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गजेन्द्र_ठाकुर_समग्र_खण्ड-2.mp4

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Part 3 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 3
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  1. 0:00–0:05नमस्कार, आज्गी इस बहत खास साहित्य कचर्चा में सीदे गोता लगाते हैं.
  2. 0:05–0:08आज्ग हम एक आज्ई विशाल महाप्रोज्यक्त की बात करने वाले हैं,
  3. 0:08–0:12जिसने भारत की चे आलग-गलग भाषाशाग के शाण्दार साहित्य को,
  4. 0:12–0:42अद्रज़ाई बार जाएगी नहींगे अगाई अगाई दरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई
  5. 0:42–0:47अद्रेंगे और अंद्द में देखेंगे के मैठिली के लिए कोंजे नये चितिच खुल रहेंगें।
  6. 0:47–0:50तु चलिए पहले बाख से शुरू करते हैं।
  7. 0:50–0:53इस अटिहासिक अनुवाद के विशाल पैमाने
  8. 0:53–0:56उगर इसके पीचे काम कर रहे उस दिलचष्प दरशन को समचते है.
  9. 0:57–0:59गजेंद्र ताकृर जी दूरा अनुधित
  10. 0:59–1:02और आशीश अंचनाहार जी दूरा समपादित
  11. 1:02–1:04तोहाजार चब्भी संसकरन का ये काम
  12. 1:04–1:06अपने आपने बेहत कहास है.
  13. 1:07–1:09इसे सरफे एक संकलन मत मानी.
  14. 1:09–1:12ये एक बहुत ही ज़रूरी संसक्रितिक सेतो है,
  15. 1:12–1:20एक आईसा पूल जो भारत के अलग गलग हिस्सो में रच्छे गय बहेटरीं साहित्ते को एक साजा मंज देता है.
  16. 1:20–1:26अब अनुवादग गजेंदर ताकुर का जो मारक दर्षक सद्धान्त हैना वाखगेई सुचने पर मजबूर कर दिता है.
  17. 1:26–1:30उनका मानना है कि अनुवाद कोई हाश्ये का या किनारे का काम नहीं है.
  18. 1:30–1:34बलकि ये एक समानानतर सत्या है.
  19. 1:34–1:40मतलब एक अनुदित रच्ना भी मुल कहानी के सार को उसी गेरे बवद्धिग वजन के साथ पकड़ती है.
  20. 1:40–1:44वस यूज समज लिजे कि वो सत्यव एक नहीं भाशा में थोडी देर से पाचा है.
  21. 1:44–1:46और ये सब हुए कैसे?
  22. 1:46–1:54इन कहानियों को मेठली में जीवंद करने के लिए एक बहुत ही सकत तूटीर यानी दूएस्तर्या अकाटमिक अनुवाद प्रक्रिया अपनाई गई.
  23. 1:54–1:59सीद है एक बवाशा से दूस्री में नहीं, बलकी पहले मूल बवाशा से अंग्रेजी में,
  24. 1:59–2:04अपर उस अंग्रेजी संसकरन को आदार बनाखर मैठिली में अनुवाद किया गया.
  25. 2:04–2:07ये जटल प्रक्रिया पक्कग करती है,
  26. 2:07–2:10की मोल कहानी की संसक्रतिक खुष्बू और उसकी अस्ली भावनाये
  27. 2:10–2:13एक दम सतीक्ता के साथ हम तक पूँचे.
  28. 2:13–2:22ज़ा इस प्रुजेक्त के प्यलाओ को देखे, इस महत्वकांशी कहन्द में तलगु, उडिया, गुज्राती, कनन, भुच्पूरी और कश्मीरी.
  29. 2:22–2:27यानी चे आलगलक शेत्री यबहाशाँ के साहित्ते को एक ही जगा पे रोया गया है.
  30. 2:27–2:39इतनी सारी बाशाव के अनुथे साहित्ते को उनकी पूरी सांसक्रतिक महेख किसात एक ही जगा पहना साहित्ते प्रेम्यो के ले किसी दुरलब अफसर से कम नहीं है.
  31. 2:39–2:45तीक है तो इस बाशाई सवर का हमारा पहला बडडा पडाव है दक्षन भारत.
  32. 2:45–2:50आईए तेल्गु साहिते के इस भेहद मस्वूथ और भावनात्मक हिस्छे में जलते हैं
  33. 2:50–2:54पेदिन्ती अशोग कुमार का एक पूरसकार विजेता उपन्यास है
  34. 2:54–2:57जिसका मात्हिली नाम है सदालेल मित्र
  35. 2:57–3:00ये कहानी आपको जगजोर कर रकते गी
  36. 3:00–3:07ये कलन्दर समवदाय के एक व्यक्ती, इमाम और उसके प्रषिक्षिद भालो के भीचके गेरे बहावनात्मक रिष्टे को दिखाती है.
  37. 3:07–3:11जब आस पास की राजनीतिक और समाजिक दुन्या तेजी से बड़ल रही हो,
  38. 3:11–3:15तब यन्सान और जान्वर का ये अटूट बन्धन कैसे टिकता है?
  39. 3:15–3:18ये उपन्यास इसी की बहुत भी मार्मिक पर्ताल करता है.
  40. 3:18–3:21और यही से हमें कैसे विषेक यार बडते हैं,
  41. 3:21–3:22जो समाच की एक बिल्कुल रलाग,
  42. 3:22–3:25लेकिन बेहाज जरूरी सच्चाई पेश करता है.
  43. 3:25–3:28तेलुगु दलिद साहिते की भेदने वागें
  44. 3:28–3:32यहां मोल स्रोतों कानजर्या बिलकुल भेबाख और स्पष्ट है
  45. 3:32–3:36जे सुभद्रा और चल्ब अली स्वरुपारानी जैसी लेखि काूकी रच्नाए
  46. 3:36–3:39हाश्ये पर होने के दर्द, लेंगिक शूशन
  47. 3:39–3:42अगर उदिया और दक्षनी भाशाँ की योर मुडते हैं,
  48. 3:42–3:45जहां हम उडिया और कननण गद्धे की भावनात्मक गेरायों को महसुस करेंगे,
  49. 3:45–3:48यहा उडिया और कननण साहिते के भीच एक बहुत ही दिल्चस प्तुल्ना सामने आते है।
  50. 3:48–4:18अदिया लेखिका सरोजनी साहु हैं जिनकी कहानी असीमित और भेहद अंतरंग दुख को गेराई अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपन
  51. 4:18–4:24सुकेडती है, और वही दूसरी तरव कननड लेक्हक अशोग हेग्डे की क्रती अनहार है,
  52. 4:24–4:29जीवन के गेरे प्रतिकात्मक अंद्खार अर कतोर संगरषों को दिखाती है.
  53. 4:29–4:33दोनो ही बाशाय मानवी ये भावनावों के रवग-ग़़ग
  54. 4:33–4:35पर बहुत ही गेरे पहलुएग को चूर रही है.
  55. 4:35–4:38इस सान्सक्रतिक पूल पर तोडा और आगे बड़ते है,
  56. 4:39–4:42और पहुचते है, भारत के पश्चमी तटपर,
  57. 4:42–4:47जगज्राती साहिते के एक दम जीवन्त और �alag alag rang humara intazaar kar rahi hai.
  58. 4:48–4:52गुज्राती साहिते का ये हिस्सा वाकगी गजब की विवित्ता समेटे हुए hai.
  59. 4:52–4:57सुच्छी ए, एक इख़न्द में आपको नरसिंग महता की वो शास्त्रे भक्ती कविता मिल रही है,
  60. 4:57–4:59जो महात्मा गादीजी को बहुत प्रिया थी
  61. 4:59–5:00और उसी के साथ
  62. 5:00–5:02दलपत चाहान के मनोवेग्यानेक ध्रिलर
  63. 5:02–5:04दर कर रोमाज भी
  64. 5:04–5:06इसी करी में नजीर मनसुरी की
  65. 5:06–5:08मुसलिम समवुदाय से जुडी
  66. 5:08–5:10जटिल समाजे कताई बी शामिल है
  67. 5:10–5:11एक बहत्रीन अनुवाद
  68. 5:11–5:14कितनी विशाल दून्या को एक जगल आसकता है?
  69. 5:14–5:15है ना?
  70. 5:15–5:18तो इन सारेक शेट्रे सहित्यों को एक साथ देखने के बाज
  71. 5:18–5:22सबसे बड़ा सवाल ये है, की इस विशाल महाप्रोजेट का
  72. 5:22–5:24मैठली सहित्य के बहुविष्य के लिए
  73. 5:24–5:27आखगर मतलप क्या है?
  74. 5:27–5:31पूरे भारत के यह बहत्री नावाजों को मेठली मे लाने का जो असली मकसद है
  75. 5:31–5:34उसे बहुत ही खॉबसुरती से बताया गया है
  76. 5:34–5:38असल में यह सब यह यह ताकी हाजारो सालों के तूफानो
  77. 5:38–5:40और समे की कथोर कसोटी के बावजुद
  78. 5:40–5:45मेठली बाशा और संसक्रिती का ये दीपक युही जग्मगाता रहे.
  79. 5:45–5:48तुस्री बाशाँ की इनुट्क्रिष्ट रच्नाउ को गले लगाकर,
  80. 5:48–5:54मेठली साहित्ये अपनी ज़ों को और मस्बूद और अपनी पहुच को व्यापक बना रहा है.
  81. 5:54–5:58इस विश्लेशन को समेटते हुए, जरा इस बात पर गवर कीजेगा.
  82. 5:58–6:03अगर अनूवाद सच्मुच एक समानतर सत्यहे, तो जरा सोच्छिए,
  83. 6:03–6:09पूरे भारत में आज़े और कितने अनुदित सत्यह, कितनी दबी हुई कहानिया है,
  84. 6:09–6:15जो नई दिमागो को रोशन करने किलिए, बस एक आज़े ही सांसक्रतिक सेटु का अंदिजार कर रही है.
  85. 6:15–6:20अभी तो अंगिनत कहानियो और विचारो का आदान प्रदान होना बाखी है.
  86. 6:20–6:24इसी प्रेरक विचार कि साथ आजच की चरचा को यही विराम देते है.
  87. 6:24–6:28अमारे सात इस सफर में बने रहने किलिए बहुत-बहुत द्धन्नेवाद

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नमस्कार, आज्गी इस बहत खास साहित्य कचर्चा में सीदे गोता लगाते हैं. आज्ग हम एक आज्ई विशाल महाप्रोज्यक्त की बात करने वाले हैं, जिसने भारत की चे आलग-गलग भाषाशाग के शाण्दार साहित्य को, अद्रज़ाई बार जाएगी नहींगे अगाई अगाई दरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई तरश्छाई अद्रेंगे और अंद्द में देखेंगे के मैठिली के लिए कोंजे नये चितिच खुल रहेंगें। तु चलिए पहले बाख से शुरू करते हैं। इस अटिहासिक अनुवाद के विशाल पैमाने उगर इसके पीचे काम कर रहे उस दिलचष्प दरशन को समचते है. गजेंद्र ताकृर जी दूरा अनुधित और आशीश अंचनाहार जी दूरा समपादित तोहाजार चब्भी संसकरन का ये काम अपने आपने बेहत कहास है. इसे सरफे एक संकलन मत मानी. ये एक बहुत ही ज़रूरी संसक्रितिक सेतो है, एक आईसा पूल जो भारत के अलग गलग हिस्सो में रच्छे गय बहेटरीं साहित्ते को एक साजा मंज देता है. अब अनुवादग गजेंदर ताकुर का जो मारक दर्षक सद्धान्त हैना वाखगेई सुचने पर मजबूर कर दिता है. उनका मानना है कि अनुवाद कोई हाश्ये का या किनारे का काम नहीं है. बलकि ये एक समानानतर सत्या है. मतलब एक अनुदित रच्ना भी मुल कहानी के सार को उसी गेरे बवद्धिग वजन के साथ पकड़ती है. वस यूज समज लिजे कि वो सत्यव एक नहीं भाशा में थोडी देर से पाचा है. और ये सब हुए कैसे? इन कहानियों को मेठली में जीवंद करने के लिए एक बहुत ही सकत तूटीर यानी दूएस्तर्या अकाटमिक अनुवाद प्रक्रिया अपनाई गई. सीद है एक बवाशा से दूस्री में नहीं, बलकी पहले मूल बवाशा से अंग्रेजी में, अपर उस अंग्रेजी संसकरन को आदार बनाखर मैठिली में अनुवाद किया गया. ये जटल प्रक्रिया पक्कग करती है, की मोल कहानी की संसक्रतिक खुष्बू और उसकी अस्ली भावनाये एक दम सतीक्ता के साथ हम तक पूँचे. ज़ा इस प्रुजेक्त के प्यलाओ को देखे, इस महत्वकांशी कहन्द में तलगु, उडिया, गुज्राती, कनन, भुच्पूरी और कश्मीरी. यानी चे आलगलक शेत्री यबहाशाँ के साहित्ते को एक ही जगा पे रोया गया है. इतनी सारी बाशाव के अनुथे साहित्ते को उनकी पूरी सांसक्रतिक महेख किसात एक ही जगा पहना साहित्ते प्रेम्यो के ले किसी दुरलब अफसर से कम नहीं है. तीक है तो इस बाशाई सवर का हमारा पहला बडडा पडाव है दक्षन भारत. आईए तेल्गु साहिते के इस भेहद मस्वूथ और भावनात्मक हिस्छे में जलते हैं पेदिन्ती अशोग कुमार का एक पूरसकार विजेता उपन्यास है जिसका मात्हिली नाम है सदालेल मित्र ये कहानी आपको जगजोर कर रकते गी ये कलन्दर समवदाय के एक व्यक्ती, इमाम और उसके प्रषिक्षिद भालो के भीचके गेरे बहावनात्मक रिष्टे को दिखाती है. जब आस पास की राजनीतिक और समाजिक दुन्या तेजी से बड़ल रही हो, तब यन्सान और जान्वर का ये अटूट बन्धन कैसे टिकता है? ये उपन्यास इसी की बहुत भी मार्मिक पर्ताल करता है. और यही से हमें कैसे विषेक यार बडते हैं, जो समाच की एक बिल्कुल रलाग, लेकिन बेहाज जरूरी सच्चाई पेश करता है. तेलुगु दलिद साहिते की भेदने वागें यहां मोल स्रोतों कानजर्या बिलकुल भेबाख और स्पष्ट है जे सुभद्रा और चल्ब अली स्वरुपारानी जैसी लेखि काूकी रच्नाए हाश्ये पर होने के दर्द, लेंगिक शूशन अगर उदिया और दक्षनी भाशाँ की योर मुडते हैं, जहां हम उडिया और कननण गद्धे की भावनात्मक गेरायों को महसुस करेंगे, यहा उडिया और कननण साहिते के भीच एक बहुत ही दिल्चस प्तुल्ना सामने आते है। अदिया लेखिका सरोजनी साहु हैं जिनकी कहानी असीमित और भेहद अंतरंग दुख को गेराई अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपनी अपन सुकेडती है, और वही दूसरी तरव कननड लेक्हक अशोग हेग्डे की क्रती अनहार है, जीवन के गेरे प्रतिकात्मक अंद्खार अर कतोर संगरषों को दिखाती है. दोनो ही बाशाय मानवी ये भावनावों के रवग-ग़़ग पर बहुत ही गेरे पहलुएग को चूर रही है. इस सान्सक्रतिक पूल पर तोडा और आगे बड़ते है, और पहुचते है, भारत के पश्चमी तटपर, जगज्राती साहिते के एक दम जीवन्त और �alag alag rang humara intazaar kar rahi hai. गुज्राती साहिते का ये हिस्सा वाकगी गजब की विवित्ता समेटे हुए hai. सुच्छी ए, एक इख़न्द में आपको नरसिंग महता की वो शास्त्रे भक्ती कविता मिल रही है, जो महात्मा गादीजी को बहुत प्रिया थी और उसी के साथ दलपत चाहान के मनोवेग्यानेक ध्रिलर दर कर रोमाज भी इसी करी में नजीर मनसुरी की मुसलिम समवुदाय से जुडी जटिल समाजे कताई बी शामिल है एक बहत्रीन अनुवाद कितनी विशाल दून्या को एक जगल आसकता है? है ना? तो इन सारेक शेट्रे सहित्यों को एक साथ देखने के बाज सबसे बड़ा सवाल ये है, की इस विशाल महाप्रोजेट का मैठली सहित्य के बहुविष्य के लिए आखगर मतलप क्या है? पूरे भारत के यह बहत्री नावाजों को मेठली मे लाने का जो असली मकसद है उसे बहुत ही खॉबसुरती से बताया गया है असल में यह सब यह यह ताकी हाजारो सालों के तूफानो और समे की कथोर कसोटी के बावजुद मेठली बाशा और संसक्रिती का ये दीपक युही जग्मगाता रहे. तुस्री बाशाँ की इनुट्क्रिष्ट रच्नाउ को गले लगाकर, मेठली साहित्ये अपनी ज़ों को और मस्बूद और अपनी पहुच को व्यापक बना रहा है. इस विश्लेशन को समेटते हुए, जरा इस बात पर गवर कीजेगा. अगर अनूवाद सच्मुच एक समानतर सत्यहे, तो जरा सोच्छिए, पूरे भारत में आज़े और कितने अनुदित सत्यह, कितनी दबी हुई कहानिया है, जो नई दिमागो को रोशन करने किलिए, बस एक आज़े ही सांसक्रतिक सेटु का अंदिजार कर रही है. अभी तो अंगिनत कहानियो और विचारो का आदान प्रदान होना बाखी है. इसी प्रेरक विचार कि साथ आजच की चरचा को यही विराम देते है. अमारे सात इस सफर में बने रहने किलिए बहुत-बहुत द्धन्नेवाद

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