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मैथिली_साहित्य_का_समानांतर_इतिहास_और_दमन.mp4
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- 0:00–0:10अज्छ की इस चर्चा में हम मैठिली साहित्य के समानानतर इतिहास और उसके मुख्धारा के संगरष पर आदारित एक बहत आहम दस्तावेष का विष्लेषन कर रहे हैं.
- 0:10–0:17तु चलिए बिना समय गवाए सीदे देकते हैं के इस सामगरी को और अदिक प्रभावशाली कैसे बनाय जा सकता है.
- 0:17–0:22बलकोल. अगर अम सीदे इसके सबसे महत्पोडन पहलुपर आई,
- 0:22–0:27तो मेरी पहली स्पष्ट समिक्षा इस दस्तावेश की संद्रच्ना और प्रवाह को लेकर है.
- 0:28–0:36वर्तमान में यह सामगरी अटिहासिक विष्लेशन और आदूनिक संस्थागत आलोचना के भीज बहुत बुरी तरह जूल रही है.
- 0:36–0:45आप आप जब मैं से पड़र आखा तो एक ही प्रवाहा में आप आप वी सदी के शिद्दों के चर्रया पद और विद्द्यापती की लोग परमपरा की बात हो रही ती.
- 0:45–0:53और फिर अचानक अगले ही पल हम सहित अकाधमी के खलाईर आर टीाई और भाईबतीजावात के खलासो पर आजाते हैं.
- 0:53–0:58वही तो ये इस पान्टूलिपी के एक बहुत ही बून्यादी कम्जोरी है.
- 0:58–1:05आप खुछ सुचिए एक तरफ निपाल में मल राजाँं के इतिहास का गंभीर अकादमिक वरनन चल रहा है
- 1:05–1:12और अचानक बिना किसी चेटावनी के दूशन पानजी और पुरसकारों की राजनी ती आजाती है
- 1:12–1:21ये मिश्रड आईसा लखता है, जैसे एक अटिहासेक शोध प्रबंद और एक आदूनिक शिकायत पत्र आपस में जोरदार तरीके से तक्रा रहे है।
- 1:21–1:28अग, अग, मेंड़, अगर अगर में से कमजोरी कह रहे हैं, तो क्या हम लेखक के मुख्यो उदेशे को नजर अंदाज नहीं कर रहे हैं?
- 1:28–1:32मतलब मेरी समज में तो लेखक जान बूचकर इं दोनो को मिला रहा है
- 1:32–1:36ताकि वो दिखा सके कि ये दमन कोई पुरानी बात नहीं है
- 1:36–1:39आप मैं समचती हूँ कि उनका एरादा यही है
- 1:39–1:41तो फिर अगर हम चोथवी सदी के दमन को
- 1:41–1:43आज की नोकर शाही से अलग कर देंगे
- 1:43–1:49तो क्या हम इस किताब की जो मूल अर्ज्झन्सी है, जो ताटका लिकता है, उसे नहीं मार रहें?
- 1:49–1:55नहीं, पर यह बहुत ही वाजज़िप सवाल होने के बावजुद, मेरा तरक इसके बिलकुल विप्रीत है.
- 1:55–2:02दिक्ये जब आप इन दोनो को मिलाते हैं, तो आप अरजन्जी नहीं, बलकी वेचारेग ब्रहम पैदा करते हैं.
- 2:02–2:07मतलप पाथक के दिमाग के काम करने का अपनाएक तरीका होता है.
- 2:07–2:10रहा, आप कोगनेटिट विपलआश की बात कर रही है.
- 2:10–2:14बलकुल, जब पाटक नेपाल के मल राजाँँ के दरबार में
- 2:14–2:18मैठली नाटकों के विकास के बारे में पड़़़ा होता है,
- 2:18–2:22तो वो एक विषिछ ये तिहासिक मान्सिक्ता में होता है.
- 2:22–2:26आज़े में अचानक वीनीत उपल या साहित या कादमी के
- 2:26–2:27यह तो है
- 2:27–2:29यह से आज़े समजगे
- 2:29–2:31जैसे आप एक बेहत फुबसुरत
- 2:31–2:33और प्राछीन शास्त्रिये राग सून रहे हो
- 2:33–2:35और कोई हर दो मिनेट में संगीत रोक कर
- 2:35–2:37आपको किसी कानूनी मुकद्मे की
- 2:37–2:39फाईल पडकर सूनाने लगे
- 2:39–2:40इक दम सही कहा
- 2:40–2:42अर कोई हर दो मिन्नट्मे संगीट रोक रहार
- 2:42–2:45आपको किसी कानुनी मुकद्मे की फाईल पड़कर सूनाने लगे
- 2:45–2:47इक्डम सही कहा
- 2:47–2:49वो मुकद्मा कितना भी महत्वपुन क्यो नहों
- 2:49–2:54वो उस संगीट के बावनात्मक प्रभाव को पुरी तरे से नष्ट कर रहा है
- 2:54–2:56ये बवाथी दिल्चास्त नजर्या है
- 2:56–3:01यानी आप कहरी हैं कि पाठक एक ही समय में एक कलाप्रेमी
- 3:01–3:03और एक वकील या अडिटर की तरा नहीं सोथ सकता
- 3:03–3:06दोनो किलिए रवग मान्सिक स्थान चाही है
- 3:06–3:07तो फिर इसक न समवदान क्या है
- 3:07–3:37अगर हम अँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 3:37–3:40तो आप प्रद़ब बाद्धाग बाद्धाग
- 3:40–3:43तो आप बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग
- 3:43–3:46बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग
- 3:46–3:49बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग
- 3:49–3:52बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग
- 3:52–3:55बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग
- 3:55–3:59तुश्रे क्हन्द को हम विशुद्द्द्रूप से राजनीती और दमन पर किंद्द्ध कर सकते है?
- 3:59–4:00आ, बिल्कुल!
- 4:00–4:07तुश्रे क्हन्द का शीर्षक दमन की वास्तोकला या संस्तागत राजनीती जैसा कुछ हो सकता है.
- 4:07–4:11इस में लेखख उन तमाम सबूटों को एक साथ रक सकते हैं
- 4:11–4:15जो ये बताते हैं कि इस सम्रद इतिहास को कैसे दबाया गया?
- 4:15–4:20जैसे रमानात जादवारा गंगेश उपाद्ध्याय के इतिहास को छबाने का प्रैयास
- 4:20–4:24या फिर RTI से निकलेवे चोंकाने वाले आखडे
- 4:24–4:27आप देख पार हूँ कि ये कैसे काम करेगा
- 4:27–4:30जब आप इन आदूनेग के स्टडीज और RTI के आगडों को
- 4:30–4:32इक अलक हणड मे एक साथ परते हैं
- 4:32–4:35तो ये इक शक्तिषाली अकादिमिक फीसिस की तर लगेगा
- 4:35–4:37पाटक बीच मे अद्खेगा नहीं
- 4:37–4:38सही बात है
- 4:38–4:40पाटक एक के बाद एक सबूथ देखेगा
- 4:40–4:43और संस्त्तागद ब्रश्टाचार के प्रती
- 4:43–4:45उसकी नाराजगी सवबावेक रूप से बड़ेगी
- 4:45–4:48यह दस्तावेस को बहुत अदिक व्यवस्तित और मारक बनाग देगा
- 4:48–4:54तीक है, मान लेते हैं कि हमने साहित्ते को पहले कहन्द में अलग कर दिया,
- 4:54–4:58लेकिन इस विभाजन से एक और बडी चुनाउती सामने आती है,
- 4:58–5:03मेरी दूसरी मुख्य समिक्षा इस बात पर है कि हम उस साहित्ते को
- 5:03–5:05पेश किस द्रिष्टी कों से कर रहे हैं?
- 5:05–5:09मुखिदारा के आख्यान का खंडन करने की तीवर इच्छा में
- 5:09–5:13समनानतर साहित्ते का पना सुत्तन्तर कलात्मक पक्ष कही चिप्सा गया है?
- 5:13–5:17आई ये इस दस्तावेस की दूसरी सबसे बढई कम्जोरी है.
- 5:17–5:21लेखख यहे साबित करने में अपनी अदेकानच उर्जा लगा रहा है,
- 5:21–5:25कि यह प्रज्ये की रच्नाय ब्रहमडवादी कैनन के विरोध में क्यु खडी है?
- 5:26–5:31लेकिन यहे समगरी इन विद्रोही रच्नायू की वास्तवेख साहित ते कुब्यों
- 5:31–5:34या उनकी बाशा की गेराई को पर्याप्त जगान नही देती.
- 5:34–5:37पर यहां में थोडा असहमत हूँ.
- 5:37–5:41मतलब क्या विद्रोही होना ही अपने आपने काफी नहीं है.
- 5:41–5:43हम यहां उन लेखखों की बाट कर रहे हैं,
- 5:43–5:46जिने जान भूजकर मुख्यदारा से बाधर रहा गया.
- 5:46–5:47वो तो है, लेकिन
- 5:47–5:50जेसे गंगेश उपाद्धयाय की वैजारिक प्रिष्ट भूमी हो
- 5:50–5:55या हरी मोहन जादवारा अपनी रचनाो के जर ये रूडी वादीता पर प्राहार
- 5:55–5:58अगर अम केवल उनकी कलात्मक सुंदरता पर बाद करेंगे
- 5:58–6:02तो क्या हम उसी समब्रान्त्वादी विवस्ता के मानको पर नहीं केल रहें?
- 6:02–6:03जिसका हम विरोथ कर रहें?
- 6:03–6:06दिक है, ये तरक अकसर दिया जाता है.
- 6:06–6:12लेकिन यहां कलात्मक सुंदरता का मतलब केवल संसक्रित के पुराने मानको वाली सुंदरता नहीं है.
- 6:12–6:17कलात्मक्ता का मतलब है, उस रच्ना की अपनी मारक्शम्ता
- 6:17–6:18मारक्शम्ता
- 6:18–6:22आँ, जब में कहते हैं की साहित्ते का प्रभाव दब गया है
- 6:22–6:27तो हमारा मतलब यह है, की पाटक को केवल यह बताया जारा है,
- 6:27–6:30की पला रच्ना महत्वपून है, क्योंकी विद्रो ही है.
- 6:30–6:34लेकिन पाटक को वो विद्रो महसुस नहीं कराया जारा
- 6:34–6:40आप के विल ये नहीं कै सकते की हरी मोहनजा का विंग रूडिवादिता पर एक प्रहार था
- 6:40–6:45मतलब आप केरी है कि ये पाटक के तारकिक दिमाग को तो जानकारी देता है
- 6:45–6:47लेकिन उसकी समवेदना को नहीं चुता
- 7:00–7:06अगर अवे निसे थो सुदारनो के साथ समजें तो दस्तावेज में फतूरी लाल की 1874 के अकाल पर लिखी लाल की अकाली कविद का जिक राता है वरतमान में दस्तावेज केवल यह बताकर अगे बर जाता है कि यह प्रच्ये का साहीते है।
- 7:06–7:07सती कुदारन है।
- 7:07–7:22तो तो सुदारनो के साथ समजें तो दस्तावेज में पपूरी लाल की अथारा सो तिध़र चोथदर के अकाल पर लिखी गगी अकाली कविद का जिक राता है वर्तमान में दस्तावेज केवल यह बताकर अगे बर जाता है कि यह प्रच्ये का साथीत है.
- 7:22–7:27वर्तमान में दस्तावेज केवल यह बताखर आगे बड़जाता है कि यह लगाश्ये का साहीत है.
- 7:28–7:31सती कुदारन है अब इसे टीक कैसे करें?
- 7:31–7:35उसको आजसा करना चाहीए कि लेक्हक को यह करने से लगे
- 7:35–7:39पतूरी लाल के विद्डरो ही होने की गूशना करने से लगे
- 7:39–7:43अगर बाथा की रच्ना की समवेदन शील्ता से जुड़जाएगा तब आपका तरक काम करेगा
- 7:43–8:13अपन्क्तियों को सामने रख्ये जाए अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे �
- 8:13–8:18उसके बाज जब आप खफेंगे की देखिए इतनी महान रच्ना को मुख्धाराने दबादिया
- 8:18–8:19तो पाटख रोज सि बहरुटेगा
- 8:19–8:21किख यही बाट है
- 8:21–8:23जब आप किसी महान गायाक के बारे में लिखते हैं
- 8:23–8:26तो आप केवल ये नहीं लिखते कि उसे गाने नहीं दिया गया
- 8:26–8:29आप पहले लोगों को उसकी आवाज सूनाते है
- 8:29–8:30बलकुल
- 8:30–8:32इसी तरह जग्दीश प्रसाद मंडल क्यो पन्यास
- 8:32–8:36पंगु के किरदारों कि सचक्त पंग्तियों को दस्तावेज में शामिल करें
- 8:36–8:40रही मोहन जा के विंगि वाले पारग्राफ निकाल कर रखें
- 8:40–8:42पात्खोज विंगि की दार से कटने दें
- 8:42–8:45जब साहित दे अपना पक्ष खुड रखेगा
- 8:45–8:49तो लेक्ख का राजनी तिक्टर्क अपने आप अजे हो जाएगा
- 8:49–8:51ये वागगे बहुती गेरा नजरी आ है
- 8:51–8:57अब जब हम हाशीए के साहते के अबास को वबारने की बात कर रहे हैं
- 8:57–9:03तो मेरी तीसरी और अन्तिम समेखशा इस पूरे इतिहास के सबसे आदूनिक पडाव पर आती है
- 9:03–9:05और वो है विदेहा दिजितल आन्दोलन
- 9:05–9:10इस सदी की शुर्वात में विदेहा एजरनल ने जो किया वो कमाल है
- 9:10–9:17आप तिरहुता लिपी का सन्द्रक्षन और गयारा हजार पांडो लिपिो का दिजितली करन कोई चोटी बात नहीं है
- 9:17–9:18बलकुल
- 9:18–9:22लेक्हक ने पहले के अद्ध्यायों में बडी महनत से इक शोद परक अकाद मिक लेजा स्थापिट किया ता,
- 9:22–9:25लेक्हक ने पहले के अद्ध्यायों में बडी महनत से इक शोद परक अकाद मिक लेजा स्थापिट किया ता,
- 9:25–9:28लेजा एक तथस्ते एतियासिक विष्लेशन से बड़ल कर
- 9:28–9:31कुछ हत थक आत्मप रचार आत्मक होगया है
- 9:31–9:36और ये लेजे का बड़ाव इस दस्तावेज की विष्वस नियता के लिए एक बहुत बडी कम्जोरी है
- 9:36–9:43लेखख ने पहले के अद्धायों में बढ़ी महनत से एक शोद परक अकाद में लेजा स्थापिट किया ता,
- 9:43–9:46लेकिन विदेह अद्धायों में विदेह अद्धायों विदेह अद्धायों विदेह आप देजा तुट जाता है.
- 9:46–9:56अग, मतलब आचानक हमारे सामने पहली मेठिली वेप साइत, पहली ब्रेल साइत, पहला उनीकोड प्रस्ताओ, जैसी उपलप्दियों की लंभी चेकलिस्त आजाती एग.
- 9:56–10:05सही कहा, यह लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए विग्यापन समगरी जैसा लगने लकता है.
- 10:05–10:08लेकिन क्या यह ए अनुचित है?
- 10:08–10:15मिरे मतलब है, अगर किसी समूहुने बिना किसी सरकारी अनुदान के लाको पन्नो का दिजिटिली करन किया है,
- 10:15–10:45तो थो थो थो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
- 10:45–10:47बचाओ की मुद्राया दिफन्सिव लक्ता है.
- 10:48–10:49बलक्ल.
- 10:49–10:52पाटख को लक्ता है कि शाहेद ये पूरी किताब
- 10:52–10:55इसी वेबसाइत का प्रचार करने के लिख्खी लिख्खी रही गगी ती.
- 10:55–10:57इसले मेरा सुजाव ये है,
- 10:57–10:59कि इस दिजिटल पहल को,
- 10:59–11:08उपलब्द्यों की सुची के बजाए, मैठिली के समनानतर इतिहाज के सबसे नवींतम और तारकिक विकाज के रुप में प्रस्तुत करें.
- 11:08–11:13इसे एक समाज शास्तरिये और तकनी की क्रान्टी के दिष्टी कोंट से लिख हैं.
- 11:13–11:16इसे तकनी की क्रान्ती की दिष्टी कोंट से लिखना
- 11:17–11:19ये सुन्ने में तो बहुत अच्टार लकता है,
- 11:19–11:22लिके लिके लिके लिके कागज पर थोस रुप में कैसे उतार सकते हैं
- 11:22–11:24इसके क्या उदारन हूँँँँँँँँँँँ
- 11:24–11:26इसे अजसे सोच्टिए
- 11:26–11:29चर्यापत के सिथ्दोंने आथवी सदी में क्या किया किया था
- 11:30–11:33उनो ने संसक्रित के अभी जाथते एका दिकार को तोडने किलिए
- 11:33–11:35लोग भाशा का इस्तमाल किया था
- 11:36–11:39शंकर देव के नाथकोने राजदरबारो की बाशा को चुनोती दी थी
- 11:39–11:43अब इसी अवदारना को इंटरनेट पर लागु की जीए
- 11:43–11:44अव, मैं समज रहूं
- 11:44–11:50लिट अकाटमी जैसे स्थापिट संस्थानो के एका दिकार को धूस्त कर दिया है
- 11:50–11:52ये बहुती शान्दार नजरीया है
- 11:52–11:55यानी विदे हे यी जरनल किवल एक वेबसाइत नहीं है
- 11:55–11:59उसी अटिहासिक विद्रोह का आदूनिक रूप है.
- 11:59–12:02तिरहुता को युनी कोड में लाना किवल लिक तकनीक उतलब दिन रही है,
- 12:02–12:08बल की वो बाशा को उस अभिजाक ते कैट से आजाद करने की एक समाजिक क्रानती है.
- 12:08–12:12बलक्ल, आप ये मत कहीगे के हमने लाको पन्नो का संग्रहे बनाया.
- 12:12–12:21आप ये कहीगे के इतिहास के इस पडाव पर जब प्रकाश्ष्यको ने लाच्ये की आवाजों के ले दर्वाजे बन्द कर दिये तब,
- 12:21–12:24तकनीक ने एक लोग तान्त्रिक माद्ध्यम प्रदान किया.
- 12:24–12:28और अज्टावेस कवो अक्यादमिक लेजा बरक्रार रहता है
- 12:28–12:31अचानक प्यार ब्रोशर वाली भहवना नहीं आती
- 12:31–12:35ये दस्टावेस को शुरू से अंटक एक ही परिपक को सुर में बान देता है
- 12:35–12:39सही कहा, यही एक अच्छी समिक्षा का लक्षे होता है
- 12:39–12:45जब आप उपलप्ड़्ियों को गिनाने के बजाए उनके पीचे के समाज शास्तर को समजाते है,
- 12:45–12:50तो पाटख खुड ये निशकर्ष निकालता है कि आपका काम कितना महान है.
- 12:50–12:53ये वाकग ये बहुती व्यावारिक चर्चा रही.
- 12:53–12:55इस दस्तावेज मे असी मिछ शम्ता है,
- 12:55–12:58बस इसे सही साचे में ड़ालने की ज़रूरत है.
- 12:58–13:01तो आजकी इस पूरी समिक्षा को समेट ते हुए,
- 13:01–13:02हमारे पास लेक्ध के लिए,
- 13:02–13:05तीन, बहुती सपष्ट और थोस सुजाव हैं.
- 13:05–13:08पहला सुजाव सन्रच्ना से ज़़ा है
- 13:08–13:10दस्तावेस को दो खन्डो मे बाटें
- 13:10–13:14पहले खन्ड मे साहिट्ते के समानानतर इतिहाज को रख्खें
- 13:14–13:20और दूस्रे खन्ड मे RTI और संस्तथदद मन को एक के स्टडी की तर है पेष्ख करें
- 13:20–13:23इसे वैचारे एक ब्रम्दूर होगा.
- 13:23–13:23बलकुल.
- 13:23–13:27अर दुस्रा सुजाव द्रिष्टे कोन को लेकर है.
- 13:27–13:32हाश्ये के साहित्ते को केवल राजनीते क विद्रों के सबूट के तोर पर इस्तमाल ना करें.
- 13:32–13:37वतुरी लाल या हरी मोहन्जा की रचनाो के मारमेक अंशो को सीदे उद्रित करें.
- 13:37–13:41साहित्ते को अपनी कलात्मक शक्ती के जर्ये खुड अपना पक्ष रकने दें.
- 13:41–13:45और हमारा तीस्रा सुजाव लेजे पर था.
- 13:45–13:52विदेह आन्दोलन के अद्ध्याय को उपलब्दियों की सुची या प्यार ब्रोशर ना बनने दे.
- 13:52–13:56इसे इतिहास के एक एसे स्वबहावेग विकास के रूप में लिखें,
- 13:56–14:02जहां एक अन्टनेट ने वही काम किया जो कभी आप्वी सदी में लोग भाशाने किया ता.
- 14:02–14:06मुझे पुरा विश्वास है कि अगर इन बडलावों को लागु कर दिया जाए,
- 14:06–14:11तो ये मैठली साहिट्ट और दमन के इतिहास पर एक कालजैई अकाद्मिक क्रिती बन जाएगा.
- 14:11–14:15लेखख ने जो शोथ की आए वो सच्मुच अस आदारन है.
- 14:15–14:19बिल्कुल, इस तरा का इतिहास लिखना कोई आसान काम नहीं है?
- 14:19–14:22हम लिखव कोई सहासिक प्रयास के लिए बदही देते हैं.
- 14:22–14:27हम ने आमन्त्रत करते हैं कि इन सुजहवो को अपनी पांडूलिपी में लागू करने के बाद
- 14:27–14:30बवाड़ बवाद वे अपना काम हमे जबारा ज़ोर बजेएं
- 14:30–14:32हमें ये देखकर भेहत खुषी होगी
- 14:32–14:35कि ये दस्तावेज अपने अंतिम रूप में कैसा दिकता है
- 14:35–14:38आजकी हमारी चर्चा में बस इतना ही
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अज्छ की इस चर्चा में हम मैठिली साहित्य के समानानतर इतिहास और उसके मुख्धारा के संगरष पर आदारित एक बहत आहम दस्तावेष का विष्लेषन कर रहे हैं. तु चलिए बिना समय गवाए सीदे देकते हैं के इस सामगरी को और अदिक प्रभावशाली कैसे बनाय जा सकता है. बलकोल. अगर अम सीदे इसके सबसे महत्पोडन पहलुपर आई, तो मेरी पहली स्पष्ट समिक्षा इस दस्तावेश की संद्रच्ना और प्रवाह को लेकर है. वर्तमान में यह सामगरी अटिहासिक विष्लेशन और आदूनिक संस्थागत आलोचना के भीज बहुत बुरी तरह जूल रही है. आप आप जब मैं से पड़र आखा तो एक ही प्रवाहा में आप आप वी सदी के शिद्दों के चर्रया पद और विद्द्यापती की लोग परमपरा की बात हो रही ती. और फिर अचानक अगले ही पल हम सहित अकाधमी के खलाईर आर टीाई और भाईबतीजावात के खलासो पर आजाते हैं. वही तो ये इस पान्टूलिपी के एक बहुत ही बून्यादी कम्जोरी है. आप खुछ सुचिए एक तरफ निपाल में मल राजाँं के इतिहास का गंभीर अकादमिक वरनन चल रहा है और अचानक बिना किसी चेटावनी के दूशन पानजी और पुरसकारों की राजनी ती आजाती है ये मिश्रड आईसा लखता है, जैसे एक अटिहासेक शोध प्रबंद और एक आदूनिक शिकायत पत्र आपस में जोरदार तरीके से तक्रा रहे है। अग, अग, मेंड़, अगर अगर में से कमजोरी कह रहे हैं, तो क्या हम लेखक के मुख्यो उदेशे को नजर अंदाज नहीं कर रहे हैं? मतलब मेरी समज में तो लेखक जान बूचकर इं दोनो को मिला रहा है ताकि वो दिखा सके कि ये दमन कोई पुरानी बात नहीं है आप मैं समचती हूँ कि उनका एरादा यही है तो फिर अगर हम चोथवी सदी के दमन को आज की नोकर शाही से अलग कर देंगे तो क्या हम इस किताब की जो मूल अर्ज्झन्सी है, जो ताटका लिकता है, उसे नहीं मार रहें? नहीं, पर यह बहुत ही वाजज़िप सवाल होने के बावजुद, मेरा तरक इसके बिलकुल विप्रीत है. दिक्ये जब आप इन दोनो को मिलाते हैं, तो आप अरजन्जी नहीं, बलकी वेचारेग ब्रहम पैदा करते हैं. मतलप पाथक के दिमाग के काम करने का अपनाएक तरीका होता है. रहा, आप कोगनेटिट विपलआश की बात कर रही है. बलकुल, जब पाटक नेपाल के मल राजाँँ के दरबार में मैठली नाटकों के विकास के बारे में पड़़़ा होता है, तो वो एक विषिछ ये तिहासिक मान्सिक्ता में होता है. आज़े में अचानक वीनीत उपल या साहित या कादमी के यह तो है यह से आज़े समजगे जैसे आप एक बेहत फुबसुरत और प्राछीन शास्त्रिये राग सून रहे हो और कोई हर दो मिनेट में संगीत रोक कर आपको किसी कानूनी मुकद्मे की फाईल पडकर सूनाने लगे इक दम सही कहा अर कोई हर दो मिन्नट्मे संगीट रोक रहार आपको किसी कानुनी मुकद्मे की फाईल पड़कर सूनाने लगे इक्डम सही कहा वो मुकद्मा कितना भी महत्वपुन क्यो नहों वो उस संगीट के बावनात्मक प्रभाव को पुरी तरे से नष्ट कर रहा है ये बवाथी दिल्चास्त नजर्या है यानी आप कहरी हैं कि पाठक एक ही समय में एक कलाप्रेमी और एक वकील या अडिटर की तरा नहीं सोथ सकता दोनो किलिए रवग मान्सिक स्थान चाही है तो फिर इसक न समवदान क्या है अगर हम अँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ तो आप प्रद़ब बाद्धाग बाद्धाग तो आप बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग बाद्धाग तुश्रे क्हन्द को हम विशुद्द्द्रूप से राजनीती और दमन पर किंद्द्ध कर सकते है? आ, बिल्कुल! तुश्रे क्हन्द का शीर्षक दमन की वास्तोकला या संस्तागत राजनीती जैसा कुछ हो सकता है. इस में लेखख उन तमाम सबूटों को एक साथ रक सकते हैं जो ये बताते हैं कि इस सम्रद इतिहास को कैसे दबाया गया? जैसे रमानात जादवारा गंगेश उपाद्ध्याय के इतिहास को छबाने का प्रैयास या फिर RTI से निकलेवे चोंकाने वाले आखडे आप देख पार हूँ कि ये कैसे काम करेगा जब आप इन आदूनेग के स्टडीज और RTI के आगडों को इक अलक हणड मे एक साथ परते हैं तो ये इक शक्तिषाली अकादिमिक फीसिस की तर लगेगा पाटक बीच मे अद्खेगा नहीं सही बात है पाटक एक के बाद एक सबूथ देखेगा और संस्त्तागद ब्रश्टाचार के प्रती उसकी नाराजगी सवबावेक रूप से बड़ेगी यह दस्तावेस को बहुत अदिक व्यवस्तित और मारक बनाग देगा तीक है, मान लेते हैं कि हमने साहित्ते को पहले कहन्द में अलग कर दिया, लेकिन इस विभाजन से एक और बडी चुनाउती सामने आती है, मेरी दूसरी मुख्य समिक्षा इस बात पर है कि हम उस साहित्ते को पेश किस द्रिष्टी कों से कर रहे हैं? मुखिदारा के आख्यान का खंडन करने की तीवर इच्छा में समनानतर साहित्ते का पना सुत्तन्तर कलात्मक पक्ष कही चिप्सा गया है? आई ये इस दस्तावेस की दूसरी सबसे बढई कम्जोरी है. लेखख यहे साबित करने में अपनी अदेकानच उर्जा लगा रहा है, कि यह प्रज्ये की रच्नाय ब्रहमडवादी कैनन के विरोध में क्यु खडी है? लेकिन यहे समगरी इन विद्रोही रच्नायू की वास्तवेख साहित ते कुब्यों या उनकी बाशा की गेराई को पर्याप्त जगान नही देती. पर यहां में थोडा असहमत हूँ. मतलब क्या विद्रोही होना ही अपने आपने काफी नहीं है. हम यहां उन लेखखों की बाट कर रहे हैं, जिने जान भूजकर मुख्यदारा से बाधर रहा गया. वो तो है, लेकिन जेसे गंगेश उपाद्धयाय की वैजारिक प्रिष्ट भूमी हो या हरी मोहन जादवारा अपनी रचनाो के जर ये रूडी वादीता पर प्राहार अगर अम केवल उनकी कलात्मक सुंदरता पर बाद करेंगे तो क्या हम उसी समब्रान्त्वादी विवस्ता के मानको पर नहीं केल रहें? जिसका हम विरोथ कर रहें? दिक है, ये तरक अकसर दिया जाता है. लेकिन यहां कलात्मक सुंदरता का मतलब केवल संसक्रित के पुराने मानको वाली सुंदरता नहीं है. कलात्मक्ता का मतलब है, उस रच्ना की अपनी मारक्शम्ता मारक्शम्ता आँ, जब में कहते हैं की साहित्ते का प्रभाव दब गया है तो हमारा मतलब यह है, की पाटक को केवल यह बताया जारा है, की पला रच्ना महत्वपून है, क्योंकी विद्रो ही है. लेकिन पाटक को वो विद्रो महसुस नहीं कराया जारा आप के विल ये नहीं कै सकते की हरी मोहनजा का विंग रूडिवादिता पर एक प्रहार था मतलब आप केरी है कि ये पाटक के तारकिक दिमाग को तो जानकारी देता है लेकिन उसकी समवेदना को नहीं चुता अगर अवे निसे थो सुदारनो के साथ समजें तो दस्तावेज में फतूरी लाल की 1874 के अकाल पर लिखी लाल की अकाली कविद का जिक राता है वरतमान में दस्तावेज केवल यह बताकर अगे बर जाता है कि यह प्रच्ये का साहीते है। सती कुदारन है। तो तो सुदारनो के साथ समजें तो दस्तावेज में पपूरी लाल की अथारा सो तिध़र चोथदर के अकाल पर लिखी गगी अकाली कविद का जिक राता है वर्तमान में दस्तावेज केवल यह बताकर अगे बर जाता है कि यह प्रच्ये का साथीत है. वर्तमान में दस्तावेज केवल यह बताखर आगे बड़जाता है कि यह लगाश्ये का साहीत है. सती कुदारन है अब इसे टीक कैसे करें? उसको आजसा करना चाहीए कि लेक्हक को यह करने से लगे पतूरी लाल के विद्डरो ही होने की गूशना करने से लगे अगर बाथा की रच्ना की समवेदन शील्ता से जुड़जाएगा तब आपका तरक काम करेगा अपन्क्तियों को सामने रख्ये जाए अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे अगे � उसके बाज जब आप खफेंगे की देखिए इतनी महान रच्ना को मुख्धाराने दबादिया तो पाटख रोज सि बहरुटेगा किख यही बाट है जब आप किसी महान गायाक के बारे में लिखते हैं तो आप केवल ये नहीं लिखते कि उसे गाने नहीं दिया गया आप पहले लोगों को उसकी आवाज सूनाते है बलकुल इसी तरह जग्दीश प्रसाद मंडल क्यो पन्यास पंगु के किरदारों कि सचक्त पंग्तियों को दस्तावेज में शामिल करें रही मोहन जा के विंगि वाले पारग्राफ निकाल कर रखें पात्खोज विंगि की दार से कटने दें जब साहित दे अपना पक्ष खुड रखेगा तो लेक्ख का राजनी तिक्टर्क अपने आप अजे हो जाएगा ये वागगे बहुती गेरा नजरी आ है अब जब हम हाशीए के साहते के अबास को वबारने की बात कर रहे हैं तो मेरी तीसरी और अन्तिम समेखशा इस पूरे इतिहास के सबसे आदूनिक पडाव पर आती है और वो है विदेहा दिजितल आन्दोलन इस सदी की शुर्वात में विदेहा एजरनल ने जो किया वो कमाल है आप तिरहुता लिपी का सन्द्रक्षन और गयारा हजार पांडो लिपिो का दिजितली करन कोई चोटी बात नहीं है बलकुल लेक्हक ने पहले के अद्ध्यायों में बडी महनत से इक शोद परक अकाद मिक लेजा स्थापिट किया ता, लेक्हक ने पहले के अद्ध्यायों में बडी महनत से इक शोद परक अकाद मिक लेजा स्थापिट किया ता, लेजा एक तथस्ते एतियासिक विष्लेशन से बड़ल कर कुछ हत थक आत्मप रचार आत्मक होगया है और ये लेजे का बड़ाव इस दस्तावेज की विष्वस नियता के लिए एक बहुत बडी कम्जोरी है लेखख ने पहले के अद्धायों में बढ़ी महनत से एक शोद परक अकाद में लेजा स्थापिट किया ता, लेकिन विदेह अद्धायों में विदेह अद्धायों विदेह अद्धायों विदेह आप देजा तुट जाता है. अग, मतलब आचानक हमारे सामने पहली मेठिली वेप साइत, पहली ब्रेल साइत, पहला उनीकोड प्रस्ताओ, जैसी उपलप्दियों की लंभी चेकलिस्त आजाती एग. सही कहा, यह लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए विग्यापन समगरी जैसा लगने लकता है. लेकिन क्या यह ए अनुचित है? मिरे मतलब है, अगर किसी समूहुने बिना किसी सरकारी अनुदान के लाको पन्नो का दिजिटिली करन किया है, तो थो थो थो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � बचाओ की मुद्राया दिफन्सिव लक्ता है. बलक्ल. पाटख को लक्ता है कि शाहेद ये पूरी किताब इसी वेबसाइत का प्रचार करने के लिख्खी लिख्खी रही गगी ती. इसले मेरा सुजाव ये है, कि इस दिजिटल पहल को, उपलब्द्यों की सुची के बजाए, मैठिली के समनानतर इतिहाज के सबसे नवींतम और तारकिक विकाज के रुप में प्रस्तुत करें. इसे एक समाज शास्तरिये और तकनी की क्रान्टी के दिष्टी कोंट से लिख हैं. इसे तकनी की क्रान्ती की दिष्टी कोंट से लिखना ये सुन्ने में तो बहुत अच्टार लकता है, लिके लिके लिके लिके कागज पर थोस रुप में कैसे उतार सकते हैं इसके क्या उदारन हूँँँँँँँँँँँ इसे अजसे सोच्टिए चर्यापत के सिथ्दोंने आथवी सदी में क्या किया किया था उनो ने संसक्रित के अभी जाथते एका दिकार को तोडने किलिए लोग भाशा का इस्तमाल किया था शंकर देव के नाथकोने राजदरबारो की बाशा को चुनोती दी थी अब इसी अवदारना को इंटरनेट पर लागु की जीए अव, मैं समज रहूं लिट अकाटमी जैसे स्थापिट संस्थानो के एका दिकार को धूस्त कर दिया है ये बहुती शान्दार नजरीया है यानी विदे हे यी जरनल किवल एक वेबसाइत नहीं है उसी अटिहासिक विद्रोह का आदूनिक रूप है. तिरहुता को युनी कोड में लाना किवल लिक तकनीक उतलब दिन रही है, बल की वो बाशा को उस अभिजाक ते कैट से आजाद करने की एक समाजिक क्रानती है. बलक्ल, आप ये मत कहीगे के हमने लाको पन्नो का संग्रहे बनाया. आप ये कहीगे के इतिहास के इस पडाव पर जब प्रकाश्ष्यको ने लाच्ये की आवाजों के ले दर्वाजे बन्द कर दिये तब, तकनीक ने एक लोग तान्त्रिक माद्ध्यम प्रदान किया. और अज्टावेस कवो अक्यादमिक लेजा बरक्रार रहता है अचानक प्यार ब्रोशर वाली भहवना नहीं आती ये दस्टावेस को शुरू से अंटक एक ही परिपक को सुर में बान देता है सही कहा, यही एक अच्छी समिक्षा का लक्षे होता है जब आप उपलप्ड़्ियों को गिनाने के बजाए उनके पीचे के समाज शास्तर को समजाते है, तो पाटख खुड ये निशकर्ष निकालता है कि आपका काम कितना महान है. ये वाकग ये बहुती व्यावारिक चर्चा रही. इस दस्तावेज मे असी मिछ शम्ता है, बस इसे सही साचे में ड़ालने की ज़रूरत है. तो आजकी इस पूरी समिक्षा को समेट ते हुए, हमारे पास लेक्ध के लिए, तीन, बहुती सपष्ट और थोस सुजाव हैं. पहला सुजाव सन्रच्ना से ज़़ा है दस्तावेस को दो खन्डो मे बाटें पहले खन्ड मे साहिट्ते के समानानतर इतिहाज को रख्खें और दूस्रे खन्ड मे RTI और संस्तथदद मन को एक के स्टडी की तर है पेष्ख करें इसे वैचारे एक ब्रम्दूर होगा. बलकुल. अर दुस्रा सुजाव द्रिष्टे कोन को लेकर है. हाश्ये के साहित्ते को केवल राजनीते क विद्रों के सबूट के तोर पर इस्तमाल ना करें. वतुरी लाल या हरी मोहन्जा की रचनाो के मारमेक अंशो को सीदे उद्रित करें. साहित्ते को अपनी कलात्मक शक्ती के जर्ये खुड अपना पक्ष रकने दें. और हमारा तीस्रा सुजाव लेजे पर था. विदेह आन्दोलन के अद्ध्याय को उपलब्दियों की सुची या प्यार ब्रोशर ना बनने दे. इसे इतिहास के एक एसे स्वबहावेग विकास के रूप में लिखें, जहां एक अन्टनेट ने वही काम किया जो कभी आप्वी सदी में लोग भाशाने किया ता. मुझे पुरा विश्वास है कि अगर इन बडलावों को लागु कर दिया जाए, तो ये मैठली साहिट्ट और दमन के इतिहास पर एक कालजैई अकाद्मिक क्रिती बन जाएगा. लेखख ने जो शोथ की आए वो सच्मुच अस आदारन है. बिल्कुल, इस तरा का इतिहास लिखना कोई आसान काम नहीं है? हम लिखव कोई सहासिक प्रयास के लिए बदही देते हैं. हम ने आमन्त्रत करते हैं कि इन सुजहवो को अपनी पांडूलिपी में लागू करने के बाद बवाड़ बवाद वे अपना काम हमे जबारा ज़ोर बजेएं हमें ये देखकर भेहत खुषी होगी कि ये दस्तावेज अपने अंतिम रूप में कैसा दिकता है आजकी हमारी चर्चा में बस इतना ही