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गद्य_पद्य_भारतीक_भाषाई_आ_सम्पादकीय_परिमार्जन.m4a
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- 0:00–0:06आएक हमर इविमर्श गद्य पद्य भार्ती अनुवाद कंट दूई पर अच्छे,
- 0:06–0:12जहे में गजंद्र ताकृ द्हारा अनुदित आआशिश अनचिनार दूरा सम्पादित,
- 0:12–0:16बिबन भार्ती यबाषाक साहित्यक मैथ्ली अनुवाद अच्छे.
- 0:16–0:20अई निसन्दे है एक ता एतिहासे काज अचे
- 0:20–0:24मुदा हा बिना कुनो विलंबक औव हम सब सीथा विमर शूरू करी
- 0:24–0:29देखु समपाद की यः सन्रचना आ अनुक्रमनिका प्रस्तूती करन के भीच
- 0:29–0:32एक ता अवानच दूरी भुजही तचे
- 0:32–0:37एक दाम जाहे सा पाथक के संदर्ब खोजवा में असुविदा बसके चे
- 0:37–0:45आप मने अनुक्रमनिका पर द्रिष्टी दिया ता देखवा जे गद्य अपद्द्यक खंडके एक दम अलगलग राखल गे लचे
- 0:45–0:48इएक ता गंभीर समपाद की ये त्रुटी एचे
- 0:48–0:52अहो मैं विद्धाक आदार पर बाथ देल गे लगे लगे लगे लगे
- 0:52–0:57आए एक रासे होई त की चे जे एक त बहाशाक समपून सहिट्या खंडद बोजाई त चे
- 0:57–1:01बुजलिये जो एक रा एक त उदारन सब उज़ही चाही त
- 1:01–1:07तक कलपना करुग जे आहा एक ता एहन विशाल अई तिहासिक संगराले में
- 1:07–1:10ताहली रहल चीजते भिन्द भिन्द प्राचीन सब्भिताक वस्तुके
- 1:10–1:13उकर मुल संस्क्रीतिक आदार पर नहीं
- 1:13–1:16बलकी उकर बनावबटक के आदार पर राखल गेल अचे
- 1:16–1:46इक्द्द्द्द्दिक उप्मा आची एक्द्दिक अप्मा आची एक्दिद्दिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक्
- 1:46–2:16अदे अदिया गड़ादी और कनड़ग गड्द्या भी जाएचे अदे अदे अदे पद्दिया गड़ादी तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे
- 2:16–2:22अग, उगरा सता पात्खक द्यान आजे सान्सक्रेतिक प्रवाज जे उपूरी तरह तूटी जाएचे.
- 2:22–2:24एक दम तूटी जाएचे.
- 2:24–2:33अग, उगरा सत तब पात्ठक द्यान अजे संस्क्रितिक प्रवाज जे उपूरी तरह तूती जाएचे.
- 2:33–2:49ये गदम तूटी जाए चे, तव एकर सुदारक उपाई इए चे जे पोठीक अनुक्रमने का अ समपादकी ए दूनु खाम सन्रच्ना के विद्धामाने गद्दे अपपद्दे का आदार पर नहीं, बलकी मुल भाशा का आदार पर पूनरगतित कैल जाए.
- 2:49–2:59बुजलिय, जाही सा एक ता बाशाक समपून स्वाद, उकर गन्द, अकर मातेक कता पाथक के एक संगे बेट सकए.
- 2:59–3:07अग, बाशाक के के खेंदर में राखाल जाए, समपाद की अपोतिक अनुक्रमनिका में तिल्गु साहिट्ते का एक ता मुख्ध्य कहन्द बनत.
- 3:07–3:13अगर अंतर गत पहले तिल्गु गद्देके राखल जाए आवकर तुरन्त बाद तिल्गु पद्देके
- 3:13–3:21जिना जे सुभद्द्रा वा चल्लपली स्वरु प्रानी जे का कवेये त्रीक तिल्गु दलेत महीला कवेता
- 3:21–3:33अगदम, एक रासा पाथक एक संगे तेलगु समाजक राजनेतिक संगर्ष, कलंदर समुदायक सीमान्त जीवन अ इस्त्री विमर्षक पुरन चित्र एक अगटाम देखिपाता हा.
- 3:33–3:37मुदा रुकु, हमरा एक ते एक ता बात प्शंका बहुर है लच्छे.
- 3:37–3:38की?
- 3:38–3:41इई एक ता अकादमिक संकलन से होता अची नहीं?
- 3:41–3:43आप चेटा
- 3:43–3:46जी शोद हारती वा अदेता विशेश रूपसा
- 3:46–3:49केवल विद्हागत अद्ध्यन करे चाहत्छतीं
- 3:49–3:50जे ना मानी लिया
- 3:50–3:55जे के उ खली बारत का आदूनिक गद्ध पर शोद करोब चे थीं
- 3:55–4:00उत चिद जिता जा हूंका बीच भीच मे पद्धक पन्ना उलते पडल.
- 4:00–4:02येक ता निक प्रष्न अची.
- 4:02–4:08मुदा जा हम एही पोठी क गद्द्य पद्ध्य बार्तिय अनुवाद क वूलु देश्पर विचार करिये,
- 4:08–4:15तईकर लक्छ विन्न विन्न भारतिय भाशाक सुगन्दध के मेठलिक पाथक दरी पूचाना एची.
- 4:15–4:16आव उता जी.
- 4:16–4:21शोदारती तव अनुक्रमनिकाक उप्योग कएक अपन गद्ये खोज लेता.
- 4:21–4:24मुदा एक ता समान न साहित्य प्रेमी पाथक लेल,
- 4:24–4:31जे पन्ना दर पन्ना पोथी पडेच थी, बाशाक आदार पर जुडल रहब बेसी सहज होएच है.
- 4:31–4:34माने उ वान्सिक रूप सद्दोज जनग होएच है.
- 4:34–4:38एक दम एक ता बाशा सा दोसर भाशा में चलांग लगेवा में,
- 4:38–4:42जे एक्ता कल्च्टरल शौक वाख वाख संस्क्रतिक दख्का होए चे
- 4:42–4:46अक्रासा पाथख के बचेवाख यी सब सनिक तरीका चे
- 4:46–4:54आप जेना तेल्गुक सिमान्त जीवन सा अचानक उडियाक अदिवासी जीवन में प्रवेश करव आफिर गुज्राती देस जाएप
- 4:54–5:01सत्ते कहलहू, साहित्ते कोनो विदा से भेसी आपन भोगोलिक अ संख्रतिक माट्टेच से जोड़ होए तच्छे.
- 5:01–5:07आहक तर्क में वजन अची, पात्ख कक मान्सिक यात्रा के निरबाद राखभ अही,
- 5:07–5:11कल्ट्रल शोक से बचैना समपादक के प्रथम दाइत वहुएद से.
- 5:11–5:17आजा हमर उदेश अही मुल संसक्रतिक गंद के सुरक्षित रखबाग अची,
- 5:17–5:24जहिक चर्चा आहा करल हल ची, ता इबाज सीदे तोर पर अनुवादक के उही दर्शन्ट से जोड़ाइ तची,
- 5:24–5:26जे इस समपोंड पोथिक आत्मा चे.
- 5:26–5:30एक दम सही त्हाम पहुच लोग वहा, अनुवाद दर्शनट जे मूल सिद्धान्त,
- 5:30–5:34अगरा आमुख में और भेसी प्रात्मिक्ता बेट्वाग जाही.
- 5:34–5:38एह एही समग्रिक एक ता बहुत पैग संच्रषनात्मक कमजोरी अची.
- 5:38–5:44समपादिकिय में गजेंद थाकुरग जे अट्यन्त शक्तिषाली अनवाद दर्षन अची.
- 5:44–5:48दजेंद ठाकुरक जे अट्यन्त शक्तिषाली अनुवाद दर्षन अची
- 5:48–5:51जेकर उलेख उसमर पन वाख्के में से हो के ने चाती?
- 5:51–5:54आँ, उबहुत नीचा जाके आए लगछी.
- 5:54–5:59हुंकर उप्रसिद उद्धरन समनान्तर कात करोट मे हैब नहीं अची.
- 5:59–6:03वरन यह आची असल सत्या जो आपन समेलेला कची
- 6:03–6:06ओ, हो, इकोनो सादारन बात नहीं आची
- 6:06–6:09इएक ता गंभीर अख्रानतिकारी विचार आची
- 6:09–6:16एक दम संगे मूल भाशाक रंग आग गंदधे बचेवाग जे हूंकर संगर्ष आची
- 6:16–6:23इस्व न्पादिक यक पाचम्खन्ड अनुवाद्द्दर्शन अपद्द्द्दी में दھकेल देल गेला ची.
- 6:23–6:29जाए कारने पाथक अतेक नीक वैचारिक अदार से बहुद देर से परिषित हूए चती.
- 6:29–6:34आजा पाथक एही दर्शन से अनभिग्य रहे चती,
- 6:34–6:43तो उ अनुवादक को उही विषिष्ट शब्दावली के वाख्यविन्यास का उही अट्कतापन के अनुवादक को कमजोरी मानी लेता.
- 6:43–6:46जखन की उएक ता साभिप प्राय प्रयोग अचे.
- 6:46–6:48सत्य कहला हूँ.
- 6:48–6:50एही लेल सुदारक उपाई एजी,
- 6:50–6:55जे इ अनुवाद दरशन कोनो अकादमिक नियम कानुन मात्र नहीं अछी,
- 6:55–6:57इ एही सम्पूरन पोठी कर चश्मा थेक.
- 6:57–7:03आ, एक्रा सम्पादिक एक प्रारन्व में भूमिका ख्टूरत बाद स्थापित केल जाएक चाही.
- 7:03–7:15एक दम, पाटक जगन पोठी पड़ब शुरू करे चती, तो उनका लग पहल पन्ना से इचश्मा हे बाक चाही, जाईसा उ समपुरन सामागरी के उआई नजर से देख सकती.
- 7:15–7:18तए एक राव्यबार में कोना लागु केल जाही?
- 7:18–7:29जिना जंपादकी अक पहला प्रस्तावना क तुरन्त बाजे दुस्रा संपादक अनुवादक क परीचाय वला हिस्सा ची
- 7:29–7:34अते सीदे संपादक क परीचाय देबाक सट्ता पच्मा खंद सां
- 7:34–7:39समानानतर कात करोट्वला उद्धरन अशव्दावली के सुरक्षित रक्बाक
- 7:39–7:45जब आद्दिपी जईलक्ष्मी के संदरभ में दिलगेल आची तक्रा उपर लो आनल जासके तच्छे.
- 7:45–7:49आप और इब बहुत स्पष्ट रूप सकाल जबाक चाही.
- 7:49–7:50पाथक के पहनेही बताओ,
- 7:50–7:53जगन वो गुज्रातिक नजीर मन्सुरी
- 7:53–7:55वा कश्मिर करहमान राही के पड़ता,
- 7:55–7:58तो उनका शब्द के पाचु कत्तिदरी मुल्गन्द भिटत.
- 7:58–8:02बुजल्ये, जगन अन्वादक कहे चितीन,
- 8:02–8:05जे समानानतर कात करोट मेहेब नहीं आची,
- 8:05–8:10ता एकर अर्थ इएची, जे उकोनो तेलुगु शब्दक बदला मे,
- 8:10–8:14मैत्ली क्कोनो एहिन सुरक्षत सब्द नहीं कुजना चाहे च्छतीन,
- 8:14–8:19जो अकर केवल अर्थ दैथ हो, मुदा अकर सांस्क्रितिक आत्मा के मार दैथ हो.
- 8:19–8:24एक दम सही, उचाहे च्छतीन, जे मैत्ली भाशा अपन सीमा के तानिक,
- 8:24–8:28अही तेलगुवा कश्मीरी विचार के समहित कर आँई
- 8:28–8:33माने अनुवादित कविता एक्दम शुद्द पारंपर एक मैठलीजे का नहीं लागत
- 8:33–8:39नहीं लागत यह एहन लागत जेना कुनो कश्मीरी आत्मा मैठली में भाजी रहल होए
- 8:39–8:43मुदा एक ते हमरा एक ता दोसर बात बुजाईत अची
- 8:43–8:43की बात?
- 8:43–8:49की एही दरशन आसिद्धान्त के एक दम सुरुए में रक्लासा
- 8:49–8:53ए आलेक भेसी अकादमिक आब हारीत तने भाजाएत
- 8:53–8:57पाथक प्रायः भूमिका पड़ेत काल सहित यक रस्खोजद छती
- 8:57–8:59आई, ये दोर सबहावे कची
- 8:59–9:03मुदा एक्रा प्रस्तुत करबाक तरीका पर सब किचु निरभर करे चे
- 9:03–9:06माने दराईज़ा बाक समबहावन न नहीं अच्छे की
- 9:06–9:10नहीं, जो एक्रा नीरस अकाद्दमिक नीम जगा नहीं
- 9:10–9:13अग, ज़ना अनुवादक पाथक सा कही रहल हो थी,
- 9:13–9:18जे हम आहाक लेल कशमीर का बरव आए उरीशाक माटीला का आए ची.
- 9:18–9:21एक दम आए एलेल हमरा एही सब द सबख सुगन्द के,
- 9:21–9:26कोना सुरक्षित रक्छी परल आची से आहाक लेल बुजना ए बड़ दिल्चास पैते.
- 9:40–9:48माने सिद्दान्त के दर्षनक भोजसा निकाली का एक्ता सहित्टिक सहसिक कार्यक रुप में प्रस्तुत कल जाए.
- 9:48–10:00सत्ते कहल हूँ आईते आबी कहम्रा लगीत आची जे एकता तेसर आद्यन्त महत्पूर्न काज जे बची जाएच है उची संदर्भ कास्थापना
- 10:00–10:03संदर्भ कास्थापना आगताख पर्यक यह ची
- 10:03–10:15मूल भाशाक सांस्क्रतिक आईतियासिक प्रिष्ट भूमिसा मेठलेक पाथक के जोडबाक लेल प्रतेक खंडक आरंभ में एक ता संचिप्त परिचयात्मक से तु आवश्षक अची.
- 10:15–10:19इवर्तमान धाचाख बहुत पेक खम्जोरी अची.
- 10:19–10:27अव, वर्त्मान सामगरी में लेखक लोकनिक परिच्या एक संगे हुंकर रच्नाक विषे वस्थुत बतावलगेल अची नहीं,
- 10:27–10:33जिना तेल्गुक सदालेल मित्र में कलंदर समुदाएक भालुनचेवाक परमपरा?
- 10:33–10:38अग, वा उडियाक सरोजनी साहुक कता में असीमित दुख कबात,
- 10:38–10:45मुदा मेठली पाथक के वही विषिट चेत्री आन्दोलनक अतिहासिक संदर्ब नहीं बहती च्याए.
- 10:45–10:49माने पाथक के सीधे गेरा पानी में दھकेल देल जाएच्याए.
- 10:49–10:57जेना गुज्राती दलित कविता वा कश्मीरी सूफी परमपरा पर सीथा च्लांग लगा देल गल अचे.
- 10:57–11:05हम्रा लेल वा कोनो से हो मैठली बाशी पाठक अक ले इग कविता सब मात्र किचु सबदक समूह बनी कर रही जैत.
- 11:05–11:10बिना उही संदर्ब कक पाथक उही विदखक अस्ली ताप के नहीं महसुस कपता.
- 11:10–11:12सत्ते कहल हूँ.
- 11:12–11:17आई ही ले हमर सुजाव अचे एजे अनवादक वस समपादक दे सूं
- 11:17–11:19प्रतेग भाशा कहन्द कक प्रारंभ में
- 11:19–11:22203 पातिक एक ता माख्रो कंटेक्स्ट्
- 11:22–11:25या व्यापक संदरभ जोडल जाए.
- 11:25–11:28जना एक ता चोड सन परीप्रेखषे
- 11:28–11:30जे पाथकक मस्तिषक के
- 11:30–11:33उही विषिष्ट काल कंड अब भुगोल में अस्थापित कषके.
- 11:33–11:37रहा, जे हमरा गुज्राती दलित कविता का कंड कलेल
- 11:37–11:42इक रवाख होए, तजगन 15-Gujrati Dalit Kavita कविता कखन्ड अवेच चे,
- 11:42–11:47तवोते सीदे कविता कनाम लिखवाग सट्टा पहले दूलाईन में
- 11:47–11:50गुज्राती Dalit साहित्तिक आंदोलन कप्रेष्ट भूमी
- 11:50–11:52आ अकर संगर्ष्का चर्चा केल जाए.
- 11:52–12:01माने, गुज्राती दलित आंदोलन कोनु सामान्य संगर्ष नहीं चल, एकर अपनिक्त विषिष्ट भोगोलिक अर राजनेतिक रुप्रेखा अचे.
- 12:01–12:08इक्दम बिना इबुजने उमे सोलंकि कविता एक ता सामान्या अक्रोष लागी सकत अची
- 12:08–12:14जोखन की उएक ता बहुत विषिष्ट अस्ठान्या वेवस था तीख्षन आलोचना अची
- 12:14–12:26बुजलिय, पात्ख के बतावल जाए, जी गुज्रातक समाज में दलिद साहित्त्य, कोना मुख्यदारा सा अलग अपन एक ता समवननतर सत्तिग गर्लक अची.
- 12:26–12:33आप, यी त्री लाईनक बूमिका एक ता लेंस का काज करत, जाही सक कविताक असल अर्थ इस पष्ट भैजात.
- 12:33–12:38अम्रा लगाइत छी कश्मिरी साहित्यमे यी और भेशी जरूरी भोजाए.
- 12:38–12:39इक दम जरूरी आची.
- 12:39–12:49बिना कश्मीर का सूफी परमपरा वा उते के विस्थापनक दर्द बुजले, रह्मान रही कविता त मात्र शब्दक खेल लागी सकता ची.
- 12:49–12:56आ, कश्मीरी सहित्यक संदर्व में, जिना रह्मान रही कविता से पुर्व, कश्मीर का सूफी परमपरा,
- 12:56–13:06अक रहस्यवाद आदूनिक कश्मिर कर राजनेतिक वेदना, विस्थापनक दर्द का एतिहासिक मिलापक बारे में एक टाई चोट सन परिप्रेक्ष्यद दिल जाए.
- 13:06–13:14माने इबतेना अवष्यक अची जे कोना कशमीरी कविता मे अद्धात्म अ अद्धनिक त्रासदी एक संगे चलाई तची.
- 13:14–13:20एक दम इचोड-चोड-संदरभ पाथकक लेल कम्रेक तापमान सिथ करे चे,
- 13:20–13:26जाई से उ भीतर प्रवेश करभासब पहीने मानसिक रुप से तेयार भेजाई चन.
- 13:26–13:32इत उहन बात भेल, जे कुनो गाच के एक माटी से उखाडी के दो सर ठाम लेगे बाक लेल,
- 13:32–13:37उकर ज़ी में लागल किछु प�रान माटी उ संगे लोजेनाई आवश्षक होई चे.
- 13:37–13:40अहो, बहुत सुन्दर उप्माच है
- 13:40–13:45आँ, मने अनुवाद खाली सब्दक नहीं होएच, मातिक से होएच
- 13:45–13:49हम्राई बुजहाई तची, जे बिना उही माख्रो कंटेक्स्ट्वला मातिक
- 13:49–13:54उज़ ड़ मेठलिक नव माती में प्रवेश करत काल शोक में चल जात
- 13:54–14:05इक्दम, आज्जा हम एही द्रिष्टानतके और विस्तार दी, तब बिना उही मूल मातिक, नव ठाम पर गाच वाता सुखाई सके तची, वा अकर अस्ली सुगन्द बडली सके तची.
- 14:05–14:35आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� �
- 14:35–14:40अगर अगर चरम सीमा द़़ी पहुचे बाँ में साईता करगट्छी तो उदेश्ट्रूटी निकालब ना होई तची.
- 14:40–14:44बलकी अई सामग़ेट चे वास्तविक समबावना अची अग्रा अगर चरम सीमा द़़ी पहुचे बाँ में साईता करगट्छी.
- 14:44–14:47मुदा जते काज इती गमहीर आप पैग हो,
- 14:47–14:50उते आलोचनात्मक द्रिष्टी से हो,
- 14:50–14:52उतबे सुख्श महेबाक चाही.
- 14:52–14:56इग्दम, जकन हम एहन समग्रेक समिक्षा करेच ही,
- 14:56–14:58तवूदेश्छ त्रूटी निकालब ना होईतची.
- 14:58–15:01बलकी उही समगरित जे वास्तविक समबावना अची
- 15:01–15:06उक्रा उकर चरम सीमा दहरी पहुचेबा में सहाईता करब होई तची.
- 15:06–15:10आप इपोती पही नहीं सब बहुत सम्रिद अची.
- 15:10–15:14बस एक्रा प्रस्तुट करबाक तरीका मैं किछ समपाद की अपरीमारजन
- 15:14–15:18एक्रा पात्ख के लिल और भेसी आपन आसुलभ बना देत.
- 15:18–15:22ता ज़ा हम आईत एही समपूरन विमर्ष के समेटे चाही,
- 15:22–15:27ता एक्रा और उत्क्रिष्ट बनेबाख लिल 3 ता मुख्य काज के लिल जासके तची.
- 15:27–15:41पहल अनुक्रमडिका अ समपादिकियके विधा गद्या अपद्यकसत्ता बहाशाका अदार पर पुनरगतित केल जाए से पाथक के एक तब आशाक पुरन संस्क्रतिक स्वाद एक ठाम वेट सके.
- 15:41–15:51अग, दो सर अनुवादक दर्षन और वैचारिक सिद्धान्त के समपादकिये के पाचम खंदसा उठाकर इक्दम प्रारमभ में स्थापित केल जाए.
- 15:51–15:54इक तर रचनात्मक गोशना पत्रक रूपेन,
- 15:54–15:57जाहे सब पात्ख, स्रूवे सां,
- 15:57–16:01उही वैचारिक चश्माके संगे रस लेवाक ले तैयार भासकती.
- 16:01–16:05एक दम, अथे सर, भिन्न भिन्न भाशाइ खन्द सपूर्व,
- 16:05–16:08उकर सांस्क्रितिक एतिहासिक प्रिष्ट बूमी.
- 16:08–16:11मानी, इक टछ़्ट्सन माईक्रो कन्तेक्स्ट जोडल जाए.
- 16:11–16:17जिना की गुज्राती दलिट साहिते, अक्कश्मीरी रहसे वादक संदरभ में चर्चा बहेल,
- 16:17–16:21यी उही गाज्के जडी में लागल मुल माटिक काच करत.
- 16:21–16:26इटीनो सुजाव लागु करलासा पात्ख केवल शब्द नेपड़त,
- 16:26–16:31बलकी ओही समाज, ओही इतिहास, आओही पीडा के से हो भोगेत,
- 16:31–16:33जे कर अनुवाद के लगेल अची.
- 16:33–16:35सथ यकाल हूँँँँँ.
- 16:35–16:38हम आशा करे ची, जे इई सुजाव,
- 16:38–16:43आब आँँ सव बेर भिर सोचु जे की आँँ जकन कोनु नवगाच रोपए ची,
- 16:43–16:46तक की ओकर ज़ी में किछ पुरान माटी चोरे ची,
- 16:46–16:49वा ओकर पूरा साव कर देची.
- 16:49–16:53अब आँ सव बेर भिर सोचु जे की आँजगन कोनु नवगाच रोपए ची,
- 16:54–16:57तक की ओगर ज़ी में किछ पुरान माटी चोरे ची,
- 16:58–17:00वा ओगर पूरा साव कर देची.
- 17:01–17:02फिर भेटब
- 17:03–17:04फिर भेटब
- 17:04–17:08भी बदान माटी चूरे ची वा उक्रा पूरा साव कर देची
- 17:08–17:10फिर भेटब
- 17:10–17:11फिर भेटब
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आएक हमर इविमर्श गद्य पद्य भार्ती अनुवाद कंट दूई पर अच्छे, जहे में गजंद्र ताकृ द्हारा अनुदित आआशिश अनचिनार दूरा सम्पादित, बिबन भार्ती यबाषाक साहित्यक मैथ्ली अनुवाद अच्छे. अई निसन्दे है एक ता एतिहासे काज अचे मुदा हा बिना कुनो विलंबक औव हम सब सीथा विमर शूरू करी देखु समपाद की यः सन्रचना आ अनुक्रमनिका प्रस्तूती करन के भीच एक ता अवानच दूरी भुजही तचे एक दाम जाहे सा पाथक के संदर्ब खोजवा में असुविदा बसके चे आप मने अनुक्रमनिका पर द्रिष्टी दिया ता देखवा जे गद्य अपद्द्यक खंडके एक दम अलगलग राखल गे लचे इएक ता गंभीर समपाद की ये त्रुटी एचे अहो मैं विद्धाक आदार पर बाथ देल गे लगे लगे लगे लगे आए एक रासे होई त की चे जे एक त बहाशाक समपून सहिट्या खंडद बोजाई त चे बुजलिये जो एक रा एक त उदारन सब उज़ही चाही त तक कलपना करुग जे आहा एक ता एहन विशाल अई तिहासिक संगराले में ताहली रहल चीजते भिन्द भिन्द प्राचीन सब्भिताक वस्तुके उकर मुल संस्क्रीतिक आदार पर नहीं बलकी उकर बनावबटक के आदार पर राखल गेल अचे इक्द्द्द्द्दिक उप्मा आची एक्द्दिक अप्मा आची एक्दिद्दिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक्दिदिक अप्मा आची एक् अदे अदिया गड़ादी और कनड़ग गड्द्या भी जाएचे अदे अदे अदे पद्दिया गड़ादी तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे पद्दिया तो दे अग, उगरा सता पात्खक द्यान आजे सान्सक्रेतिक प्रवाज जे उपूरी तरह तूटी जाएचे. एक दम तूटी जाएचे. अग, उगरा सत तब पात्ठक द्यान अजे संस्क्रितिक प्रवाज जे उपूरी तरह तूती जाएचे. ये गदम तूटी जाए चे, तव एकर सुदारक उपाई इए चे जे पोठीक अनुक्रमने का अ समपादकी ए दूनु खाम सन्रच्ना के विद्धामाने गद्दे अपपद्दे का आदार पर नहीं, बलकी मुल भाशा का आदार पर पूनरगतित कैल जाए. बुजलिय, जाही सा एक ता बाशाक समपून स्वाद, उकर गन्द, अकर मातेक कता पाथक के एक संगे बेट सकए. अग, बाशाक के के खेंदर में राखाल जाए, समपाद की अपोतिक अनुक्रमनिका में तिल्गु साहिट्ते का एक ता मुख्ध्य कहन्द बनत. अगर अंतर गत पहले तिल्गु गद्देके राखल जाए आवकर तुरन्त बाद तिल्गु पद्देके जिना जे सुभद्द्रा वा चल्लपली स्वरु प्रानी जे का कवेये त्रीक तिल्गु दलेत महीला कवेता अगदम, एक रासा पाथक एक संगे तेलगु समाजक राजनेतिक संगर्ष, कलंदर समुदायक सीमान्त जीवन अ इस्त्री विमर्षक पुरन चित्र एक अगटाम देखिपाता हा. मुदा रुकु, हमरा एक ते एक ता बात प्शंका बहुर है लच्छे. की? इई एक ता अकादमिक संकलन से होता अची नहीं? आप चेटा जी शोद हारती वा अदेता विशेश रूपसा केवल विद्हागत अद्ध्यन करे चाहत्छतीं जे ना मानी लिया जे के उ खली बारत का आदूनिक गद्ध पर शोद करोब चे थीं उत चिद जिता जा हूंका बीच भीच मे पद्धक पन्ना उलते पडल. येक ता निक प्रष्न अची. मुदा जा हम एही पोठी क गद्द्य पद्ध्य बार्तिय अनुवाद क वूलु देश्पर विचार करिये, तईकर लक्छ विन्न विन्न भारतिय भाशाक सुगन्दध के मेठलिक पाथक दरी पूचाना एची. आव उता जी. शोदारती तव अनुक्रमनिकाक उप्योग कएक अपन गद्ये खोज लेता. मुदा एक ता समान न साहित्य प्रेमी पाथक लेल, जे पन्ना दर पन्ना पोथी पडेच थी, बाशाक आदार पर जुडल रहब बेसी सहज होएच है. माने उ वान्सिक रूप सद्दोज जनग होएच है. एक दम एक ता बाशा सा दोसर भाशा में चलांग लगेवा में, जे एक्ता कल्च्टरल शौक वाख वाख संस्क्रतिक दख्का होए चे अक्रासा पाथख के बचेवाख यी सब सनिक तरीका चे आप जेना तेल्गुक सिमान्त जीवन सा अचानक उडियाक अदिवासी जीवन में प्रवेश करव आफिर गुज्राती देस जाएप सत्ते कहलहू, साहित्ते कोनो विदा से भेसी आपन भोगोलिक अ संख्रतिक माट्टेच से जोड़ होए तच्छे. आहक तर्क में वजन अची, पात्ख कक मान्सिक यात्रा के निरबाद राखभ अही, कल्ट्रल शोक से बचैना समपादक के प्रथम दाइत वहुएद से. आजा हमर उदेश अही मुल संसक्रतिक गंद के सुरक्षित रखबाग अची, जहिक चर्चा आहा करल हल ची, ता इबाज सीदे तोर पर अनुवादक के उही दर्शन्ट से जोड़ाइ तची, जे इस समपोंड पोथिक आत्मा चे. एक दम सही त्हाम पहुच लोग वहा, अनुवाद दर्शनट जे मूल सिद्धान्त, अगरा आमुख में और भेसी प्रात्मिक्ता बेट्वाग जाही. एह एही समग्रिक एक ता बहुत पैग संच्रषनात्मक कमजोरी अची. समपादिकिय में गजेंद थाकुरग जे अट्यन्त शक्तिषाली अनवाद दर्षन अची. दजेंद ठाकुरक जे अट्यन्त शक्तिषाली अनुवाद दर्षन अची जेकर उलेख उसमर पन वाख्के में से हो के ने चाती? आँ, उबहुत नीचा जाके आए लगछी. हुंकर उप्रसिद उद्धरन समनान्तर कात करोट मे हैब नहीं अची. वरन यह आची असल सत्या जो आपन समेलेला कची ओ, हो, इकोनो सादारन बात नहीं आची इएक ता गंभीर अख्रानतिकारी विचार आची एक दम संगे मूल भाशाक रंग आग गंदधे बचेवाग जे हूंकर संगर्ष आची इस्व न्पादिक यक पाचम्खन्ड अनुवाद्द्दर्शन अपद्द्द्दी में दھकेल देल गेला ची. जाए कारने पाथक अतेक नीक वैचारिक अदार से बहुद देर से परिषित हूए चती. आजा पाथक एही दर्शन से अनभिग्य रहे चती, तो उ अनुवादक को उही विषिष्ट शब्दावली के वाख्यविन्यास का उही अट्कतापन के अनुवादक को कमजोरी मानी लेता. जखन की उएक ता साभिप प्राय प्रयोग अचे. सत्य कहला हूँ. एही लेल सुदारक उपाई एजी, जे इ अनुवाद दरशन कोनो अकादमिक नियम कानुन मात्र नहीं अछी, इ एही सम्पूरन पोठी कर चश्मा थेक. आ, एक्रा सम्पादिक एक प्रारन्व में भूमिका ख्टूरत बाद स्थापित केल जाएक चाही. एक दम, पाटक जगन पोठी पड़ब शुरू करे चती, तो उनका लग पहल पन्ना से इचश्मा हे बाक चाही, जाईसा उ समपुरन सामागरी के उआई नजर से देख सकती. तए एक राव्यबार में कोना लागु केल जाही? जिना जंपादकी अक पहला प्रस्तावना क तुरन्त बाजे दुस्रा संपादक अनुवादक क परीचाय वला हिस्सा ची अते सीदे संपादक क परीचाय देबाक सट्ता पच्मा खंद सां समानानतर कात करोट्वला उद्धरन अशव्दावली के सुरक्षित रक्बाक जब आद्दिपी जईलक्ष्मी के संदरभ में दिलगेल आची तक्रा उपर लो आनल जासके तच्छे. आप और इब बहुत स्पष्ट रूप सकाल जबाक चाही. पाथक के पहनेही बताओ, जगन वो गुज्रातिक नजीर मन्सुरी वा कश्मिर करहमान राही के पड़ता, तो उनका शब्द के पाचु कत्तिदरी मुल्गन्द भिटत. बुजल्ये, जगन अन्वादक कहे चितीन, जे समानानतर कात करोट मेहेब नहीं आची, ता एकर अर्थ इएची, जे उकोनो तेलुगु शब्दक बदला मे, मैत्ली क्कोनो एहिन सुरक्षत सब्द नहीं कुजना चाहे च्छतीन, जो अकर केवल अर्थ दैथ हो, मुदा अकर सांस्क्रितिक आत्मा के मार दैथ हो. एक दम सही, उचाहे च्छतीन, जे मैत्ली भाशा अपन सीमा के तानिक, अही तेलगुवा कश्मीरी विचार के समहित कर आँई माने अनुवादित कविता एक्दम शुद्द पारंपर एक मैठलीजे का नहीं लागत नहीं लागत यह एहन लागत जेना कुनो कश्मीरी आत्मा मैठली में भाजी रहल होए मुदा एक ते हमरा एक ता दोसर बात बुजाईत अची की बात? की एही दरशन आसिद्धान्त के एक दम सुरुए में रक्लासा ए आलेक भेसी अकादमिक आब हारीत तने भाजाएत पाथक प्रायः भूमिका पड़ेत काल सहित यक रस्खोजद छती आई, ये दोर सबहावे कची मुदा एक्रा प्रस्तुत करबाक तरीका पर सब किचु निरभर करे चे माने दराईज़ा बाक समबहावन न नहीं अच्छे की नहीं, जो एक्रा नीरस अकाद्दमिक नीम जगा नहीं अग, ज़ना अनुवादक पाथक सा कही रहल हो थी, जे हम आहाक लेल कशमीर का बरव आए उरीशाक माटीला का आए ची. एक दम आए एलेल हमरा एही सब द सबख सुगन्द के, कोना सुरक्षित रक्छी परल आची से आहाक लेल बुजना ए बड़ दिल्चास पैते. माने सिद्दान्त के दर्षनक भोजसा निकाली का एक्ता सहित्टिक सहसिक कार्यक रुप में प्रस्तुत कल जाए. सत्ते कहल हूँ आईते आबी कहम्रा लगीत आची जे एकता तेसर आद्यन्त महत्पूर्न काज जे बची जाएच है उची संदर्भ कास्थापना संदर्भ कास्थापना आगताख पर्यक यह ची मूल भाशाक सांस्क्रतिक आईतियासिक प्रिष्ट भूमिसा मेठलेक पाथक के जोडबाक लेल प्रतेक खंडक आरंभ में एक ता संचिप्त परिचयात्मक से तु आवश्षक अची. इवर्तमान धाचाख बहुत पेक खम्जोरी अची. अव, वर्त्मान सामगरी में लेखक लोकनिक परिच्या एक संगे हुंकर रच्नाक विषे वस्थुत बतावलगेल अची नहीं, जिना तेल्गुक सदालेल मित्र में कलंदर समुदाएक भालुनचेवाक परमपरा? अग, वा उडियाक सरोजनी साहुक कता में असीमित दुख कबात, मुदा मेठली पाथक के वही विषिट चेत्री आन्दोलनक अतिहासिक संदर्ब नहीं बहती च्याए. माने पाथक के सीधे गेरा पानी में दھकेल देल जाएच्याए. जेना गुज्राती दलित कविता वा कश्मीरी सूफी परमपरा पर सीथा च्लांग लगा देल गल अचे. हम्रा लेल वा कोनो से हो मैठली बाशी पाठक अक ले इग कविता सब मात्र किचु सबदक समूह बनी कर रही जैत. बिना उही संदर्ब कक पाथक उही विदखक अस्ली ताप के नहीं महसुस कपता. सत्ते कहल हूँ. आई ही ले हमर सुजाव अचे एजे अनवादक वस समपादक दे सूं प्रतेग भाशा कहन्द कक प्रारंभ में 203 पातिक एक ता माख्रो कंटेक्स्ट् या व्यापक संदरभ जोडल जाए. जना एक ता चोड सन परीप्रेखषे जे पाथकक मस्तिषक के उही विषिष्ट काल कंड अब भुगोल में अस्थापित कषके. रहा, जे हमरा गुज्राती दलित कविता का कंड कलेल इक रवाख होए, तजगन 15-Gujrati Dalit Kavita कविता कखन्ड अवेच चे, तवोते सीदे कविता कनाम लिखवाग सट्टा पहले दूलाईन में गुज्राती Dalit साहित्तिक आंदोलन कप्रेष्ट भूमी आ अकर संगर्ष्का चर्चा केल जाए. माने, गुज्राती दलित आंदोलन कोनु सामान्य संगर्ष नहीं चल, एकर अपनिक्त विषिष्ट भोगोलिक अर राजनेतिक रुप्रेखा अचे. इक्दम बिना इबुजने उमे सोलंकि कविता एक ता सामान्या अक्रोष लागी सकत अची जोखन की उएक ता बहुत विषिष्ट अस्ठान्या वेवस था तीख्षन आलोचना अची बुजलिय, पात्ख के बतावल जाए, जी गुज्रातक समाज में दलिद साहित्त्य, कोना मुख्यदारा सा अलग अपन एक ता समवननतर सत्तिग गर्लक अची. आप, यी त्री लाईनक बूमिका एक ता लेंस का काज करत, जाही सक कविताक असल अर्थ इस पष्ट भैजात. अम्रा लगाइत छी कश्मिरी साहित्यमे यी और भेशी जरूरी भोजाए. इक दम जरूरी आची. बिना कश्मीर का सूफी परमपरा वा उते के विस्थापनक दर्द बुजले, रह्मान रही कविता त मात्र शब्दक खेल लागी सकता ची. आ, कश्मीरी सहित्यक संदर्व में, जिना रह्मान रही कविता से पुर्व, कश्मीर का सूफी परमपरा, अक रहस्यवाद आदूनिक कश्मिर कर राजनेतिक वेदना, विस्थापनक दर्द का एतिहासिक मिलापक बारे में एक टाई चोट सन परिप्रेक्ष्यद दिल जाए. माने इबतेना अवष्यक अची जे कोना कशमीरी कविता मे अद्धात्म अ अद्धनिक त्रासदी एक संगे चलाई तची. एक दम इचोड-चोड-संदरभ पाथकक लेल कम्रेक तापमान सिथ करे चे, जाई से उ भीतर प्रवेश करभासब पहीने मानसिक रुप से तेयार भेजाई चन. इत उहन बात भेल, जे कुनो गाच के एक माटी से उखाडी के दो सर ठाम लेगे बाक लेल, उकर ज़ी में लागल किछु प�रान माटी उ संगे लोजेनाई आवश्षक होई चे. अहो, बहुत सुन्दर उप्माच है आँ, मने अनुवाद खाली सब्दक नहीं होएच, मातिक से होएच हम्राई बुजहाई तची, जे बिना उही माख्रो कंटेक्स्ट्वला मातिक उज़ ड़ मेठलिक नव माती में प्रवेश करत काल शोक में चल जात इक्दम, आज्जा हम एही द्रिष्टानतके और विस्तार दी, तब बिना उही मूल मातिक, नव ठाम पर गाच वाता सुखाई सके तची, वा अकर अस्ली सुगन्द बडली सके तची. आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� � अगर अगर चरम सीमा द़़ी पहुचे बाँ में साईता करगट्छी तो उदेश्ट्रूटी निकालब ना होई तची. बलकी अई सामग़ेट चे वास्तविक समबावना अची अग्रा अगर चरम सीमा द़़ी पहुचे बाँ में साईता करगट्छी. मुदा जते काज इती गमहीर आप पैग हो, उते आलोचनात्मक द्रिष्टी से हो, उतबे सुख्श महेबाक चाही. इग्दम, जकन हम एहन समग्रेक समिक्षा करेच ही, तवूदेश्छ त्रूटी निकालब ना होईतची. बलकी उही समगरित जे वास्तविक समबावना अची उक्रा उकर चरम सीमा दहरी पहुचेबा में सहाईता करब होई तची. आप इपोती पही नहीं सब बहुत सम्रिद अची. बस एक्रा प्रस्तुट करबाक तरीका मैं किछ समपाद की अपरीमारजन एक्रा पात्ख के लिल और भेसी आपन आसुलभ बना देत. ता ज़ा हम आईत एही समपूरन विमर्ष के समेटे चाही, ता एक्रा और उत्क्रिष्ट बनेबाख लिल 3 ता मुख्य काज के लिल जासके तची. पहल अनुक्रमडिका अ समपादिकियके विधा गद्या अपद्यकसत्ता बहाशाका अदार पर पुनरगतित केल जाए से पाथक के एक तब आशाक पुरन संस्क्रतिक स्वाद एक ठाम वेट सके. अग, दो सर अनुवादक दर्षन और वैचारिक सिद्धान्त के समपादकिये के पाचम खंदसा उठाकर इक्दम प्रारमभ में स्थापित केल जाए. इक तर रचनात्मक गोशना पत्रक रूपेन, जाहे सब पात्ख, स्रूवे सां, उही वैचारिक चश्माके संगे रस लेवाक ले तैयार भासकती. एक दम, अथे सर, भिन्न भिन्न भाशाइ खन्द सपूर्व, उकर सांस्क्रितिक एतिहासिक प्रिष्ट बूमी. मानी, इक टछ़्ट्सन माईक्रो कन्तेक्स्ट जोडल जाए. जिना की गुज्राती दलिट साहिते, अक्कश्मीरी रहसे वादक संदरभ में चर्चा बहेल, यी उही गाज्के जडी में लागल मुल माटिक काच करत. इटीनो सुजाव लागु करलासा पात्ख केवल शब्द नेपड़त, बलकी ओही समाज, ओही इतिहास, आओही पीडा के से हो भोगेत, जे कर अनुवाद के लगेल अची. सथ यकाल हूँँँँँ. हम आशा करे ची, जे इई सुजाव, आब आँँ सव बेर भिर सोचु जे की आँँ जकन कोनु नवगाच रोपए ची, तक की ओकर ज़ी में किछ पुरान माटी चोरे ची, वा ओकर पूरा साव कर देची. अब आँ सव बेर भिर सोचु जे की आँजगन कोनु नवगाच रोपए ची, तक की ओगर ज़ी में किछ पुरान माटी चोरे ची, वा ओगर पूरा साव कर देची. फिर भेटब फिर भेटब भी बदान माटी चूरे ची वा उक्रा पूरा साव कर देची फिर भेटब फिर भेटब