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गंगेशक_प्रेम_आ_विस्मृतिक_षड्यन्त्र.m4a

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Part 2 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 2
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  1. 0:00–0:08कनिक कल्पना करू, जे हम्रा सब जे इतिहासक पोठी पड़े ची उ भीतल समय का सत्ति बताबखलिल नहीं लिखल गलो?
  2. 0:08–0:13आप, माने जानी भुजी का किछ बात भिस्राएबखलिल लिखल गलो?
  3. 0:13–0:18इक्दम बुजुजे हम्रा सब के बहुत रोष्यारी से ब्हुलाएबक ले लिखाल गे लो.
  4. 0:18–0:22की हो आजन कोनो समाजक सबसे पैग सत्य के जानी बुजी का,
  5. 0:22–0:23पोथी से मिता दिल जाए.
  6. 0:23–0:26औग, मिताल गेल सत्य एक ता भूथ बनी का,
  7. 0:26–0:28अगी समाजक चारो कात गूमेत रहे
  8. 0:28–0:30यी वाक यी एक टा एहन विशय अची
  9. 0:30–0:34जे हमरा सब कष शोचबाक प्रक्रिया के जगजोरी कर रहे तची
  10. 0:34–0:35सही बात
  11. 0:35–0:38आई हम सब एक टा एहन दून्या में प्रवेश करोड़ ची
  12. 0:38–0:41जताएग इतिहास, गियान, और कल्पना का भीज
  13. 0:41–0:45अर कल्पना का भीज एक ता बद्द भयानक युध्द चली रहुल अची
  14. 0:45–0:47हम्रा सब के साद्दारन तया लगे तची
  15. 0:47–0:50जे जे लिखल गे लची से सत्ते अची
  16. 0:51–0:52मुदाजे मेटाए देल गे लची
  17. 0:53–0:56अकर सक्ती कते को भेर भेशी ब्यावंकर हुए तची
  18. 0:56–0:56हा?
  19. 0:56–1:01आआ आई हमरा सबके इगहीर विमर्ष कोनो साददधरन विषेपर नहीं आची
  20. 1:01–1:07हम सब चर्चा करो हल ची विदे हे इप्रत्रिका में प्रकाषित नाटक उलका मुखपर
  21. 1:07–1:10जकर समपादन गजेंद्र ताकौल केने चतिन
  22. 1:10–1:15और 2012 में बेचन ताकृर कर निर्देशन में एकर मनचन भेलचल.
  23. 1:15–1:19इकोन भीतल समय कर नीरस कता नहीं आची.
  24. 1:19–1:20बलकु नहीं.
  25. 1:20–1:33यी गंगेश आवल्लबाक प्रेमक माद्धिम सव, स्म्रिती माने याद रखव, आविस्म्रिती माने भिसरी जाएब के भीच चली रहल संगर्ष्क एक ता बहुत जीवन्त गाता आची.
  26. 1:33–1:41जक्रा सुन्लाक बाद, हम्रा सबखजे ग्यान अई इतिहास के देखबाग नजरी आची उ पुरन रूप से बदली जाएत.
  27. 1:41–1:44ता चलो, एक राकनिक ग़ेराय में जाके भुजही ची?
  28. 1:44–1:47नातेक पहिल हिस्सा बद्याना कर सकचे,
  29. 1:47–1:51जते गंगेश आवल्लबाक प्रेमक प्रसंग वेता है.
  30. 1:51–1:54जे स्रोता गंगेशक बारे में नहीं जानिच्छती,
  31. 1:54–1:58उनका लेल बतादी जे चोदवम शताब दिक मित्हिला में
  32. 1:58–2:01गंगेश उपाद्ध्याई एक तब बड पैग नाम चला.
  33. 2:01–2:07आ, उ, तत्व छिन्ता मनी जका भारी न्याएशास्ट्र अतर्क शास्ट्रक रच्नाकिलनी.
  34. 2:07–2:37नियाई शास्र माने एक्दम विषुद्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्
  35. 2:37–2:45बन्देज जेंगा वेक्तिक लेलजकर पुरा जीवन सुत्र आसिद्दान्त में भीतल हुए, हुंकर प्रक्रतिक सुन्दर या आप्रीम का गीत रचब
  36. 2:45–2:52अगटा बवद्धिक भूकमप जका आचे ओआ ब्रम्हांद के सर्फ तर्कक नजरिस नहीं
  37. 2:52–2:55बलकी बहावना आई अनुबोटिक नजरिस देखी रहल चाती
  38. 2:55–3:01यह तव उईना भेल जना कोनो सुपर कम्पुटर का आलगोरिदम अचानक रोमान्टिक गजल लिख़ा लिखफ शुरू कर दैए.
  39. 3:01–3:09आख आख एक दम सती कुदारन आची, जे मशीन सर्फ गनित कबाशा भुजेच छे औई आचानक से बहावनक बात करे लागे.
  40. 3:09–3:19मुदा एते हमरेक्ता प्रष्न अची, उही समःक जी समाज अची मने, तोल अच्छवाडी, उहुंकरी प्रेम कर एते कडा विरोद किया कर अची.
  41. 3:19–3:22जक्रा नातक में स्तुल प्रेम कहल गल अची.
  42. 3:22–3:28आप, वैई. कुन पैक विद्वान जब प्रेम कविता लिखिर रहा लगची, तवो ही में समाजका की नुक्सान आच्छ?
  43. 3:28–3:36देखो, नुक्सान प्रेम से नहीं आच्छ, बलकी उही प्रेम कखारने, जए समाजिक दहाचा डोली रहा लगचे, उक्रा से आच्छ.
  44. 3:36–3:40ये देव्दत का पात्र के भुजब बडजरूरी आचे
  45. 3:40–3:41देव्दत
  46. 3:41–3:44अज़ा उही समाज का बद्दिक �thekidār चती
  47. 3:44–3:45एक दम
  48. 3:45–3:48उग गंगेश की एक ता चितावनी देच चतीन
  49. 3:48–3:50उए विस पश्ट कही चतीन
  50. 3:50–3:57जे पाज्सो वा हजार वर्ष कबाद गंगेशक तव छिन्ता मनी पर ता हजारों तीका तिपनी लिखल जाएत.
  51. 3:57–4:00मुदा हुनकर प्रेम का चर्चा कियो ही करत.
  52. 4:00–4:01बिल्कुल.
  53. 4:01–4:06इतिहास यर्फ अख्रा याद रख हैता ची जिस समाजक नियम में फित बैसे तची.
  54. 4:06–4:10इतिहास ब्हावना किनही तरक के यादर कही तची
  55. 4:10–4:12तजगा हम थीक भूजी रहल ची
  56. 4:12–4:15तदेव दद्तक कहबाक अर्ठ यह ची
  57. 4:15–4:18जिस समाज के गंगेशक न्याए सास्त्र तच्विकार अची
  58. 4:18–4:21कारन औश रेष्ट्टा स्था स्ठापिट करे तची
  59. 4:21–4:27अग, मुदा वल्लबाक संगे हूंकर प्रेम सामाजिक नियमक विरुद मानल जारा है लाची.
  60. 4:27–4:31समाज नहीं चाहे तची, जे हूंकर पेग विद्वान सामाजिक नियम तोड़ै.
  61. 4:32–4:36अह, ताहिलेल समाज गंगेशक, तरककत इतिहास में नमर करभा चाहे तची.
  62. 4:36–4:40मुदा हुंकर कविता के जानी भूजी का मिटाएप चाहेता ची
  63. 4:40–4:44यहे आचे, यह एक ता सुविचारत विष्मरीति का शद्यान्त्र आची
  64. 4:44–4:46इश्यान्त्र अग भाज जगन उच्छल आची
  65. 4:46–4:50ता नाटक में एक ता बद रोचक विज्वल प्रतीक अचाचा आची
  66. 4:50–4:53मंज पर रखल शत्रन्जक खन मने क्यूब
  67. 4:53–4:54हाँ
  68. 4:54–4:57उ गन कोनो सादारन वस्तू नहीं आची
  69. 4:57–4:59पहले ता हमरा एक निक अजीब लागल
  70. 4:59–5:01हमर मतलप प्रेम के कता
  71. 5:01–5:05आई आचानक मंच पर एक ता शत्रन्जक खन
  72. 5:05–5:06एक रकी काज
  73. 5:06–5:12उश्ट्रन्ज का गण मूल रूप्सा समे का पैग अंद्राल तार्किक्ता का कतूर्ता
  74. 5:12–5:15अविस्म्रिति के जे दर अची तक्रा दर्षावेत अची
  75. 5:15–5:16अग...
  76. 5:16–5:19कनिक, एक रा और स्पष्ट करू?
  77. 5:19–5:23देव दद्त गंगेश के, उई गण का चोसट्च्ता खाना पर
  78. 5:23–5:27दानक दाना गिन्तिक एक ता गनित्य उदारन देच्छती.
  79. 5:27–5:28औग, औग.
  80. 5:28–5:32वही जे पहल खाना पर एक ता दाना दो सर पर दूटा थे सर पचारीता.
  81. 5:32–5:33एक दम.
  82. 5:33–5:36इच्छो सथम खाना दरी जाद-जाद,
  83. 5:36–5:39गनित्य रूप से इतिक पैग संख्या बनी जाएत ची,
  84. 5:39–5:42जे सम्पून प्रिद्वीक अन्न खतम वोजाएत
  85. 5:42–5:43बाप्रे
  86. 5:43–5:45इत अग्स्पनिन्चल ग्रोट के सिद्धान्द बेल
  87. 5:45–5:48मुदा एकर एही कता सकी सम्बन्द चे
  88. 5:48–5:49सम्बन्द एए आची
  89. 5:49–5:52जे गण उई कत्फोर गनित
  90. 5:52–5:54आच्चमै कविशाल अंट्राल कप्रती कची
  91. 5:54–6:01देव्दत् भुज़्ार हल्चत्ही जे हाजारो वर्ष्कई जे विशाल समेचक्र अची उहमे केवल तर्क्तिकएत.
  92. 6:01–6:05माने गंगगं जका जे कदोर अची उआँ समेग के मार साई लेत.
  93. 6:05–6:11अग, मुदहुनकर प्रेम जे कोमल अची उ उहे समय कबोजतर दवाक मरी जाएत.
  94. 6:11–6:15गन अकार में सीथा रिखावला होई तची जिना नयाए शास्त्र.
  95. 6:15–6:18एह में भहवना कोनो गुन जाएश नहीं चे.
  96. 6:18–6:20कमालक प्रकीख वाद ची.
  97. 6:20–6:26मुदद जक्चन समाज गंगेशक प्रेम के कविता सब के नश्ट करवाक साजिश करे तची,
  98. 6:26–6:31तकन कताजे मोड ले तची उ बड़ रुमानचित करे वाला चे.
  99. 6:31–6:34कारण उ कविता सब मरी नहीं जाई तची,
  100. 6:34–6:37उ एक ता नव रूप ले ले तची.
  101. 6:37–6:43आँ उल्का मुक नामक एक ता भूतिया या विद्रोही सुर बनी जाएत छी,
  102. 6:43–6:49जे बास बिट्टी में बाहरक जे सूंसान जगा हुएत छी,
  103. 6:49–6:51उते गूमेत रहेत छी.
  104. 6:51–6:57इ उल्का मुक उही दवायल्गेल सत्यक प्रती कचे जक्रा समाज नष्ट करब चाहलाहन.
  105. 6:57–7:05ता आहा कबाक अर्थ चे जगन कोनो विचार के जबर्दस्ती मिताबक प्रास होई तची, ता ओ नश्ट नही होई तची.
  106. 7:05–7:09बलकुल ने, उ कोनो नो कोनो विद्रो ही रूप लई ले तची.
  107. 7:09–7:14एते गंगेशक प्रेम के कविता के उलका मुख कर रूप बहेता लची.
  108. 7:14–7:18अब भूथ बनी कष समाजग परदी पर मन्डरा रहा लग ची
  109. 7:19–7:22आई एते सं नाटक में जे संस्तागत विस्मिरती
  110. 7:23–7:26मने अंस्तिटॉषनल आमनिश्या के गब अबेद ची
  111. 7:27–7:28अब बहुत महत पूँण अची
  112. 7:28–7:30अख्रा बूज़़़ आवश्यक अख्ची
  113. 7:30–7:33अख्चाई, हम एक ता प्रष्न तरग्छाज़,
  114. 7:33–7:36इई संस्तागत विस्मिरती सुनब में
  115. 7:36–7:40आपन लगाई तची, जना कोनो बहुत पेग साजिष चली रहल हुए,
  116. 7:40–7:42मुदा असब तगुरु च्थिन ना
  117. 7:42–8:12अचार्य सर्भख के टसम्वाद अची जते अस पष्ट कहच्छतिन जे गंगेश क ताई चाजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजि�
  118. 8:12–8:15वद्द्व चिन्तामनीक आस्ली आप्ट्ट् कियो नहीं बुजिया
  119. 8:15–8:16शिर्फ वुक्रा रती लेए?
  120. 8:16–8:17एक दम
  121. 8:17–8:19एक ते रत्बाक जे प्रक्रिया आची
  122. 8:19–8:22उ आसल में विस्म्रितिक एक ता हत्यार आची
  123. 8:22–8:25कोना? रत्बाक मतलप तमान राखभ बहल ना
  124. 8:25–8:30अग, उगगगेश का मानव स्वरुब केन, उनकर प्रीम केन, उनकर कविता केन से हो खोजी लेद.
  125. 8:31–8:37ताही लेल शिक्षा प्रनाली इस उनिष्चित करही तची, जे ग्यान स्व्व एक टा कर्मकान्ड बनी करही.
  126. 8:37–8:42माने जो विद्यारती गंगेश खपोतिक आर्थ भूजी लेद तो उप्रशन करत?
  127. 8:42–8:45आ, उगंगेश का मानव स्वरूब केन,
  128. 8:45–8:49उनकर प्रीम केन, उनकर कविता केन से हो खोजी लेद.
  129. 8:49–8:52ताहिलेल शिक्षा प्रनाली इस उनिष्चित करओी तची
  130. 8:52–8:56जे ग्यान स्र्व एक ता कर्मकान्द बनी कर अगी जाए
  131. 8:56–8:57बाप्रे
  132. 8:57–8:59इत बहुत गहीर बाद भेल
  133. 8:59–9:02उहिना भेल जना हमरा शबका
  134. 9:02–9:04कमपूटर का हाट्डाइव में होई चे
  135. 9:04–9:05की कहे ची आहा एहा हाट्डाइव
  136. 9:05–9:10आँ, जना जा हम कोनो फाँल के कमपूटर से दिलीट कर देईची,
  137. 9:10–9:12ता हमरा लगे ची उखतम भोगेल.
  138. 9:12–9:16मुदो अकर कोनो खोनो हिस्सा, हाट़्ाएम कतो नुकाल रही जाएत ची.
  139. 9:16–9:20गजजब को दारन देलहूँ, आँँ, एक दम वही बात अची.
  140. 9:20–9:24सत्तादारी वर्ग के लगगे तची जो फाईल डिलिट कर देलग
  141. 9:24–9:26अग, मुतो उ फाईल कतो जाएत नहां आची
  142. 9:26–9:30तकी गंगेश के प्रेम आ उ कविता सब
  143. 9:30–9:32जे उलका मुख बनी गेल आची
  144. 9:32–9:35उ शच्मुच एही रतनत विद्या सम्मेटाल जाशकल
  145. 9:35–9:36बलकुल नहीं
  146. 9:36–9:41जखन चोपारी अशिक्षा संस्थान इतिहास के पन्नासम मेटबैतची
  147. 9:41–9:46तकनो सत्या लोक गाता लोक गीतक रूप लालेतची
  148. 9:46–9:49जना नाटक में दीना भद्री वा सलेष का कता जे
  149. 9:49–9:58आवन्षी दरक लोक गाता, कमला मयाक गीत, बालगुरयाक गीतक जे प्रयोग अची उ इते सार्थक्ता पावे तची.
  150. 9:58–10:04मने जे इतिहास पूती सब बाहर कदेल गिल, उकरा आम जन मानस अपन गीत में बचाले लक.
  151. 10:04–10:15इक्दम इतिहासकार जखन पन्नापसन नाम मिटवैई चतिन, तकन उ सत्यः प्रतिक और गीत के रुप लोका आम लोका कन्त में सुरक्षिट बजगाईत अची.
  152. 10:15–10:17इत बहुत सुन्दर बात अची.
  153. 10:17–10:21दीना भद्री और सलहे सक, लोक गाता इतिखावत अची,
  154. 10:21–10:28जगरा समाज के उच्छवर्ग दबाईल गेल, अगरा लोक अपन स्मिर्ती में आमर कले लक.
  155. 10:28–10:32उगीत आसल में इतिहासक हार्ट्ट्डाइब बाखव अच्छी.
  156. 10:32–10:36अओ, अओलका मुक उज्छि लोक स्मिर्तिक विद्रोही रूप अच्छे,
  157. 10:36–10:41जे बास बिट्टी में गूमी रहा लगजी, जे प्रतीषा करहा लगजी, जे कखन अख्रा वापस आबक मोगा भेटद.
  158. 10:41–10:43एक दम सही बुजलो है.
  159. 10:43–10:47मने हम्रा सब के चारो काज ये लोग गीत गाएन बहरहा लगजी,
  160. 10:47–10:51उसर गीत नहीं उदबायल गेल इतियासक दस्तबेज अची
  161. 10:51–10:54आप इस शच मे यक तवीचारो तेजक विन्दू अची
  162. 10:54–10:57बूदा एते सा नाटक जे एक तवीशाल चलाँं लगावे तची
  163. 10:57–10:59उब बड अस्चर जनक अची
  164. 10:59–11:03नाटक सीदे साथ सो वर्ष के बादक वास्त्विक्ता में प्रवेश करता ची
  165. 11:03–11:06आए दे मन्जपसे एक पैग बद्लाव होई तचे
  166. 11:06–11:09उजे शत्रन्ज का गश्टल उक्रा हता दिल जाई तची
  167. 11:10–11:14आउकर जगा एक ता गोला मने स्विर राखी दिल जाई तची
  168. 11:14–11:17गोन हताक गोला रक्बाकी अवश्षक्ताचल
  169. 11:17–11:21इबदलाओ बहुत गहीर प्रतिक कात्मक अद्द रक्छे तचे
  170. 11:21–11:25गं कल्पना भूद्काल असे द्दान्तिक वाद्विवादक प्रतिक चल
  171. 11:25–11:28उ मानव निर्मित अची जकर एक ता सीमा आचे
  172. 11:28–11:32मुदा गोला, गोला तो प्रत्विक प्रतीक अची
  173. 11:32–11:36इक्दम, उ वास्तविक्ताक प्राक्रतिक चक्रक अवर्तमानक प्रतीक अची
  174. 11:36–11:39गोला में कोनु तीक्हा कोना न नहीं हुई तची
  175. 11:39–11:41उ निरन्तर चलेट रहे तची
  176. 11:41–11:47उहो माने अब कता सइद्दान्तिक लोक सबाहर निकल कः सीदे याठार तक दरातल पर आभी गेल आचे.
  177. 11:47–11:50आप, इस साथ सो वर्स बादक समय आचे.
  178. 11:50–11:56आर एते यसबसे दिल्चस्त बात इए आचे जे ओ पुरान पात्र आब नौ रूप में जन्मलेल नची.
  179. 11:56–11:59इक ता पुर्न पुनर जन्म कच्च्र आचे
  180. 11:59–12:29आप आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आ�
  181. 12:29–12:59अगर उद्बाद बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बा�
  182. 12:59–13:02अचारे कारन समबन्त खुजबाक बाल सुलप जिग्यासा जीना.
  183. 13:03–13:06बलकुल, प्रक्रिति में जब हुरे हैल अची,
  184. 13:06–13:09उकर कारन पुछ़व अप्राद कोना भहसा कै तची.
  185. 13:09–13:15इबेंग वाला प्रष्चन असल में संस्तागत शिक्षा प्रनालिक ज़द पर प्रठार अची.
  186. 13:29–13:34जखन के हु पूछे चे जे की एक तकहनो रटन तविद्याक वर्चस्व के चूनाती देई तचे.
  187. 13:34–13:38आ, कारन सत्ता नहीं चाहत छे जे की हो सवाल करे.
  188. 13:38–13:44जों लोग सवाल कर वप शूरू कदेत, तो विस्मिरितिक जे सद्यन्त्र थी उ तूटी जाइत.
  189. 13:44–13:45इक दम सही बात.
  190. 13:59–14:05तव आप अगान बाटे लागे तछी तखन अस्ली ज्यान समाज कर उही हिस्सा से अवे तछी जख्रा हाँशे पर राखल गे लची
  191. 14:05–14:10मने जखन विवस्ता सरी जाई तछी तखन नो प्रकाष परडिदी से अवे तछी
  192. 14:10–14:14जखन संस्तागत शिक्षा अग्यानता बाटे लागे तची
  193. 14:14–14:18तकन आस्ली ज्यान समाजकर उही हिस्सा से अवे तची
  194. 14:18–14:20जख्रा हाँश्ये पर राखल गे लची
  195. 14:20–14:23मने जखन विवस्ता सरी जाई तची
  196. 14:23–14:25तकन नो प्रकाश परिदी से अवे तची
  197. 14:25–14:26हाँ
  198. 14:26–14:31गंगादर पाट्शाला चोडी कद सबत्रीक भोन चली ज़थें
  199. 14:31–14:35उते हुँँका एक ताभीज भिटे चनी उलका मुखी ताभीज
  200. 14:35–14:38जे रिषी जटा हुँका दाए चथें
  201. 14:38–14:40रूकु रूकु, उही उलका मुखी
  202. 14:40–14:43जि साथ सो साल पहले गंगेषक प्रेम कर कविता चल
  203. 14:43–14:48जे बास्बिट्ती में भूद बनी कगूमै चल, एक दम सही पकर लो है.
  204. 14:48–14:53बाप्रे, उ कविता जे दबायल गिल चल, उ आब एक ताभीज बनी कवापी साभी गेल आची.
  205. 14:53–15:00हा, उ ताभीज गंगाद हरकेन सत्यक खोज में मार्ग दर्षन करे तची.
  206. 15:00–15:03और भोन में, हुंकर जे आस्ली गुरू बनेच्छत्छति,
  207. 15:03–15:07उकोनो बहुत पेग आचारियने, बलकि, हीरू चति.
  208. 15:07–15:11हीरू? हीरू जे एक ता दलित गायक आचर मकार चति.
  209. 15:11–15:14इद्रिश्य पुरा नाटक का जान आची.
  210. 15:14–15:17हमरो लागल जे हीरुक प्रसंग बहुत क्रान्ति करी आची
  211. 15:17–15:21मुदा हम चाहव जे आहा एक रेकानिक और विस्तार से समजग।
  212. 15:21–15:25एक ता चर्म कार जे समाजक सोपान में नीचार अखल गेल आची
  213. 15:25–15:27उहुंकर गुरु कोना बन जाएच्छती
  214. 15:27–15:32दिको, आपे एक ता बहुत गहीर सामाजिक राजनेतिक विमर्षा ची
  215. 15:32–15:36समाज कनज्री में चर्म कार अपवित्र मानल जाएच्छती
  216. 15:36–15:37मुदहीरु की करेच्छती
  217. 15:37–15:40अप तमुलाल मालक चाम सामादल आम्रेदंबन वेच्छती ना
  218. 15:40–15:43हाँ, जे जान्वर मरी गला ची
  219. 15:43–15:49जक्रा समाज भेकी देलका चे, उही चाम से उस संगीत लै अजीवन निकालै च्छती.
  220. 15:49–15:50गज़ब अची इज़.
  221. 15:50–15:54जते राज्दर्बार में दर्बारी सब स्रटंत विद्या बान्ती रहाल च्छती,
  222. 15:54–15:56जे ग्यान भीतर सम मरी चुकल अचे,
  223. 15:56–15:59उते हीरु प्रक्र्तिक संजुडावसे
  224. 15:59–16:01आस्ली ज्यान विखसिट करहे अज्छती
  225. 16:01–16:04मने ज्यानक आस्ली श्रोट महल्वा पाट्शाला में
  226. 16:04–16:08बलकी बून में प्रक्र्तिक भीच आ एक ता चर्मकारक लोग गीत में भीते अची
  227. 16:08–16:10इक्दम सतीक बात कहलूं
  228. 16:10–16:17इए उईव्यवस्ता पर तमाचा आची, जे ज्यान के सर्फ किछ उच्वर्गक बपोटी मानत आची.
  229. 16:17–16:21जे पोठी नहें पड़े सकेता चे, कि उकर लग ज्यान नहें आची.
  230. 16:21–16:23रदन्त विद्या शब्द के हत्या ची
  231. 16:23–16:24बिल्ल्कुल
  232. 16:24–16:27गंगादर जकन रिए। शिष्वनेथ चतिन
  233. 16:27–16:32तकन उ थ्यानक एक ता पून तया नव परमपरा के स्विकार करहल चतिन
  234. 16:32–16:38जे समावेशी अची असत्तिन ज़ादान परमपरा करहल चतिन
  235. 16:38–16:40अगर अदर बद्या शब्द के हत्या ची
  236. 16:40–16:41बिल्ल्कुल
  237. 16:41–16:44गंगादर जखन रीड़ूख शिष बनेट चत्फीन
  238. 16:44–16:49तकन अग्यानक एक ता पूँन तया नव परमपरा के स्विकार करहल चत्फीन
  239. 16:49–16:52जे समावेशी अची असत्देक नज्दीक अची
  240. 16:52–17:00इप पुरा के पुरा दिकोडिंग सून्ला के बाद हम्रा लगे तची के हम्रा सब के एकर एक ता समग्र चित्र बनेवा कावषकता आची.
  241. 17:00–17:01आप एक दम.
  242. 17:01–17:31जज़ाम सव आही समपून चर्चाक सार निकाली, तक गंगेश कर तर्क के विरुद, हुनकर कवीता उलका मुखक भूत्यागीट, शत्रनज के गनक जगा प्रिठ्विके गोला, और अंत में दरबारी आचारे सबखबरध्स, हीरुक शिक्चा. इस सबख की अर्ठ निकलेत अ
  243. 17:31–17:34तव उ ग्यान नहीं विस्म्रती यच्छे
  244. 17:34–17:38माने उ ग्यान वास्तब में आग्यानता से हो खतरना कचे
  245. 17:38–17:40कारन उकरा लगे टच्छे
  246. 17:40–17:42जो सब किछ जनई टच्छे
  247. 17:42–17:44मुदा असल में उकि चूए नहीं जनई टच्छे
  248. 17:44–17:47हा, प्रेम कविता, लोग गाता
  249. 17:47–17:50गाता और सादारन लोग का अनुबहव,
  250. 17:50–17:54उही रतन्त विद्या किलाफ एक ता आमर विद्रोह अच्छी.
  251. 17:54–17:57आएहे में उलका मुख कजे बूमी का जे,
  252. 17:57–17:59उ आशा जगावे तचे.
  253. 17:59–18:02जगुन सत्ता आहाक एतिहास के पोती से
  254. 18:02–18:03डिलीट करव चाहे तची,
  255. 18:03–18:05तो उसत्या खटम नहीं होई ताछी
  256. 18:05–18:06भिल्कुल
  257. 18:06–18:09उकोन अकोन रूप में वापस जरूर आवे तचे
  258. 18:09–18:12उलका मुख एही बातक प्रती कचे
  259. 18:12–18:16जे दबायल गिल सत्या नव रूप में वापस आईबे कर अई तचे
  260. 18:16–18:19उकरा हमेशा कलेल मिताल नहीं जासके चे
  261. 18:19–18:28नाई, उ व्यवस्ता के कोनो कूना में, लोग गीत में, लोग गाता में नुकाल रहत, आस समय अलापर फेर सजीविद बहुजाएत.
  262. 18:28–18:35गंगेशक तरक इतिहास में दर्ज भेल, मुदा हुंकर कविता उलका मुख बनी कजजिन्दा रहल.
  263. 18:35–18:41आँ साथ ससाल बाद गंगादर आहीरुक रूप में उ विद्रोज छेर सथार भेल.
  264. 18:41–18:45इस सच में एक ता एहन सत्या ची जी रोंक्ता क्डा कर दीतेच.
  265. 18:45–18:49एक दम हम्रा सब जक्रा अदिकारिक इतिहास मानत ची
  266. 18:49–18:52उ कते को बेर स्व्व उत्टी बे होई तची
  267. 18:52–18:54तक सत्ता हमरा याद रखाई दा चाहित चीज
  268. 18:54–18:58मुदा असली सत्ति लोकक सुम्रती में जीवित रही तची
  269. 18:58–19:00आए एह लेल प्रश्न पुच्छा बड़ जरूरी आची
  270. 19:00–19:05जैना चोटका गंगादर पुचलनें जे बेंग पाईन में कुदे आसे कीएक
  271. 19:05–19:08इसवाल समपुन विवस्था के हिलादेई तची
  272. 19:08–19:10आजी विवस्था चाही तची
  273. 19:10–19:13जी लोग स्रफ रटे सोचे नाए
  274. 19:13–19:15इस पूरा विष्लेश्टन सून्लाक बाद
  275. 19:15–19:17हम्रा लागत अची
  276. 19:17–19:19जे इतिहास अग्यान के देखबाक नजर्या
  277. 19:19–19:21एक दम सबदल गे लची
  278. 19:21–19:28हम्रा पुन विश्वास अची, जे ईविमर्ष् सून्लाक बाद लोक पन समाजग गीइत आगाता के एक तन्नव नजर्या सी देखध.
  279. 19:28–19:33सत्या के जान्बा के लिल स्व पोठी पर निरभर रहेप पर्याप्त नहीं अची.
  280. 19:33–19:41ता इचल हमरा सबक आयो गहीर विमर्ष उलकामुक नाटक के बहाने स्म्रिती विस्म्रिती अग्यानक विद्रोग कता.
  281. 19:41–19:43एक ता बहुत नीक चर्चा रहली.
  282. 19:43–19:51मुदा विदा लेबासन पहिने हम चाहब जिस स्रोता लोक नीक एक ता गहीर प्रष्नक संगे एतिसन जाएत.
  283. 19:51–20:04आएकनिक सांत भखष सोचवाक अची, जि हमरा सब कष समाज में, आहन कोन कोन मान्निता वा इतिहास अची, जक्रा लोग बिनाप्रष्न केने मात्र रती रहा लची.
  284. 20:04–20:09आप और की चारुकाज से हो कोनो उलका मुक नुकाया लचे?
  285. 20:09–20:13कोनो आहन सत्ते जि आपना के बुजहावाक प्रतिक्षा करोहल अची
  286. 20:13–20:20जगरा कोनो ब्यवस्ता मिता देबक प्रेयास के लक मुदा हम सबोक्रा अंदेखा करोहन ची
  287. 20:20–20:28चारू का तक लोक गीत, लोक गाता, आहाश्ये पर रहे वाला लोक कता के द्यान से सुन्मक चाए
  288. 20:28–20:32कतो उही में कोनो बइग सत्तित नहीं नुकायलत्ची
  289. 20:32–20:35एकरापर भीचार जरुर हो बक चाही
  290. 20:35–20:36दन्नेवाद

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कनिक कल्पना करू, जे हम्रा सब जे इतिहासक पोठी पड़े ची उ भीतल समय का सत्ति बताबखलिल नहीं लिखल गलो? आप, माने जानी भुजी का किछ बात भिस्राएबखलिल लिखल गलो? इक्दम बुजुजे हम्रा सब के बहुत रोष्यारी से ब्हुलाएबक ले लिखाल गे लो. की हो आजन कोनो समाजक सबसे पैग सत्य के जानी बुजी का, पोथी से मिता दिल जाए. औग, मिताल गेल सत्य एक ता भूथ बनी का, अगी समाजक चारो कात गूमेत रहे यी वाक यी एक टा एहन विशय अची जे हमरा सब कष शोचबाक प्रक्रिया के जगजोरी कर रहे तची सही बात आई हम सब एक टा एहन दून्या में प्रवेश करोड़ ची जताएग इतिहास, गियान, और कल्पना का भीज अर कल्पना का भीज एक ता बद्द भयानक युध्द चली रहुल अची हम्रा सब के साद्दारन तया लगे तची जे जे लिखल गे लची से सत्ते अची मुदाजे मेटाए देल गे लची अकर सक्ती कते को भेर भेशी ब्यावंकर हुए तची हा? आआ आई हमरा सबके इगहीर विमर्ष कोनो साददधरन विषेपर नहीं आची हम सब चर्चा करो हल ची विदे हे इप्रत्रिका में प्रकाषित नाटक उलका मुखपर जकर समपादन गजेंद्र ताकौल केने चतिन और 2012 में बेचन ताकृर कर निर्देशन में एकर मनचन भेलचल. इकोन भीतल समय कर नीरस कता नहीं आची. बलकु नहीं. यी गंगेश आवल्लबाक प्रेमक माद्धिम सव, स्म्रिती माने याद रखव, आविस्म्रिती माने भिसरी जाएब के भीच चली रहल संगर्ष्क एक ता बहुत जीवन्त गाता आची. जक्रा सुन्लाक बाद, हम्रा सबखजे ग्यान अई इतिहास के देखबाग नजरी आची उ पुरन रूप से बदली जाएत. ता चलो, एक राकनिक ग़ेराय में जाके भुजही ची? नातेक पहिल हिस्सा बद्याना कर सकचे, जते गंगेश आवल्लबाक प्रेमक प्रसंग वेता है. जे स्रोता गंगेशक बारे में नहीं जानिच्छती, उनका लेल बतादी जे चोदवम शताब दिक मित्हिला में गंगेश उपाद्ध्याई एक तब बड पैग नाम चला. आ, उ, तत्व छिन्ता मनी जका भारी न्याएशास्ट्र अतर्क शास्ट्रक रच्नाकिलनी. नियाई शास्र माने एक्दम विषुद्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द् बन्देज जेंगा वेक्तिक लेलजकर पुरा जीवन सुत्र आसिद्दान्त में भीतल हुए, हुंकर प्रक्रतिक सुन्दर या आप्रीम का गीत रचब अगटा बवद्धिक भूकमप जका आचे ओआ ब्रम्हांद के सर्फ तर्कक नजरिस नहीं बलकी बहावना आई अनुबोटिक नजरिस देखी रहल चाती यह तव उईना भेल जना कोनो सुपर कम्पुटर का आलगोरिदम अचानक रोमान्टिक गजल लिख़ा लिखफ शुरू कर दैए. आख आख एक दम सती कुदारन आची, जे मशीन सर्फ गनित कबाशा भुजेच छे औई आचानक से बहावनक बात करे लागे. मुदा एते हमरेक्ता प्रष्न अची, उही समःक जी समाज अची मने, तोल अच्छवाडी, उहुंकरी प्रेम कर एते कडा विरोद किया कर अची. जक्रा नातक में स्तुल प्रेम कहल गल अची. आप, वैई. कुन पैक विद्वान जब प्रेम कविता लिखिर रहा लगची, तवो ही में समाजका की नुक्सान आच्छ? देखो, नुक्सान प्रेम से नहीं आच्छ, बलकी उही प्रेम कखारने, जए समाजिक दहाचा डोली रहा लगचे, उक्रा से आच्छ. ये देव्दत का पात्र के भुजब बडजरूरी आचे देव्दत अज़ा उही समाज का बद्दिक �thekidār चती एक दम उग गंगेश की एक ता चितावनी देच चतीन उए विस पश्ट कही चतीन जे पाज्सो वा हजार वर्ष कबाद गंगेशक तव छिन्ता मनी पर ता हजारों तीका तिपनी लिखल जाएत. मुदा हुनकर प्रेम का चर्चा कियो ही करत. बिल्कुल. इतिहास यर्फ अख्रा याद रख हैता ची जिस समाजक नियम में फित बैसे तची. इतिहास ब्हावना किनही तरक के यादर कही तची तजगा हम थीक भूजी रहल ची तदेव दद्तक कहबाक अर्ठ यह ची जिस समाज के गंगेशक न्याए सास्त्र तच्विकार अची कारन औश रेष्ट्टा स्था स्ठापिट करे तची अग, मुदा वल्लबाक संगे हूंकर प्रेम सामाजिक नियमक विरुद मानल जारा है लाची. समाज नहीं चाहे तची, जे हूंकर पेग विद्वान सामाजिक नियम तोड़ै. अह, ताहिलेल समाज गंगेशक, तरककत इतिहास में नमर करभा चाहे तची. मुदा हुंकर कविता के जानी भूजी का मिटाएप चाहेता ची यहे आचे, यह एक ता सुविचारत विष्मरीति का शद्यान्त्र आची इश्यान्त्र अग भाज जगन उच्छल आची ता नाटक में एक ता बद रोचक विज्वल प्रतीक अचाचा आची मंज पर रखल शत्रन्जक खन मने क्यूब हाँ उ गन कोनो सादारन वस्तू नहीं आची पहले ता हमरा एक निक अजीब लागल हमर मतलप प्रेम के कता आई आचानक मंच पर एक ता शत्रन्जक खन एक रकी काज उश्ट्रन्ज का गण मूल रूप्सा समे का पैग अंद्राल तार्किक्ता का कतूर्ता अविस्म्रिति के जे दर अची तक्रा दर्षावेत अची अग... कनिक, एक रा और स्पष्ट करू? देव दद्त गंगेश के, उई गण का चोसट्च्ता खाना पर दानक दाना गिन्तिक एक ता गनित्य उदारन देच्छती. औग, औग. वही जे पहल खाना पर एक ता दाना दो सर पर दूटा थे सर पचारीता. एक दम. इच्छो सथम खाना दरी जाद-जाद, गनित्य रूप से इतिक पैग संख्या बनी जाएत ची, जे सम्पून प्रिद्वीक अन्न खतम वोजाएत बाप्रे इत अग्स्पनिन्चल ग्रोट के सिद्धान्द बेल मुदा एकर एही कता सकी सम्बन्द चे सम्बन्द एए आची जे गण उई कत्फोर गनित आच्चमै कविशाल अंट्राल कप्रती कची देव्दत् भुज़्ार हल्चत्ही जे हाजारो वर्ष्कई जे विशाल समेचक्र अची उहमे केवल तर्क्तिकएत. माने गंगगं जका जे कदोर अची उआँ समेग के मार साई लेत. अग, मुदहुनकर प्रेम जे कोमल अची उ उहे समय कबोजतर दवाक मरी जाएत. गन अकार में सीथा रिखावला होई तची जिना नयाए शास्त्र. एह में भहवना कोनो गुन जाएश नहीं चे. कमालक प्रकीख वाद ची. मुदद जक्चन समाज गंगेशक प्रेम के कविता सब के नश्ट करवाक साजिश करे तची, तकन कताजे मोड ले तची उ बड़ रुमानचित करे वाला चे. कारण उ कविता सब मरी नहीं जाई तची, उ एक ता नव रूप ले ले तची. आँ उल्का मुक नामक एक ता भूतिया या विद्रोही सुर बनी जाएत छी, जे बास बिट्टी में बाहरक जे सूंसान जगा हुएत छी, उते गूमेत रहेत छी. इ उल्का मुक उही दवायल्गेल सत्यक प्रती कचे जक्रा समाज नष्ट करब चाहलाहन. ता आहा कबाक अर्थ चे जगन कोनो विचार के जबर्दस्ती मिताबक प्रास होई तची, ता ओ नश्ट नही होई तची. बलकुल ने, उ कोनो नो कोनो विद्रो ही रूप लई ले तची. एते गंगेशक प्रेम के कविता के उलका मुख कर रूप बहेता लची. अब भूथ बनी कष समाजग परदी पर मन्डरा रहा लग ची आई एते सं नाटक में जे संस्तागत विस्मिरती मने अंस्तिटॉषनल आमनिश्या के गब अबेद ची अब बहुत महत पूँण अची अख्रा बूज़़़ आवश्यक अख्ची अख्चाई, हम एक ता प्रष्न तरग्छाज़, इई संस्तागत विस्मिरती सुनब में आपन लगाई तची, जना कोनो बहुत पेग साजिष चली रहल हुए, मुदा असब तगुरु च्थिन ना अचार्य सर्भख के टसम्वाद अची जते अस पष्ट कहच्छतिन जे गंगेश क ताई चाजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजिश कहब साजि� वद्द्व चिन्तामनीक आस्ली आप्ट्ट् कियो नहीं बुजिया शिर्फ वुक्रा रती लेए? एक दम एक ते रत्बाक जे प्रक्रिया आची उ आसल में विस्म्रितिक एक ता हत्यार आची कोना? रत्बाक मतलप तमान राखभ बहल ना अग, उगगगेश का मानव स्वरुब केन, उनकर प्रीम केन, उनकर कविता केन से हो खोजी लेद. ताही लेल शिक्षा प्रनाली इस उनिष्चित करही तची, जे ग्यान स्व्व एक टा कर्मकान्ड बनी करही. माने जो विद्यारती गंगेश खपोतिक आर्थ भूजी लेद तो उप्रशन करत? आ, उगंगेश का मानव स्वरूब केन, उनकर प्रीम केन, उनकर कविता केन से हो खोजी लेद. ताहिलेल शिक्षा प्रनाली इस उनिष्चित करओी तची जे ग्यान स्र्व एक ता कर्मकान्द बनी कर अगी जाए बाप्रे इत बहुत गहीर बाद भेल उहिना भेल जना हमरा शबका कमपूटर का हाट्डाइव में होई चे की कहे ची आहा एहा हाट्डाइव आँ, जना जा हम कोनो फाँल के कमपूटर से दिलीट कर देईची, ता हमरा लगे ची उखतम भोगेल. मुदो अकर कोनो खोनो हिस्सा, हाट़्ाएम कतो नुकाल रही जाएत ची. गजजब को दारन देलहूँ, आँँ, एक दम वही बात अची. सत्तादारी वर्ग के लगगे तची जो फाईल डिलिट कर देलग अग, मुतो उ फाईल कतो जाएत नहां आची तकी गंगेश के प्रेम आ उ कविता सब जे उलका मुख बनी गेल आची उ शच्मुच एही रतनत विद्या सम्मेटाल जाशकल बलकुल नहीं जखन चोपारी अशिक्षा संस्थान इतिहास के पन्नासम मेटबैतची तकनो सत्या लोक गाता लोक गीतक रूप लालेतची जना नाटक में दीना भद्री वा सलेष का कता जे आवन्षी दरक लोक गाता, कमला मयाक गीत, बालगुरयाक गीतक जे प्रयोग अची उ इते सार्थक्ता पावे तची. मने जे इतिहास पूती सब बाहर कदेल गिल, उकरा आम जन मानस अपन गीत में बचाले लक. इक्दम इतिहासकार जखन पन्नापसन नाम मिटवैई चतिन, तकन उ सत्यः प्रतिक और गीत के रुप लोका आम लोका कन्त में सुरक्षिट बजगाईत अची. इत बहुत सुन्दर बात अची. दीना भद्री और सलहे सक, लोक गाता इतिखावत अची, जगरा समाज के उच्छवर्ग दबाईल गेल, अगरा लोक अपन स्मिर्ती में आमर कले लक. उगीत आसल में इतिहासक हार्ट्ट्डाइब बाखव अच्छी. अओ, अओलका मुक उज्छि लोक स्मिर्तिक विद्रोही रूप अच्छे, जे बास बिट्टी में गूमी रहा लगजी, जे प्रतीषा करहा लगजी, जे कखन अख्रा वापस आबक मोगा भेटद. एक दम सही बुजलो है. मने हम्रा सब के चारो काज ये लोग गीत गाएन बहरहा लगजी, उसर गीत नहीं उदबायल गेल इतियासक दस्तबेज अची आप इस शच मे यक तवीचारो तेजक विन्दू अची बूदा एते सा नाटक जे एक तवीशाल चलाँं लगावे तची उब बड अस्चर जनक अची नाटक सीदे साथ सो वर्ष के बादक वास्त्विक्ता में प्रवेश करता ची आए दे मन्जपसे एक पैग बद्लाव होई तचे उजे शत्रन्ज का गश्टल उक्रा हता दिल जाई तची आउकर जगा एक ता गोला मने स्विर राखी दिल जाई तची गोन हताक गोला रक्बाकी अवश्षक्ताचल इबदलाओ बहुत गहीर प्रतिक कात्मक अद्द रक्छे तचे गं कल्पना भूद्काल असे द्दान्तिक वाद्विवादक प्रतिक चल उ मानव निर्मित अची जकर एक ता सीमा आचे मुदा गोला, गोला तो प्रत्विक प्रतीक अची इक्दम, उ वास्तविक्ताक प्राक्रतिक चक्रक अवर्तमानक प्रतीक अची गोला में कोनु तीक्हा कोना न नहीं हुई तची उ निरन्तर चलेट रहे तची उहो माने अब कता सइद्दान्तिक लोक सबाहर निकल कः सीदे याठार तक दरातल पर आभी गेल आचे. आप, इस साथ सो वर्स बादक समय आचे. आर एते यसबसे दिल्चस्त बात इए आचे जे ओ पुरान पात्र आब नौ रूप में जन्मलेल नची. इक ता पुर्न पुनर जन्म कच्च्र आचे आप आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आब आ� अगर उद्बाद बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बाधा बा� अचारे कारन समबन्त खुजबाक बाल सुलप जिग्यासा जीना. बलकुल, प्रक्रिति में जब हुरे हैल अची, उकर कारन पुछ़व अप्राद कोना भहसा कै तची. इबेंग वाला प्रष्चन असल में संस्तागत शिक्षा प्रनालिक ज़द पर प्रठार अची. जखन के हु पूछे चे जे की एक तकहनो रटन तविद्याक वर्चस्व के चूनाती देई तचे. आ, कारन सत्ता नहीं चाहत छे जे की हो सवाल करे. जों लोग सवाल कर वप शूरू कदेत, तो विस्मिरितिक जे सद्यन्त्र थी उ तूटी जाइत. इक दम सही बात. तव आप अगान बाटे लागे तछी तखन अस्ली ज्यान समाज कर उही हिस्सा से अवे तछी जख्रा हाँशे पर राखल गे लची मने जखन विवस्ता सरी जाई तछी तखन नो प्रकाष परडिदी से अवे तछी जखन संस्तागत शिक्षा अग्यानता बाटे लागे तची तकन आस्ली ज्यान समाजकर उही हिस्सा से अवे तची जख्रा हाँश्ये पर राखल गे लची मने जखन विवस्ता सरी जाई तची तकन नो प्रकाश परिदी से अवे तची हाँ गंगादर पाट्शाला चोडी कद सबत्रीक भोन चली ज़थें उते हुँँका एक ताभीज भिटे चनी उलका मुखी ताभीज जे रिषी जटा हुँका दाए चथें रूकु रूकु, उही उलका मुखी जि साथ सो साल पहले गंगेषक प्रेम कर कविता चल जे बास्बिट्ती में भूद बनी कगूमै चल, एक दम सही पकर लो है. बाप्रे, उ कविता जे दबायल गिल चल, उ आब एक ताभीज बनी कवापी साभी गेल आची. हा, उ ताभीज गंगाद हरकेन सत्यक खोज में मार्ग दर्षन करे तची. और भोन में, हुंकर जे आस्ली गुरू बनेच्छत्छति, उकोनो बहुत पेग आचारियने, बलकि, हीरू चति. हीरू? हीरू जे एक ता दलित गायक आचर मकार चति. इद्रिश्य पुरा नाटक का जान आची. हमरो लागल जे हीरुक प्रसंग बहुत क्रान्ति करी आची मुदा हम चाहव जे आहा एक रेकानिक और विस्तार से समजग। एक ता चर्म कार जे समाजक सोपान में नीचार अखल गेल आची उहुंकर गुरु कोना बन जाएच्छती दिको, आपे एक ता बहुत गहीर सामाजिक राजनेतिक विमर्षा ची समाज कनज्री में चर्म कार अपवित्र मानल जाएच्छती मुदहीरु की करेच्छती अप तमुलाल मालक चाम सामादल आम्रेदंबन वेच्छती ना हाँ, जे जान्वर मरी गला ची जक्रा समाज भेकी देलका चे, उही चाम से उस संगीत लै अजीवन निकालै च्छती. गज़ब अची इज़. जते राज्दर्बार में दर्बारी सब स्रटंत विद्या बान्ती रहाल च्छती, जे ग्यान भीतर सम मरी चुकल अचे, उते हीरु प्रक्र्तिक संजुडावसे आस्ली ज्यान विखसिट करहे अज्छती मने ज्यानक आस्ली श्रोट महल्वा पाट्शाला में बलकी बून में प्रक्र्तिक भीच आ एक ता चर्मकारक लोग गीत में भीते अची इक्दम सतीक बात कहलूं इए उईव्यवस्ता पर तमाचा आची, जे ज्यान के सर्फ किछ उच्वर्गक बपोटी मानत आची. जे पोठी नहें पड़े सकेता चे, कि उकर लग ज्यान नहें आची. रदन्त विद्या शब्द के हत्या ची बिल्ल्कुल गंगादर जकन रिए। शिष्वनेथ चतिन तकन उ थ्यानक एक ता पून तया नव परमपरा के स्विकार करहल चतिन जे समावेशी अची असत्तिन ज़ादान परमपरा करहल चतिन अगर अदर बद्या शब्द के हत्या ची बिल्ल्कुल गंगादर जखन रीड़ूख शिष बनेट चत्फीन तकन अग्यानक एक ता पूँन तया नव परमपरा के स्विकार करहल चत्फीन जे समावेशी अची असत्देक नज्दीक अची इप पुरा के पुरा दिकोडिंग सून्ला के बाद हम्रा लगे तची के हम्रा सब के एकर एक ता समग्र चित्र बनेवा कावषकता आची. आप एक दम. जज़ाम सव आही समपून चर्चाक सार निकाली, तक गंगेश कर तर्क के विरुद, हुनकर कवीता उलका मुखक भूत्यागीट, शत्रनज के गनक जगा प्रिठ्विके गोला, और अंत में दरबारी आचारे सबखबरध्स, हीरुक शिक्चा. इस सबख की अर्ठ निकलेत अ तव उ ग्यान नहीं विस्म्रती यच्छे माने उ ग्यान वास्तब में आग्यानता से हो खतरना कचे कारन उकरा लगे टच्छे जो सब किछ जनई टच्छे मुदा असल में उकि चूए नहीं जनई टच्छे हा, प्रेम कविता, लोग गाता गाता और सादारन लोग का अनुबहव, उही रतन्त विद्या किलाफ एक ता आमर विद्रोह अच्छी. आएहे में उलका मुख कजे बूमी का जे, उ आशा जगावे तचे. जगुन सत्ता आहाक एतिहास के पोती से डिलीट करव चाहे तची, तो उसत्या खटम नहीं होई ताछी भिल्कुल उकोन अकोन रूप में वापस जरूर आवे तचे उलका मुख एही बातक प्रती कचे जे दबायल गिल सत्या नव रूप में वापस आईबे कर अई तचे उकरा हमेशा कलेल मिताल नहीं जासके चे नाई, उ व्यवस्ता के कोनो कूना में, लोग गीत में, लोग गाता में नुकाल रहत, आस समय अलापर फेर सजीविद बहुजाएत. गंगेशक तरक इतिहास में दर्ज भेल, मुदा हुंकर कविता उलका मुख बनी कजजिन्दा रहल. आँ साथ ससाल बाद गंगादर आहीरुक रूप में उ विद्रोज छेर सथार भेल. इस सच में एक ता एहन सत्या ची जी रोंक्ता क्डा कर दीतेच. एक दम हम्रा सब जक्रा अदिकारिक इतिहास मानत ची उ कते को बेर स्व्व उत्टी बे होई तची तक सत्ता हमरा याद रखाई दा चाहित चीज मुदा असली सत्ति लोकक सुम्रती में जीवित रही तची आए एह लेल प्रश्न पुच्छा बड़ जरूरी आची जैना चोटका गंगादर पुचलनें जे बेंग पाईन में कुदे आसे कीएक इसवाल समपुन विवस्था के हिलादेई तची आजी विवस्था चाही तची जी लोग स्रफ रटे सोचे नाए इस पूरा विष्लेश्टन सून्लाक बाद हम्रा लागत अची जे इतिहास अग्यान के देखबाक नजर्या एक दम सबदल गे लची हम्रा पुन विश्वास अची, जे ईविमर्ष् सून्लाक बाद लोक पन समाजग गीइत आगाता के एक तन्नव नजर्या सी देखध. सत्या के जान्बा के लिल स्व पोठी पर निरभर रहेप पर्याप्त नहीं अची. ता इचल हमरा सबक आयो गहीर विमर्ष उलकामुक नाटक के बहाने स्म्रिती विस्म्रिती अग्यानक विद्रोग कता. एक ता बहुत नीक चर्चा रहली. मुदा विदा लेबासन पहिने हम चाहब जिस स्रोता लोक नीक एक ता गहीर प्रष्नक संगे एतिसन जाएत. आएकनिक सांत भखष सोचवाक अची, जि हमरा सब कष समाज में, आहन कोन कोन मान्निता वा इतिहास अची, जक्रा लोग बिनाप्रष्न केने मात्र रती रहा लची. आप और की चारुकाज से हो कोनो उलका मुक नुकाया लचे? कोनो आहन सत्ते जि आपना के बुजहावाक प्रतिक्षा करोहल अची जगरा कोनो ब्यवस्ता मिता देबक प्रेयास के लक मुदा हम सबोक्रा अंदेखा करोहन ची चारू का तक लोक गीत, लोक गाता, आहाश्ये पर रहे वाला लोक कता के द्यान से सुन्मक चाए कतो उही में कोनो बइग सत्तित नहीं नुकायलत्ची एकरापर भीचार जरुर हो बक चाही दन्नेवाद

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