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मैथिलीक_समानान्तर_इतिहास_आ_लुकायल_सत्य.m4a
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- 0:00–0:07तनी विचार करू, जब ऊँ इ कहल जाए जए उव कोनो भाषा की सब समहान कवि
- 0:07–0:11आँ, जगरा नाम पर समुचा साहित्य के क्कता युग तार चे
- 0:11–0:17एक दम, उ असल में कोनो एक वक्ती च्यला ही नहीं, तकन की कहब
- 0:17–0:22बाप्रे, यी सुनी कत आं कोनो भी विवकती आश्चरे में पडी जाएत.
- 0:22–0:30आप, आप, अगी हुए जा कोनो बाशा के सबसे पेग दाशनिक कक जे आस्ली वन्शावली चे न प्रष्ट बूमी.
- 0:30–0:37अग, तक्रा एक ता रहस्यमए उ बलाक बूक में दर्ज का कर सद्यो दरी नुका कर अखल गेल हूए.
- 0:37–0:41जही से समाजक उज उच नीचक विवस्ता चे उ बनल रहे बुजलु.
- 0:41–0:49ये खडम, तजब आजुक आजुक एह नव गण अद्ध्धिन में उ हम आहा खोस ची आहा कपरचित विषे शग्गय चे थी.
- 0:49–0:50नमशकार?
- 0:50–0:55आजुक जे विषे आचे उ मने बहुत संसनी हेज कही च़े ची एक्रा.
- 0:55–1:00सन्सनी के जेही लेल, जे आई हम सब इतिहास के उही पन्ना के पल्टा बजार रहल ची,
- 1:00–1:03जक्रा शाएद कह्यो और सोजा आबई नहीं दिल गिल.
- 1:03–1:10सही कहलू, सादारनतया इतिहासके लोक एक ता सोजा रेखा क्रूप में देखे ची,
- 1:10–1:14जते सब किचु असा असपष्ट अक्रमानुसार होएचे
- 1:14–1:20मुदा जखन सत्ता पह्चान असाहित्य अपस मेटक रावेच्छी
- 1:20–1:23तकन इरेखा उं एक दूदूर बजजेचे
- 1:23–1:26आर उही दूदूर पानी में जे सत्ते चूपल होएचे
- 1:26–1:29उ अगसर अच्टापित कता से बिलकुल अलग होई चे.
- 1:29–1:32तो औही अच्टापित कता के चुनाती देवा के लेल,
- 1:32–1:34आई हमरा लोकनिक सोजा जे स्रोत अची,
- 1:34–1:37उचे गजंद्र ताकुर द्वारा सम्पादित,
- 1:37–1:41उवी देह मेठली साहित्यक समानांतर इतिहास.
- 1:41–1:45जक्रा अग्रेजी में वलुम वान कही सके ची, तोम वान चेई.
- 1:45–1:50इपो थी मात्र किछु पन्नाक संग्र, वा साहित्तेक समाने क्रोनिकल नी चे.
- 1:50–1:54इएक ता सीध प्रतिकार चे, उही इतिहास के विरुद्द.
- 1:54–2:00जक्रा मुख्य दाराक संस्ता सब जैना की साहित त्या अकादमी सद्यों सब पोषेत अविक्र हलत्छी
- 2:01–2:08जक्रा इस्रोत उं सुख्यल मुख्यनाला वर मने अंग्रेजी में कहोता, द्राएड में द्रेन कही तच्ये
- 2:08–2:23द्राएड में द्रेन ये एक ता बबढ़दा रूपक चे जे जे इतिहास हमरा लोकनी के पढ़ावल जैत ची उही मेस जीवन, विद्द्रोज आ आम लोक कषंगरष करस सुखा दिल गे लगे लगे लगे लगे.
- 2:23–2:28इक दम इप उप्छी उही समनान्तर इतिहासक अनवेशन करे तची
- 2:28–2:31जक्रा जानी भुजकर हाश्या पर
- 2:31–2:34मने किनारक अंदकार में दखेल देल गयल
- 2:34–2:36आही में दलित विमर्ष्से लोकः
- 2:36–2:38महिला रच्नाकारक उपेख्षा
- 2:38–2:41नेपालक मल राजा कुदरबार क्मेठिली
- 2:41–2:47आउ आसम से बंगाल दरी पस्रल, मेठिलीक चब्यापक प्रभाव चै, तक्रा समेटल गेल अच्छे.
- 2:47–2:51मुदा एते श्रोता लोकनी के इस पष्ट कर देब निक रहत,
- 2:51–2:55जे हमरा लोकनी काच एते कोनो एक पक्च्लेब नहीं चे.
- 2:55–2:56आख, आख, बilkul nahin.
- 2:56–3:00चाहे उ वामपन ती विचार हुए वादक्षनपन ती
- 3:00–3:04हम सब बस निष्पक श्रूप से श्रोथ में जे आची उक्रा राखी रहल ची
- 3:04–3:07हम सब कोनो राजनितिक दावी के समरत्ह नहीं कर रहल ची
- 3:07–3:09एक दम सही कहलो
- 3:09–3:14तद इतिहासक एज आ एक हाँर सालक लंबा यात्रा चे,
- 3:14–3:16एक रा कोनो दरबारी संस्मरन से नहीं,
- 3:16–3:20बलकी विद्रोज के एक दम श्रूाती बिन्दू से शूरूए ची.
- 3:20–3:22जे बहुत जरूरी चे,
- 3:22–3:25कोनो बाशक श्रूात असल में आम लोकक भीच से हूए चे.
- 3:25–3:55अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अ�
- 3:55–4:00अवाद्र बाशाक शुर्वाती वा खच्च्चा अव्षेश मानी लेल जाएच्चे
- 4:00–4:03ता आहा उकर विद्रोही स्वरके पून रूपें दबादे च्छे
- 4:03–4:08एक दम मुदः समनान्तरी तिवास एकरा अरके नजरी सद देखेच च्छे
- 4:08–4:12माने सिद्दलोकनी की चर्यापद मात्र किछ पुरान गीत नहीं चल
- 4:12–4:13बलकु नहीं
- 4:13–4:19इवो ही समएक संसक्रितक वर्चस्व कर्म कान्द अस समाज्मे जग्डल जातिवाद चल
- 4:19–4:22उकर विरुद एक ता खुजल विद्रोज चल
- 4:22–4:24उसब देसिल बैना में
- 4:24–4:27माने, लोग बाशा मे आपन बात राख हे रहल चला.
- 4:27–4:29रूकु एक मिनेट ले ने ते रूकेची.
- 4:30–4:35श्रोथ मे इसे हो लिखल चे जे इचर्यापद उर संद्याबाशा मे लिखल गल चल.
- 4:35–4:36हा, संद्याबाशा.
- 4:36–4:38इस संद्याबाशा की थेख?
- 4:38–4:40एकर नाम एक उर रहस्स्यमैं की एक च्छे?
- 4:40–4:43संद्या बाशा अर्थात गोदूलिक बाशा.
- 4:43–4:48इएक त अदबुत कोटिंग वगुप्त बाशा चल बुज्लो.
- 4:48–4:51कोटिंग माने अर्थ नुका कर रखबाक लेली.
- 4:51–4:51एक दम.
- 4:51–4:56जिना सन्द्याक समें प्रकाश और अंदार मिलल जुलल रहे चेल,
- 4:56–5:00तैइना एही भाशाक शब्दक दूरा अर्थ होई चल.
- 5:00–5:03बाहरी लोक वा सत्तादारी वर्ग क्लेल,
- 5:03–5:07इस सामाने अद्यात्मिक वा दैनिक जीवना कीजगा का लगे चल.
- 5:07–5:09अख्रा बुजबे नहीं करे जी की भूराल चे
- 5:09–5:11इत माने उ उईना बेल जेना कोनो अंड़ाँँड पंक्रोक संगीत होई चे
- 5:11–5:13पंक्रोक? रहा बहुत नी कुदारन चाही
- 5:13–5:15जे स्ताभी रोग जे लोग एही आंदोलन सजुडल चला
- 5:15–5:17उ च्ट्ता विरोदि होई चल
- 5:18–5:20इ एक प्रकारक भाशिक आवरन चल
- 5:20–5:24जाए सा आम लोग दरी सन्देश से हो पोचाई जाए
- 5:24–5:26आज च्ट्ता दारी वर के बहन को नहीं लागे?
- 5:26–5:29अग, उख्रा भुजबे नहीं करे जी की भार आल चे?
- 5:29–5:31इत माने उएना भेल
- 5:31–5:34जेना कोनो अंदग्राउंड पंक्रोक संगीत होई चे
- 5:34–5:37पंक्रोक? रहाँ बहुत नी कुदारन चेई
- 5:37–5:44जे स्तापित कलासिकल संगीत कडानीमन सब के तोडेत आम लोकक मने सदक कवाज बनेच छे
- 5:44–5:47आजे कर असल मतलप केवल उकर श्रोता बुजे छे
- 5:47–5:51अजगन कोनो भाशा आम लोकक विद्रोक का हत्यार बनी जाएचे तकन सत्ताकी करेचे
- 5:51–5:55सब सब पही ले उकर अवास दबावे के प्रहास करेचे
- 5:55–5:56एकदम करेचे
- 5:56–6:01आएही सा बाशाक संगर्ष मात्र भोली दरी सीमित नहीं रहीगल
- 6:01–6:05अगर आवाज दबावे के प्रैज करेचे
- 6:05–6:06इक दम करेचे
- 6:06–6:11आएही सा भाशाक संगर्ष मात्र भोली दरी सीमित नहींगल
- 6:11–6:14इएक लिपिक संगर्ष में बडलीगेल
- 6:14–6:18इते श्रोत लिपिक राजनीती पर बहत गंभीर विमर्ष करे तची
- 6:18–6:23जेना तिरहुता जक्रा मित्ही लाक्षर से हो कहल जाएद चे
- 6:23–6:29औह धार साल सा शैक्षिक, सांस्क्रितिक आप पनजी प्रबंदख काजलेल प्रेवोग होई च्छल
- 6:29–6:34मुदा वीसम शताबदी में एक रा पाचा दھकेल कव, उ देवनागरी के अपनायोल गेल
- 6:34–6:36आदेवनागरी के लाभी देल गल
- 6:36–6:38मुदा एते हमरा एक ता प्रष्ना पुषे के आची
- 6:38–6:43हमर मतलप चे की तिरहुता लिपी के हताईवा वास्तव में कोनो श़यंत्र चल
- 6:43–6:46आए एक ता सबहविक प्रष्न चे
- 6:46–6:49की इमात्रे एक ता प्रशास्निक सूविदा नहीं बहसके तचे,
- 6:49–6:51माने जक्यखन प्रिंटिंग प्रेस आवी रहल चल,
- 6:51–6:55तक हन देवनागरी के ताइप फेस आसानी से अपलब दचल.
- 6:55–6:57आप ये तरक अकसर दिल जाए ची.
- 6:57–7:00तकी ये एक ता सादारन तकनीकी बदलाव नहीं चल,
- 7:00–7:02जक्रा समानान्तर इतिहास,
- 7:02–7:06बिना मतलप का संसक्रतिक पहचान मेटाभे के सोची समजी प्रयास मानी रहल चल?
- 7:06–7:08ये बहुत नीक प्रष्न अची,
- 7:08–7:12और उं तरक से हो औही समय यही देल गेल चल.
- 7:12–7:17मुदा समणनान्तर इतिहासेक एकर जे विषलिशन करेत चे,
- 7:17–7:20उकर तन्त्र भूजभ बहुत अवश्षक चे.
- 7:20–7:22आचे तन्त्र की चलेकर?
- 7:22–7:26जकन कोनो भाशा के अपना एक ता स्वतन्त्र लिपी होगत चे,
- 7:26–7:28जे ना बंगाली वा उडेया कचे,
- 7:28–7:33ता अखरा देखके एस पष्ट भोजा एख जे एक ता अलक बाशा चे.
- 7:33–7:35आएक ता अलक स्वरूप देखाएख चे.
- 7:35–7:39एक रा उसब विज्वल अदेंटिती वा द्रिष्ष पहचान कहो चती.
- 7:39–7:45देवनागरी के अपनईबासी मैत्लिक एजे दिश्छ पहचानचल उ कतम होगेल
- 7:45–7:47आ, एकर परिनान की भेल
- 7:47–7:51परिनाम एब होगेल जगन मैत्ली देवनागरी में लिखल जाई लागल
- 7:51–7:55तकन दिल्ली वप पतना के जे सत्तादारी वर्ग चल
- 7:55–7:58उनकलेल इे कह बहुत सहज बोगेल
- 7:58–8:01जे इे इतमात्र हिंदीक एकता अशुद द्रूप चे
- 8:01–8:06हा, उसब कहल आगल जे इे इता हिंदीक बोली मात्र चे
- 8:06–8:10लिपी की परिवरतन मैत्ली के सुतन्तर भाशा से
- 8:10–8:14हिंदीक बोली मने डायलेक्त बनाई पर मजबोर का देलक
- 8:14–8:15बाप्रे
- 8:15–8:17और इएतेक प्रभावकारी चल
- 8:17–8:20जे जार्ज ग्रीर्सन जका महान भाशाविद
- 8:20–8:22जे यों लिंविस्टिक सरवे अग आदिया केलनी
- 8:22–8:25औ, औ, अ, अ, अश्शम मेचला
- 8:25–8:28जे मैइतलिक आपन एतेक सम्रद व्याकरन
- 8:28–8:30आजाइत दे रहितों
- 8:30–8:33एक्रा हिंदिक उप्बोली कोना मानल जार हो लग चे?
- 8:33–8:34एक्दम!
- 8:34–8:38मने, यी बदलाओ मात्र प्रेसक के सुविद्धान आई
- 8:38–8:41बलकी एक्ता बाशाक के अपन अदहीं कर वाखे
- 8:41–8:44एक्ता बहुत पैग रद्यार प्रमानित भेल
- 8:44–8:48भूजलू, मने जकन कोना बाशाक पहेरन
- 8:48–8:52उकर उं विज्वल आर्मर चिन लेल जाएचचे
- 8:52–8:57तक्हन उक्रा दोसर भाशाक, छोट भाई मानव, बहुत आसान बोजाएचे
- 8:57–8:58बहुत आसान बोजाएचे
- 8:58–9:00इबहुत खोफनाख चे
- 9:00–9:04मुदा जो सत्ता एतेक शक्ती शाली चल
- 9:04–9:08जे उ तिरहुता जका लिपी के पाचा दखेल सकत चल
- 9:08–9:12तकन हुंका लोकनी मैठलिक सब सा पैग आँकोन
- 9:12–9:13विद्यापती के
- 9:13–9:15रहा विद्यापती केना समभारा लिन
- 9:15–9:18हुंकर लोक गिता एतेक लोक प्रिया चल
- 9:18–9:21जे उक्रा मेकायव असमबव चल
- 9:21–9:26अ आईतही सा एही पोठिक सब से चोंकावे वला दावी सोजा अबईत छे.
- 9:26–9:27की दावी छे?
- 9:27–9:33समानानतर इतिहास कहब छे जे अस्तापित इतिहास कार लोकनी विद्यापती के मितायव नाई
- 9:33–9:35बलकी हुंका उक्लोन का दिलनी.
- 9:35–9:36क्लोन का दिलनी?
- 9:36–9:41आप उनका लोकनी एक नहीं दूटा विद्यापती ताडक दलनी.
- 9:41–9:45चमाकरम, मदा इं हम्रा पच्यवाला बात नहीं लागी रहाला चे.
- 9:45–9:47हम भुजी रहाल ची.
- 9:47–9:50विद्यापती ता मैठिली साहित टिक परयाए च्छतिन,
- 9:50–9:54एकर की प्रमाना ची, जे उ दूटा अलगलग वेक्ती चला?
- 9:54–9:58एता कोनो पैग शर्यंत्र कः सिद्धान्त जकल लागी रहल चे?
- 9:58–10:05इसन्दे गिगदम सो वहविक चे, मुदा स्रोत जही आदार पर इदाभी करे चे, उक्रा गोर से सूनु.
- 10:05–10:07आच्छ? की कहे चे स्रोत?
- 10:07–10:13विदेहक समनानतर इतिहास के अनुसार, जखन आहा विद्ध्यापतिक रचना सब के देखाई ची,
- 10:13–10:17तो उही में उ दूटा एक दम विप्रीत दून्या बेटे चे
- 10:17–10:19दूटा दून्या के ना
- 10:19–10:21एक दिस छतिन विद्यापती तख्कुरा
- 10:21–10:25जे 1350-1435 इस्वि के भीच्छला
- 10:25–10:28उ संस्क्रिता अवहत्तम में पूरुष परिक्षाजा का गरन्त लिखालने
- 10:28–10:30जे दर्वारी ग्रन्त चे
- 10:30–10:32रवारी च्या
- 10:32–10:34परमपरावादी च्या
- 10:34–10:36सम्ब्रान्त वर्गक मान्सिक्ता सब रवारी च्या
- 10:36–10:38आद दूसर दिस
- 10:38–10:40दूसर दिस खतिन उ विद्यापती
- 10:40–10:42जिनका पदावली ले जानल जाए च्या
- 10:42–10:44इप दावली पुनतह देसिल भैना
- 10:44–10:49उन्नतहा देसिल बैना अथात आम लोकक बाशा मे रचल गेल अची
- 10:49–10:50आ अगर विषे वस्तु
- 10:50–10:56इ़चना सव जाति बन्दन से मुक्त चे, विद्रो ही चे, आ एक दम लोक संस्क्रिति से जुरल चे
- 10:56–10:59तसमानानतर इतिहास कतर्क चे जे
- 10:59–11:05जे इस समबहव लेही आची, जे एक गोटेक दरबारी परमपराके उते कटरता से पोषन करई,
- 11:05–11:09संगे संग लोक भाशा मे उते क्रान्तिकारी असच्छन्द गीट से हो लिखाई.
- 11:09–11:15तकी मुख्यदारक इतिहासकार जानी भूजी कई ब्रहम पइदा किलनी, दूनूके मिला दिलनी
- 11:15–11:23समननतर आन्दूलनक मननाई चे, जे हां एक्दम एहनभेल, मुख्यदारक इतिहासकार दूनूके मिला का एक कर दिलनी
- 11:23–11:32मैं, उसब पदावली जे का विद्रोही अ लोक परया लोक गीतक के रच्ना कारक कि सो हो, दर्बारी अ सवरन आवरन पहरादिलनी.
- 11:32–11:43आप, एक रा आप एक आम लोक कविख के दरबारी आ उंपालतू बनावे के प्रयास कै ची, जे इस से हुंकर विद्रोही च्विख के निंद्रित केल जासके.
- 11:43–11:46इता एक तब बहुत पाएक संस्तागत हेर फेर भेल,
- 11:46–11:48जे गीत आम लोक गववेच्छल,
- 11:48–11:51उकर कविक के रास दर्बारक पुषाक पहरा दिल गेल,
- 11:51–11:54जाए से लोक उक्रा सत्ताख लिस्सा माने.
- 11:54–11:57मुदा एक संस्तागत हेर फेर एत टीनेरु के च्य,
- 11:57–12:02पोति में एक तबहुत रहस्से मैं शब्दक प्रेयोग भेल चे उ दूशन पन्जी
- 12:02–12:04आप दूशन पन्जी
- 12:04–12:09जकन हम एनाम सुनलू ता हमरा कोनो जासुसी उपन्यास जका लागल
- 12:09–12:11एक इच है?
- 12:11–12:16आई यी न्याय दर्षनक महान दार्षनिक उं गंगे सुपाद्ध्याय से कोना जुडल चे?
- 12:16–12:21इदूशन पनजी वास्तव में इतिहासक इक ता द्द बलागबुक जका चै.
- 12:21–12:22बलागबुक?
- 12:22–12:28आ, पन्जी प्रबन्द मेठिल समाज में वन्शावलीक एक ता बहुत विवस्तित रिकोड चै,
- 12:28–12:32जकर काज समाज में विवा और जातिक सुद्धात तैकर अप चल.
- 12:32–12:34एकर बहुत महीमा मन्दन भेल चै.
- 12:34–12:39मुदा, एही विवस्ताके भीतर, एक ता दूशन पनजी से हो हो एच्छल,
- 12:39–12:42जही में उसब तत्ध्य दरज हो एच्छल,
- 12:42–12:46जे समाजक नीमके तोडे चल, वाजक्डा दूशित मानल जएच्छल.
- 12:46–12:52आ, गंगेश उपाद्याय, जे तत्व छिन्तामनी जका महान ग्रन्त लिखलनी,
- 12:52–12:54उनकर नाम एही ब्लैक बुक्मे की एक चल?
- 12:54–12:58करन, दूशन पनजी से इटत्छ्यो जागर भेल,
- 12:58–13:01जे उआ गंगेश का विवा, एक टा चर्म कारिनी,
- 13:01–13:04अथा चमार जातिक महला से भेलचल
- 13:04–13:09आखुनकर जन्, उनकर पिताक मरित्तुक पाज साल बाद वेलचल
- 13:09–13:15बाप रे, इदोनो तत्छ उही समबक पित्र सट्तात्मक अग्जातिवादी समाच के पदानुक्रम के
- 13:15–13:18जन से हिलाभे लिलल, काफी च्याए
- 13:18–13:23जे यी बात पंजीनी दर्च चल, ता हम सब एक राजनाइत की अक नहीं चीए.
- 13:23–13:26ये तहीत, इतिहास कारक बूमि का अवेच छे.
- 13:26–13:29रमानन्द जहांजे का संस्तागत इतिहास कार,
- 13:29–13:31जे पंजीक अद्यायन के लिन,
- 13:31–13:34उसब बरसो दरी एही तत्या के चिपे लिन.
- 13:34–14:04जब आप बवाग़ा दाबी प्रश्न चिन लागी जाएत येकर मतलव इचे जे ज्यान आदर्षनक दुन्या में गंगेशक जे इस्ठान चे अख्रा सुरक्षित रक्बाक लेल या कहो जे समाजक उच नीच कर लोकनिक सब स्वाहन दाप्शनिक जे सामाजिक प्रिष्ट भ�
- 14:04–14:06वईटा एक तरक अनर किलिंग भिल
- 14:06–14:08वऐचारी कानर किलिंग
- 14:08–14:11एक ता विचारक कवास्तवेक विरासत के मारी देल गिल
- 14:11–14:14जाही इसा समाजक जुता सम्मान बचल रही है
- 14:14–14:15बलकुल
- 14:15–14:17इवन्शावली मात्र रिकोड नहीं चले
- 14:17–14:19इस सत्ता का हत्यार चल
- 14:19–14:21बद्दा सम्मान बचल रही है?
- 14:21–14:24बलकुल! इवन्शावली मात्र रिकोड नहीं चले
- 14:24–14:27इस सत्ता का हत्यार चल, जक्रा से इदे हुइच्चल
- 14:27–14:31जो उग ककर इ तिहास लिखल जाएत, अग ककर मिता दिल जायत
- 14:31–14:33इबहुत गहरा बाथ चे
- 14:33–14:35मुदा एक ता बात वताव।
- 14:35–14:45अगर अपन गर में अपना केंदर में लोक बाशा के वा आम लोकक अवाजक एते क निर्ममता सब कुछलव वा समब्रान्त बनाईवे के प्रहास भेल
- 14:45–14:49तब इब आशा की के लक की इई चुप्चाम मरीगेल?
- 14:49–14:52नहीं बाशा कही अचुप्चाम नहीं मरेचे
- 14:52–15:00जखन केंदर में बाशापर दबावग़ल, तकनी बाशा अपन सीमा पार कर गलाल, आच्चारो दिस उविस्फोट जेग का पसरीगेल.
- 15:00–15:01माने मित्ला सब बाहर?
- 15:01–15:06आप, एक रा महान प्रवास, वाद ग्रेट डायसपोरा कहल जासकेचे.
- 15:06–15:12तेरहम, चवदम, शताबदिक, बाज्जगन, मित्लापर, बहरी आक्रमड भेल, और जाजनेतिक, अस्तिर्ता आएल.
- 15:12–15:14तो विद्वान लोगनी बहर चिल गेला?
- 15:14–15:19आप, बहुत रास विद्वान, अकलाकार, निपालक, मल राजा का दरबार में शरन लेलनी.
- 15:19–15:23अदे यी मात्र एक ता श्रनारती बाशा बनी कर रोही केल?
- 15:23–15:29एक दम नहीं. निपालक मलराजवन्श, विषेशकर जगत प्रकाश मल अ भुपेंद्र मल,
- 15:29–15:31मेतली के गजजब कषन रक्षन देलनी.
- 15:31–15:33उस अब ता नाटक से हो लिक लन नी? नहीं.
- 15:33–15:39अगई आजुक युग में विआपार, विग्यान, अद्तकनी की लेल अंगरी जी एक ता विष्वव्यापी समपरक बाशा, वाँ लिंवा फ्रंका चे.
- 15:39–15:42उतै मैठली मात्र कोनो पाहुनक भासा नहीं रहल,
- 15:42–15:47बलकी उ रास्दर्बार, कुटनीती, आर रंग मन्चक मुख्य बासा बनी लिएल.
- 15:47–15:49त, इस सबख अर्थ की भिल.
- 15:50–15:52हम एक रा एहीन भुज़े ची,
- 15:52–15:56जे जैना आजुक युग में व्यापार, विग्यान,
- 15:56–16:00अद्तकनी की लेल अंगरी जी एक ता विष्वव्यापी समपरक बाशा
- 16:00–16:02वहु लिंवा फ्रांक का चे
- 16:02–16:03अई ना मेठ्फ्ली सो चल
- 16:03–16:06तैइना चोदामा से सत्रहमा सताबदी में
- 16:06–16:08पूरवी भारत के लेल मेठ्फ्ली
- 16:08–16:11एक ता अंतर राश्ट्री ये समपरक बाशा चल
- 16:11–16:16जे क्रा बज्वाक आर्थ चल जे आहा बहुत सु संस्क्रत आब बवद्धिक ची
- 16:16–16:18इग्दम सदिक तुना चे
- 16:18–16:21आईकर प्रमान आब खर्ट के स्थ नेपाल में नहीं
- 16:21–16:23उ आसम आब भंगाल मे सुहु बेटत
- 16:23–16:24आसम में को ना?
- 16:24–16:26आसम्या मैत्लिक मिष्ष्रन्ट्छल
- 16:26–16:28आप भूजाई चला
- 16:28–16:30जि जा वैश्नाव द्रमक संदेश
- 16:30–16:32जन जन दरी पूँचेबक चे
- 16:32–16:34तम मैत्लिक के औही सांगितिक
- 16:34–16:36आब बोद्टिक प्रभाबक अपनाई परत
- 16:36–16:38आब बंगाल मे सोथद की चोई एहीना भेल चल
- 16:38–16:43तव मेतली के उही सांगित्तिक आब भड्दिक प्रभावाक अपनाई परत्
- 16:43–16:45आब बंगाल मे सोबतत की चोई एही ना भेल चल?
- 16:45–16:50आब बंगाल मे एकर स्वरुप ब्रज्भूली कहलो लाक
- 16:50–16:51ब्रज्भूली?
- 16:51–16:53जैई में गोविंद्दास लिखलनी
- 16:53–16:59अग, गोविंद दास सल्ला कब बहुते पाचा द़़ी रविंदना तैगोर द़री एक रप रभाव रहल.
- 16:59–17:03उत बहनुसिंग कचद्म आम से सिजो लिखले नहीं.
- 17:03–17:08अग, तैगोर स्वयम भहनुसिंग खचद्म आम से ब्रज्बूली में रचना केलनी.
- 17:08–17:14इस प्रमानित करे च्याई जे मेठलीक जे सान्स्क्रतिक पूजी च्याल, उक इते क्याई च्याल
- 17:14–17:19मुदा एते फिर से औही संस्तागत इतिहाँस काज देखा जाएच्छे
- 17:19–17:19उक आना
- 17:19–17:24स्रोत अस्पष्ट रूप से कहे च्याई जे एते क्याई च्याल च्याल
- 17:24–17:28जदे मेत्ली समुचा पूर्वी भारत के जुडी रहल चल
- 17:28–17:29उक्रा हमर इतिहास कार
- 17:29–17:31आपन मानेसकत रहेत रहला
- 17:31–17:32एक दम
- 17:32–17:34संस्तागत इतिहास
- 17:34–17:35एही काल्क्श्डण अक्सर
- 17:35–17:36नेपाली सहित
- 17:36–17:39वबंगाद के वेश्नोव सहित कही का
- 17:39–17:42मेतली के के कर मुखष्रे से वन्चिद करी चाई
- 17:42–17:43जे बहुत दुखर चाई
- 17:43–17:46समानान्तर इतिहासक मुल उद्टेश
- 17:46–17:48एही महान प्रवास के गुरया का अनब
- 17:48–17:52आ एकरा मेतली सहत्यक अबहिन अंगक रूप मैं स्तापिट कर बची
- 17:52–17:55माने, जे भीया मितला मे रूपल गेल
- 17:55–18:03अकर गाच, नेपाल, असम, बंगाल मेपरल, मुदा हमर संस्ता सब उही पल के अपन नहीं मान लेने.
- 18:03–18:05विडमना तो आही चे.
- 18:05–18:10चलू आब हम सब इतिहासक पन्ना से निकली का वर्तमान दिस भुरेच्छी.
- 18:10–18:13राजाक दरबार आब खतम बहुगे लचे.
- 18:13–18:16पन्जिकार वा मल ले राजा अब नहीं चती
- 18:16–18:19तक या इ इस्तिती बदली गेला चे
- 18:19–18:22सथ्ताक सब रूब बदली गेला चे मुदा मान्सिक्ता नहीं
- 18:22–18:27माने आब साहित इक सथ्ता आदूनेक अकाटमे कहात में आबी गेला चे
- 18:27–18:29जीना साहित अकाटमी
- 18:29–18:42और जखन आहा सत्ता कोनो केंदर बनाता है तकन उकर चारू दिस एक ता पहरेदारी वा उ गेट्कीपिंक सुरू बहाजा है च्या इ गेट्कीपिंक का जे पर्दा फाश सुरोत में केल गेल जे उता आखी खूले वाला चे.
- 18:42–18:44र ती आइ सप्खलासा बेल चे.
- 18:44–18:47जि नन्टी प्रतिषत अनुवाद प्रकाशन का काज
- 18:47–18:50सलाकार समेतिक दस सदस्से के
- 18:50–18:52अपन मित्र असम्मन्दी के विटल
- 18:52–18:55ये मात्र आर्थिग भ्रस्टचार नहीं चल
- 18:55–18:57ये वेचारिग भ्रस्टचार चल
- 18:57–18:59उखुना एकर तन्त्र कुना काज करे चल
- 18:59–19:04अन्वाद कोनो भी चेत्रीय बाशाके विष्व से जोडबाक खडगी होई चे
- 19:04–19:08जब मात्र उही लोकक पोठीक अन्वाद भहुर हैल चे
- 19:08–19:10जे सम्ब्रान्त वर्गक चती
- 19:10–19:13वाजे संस्ताक नियमक सेंजले चती
- 19:13–19:16तकन बाहरी दुन्या के इई लागे लगे चे
- 19:16–19:19जे मेठली साहित्ते मात्र ब्रम्हन्वादी
- 19:19–19:22वा परम्परावादी कताग संग्र है.
- 19:22–19:25एक दम आज जे लोग एप परम्पराशे प्रष्नु पुचल चला
- 19:25–19:28हुणका उ चुप्चाब हाश्या पर दھकेल दिलगल.
- 19:28–19:31जेना हरी मोहन्जा कन्यादान.
- 19:31–19:33स्रोद उक्रे उदारन देट अची
- 19:33–19:37इई उपन्यास ब्रम्मणवाद और रूदीवाद पर एक ता कडवा व्यंग चल
- 19:37–19:40समाजक एक ता आईना देखावे चल
- 19:40–19:42आ लोकक भीच बहुत लोके प्रियचल
- 19:42–19:44मुद एक राज जानी भुजी का
- 19:44–19:46अकाद्मी पुरस्कार से वन्चित्रा कहल गेल
- 19:46–19:49माने, जाहा सत्ता के विरुद्ध लिख्वाव
- 19:49–19:51ता आहा के पुरस्कार नहीं बेटाद
- 19:51–19:55और इूपेख्षा मात्र व्यंगय कार दरे सीमित नहीं रहाल
- 19:55–19:59उसर सबाल तुरन अर्थात हाश्यपर रहे वाला समाज
- 19:59–20:03आम महिला साहित्यकारक के तज्यना अद्रिष्य कर देलगेल
- 20:03–20:06आप, स्रोथ में बेचन्ताक। रग्दलेत रग्द्द्रंवाच्चे
- 20:06–20:13उनकर नाटक, मितलाक तथाकतित स्लाप्स्टेक, वाहास्टे नाटके एक ताकरारा थपपडचल
- 20:13–20:17मुदा हुनका मुक्यदाराक इतिहास मे जगा नई भधल
- 20:17–20:21तीक होहे ना उ जग्दीश प्रसाद मन्डल को पन्यास, पंगु
- 20:21–20:26जे निचला तबकाक यधार्त, हुनक मातिक गंद अ संगर्ष देखावे चिये
- 20:26–20:29उकरा लंभा समएद हरी नजर अंदाज केल गेल
- 20:29–20:34जद्देपी बहुत पाचा, 2021 में हुंका पूरसकार भेटलनी,
- 20:34–20:39मुदा बर्शुद हरी हुंका मुख्य विमर सा बाहर राखल गेल.
- 20:39–20:42आम महिला लेखिका किस्तितित औरो कराब चल.
- 20:42–20:48रहा, स्रोथ विभ्भारानी वा सुश्मिता पाथकजका सशक्त लेखिका लोकनेक नाम लेच्छे,
- 20:48–20:51जिनका मुखिदाराक अन्त्लोगी में जगे नी भेटल,
- 20:51–20:57इसब इदेकावे चे जे आदूनिक काल में से हो अकता अद्दिश्ष्पन्जी काज कर रहा लचे,
- 20:57–21:02जे ये तैकरे च्छल, जे के सहित्तेकार चे आक्के अयोग्य.
- 21:02–21:03इक दं!
- 21:03–21:06इसब सुनक बहुत निराशा हूए चे.
- 21:06–21:09मुदा एही विदे है समानानतर इतिहास के,
- 21:09–21:13सबसे नीक बात इचे, जे इ मातर समस्या नहीं गिनावेच छे.
- 21:13–21:15इई एकर प्रतिकार से हु देखावे चे
- 21:15–21:20आ एक प्रतिकार कोनो सडगग पर वा कोनो सेमिनार हाल में नहीं
- 21:20–21:22बलकी अंटरनेट पर भरहल अची
- 21:22–21:26आ और इप प्रतिकार सब से क्रान्तिकारी आची
- 21:26–21:29एक रा हम सब दिजितल क्रान्ति कही सके ची
- 21:29–21:59तो बदेज अनलाईन बद्ब़दाई बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद
- 21:59–22:04अगर अगर अगर दिजितल रूप में आन नहीं जे खरा ख़ा पुटर पडे सकें।
- 22:04–22:11अज़ सब से पएक बात तिरहुता लिपी के यूनी कोर दरी पहुचे बाख्रानती भेल, एकर मतलप की भेल?
- 22:11–22:14एक रा सीदा मतल भी भेल, जे आब कोनो समपादक चोर,
- 22:14–22:17कोनो अकाधमी, वा कोनो पंजिकार,
- 22:17–22:21इदे नहीं कर सकेचे, जे केक्रा पडलनाते अकेक्रान है.
- 22:21–22:27माने, अंटनेट कोनो बाशाके अकर दिजितल सरवबहमिकता दर हल चे.
- 22:27–22:29आप, दिजितल सवरनेटी.
- 22:29–22:34आप शोशित वर्ग वाहाश्या पर राखल लोक अपन कता उ स्वैम कही सकेचते.
- 22:34–22:38कोनो भाशाक भविष्षक लिल, इस सबस जरूरी चे,
- 22:38–22:42जे उकर ग्यान भंडार समुचा विष्वक लिल खुला हुए,
- 22:42–22:45नकी कि चु खास लोक के आल्मारी में बन्द.
- 22:45–22:47ये ज़म सही बाच्चे
- 22:47–22:52तब ये ही विस्त्रित आ आगी खोले वाला चर्चाक उप संगार दिस अबएच्छी
- 22:52–22:55श्रोता लोकनीक यी बुज़ब जरूरी चे
- 22:55–22:58जे यी चर्चा हम्रा लोकनीक के की सिखवगचे
- 22:58–23:02अजगन कोनो व्यक्ती एही ज्यानक व्यापक परी प्रेख्ष्य में भूजछच्य,
- 23:02–23:05तकन इदेखफ सहज भोजगाएच्य,
- 23:05–23:08जे केना सुचनाक नियंद्रन साथ,
- 23:08–23:11अजगन विजेईत शत्तादारी या औही लोग द़्ारा लिखल जाएच्य,
- 23:11–23:16ये सद्यों सा हाश्या पर रहका से हो आपन अवाज बचेवा काम केलनी.
- 23:16–23:20अस समनानतर एतिहास आसल में उही सम्रितिक पुनर निरमाड चे.
- 23:20–23:24आजकन कोनो व्यक्ती एही ज्यानक व्यापक परी प्रेक्ष्श में भुजगच्चे,
- 23:24–23:26तकन इदेखभ सहज भोजआए चे,
- 23:26–23:29जे केना सुचनाक नियंटरन समाजक अकार दैच्छे
- 23:29–23:35रहा, इध हम्रा लोकनिक के अपन वर्तमान पर सोहो गंभिरतास सोचे पर मजबोर करे चे
- 23:35–23:42एक दम, आए ही सोच के आगु बड़ेवत, हम एही चर्चाक अंत एक ता एहन प्रश्नस करे चाहब,
- 23:42–23:46जे एही श्रोट सनिक्लिक का हमरा आहाक दैनिक जीवन सजुडःच्छे
- 23:46–23:46उकी चे
- 23:46–23:49सोचु जम मद्ध्य कालक पनजी कार
- 23:49–23:53वा आदुनिक कालक साहित अकाद्मि आपन हिसाब सा
- 23:53–23:55इतिहासक ब्लाक बुक बना सके चथें
- 23:55–23:59अपन हे साब सां सुचना के नियंत्रित असमपादित कर सके च्छतिन
- 23:59–24:05तकी आजुक एह दिजिटल युग में, जक्रा हम सब एतेक मुक्त मानी रोहल ची,
- 24:05–24:08कोनो नवका पंजिकार नहीं जन मले लक अच्छे.
- 24:08–24:12इबहत खतरनाक प्रष्न ची, कि यो बिग टेक कमपनी सब,
- 24:25–24:27अगला गेहन देहन में फिर कोनो नवका पन्नापल टाएब
Plain text
तनी विचार करू, जब ऊँ इ कहल जाए जए उव कोनो भाषा की सब समहान कवि आँ, जगरा नाम पर समुचा साहित्य के क्कता युग तार चे एक दम, उ असल में कोनो एक वक्ती च्यला ही नहीं, तकन की कहब बाप्रे, यी सुनी कत आं कोनो भी विवकती आश्चरे में पडी जाएत. आप, आप, अगी हुए जा कोनो बाशा के सबसे पेग दाशनिक कक जे आस्ली वन्शावली चे न प्रष्ट बूमी. अग, तक्रा एक ता रहस्यमए उ बलाक बूक में दर्ज का कर सद्यो दरी नुका कर अखल गेल हूए. जही से समाजक उज उच नीचक विवस्ता चे उ बनल रहे बुजलु. ये खडम, तजब आजुक आजुक एह नव गण अद्ध्धिन में उ हम आहा खोस ची आहा कपरचित विषे शग्गय चे थी. नमशकार? आजुक जे विषे आचे उ मने बहुत संसनी हेज कही च़े ची एक्रा. सन्सनी के जेही लेल, जे आई हम सब इतिहास के उही पन्ना के पल्टा बजार रहल ची, जक्रा शाएद कह्यो और सोजा आबई नहीं दिल गिल. सही कहलू, सादारनतया इतिहासके लोक एक ता सोजा रेखा क्रूप में देखे ची, जते सब किचु असा असपष्ट अक्रमानुसार होएचे मुदा जखन सत्ता पह्चान असाहित्य अपस मेटक रावेच्छी तकन इरेखा उं एक दूदूर बजजेचे आर उही दूदूर पानी में जे सत्ते चूपल होएचे उ अगसर अच्टापित कता से बिलकुल अलग होई चे. तो औही अच्टापित कता के चुनाती देवा के लेल, आई हमरा लोकनिक सोजा जे स्रोत अची, उचे गजंद्र ताकुर द्वारा सम्पादित, उवी देह मेठली साहित्यक समानांतर इतिहास. जक्रा अग्रेजी में वलुम वान कही सके ची, तोम वान चेई. इपो थी मात्र किछु पन्नाक संग्र, वा साहित्तेक समाने क्रोनिकल नी चे. इएक ता सीध प्रतिकार चे, उही इतिहास के विरुद्द. जक्रा मुख्य दाराक संस्ता सब जैना की साहित त्या अकादमी सद्यों सब पोषेत अविक्र हलत्छी जक्रा इस्रोत उं सुख्यल मुख्यनाला वर मने अंग्रेजी में कहोता, द्राएड में द्रेन कही तच्ये द्राएड में द्रेन ये एक ता बबढ़दा रूपक चे जे जे इतिहास हमरा लोकनी के पढ़ावल जैत ची उही मेस जीवन, विद्द्रोज आ आम लोक कषंगरष करस सुखा दिल गे लगे लगे लगे लगे. इक दम इप उप्छी उही समनान्तर इतिहासक अनवेशन करे तची जक्रा जानी भुजकर हाश्या पर मने किनारक अंदकार में दखेल देल गयल आही में दलित विमर्ष्से लोकः महिला रच्नाकारक उपेख्षा नेपालक मल राजा कुदरबार क्मेठिली आउ आसम से बंगाल दरी पस्रल, मेठिलीक चब्यापक प्रभाव चै, तक्रा समेटल गेल अच्छे. मुदा एते श्रोता लोकनी के इस पष्ट कर देब निक रहत, जे हमरा लोकनी काच एते कोनो एक पक्च्लेब नहीं चे. आख, आख, बilkul nahin. चाहे उ वामपन ती विचार हुए वादक्षनपन ती हम सब बस निष्पक श्रूप से श्रोथ में जे आची उक्रा राखी रहल ची हम सब कोनो राजनितिक दावी के समरत्ह नहीं कर रहल ची एक दम सही कहलो तद इतिहासक एज आ एक हाँर सालक लंबा यात्रा चे, एक रा कोनो दरबारी संस्मरन से नहीं, बलकी विद्रोज के एक दम श्रूाती बिन्दू से शूरूए ची. जे बहुत जरूरी चे, कोनो बाशक श्रूात असल में आम लोकक भीच से हूए चे. अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अद अ� अवाद्र बाशाक शुर्वाती वा खच्च्चा अव्षेश मानी लेल जाएच्चे ता आहा उकर विद्रोही स्वरके पून रूपें दबादे च्छे एक दम मुदः समनान्तरी तिवास एकरा अरके नजरी सद देखेच च्छे माने सिद्दलोकनी की चर्यापद मात्र किछ पुरान गीत नहीं चल बलकु नहीं इवो ही समएक संसक्रितक वर्चस्व कर्म कान्द अस समाज्मे जग्डल जातिवाद चल उकर विरुद एक ता खुजल विद्रोज चल उसब देसिल बैना में माने, लोग बाशा मे आपन बात राख हे रहल चला. रूकु एक मिनेट ले ने ते रूकेची. श्रोथ मे इसे हो लिखल चे जे इचर्यापद उर संद्याबाशा मे लिखल गल चल. हा, संद्याबाशा. इस संद्याबाशा की थेख? एकर नाम एक उर रहस्स्यमैं की एक च्छे? संद्या बाशा अर्थात गोदूलिक बाशा. इएक त अदबुत कोटिंग वगुप्त बाशा चल बुज्लो. कोटिंग माने अर्थ नुका कर रखबाक लेली. एक दम. जिना सन्द्याक समें प्रकाश और अंदार मिलल जुलल रहे चेल, तैइना एही भाशाक शब्दक दूरा अर्थ होई चल. बाहरी लोक वा सत्तादारी वर्ग क्लेल, इस सामाने अद्यात्मिक वा दैनिक जीवना कीजगा का लगे चल. अख्रा बुजबे नहीं करे जी की भूराल चे इत माने उ उईना बेल जेना कोनो अंड़ाँँड पंक्रोक संगीत होई चे पंक्रोक? रहा बहुत नी कुदारन चाही जे स्ताभी रोग जे लोग एही आंदोलन सजुडल चला उ च्ट्ता विरोदि होई चल इ एक प्रकारक भाशिक आवरन चल जाए सा आम लोग दरी सन्देश से हो पोचाई जाए आज च्ट्ता दारी वर के बहन को नहीं लागे? अग, उख्रा भुजबे नहीं करे जी की भार आल चे? इत माने उएना भेल जेना कोनो अंदग्राउंड पंक्रोक संगीत होई चे पंक्रोक? रहाँ बहुत नी कुदारन चेई जे स्तापित कलासिकल संगीत कडानीमन सब के तोडेत आम लोकक मने सदक कवाज बनेच छे आजे कर असल मतलप केवल उकर श्रोता बुजे छे अजगन कोनो भाशा आम लोकक विद्रोक का हत्यार बनी जाएचे तकन सत्ताकी करेचे सब सब पही ले उकर अवास दबावे के प्रहास करेचे एकदम करेचे आएही सा बाशाक संगर्ष मात्र भोली दरी सीमित नहीं रहीगल अगर आवाज दबावे के प्रैज करेचे इक दम करेचे आएही सा भाशाक संगर्ष मात्र भोली दरी सीमित नहींगल इएक लिपिक संगर्ष में बडलीगेल इते श्रोत लिपिक राजनीती पर बहत गंभीर विमर्ष करे तची जेना तिरहुता जक्रा मित्ही लाक्षर से हो कहल जाएद चे औह धार साल सा शैक्षिक, सांस्क्रितिक आप पनजी प्रबंदख काजलेल प्रेवोग होई च्छल मुदा वीसम शताबदी में एक रा पाचा दھकेल कव, उ देवनागरी के अपनायोल गेल आदेवनागरी के लाभी देल गल मुदा एते हमरा एक ता प्रष्ना पुषे के आची हमर मतलप चे की तिरहुता लिपी के हताईवा वास्तव में कोनो श़यंत्र चल आए एक ता सबहविक प्रष्न चे की इमात्रे एक ता प्रशास्निक सूविदा नहीं बहसके तचे, माने जक्यखन प्रिंटिंग प्रेस आवी रहल चल, तक हन देवनागरी के ताइप फेस आसानी से अपलब दचल. आप ये तरक अकसर दिल जाए ची. तकी ये एक ता सादारन तकनीकी बदलाव नहीं चल, जक्रा समानान्तर इतिहास, बिना मतलप का संसक्रतिक पहचान मेटाभे के सोची समजी प्रयास मानी रहल चल? ये बहुत नीक प्रष्न अची, और उं तरक से हो औही समय यही देल गेल चल. मुदा समणनान्तर इतिहासेक एकर जे विषलिशन करेत चे, उकर तन्त्र भूजभ बहुत अवश्षक चे. आचे तन्त्र की चलेकर? जकन कोनो भाशा के अपना एक ता स्वतन्त्र लिपी होगत चे, जे ना बंगाली वा उडेया कचे, ता अखरा देखके एस पष्ट भोजा एख जे एक ता अलक बाशा चे. आएक ता अलक स्वरूप देखाएख चे. एक रा उसब विज्वल अदेंटिती वा द्रिष्ष पहचान कहो चती. देवनागरी के अपनईबासी मैत्लिक एजे दिश्छ पहचानचल उ कतम होगेल आ, एकर परिनान की भेल परिनाम एब होगेल जगन मैत्ली देवनागरी में लिखल जाई लागल तकन दिल्ली वप पतना के जे सत्तादारी वर्ग चल उनकलेल इे कह बहुत सहज बोगेल जे इे इतमात्र हिंदीक एकता अशुद द्रूप चे हा, उसब कहल आगल जे इे इता हिंदीक बोली मात्र चे लिपी की परिवरतन मैत्ली के सुतन्तर भाशा से हिंदीक बोली मने डायलेक्त बनाई पर मजबोर का देलक बाप्रे और इएतेक प्रभावकारी चल जे जार्ज ग्रीर्सन जका महान भाशाविद जे यों लिंविस्टिक सरवे अग आदिया केलनी औ, औ, अ, अ, अश्शम मेचला जे मैइतलिक आपन एतेक सम्रद व्याकरन आजाइत दे रहितों एक्रा हिंदिक उप्बोली कोना मानल जार हो लग चे? एक्दम! मने, यी बदलाओ मात्र प्रेसक के सुविद्धान आई बलकी एक्ता बाशाक के अपन अदहीं कर वाखे एक्ता बहुत पैग रद्यार प्रमानित भेल भूजलू, मने जकन कोना बाशाक पहेरन उकर उं विज्वल आर्मर चिन लेल जाएचचे तक्हन उक्रा दोसर भाशाक, छोट भाई मानव, बहुत आसान बोजाएचे बहुत आसान बोजाएचे इबहुत खोफनाख चे मुदा जो सत्ता एतेक शक्ती शाली चल जे उ तिरहुता जका लिपी के पाचा दखेल सकत चल तकन हुंका लोकनी मैठलिक सब सा पैग आँकोन विद्यापती के रहा विद्यापती केना समभारा लिन हुंकर लोक गिता एतेक लोक प्रिया चल जे उक्रा मेकायव असमबव चल अ आईतही सा एही पोठिक सब से चोंकावे वला दावी सोजा अबईत छे. की दावी छे? समानानतर इतिहास कहब छे जे अस्तापित इतिहास कार लोकनी विद्यापती के मितायव नाई बलकी हुंका उक्लोन का दिलनी. क्लोन का दिलनी? आप उनका लोकनी एक नहीं दूटा विद्यापती ताडक दलनी. चमाकरम, मदा इं हम्रा पच्यवाला बात नहीं लागी रहाला चे. हम भुजी रहाल ची. विद्यापती ता मैठिली साहित टिक परयाए च्छतिन, एकर की प्रमाना ची, जे उ दूटा अलगलग वेक्ती चला? एता कोनो पैग शर्यंत्र कः सिद्धान्त जकल लागी रहल चे? इसन्दे गिगदम सो वहविक चे, मुदा स्रोत जही आदार पर इदाभी करे चे, उक्रा गोर से सूनु. आच्छ? की कहे चे स्रोत? विदेहक समनानतर इतिहास के अनुसार, जखन आहा विद्ध्यापतिक रचना सब के देखाई ची, तो उही में उ दूटा एक दम विप्रीत दून्या बेटे चे दूटा दून्या के ना एक दिस छतिन विद्यापती तख्कुरा जे 1350-1435 इस्वि के भीच्छला उ संस्क्रिता अवहत्तम में पूरुष परिक्षाजा का गरन्त लिखालने जे दर्वारी ग्रन्त चे रवारी च्या परमपरावादी च्या सम्ब्रान्त वर्गक मान्सिक्ता सब रवारी च्या आद दूसर दिस दूसर दिस खतिन उ विद्यापती जिनका पदावली ले जानल जाए च्या इप दावली पुनतह देसिल भैना उन्नतहा देसिल बैना अथात आम लोकक बाशा मे रचल गेल अची आ अगर विषे वस्तु इ़चना सव जाति बन्दन से मुक्त चे, विद्रो ही चे, आ एक दम लोक संस्क्रिति से जुरल चे तसमानानतर इतिहास कतर्क चे जे जे इस समबहव लेही आची, जे एक गोटेक दरबारी परमपराके उते कटरता से पोषन करई, संगे संग लोक भाशा मे उते क्रान्तिकारी असच्छन्द गीट से हो लिखाई. तकी मुख्यदारक इतिहासकार जानी भूजी कई ब्रहम पइदा किलनी, दूनूके मिला दिलनी समननतर आन्दूलनक मननाई चे, जे हां एक्दम एहनभेल, मुख्यदारक इतिहासकार दूनूके मिला का एक कर दिलनी मैं, उसब पदावली जे का विद्रोही अ लोक परया लोक गीतक के रच्ना कारक कि सो हो, दर्बारी अ सवरन आवरन पहरादिलनी. आप, एक रा आप एक आम लोक कविख के दरबारी आ उंपालतू बनावे के प्रयास कै ची, जे इस से हुंकर विद्रोही च्विख के निंद्रित केल जासके. इता एक तब बहुत पाएक संस्तागत हेर फेर भेल, जे गीत आम लोक गववेच्छल, उकर कविक के रास दर्बारक पुषाक पहरा दिल गेल, जाए से लोक उक्रा सत्ताख लिस्सा माने. मुदा एक संस्तागत हेर फेर एत टीनेरु के च्य, पोति में एक तबहुत रहस्से मैं शब्दक प्रेयोग भेल चे उ दूशन पन्जी आप दूशन पन्जी जकन हम एनाम सुनलू ता हमरा कोनो जासुसी उपन्यास जका लागल एक इच है? आई यी न्याय दर्षनक महान दार्षनिक उं गंगे सुपाद्ध्याय से कोना जुडल चे? इदूशन पनजी वास्तव में इतिहासक इक ता द्द बलागबुक जका चै. बलागबुक? आ, पन्जी प्रबन्द मेठिल समाज में वन्शावलीक एक ता बहुत विवस्तित रिकोड चै, जकर काज समाज में विवा और जातिक सुद्धात तैकर अप चल. एकर बहुत महीमा मन्दन भेल चै. मुदा, एही विवस्ताके भीतर, एक ता दूशन पनजी से हो हो एच्छल, जही में उसब तत्ध्य दरज हो एच्छल, जे समाजक नीमके तोडे चल, वाजक्डा दूशित मानल जएच्छल. आ, गंगेश उपाद्याय, जे तत्व छिन्तामनी जका महान ग्रन्त लिखलनी, उनकर नाम एही ब्लैक बुक्मे की एक चल? करन, दूशन पनजी से इटत्छ्यो जागर भेल, जे उआ गंगेश का विवा, एक टा चर्म कारिनी, अथा चमार जातिक महला से भेलचल आखुनकर जन्, उनकर पिताक मरित्तुक पाज साल बाद वेलचल बाप रे, इदोनो तत्छ उही समबक पित्र सट्तात्मक अग्जातिवादी समाच के पदानुक्रम के जन से हिलाभे लिलल, काफी च्याए जे यी बात पंजीनी दर्च चल, ता हम सब एक राजनाइत की अक नहीं चीए. ये तहीत, इतिहास कारक बूमि का अवेच छे. रमानन्द जहांजे का संस्तागत इतिहास कार, जे पंजीक अद्यायन के लिन, उसब बरसो दरी एही तत्या के चिपे लिन. जब आप बवाग़ा दाबी प्रश्न चिन लागी जाएत येकर मतलव इचे जे ज्यान आदर्षनक दुन्या में गंगेशक जे इस्ठान चे अख्रा सुरक्षित रक्बाक लेल या कहो जे समाजक उच नीच कर लोकनिक सब स्वाहन दाप्शनिक जे सामाजिक प्रिष्ट भ� वईटा एक तरक अनर किलिंग भिल वऐचारी कानर किलिंग एक ता विचारक कवास्तवेक विरासत के मारी देल गिल जाही इसा समाजक जुता सम्मान बचल रही है बलकुल इवन्शावली मात्र रिकोड नहीं चले इस सत्ता का हत्यार चल बद्दा सम्मान बचल रही है? बलकुल! इवन्शावली मात्र रिकोड नहीं चले इस सत्ता का हत्यार चल, जक्रा से इदे हुइच्चल जो उग ककर इ तिहास लिखल जाएत, अग ककर मिता दिल जायत इबहुत गहरा बाथ चे मुदा एक ता बात वताव। अगर अपन गर में अपना केंदर में लोक बाशा के वा आम लोकक अवाजक एते क निर्ममता सब कुछलव वा समब्रान्त बनाईवे के प्रहास भेल तब इब आशा की के लक की इई चुप्चाम मरीगेल? नहीं बाशा कही अचुप्चाम नहीं मरेचे जखन केंदर में बाशापर दबावग़ल, तकनी बाशा अपन सीमा पार कर गलाल, आच्चारो दिस उविस्फोट जेग का पसरीगेल. माने मित्ला सब बाहर? आप, एक रा महान प्रवास, वाद ग्रेट डायसपोरा कहल जासकेचे. तेरहम, चवदम, शताबदिक, बाज्जगन, मित्लापर, बहरी आक्रमड भेल, और जाजनेतिक, अस्तिर्ता आएल. तो विद्वान लोगनी बहर चिल गेला? आप, बहुत रास विद्वान, अकलाकार, निपालक, मल राजा का दरबार में शरन लेलनी. अदे यी मात्र एक ता श्रनारती बाशा बनी कर रोही केल? एक दम नहीं. निपालक मलराजवन्श, विषेशकर जगत प्रकाश मल अ भुपेंद्र मल, मेतली के गजजब कषन रक्षन देलनी. उस अब ता नाटक से हो लिक लन नी? नहीं. अगई आजुक युग में विआपार, विग्यान, अद्तकनी की लेल अंगरी जी एक ता विष्वव्यापी समपरक बाशा, वाँ लिंवा फ्रंका चे. उतै मैठली मात्र कोनो पाहुनक भासा नहीं रहल, बलकी उ रास्दर्बार, कुटनीती, आर रंग मन्चक मुख्य बासा बनी लिएल. त, इस सबख अर्थ की भिल. हम एक रा एहीन भुज़े ची, जे जैना आजुक युग में व्यापार, विग्यान, अद्तकनी की लेल अंगरी जी एक ता विष्वव्यापी समपरक बाशा वहु लिंवा फ्रांक का चे अई ना मेठ्फ्ली सो चल तैइना चोदामा से सत्रहमा सताबदी में पूरवी भारत के लेल मेठ्फ्ली एक ता अंतर राश्ट्री ये समपरक बाशा चल जे क्रा बज्वाक आर्थ चल जे आहा बहुत सु संस्क्रत आब बवद्धिक ची इग्दम सदिक तुना चे आईकर प्रमान आब खर्ट के स्थ नेपाल में नहीं उ आसम आब भंगाल मे सुहु बेटत आसम में को ना? आसम्या मैत्लिक मिष्ष्रन्ट्छल आप भूजाई चला जि जा वैश्नाव द्रमक संदेश जन जन दरी पूँचेबक चे तम मैत्लिक के औही सांगितिक आब बोद्टिक प्रभाबक अपनाई परत आब बंगाल मे सोथद की चोई एहीना भेल चल तव मेतली के उही सांगित्तिक आब भड्दिक प्रभावाक अपनाई परत् आब बंगाल मे सोबतत की चोई एही ना भेल चल? आब बंगाल मे एकर स्वरुप ब्रज्भूली कहलो लाक ब्रज्भूली? जैई में गोविंद्दास लिखलनी अग, गोविंद दास सल्ला कब बहुते पाचा द़़ी रविंदना तैगोर द़री एक रप रभाव रहल. उत बहनुसिंग कचद्म आम से सिजो लिखले नहीं. अग, तैगोर स्वयम भहनुसिंग खचद्म आम से ब्रज्बूली में रचना केलनी. इस प्रमानित करे च्याई जे मेठलीक जे सान्स्क्रतिक पूजी च्याल, उक इते क्याई च्याल मुदा एते फिर से औही संस्तागत इतिहाँस काज देखा जाएच्छे उक आना स्रोत अस्पष्ट रूप से कहे च्याई जे एते क्याई च्याल च्याल जदे मेत्ली समुचा पूर्वी भारत के जुडी रहल चल उक्रा हमर इतिहास कार आपन मानेसकत रहेत रहला एक दम संस्तागत इतिहास एही काल्क्श्डण अक्सर नेपाली सहित वबंगाद के वेश्नोव सहित कही का मेतली के के कर मुखष्रे से वन्चिद करी चाई जे बहुत दुखर चाई समानान्तर इतिहासक मुल उद्टेश एही महान प्रवास के गुरया का अनब आ एकरा मेतली सहत्यक अबहिन अंगक रूप मैं स्तापिट कर बची माने, जे भीया मितला मे रूपल गेल अकर गाच, नेपाल, असम, बंगाल मेपरल, मुदा हमर संस्ता सब उही पल के अपन नहीं मान लेने. विडमना तो आही चे. चलू आब हम सब इतिहासक पन्ना से निकली का वर्तमान दिस भुरेच्छी. राजाक दरबार आब खतम बहुगे लचे. पन्जिकार वा मल ले राजा अब नहीं चती तक या इ इस्तिती बदली गेला चे सथ्ताक सब रूब बदली गेला चे मुदा मान्सिक्ता नहीं माने आब साहित इक सथ्ता आदूनेक अकाटमे कहात में आबी गेला चे जीना साहित अकाटमी और जखन आहा सत्ता कोनो केंदर बनाता है तकन उकर चारू दिस एक ता पहरेदारी वा उ गेट्कीपिंक सुरू बहाजा है च्या इ गेट्कीपिंक का जे पर्दा फाश सुरोत में केल गेल जे उता आखी खूले वाला चे. र ती आइ सप्खलासा बेल चे. जि नन्टी प्रतिषत अनुवाद प्रकाशन का काज सलाकार समेतिक दस सदस्से के अपन मित्र असम्मन्दी के विटल ये मात्र आर्थिग भ्रस्टचार नहीं चल ये वेचारिग भ्रस्टचार चल उखुना एकर तन्त्र कुना काज करे चल अन्वाद कोनो भी चेत्रीय बाशाके विष्व से जोडबाक खडगी होई चे जब मात्र उही लोकक पोठीक अन्वाद भहुर हैल चे जे सम्ब्रान्त वर्गक चती वाजे संस्ताक नियमक सेंजले चती तकन बाहरी दुन्या के इई लागे लगे चे जे मेठली साहित्ते मात्र ब्रम्हन्वादी वा परम्परावादी कताग संग्र है. एक दम आज जे लोग एप परम्पराशे प्रष्नु पुचल चला हुणका उ चुप्चाब हाश्या पर दھकेल दिलगल. जेना हरी मोहन्जा कन्यादान. स्रोद उक्रे उदारन देट अची इई उपन्यास ब्रम्मणवाद और रूदीवाद पर एक ता कडवा व्यंग चल समाजक एक ता आईना देखावे चल आ लोकक भीच बहुत लोके प्रियचल मुद एक राज जानी भुजी का अकाद्मी पुरस्कार से वन्चित्रा कहल गेल माने, जाहा सत्ता के विरुद्ध लिख्वाव ता आहा के पुरस्कार नहीं बेटाद और इूपेख्षा मात्र व्यंगय कार दरे सीमित नहीं रहाल उसर सबाल तुरन अर्थात हाश्यपर रहे वाला समाज आम महिला साहित्यकारक के तज्यना अद्रिष्य कर देलगेल आप, स्रोथ में बेचन्ताक। रग्दलेत रग्द्द्रंवाच्चे उनकर नाटक, मितलाक तथाकतित स्लाप्स्टेक, वाहास्टे नाटके एक ताकरारा थपपडचल मुदा हुनका मुक्यदाराक इतिहास मे जगा नई भधल तीक होहे ना उ जग्दीश प्रसाद मन्डल को पन्यास, पंगु जे निचला तबकाक यधार्त, हुनक मातिक गंद अ संगर्ष देखावे चिये उकरा लंभा समएद हरी नजर अंदाज केल गेल जद्देपी बहुत पाचा, 2021 में हुंका पूरसकार भेटलनी, मुदा बर्शुद हरी हुंका मुख्य विमर सा बाहर राखल गेल. आम महिला लेखिका किस्तितित औरो कराब चल. रहा, स्रोथ विभ्भारानी वा सुश्मिता पाथकजका सशक्त लेखिका लोकनेक नाम लेच्छे, जिनका मुखिदाराक अन्त्लोगी में जगे नी भेटल, इसब इदेकावे चे जे आदूनिक काल में से हो अकता अद्दिश्ष्पन्जी काज कर रहा लचे, जे ये तैकरे च्छल, जे के सहित्तेकार चे आक्के अयोग्य. इक दं! इसब सुनक बहुत निराशा हूए चे. मुदा एही विदे है समानानतर इतिहास के, सबसे नीक बात इचे, जे इ मातर समस्या नहीं गिनावेच छे. इई एकर प्रतिकार से हु देखावे चे आ एक प्रतिकार कोनो सडगग पर वा कोनो सेमिनार हाल में नहीं बलकी अंटरनेट पर भरहल अची आ और इप प्रतिकार सब से क्रान्तिकारी आची एक रा हम सब दिजितल क्रान्ति कही सके ची तो बदेज अनलाईन बद्ब़दाई बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद अगर अगर अगर दिजितल रूप में आन नहीं जे खरा ख़ा पुटर पडे सकें। अज़ सब से पएक बात तिरहुता लिपी के यूनी कोर दरी पहुचे बाख्रानती भेल, एकर मतलप की भेल? एक रा सीदा मतल भी भेल, जे आब कोनो समपादक चोर, कोनो अकाधमी, वा कोनो पंजिकार, इदे नहीं कर सकेचे, जे केक्रा पडलनाते अकेक्रान है. माने, अंटनेट कोनो बाशाके अकर दिजितल सरवबहमिकता दर हल चे. आप, दिजितल सवरनेटी. आप शोशित वर्ग वाहाश्या पर राखल लोक अपन कता उ स्वैम कही सकेचते. कोनो भाशाक भविष्षक लिल, इस सबस जरूरी चे, जे उकर ग्यान भंडार समुचा विष्वक लिल खुला हुए, नकी कि चु खास लोक के आल्मारी में बन्द. ये ज़म सही बाच्चे तब ये ही विस्त्रित आ आगी खोले वाला चर्चाक उप संगार दिस अबएच्छी श्रोता लोकनीक यी बुज़ब जरूरी चे जे यी चर्चा हम्रा लोकनीक के की सिखवगचे अजगन कोनो व्यक्ती एही ज्यानक व्यापक परी प्रेख्ष्य में भूजछच्य, तकन इदेखफ सहज भोजगाएच्य, जे केना सुचनाक नियंद्रन साथ, अजगन विजेईत शत्तादारी या औही लोग द़्ारा लिखल जाएच्य, ये सद्यों सा हाश्या पर रहका से हो आपन अवाज बचेवा काम केलनी. अस समनानतर एतिहास आसल में उही सम्रितिक पुनर निरमाड चे. आजकन कोनो व्यक्ती एही ज्यानक व्यापक परी प्रेक्ष्श में भुजगच्चे, तकन इदेखभ सहज भोजआए चे, जे केना सुचनाक नियंटरन समाजक अकार दैच्छे रहा, इध हम्रा लोकनिक के अपन वर्तमान पर सोहो गंभिरतास सोचे पर मजबोर करे चे एक दम, आए ही सोच के आगु बड़ेवत, हम एही चर्चाक अंत एक ता एहन प्रश्नस करे चाहब, जे एही श्रोट सनिक्लिक का हमरा आहाक दैनिक जीवन सजुडःच्छे उकी चे सोचु जम मद्ध्य कालक पनजी कार वा आदुनिक कालक साहित अकाद्मि आपन हिसाब सा इतिहासक ब्लाक बुक बना सके चथें अपन हे साब सां सुचना के नियंत्रित असमपादित कर सके च्छतिन तकी आजुक एह दिजिटल युग में, जक्रा हम सब एतेक मुक्त मानी रोहल ची, कोनो नवका पंजिकार नहीं जन मले लक अच्छे. इबहत खतरनाक प्रष्न ची, कि यो बिग टेक कमपनी सब, अगला गेहन देहन में फिर कोनो नवका पन्नापल टाएब