि सलहेस.
  207. 14:43–14:47राग, सलहेस जिने तुसाथ समवदाय का रक्षक दिव्टा माना जाता है.
  208. 14:47–14:55दीना भद्द्री जो मुसहर समवदायके नायक ते और जिनों ने बंदुवा मस्दूरी के किलाग लंभी और एतिहासेक लडाय लडी.
  209. 14:55–14:56और लोरीका भी?
  210. 14:56–15:02बिलकुल. आहीर समवदायके वीर नायक लोरीका अगी कताःने सद्दीों से लोगों की जुबान पर थी.
  211. 15:02–15:04खेतो में काम करतेवे गाई जाती थी
  212. 15:04–15:07लेकिन वे कभी अकाद्दमियो के पन्नोपर नहीं चपीं
  213. 15:07–15:12लेकिन देखिए, मोखिक कत्ठाः है समय के साथ खोजाने का खत्रा रकती है
  214. 15:12–15:18इन कताटाओं को इस लोक सहिते को हमेशा किले बचाने का काम आदूनिक तकनिक निक निक या
  215. 15:18–15:20तकनीक ने बहुत बडार रूल निभाया है
  216. 15:20–15:50यह तो जिजटल आन्दोलन शुरू हुए आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आप आप आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ�
  217. 15:50–16:20अद्र बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द
  218. 16:20–16:50यह दूब बश्वादा लिए लिए तुब बवाजा लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लि�
  219. 16:50–16:55जो तर्जद जंडर या किननर समवदाए के संगर्ष और जीवन की बात करता है
  220. 16:55–17:02केक्रा लेल केलो, जो गाहु से शेहरू की तरव हो रहे भेता हाशा पलाएन के दर्थ को सामने रकता है
  221. 17:02–17:05और जग्दीश प्रसाद मन्डल का अपन्यास पंगु
  222. 17:05–17:08जिसे आखिर कार 2021 में जाकर पहचान मिली
  223. 17:08–17:11जो दलितो के संगरष की जमीनी हकीकत को
  224. 17:11–17:13बेना किसी लागल पेट के बयां करता है
  225. 17:13–17:14सही का
  226. 17:14–17:16इसके लावा विभारानी जैसी कई महीला लेखी काए
  227. 17:16–17:19जिने मुख्यदाराने शाएदी कभी गमविर्ता से लिया दा,
  228. 17:19–17:21वे भी अब इस दिजिटल करान्ती के जरिये,
  229. 17:21–17:24अपना साहित्तिजजणजन तक पहुचा रही हैं.
  230. 17:24–17:26और इस दिजिटल फ्यलाव में,
  231. 17:26–17:28एक और बहत महतुपुन बिंदू है,
  232. 17:28–17:30जो नेपाल से जुडा है.
  233. 17:46–17:52जब की हम ने पहले बात की कि निपाल के मलर आजाँ का मैठली के विकास में कितना बड़ा योगदान था
  234. 17:52–17:53यही तो विदंबना है
  235. 17:53–17:59और इसी लिए अब निपाल में भी इस संस्तागत बट्वारे के किलाफ विरोद के सूर उट्रे हैं
  236. 17:59–18:05समवनान्तर इतियास का मानन है, कि साहित्ते और भाशा को दो देशों की सरहदों में नहीं बान्दा जासकता.
  237. 18:05–18:07बलकुल नहीं बान्दा जासकता.
  238. 18:07–18:10तो अगर अम अं सारी कड्यों को जोडें,
  239. 18:10–18:13चर्यापद के रहस्स्सिमै गीतों से लेकर,
  240. 18:13–18:17तिरहुता लिपी के मिटने तक, विद्ध्यापती के विन्योग से लेकर
  241. 18:17–18:19साहित याकादमी की गेट कीपिंक तक,
  242. 18:19–18:22और गंगेश उपाद्याय के चिपे हुए सच से लेकर
  243. 18:22–18:25विदेह के दिजितल विद्रो तक,
  244. 18:25–18:28तो जो तस्वीर उबहरती है, वो बहुती शक्तिषाली है.
  245. 18:28–18:32जियान सर्फ तब मुल्लेवान होता है,
  246. 18:32–18:36जब उसके पीचे की राजनी ती, और उसके सही संदरब को समजा जाए.
  247. 18:36–18:39अपिष्यल इतिहास का फोकस हमेशा राज दरबारों,
  248. 18:39–18:43वन्शावलीों और सत्ता को वेद � thairane pe raha hai.
  249. 18:43–18:45लेकिन ये समानानतर इतिहास,
  250. 18:45–18:47जसा कि स्रोत में कहागया है,
  251. 18:47–18:49दड़कते हुए मानविय दिल की बात करता है.
  252. 18:50–18:52ये उन वन्चितों की आवाज है,
  253. 18:52–18:55जिन उने हर सदी में आपना सच कहने का रास्ता निकाल ही लिया.
  254. 18:55–18:59जब उनके पास कागज नहीं तो उनोने मोखेग गीट गाए
  255. 18:59–19:03और जब उने तकनीक मिली, तो उनोने पूरा कपूरा दिजिटल आरकाइव कडागग गर दिया.
  256. 19:03–19:07चच मे, ये दीब डाएव सर्फ मेठली भाशा की कहानी नहीं है.
  257. 19:07–19:16ये सोचने पर मजबोर करता है, कि जो इतिहास हम सकूलों या कोलेजों की कितावों में पडते है, वो असल में किसने लिखा है.
  258. 19:16–19:17बलकुल?
  259. 19:17–19:23क्यों लिखा है, और उसे भी ज़ोरी सवाल, उस मेंसे किसे जान भूजकर मिता दिया डिया गया है.
  260. 19:23–19:27ये भी के जो मिता दिया दिया दा ता वो कभी पुरी तरा से मरता नहीं एं
  261. 19:28–19:31वो बस एक सही वक्त और सही माद्ध्ध्यम का इंतदार करता है
  262. 19:31–19:34जाने से पहले सुन्नेवालों के लिए एक अईसा विचार है
  263. 19:35–19:37जिस पर गेहराई से सोचा जासकता है
  264. 19:37–19:40ये विचार आजकी चर्चा से ही जन्म लेता है
  265. 19:40–19:44जरा सोचिए अगर एक भाशा और उसकी कोई हुई लिपी को
  266. 19:44–19:48सिझफ यंटनेट और कुछ उच्साही लोगों के जुनून की मददद से
  267. 19:48–19:51दिजितल दुन्या में दुबारा जिन्दा किया जासकता है
  268. 19:51–19:56यह भी बिना किसी सरकारी अकाद्मी के बारी फन्ड यह उनके आश्वर्वाद के,
  269. 19:56–20:01तो बहुविश्य में इं तथाखधिद साहिपे अकाद्मीो की, क्या प्रसांगिक्ता रहे जाएगी?
  270. 20:01–20:05ये वाखे बहुविश्य की आहाथ है, क्या आने वाले दशको में
  271. 20:05–20:09अज़के जेहन सबखर का हिस्ट्सा बनने के लिए जुडे रहने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.

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अग, कल्पना कीजी कि जिस महान कवि की कविता है पीडियो से गाए जारी है, जिसके नाम पर आजज भी चोक-चोराहे बने हुए है, वो आसल में मतलप कोई एक अन्सान थाए नहीं. आच्ठ? एक अन्सान नहीं था? आँ, बलके इतिहास के पन्नो में, दो बिलकुल अलग गलग लोगो को मिलागर एक चेहरा गर दिया गया हो. और वो बी इसले ताकी एक बड़े लोक विद्रोग को सथा के साचे में आसानी से फिट किया जासके. अज तो बज़ाद बादा बादा लगागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागा� अगर दिखार बाद़ा लोग, लोग कताव और दिजिटल क्रान्ती की मददद से उस चिपे हुए सच को बार निकाला. बिलकोल. पर दिखे आगे बडने से पहले एक बाथ सपष्ट करना बहुत जोगी है. आप वो दिस्कलेमर देना सही रहेगा. समआनान्तर इतिहास ने, हाश्विया पर पडे लोगों, लोग कतावं और दिजिटल क्रान्ती की मददत से, उस छिपे हुई सच को बहार निकाला. बिल्कुल. पर दिक्ये आगे बडने से पहले एक बाज स्पष्ट करना बहुत जोरी है. अगर दिस्कलेमर देना सही रहेगा ये श्वोट सामगरी में साहित ये अकादमी पर पक्ष्पात, ब्रामभ़वादी वर्चस्व, और संस्तागत भेदबाव के कई कडे दावे की एगे हैं. तो हम यहां यें राजनीतिक या जातीगद दावो का, ना तो समर्थन कर रहे है, नहीं विरोथ कर रहे हैं. तो दिक्ये इस कहानी की ज़डेना बहुत गेरी हैं अदिकारे के तिहास अकसर कई चीजों को दरकिनार कर देता है स्रोथ के अनसार मैठिली भाशा की उतपती आप्वीं से बारवी शताबदी के भीच मागदी प्राक्रित से हुई ती मागदी प्राक्रित से मागदी प्राक्रिट से हूए ती मागदी प्राक्रिट से अग, लेकिन इसकी सबसे पहली और प्रमानेग जलक हमे चर्या पद में दिखने को मिलती है ये कानापा, और सरहापा जैसे तेइस वज्रेयान सिथों दोड़ा रचे गय, रहेस से मैं गीत हैं अग, मुजे यहां थोडा रुकना होगा. यह सिद आकिर ते कोन? बताता हूँ. और इनका साहिट्य इतना रहेस से मैं कियों ता? की मुख्य दारा के इतिहास ने इसे नजर अंदास करना ही बहतर समजा? देखे ये सिद कोई राज दर्बारो में बैटने लोग नहीं ते ये तो गूमते फिरते भिख्षू थे जो समाजके निचले तबको से आते थे उनहुने अपने गीतों के लिए जान भूचकर संद्या बाशा या तौएलाइट लंबेज के अस्तमाल किया अच्छा त्वालाइत लंगज ये क्या हुती है? सन्द्या बाशा का मतलब है, एक अईसी बाशा, जो ना पूरी तरान से दिन के उजाले जैसी साफ है, और नहीं राद के अंदेरे जैसी चुपी हुए है. औहु. मददब ये एक तर से कुट बंद या कोड़द भाशा थी बिलकुल सही इसे आम जन्ता जो उन सिद्दों के करीब थी वो तो समझ सकती थी लेकिन सत्ता और दरबार के रूदी वादी लोग इसे आसानी से पकड नहीं पाते थे क्या बाते ये उस उमैं के संस्क्रित, वर्च्ष्व, और दार्मिक पाक्श्ण्ड के खिलाद एक बहुद बाशाई बगावद थी ये तो एक तर से अंट्ग्राउंट रीजिटन्स मुम्मिन्ट जैसा लगरे है? मतब सत्ता की नजरों से बचकर अपनी बात कैने का एक शान्दार तरीका. आप बलकल वैसा ही था. तो चली एस को तोडा विस्तार से समझते हैं. सहित سے भी बड़ा मुद्डा मुजे हैं, उस लिपी का लकता है, जिस में ये सब लिखा जारा था. मैंने स्रोत में पडा की, एक हाँजार साल तक मैठली अपनी मुल तिरहुता लिपी में लिखी जाती जाती थी. हाँँजिसे मित लाक्षर भी कैते हैं. सही. लेकिन 20th । सदी में इसे हताखर देवनागरी को अदिकारिग बना दिया गया अब मेरा सवाल यह किसी लिपी को रातो राद कैसे मिताया जासकता यह कोई एक दिन का काम तो नहीं रहा होगा नहीं यह रातो राद बलकुल नहीं हूँ और सच कहुंतो यही समानान्तर इतियाज का सबसे दर्दनाग हिस्चा है जब किसी लिपी को मिताया जातान, तो असल में उस भाशा की द्रिष्श्म्रिती या विज्यल मेमरी को मिताया जाता है विज्यल मेमरी जब स्कूल के ब्लागबोट से त्रहुता गायब होगगग, जब ताई प्रीटर और प्रिंटिंग प्रेस केवल देवनागरी चापने लगे. और सरकारी काम का ज़ेवनागरी में लगा, तो त्रहुता दिरे-दिरे स्थ दार्मिक अनुष्टानो या पुरानी पोठीों तक सिमट कर रहागेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगे� समणान्तर इतिहास कार पिलकुल यही तरक देते हैं इस बदलावने मैठली को एक स्वतन्त्र और प्राचीन भाशा के दरजे से गिराकर उसे बस हिंदी की एक बोली या डालेक्त के रूप में पेश करने का रास्ता साव कर दिया वुद्यपती ताकृर की बात करना चाहूंगी, जो 1350 सी 1450 के भीच्ट का उनका समे था. तो आपकी अपनी स्वतन्तर पहचान दिरे दिंदली पडने लकती है. और अगर लिप्पी और पहचान को इतना दिंदला कर दिया गया, तो जाहर है कि उनलोगों की पहचान भी सुरक्षित नहीं रही होगी, जिनों ले इस भाशा को महान बनाया था. आप बगदागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा दावागा द अग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उ� समनानतर इत्यास का दावा है के एक दुसरे विद्यापती भी थे, जो असल में एक लोग कवी थे. उनोने पदाओली रची और उनोने दरभार की संसक्रित चोडगर आम जन की बाशा देसिल भयना को चुना. देसिल भयना. दिसल भयना दिसल भयना का मतलब है देश की या आम लोगों की मीटी बोली विदेहे मुवमिन ने तो इस वैचारिक फर्क को स्थापित करने किलिए बकाईदा एक सबाल्टन विद्यापती या हाशिये की विद्यापती का एक लोगो तक तेयार किया है आप रे तु क्या हम ये कहर रहे हैं कि इतिहास ने एक विद्रोही लोक कवी और एक दरबारी विध्वान को मिला कर एक ही वेक्ती बना दिया बस इसलिए ता कि उस लोक सहते पर उच्वर अपना दावा पेष कर सके. यह तेखे समानान्तर इतिहाज सीदा सीदा यही इशारा करता है येक तरा का संसक्रितिक विनियोग या कल्ट्रल अप्रुप्रीएशन था असली विद्यापती की महांत संसक्रित के बारी बरकम शब्डो में नहीं थी अग तो केतो और गाँवाँ में गाई जाने वाले गितो में थी यहाँ पर बात आकर सच में बहुत दिल्चास फुजाती है ये एक भाशा के साथ होने वाले खिल्वाड का बहुत बड़ा उदारन है लेकिन कहानी सर्फ सिकुडने की नहीं है ना? अगर अपन सोर्स कोड की देकते हों अगर अपन सोर्स कोड अद जैसे कोई सुफ्ट्वार जिसे हर कोई अपन सोल कर सकता है अपने हिसाप से बड़ल सकता है और कुछ नेया बना सकता है अगर अपन सोर्स कोड बड़े पाँमने पर देखे है जेसे कोई सुफ्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्� अद्री कियो इसका असर तो बंगाल अरसम तक था. श्रोद बताता है कि बंगाल में ब्रज्बूली नाम की एक मिष्रिद भाशा का वेकास हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ ये बाशा एक आज्सा साँस्क्रितिक खजाना ती, जिसे कई अन्ने साँस्क्रितियोंने अपना साहित्ते गडा. लिकिन यहा एक बड़ भड़ विरोदा वास एक, जो बात मुझे कखतक रही है. वो क्या? एक बाशा जो इतनी प्रभावषाली ती, कि नेपाल के राजा उस में नाटक लिक रहे हैं, बंगाल रशम के संट उसे नहीं बहाशाइं गडर रहे हैं, वो बहाशा अपने ही गर में हाँशे पर कैसे दھकिल दिगाई, मतलब एक दोनर बहाशा सिकोड कैसे गए गई. देखे जब किसी बाशा का प्रबाव इतना व्यापक होता ना, तो उस पे निंट्टरन बहुत एहम हो जाता है. बाशा को सिकोडने का काम अकसर लेए संस्ताइ करती है, जो उसके मानक तैकरती है. समज रही हो. जो लोग ये तैखरने की कुर्सी पर बैट्ते हैं, कि क्या शुद हैं, क्या चफेगां, और किसे पुरसकार मिलेगा, वे दिरे-दिरे बाशा की बावन्री तैखे देटें हैं. तो इस सब काहिर मतलप क्या हैं? यही से हम उस फिस्से में प्रवेश करते हैं, ज़ाह संस्तागत भेदबहू और गेट कीपिंकी बात आती है बिलकुड स्रोथ में साहित या अकाद्मी की कार्ये प्रनाली पर गंभी रारोप लगाए गे हैं 1965 में अकाद्मी ने मैठली को मानेता दी लेकिन विनीत उत्पल और आशीश अंचिनार दवारा अगर दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो बवागा दो वागा दो बवागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा दो वागा द तो बागी लोगों के लिए मेडान के दरवाजे कवी नी कुलते? सही कहा इसका एक बड़ा और दुख़द उदारन हरी मोहन जा का है वे कन्यादान और खटर कखा के तरंग जैसी उपन्यासोगे बहुत प्रसिथ दो लोगप्री वेंगे कार थे हरी मोहन जा तो बाखी लोगों के लिए मेडान के दरवाजे कभी नी कुलते? सही कहा इसका एक बड़ा और दुखद उदारन रही मोहन्जा का है वे कन्यादान और कट्र कचा के तरंग जैसी उपन्यासोगे बहुत प्रसिथ तो लोगप्री वेंगेकार थे रही मोहन्जा उनकी किताबे तो गर-गर में पडीजाती थी उनकी श्यली भहड तीची ती आँ और यही उनकी सबसे बडीगल्ती बन गय. उनोने समाज की रूडी वादिता और पाकहन्पर तीखा प्रहार किया था. संस्तागड दाचे को सीदे चुनोती दी थी. अदिजा ये हुए कि उने जान बुचकर अकाद्मी पुरस्कार से दूर रखा गया जिस सालोने पुरस्कार मिल सकता ता अज़ा काथा है कि उस साल अकाद्मीने मेठली में किसी को पुरस्कार ही नी दिया सर्फ इसलिया ता की हरी महुंजा को सम्मानित करने से बचाजा जा सके ये तो उसी विःपी कलब वाली बात होगे जाँ बाउन्सर गेट पर खडे है और सर्फ अपने परिवार वालो या जान पैचान वालो को अंदर जाने देर हैं बिल्खोल और जो लेख्ह कसल में उस पूरी पाटी की जान हैं जिसकी किताभे लोग सबसे जाडा पड़रें उसे कलब से ही बहर निकाल दिया जाता है. इस से एक बहत महत्पून सवाल पडा होता है. ये आदनिक संस्तागत राजनी दी तो है. अगर दूशन पन्जी यानी दाब्बुक तक जाते हैं। ये ब्लागबुक वाला हिस्सा वाखे यी किसी दाख मिस्त्री जैसा है। 2009 में विदेह आन्दोलन ने वन्शावली के कुछ गुप्त रिकोट्स को सरवजनिक कर दिया तो जोगादार नाँगे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बारे नागे बार तो अज़े बी जादावे की जाते थे गवाद वाद वाद हुए ता वाद हूँ तो आजे महान व्यक्ती के जीवन में आजा ख्या जिसे चिपाने की तनी जरूरत पड़गेई. तो देके गुब्थ पनजी रेकोट से ये सच्सामने आया की गंगेष शौपाद्धयाई ने एक चर्म कारिनी यानी निच्ली जाती की महिला से शादी की ती. अच्छा. बिल्कुल! और इसिल्ये संस्तागत इतिहाँस कारों जैसे रमनाज्जा और अन्ने ने जातिगड शुद्द्टा और उच्वर्ग का ब्रहम बनाय रखने किलिए इस सच्चाई को पुरी तरषे दबा दिया? अग! स्रोथ इसे इतिहास की अनर किलिंग कहता है एक महन दार्षनिक के जीवन की सच्चाई को सर्फ इसलिये मार दिया गया कुकि वो समाज के बनाएगे साचो में फिट नहीं बेट्राता ये दरी तो है सच्चाई सामने आने का दर और राजनीती को किस टर से चलाता है, इसका भी स्रोथ में काफी जिक्र है. समाज शास्त्री ती के अमन का एक विष्लेशन इस में दिया गया है, जब गलग मैठली राजनी की मांग। उती, तो उसका विरोद किसी बाहरी ने नहीं, बलकी कुद मैत्ली भाशी कषेत्र के ही अन्नेवर्गोने किया ये बहत जीब लकता है कि कोई अपनी ही बाशा के राजग का विरोद क्यों करेगा किकि वुसर भाशा का राजग नहीं होताना ती के अमन का तरक है कि अन्नेवर्गों कोई ये साप दिक्रा था अगर अलग राज्जे बना, तो राजनीतिक और प्रशास्निक सत्ता उसी उच्छवर के हाथो में चली जाएगी, जिसने साहित्य, वन्शावली और इतिहास पर अपना कबजा कर रखगा है. बिलकुल. यह आप दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल दखेल यह अद्वाजाँ, दर्बारियों, और उच्वर्ग के नायकों की चर्चा होती है, वहे समझनतर यह यह यह जगा लोक नायकों लिए. जैसे कि सलहेस. राग, सलहेस जिने तुसाथ समवदाय का रक्षक दिव्टा माना जाता है. दीना भद्द्री जो मुसहर समवदायके नायक ते और जिनों ने बंदुवा मस्दूरी के किलाग लंभी और एतिहासेक लडाय लडी. और लोरीका भी? बिलकुल. आहीर समवदायके वीर नायक लोरीका अगी कताःने सद्दीों से लोगों की जुबान पर थी. खेतो में काम करतेवे गाई जाती थी लेकिन वे कभी अकाद्दमियो के पन्नोपर नहीं चपीं लेकिन देखिए, मोखिक कत्ठाः है समय के साथ खोजाने का खत्रा रकती है इन कताटाओं को इस लोक सहिते को हमेशा किले बचाने का काम आदूनिक तकनिक निक निक या तकनीक ने बहुत बडार रूल निभाया है यह तो जिजटल आन्दोलन शुरू हुए आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आप आप आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� अद्र बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द बद्द यह दूब बश्वादा लिए लिए तुब बवाजा लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लि� जो तर्जद जंडर या किननर समवदाए के संगर्ष और जीवन की बात करता है केक्रा लेल केलो, जो गाहु से शेहरू की तरव हो रहे भेता हाशा पलाएन के दर्थ को सामने रकता है और जग्दीश प्रसाद मन्डल का अपन्यास पंगु जिसे आखिर कार 2021 में जाकर पहचान मिली जो दलितो के संगरष की जमीनी हकीकत को बेना किसी लागल पेट के बयां करता है सही का इसके लावा विभारानी जैसी कई महीला लेखी काए जिने मुख्यदाराने शाएदी कभी गमविर्ता से लिया दा, वे भी अब इस दिजिटल करान्ती के जरिये, अपना साहित्तिजजणजन तक पहुचा रही हैं. और इस दिजिटल फ्यलाव में, एक और बहत महतुपुन बिंदू है, जो नेपाल से जुडा है. जब की हम ने पहले बात की कि निपाल के मलर आजाँ का मैठली के विकास में कितना बड़ा योगदान था यही तो विदंबना है और इसी लिए अब निपाल में भी इस संस्तागत बट्वारे के किलाफ विरोद के सूर उट्रे हैं समवनान्तर इतियास का मानन है, कि साहित्ते और भाशा को दो देशों की सरहदों में नहीं बान्दा जासकता. बलकुल नहीं बान्दा जासकता. तो अगर अम अं सारी कड्यों को जोडें, चर्यापद के रहस्स्सिमै गीतों से लेकर, तिरहुता लिपी के मिटने तक, विद्ध्यापती के विन्योग से लेकर साहित याकादमी की गेट कीपिंक तक, और गंगेश उपाद्याय के चिपे हुए सच से लेकर विदेह के दिजितल विद्रो तक, तो जो तस्वीर उबहरती है, वो बहुती शक्तिषाली है. जियान सर्फ तब मुल्लेवान होता है, जब उसके पीचे की राजनी ती, और उसके सही संदरब को समजा जाए. अपिष्यल इतिहास का फोकस हमेशा राज दरबारों, वन्शावलीों और सत्ता को वेद � thairane pe raha hai. लेकिन ये समानानतर इतिहास, जसा कि स्रोत में कहागया है, दड़कते हुए मानविय दिल की बात करता है. ये उन वन्चितों की आवाज है, जिन उने हर सदी में आपना सच कहने का रास्ता निकाल ही लिया. जब उनके पास कागज नहीं तो उनोने मोखेग गीट गाए और जब उने तकनीक मिली, तो उनोने पूरा कपूरा दिजिटल आरकाइव कडागग गर दिया. चच मे, ये दीब डाएव सर्फ मेठली भाशा की कहानी नहीं है. ये सोचने पर मजबोर करता है, कि जो इतिहास हम सकूलों या कोलेजों की कितावों में पडते है, वो असल में किसने लिखा है. बलकुल? क्यों लिखा है, और उसे भी ज़ोरी सवाल, उस मेंसे किसे जान भूजकर मिता दिया डिया गया है. ये भी के जो मिता दिया दिया दा ता वो कभी पुरी तरा से मरता नहीं एं वो बस एक सही वक्त और सही माद्ध्ध्यम का इंतदार करता है जाने से पहले सुन्नेवालों के लिए एक अईसा विचार है जिस पर गेहराई से सोचा जासकता है ये विचार आजकी चर्चा से ही जन्म लेता है जरा सोचिए अगर एक भाशा और उसकी कोई हुई लिपी को सिझफ यंटनेट और कुछ उच्साही लोगों के जुनून की मददद से दिजितल दुन्या में दुबारा जिन्दा किया जासकता है यह भी बिना किसी सरकारी अकाद्मी के बारी फन्ड यह उनके आश्वर्वाद के, तो बहुविश्य में इं तथाखधिद साहिपे अकाद्मीो की, क्या प्रसांगिक्ता रहे जाएगी? ये वाखे बहुविश्य की आहाथ है, क्या आने वाले दशको में अज़के जेहन सबखर का हिस्ट्सा बनने के लिए जुडे रहने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.

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