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अरब_से_मिथिला_तक_गजल_का_सफर.mp4

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Part 1 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 1
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  1. 0:00–0:09बालेवुट की फिल्मों और मशूर गानों दाश्षों को तक हमारे दिमाग में एक एक खास तरा की चवी बिटादी है.
  2. 0:09–0:11आ, बलकुल एक बहुती रूडी वादी चवी.
  3. 0:11–0:18सएका. मतलप, हमे-हमें एश्छा यही लकता है कि साखी कोई बहध खुबसुरत महीला होती है,
  4. 0:18–0:20यो मैंगाने में शराब परूसती है
  5. 0:20–0:23जो की अटिहासिक रूप से एक दम गलत है
  6. 0:23–0:26बलकोल, लेकिन क्या हो अगर मैं कहुं
  7. 0:26–0:28कि आस्ली अरभी गजलो में
  8. 0:28–0:30साकी हमेशा एक पूरुष होता था
  9. 0:30–0:35और, जब यही गजल अरब के रेगिस्तानो से सफर करती हुई
  10. 0:35–0:38भी भीहार के मित्ला अंचल तक पूँची
  11. 0:38–0:41तो वो शराब ताडी बन गए
  12. 0:41–0:43और वो साकी पासी बन गया
  13. 0:43–0:46ये सच में बहुत ही अद्बुत सांसक्रति क्यात्र है
  14. 0:46–0:47है ना
  15. 0:47–0:49तो आज के जेहन अद्दियन में
  16. 0:49–0:51हम एक बहुत ही दिल्चस्प
  17. 0:51–0:54अर अद्याँशिक स्रोज समगरी पर चर्चा कर रहे है
  18. 0:54–0:57आशीश अंचिनाहरजी दूरा लिखित पुस्तक
  19. 0:57–1:00मेठली गजलक व्याकरन उएटिहास
  20. 1:00–1:03और ये कोई सादारन किताब नहीं दिखिया
  21. 1:03–1:06ये किताब स्रफ एक काव्यविदा के नियम नहीं बताती है
  22. 1:06–1:08तो फिर इसका मुख्यो देशि क्या है?
  23. 1:08–1:12ये आसल में इस बात का एक यक शान्दार एतियासिक दस्तावीज है
  24. 1:12–1:18कि कैसे कैसे कोई एक कला करूप अपनी भबहगुलिक और सान्सक्रतिक सीमाई पार करता है
  25. 1:18–1:21मतलब एक जग़ से तुस्री जगर डल जाना
  26. 1:21–1:22एक दम सही
  27. 1:22–1:27ये कुछ वैसा ही है, जैसे आप फारस की किसी शान्दार मसजित का बलूप्रिंट लें,
  28. 1:27–1:29लेकिन उसे बनाने के लिए संँमर्मर की जगा,
  29. 1:29–1:33मिदिला की लाल मिट्टी, पकी हुई इटों और भास का अईस्का अईस्तिमाल करे.
  30. 1:33–1:38अरे वाज ये वास्तु कलावाली उप्मा तो बहुती सतीक बहतती है
  31. 1:38–1:41आप खुगी दाचा भले ही विदेशी हो सकता है
  32. 1:41–1:44लेकिन उसकी आत्मा और उसकी खुज्बू पूरी तरा से स्थानिया हो जाती है
  33. 1:44–1:48और लेक्हक ने शुर्वात मही भाद बहुत सपष्ट कर दी है
  34. 1:48–1:50कि ये पुस्तक उन्लोगों के ले ले नहीं है,
  35. 1:50–1:54जो बिना पडे किसी बाद पर बहेस करते हैं.
  36. 1:54–1:56आच्छा, तो ये गंभीर पाटखों के ले हैं.
  37. 1:56–1:57जी भिल्कुल.
  38. 1:57–1:59ये उन गंभीर ग्यान पिपासुमों के लिए है,
  39. 1:59–2:02तो किसी विदा की ज़ों तक ग़ेराई में जाना चाते हैं
  40. 2:02–2:04तो चली है, हम भी ज़ेराई में चलते हैं
  41. 2:04–2:07वं खिल बहरी धाचे को
  42. 2:07–2:09जब हम अपनी जमीं पर उतारते हैं
  43. 2:09–2:12तो सब से पहले उसका नाम करन अपने तरीके से करते हैं
  44. 2:12–2:14है, शुर्वाद तो नाम से होती हैं
  45. 2:14–2:20तो स्रोत में सबसे पहला और सबसे मुखर विवाद इसी बात पर है,
  46. 2:20–2:22किसे गजल कहाजाय या गजल?
  47. 2:22–2:27मतलब अरभी और दू में तो ज़ की दूनी के लिए अखषर की निचे नुक्ता लगा जाता है,
  48. 2:27–2:57अग, ज़ और गज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आ� आ� �
  49. 2:57–3:03गव, या ज़, ज़ ज़ एसे अखषरों के नुक्ता लगाखर उच्चरन करने की प्राक्रितिक परमपरा नहीं है.
  50. 3:03–3:06वहां की वहां की इस तानिया बोली में वो दुनिया है ही नहीं.
  51. 3:06–3:07भिल्कुल!
  52. 3:07–3:10मैठली की अपनी एक अलग मिठास और गुलाई है,
  53. 3:10–3:13तु जब कोई विद्हा आपकी बाशा मे आगे है,
  54. 3:13–3:18तु उसे आपकी बाशा के व्याकरन और उच्चारन के नियमों के सामने जुकना ही होगा.
  55. 3:18–3:19ये तो बहुत यी तार्किग बात है.
  56. 3:19–3:22आप तु अरभी का शब्द जब मैठली मे आता है,
  57. 3:22–3:26तो वो व्याकरनेक और द्हने अत्मक रूप से गजली बन जाता है.
  58. 3:26–3:29नुक्ता हता देना असल में ये गोशना है,
  59. 3:29–3:32कि अब ये विद्धा पराए नहीं रहीं.
  60. 3:32–3:34ये अब हमारी अपनी हो चुकिये.
  61. 3:34–3:36मतलब नाम से ही देसी करन की,
  62. 3:36–3:38एक पक्कि शुर्वात हो गए.
  63. 3:38–3:40अगर दिल्चास्प सफर रहा है
  64. 3:40–3:42तो इसका जन मसल में कहां वा था
  65. 3:42–3:44अम इस याद्रा को समजने किले
  66. 3:44–3:46हमें इसलाम के उदेसे भी पहले के अरब में जाना होगा
  67. 3:46–3:48उस्युख को जाहिलिया या अंद्खार युग कहा जाता है
  68. 3:48–3:50अच्छा अगा जाता
  69. 3:50–3:54विदा मित्ला के केटो और कलियानो तक कैसे पहुज गए?
  70. 3:54–3:57ये एक बोध लंबा और दिल्चास्प सफर रहा है.
  71. 3:57–3:59तो इसका जन मसल में कहां वहा था?
  72. 3:59–4:03इस यात्रा को समझने किले हमें इसलाम के उदे से भी पहले के आरब में जाना होगा.
  73. 4:03–4:08उस्विख को जाहिलिया या अंदकार योग कहा जाता है
  74. 4:08–4:09अच्छा अंदकार योग
  75. 4:09–4:11वहां क्या उता तो उस समे
  76. 4:11–4:13उस समे वहां कबिलाई संसक्रती ती
  77. 4:13–4:15और लोग अपने कबिले के सरदारों
  78. 4:15–4:17या योद्दाओ की प्रष्शन्सा में
  79. 4:17–4:20जो लंबे लंबे गीट गाते ते
  80. 4:20–4:21उने कसीदा कहा जाता ता
  81. 4:21–4:22एक मिनेट
  82. 4:22–4:25तो एक कभीलाई प्रशस्तिगान
  83. 4:25–4:28यानी कसीदा गजल में कैसे बड़ल गया
  84. 4:28–4:31ये दोनो तो बहत अलग विधाए लकती हैं
  85. 4:31–4:34यही पर मानव मनोविग्यान काम करता है
  86. 4:34–4:37देखे कसीदे के शुवात अकसर प्रेम कवरनन से होती थी
  87. 4:37–4:39अच्छा प्रेम प्रसंख से
  88. 4:39–4:41जिसे तश्भीब कहते ते
  89. 4:41–4:44तो जब कसीदे को उसी प्रेम वाले हिससे ने
  90. 4:44–4:47अपना एक �alag, स्वतन्त्र और अदेक विक्तिगत रूब ले लिया
  91. 4:47–4:49तब गजल कजन वहा
  92. 4:49–4:50औरे वा
  93. 4:50–4:52तो इसका को इसके जन दाता भी रहा होगा
  94. 4:52–4:53जी भिलकु
  95. 4:53–4:56इम्रूल कैस नाम के बहुत बड़े अरभी शाहर को
  96. 4:56–4:58गजल कजन दाता माना जाता है
  97. 4:58–5:00तो उनो ने शुर्वात कैसे की थी
  98. 5:00–5:01खलपना गी जे
  99. 5:01–5:03के इस शाहर अपनी प्रेमिका के
  100. 5:17–5:20तरह की खाना बदोश विरह कवीता
  101. 5:20–5:23और प्र अरब से ये फारस कैसे पहुट्ची?
  102. 5:24–5:26जैसे जेसे येसलाम का विस्तार हुए
  103. 5:26–5:29ये विदा एराक और एरान यान यानी फारस पहुट्ची
  104. 5:30–5:32और फारस में तो इसका रुपी बदल गया होगा
  105. 5:32–5:33बलकल बदल गया
  106. 5:33–5:39पारस में रुद की रूमी और हापिस जैसे महान शाएरोने से पूरी तरे से नया आयाम दे दिया.
  107. 5:39–5:41मतला वो नो ने इस में कुछ नया जोड दिया.
  108. 5:41–5:47आँँँ. नो ने सानसारेक विरहे में सूफीवाद, दरषन और रहस्सिवाद को जोड दिया.
  109. 5:47–5:52अब महबुब स्रफ को इनसान नहीं ता, बलके इश्वर का रुब बन गया था.
  110. 5:52–5:55सूफी वाद का प्रभाव, और भारत में ये का बाई?
  111. 5:55–5:58पारस सी ये विदा आमीर खुस्रो के साथ भारत आई.
  112. 5:58–6:28जब गजल मितला पूँची तो वो अरब के खजूर या बजागा पूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
  113. 6:28–6:34या आंगुर की शराब या फारस के प्रतीको के साथ तो मित्ला के लोगो से समवाद नहीं कर सकती थी ना?
  114. 6:34–6:36बलकल नहीं. बलकल नहीं कर सकती थी.
  115. 6:36–6:43मेरा मतलब है मित्ला के एक किसान के लिए आंगुर की शराब का वो सांस्क्रतिक महत्व कैसे हो सकता है,
  116. 6:43–6:45यो किसी इरानी शावर के लिए ता
  117. 6:45–6:50और टीक इसी जगा इस रोट समगरी का सब से शान्दार हिस्वा सामने आता है
  118. 6:50–6:52प्रतीकों का पुरी तरह से दीसी करन
  119. 6:52–6:58आप, क्यों कि गजल में मैए खाने और शराब का तो बहुत बडा प्रतिकात्मक महत्वा है
  120. 6:58–6:59बगड बड़ा महत्व है
  121. 6:59–7:01ये वो जगा मानी जाती है
  122. 7:01–7:02जाए अनसान अपने सानसारिक बन्धनो
  123. 7:02–7:05और जुटे आंकार को बूल कर
  124. 7:05–7:08एक उच अद्धात्मिक अवस्था में पूशता है
  125. 7:08–7:11तो अरभी या उर्दू शाएरी में शराब को मैं कहा जाता है
  126. 7:11–7:12हां
  127. 7:12–7:16लेक्हक आशीश अंचिनार जी ने बध मस्वूथी से ये तर्क दिया है,
  128. 7:16–7:18कि मैत्ली में इसके लिए ताडी शब्द का पर्योग,
  129. 7:18–7:20सबसे सतिक और प्राक्रतिक है.
  130. 7:20–7:23ताडी? ये तो एक देट शब्द है?
  131. 7:23–7:25जी, एक दम जमीनी शब्द.
  132. 7:25–7:31लिकिन स्रोथ में एक जगा एभी बहेस है के अगर देसी नशाही चाही जाही था,
  133. 7:31–7:34तो बहांग शबत का इस्तमाल क्यो नी क्या गया?
  134. 7:34–7:39मितला में तो शिव की पूजा और बहांग का बहुत पूअडना सम्मन्द है?
  135. 7:39–8:09तो बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब
  136. 8:09–8:39और और बवाज़ा दूब बाज़ा पीटागा पीटागा पीटागा दूब बाज़ा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटाग
  137. 8:39–8:40ताडी उतारने काम करता है
  138. 8:41–8:44ये तो एक पूरी की पूरी सान्सक्रितिक शिफ्तिंग हो गए
  139. 8:44–8:47और जैसा के हमने श्रुवात में बात की ती
  140. 8:47–8:49कि साकी मुल्रुप से पूरुष होता था
  141. 8:50–8:54तो ये पासी शबद उस अप इतिहासे क सतीक्ता को भी बनाय रकता है
  142. 8:54–9:01बिल्कुल बनाय रकता है, साकी का ये देसी करन ये साभित करता है के गजल अप किसी महमान की तरह नहीं,
  143. 9:01–9:06बलकी मित्ला की जमीन के एक सबहावेख हिस्से की तरह रही है.
  144. 9:06–9:08या इसके साथ बरतनो के नाम भी बदल गय?
  145. 9:08–9:09आप, बिल्कुल बदल गय.
  146. 9:09–9:12अरभी में जो सुराही मीना के लाती ती
  147. 9:12–9:16मेठली गजल में उसे डाबा, कत्या, या लबनी कहागें
  148. 9:16–9:20अच्छ, ये सब ताडी रक्ने वाले स्थानी एं मिट्टी के वरतन है?
  149. 9:20–9:23जी, और जार है मैं खाना अप पासी खाना या ताडी खाना बन गय?
  150. 9:23–9:27मैं खाने और पासी खाने की ये जमीनी बात तो बहुती दिल्चास्प हैं
  151. 9:27–9:32उम लेकिन गजल की आसल आत्मा है, उम तो शराब नहीं बल की इश्क है
  152. 9:32–9:34आ, इश्क ही उसकी बुन्याद है
  153. 9:34–9:37और जैसा के आपने पहले रुमी और हाफिस का जिक्र किया
  154. 9:37–9:42उम ये इश्क सुफ किसी इनसान से शारी रिक प्रेम की बात तो नहीं है,
  155. 9:42–9:44ये उसे कही अदेक गहरा है.
  156. 9:44–9:48उम ये गजल का सब से गुड़ पहलू है.
  157. 9:48–9:52दिकि गजल में जो इश्क है, वो सुफ इश्के मजाजी,
  158. 9:52–9:54यहनी सानसारिक प्रेम नहीं है.
  159. 9:54–9:55तो फिर क्या है?
  160. 9:55–10:00वो इश्वे हगी की, यहनी इश्वर ये प्रेम की तरव जाने के एक रास्ता है.
  161. 10:01–10:05इस्लाम और सूफी वाद में इस रूहानी इश्ख के साथ मुकाम,
  162. 10:05–10:07यहनी साथस्तर विस्तार से बताए गये हैं.
  163. 10:07–10:11साथस्तर, मतलवे एक सच्चा आशिक वही है,
  164. 10:11–10:15जो इं सातो स्तरों की कद्हिन यात्रा तैकरे हैं
  165. 10:15–10:16बलकोल सेई
  166. 10:16–10:19स्रोथ में उं सातो स्तरों का बहुत बारी की से जिकर हैं
  167. 10:19–10:25अगर मुने समझने की कोशिष करें तो ये एक अई अंसान के मनोविग्यान के चरम पर पोचने की कहानी लकती हैं
  168. 10:25–10:26इसे एसे समझें
  169. 10:26–10:56पहला स्तर है रब, जिस का मतलब है आखरषन, किसी को बस एक नजर देखा और उसकी तरफ खिचाओ मैंसुस हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
  170. 10:56–11:00प्रेम को इक अलगी अद्यात्मिक दिशा में लेजाते हैं ता?
  171. 11:00–11:04जी चोथा स्तर है अकीदत यानी श्रद्धा
  172. 11:04–11:09यहा प्रेमी अपनी महभुभा या इश्वर के प्रती एक गेरा सम्मान में सूस करता हैं
  173. 11:09–11:14फिर आता है इबादत जहां प्रेम पुजा बन जाता हैं
  174. 11:14–11:17और च्टास्तर है जुनून या दीवान्गी
  175. 11:17–11:20जाँ प्रेमी को समाज नीमो
  176. 11:20–11:23या अपनी खुदकी कोई परवान रहती
  177. 11:23–11:25वो पुरी तरासे एक ट्रान्स की स्तिती में होता है
  178. 11:26–11:28और इन सब के बाद आता है
  179. 11:28–11:31सात्मा और सब से अंते मुकाम मुध
  180. 11:31–11:35या सुपी वाद की बाशा में कहें, तो फना.
  181. 11:35–11:39रा, फना. इसका मतलब ये नहीं के शरीर खतम होगया.
  182. 11:39–11:43बलकी इसका अथ है अपने एहंकार, अपनी मैं का पूरी तरा से मिट जाना.
  183. 11:43–11:49मतलब, प्रेमी और प्रेमिका, या आत्मा और परमात्मा के भीच का
  184. 11:49–11:51भर भेद खत्म हो जान.
  185. 11:51–11:51दिलकोल.
  186. 11:52–11:54आप उसी में विलीन हो जाते हैं, जिस से आप प्रेम करते हैं.
  187. 11:54–11:57आप यहां स्रोथ में एक एसा बिंदू आता है,
  188. 11:58–12:00जो सच में दिमाग जग्छोड देता है.
  189. 12:00–12:01वो कुन सा बिंदू?
  190. 12:01–12:02इस पूरे अद्धियन का,
  191. 12:02–12:08अगर ब्याद दियान दे तो ये याट्रा भी उसी तरा आकर्षन यानी सनेह से शूएज़े नुवाव पर खत्मोतीए
  192. 12:08–12:13अर महाभाव थीक वही अवस्ता है जो सूफी वाद में फना है
  193. 12:13–12:14इक दम सहीग
  194. 12:14–12:21अगर आप दियान दे, तो ये यात्रा भी उसी तरा आखर्षन यानी सनेहे से शूरो तीए, और महाभाव पर कब अतीए.
  195. 12:21–12:26और महाभाव थीक वही अवस्ता है, जो सूफी वाद में फना है.
  196. 12:26–12:37इक दम सईए, जहां रादा और क्रिषन इतने एक रूप हो जाते हैं कि रादा कुतको क्रिषन और क्रिषन कुतको रादा समजने लकते हैं, चेतना का पुरी तरह से विले हो जाता हैं.
  197. 12:37–12:40लेकिन क्या ये सर्विक इत्ट्टफाक है
  198. 12:40–12:43कि दू बिलकुल रवग रवग हिस्सो में
  199. 12:43–12:46तू रवग रवग दर्मो में
  200. 12:46–12:48प्रेम के मनोविग्यान को लेकर
  201. 12:48–12:50बलकुल एक जैसा दाचा विखसित हूँँँ
  202. 12:50–12:52ये इसके पीचे कोई अतिहासे कनेक्ष्छन है
  203. 12:52–12:54राव, वोई
  204. 13:07–13:08मुझे ये नहीं पता था?
  205. 13:08–13:10उनका ततकाली नाम दभीर खास था
  206. 13:10–13:12और वो आरभी फारसी भाशा
  207. 13:12–13:15और सूफी दरशन के बहुत बड़े
  208. 13:15–13:16और माननेता प्राप विद्वान थे
  209. 13:16–13:17अच्छा?
  210. 13:17–13:19तो वो पहले से शूफी दरशन जानते थे?
  211. 13:19–13:20जी
  212. 13:20–13:24बाद में जब वो च्यतन ने महाप्रभु के समपरक में आए तो उने अपना जीवन बडल लिया.
  213. 13:25–13:27तो ये सोचना बहुत तारकिक है,
  214. 13:27–13:29कि उनो ने सूफी वाद के फनावाले दर्षन,
  215. 13:29–13:34और बार्दिय भकती परमपरा के दर्षन को एक दूसरे में पिरो दिया हो.
  216. 13:34–13:39ये तो सच्छ में कमाल की बात है, गयान जब बटता है, तो वो दारमिक सीमाय नहीं देकता.
  217. 13:39–13:40बलकल नहीं देकता.
  218. 13:40–13:46ये बहुती खुबसुरत बात है, कि कैसे सूफी संथ और वेशनव भक्त एक ही आद्यात्मिक बाशा बोल रहे थे.
  219. 13:46–13:51अगर गर गजल आत्मा ये पना ये महाभाव है
  220. 13:51–13:55जो रहर नीम रहर सरहत को तोड़कर असीम हुजाना चाहती है
  221. 13:55–13:58तो आम ये कितनी बडी विडंबना है
  222. 13:58–14:01के इस असीम प्रेम को व्यक्त करने के लिए
  223. 14:01–14:03जिस विद्धा का जुनाव किया गया
  224. 14:03–14:09ये कितनी बडी विडंबना है, के इस आसीम प्रेम को विक्त करने के लिए,
  225. 14:09–14:12जिस विद्धा का जुनाव की आगया, यानी गजल,
  226. 14:12–14:16उसका व्याक्रन दून्या के सबसे सच्थ व्याक्रनों बिसे एक है.
  227. 14:16–14:18आँ, ये बात तो है.
  228. 14:18–14:20अच्छा तो गजल का व्याक्रन वो बाशन्द है
  229. 14:20–14:22जी गजल का सक्त व्याक्रन वही बाशन्द है
  230. 14:22–14:24ये उर्जा को बिखरने नहीं देटा
  231. 14:24–14:26बलकि उसे एक लेजर भीम कितर तीखा और असर्दार बना देटा
  232. 14:26–14:28तो इसका बूनियादी देटा
  233. 14:28–14:30तो वहज़ा को बिखरने नहीं देटा
  234. 14:30–14:33बलकी उसे एक लेजर भीम कितरा तीखा और असर्दार बना देटा है
  235. 14:33–14:35तो इसका बुन्यादी धाचा क्या होता है
  236. 14:35–14:38इसका बुन्यादी धाचा शेर पर तिका होता है
  237. 14:38–14:40एक शेर में केवल दो पंक्तिया होती है
  238. 14:40–14:41और
  239. 14:41–14:43ये उर्जा को बिखरने नहीं देता
  240. 14:43–14:47बलकि उसे एक लेजर भीम कितर तीखा और असर्दार बना देता है
  241. 14:47–14:49तो इसका बुन्यादी धाचा क्या होता है
  242. 14:49–14:52इसका बुन्यादी धाचा शेर पर तिका होता है
  243. 14:52–14:55एक शेर में केभल दो पंकतिया होती है
  244. 14:55–14:56और
  245. 14:56–15:26अपन्ती बादगा पर बादगा पर पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बा
  246. 15:26–15:34और मुशायरो में जब दूस्री पंक्ती पर लोग वावा करते है, तो असल में उसी तीर के निशाने पर लगने की डाद हूती है.
  247. 15:34–15:35बिलकुल सही.
  248. 15:35–15:41श्रोथ में गजल की सन्रच्ना को लेकर दो बहुत महतुपों शब्डो का विस्तार से जिक रहे है.
  249. 15:41–15:42विस्तार जिए.
  250. 15:42–15:45गजल का जो सबसे पहला शेर होता है, उदै होने की जगा.
  251. 15:45–15:47और इसकी क्या कासिध होती है?
  252. 15:47–15:53इसकी कासिध है, यह है के इसके दोनो मिस्रों के अंत में, काफ्या और रदीप समान रुब से आता है.
  253. 15:53–15:55और उदै होता है?
  254. 15:55–16:00अगर बवाँदा था है, बवाँदा का अथा है, अगर बवाँदा का अथा है,
  255. 16:00–16:06अगर बवाँदा का अथा है, बवाँदा का अथा है, अगर बवाँदा का अथा है,
  256. 16:06–16:10अगर बवाँदा का अथा है, अगर बवाँदा का अथा है,
  257. 16:10–16:14उसे मक्ता गा जाता है, मक्ता गा अर्थ है कातनी की जगा, या समापन.
  258. 16:14–16:19अं, हम जानते है कि गजल में काफ्या और रदीप का गनित कितना सक्थ होता है,
  259. 16:19–16:26लेकिन मैठली जैसी बाशा में, जाजा शब्दों की लेए और वाक्क्यो की बनावद,
  260. 16:26–16:28उर्दूप फर्षी से बिल्कुल रग है
  261. 16:28–16:32इस जमीन को निभाना कितना मुष्किल रहा होगा
  262. 16:32–16:33बहुत मुष्किल रहा है
  263. 16:33–16:39स्रोथ में में प्यठ्ली गजल के व्याक्रन को लेका रहा एक बहुत फीड़ानी और तीखी बहेस का जिक रहें
  264. 16:39–16:43खाफिया मे ए और येव के प्रेवाद
  265. 16:43–16:46ये विवाद सर्फ वर्तनी का नहीं है
  266. 16:46–16:50ये बाशा की मुल दूनियो और उसकी ज़ों को बचाने का विवाद है
  267. 16:50–16:52तोड़ा विस्तार से समझाए ए
  268. 16:52–16:56देके बहेस ये है कि ज़से एक शबद है जिसे हम को आएल लिकते है
  269. 16:56–17:02ब्राचीन मेठली में एक अपर्योग हूता ज़से आयल, गाय, कायल
  270. 17:02–17:04तु फिर विवाद क्या है
  271. 17:04–17:08मद्धिकाल मे आखर इसके स्थान पर यव का चलन बड़गया
  272. 17:08–17:10ज़से आयल, गाय, कायल
  273. 17:10–17:12लेक्खग ने अपनी किताब में
  274. 17:12–17:18बवद्स्पष्ट और कडा रुक अपनाया है, कि एक प्रेजोगी अदिक प्रामानेक और दन्ने अप्मक रुप से सही है.
  275. 17:18–17:23लेकिन यहा मैं लेकहक के विचार से थोडा असहमत होना चाहूंगी,
  276. 17:23–17:25यहा कम से कम एक सवाल तो उठाना चाहूंगी.
  277. 17:25–17:26जी, बलकल पुछिए.
  278. 17:42–17:47उज़िद नहीं एक पीचे गजल का एक बहुत गेरा विग्यान है
  279. 17:47–17:50जिसे बहर या मीटर कहा जाता है.
  280. 17:50–17:53गजल में शब्दों का वजन नापा जाता है,
  281. 17:53–17:56की कुनसी मात्रा कितनी लंबी खिडचेगी,
  282. 17:56–17:57ये तै होता है.
  283. 17:57–17:59ए एक पूर्न स्वर है,
  284. 17:59–18:01तो आपनी एक स्वतन्त्र मात्रा और दूनी रकता है
  285. 18:02–18:03जबकी यव एक व्यशन है
  286. 18:04–18:04आच्छा
  287. 18:04–18:07तो ए लिखने से स्वर सुर् सूर्षित रहता है
  288. 18:07–18:07बलक्ल
  289. 18:08–18:09जब आप के लिखते हैं
  290. 18:10–18:11तो आप स्वर की मिथास
  291. 18:11–18:13और उसकी सतीक मात्रा
  292. 18:13–18:14को बचारहे होते है
  293. 18:14–18:17जज़ल की बहर में एक दम सही बटती है
  294. 18:17–18:20या का इस्तमाल उस गनित को और
  295. 18:20–18:22धूनी की उस गुलाई को बिगार देता है
  296. 18:22–18:24आप समजी
  297. 18:24–18:27इसलिये लेखख का ये आग्रा बाशा को शुद रकने
  298. 18:27–18:31और गजल के कडे मीटर को सादने के लिए बहुत जरूरी है
  299. 18:31–18:34मतलब ये महेज व्याकरन का निम नहीं है
  300. 18:34–18:37ये गजल के संगीत को बचाने के कोशिष है
  301. 18:37–18:38एक दम सेई
  302. 18:38–18:41और जब बाध संगीत और मीटर की आती है
  303. 18:41–18:45तो किताब में गजल लिखने की ट्रेनिंग का जो हिस्सा है
  304. 18:45–18:48वो मुझे सब से जब ज़ादा रोमान्चित करता है
  305. 18:48–18:50आँ, वो हिस्सा बहुत खास है.
  306. 18:50–18:53मुझे अमेशा लकता ता कि कविता बस दिल से निकलती है
  307. 18:53–18:55और कागस पर उतर आती है.
  308. 18:55–18:59लिकिन यहां तो इसके बाकाएदा रियास की बात की गगे है.
  309. 18:59–19:02गजल के दुनिया में ये रियास बहुत कथोर हूता है.
  310. 19:02–19:05उसके लिए साथी मुशाईरा और तराई मुशाईरा का आयोजन होता है
  311. 19:05–19:07साथी मुशाईरा क्या होता है
  312. 19:07–19:10साथी मुशाईरा गजल सीकने की पहली सीटी है
  313. 19:10–19:13इस में इक आजीब ओगरी नियम होता है
  314. 19:13–19:15की शायर को गजल लिखनी होती है
  315. 19:15–19:18लेकिन उस में शब्दों का कोई अर्थ होना जरूरी नहीं है
  316. 19:18–19:20ये तो बहुत ही अनोखी बात है
  317. 19:20–19:22बिना अर्थ की गजल
  318. 19:23–19:27जब मैंने इस रोत में पडा तो मुझे तुरन्त शास्त्रिय संगीत की यादा गगी
  319. 19:27–19:28अच्छ वो कैसे
  320. 19:28–19:30ये बिलकुल वैसा ही है
  321. 19:30–19:33जेसे शास्त्रिय संगीत सीकते समें
  322. 19:33–19:37गायक सर्फ सारे गामा पा कारियास करता है
  323. 19:37–19:41सारे गामा का अपने अपने कोई शाभदिक अर्ठ तो नहीं होता
  324. 19:41–19:45लेकिन वो गायक के गले की मास पेशियों को तगयार करता है
  325. 19:45–19:47उसके सुरों को पक्का करता है
  326. 19:47–19:49बड़दी खुबसुरत उप्मा एए
  327. 19:49–19:54तो सोथी मुशाईरा भी शायएद शायर के दिमाग की मासपेशीयों को मीटर के लिए तगार तोगा
  328. 19:54–19:55बिलकुड
  329. 19:55–19:58सोथी मुशाईरा शायर की बहर पक्की करता है
  330. 19:58–20:01इसका मकसद सरफ लें, मात्रा
  331. 20:01–20:03और शब्दों के वजन को
  332. 20:03–20:07गज़ल के एकदम सतीक साचे में दहलने की प्रक्तिस करना होता है.
  333. 20:07–20:09और जब सुर पक्का हो जाता है, तब क्या होता है?
  334. 20:09–20:11जब शायर का सुर पक्का हो जाता है,
  335. 20:11–20:14जब उसे मीटर की ना समज में आजाती है,
  336. 20:14–20:16तब वो तरही मुशारा में जाता है.
  337. 20:16–20:19ज़हां उसे एक लैं देदी जाती है
  338. 20:19–20:22आयोजग की तरव से एक पंकती देदी जाती है
  339. 20:22–20:24जिसे तरहे ए विस्रा कैते हैं
  340. 20:24–20:26अप सभी शायरों को उसी पंकती के लै
  341. 20:26–20:29उसके काफिया और रदीप की जमीन पर
  342. 20:29–20:32अपनी अपनी नेगज़ल लिखनी होती है
  343. 20:32–20:34ये तो शायर की अस्ली परिक्षा हूँती हो गी.
  344. 20:34–20:38भिलकुल, कि वो एक तैस उमा के बिटर अपनी कितनी मालेक उडान बर सकता है.
  345. 20:38–20:41लेखव ने इस बात पर बहुत जोर दिया है,
  346. 20:41–20:47कि आज के दोर में जो लोग बिना भेहर या बिना मीटर के कुछ भी लिखकर उसे गजल का नाम दे देटे हैं.
  347. 20:47–20:49उस सहित्ये के सात अन्नियाय है.
  348. 20:49–20:51नियम ज़ोरी है.
  349. 20:51–20:54जी. नियम आप की आजादी को चींते नहीं है.
  350. 20:54–20:57बलके वे उसाजादी को एक असा खुबसुरत आकार देते हैं
  351. 20:57–20:59जो सदींगों तक जिंदा रहे सके.
  352. 20:59–21:01ये एक बहुत ही शचकत विचार है.
  353. 21:01–21:05स्वतन्त्रता और अनुशासन का बहतरीं संटुलन.
  354. 21:05–21:08तो अगर हम इस पूरी चर्चा को समेटें
  355. 21:08–21:12तो आशीश अंचिनार जी की ये किताब
  356. 21:12–21:15मैत्टिली गजलक व्याकरन अईतिहास
  357. 21:15–21:19सर्फ काफ्या रदीप और मात्राउं की इंटी करना नहीं सिकहाती.
  358. 21:19–21:24बलकल नहीं, ये किताब हमें एक बड़ा सांस्क्रितिक पाट पड़ाती है.
  359. 21:24–21:25वो पाट क्या है?
  360. 21:25–21:29ये दिकाती है कि कैसे कला की कोई एक विदा
  361. 21:29–21:32अरब के गरम इतिखास से निकलती है
  362. 21:32–21:36सूफी सन्तों और अवैशनव भक्तों के दर्षन से गुजरती है
  363. 21:36–21:39और अंतत तहा मिखला के ताडे के पेडों
  364. 21:39–21:43और पासी काने की स्थानियता में अपनी गेरी जरने जमा लेती है
  365. 21:43–21:49ये मानव सब्विता के जुडने और एक दूसर को अपनाने का सब सब सुन्दर दारने है
  366. 21:49–21:52तच में ये एक अधबूत यात्रा है
  367. 21:52–21:56और ये हमें ये भी सोचने पर मजबोर करता है
  368. 21:56–21:59की बाशा कितनी लचीली और शक्ती शाली होती है
  369. 21:59–22:04लेकिन इन सब बातो के बीच मेरे दिमाग में एक और विचार गूम रहा है
  370. 22:04–22:04वो क्या?
  371. 22:04–22:07जो मैं श्रोताउ के लिए चोडना चाहूंगी
  372. 22:07–22:09इस पुस्तक में इस बात का भी जिक्र है
  373. 22:09–22:14कैसे लेक्हक ने अपने ब्लोग अंचिनार अखहर के जर ये
  374. 22:14–22:16इंटनेट का बरपूर इस्तमाल करते हुए
  375. 22:16–22:19इस विद्धा को और लोगो तक पहचाया
  376. 22:19–22:21रहा इंटनेट ने बहुत मदद की है
  377. 22:21–22:24तो आज जब हम इस दिजटल युग में जी रहें जहां
  378. 22:24–22:26इंटनेट ने दुनिया की
  379. 22:26–22:29हर भोगोलिक सीमा को मिता दिया है
  380. 22:29–22:37तो क्या आने वाले कल में हमें कोई आईसी नई वेश्विक कावे विद्धा देखने को मिलेगी, जिसकी अपनी कोई सरहद ही नहों?
  381. 22:37–22:39ये तो बविश्षे ही बताएगा
  382. 22:39–22:47अगर बज़िटल दुनिया का नहीं बज़ारा बन चुका है जो बबविश्षका का एक बिलकुल नहीं व्याक्रन लिखेगा
  383. 22:47–22:53जहां शाएद पूरी दुनिया की संसकतिया एक ही समय में एक तुस्रे में गुल मिल रही हूंगी
  384. 22:53–22:56ये सुचने माली बात है

Plain text

बालेवुट की फिल्मों और मशूर गानों दाश्षों को तक हमारे दिमाग में एक एक खास तरा की चवी बिटादी है. आ, बलकुल एक बहुती रूडी वादी चवी. सएका. मतलप, हमे-हमें एश्छा यही लकता है कि साखी कोई बहध खुबसुरत महीला होती है, यो मैंगाने में शराब परूसती है जो की अटिहासिक रूप से एक दम गलत है बलकोल, लेकिन क्या हो अगर मैं कहुं कि आस्ली अरभी गजलो में साकी हमेशा एक पूरुष होता था और, जब यही गजल अरब के रेगिस्तानो से सफर करती हुई भी भीहार के मित्ला अंचल तक पूँची तो वो शराब ताडी बन गए और वो साकी पासी बन गया ये सच में बहुत ही अद्बुत सांसक्रति क्यात्र है है ना तो आज के जेहन अद्दियन में हम एक बहुत ही दिल्चस्प अर अद्याँशिक स्रोज समगरी पर चर्चा कर रहे है आशीश अंचिनाहरजी दूरा लिखित पुस्तक मेठली गजलक व्याकरन उएटिहास और ये कोई सादारन किताब नहीं दिखिया ये किताब स्रफ एक काव्यविदा के नियम नहीं बताती है तो फिर इसका मुख्यो देशि क्या है? ये आसल में इस बात का एक यक शान्दार एतियासिक दस्तावीज है कि कैसे कैसे कोई एक कला करूप अपनी भबहगुलिक और सान्सक्रतिक सीमाई पार करता है मतलब एक जग़ से तुस्री जगर डल जाना एक दम सही ये कुछ वैसा ही है, जैसे आप फारस की किसी शान्दार मसजित का बलूप्रिंट लें, लेकिन उसे बनाने के लिए संँमर्मर की जगा, मिदिला की लाल मिट्टी, पकी हुई इटों और भास का अईस्का अईस्तिमाल करे. अरे वाज ये वास्तु कलावाली उप्मा तो बहुती सतीक बहतती है आप खुगी दाचा भले ही विदेशी हो सकता है लेकिन उसकी आत्मा और उसकी खुज्बू पूरी तरा से स्थानिया हो जाती है और लेक्हक ने शुर्वात मही भाद बहुत सपष्ट कर दी है कि ये पुस्तक उन्लोगों के ले ले नहीं है, जो बिना पडे किसी बाद पर बहेस करते हैं. आच्छा, तो ये गंभीर पाटखों के ले हैं. जी भिल्कुल. ये उन गंभीर ग्यान पिपासुमों के लिए है, तो किसी विदा की ज़ों तक ग़ेराई में जाना चाते हैं तो चली है, हम भी ज़ेराई में चलते हैं वं खिल बहरी धाचे को जब हम अपनी जमीं पर उतारते हैं तो सब से पहले उसका नाम करन अपने तरीके से करते हैं है, शुर्वाद तो नाम से होती हैं तो स्रोत में सबसे पहला और सबसे मुखर विवाद इसी बात पर है, किसे गजल कहाजाय या गजल? मतलब अरभी और दू में तो ज़ की दूनी के लिए अखषर की निचे नुक्ता लगा जाता है, अग, ज़ और गज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आज आ� आ� � गव, या ज़, ज़ ज़ एसे अखषरों के नुक्ता लगाखर उच्चरन करने की प्राक्रितिक परमपरा नहीं है. वहां की वहां की इस तानिया बोली में वो दुनिया है ही नहीं. भिल्कुल! मैठली की अपनी एक अलग मिठास और गुलाई है, तु जब कोई विद्हा आपकी बाशा मे आगे है, तु उसे आपकी बाशा के व्याकरन और उच्चारन के नियमों के सामने जुकना ही होगा. ये तो बहुत यी तार्किग बात है. आप तु अरभी का शब्द जब मैठली मे आता है, तो वो व्याकरनेक और द्हने अत्मक रूप से गजली बन जाता है. नुक्ता हता देना असल में ये गोशना है, कि अब ये विद्धा पराए नहीं रहीं. ये अब हमारी अपनी हो चुकिये. मतलब नाम से ही देसी करन की, एक पक्कि शुर्वात हो गए. अगर दिल्चास्प सफर रहा है तो इसका जन मसल में कहां वा था अम इस याद्रा को समजने किले हमें इसलाम के उदेसे भी पहले के अरब में जाना होगा उस्युख को जाहिलिया या अंद्खार युग कहा जाता है अच्छा अगा जाता विदा मित्ला के केटो और कलियानो तक कैसे पहुज गए? ये एक बोध लंबा और दिल्चास्प सफर रहा है. तो इसका जन मसल में कहां वहा था? इस यात्रा को समझने किले हमें इसलाम के उदे से भी पहले के आरब में जाना होगा. उस्विख को जाहिलिया या अंदकार योग कहा जाता है अच्छा अंदकार योग वहां क्या उता तो उस समे उस समे वहां कबिलाई संसक्रती ती और लोग अपने कबिले के सरदारों या योद्दाओ की प्रष्शन्सा में जो लंबे लंबे गीट गाते ते उने कसीदा कहा जाता ता एक मिनेट तो एक कभीलाई प्रशस्तिगान यानी कसीदा गजल में कैसे बड़ल गया ये दोनो तो बहत अलग विधाए लकती हैं यही पर मानव मनोविग्यान काम करता है देखे कसीदे के शुवात अकसर प्रेम कवरनन से होती थी अच्छा प्रेम प्रसंख से जिसे तश्भीब कहते ते तो जब कसीदे को उसी प्रेम वाले हिससे ने अपना एक �alag, स्वतन्त्र और अदेक विक्तिगत रूब ले लिया तब गजल कजन वहा औरे वा तो इसका को इसके जन दाता भी रहा होगा जी भिलकु इम्रूल कैस नाम के बहुत बड़े अरभी शाहर को गजल कजन दाता माना जाता है तो उनो ने शुर्वात कैसे की थी खलपना गी जे के इस शाहर अपनी प्रेमिका के तरह की खाना बदोश विरह कवीता और प्र अरब से ये फारस कैसे पहुट्ची? जैसे जेसे येसलाम का विस्तार हुए ये विदा एराक और एरान यान यानी फारस पहुट्ची और फारस में तो इसका रुपी बदल गया होगा बलकल बदल गया पारस में रुद की रूमी और हापिस जैसे महान शाएरोने से पूरी तरे से नया आयाम दे दिया. मतला वो नो ने इस में कुछ नया जोड दिया. आँँँ. नो ने सानसारेक विरहे में सूफीवाद, दरषन और रहस्सिवाद को जोड दिया. अब महबुब स्रफ को इनसान नहीं ता, बलके इश्वर का रुब बन गया था. सूफी वाद का प्रभाव, और भारत में ये का बाई? पारस सी ये विदा आमीर खुस्रो के साथ भारत आई. जब गजल मितला पूँची तो वो अरब के खजूर या बजागा पूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� या आंगुर की शराब या फारस के प्रतीको के साथ तो मित्ला के लोगो से समवाद नहीं कर सकती थी ना? बलकल नहीं. बलकल नहीं कर सकती थी. मेरा मतलब है मित्ला के एक किसान के लिए आंगुर की शराब का वो सांस्क्रतिक महत्व कैसे हो सकता है, यो किसी इरानी शावर के लिए ता और टीक इसी जगा इस रोट समगरी का सब से शान्दार हिस्वा सामने आता है प्रतीकों का पुरी तरह से दीसी करन आप, क्यों कि गजल में मैए खाने और शराब का तो बहुत बडा प्रतिकात्मक महत्वा है बगड बड़ा महत्व है ये वो जगा मानी जाती है जाए अनसान अपने सानसारिक बन्धनो और जुटे आंकार को बूल कर एक उच अद्धात्मिक अवस्था में पूशता है तो अरभी या उर्दू शाएरी में शराब को मैं कहा जाता है हां लेक्हक आशीश अंचिनार जी ने बध मस्वूथी से ये तर्क दिया है, कि मैत्ली में इसके लिए ताडी शब्द का पर्योग, सबसे सतिक और प्राक्रतिक है. ताडी? ये तो एक देट शब्द है? जी, एक दम जमीनी शब्द. लिकिन स्रोथ में एक जगा एभी बहेस है के अगर देसी नशाही चाही जाही था, तो बहांग शबत का इस्तमाल क्यो नी क्या गया? मितला में तो शिव की पूजा और बहांग का बहुत पूअडना सम्मन्द है? तो बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब और और बवाज़ा दूब बाज़ा पीटागा पीटागा पीटागा दूब बाज़ा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटागा पीटाग ताडी उतारने काम करता है ये तो एक पूरी की पूरी सान्सक्रितिक शिफ्तिंग हो गए और जैसा के हमने श्रुवात में बात की ती कि साकी मुल्रुप से पूरुष होता था तो ये पासी शबद उस अप इतिहासे क सतीक्ता को भी बनाय रकता है बिल्कुल बनाय रकता है, साकी का ये देसी करन ये साभित करता है के गजल अप किसी महमान की तरह नहीं, बलकी मित्ला की जमीन के एक सबहावेख हिस्से की तरह रही है. या इसके साथ बरतनो के नाम भी बदल गय? आप, बिल्कुल बदल गय. अरभी में जो सुराही मीना के लाती ती मेठली गजल में उसे डाबा, कत्या, या लबनी कहागें अच्छ, ये सब ताडी रक्ने वाले स्थानी एं मिट्टी के वरतन है? जी, और जार है मैं खाना अप पासी खाना या ताडी खाना बन गय? मैं खाने और पासी खाने की ये जमीनी बात तो बहुती दिल्चास्प हैं उम लेकिन गजल की आसल आत्मा है, उम तो शराब नहीं बल की इश्क है आ, इश्क ही उसकी बुन्याद है और जैसा के आपने पहले रुमी और हाफिस का जिक्र किया उम ये इश्क सुफ किसी इनसान से शारी रिक प्रेम की बात तो नहीं है, ये उसे कही अदेक गहरा है. उम ये गजल का सब से गुड़ पहलू है. दिकि गजल में जो इश्क है, वो सुफ इश्के मजाजी, यहनी सानसारिक प्रेम नहीं है. तो फिर क्या है? वो इश्वे हगी की, यहनी इश्वर ये प्रेम की तरव जाने के एक रास्ता है. इस्लाम और सूफी वाद में इस रूहानी इश्ख के साथ मुकाम, यहनी साथस्तर विस्तार से बताए गये हैं. साथस्तर, मतलवे एक सच्चा आशिक वही है, जो इं सातो स्तरों की कद्हिन यात्रा तैकरे हैं बलकोल सेई स्रोथ में उं सातो स्तरों का बहुत बारी की से जिकर हैं अगर मुने समझने की कोशिष करें तो ये एक अई अंसान के मनोविग्यान के चरम पर पोचने की कहानी लकती हैं इसे एसे समझें पहला स्तर है रब, जिस का मतलब है आखरषन, किसी को बस एक नजर देखा और उसकी तरफ खिचाओ मैंसुस हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� प्रेम को इक अलगी अद्यात्मिक दिशा में लेजाते हैं ता? जी चोथा स्तर है अकीदत यानी श्रद्धा यहा प्रेमी अपनी महभुभा या इश्वर के प्रती एक गेरा सम्मान में सूस करता हैं फिर आता है इबादत जहां प्रेम पुजा बन जाता हैं और च्टास्तर है जुनून या दीवान्गी जाँ प्रेमी को समाज नीमो या अपनी खुदकी कोई परवान रहती वो पुरी तरासे एक ट्रान्स की स्तिती में होता है और इन सब के बाद आता है सात्मा और सब से अंते मुकाम मुध या सुपी वाद की बाशा में कहें, तो फना. रा, फना. इसका मतलब ये नहीं के शरीर खतम होगया. बलकी इसका अथ है अपने एहंकार, अपनी मैं का पूरी तरा से मिट जाना. मतलब, प्रेमी और प्रेमिका, या आत्मा और परमात्मा के भीच का भर भेद खत्म हो जान. दिलकोल. आप उसी में विलीन हो जाते हैं, जिस से आप प्रेम करते हैं. आप यहां स्रोथ में एक एसा बिंदू आता है, जो सच में दिमाग जग्छोड देता है. वो कुन सा बिंदू? इस पूरे अद्धियन का, अगर ब्याद दियान दे तो ये याट्रा भी उसी तरा आकर्षन यानी सनेह से शूएज़े नुवाव पर खत्मोतीए अर महाभाव थीक वही अवस्ता है जो सूफी वाद में फना है इक दम सहीग अगर आप दियान दे, तो ये यात्रा भी उसी तरा आखर्षन यानी सनेहे से शूरो तीए, और महाभाव पर कब अतीए. और महाभाव थीक वही अवस्ता है, जो सूफी वाद में फना है. इक दम सईए, जहां रादा और क्रिषन इतने एक रूप हो जाते हैं कि रादा कुतको क्रिषन और क्रिषन कुतको रादा समजने लकते हैं, चेतना का पुरी तरह से विले हो जाता हैं. लेकिन क्या ये सर्विक इत्ट्टफाक है कि दू बिलकुल रवग रवग हिस्सो में तू रवग रवग दर्मो में प्रेम के मनोविग्यान को लेकर बलकुल एक जैसा दाचा विखसित हूँँँ ये इसके पीचे कोई अतिहासे कनेक्ष्छन है राव, वोई मुझे ये नहीं पता था? उनका ततकाली नाम दभीर खास था और वो आरभी फारसी भाशा और सूफी दरशन के बहुत बड़े और माननेता प्राप विद्वान थे अच्छा? तो वो पहले से शूफी दरशन जानते थे? जी बाद में जब वो च्यतन ने महाप्रभु के समपरक में आए तो उने अपना जीवन बडल लिया. तो ये सोचना बहुत तारकिक है, कि उनो ने सूफी वाद के फनावाले दर्षन, और बार्दिय भकती परमपरा के दर्षन को एक दूसरे में पिरो दिया हो. ये तो सच्छ में कमाल की बात है, गयान जब बटता है, तो वो दारमिक सीमाय नहीं देकता. बलकल नहीं देकता. ये बहुती खुबसुरत बात है, कि कैसे सूफी संथ और वेशनव भक्त एक ही आद्यात्मिक बाशा बोल रहे थे. अगर गर गजल आत्मा ये पना ये महाभाव है जो रहर नीम रहर सरहत को तोड़कर असीम हुजाना चाहती है तो आम ये कितनी बडी विडंबना है के इस असीम प्रेम को व्यक्त करने के लिए जिस विद्धा का जुनाव किया गया ये कितनी बडी विडंबना है, के इस आसीम प्रेम को विक्त करने के लिए, जिस विद्धा का जुनाव की आगया, यानी गजल, उसका व्याक्रन दून्या के सबसे सच्थ व्याक्रनों बिसे एक है. आँ, ये बात तो है. अच्छा तो गजल का व्याक्रन वो बाशन्द है जी गजल का सक्त व्याक्रन वही बाशन्द है ये उर्जा को बिखरने नहीं देटा बलकि उसे एक लेजर भीम कितर तीखा और असर्दार बना देटा तो इसका बूनियादी देटा तो वहज़ा को बिखरने नहीं देटा बलकी उसे एक लेजर भीम कितरा तीखा और असर्दार बना देटा है तो इसका बुन्यादी धाचा क्या होता है इसका बुन्यादी धाचा शेर पर तिका होता है एक शेर में केवल दो पंक्तिया होती है और ये उर्जा को बिखरने नहीं देता बलकि उसे एक लेजर भीम कितर तीखा और असर्दार बना देता है तो इसका बुन्यादी धाचा क्या होता है इसका बुन्यादी धाचा शेर पर तिका होता है एक शेर में केभल दो पंकतिया होती है और अपन्ती बादगा पर बादगा पर पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बादगा पर बा और मुशायरो में जब दूस्री पंक्ती पर लोग वावा करते है, तो असल में उसी तीर के निशाने पर लगने की डाद हूती है. बिलकुल सही. श्रोथ में गजल की सन्रच्ना को लेकर दो बहुत महतुपों शब्डो का विस्तार से जिक रहे है. विस्तार जिए. गजल का जो सबसे पहला शेर होता है, उदै होने की जगा. और इसकी क्या कासिध होती है? इसकी कासिध है, यह है के इसके दोनो मिस्रों के अंत में, काफ्या और रदीप समान रुब से आता है. और उदै होता है? अगर बवाँदा था है, बवाँदा का अथा है, अगर बवाँदा का अथा है, अगर बवाँदा का अथा है, बवाँदा का अथा है, अगर बवाँदा का अथा है, अगर बवाँदा का अथा है, अगर बवाँदा का अथा है, उसे मक्ता गा जाता है, मक्ता गा अर्थ है कातनी की जगा, या समापन. अं, हम जानते है कि गजल में काफ्या और रदीप का गनित कितना सक्थ होता है, लेकिन मैठली जैसी बाशा में, जाजा शब्दों की लेए और वाक्क्यो की बनावद, उर्दूप फर्षी से बिल्कुल रग है इस जमीन को निभाना कितना मुष्किल रहा होगा बहुत मुष्किल रहा है स्रोथ में में प्यठ्ली गजल के व्याक्रन को लेका रहा एक बहुत फीड़ानी और तीखी बहेस का जिक रहें खाफिया मे ए और येव के प्रेवाद ये विवाद सर्फ वर्तनी का नहीं है ये बाशा की मुल दूनियो और उसकी ज़ों को बचाने का विवाद है तोड़ा विस्तार से समझाए ए देके बहेस ये है कि ज़से एक शबद है जिसे हम को आएल लिकते है ब्राचीन मेठली में एक अपर्योग हूता ज़से आयल, गाय, कायल तु फिर विवाद क्या है मद्धिकाल मे आखर इसके स्थान पर यव का चलन बड़गया ज़से आयल, गाय, कायल लेक्खग ने अपनी किताब में बवद्स्पष्ट और कडा रुक अपनाया है, कि एक प्रेजोगी अदिक प्रामानेक और दन्ने अप्मक रुप से सही है. लेकिन यहा मैं लेकहक के विचार से थोडा असहमत होना चाहूंगी, यहा कम से कम एक सवाल तो उठाना चाहूंगी. जी, बलकल पुछिए. उज़िद नहीं एक पीचे गजल का एक बहुत गेरा विग्यान है जिसे बहर या मीटर कहा जाता है. गजल में शब्दों का वजन नापा जाता है, की कुनसी मात्रा कितनी लंबी खिडचेगी, ये तै होता है. ए एक पूर्न स्वर है, तो आपनी एक स्वतन्त्र मात्रा और दूनी रकता है जबकी यव एक व्यशन है आच्छा तो ए लिखने से स्वर सुर् सूर्षित रहता है बलक्ल जब आप के लिखते हैं तो आप स्वर की मिथास और उसकी सतीक मात्रा को बचारहे होते है जज़ल की बहर में एक दम सही बटती है या का इस्तमाल उस गनित को और धूनी की उस गुलाई को बिगार देता है आप समजी इसलिये लेखख का ये आग्रा बाशा को शुद रकने और गजल के कडे मीटर को सादने के लिए बहुत जरूरी है मतलब ये महेज व्याकरन का निम नहीं है ये गजल के संगीत को बचाने के कोशिष है एक दम सेई और जब बाध संगीत और मीटर की आती है तो किताब में गजल लिखने की ट्रेनिंग का जो हिस्सा है वो मुझे सब से जब ज़ादा रोमान्चित करता है आँ, वो हिस्सा बहुत खास है. मुझे अमेशा लकता ता कि कविता बस दिल से निकलती है और कागस पर उतर आती है. लिकिन यहां तो इसके बाकाएदा रियास की बात की गगे है. गजल के दुनिया में ये रियास बहुत कथोर हूता है. उसके लिए साथी मुशाईरा और तराई मुशाईरा का आयोजन होता है साथी मुशाईरा क्या होता है साथी मुशाईरा गजल सीकने की पहली सीटी है इस में इक आजीब ओगरी नियम होता है की शायर को गजल लिखनी होती है लेकिन उस में शब्दों का कोई अर्थ होना जरूरी नहीं है ये तो बहुत ही अनोखी बात है बिना अर्थ की गजल जब मैंने इस रोत में पडा तो मुझे तुरन्त शास्त्रिय संगीत की यादा गगी अच्छ वो कैसे ये बिलकुल वैसा ही है जेसे शास्त्रिय संगीत सीकते समें गायक सर्फ सारे गामा पा कारियास करता है सारे गामा का अपने अपने कोई शाभदिक अर्ठ तो नहीं होता लेकिन वो गायक के गले की मास पेशियों को तगयार करता है उसके सुरों को पक्का करता है बड़दी खुबसुरत उप्मा एए तो सोथी मुशाईरा भी शायएद शायर के दिमाग की मासपेशीयों को मीटर के लिए तगार तोगा बिलकुड सोथी मुशाईरा शायर की बहर पक्की करता है इसका मकसद सरफ लें, मात्रा और शब्दों के वजन को गज़ल के एकदम सतीक साचे में दहलने की प्रक्तिस करना होता है. और जब सुर पक्का हो जाता है, तब क्या होता है? जब शायर का सुर पक्का हो जाता है, जब उसे मीटर की ना समज में आजाती है, तब वो तरही मुशारा में जाता है. ज़हां उसे एक लैं देदी जाती है आयोजग की तरव से एक पंकती देदी जाती है जिसे तरहे ए विस्रा कैते हैं अप सभी शायरों को उसी पंकती के लै उसके काफिया और रदीप की जमीन पर अपनी अपनी नेगज़ल लिखनी होती है ये तो शायर की अस्ली परिक्षा हूँती हो गी. भिलकुल, कि वो एक तैस उमा के बिटर अपनी कितनी मालेक उडान बर सकता है. लेखव ने इस बात पर बहुत जोर दिया है, कि आज के दोर में जो लोग बिना भेहर या बिना मीटर के कुछ भी लिखकर उसे गजल का नाम दे देटे हैं. उस सहित्ये के सात अन्नियाय है. नियम ज़ोरी है. जी. नियम आप की आजादी को चींते नहीं है. बलके वे उसाजादी को एक असा खुबसुरत आकार देते हैं जो सदींगों तक जिंदा रहे सके. ये एक बहुत ही शचकत विचार है. स्वतन्त्रता और अनुशासन का बहतरीं संटुलन. तो अगर हम इस पूरी चर्चा को समेटें तो आशीश अंचिनार जी की ये किताब मैत्टिली गजलक व्याकरन अईतिहास सर्फ काफ्या रदीप और मात्राउं की इंटी करना नहीं सिकहाती. बलकल नहीं, ये किताब हमें एक बड़ा सांस्क्रितिक पाट पड़ाती है. वो पाट क्या है? ये दिकाती है कि कैसे कला की कोई एक विदा अरब के गरम इतिखास से निकलती है सूफी सन्तों और अवैशनव भक्तों के दर्षन से गुजरती है और अंतत तहा मिखला के ताडे के पेडों और पासी काने की स्थानियता में अपनी गेरी जरने जमा लेती है ये मानव सब्विता के जुडने और एक दूसर को अपनाने का सब सब सुन्दर दारने है तच में ये एक अधबूत यात्रा है और ये हमें ये भी सोचने पर मजबोर करता है की बाशा कितनी लचीली और शक्ती शाली होती है लेकिन इन सब बातो के बीच मेरे दिमाग में एक और विचार गूम रहा है वो क्या? जो मैं श्रोताउ के लिए चोडना चाहूंगी इस पुस्तक में इस बात का भी जिक्र है कैसे लेक्हक ने अपने ब्लोग अंचिनार अखहर के जर ये इंटनेट का बरपूर इस्तमाल करते हुए इस विद्धा को और लोगो तक पहचाया रहा इंटनेट ने बहुत मदद की है तो आज जब हम इस दिजटल युग में जी रहें जहां इंटनेट ने दुनिया की हर भोगोलिक सीमा को मिता दिया है तो क्या आने वाले कल में हमें कोई आईसी नई वेश्विक कावे विद्धा देखने को मिलेगी, जिसकी अपनी कोई सरहद ही नहों? ये तो बविश्षे ही बताएगा अगर बज़िटल दुनिया का नहीं बज़ारा बन चुका है जो बबविश्षका का एक बिलकुल नहीं व्याक्रन लिखेगा जहां शाएद पूरी दुनिया की संसकतिया एक ही समय में एक तुस्रे में गुल मिल रही हूंगी ये सुचने माली बात है

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