MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID
विदेह_सदेह_२८__एक_संग्रह.mp4
Timestamped machine output
- 0:00–0:04नमसकार, चल्ये बिना किसी देरी के सीदा मुद्दिप राते हैं.
- 0:04–0:07आजके इस खास विष्लेषन बे हम विदेह सदेहे अथ्ट्फाएईस,
- 0:07–0:13नाम के एक भेहद दिल्चस् मैठली एजरनल के विषाल साहित्यग दाईरे को समजने वाले हैं.
- 0:13–0:17दिक्ये साहित ते हमेशा से हमें अलगलक दून्या में लिजाने वला एक जरोखा रहा है.
- 0:17–0:20लेकिन जब इस में बहतरीन अनुवाद का तडगा लगजैना,
- 0:20–0:23तो ये जरोखा एक पूरा का पूरा आस्मान बन जाता है.
- 0:23–0:26विदेह सदेह 18 कोई आम पत्रिका नहीं है,
- 0:26–0:29असल में यह एक अजा महा संग्रह है,
- 0:29–0:31जो दून्या बर की अलग �alag बाशाँँ की,
- 0:31–0:33बहतरीन कहानियो और कविताँ को,
- 0:33–0:36सीदे मैठली के पाठको तक पहुचाने का खाम कर रहा है.
- 0:37–0:38आज हम क्या क्या कवर करने वाले है,
- 0:38–0:43बवड़ संखशेप में बतादूँ हम विदेह सदेह के एक चोटे से परीचे से शिरवाद करेंगे
- 0:43–0:46फिर दो बहुत ही गेरी कहानियो के सफर पर चलेंगे
- 0:46–0:50पहला है जुम्मा जिस में हम आस्था और खोफ के तक्राव को देखेंगे
- 0:50–0:55और दूस्रा चिन्नमस्ता, जो नारी संगर्ष की एक बहुत ही मार्मिक कहनी है,
- 0:55–0:59और अंत में हम अनुवाद की उस अस्ली ताककग पर बाद करेंगे,
- 0:59–1:01जो इन सप को जोडती है.
- 1:01–1:03तो चलिये अपने पहले बाग से शुरू करते हैं,
- 1:03–1:06विदे है सदे है, एक परीचे.
- 1:06–1:10देकते हैं कि इस पूरी पहल की जड़ें अक्फर कहा थक पहली हैं?
- 1:10–1:14इस जरनल के सफर पर गवर करें, जिसके समपादग गजंदर ताकृगी हैं,
- 1:15–1:18तो इसकी शुर्वाद जानने के लिए हमें साल दोहाजार में वापस जाना होगा.
- 1:19–1:20जी हां, साल दोहाजार.
- 1:20–1:24जब भाल सरी गाज नाम से पहला मेठली बलोक शुगूए वाद अद.
- 1:24–1:29इंटरनेट पर मेठली भाशा की ये सबसे शुबच्वाती और अटियासिक उपस्तिती ती.
- 1:29–1:34बाद में एक जनवरी 2008 से इसे विदेहे एपट्ट्रिका कर रूप दे दिया गया.
- 1:34–1:39सچ कहु तो यह सरफ एक पब्लिकेशन नहीं है, बलकि यह अपने अपने एक पुरा आन्दोलन है,
- 1:39–1:43जिसने दिजितल दुन्या में मैठली को एक एक एक एक दम नहीं और मस्वूथ पहचान दी है.
- 1:43–1:48अब इस संग्रे की तो सबसे हेरान करने वाली बात है, वो है इसकी विविद्धा.
- 1:48–1:56जर अच्छिए, तेलगु हिन्दी, रूसी, जरमन, संसक्रत, अरभी और यहांता की कोंकनी जैसी बाशाँ की रचनाँ का,
- 1:56–2:01अब इस बड़े परीद्रिष्य से निकलकर सीदे अईन्सानी भावनाव पर आपना दूस्रा बाग,
- 2:01–2:07जुम्मा, आस्ता और भाई. शिडवात करते है, अब इस बड़े परीद्रिष्य से निकलकर सीदे अईन्सानी भावनाव पर आपनाव अपनाव बाग,
- 2:07–2:09अपने आपने बड़ी सहिट्ते कोपलप्दी है
- 2:09–2:13अब इस बड़े परिद्रिष्चे से निकलकर सीदे अई अचानी बावनाव पर आपनाव आपने आपने आपने आपने आपने बबड़ी सहिट्ते कोपलप्दी है
- 2:13–2:17है ना कमाल की बात, ये अपने अपने बड़ी सहिट्ते कोपलप्दी है.
- 2:17–2:21अब इस बड़े परईद्रिष्चे से निकलकर सीदे अन्सानी बहावनाव पर आते हैं.
- 2:21–2:25हमारा दुस्रा बाग, जुम्मा आस्था और भाई.
- 2:25–2:55श्रुवात करते हैं जुम्मा से ये मुल्रूब से शेक मोहम्मद शरीफ के लिक्षिवाई एक शान्दार तेल्गु लगुगता है, जैसे यहां मेठली में लाया गया है. कानी का सेट्ब हैद्रबात का एक आम परिवार है. कानी के शुरुमे हमें अमें क्या दिकता है. एक म
- 2:55–2:59यकीन है कि जुम्मे की नमास पशने से गर पर वलाकी रहमत बरसती है.
- 3:00–3:03लिकिन फिर हालात रातो रात कैसे पलडटते है, वो देखिए.
- 3:04–3:07दमाके से पहले उस माकी दुनिया सर्फ आस्था से बहरी थी.
- 3:08–3:10जाँ मसजिद जाना एक पवित्र और जरूरी काम ता.
- 3:10–3:40तो बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर
- 3:40–3:52ज़र आईस वाके की गहलाई को समजगे, यह सरफ एक दायलोग नहीं है, ये एक अईसी माकी हताश और दरी हुई पुकार है, जवहाँ उस अपने बच्चे की जिन्दगी की सलामती, उसकी अपनी गेहरी आस्तापर भारी पड़जाती है.
- 3:52–3:56बारी पड़जाती है. आतंगवात कैसे एक आम अनसान के रोज मर्रा की शानती
- 3:56–4:00और आस्था को जर से हिला देता है, ये कहानी उसका एक बहुती सतीक
- 4:00–4:04और नूट्रल उदारन पेष करती है. ख़र अब एक बिलकल अलक तरह के
- 4:04–4:06अगात की बात करते हैं
- 4:06–4:08हमारा थीसरा हिस्सा
- 4:08–4:09चिन्नमस्ता
- 4:09–4:10नारी का संगर्ष
- 4:10–4:12यहां बात कर रहे है
- 4:12–4:14दुक्तर प्रभाख्टान के
- 4:14–4:16पेहद मशुर हिंदी उपन्यास
- 4:16–4:17चिन्नमस्ता की
- 4:17–4:19जिसे यहां मेठली अनवाद में
- 4:19–4:20पेश की आगया है
- 4:20–4:24प्रिया चम्डे और कपनों के अप्स्पोड बिसन्स में बहुती काम्याब महीला है
- 4:24–4:28बहार से देखने पर उसकी जिन्धिगी एक दंब प्रफ्ट्ट और चकष्ट्ट्वन से भरी लकती है ना
- 4:28–4:30लेकिन आस्लियत कुछ और है
- 4:30–4:33अंदर से वो एक बहयानक शारी रिक और मानसिक ठखाखवद
- 4:33–4:35जिसे हम बनाउड केते हैं उसे जुज रही हैं
- 4:35–4:37उसकी जिन्दगी जितनी चमक्दार दिकती है
- 4:37–4:40अंदर से उतनी ही खाली अद दर्दनाख है
- 4:40–4:43जर अप प्रिया की इस हालत की ताईम लैंग को समची है
- 4:43–4:47काम के सिल्सिले में लगातार विदेशी दोरे चल रहें, नीन पूरी नहीं होरी,
- 4:47–4:50और काम का ये भारी तनाउ तब अपने चरम पर पहच्ता है,
- 4:50–4:54जब वो बेलग्रेड एर्पोट पर ट्रान्जित के दोरान अचानक भिजोष होके गिर पड़ती है.
- 4:54–4:58अद्रश्टार काम के बोज्टले दबाने की कोशिष कर रही थी
- 4:58–5:00और वो जख्म क्या थे
- 5:00–5:04असल में प्र्याज जिस पित्र सत्ता और तोक्सिक महोल का सामना कर रही है
- 5:04–5:06उसका मुख्खे कारन को योर नहीं
- 5:06–5:08बल कि उसका अपना पती नरेंद रही
- 5:08–5:12जिने वो लगातार काम के बोज्टले दबाने की कोशिष कर रही थी.
- 5:12–5:13और वो जग्म क्या थे?
- 5:13–5:18आसल में प्र्या जिस पित्र सत्ता और तोकसिक महोल का सामना कर रही है,
- 5:18–5:20उसका मुख्खे कारन को योर नहीं,
- 5:20–5:22बलके उसका अपना पती नरेंद रहे.
- 5:22–5:25वो आपनी पतनी की काम्याभी से इस कदर इर्षा करता है,
- 5:25–5:28कि वो प्र्या के अपर पैसो की गड्डिया फेखता है,
- 5:28–5:32ताने मारता है, और उनके बेटे संजु की कस्टरी चीन लेने की दमकी देता है.
- 5:32–5:35हद तो तब हुजाती है, जब उसाव-साव कह देता है,
- 5:35–5:37अगर प्रिया काम के सिसले में लन्दन गगी,
- 5:37–5:39तो वो से गर में गुसने नहीं देगा.
- 5:39–5:41यह एक आप आप आप गुटन बहार महाल है,
- 5:41–5:44जो प्रिया की आजादी और उसकी पहचान को
- 5:44–5:46पूरी तरह कुछलने पर आमादा है.
- 5:46–5:48अब इन दोनो अलग-लक कहानिो से
- 5:48–5:55अगर हम ग़ोग कहाँईएं तो एंदोनो कहाँईग में एक बहुती गेरा कोंट्रास्ट यानी एक अंदर है.
- 5:55–6:00तो यें दोनो कहानियों में एक बहुती गेरा कुन्त्रास्ट यानी एक अंदर है.
- 6:00–6:03जुम्मा में हमें बाहर से ठोपी गई हिंसा दिकती है.
- 6:03–6:08एक अचानक हुआ भम्द्हमा का जिसने पल भर में एक परिवार की शानती और आस्ता चेन ली.
- 6:08–6:15तुस्ट्री तरव चिन्नम्मस्ता में पित्र सत्तात्मक दूर्वेवावार का एक बहुती दीमा और अंद्रूनी आगात है,
- 6:15–6:18जो एक सफल महिला को रोस तिल्तिल कर तोड रहा है.
- 6:18–6:22तोनो ही अन्सान के तुटने और उनके संगर्ष की कहानिया है,
- 6:22–6:26तो ये सब जानने के बाद एक सबाल जो मन में आना लाजमी है,
- 6:26–6:30कि जब हम आसे अलग गलग, इतने गेरे मानविये अनुबवों को,
- 6:30–6:33अपनी खुद की शित्रे बाशा में पडते हैं,
- 6:33–6:37तो क्या दूनिया को देखने का हमारा नजरिया पुरी तरह से बडल नहीं जाता?
- 6:37–6:40अदिखने का हमारा नजर्या पुरी तरह से बड़ल नहीं जाता
- 6:40–6:44और सच कहुँ तो यही अनुवादित सहित्ति की सबसे बड़ी ताकत है
- 6:44–6:47ये मानता के सबसे गेरे संगर्षों को
- 6:47–6:50चहे वो हेद्रबाद की एक दरी हुई माका दर्दो
- 6:50–6:55या फिर कल्कत्ता की एक ठकी हुई बिसन्ष्वूमन की गुटन सीदा हमारे दिलो तक,
- 6:55–6:57हमारी अपनी जुबान में लेयाता है.
- 6:57–7:00यह हमें ये सोचने पे मजबूर करता है,
- 7:00–7:03की बाशा की सरहदें अपनी बहावना को खबी नहीं बान सकती.
- 7:03–7:05तो इस बारे में सोचीगा जरूर.
- 7:05–7:07आजके इस विष्छलेशन में बस इतना ही.
Plain text
नमसकार, चल्ये बिना किसी देरी के सीदा मुद्दिप राते हैं. आजके इस खास विष्लेषन बे हम विदेह सदेहे अथ्ट्फाएईस, नाम के एक भेहद दिल्चस् मैठली एजरनल के विषाल साहित्यग दाईरे को समजने वाले हैं. दिक्ये साहित ते हमेशा से हमें अलगलक दून्या में लिजाने वला एक जरोखा रहा है. लेकिन जब इस में बहतरीन अनुवाद का तडगा लगजैना, तो ये जरोखा एक पूरा का पूरा आस्मान बन जाता है. विदेह सदेह 18 कोई आम पत्रिका नहीं है, असल में यह एक अजा महा संग्रह है, जो दून्या बर की अलग �alag बाशाँँ की, बहतरीन कहानियो और कविताँ को, सीदे मैठली के पाठको तक पहुचाने का खाम कर रहा है. आज हम क्या क्या कवर करने वाले है, बवड़ संखशेप में बतादूँ हम विदेह सदेह के एक चोटे से परीचे से शिरवाद करेंगे फिर दो बहुत ही गेरी कहानियो के सफर पर चलेंगे पहला है जुम्मा जिस में हम आस्था और खोफ के तक्राव को देखेंगे और दूस्रा चिन्नमस्ता, जो नारी संगर्ष की एक बहुत ही मार्मिक कहनी है, और अंत में हम अनुवाद की उस अस्ली ताककग पर बाद करेंगे, जो इन सप को जोडती है. तो चलिये अपने पहले बाग से शुरू करते हैं, विदे है सदे है, एक परीचे. देकते हैं कि इस पूरी पहल की जड़ें अक्फर कहा थक पहली हैं? इस जरनल के सफर पर गवर करें, जिसके समपादग गजंदर ताकृगी हैं, तो इसकी शुर्वाद जानने के लिए हमें साल दोहाजार में वापस जाना होगा. जी हां, साल दोहाजार. जब भाल सरी गाज नाम से पहला मेठली बलोक शुगूए वाद अद. इंटरनेट पर मेठली भाशा की ये सबसे शुबच्वाती और अटियासिक उपस्तिती ती. बाद में एक जनवरी 2008 से इसे विदेहे एपट्ट्रिका कर रूप दे दिया गया. सچ कहु तो यह सरफ एक पब्लिकेशन नहीं है, बलकि यह अपने अपने एक पुरा आन्दोलन है, जिसने दिजितल दुन्या में मैठली को एक एक एक एक दम नहीं और मस्वूथ पहचान दी है. अब इस संग्रे की तो सबसे हेरान करने वाली बात है, वो है इसकी विविद्धा. जर अच्छिए, तेलगु हिन्दी, रूसी, जरमन, संसक्रत, अरभी और यहांता की कोंकनी जैसी बाशाँ की रचनाँ का, अब इस बड़े परीद्रिष्य से निकलकर सीदे अईन्सानी भावनाव पर आपना दूस्रा बाग, जुम्मा, आस्ता और भाई. शिडवात करते है, अब इस बड़े परीद्रिष्य से निकलकर सीदे अईन्सानी भावनाव पर आपनाव अपनाव बाग, अपने आपने बड़ी सहिट्ते कोपलप्दी है अब इस बड़े परिद्रिष्चे से निकलकर सीदे अई अचानी बावनाव पर आपनाव आपने आपने आपने आपने आपने बबड़ी सहिट्ते कोपलप्दी है है ना कमाल की बात, ये अपने अपने बड़ी सहिट्ते कोपलप्दी है. अब इस बड़े परईद्रिष्चे से निकलकर सीदे अन्सानी बहावनाव पर आते हैं. हमारा दुस्रा बाग, जुम्मा आस्था और भाई. श्रुवात करते हैं जुम्मा से ये मुल्रूब से शेक मोहम्मद शरीफ के लिक्षिवाई एक शान्दार तेल्गु लगुगता है, जैसे यहां मेठली में लाया गया है. कानी का सेट्ब हैद्रबात का एक आम परिवार है. कानी के शुरुमे हमें अमें क्या दिकता है. एक म यकीन है कि जुम्मे की नमास पशने से गर पर वलाकी रहमत बरसती है. लिकिन फिर हालात रातो रात कैसे पलडटते है, वो देखिए. दमाके से पहले उस माकी दुनिया सर्फ आस्था से बहरी थी. जाँ मसजिद जाना एक पवित्र और जरूरी काम ता. तो बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर ज़र आईस वाके की गहलाई को समजगे, यह सरफ एक दायलोग नहीं है, ये एक अईसी माकी हताश और दरी हुई पुकार है, जवहाँ उस अपने बच्चे की जिन्दगी की सलामती, उसकी अपनी गेहरी आस्तापर भारी पड़जाती है. बारी पड़जाती है. आतंगवात कैसे एक आम अनसान के रोज मर्रा की शानती और आस्था को जर से हिला देता है, ये कहानी उसका एक बहुती सतीक और नूट्रल उदारन पेष करती है. ख़र अब एक बिलकल अलक तरह के अगात की बात करते हैं हमारा थीसरा हिस्सा चिन्नमस्ता नारी का संगर्ष यहां बात कर रहे है दुक्तर प्रभाख्टान के पेहद मशुर हिंदी उपन्यास चिन्नमस्ता की जिसे यहां मेठली अनवाद में पेश की आगया है प्रिया चम्डे और कपनों के अप्स्पोड बिसन्स में बहुती काम्याब महीला है बहार से देखने पर उसकी जिन्धिगी एक दंब प्रफ्ट्ट और चकष्ट्ट्वन से भरी लकती है ना लेकिन आस्लियत कुछ और है अंदर से वो एक बहयानक शारी रिक और मानसिक ठखाखवद जिसे हम बनाउड केते हैं उसे जुज रही हैं उसकी जिन्दगी जितनी चमक्दार दिकती है अंदर से उतनी ही खाली अद दर्दनाख है जर अप प्रिया की इस हालत की ताईम लैंग को समची है काम के सिल्सिले में लगातार विदेशी दोरे चल रहें, नीन पूरी नहीं होरी, और काम का ये भारी तनाउ तब अपने चरम पर पहच्ता है, जब वो बेलग्रेड एर्पोट पर ट्रान्जित के दोरान अचानक भिजोष होके गिर पड़ती है. अद्रश्टार काम के बोज्टले दबाने की कोशिष कर रही थी और वो जख्म क्या थे असल में प्र्याज जिस पित्र सत्ता और तोक्सिक महोल का सामना कर रही है उसका मुख्खे कारन को योर नहीं बल कि उसका अपना पती नरेंद रही जिने वो लगातार काम के बोज्टले दबाने की कोशिष कर रही थी. और वो जग्म क्या थे? आसल में प्र्या जिस पित्र सत्ता और तोकसिक महोल का सामना कर रही है, उसका मुख्खे कारन को योर नहीं, बलके उसका अपना पती नरेंद रहे. वो आपनी पतनी की काम्याभी से इस कदर इर्षा करता है, कि वो प्र्या के अपर पैसो की गड्डिया फेखता है, ताने मारता है, और उनके बेटे संजु की कस्टरी चीन लेने की दमकी देता है. हद तो तब हुजाती है, जब उसाव-साव कह देता है, अगर प्रिया काम के सिसले में लन्दन गगी, तो वो से गर में गुसने नहीं देगा. यह एक आप आप आप गुटन बहार महाल है, जो प्रिया की आजादी और उसकी पहचान को पूरी तरह कुछलने पर आमादा है. अब इन दोनो अलग-लक कहानिो से अगर हम ग़ोग कहाँईएं तो एंदोनो कहाँईग में एक बहुती गेरा कोंट्रास्ट यानी एक अंदर है. तो यें दोनो कहानियों में एक बहुती गेरा कुन्त्रास्ट यानी एक अंदर है. जुम्मा में हमें बाहर से ठोपी गई हिंसा दिकती है. एक अचानक हुआ भम्द्हमा का जिसने पल भर में एक परिवार की शानती और आस्ता चेन ली. तुस्ट्री तरव चिन्नम्मस्ता में पित्र सत्तात्मक दूर्वेवावार का एक बहुती दीमा और अंद्रूनी आगात है, जो एक सफल महिला को रोस तिल्तिल कर तोड रहा है. तोनो ही अन्सान के तुटने और उनके संगर्ष की कहानिया है, तो ये सब जानने के बाद एक सबाल जो मन में आना लाजमी है, कि जब हम आसे अलग गलग, इतने गेरे मानविये अनुबवों को, अपनी खुद की शित्रे बाशा में पडते हैं, तो क्या दूनिया को देखने का हमारा नजरिया पुरी तरह से बडल नहीं जाता? अदिखने का हमारा नजर्या पुरी तरह से बड़ल नहीं जाता और सच कहुँ तो यही अनुवादित सहित्ति की सबसे बड़ी ताकत है ये मानता के सबसे गेरे संगर्षों को चहे वो हेद्रबाद की एक दरी हुई माका दर्दो या फिर कल्कत्ता की एक ठकी हुई बिसन्ष्वूमन की गुटन सीदा हमारे दिलो तक, हमारी अपनी जुबान में लेयाता है. यह हमें ये सोचने पे मजबूर करता है, की बाशा की सरहदें अपनी बहावना को खबी नहीं बान सकती. तो इस बारे में सोचीगा जरूर. आजके इस विष्छलेशन में बस इतना ही.