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मैथिली_वेब_पत्रकारिता_का_डिजिटल_सफर.m4a
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- 0:00–0:30विश्वाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद ब
- 0:30–0:36ये गदम सही. तो आज की हमारी इस दीब डाईव में, हम एक अईसी ही कहानी पर चर्चा कर रहे है.
- 0:36–0:44आदार है, आशीश अंचिनार गी की एक बहुत ही कमाल की किताब मेठली वेप पत्रकारिताक इतिहास.
- 0:44–0:47अम और ये किताप स्वफ कुछ तारीक हो या गधनाो की लिस्ट नहीं है
- 0:47–0:48बिलको नहीं
- 0:48–0:53ये दर सल इस बात का बहुती सती कद्दिन है कि जब कोई भी नहीं तकनी काती है
- 0:53–0:55तो अनसानी मनोविग्यान उसके सात कैसे खेलता है
- 0:55–1:03अग और शुवात में शुटाऊ को लक्सकता है के ख्षेत्रिये वेप पत्रकारिता के इतिहास में अज़ा क्या ध्रिलर होगा
- 1:03–1:33लिकिन मेरा यकीन मानिय, जब आप देकते हैं कि मेठली जैसी एक खषेत्रिय अबहाशाने इन्ट्रनेत के उस दीमे डालप वाले दोर से लेकर आजके एएए यानी आर्टिफिशल अब अब अब आप युग तक का सफर कैसे तैक्या, तो ये किसी सस्पैंस फिल्म से कम नही
- 1:33–2:03तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
- 2:03–2:08याहु जीो सितीज पर गजेंद ताकृर दूरा शूरू किया बहाल सरी गाच
- 2:08–2:11ये न्टनेट पर मेठिली की पहली प्रामाने को पस्तिती थी
- 2:11–2:17श्रोताव की जानकारी किलि तोड़ा सा बतादूं की ये याहु जीो सितीज अगर था क्या
- 2:17–2:23इसे आप नहां इंटरनेट के शिर्वाती दोर का एक दिजिटल खाली पलोट समच सकते हैं.
- 2:23–2:25आप नहां एक खाली जमीन कितबा?
- 2:25–2:29बलकोल याहु लोगों को इंटरनेट पर थोडीसी मुझ्त जगे देता था
- 2:29–2:32ज़हां आप बेसिक आज्टीमल कोडिं कर के
- 2:32–2:35अपना कुदका एक चोता सा वेप बेज बना सकते दे
- 2:35–2:37आपको लेयाुट से लेके टेक्स्ट तक
- 2:37–2:40सब कुछ मैनूली ताइप करना पड़ता ता
- 2:40–2:42इक दम सही का आपने, कोई रेदी में
- 2:42–2:44तेम्ठलेत नी होते ते अछ़मे.
- 2:59–3:04और फिर 2004 में समद्या नाम का पहला समचार बलोग शुरू हूँँँँँँ
- 3:04–3:08तो ये एक बहुती स्वबहाविक क्रमिक विकास था
- 3:08–3:11पहले वेब पेज फिर वेब साइट और फिर बलोग
- 3:11–3:14आप लेकिन इसी स्वबहाविक विकास के बीच में
- 3:14–3:16कुछ लोगो ने अपनी अलगी ताईमशीन चलादी
- 3:16–3:17हाहाहा
- 3:17–3:22और किता पर तेवे जो बात मुडे सबसे जाडा हेरान करने लगीना
- 3:22–3:26वो ता कतिक रास बात नामक बलोग का विवाद
- 3:26–3:32मतलप कुچ लोगोने कुदको इंटनेट पर पहला मेठली ब्लोगर साभिट करने किलिए
- 3:32–3:35अपने ब्लोग पोस्ट की तारीको मेही हेर फेर कर दी.
- 3:35–3:39और यही पर आपकी वो चानपर भेलगाडी वाले बात एकदम सतीक बेटती है.
- 3:39–3:46अन्छिनार जीने अपनी किताब में पूरे फर्जीवाडे को बहुती तक्नीकी और विष्लेश नात्मक तरीके से बेनाखाप किया है
- 3:46–3:50मैं चाती हों के हम इस तक्नीकी हिसे को तोड़ा और बारीकी से समझें
- 3:50–3:55आखर उनोने ये पख़ा कैसे क्योंकि आम अनसान तो ब्लोक पर जो तारीक लिकि ये बस उसे इसच मान लिता हैं।
- 3:55–4:01दिए हूँ ये ता के कते एक रास पात ब्लोक के संचालो को ने 2013 में एक पोस लिखा।
- 4:01–4:05लिए नोंने ब्लोक की सेटिंगज में जागर उस पोस्ट की पबलिष देट को बैक देट कर दिया.
- 4:05–4:09मडब पुरानी तारीक डाल दी वच उन्निस्ट्शौन निन्न्यान में की.
- 4:09–4:12बाप्रे सीदे चोड़ा साल पीचे.
- 4:12–4:18ये दिखाना उनका मकसत था के वे उन्निस्व निन्यान्मे से ही अगर निन्ट्टब पर मेठ्ट्ली में लिख रहे हैं.
- 4:18–4:21लिए वो तकनी के इतियास को बहुल गे.
- 4:21–4:23लेखक ने तकनी की सबूथो के साथ दिखाया,
- 4:23–4:26की गोगल ने ब्लोगर सरविस को तो जोजार तीन में ख़ीदा था.
- 4:26–4:27औरे?
- 4:27–4:30यानी जिस प्लट्फोम पर वे निन्यानवे में पोष करनेगा दावा कर रहे थे,
- 4:30–4:32उस रूप मे वो प्लट्फाम तो वजुद में नहीं था.
- 4:32–4:33बलकल नहीं.
- 4:33–4:35और उस से भी बड़ी बात.
- 4:35–4:36कस्टम यूर्ल का फीच्चर,
- 4:36–4:39जिस मे आप किसी लिंक के अंदर पुरानी तारीग दिखा सकते हैं,
- 4:39–5:09वो फीट्चर ब्लोगर पर 2008 और उसके बात के वर्षो में आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ �
- 5:09–5:11उसरी तरासे सर्फ कोड़़ पटीका है
- 5:11–5:14और ये बूक सर्फ तारीक है बडलने तक सीमित नहीं
- 5:14–5:18किताब हमें अंटनेटके एक और बहुती क्ष्टरनाग डिजान की तरफ लेजाती है
- 5:18–5:21वलगडेशिन या सत्यापन की बूक
- 5:21–5:23वहुती महतपून बिंदू है
- 5:23–5:28जब हम यंटनेट के सफर की बात करते हैं, तो अकसर हम सर्फ प़एदुं पर बात करते हैं,
- 5:28–5:31कि सुचना तुरन्त मिल जाती है, बंकिं आसान हो गई है.
- 5:31–5:35लेकिन दिजिटल मनो विग्यान समाज को भीतर से कैसे बडल रहा है,
- 5:35–5:37किताब इस पर गेहरी चोट करती है.
- 5:37–6:07अगर हम इसे मेठली या कि लग बटन लग बटन बनाने लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग ब
- 6:07–6:10किसी भी चेत्रे साहित्ते के परद्रिष्चे से जोडगगर देखें
- 6:10–6:12तो ये एक बड़ भड़ वैच्चारिएक तक्राव है.
- 6:12–6:13वो कैसे?
- 6:13–6:17देखे शेत्रे साहिते हमेशा से तहराव, गेराई और लंभे विमर्ष की मांक रता है.
- 6:18–6:18है ना?
- 6:18–6:18हा बilkul.
- 6:18–6:23लेकिन अब वो साहिट्य, एक अज़्ेटिटल अखाडे मे दھखेल दिया गया है,
- 6:23–6:28जिसे सर्फ तीन सेकंके डोपमाएन हिट्स और तुर्फ मिलने वाले लाएक्स के लेटिटान की अग़्ाए.
- 6:28–6:32रहां, मतला लोग कोई अच्छी कविता लिखने से जाड़ा इस बात पर दियान देते हैं
- 6:32–6:34कि उस पर कितनी जल्दी लाएक साइंगे.
- 6:34–6:34दलकोल.
- 6:34–6:36और ये सव्साहिते किस तर पर नहीं हो रहा?
- 6:36–7:06वो आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ
- 7:06–7:36तो तो थो बज़ागा बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ाग
- 7:36–7:40इंसान को ज्यानी के साथ साथ अग्यानी भी बना दिया है
- 7:40–7:44वो इसलिये कि अगब हमारी स्मिती, हमारी याद रखनी शम्ता
- 7:44–7:46गुगल के सरवर पर निवबर हो गगी है
- 7:46–7:49हम जानकारी को अपने दिमाग में प्रोसेस करनेगे बाजा है
- 7:49–7:51सरज यंजन पर चोर देते हैं
- 7:51–7:53और गुगल की अपनी एक रब यह समस्स्स्या है
- 7:53–7:57मतलब अगर आप गुगल पे सर्च करें के दर्ती गोल है
- 7:57–8:01तो आलगारिटम आप को उसके सैक्डो वैग्यानिक सबूध देगा
- 8:01–8:04लेकिन अगर आप सर्च करें के दर्ती चप्टी है
- 8:04–8:08तो वही इंटिनेट आपको उसके भी सेक्डो आटिकल्ज अव लिए देदेगा
- 8:08–8:09भिल्कल
- 8:09–8:13तो यह आसा हुए खे एकी शल्फ पर असली विग्यान की किताभे
- 8:13–8:17और नकली जाधू तोनी की किताभे साथ-सात रख्खी है
- 8:17–8:19तो आसे में कोई सत्टे तक पहुचेगा कै से
- 8:19–8:24और यही पर इस पूरी सुचना के अवर लोड की आपफत सामने आती है.
- 8:24–8:28जब आप के पास सच और जूट दोनो समान मात्रा में
- 8:28–8:30एकी जैसी वेप साच पर परोषे जारे हो,
- 8:30–8:34तो वहां आपका सब सब ज़ब आथियार आपकी आलोचनात्मक सोच होती है.
- 8:34–9:04अपने लगा बाद करी आप नहीं तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा
- 9:04–9:34अदिटाई बाज़ा अगर बाज़ा अगर बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़
- 9:34–9:36भी ब्रेड येपी में प्रकाषित करते हैं
- 9:36–9:39मैं येई समजन चाती हों के दोहाँ आप दस के दोर में
- 9:39–9:42जब मोबाईल में दंग से हिंदी भी ताइट नहीं होती ताब इनोने
- 9:42–9:45ब्रेल और तिरुहुता को दिजितल कैसे किया
- 9:45–9:49तिरुहुता जो मैठली की मुल लिपी है, कैठी, निवाडी
- 9:49–9:53और यहां तक की नेट्रहीनो के लिए, ब्रेर एपी में भी प्रकाषिट करते हैं
- 9:53–9:57मैं ये समजन चाती हों के 2008-10 के दोर में
- 9:57–10:00जब मोबाईल में दंग से हिंदी भी ताइट नहीं होती ती
- 10:00–10:04तब पिर उनो ने ब्रेल और तिरु हुता को दिजितल कैसे किया
- 10:04–10:07ये तो तकनी की रूप से बहुत बच्किल रहा होगा
- 10:07–10:08ये बेहद बच्किल था
- 10:08–10:10और यही इस काम की अस्ली कीमद है
- 10:10–10:12आज हमारे पास यूनी कोड है
- 10:12–10:15जिसे हम किसी भी देवाईस पर कोई भी बाशा आसानी से देख सकते हैं
- 10:15–10:19लेकिन उस समः यें लिपियों को यें लाने के लिए
- 10:19–10:21तो पर उन्डो ने किया कैसे?
- 10:21–10:24सुम सेवकों को पहले मैंवली फांत डिजाईन करने पडे
- 10:24–10:27फिर एक एक अख्षर को उस फांत में कोड करना पडा
- 10:27–10:31ता कि जब को उसर वेबसाइत खोले, तो उसे उजीप से दिभबे ना दिख हैं
- 10:31–10:33बलकी अस्ली लिपी दिख हैं
- 10:33–10:35अदिना दिकें बलकी अस्ली लिपी दिकें
- 10:35–10:37और ही वा एक एक अख्षर को कोड ख्या
- 10:37–10:41और ब्रेन लिपी को दिजिटल सक्रीन पर उतारना
- 10:41–10:43ता की सक्रीन लीडर सुफ्ट्वर उसे पड़ सके
- 10:43–10:46और नेट्रहीन शुटाँं तक वो साहित ते पहुट्ष सके
- 10:46–10:49ये कम्पौटर सायंज और भाशा विग्यान का बहुती जटिल ताल मिल था
- 10:50–10:55ये काम तो किसी बड़े सरकारी विबहाख का हुना चाही एथ जिस के पास करोडो का बजजद हो
- 10:55–11:00लिकिन इसे एक समुदाय कुछ समर्पित लोग अपने दम्पर कर रहे है
- 11:00–11:02वो भी बिना किसी फववदे के
- 11:02–11:05यही एक कम्युन्टी प्रोज्ट की अस्ली ताकत होती है
- 11:05–11:09कोई भी बाशा तब तक जीवित रहती है जब तक उसका समुदाय उस्टे जुडा हो है
- 11:09–11:13किताब में मैत्टिली विकी पीटिया के समवदाएक संगष्का भी बहुत विस्तार से जिक्र है
- 11:13–11:14अं...
- 11:14–11:17हम अखसर विकी पीटिया को बहुत हलके में लिते है ना
- 11:17–11:20जैसे की ये कोई अटोमातिक मशीन हो
- 11:20–11:20हां
- 11:20–11:22हमें लकता है कि जानकरी अपने आप आप आजाती है
- 11:22–11:23बलक्ल.
- 11:23–11:24लिकन एसा नहीं है.
- 11:24–11:272008 में, जब मैठली विकिपीडिया के लिप्रे आज श्वूए,
- 11:28–11:30तो एसा नहीं ता किसीने एक बटन दबाया और विकिपीडिया बन गया.
- 11:31–11:32तो क्या प्रक्रिया थी उसकी?
- 11:32–11:35लोगों को विकि मीटिया एंखौबेटर में जाना पडा.
- 11:35–11:39ये विकिपीटिया का वो टेस्टिंग राउन जाए न नहीं बाशागों का प्रेक्षन होता है
- 11:39–11:43स्वायम सेवकोने बिना पैसे लिये अपनी रातों की नींद कहराप कर के
- 11:43–11:47हाजारों शब्दों का मैनवली अनवाद किया तकनी की शब्दावली तयार की
- 11:47–11:49बाप्रे हाजारो शबत
- 11:49–11:51रेक लिखे
- 11:51–11:55औद तब जाकर 2014 में मैठली विकी पीटिया को अदिकारिक सुईक्रती मिली
- 11:55–12:00इसी तरे 2011 से Google Translate को अपने बाशा सिकाने किले भी
- 12:00–12:02देटा फीटिंका लंभा संकर स्थला
- 12:02–12:04ये सच में जबरदसत है
- 12:04–12:06और केवल तकनीकी मुर्चे पर ही नहीं
- 12:06–12:09साहित्ते के मुर्चे पर भी न्टनेत ने पूरी आजादी दी
- 12:09–12:13किता बताती है कि अन चिनार अखर जैसे ब्लोग्स ने
- 12:13–12:16मुख्यदारा से अलग जाकर मैठली गजल को
- 12:16–12:18न्टनेत पर एक नहीं पहझान दी
- 12:18–12:19उंहुं
- 12:19–12:26उन्हो ने नहें लेखों को जोडा और यहां ता की समानानतर साहित्या कादमी सम्मान भी शुरू कर दिये.
- 12:26–12:31इसका सीदा सम अगलव यहें के अगर पारमपरिक संस्थान आपको जगा नहीं देरे हैं,
- 12:31–12:35तो इंटनेट आपको अपना कुद का मंच कभड़ करने की आजादी देता है.
- 12:35–12:36एक दम सही.
- 12:36–12:40और ये निस्वार्थ भाउ से किया गया काम ही अस्ली वेप पत्र कारिता है.
- 12:40–12:43ये लोग उन लाइक्स के ले खाम नहीं कर रहे हैं.
- 12:43–12:47बलकी आने वली पीडियों के लिए एक दिजिटल द्रोहर तेयार कर रहे हैं
- 12:47–12:50ताकि उनकी बाशा सर्वर के किसी कोने में कोनगाए.
- 12:50–12:53अब यहां से ना कहानी एक अजे मोडब आती है,
- 12:53–12:55जो सीदे बहविष्षिकी और इशारा करता है.
- 12:55–13:01दिके जब कोई समवदाय अपनी भाशा का इतना बड़िजटल ड़ेटाबेस तगर लेता है,
- 13:01–13:06जिस में पन्द्रा सो किताबे हो, लाको विकिपीटि आर्टिकल्स हो,
- 13:06–13:10मिरे मतलब है, तो उस सारे देटा का अगला पडाफ क्या होता है?
- 13:10–13:14उसका अगला पडाव है वो तकनीक जो आज पुरी दुनिया को बड़ल रही है
- 13:14–13:16अटेफिशल अंटलगेंस अर मशीन लेशनिं
- 13:16–13:18पिलकोल
- 13:18–13:23किताब का ये आख्री हिस्सा तकनीकी रुब से बहुत ही अधवान्स है
- 13:23–13:27आई आई आई आई बारत्टी बाशाँ के लिए काम कर रहा है
- 13:27–13:33किताब में बताया गया है कि कैसे एए बारत की कषेत्री ए बाशाँ के लिए काम कर रहा है?
- 13:33–13:38आँ, इस में सबसे प्रमोग उदारन है, IIT Madras के नीलेकनी संटर का,
- 13:38–13:40एए प्र बारत प्रुज्ट.
- 13:40–13:42तो ये प्रुज्ट आखिर करता क्या है?
- 13:42–13:46इंका इंडिक ट्रान्स्टू मोडल बहुती क्रान्तिकारी है.
- 13:46–13:52ये एक अपन सूर्स आया आई मोडल है, जिसने अंग्रेजी और बाइस भार्तिये बाशाँँ के साथ सात अद
- 13:52–13:56मेतली में भी बहुत सतीक और हाई कोलेटी अनुवाद को समबो बना दिया है.
- 13:56–14:00और बवाग, और इसके लावा कोई और प्रुजेक भी है?
- 14:00–14:04जी, GNU के प्रुफेसर गिरीशनात जहा के निर्देशन में
- 14:04–14:07माख्रो सोफ्ट का बिंक च्रन्सलेटर प्रुजेक भी चल रहा है,
- 14:07–14:11जो मेठली को सीदे गलोबल टेक एको सिस्टम से जोड रहा है.
- 14:11–14:16यहां मैं आप से इं तक्नीकी शब्डों के पीचे का विग्यान समजना चाहती हूँ।
- 14:16–14:21किताब में, स्पीच रेकिणिशन और स्पीच सिंठिसस जैसे शब्डों का इस्तमाल हूँँ आ है
- 14:22–14:26कषेत्रिय बहाशाँ के संदर्ब में इंका आखिर मतलब क्या है
- 14:26–14:28इसे बड़ती सरल बहाशा में समचते हैं,
- 14:28–14:30श्पीच रेकशन का मतलब है,
- 14:30–14:32कमपूटर की वो शमता,
- 14:32–14:34जिस से वो आपकी आवाश सुनकर उसे ताईप कर सके,
- 14:34–14:37ज़से आप अपने फोन में बोलकर कुछ सरच करते हैं आ?
- 14:37–14:39आ, वो वोईश सरच वाला फीचर.
- 14:39–14:45बिल्कुल, मेतली जैसी बाशा के लिए प्छीन को रगग रग लजों और उचारनों को समझना सिखाया जारा हैं.
- 14:45–14:49और दूसरी तरव है स्पीच सिंठिसिस, जिस का मतलब है,
- 14:49–14:52लिखेवे तेक्स को स्वाबहाविक अवाज में बदलना
- 14:52–14:56जैसे आमेजन लेक्सा या गुगल असिस्ट्टिन बोलते हैं
- 14:56–15:00तो क्या इस का मतलब यहे है के बहुविष्ष्वे हम अपने स्माथ स्पीकर से
- 15:00–15:02सीधे मेठली में बात कर से केंगे
- 15:02–15:03बलकल कर से केंगे
- 15:03–15:09जब मशीन किसी बाशा की लिपी, उसके शब्द कोश और उसके व्याकरन को पुरी तना से माप कर लेती है,
- 15:09–15:12तो उसे इन्सानो की तरा प्रोसेस करना शुरू कर देती है.
- 15:12–15:16ये जो A.I वाली बाथ है, ये बहुत दिलचस्प तो है,
- 15:16–15:46अगर दिक्छनरी लिए तो बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए ब
- 15:46–16:16तो बद्या बर ग़ानी बाशावे नाई नीजानी बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे ना�
- 16:16–16:20अदर नट बाशा की जो कविताए, कहानिया और मुहावरे अनट बडाले है,
- 16:21–16:23वही अई अई की असली खुराग है.
- 16:24–16:27अगर अप मशीन को सच्फ रूके सरकारी दस्तावेस पड़ाएंगे,
- 16:28–16:30तो वो किसी बाबू की अनुवात की अपने लेगा,
- 16:30–16:40अप आग इन लोगोने अपनी बाशा की जो कविताए, कहानिया और मुहावरे अंट्रनेट पडाले है, वही एएएएए की असली खुराग है.
- 16:40–16:46अगर आप मशीन को स्वर्फ रूके सरकारी दस्तावेश पडालेंगे, तो वो किसी बाबू की तरण अनुवाद करेगी.
- 16:46–16:48आपको पहले खुद अपनी बहाशा का अच्छा साहिट्ते अईट्टेट पर डालना होगा
- 16:48–16:53लेकिन क्युकी मेठली समुदाएने अपना बहेटरीन साहिट्ते अईट्टेट पर डाला है
- 16:53–16:58इसली मशीन जब उसे प्रोसेस करती है तो वो उस लेए उस मिट्फास
- 16:58–17:01अर उस सांस्क्रतिक संदर्ब को भी सीखने की कोशिष करती है
- 17:01–17:03ये तो बहुती शंदर नजर्या है
- 17:03–17:06मतलब अगर आपको एएएएए को अपनी बहाशा सिकानी है
- 17:06–17:08तो ये कोई तकनी की लडाई नी है
- 17:08–17:10ये एक सहित्तिक लडाई है
- 17:10–17:12बिलकुल सही पक्डा आपने
- 17:12–17:16आपको पहले खुद अपनी बाशा का अच्छा साहिट्ते अई न्टनेट पर डालना होगा
- 17:16–17:20आई इ इन्सानो के ले कवत्रा नहीं है, बलकी ये एक पाटनशिप है।
- 17:20–17:27आँ, AI बसे एक रिफलेक्ष्छन है, समवूदाय अपनी भाशा के साथ दिजितल सपेस में जैसा व्यवावार करेगा,
- 17:27–17:30मशीने भविष्छ में उसी व्यवावार को दोराएंगी.
- 17:30–17:33तो अगर हम आजकी उस पुई चर्चा को समेटे,
- 17:33–17:40तो आशीश अंचिनार जी किताब हमें एक बहुती लंबी और रोमानचक यात्रा पर लेजाती है.
- 17:40–17:47मैठली वेप पत्र कारिता का ये सफर साल दोहजार के उनदीमे एक आप पेजों से शुरूगवा था.
- 17:47–17:52और वाँ से लेकर आज एए आई और मशीन लेशनें के इस विशाल सन्सार तक का यह सफर सच में अदबुत है.
- 17:52–17:57और इस सफर में हमने देखा की तकनीक कैसे अझन के सबसे अच्छे
- 17:57–18:00और सबसे बूरे दोनो रूपो को बहार लाती है.
- 18:00–18:06अपने अईन्सानी कमजोर्या भी देखी ज़ेसे पहले नमबर पर आने के लिए ब्लोक की तारीखे बदलना,
- 18:06–18:08क्रेट्ट की चोरी करना और लाएक्स के भीशे बागना.
- 18:08–18:11बिल्कुल. लेकिन उसी के समाना अंतर,
- 18:11–18:14हम ने अईन्साली जस्भे की वो जिद बी देखी,
- 18:14–18:21ज़ाग कुछ लोगोने बिना किसी लालजके अपनी भाशा को जिन्दारगने के लिए दिन राद एक कर दिया,
- 18:21–18:25नहीं लिपियों को कोड किया और इक पूरी दिजिटल लाइब्रेरी कड़ी कर दी.
- 18:25–18:27और यही इस किताप की सबसे बड़ी जीद है.
- 18:27–18:28इक दम.
- 18:28–18:32और आब आजकी इस दीप्टाइप को खड्म करने से पहले
- 18:32–18:35मैं श्रोताओ को एक अईसे विचार के साथ चोरना चाती हो
- 18:35–18:39जो इस पूरी यात्रा को देखने के बाद में दिमाग में आटक गया है
- 18:39–18:40या बिचार हो?
- 18:40–18:42हम ने शुरवात में बाद की ती
- 18:42–18:49के कैसे लोग अंटनेट पर पहला मानव लेखा किया पहला बलोगर बनने किले जुटी लडाया लड़रे रहे थे.
- 18:49–18:56लेकिन जरा इस बारे में सोचीए. जिस गती से एए ब्याठिली और अन्यक शित्रिय भाशाये सीक रहा है,
- 18:56–19:00उसे लाको पन्नो का सहेट तेफीट की आजा रहा है
- 19:00–19:02क्या वो दिन दूर है
- 19:02–19:05जब हमें न्टनेट पर मेठली की पहली पुरी तरह से
- 19:05–19:07एए दवारा रचित नोवेल
- 19:07–19:10या कविताओ का संग्रह देखने को मिलेगा
- 19:10–19:13तकनीकी रुब से देखें तो ये अब सर्व विच्यान कता नहीं है,
- 19:13–19:16बलकी ये बहुती नस्दी की समभावना है.
- 19:16–19:17और जब वो दिन आएगा,
- 19:17–19:21चब एक मशीन मेठिली में कोई अईसी कविता लिखेगी,
- 19:21–19:22चो आपको रुला दे,
- 19:22–19:24या कोई अईसी कहानी लिखेगी,
- 19:24–19:54तो थी तो बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ा
- 19:54–19:59अपनी खुतकी बाशा के बारे में सोचे उसका दिजिटल अस्तित्व कहा है,
- 19:59–20:02अवो न्टनेट क्यों पुराने सरवरो में कही खो रही है,
- 20:02–20:06या वो एएएए के साथ मिलकर अपना एक नया इतिहास लिक रही है.
- 20:06–20:09आजकी इस गहन चर्चा में बस इतना ही.
Plain text
विश्वाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद ब ये गदम सही. तो आज की हमारी इस दीब डाईव में, हम एक अईसी ही कहानी पर चर्चा कर रहे है. आदार है, आशीश अंचिनार गी की एक बहुत ही कमाल की किताब मेठली वेप पत्रकारिताक इतिहास. अम और ये किताप स्वफ कुछ तारीक हो या गधनाो की लिस्ट नहीं है बिलको नहीं ये दर सल इस बात का बहुती सती कद्दिन है कि जब कोई भी नहीं तकनी काती है तो अनसानी मनोविग्यान उसके सात कैसे खेलता है अग और शुवात में शुटाऊ को लक्सकता है के ख्षेत्रिये वेप पत्रकारिता के इतिहास में अज़ा क्या ध्रिलर होगा लिकिन मेरा यकीन मानिय, जब आप देकते हैं कि मेठली जैसी एक खषेत्रिय अबहाशाने इन्ट्रनेत के उस दीमे डालप वाले दोर से लेकर आजके एएए यानी आर्टिफिशल अब अब अब आप युग तक का सफर कैसे तैक्या, तो ये किसी सस्पैंस फिल्म से कम नही तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � याहु जीो सितीज पर गजेंद ताकृर दूरा शूरू किया बहाल सरी गाच ये न्टनेट पर मेठिली की पहली प्रामाने को पस्तिती थी श्रोताव की जानकारी किलि तोड़ा सा बतादूं की ये याहु जीो सितीज अगर था क्या इसे आप नहां इंटरनेट के शिर्वाती दोर का एक दिजिटल खाली पलोट समच सकते हैं. आप नहां एक खाली जमीन कितबा? बलकोल याहु लोगों को इंटरनेट पर थोडीसी मुझ्त जगे देता था ज़हां आप बेसिक आज्टीमल कोडिं कर के अपना कुदका एक चोता सा वेप बेज बना सकते दे आपको लेयाुट से लेके टेक्स्ट तक सब कुछ मैनूली ताइप करना पड़ता ता इक दम सही का आपने, कोई रेदी में तेम्ठलेत नी होते ते अछ़मे. और फिर 2004 में समद्या नाम का पहला समचार बलोग शुरू हूँँँँँँ तो ये एक बहुती स्वबहाविक क्रमिक विकास था पहले वेब पेज फिर वेब साइट और फिर बलोग आप लेकिन इसी स्वबहाविक विकास के बीच में कुछ लोगो ने अपनी अलगी ताईमशीन चलादी हाहाहा और किता पर तेवे जो बात मुडे सबसे जाडा हेरान करने लगीना वो ता कतिक रास बात नामक बलोग का विवाद मतलप कुچ लोगोने कुदको इंटनेट पर पहला मेठली ब्लोगर साभिट करने किलिए अपने ब्लोग पोस्ट की तारीको मेही हेर फेर कर दी. और यही पर आपकी वो चानपर भेलगाडी वाले बात एकदम सतीक बेटती है. अन्छिनार जीने अपनी किताब में पूरे फर्जीवाडे को बहुती तक्नीकी और विष्लेश नात्मक तरीके से बेनाखाप किया है मैं चाती हों के हम इस तक्नीकी हिसे को तोड़ा और बारीकी से समझें आखर उनोने ये पख़ा कैसे क्योंकि आम अनसान तो ब्लोक पर जो तारीक लिकि ये बस उसे इसच मान लिता हैं। दिए हूँ ये ता के कते एक रास पात ब्लोक के संचालो को ने 2013 में एक पोस लिखा। लिए नोंने ब्लोक की सेटिंगज में जागर उस पोस्ट की पबलिष देट को बैक देट कर दिया. मडब पुरानी तारीक डाल दी वच उन्निस्ट्शौन निन्न्यान में की. बाप्रे सीदे चोड़ा साल पीचे. ये दिखाना उनका मकसत था के वे उन्निस्व निन्यान्मे से ही अगर निन्ट्टब पर मेठ्ट्ली में लिख रहे हैं. लिए वो तकनी के इतियास को बहुल गे. लेखक ने तकनी की सबूथो के साथ दिखाया, की गोगल ने ब्लोगर सरविस को तो जोजार तीन में ख़ीदा था. औरे? यानी जिस प्लट्फोम पर वे निन्यानवे में पोष करनेगा दावा कर रहे थे, उस रूप मे वो प्लट्फाम तो वजुद में नहीं था. बलकल नहीं. और उस से भी बड़ी बात. कस्टम यूर्ल का फीच्चर, जिस मे आप किसी लिंक के अंदर पुरानी तारीग दिखा सकते हैं, वो फीट्चर ब्लोगर पर 2008 और उसके बात के वर्षो में आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ � उसरी तरासे सर्फ कोड़़ पटीका है और ये बूक सर्फ तारीक है बडलने तक सीमित नहीं किताब हमें अंटनेटके एक और बहुती क्ष्टरनाग डिजान की तरफ लेजाती है वलगडेशिन या सत्यापन की बूक वहुती महतपून बिंदू है जब हम यंटनेट के सफर की बात करते हैं, तो अकसर हम सर्फ प़एदुं पर बात करते हैं, कि सुचना तुरन्त मिल जाती है, बंकिं आसान हो गई है. लेकिन दिजिटल मनो विग्यान समाज को भीतर से कैसे बडल रहा है, किताब इस पर गेहरी चोट करती है. अगर हम इसे मेठली या कि लग बटन लग बटन बनाने लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग बटन लग ब किसी भी चेत्रे साहित्ते के परद्रिष्चे से जोडगगर देखें तो ये एक बड़ भड़ वैच्चारिएक तक्राव है. वो कैसे? देखे शेत्रे साहिते हमेशा से तहराव, गेराई और लंभे विमर्ष की मांक रता है. है ना? हा बilkul. लेकिन अब वो साहिट्य, एक अज़्ेटिटल अखाडे मे दھखेल दिया गया है, जिसे सर्फ तीन सेकंके डोपमाएन हिट्स और तुर्फ मिलने वाले लाएक्स के लेटिटान की अग़्ाए. रहां, मतला लोग कोई अच्छी कविता लिखने से जाड़ा इस बात पर दियान देते हैं कि उस पर कितनी जल्दी लाएक साइंगे. दलकोल. और ये सव्साहिते किस तर पर नहीं हो रहा? वो आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ तो तो थो बज़ागा बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ाग इंसान को ज्यानी के साथ साथ अग्यानी भी बना दिया है वो इसलिये कि अगब हमारी स्मिती, हमारी याद रखनी शम्ता गुगल के सरवर पर निवबर हो गगी है हम जानकारी को अपने दिमाग में प्रोसेस करनेगे बाजा है सरज यंजन पर चोर देते हैं और गुगल की अपनी एक रब यह समस्स्स्या है मतलब अगर आप गुगल पे सर्च करें के दर्ती गोल है तो आलगारिटम आप को उसके सैक्डो वैग्यानिक सबूध देगा लेकिन अगर आप सर्च करें के दर्ती चप्टी है तो वही इंटिनेट आपको उसके भी सेक्डो आटिकल्ज अव लिए देदेगा भिल्कल तो यह आसा हुए खे एकी शल्फ पर असली विग्यान की किताभे और नकली जाधू तोनी की किताभे साथ-सात रख्खी है तो आसे में कोई सत्टे तक पहुचेगा कै से और यही पर इस पूरी सुचना के अवर लोड की आपफत सामने आती है. जब आप के पास सच और जूट दोनो समान मात्रा में एकी जैसी वेप साच पर परोषे जारे हो, तो वहां आपका सब सब ज़ब आथियार आपकी आलोचनात्मक सोच होती है. अपने लगा बाद करी आप नहीं तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा अदिटाई बाज़ा अगर बाज़ा अगर बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ाई बाज़ भी ब्रेड येपी में प्रकाषित करते हैं मैं येई समजन चाती हों के दोहाँ आप दस के दोर में जब मोबाईल में दंग से हिंदी भी ताइट नहीं होती ताब इनोने ब्रेल और तिरुहुता को दिजितल कैसे किया तिरुहुता जो मैठली की मुल लिपी है, कैठी, निवाडी और यहां तक की नेट्रहीनो के लिए, ब्रेर एपी में भी प्रकाषिट करते हैं मैं ये समजन चाती हों के 2008-10 के दोर में जब मोबाईल में दंग से हिंदी भी ताइट नहीं होती ती तब पिर उनो ने ब्रेल और तिरु हुता को दिजितल कैसे किया ये तो तकनी की रूप से बहुत बच्किल रहा होगा ये बेहद बच्किल था और यही इस काम की अस्ली कीमद है आज हमारे पास यूनी कोड है जिसे हम किसी भी देवाईस पर कोई भी बाशा आसानी से देख सकते हैं लेकिन उस समः यें लिपियों को यें लाने के लिए तो पर उन्डो ने किया कैसे? सुम सेवकों को पहले मैंवली फांत डिजाईन करने पडे फिर एक एक अख्षर को उस फांत में कोड करना पडा ता कि जब को उसर वेबसाइत खोले, तो उसे उजीप से दिभबे ना दिख हैं बलकी अस्ली लिपी दिख हैं अदिना दिकें बलकी अस्ली लिपी दिकें और ही वा एक एक अख्षर को कोड ख्या और ब्रेन लिपी को दिजिटल सक्रीन पर उतारना ता की सक्रीन लीडर सुफ्ट्वर उसे पड़ सके और नेट्रहीन शुटाँं तक वो साहित ते पहुट्ष सके ये कम्पौटर सायंज और भाशा विग्यान का बहुती जटिल ताल मिल था ये काम तो किसी बड़े सरकारी विबहाख का हुना चाही एथ जिस के पास करोडो का बजजद हो लिकिन इसे एक समुदाय कुछ समर्पित लोग अपने दम्पर कर रहे है वो भी बिना किसी फववदे के यही एक कम्युन्टी प्रोज्ट की अस्ली ताकत होती है कोई भी बाशा तब तक जीवित रहती है जब तक उसका समुदाय उस्टे जुडा हो है किताब में मैत्टिली विकी पीटिया के समवदाएक संगष्का भी बहुत विस्तार से जिक्र है अं... हम अखसर विकी पीटिया को बहुत हलके में लिते है ना जैसे की ये कोई अटोमातिक मशीन हो हां हमें लकता है कि जानकरी अपने आप आप आजाती है बलक्ल. लिकन एसा नहीं है. 2008 में, जब मैठली विकिपीडिया के लिप्रे आज श्वूए, तो एसा नहीं ता किसीने एक बटन दबाया और विकिपीडिया बन गया. तो क्या प्रक्रिया थी उसकी? लोगों को विकि मीटिया एंखौबेटर में जाना पडा. ये विकिपीटिया का वो टेस्टिंग राउन जाए न नहीं बाशागों का प्रेक्षन होता है स्वायम सेवकोने बिना पैसे लिये अपनी रातों की नींद कहराप कर के हाजारों शब्दों का मैनवली अनवाद किया तकनी की शब्दावली तयार की बाप्रे हाजारो शबत रेक लिखे औद तब जाकर 2014 में मैठली विकी पीटिया को अदिकारिक सुईक्रती मिली इसी तरे 2011 से Google Translate को अपने बाशा सिकाने किले भी देटा फीटिंका लंभा संकर स्थला ये सच में जबरदसत है और केवल तकनीकी मुर्चे पर ही नहीं साहित्ते के मुर्चे पर भी न्टनेत ने पूरी आजादी दी किता बताती है कि अन चिनार अखर जैसे ब्लोग्स ने मुख्यदारा से अलग जाकर मैठली गजल को न्टनेत पर एक नहीं पहझान दी उंहुं उन्हो ने नहें लेखों को जोडा और यहां ता की समानानतर साहित्या कादमी सम्मान भी शुरू कर दिये. इसका सीदा सम अगलव यहें के अगर पारमपरिक संस्थान आपको जगा नहीं देरे हैं, तो इंटनेट आपको अपना कुद का मंच कभड़ करने की आजादी देता है. एक दम सही. और ये निस्वार्थ भाउ से किया गया काम ही अस्ली वेप पत्र कारिता है. ये लोग उन लाइक्स के ले खाम नहीं कर रहे हैं. बलकी आने वली पीडियों के लिए एक दिजिटल द्रोहर तेयार कर रहे हैं ताकि उनकी बाशा सर्वर के किसी कोने में कोनगाए. अब यहां से ना कहानी एक अजे मोडब आती है, जो सीदे बहविष्षिकी और इशारा करता है. दिके जब कोई समवदाय अपनी भाशा का इतना बड़िजटल ड़ेटाबेस तगर लेता है, जिस में पन्द्रा सो किताबे हो, लाको विकिपीटि आर्टिकल्स हो, मिरे मतलब है, तो उस सारे देटा का अगला पडाफ क्या होता है? उसका अगला पडाव है वो तकनीक जो आज पुरी दुनिया को बड़ल रही है अटेफिशल अंटलगेंस अर मशीन लेशनिं पिलकोल किताब का ये आख्री हिस्सा तकनीकी रुब से बहुत ही अधवान्स है आई आई आई आई बारत्टी बाशाँ के लिए काम कर रहा है किताब में बताया गया है कि कैसे एए बारत की कषेत्री ए बाशाँ के लिए काम कर रहा है? आँ, इस में सबसे प्रमोग उदारन है, IIT Madras के नीलेकनी संटर का, एए प्र बारत प्रुज्ट. तो ये प्रुज्ट आखिर करता क्या है? इंका इंडिक ट्रान्स्टू मोडल बहुती क्रान्तिकारी है. ये एक अपन सूर्स आया आई मोडल है, जिसने अंग्रेजी और बाइस भार्तिये बाशाँँ के साथ सात अद मेतली में भी बहुत सतीक और हाई कोलेटी अनुवाद को समबो बना दिया है. और बवाग, और इसके लावा कोई और प्रुजेक भी है? जी, GNU के प्रुफेसर गिरीशनात जहा के निर्देशन में माख्रो सोफ्ट का बिंक च्रन्सलेटर प्रुजेक भी चल रहा है, जो मेठली को सीदे गलोबल टेक एको सिस्टम से जोड रहा है. यहां मैं आप से इं तक्नीकी शब्डों के पीचे का विग्यान समजना चाहती हूँ। किताब में, स्पीच रेकिणिशन और स्पीच सिंठिसस जैसे शब्डों का इस्तमाल हूँँ आ है कषेत्रिय बहाशाँ के संदर्ब में इंका आखिर मतलब क्या है इसे बड़ती सरल बहाशा में समचते हैं, श्पीच रेकशन का मतलब है, कमपूटर की वो शमता, जिस से वो आपकी आवाश सुनकर उसे ताईप कर सके, ज़से आप अपने फोन में बोलकर कुछ सरच करते हैं आ? आ, वो वोईश सरच वाला फीचर. बिल्कुल, मेतली जैसी बाशा के लिए प्छीन को रगग रग लजों और उचारनों को समझना सिखाया जारा हैं. और दूसरी तरव है स्पीच सिंठिसिस, जिस का मतलब है, लिखेवे तेक्स को स्वाबहाविक अवाज में बदलना जैसे आमेजन लेक्सा या गुगल असिस्ट्टिन बोलते हैं तो क्या इस का मतलब यहे है के बहुविष्ष्वे हम अपने स्माथ स्पीकर से सीधे मेठली में बात कर से केंगे बलकल कर से केंगे जब मशीन किसी बाशा की लिपी, उसके शब्द कोश और उसके व्याकरन को पुरी तना से माप कर लेती है, तो उसे इन्सानो की तरा प्रोसेस करना शुरू कर देती है. ये जो A.I वाली बाथ है, ये बहुत दिलचस्प तो है, अगर दिक्छनरी लिए तो बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए ब तो बद्या बर ग़ानी बाशावे नाई नीजानी बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे नाई बाशावे ना� अदर नट बाशा की जो कविताए, कहानिया और मुहावरे अनट बडाले है, वही अई अई की असली खुराग है. अगर अप मशीन को सच्फ रूके सरकारी दस्तावेस पड़ाएंगे, तो वो किसी बाबू की अनुवात की अपने लेगा, अप आग इन लोगोने अपनी बाशा की जो कविताए, कहानिया और मुहावरे अंट्रनेट पडाले है, वही एएएएए की असली खुराग है. अगर आप मशीन को स्वर्फ रूके सरकारी दस्तावेश पडालेंगे, तो वो किसी बाबू की तरण अनुवाद करेगी. आपको पहले खुद अपनी बहाशा का अच्छा साहिट्ते अईट्टेट पर डालना होगा लेकिन क्युकी मेठली समुदाएने अपना बहेटरीन साहिट्ते अईट्टेट पर डाला है इसली मशीन जब उसे प्रोसेस करती है तो वो उस लेए उस मिट्फास अर उस सांस्क्रतिक संदर्ब को भी सीखने की कोशिष करती है ये तो बहुती शंदर नजर्या है मतलब अगर आपको एएएएए को अपनी बहाशा सिकानी है तो ये कोई तकनी की लडाई नी है ये एक सहित्तिक लडाई है बिलकुल सही पक्डा आपने आपको पहले खुद अपनी बाशा का अच्छा साहिट्ते अई न्टनेट पर डालना होगा आई इ इन्सानो के ले कवत्रा नहीं है, बलकी ये एक पाटनशिप है। आँ, AI बसे एक रिफलेक्ष्छन है, समवूदाय अपनी भाशा के साथ दिजितल सपेस में जैसा व्यवावार करेगा, मशीने भविष्छ में उसी व्यवावार को दोराएंगी. तो अगर हम आजकी उस पुई चर्चा को समेटे, तो आशीश अंचिनार जी किताब हमें एक बहुती लंबी और रोमानचक यात्रा पर लेजाती है. मैठली वेप पत्र कारिता का ये सफर साल दोहजार के उनदीमे एक आप पेजों से शुरूगवा था. और वाँ से लेकर आज एए आई और मशीन लेशनें के इस विशाल सन्सार तक का यह सफर सच में अदबुत है. और इस सफर में हमने देखा की तकनीक कैसे अझन के सबसे अच्छे और सबसे बूरे दोनो रूपो को बहार लाती है. अपने अईन्सानी कमजोर्या भी देखी ज़ेसे पहले नमबर पर आने के लिए ब्लोक की तारीखे बदलना, क्रेट्ट की चोरी करना और लाएक्स के भीशे बागना. बिल्कुल. लेकिन उसी के समाना अंतर, हम ने अईन्साली जस्भे की वो जिद बी देखी, ज़ाग कुछ लोगोने बिना किसी लालजके अपनी भाशा को जिन्दारगने के लिए दिन राद एक कर दिया, नहीं लिपियों को कोड किया और इक पूरी दिजिटल लाइब्रेरी कड़ी कर दी. और यही इस किताप की सबसे बड़ी जीद है. इक दम. और आब आजकी इस दीप्टाइप को खड्म करने से पहले मैं श्रोताओ को एक अईसे विचार के साथ चोरना चाती हो जो इस पूरी यात्रा को देखने के बाद में दिमाग में आटक गया है या बिचार हो? हम ने शुरवात में बाद की ती के कैसे लोग अंटनेट पर पहला मानव लेखा किया पहला बलोगर बनने किले जुटी लडाया लड़रे रहे थे. लेकिन जरा इस बारे में सोचीए. जिस गती से एए ब्याठिली और अन्यक शित्रिय भाशाये सीक रहा है, उसे लाको पन्नो का सहेट तेफीट की आजा रहा है क्या वो दिन दूर है जब हमें न्टनेट पर मेठली की पहली पुरी तरह से एए दवारा रचित नोवेल या कविताओ का संग्रह देखने को मिलेगा तकनीकी रुब से देखें तो ये अब सर्व विच्यान कता नहीं है, बलकी ये बहुती नस्दी की समभावना है. और जब वो दिन आएगा, चब एक मशीन मेठिली में कोई अईसी कविता लिखेगी, चो आपको रुला दे, या कोई अईसी कहानी लिखेगी, तो थी तो बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ा अपनी खुतकी बाशा के बारे में सोचे उसका दिजिटल अस्तित्व कहा है, अवो न्टनेट क्यों पुराने सरवरो में कही खो रही है, या वो एएएए के साथ मिलकर अपना एक नया इतिहास लिक रही है. आजकी इस गहन चर्चा में बस इतना ही.