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मैथिली_में_पूरे_भारत_का_असल_सच.m4a
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- 0:00–0:06जब हम बहुगलिक नक्षे देकते हैं तो अच्सर राज्जों की सीमायो और �alag lag rang to dik jathe हैं
- 0:06–0:07आप बलकुल
- 0:07–0:13लेकिन कोई भी काग्जी नक्षा ये नी बता सकता कि उन सीमाव के बितर रहने वाले लोगों की आसल पीडा क्या है
- 0:13–0:14आप सईई बात है
- 0:14–0:16उनके संगर्ष क्या हैं
- 0:16–0:17या...
- 0:17–0:20उनके हसी में कुई सद्यो पुरानी कहानी चुपी हैं
- 0:21–0:23और यहीं पर साहिद दे काम आता है
- 0:23–0:23एक दम
- 0:24–0:26लिकिन अनुवाद को लेकरना
- 0:26–0:27लोगों के एक अजीप सी दारना है
- 0:28–0:29मलगब आम तोर पे अनुवाद को
- 0:29–0:34तो बस एक बाशा से दुसरी बाशा में, शब्दो को बडलनेके बहुत यह अंत्रिक प्रक्रिया मन लिया जाता है.
- 0:34–0:36आप, जैसे कोई मशीन काम कर रही हो.
- 0:36–0:41वोई तो, एक दिशनरी उठाई शब्द का अर्थ खोजा और उसे दुसरी बाशा में लिग दिया.
- 0:41–1:11बलकी पूरी की पूरी संस्क्रिती सद्यों के संगर्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष
- 1:11–1:16यहे किताब मतलब इसका पैमाना ही अपने आप में इसे एक एतिहासिक धस्तावेज बनाता है
- 1:16–1:19आशीश अंच नहार दवार संपादित है
- 1:19–1:22और इसे विदिह प्रकाशन ने चापा है
- 1:22–1:23सही कहाए
- 1:23–1:26और पता है यहे महेजे किताब नहीं है
- 1:26–1:30इसके भीतर, चोडा गद्य, और चोबीस पद्ध्यखन्ध है
- 1:30–1:33बाप्रे, यतना सारा कंटेंट एकी जगा?
- 1:33–1:37आँ, और वो भी बारत के अलगलक कोनो से
- 1:37–1:41इस मित्तेलगु, उडिया, गुज्राती, कननड, भोज्पूरी
- 1:41–1:44और कष्मीरी साहिते की श्रेष्ट रच्नाों को
- 1:56–2:00विब्रीत परिस्तियो में भी मैठली के दीप को प्रज्वलित रख्खा है.
- 2:01–2:03जिस समरपन तो अपने अपने बहुत कुछ कहता है.
- 2:04–2:08ये केवल अन्या बहाशाँ के साहित्ति को मैठली में लाने का प्रैास नहीं लग़्ा मुजे.
- 2:09–2:10तो क्या लग़्ा है?
- 2:10–2:17अद या बज़ाद के प्रज़ाज को इतना विस्त्रत करने कोशिष या जागा वो पुरे बारत की दध़कन को अपने भीटर मैंसुच कर सके.
- 2:17–2:20ये समवर्पन तो अपने आपने बहुत कुछ कहता है
- 2:20–2:20बिल्कुल
- 2:20–2:24ये केवल अन्या बाशाव के साहित्ते को मेत्ली मेलाने का प्रास नहीं लगा मुजे
- 2:24–2:25तो क्या लग रहे?
- 2:25–2:30मदलब ये मेत्ली बाशा के ख्षितज को इतना विस्त्रित करने की कोशिष है
- 2:30–2:33ज़ाँ वो पुरे बारत की दधगन को अपने भीटर मैंसुच कर सके
- 2:33–2:35बहुत कुब कहा आपने
- 2:35–2:38एक तरा का संसक्रितिक अभी लेग है ये
- 2:38–2:41आपने पलडते ही कशमीर की वादियों से लेकर
- 2:41–2:44तिलन्दाना के गाँ तक का सबर्ताय की आजा सके.
- 2:44–2:48लेकिन इस में बहुत बढी व्यवाहरिक चनोती भी थी.
- 2:48–2:49कैसी चनोती?
- 2:49–2:52अब दिखे तिल्गो की अपनी एक अलग लै है,
- 2:52–2:55उडिया की अपनी एक विषिष्ट मिट्ती की महेख है,
- 2:55–2:57इन सब को मेठली में डालने किलिए,
- 2:57–2:59जिस प्रक्रिया का इस्तमाल हुए,
- 2:59–3:01वो बहुत ध्यान कीचती है.
- 3:01–3:04आच्छ, तो स्रोथ समगरी इसके बारे में क्या बताती है?
- 3:04–3:08स्रोथ बताते है, कि ये एक द्वीस तर्या प्रक्रिया,
- 3:08–3:11यानी तूट्यर प्रूस्से से गुज्रा है
- 3:11–3:14तूट्यर प्रूस्स, मतलब सीद हनुवाद नहीं हूँ
- 3:14–3:19नहीं, और ये अनुवाद दर्षन का एक बहुत ही व्यवावारिक, लेकिन जटिल पहलू है,
- 3:19–3:23बहुबाशी देश में सबसे बड़ी समस्या पता है किया होती है?
- 3:23–3:53आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� �
- 3:53–3:59अग, ज़ेसे तेलुगु साहिति किलिए पी जे लक्ष्मी और के पुषोटम ने ये पुल बनाया.
- 3:59–4:01गुजाति किलिए हिमांक तिसाईने काम किया.
- 4:01–4:03और उडिया किलिए?
- 4:03–4:06उडिया साहिति को अंगरेजी में लाने की जिम्दारी,
- 4:06–4:10गोपा नायक और शेलेन राउत्रे जैसे दिगगजोने उठाए.
- 4:10–4:15तो इन लोगोने मूल रचनाो को अंग्रेजी का जामा पहनाया
- 4:15–4:18और फिर उस अंग्रेजी अनुवाद को आदार बनागर
- 4:18–4:21गजेंदर ताकृरने उनहे मेठिली मेडाला.
- 4:21–4:22इक दम सही समजे आप.
- 4:22–4:24लेकिन यार याएक समस्स्या है
- 4:24–4:24क्या?
- 4:24–4:26जब कवीदा तेलगु से अंग्रेजी में जाती है
- 4:27–4:27तो
- 4:27–4:30उच्की जमीनी बड़जाती है ना?
- 4:30–4:31हा ये तो है
- 4:31–4:33और फिर जब उग्रेजी से मेठिली में आती है
- 4:33–4:36तो ये मुझे बच्पन कि उस तेलट्फों गेम
- 4:36–4:38या चाईनीज विस्पर्स जैसा लकता है
- 4:38–4:40अच्छा जाई बात कब अद्वर बन जाता है
- 4:40–4:41निलकुल
- 4:41–4:42एक विक्ती ने कान में कुछ कहा
- 4:42–4:43दूसरे ने तीस्रे को
- 4:43–4:46और अंत तक पूँष्ते पाथ का अर्थी बडल गया
- 4:46–4:48ये खत्रा तो रहता है अनुवाद में
- 4:48–4:51वोगी अंग्रेजी ये एक बहुत्टी गलोबल बाशा है
- 4:51–4:54उसकी अपनी एक सम्तल करने वाली प्रक्रती है
- 4:54–4:57तो खषेत्री एक खुर्दरे पन को मिता सकती है
- 4:57–4:59आप साथी के रहें?
- 4:59–5:02अगर तिल्गु का कोई तेट्क्रामेईद मुहावरा
- 5:02–5:04अंग्रेजी के किसी शहरी शब्दमे बड़ा
- 5:04–5:06और फिर मैठली में गया
- 5:06–5:08तो उसका मूल सार
- 5:08–5:09उसकी वो स्थानी खनक
- 5:09–5:11तो रास्ते में खोजानी चाही है
- 5:11–5:41अद्विज्यान की सबसे बडी पहेली एह यह आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई �
- 5:41–5:43इक बहुती टोस दाचागत समादान निकाला गया
- 5:44–5:47पुस्तक के अंत में बाकाईदा एक विषेश शब्दावली
- 5:47–5:49यानी गलोसरी दीगाई है
- 5:49–5:51औरे वागलोसरी
- 5:51–5:54ये शब्दावली उन शब्दो को सन्रक्षित करती है
- 5:54–5:59जो किसी विष्ट संसक्रती, क्षेट्र या राश्ट्रेता की पहचान है
- 5:59–6:03तो उसका मतलव है कि शब्दावली एक तरे के लंगर का का खाम करती है
- 6:03–6:05बिल्ट्खुल सती कुप्मा है ये
- 6:05–6:06एक लंगर?
- 6:06–6:11अगर वाकी की सन्रच्ना अंग्रेजी से होतेवे मेठली तक पहुचने में बडल भी जाए
- 6:11–6:14तो भी वो सांस्क्रितिक लंगर अपनी जगगसे नहीं हिलता
- 6:14–6:20अगर कोई अज़ा शब्द है जो किसी खास रस्म, किसी खास कपड़ या किसी विषेश भावना को दरषाता है
- 6:20–6:23जिसका ना तो अंग्रेजी में कोई सतीक नवाद है और नहीं मेठिली में
- 6:23–6:24इग्जाक्ली
- 6:24–6:27तो उसे जबर दस्ती बडला नहीं गया
- 6:27–6:29उसे उसी मूल रूप में रखा गया
- 6:29–6:32और शब्दावली में उसका संदरब सपश्ट कर दिया गया
- 6:32–6:34ये वागगे उस तेलट्फून गेम वाले खद्रे का एक
- 6:34–6:36बहुत ही अकाडमिक और प्रमानिक तोड है
- 6:36–6:39और पता है ये केवल शब्डों को बचाने की बात नहीं है
- 6:39–6:40तो और क्या हैस्में?
- 6:40–6:44ये उन पहचानो को बचाने की बात है, जो उन शब्दो से जुडी हैं.
- 6:44–6:50जब अनुवादक स्थानियता के गंद को बरकरार रकने के लिए तनी महनत कर रहे है,
- 6:50–6:55तो ये देखना और भी दिल्चास्प हो जाता है कि उनोने अनुवाद किलिए चुना किसे है
- 6:55–7:02यही पर पुस्तक कमूल दर्षन बहुत सबष्ष्ट रूप से सामने आता है
- 7:02–7:05गरन्त में एक जगा मेठली में लिखा है
- 7:05–7:35अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ�
- 7:35–8:05अदिवाँ तो बग़ाज़ नहीं तो बग़ाज़ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्
- 8:05–8:07अप से बड़ा प्रमाड है
- 8:07–8:09और वा, कोन है वो कवाएत्रिया?
- 8:09–8:13जैसे जे सुभद्रा और चलब पली स्वरुपरानी
- 8:13–8:15इन कविताएं कविता इस में शामिल है
- 8:15–8:17और इनके विषे क्या है?
- 8:17–8:20इनके विषे कोई सामान ने विमर्ष नहीं है
- 8:20–8:29ये स्त्री शरीर, याँशोशन और गेहरी ज़ड़े जमाचुके समाजिक उपीडन के किलाफ एक सीदा और दारदार प्रतिरोद है.
- 8:29–8:35तेलगु दलित कवितावों का मेतली में आना, तो बाशा इस्टर पर भी एक बड़ा प्रयोग लग लग रहे है मुजे.
- 8:35–9:05बिल्कुल, मैत्ली साहिते की अपनी एक बहुती सम्रिध पारम्परेक और शास्त्रिय प्रिष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्
- 9:05–9:09उदिया साहित्ते के हिस्थे में जब हम आदिवासी कवी बबरत माँजी की कवितावो को देखते हैं,
- 9:10–9:12तो इक अलक टरह का यधारत सामने आता है.
- 9:13–9:15बबरत माँजी उनकी कविता है किस बारे में?
- 9:15–9:19ये एक साहित्तिक चूनोती है, जो वेवस्तासे सवाल पूच रहे है.
- 9:19–9:22और उज़े लगता है कि ये चूनोती केवल तिलगु साहित्तिय दक सीमित नहीं हो गी?
- 9:23–9:23बलकुल नहीं.
- 9:23–9:29उडिया साहित्ते के हिससे में जब हम आदिवासी कवी बबरत माँजी की कविताओ को देखते हैं,
- 9:29–9:31तो इक अलक तरह का यधारत सामने आता है.
- 9:31–9:34बबरत माँजी. उनकी कविताई किस बारे में?
- 9:34–9:37उनकी कविताई आदिवासी जीवन उनके जंगलो से उनके जोडाव
- 9:37–9:40उदाव और उनकी पहचान की राजनीती का दस्तावेज हैं
- 9:40–9:44आदिवासी किले जंगल सुफ पेर नहीं होतें वोसका पुरा ब्रम्माण्द होतें
- 9:44–9:45सही गहा
- 9:45–9:50और जब उस ब्रम्माण्ट पर बहरी दुनिया का अतिक्रमण होता है
- 9:50–9:52तो जो संगर्ष जन लेता है
- 9:52–9:56बभरत माजी की कविताय उस संगर्ष की आवाज है
- 9:56–9:57कमाल की बात है?
- 9:57–9:59अजी कुछ कहनिया भी है के अस में?
- 9:59–10:00हाई, इसी कडी में
- 10:00–10:04कोल कलूरी इनोच और विनोदीनी जैसे लेकुको की
- 10:04–10:07तेलोगु दलित लगु कदाए भी आती हैं
- 10:07–10:09अच्छा, ये कहनीया क्या बयां करती हैं?
- 10:09–10:12ये समाजिक भेद्बाव को किसी उबदेश की तरह नहीं
- 10:12–10:16बलके रोज मर्रा की क्रूर सच्चाए की तरह पेश करती हैं
- 10:16–10:18साहित्तिकः सबसे शक्तिषारी रूप
- 10:18–10:22वही होता है, जो समाज के उस आईने को सामने रख्खे
- 10:22–10:24जिसे अकसर लोग देखना नहीं चाहते.
- 10:26–10:29इं दलित और आदीवासी रसनाव को अनुवाद के लिए चुनकर,
- 10:29–10:31ये गरन्त तो एक तरन से मेठली पाट्कों के सामने
- 10:31–10:35पूरे भारत के समाजिक याठार्त का एक विस्त्रत कैन्वास खूल रहें.
- 10:35–10:42बिल्कुल ये एक स्पष निरने है कि अनुवाद सर्फ राज दर्बारो की कहानियो या आमुर दर्षन का नहीं होगा.
- 10:42–10:45बल कि जमीन पर लडी जारही रोज मर्रा की लडायों का होगा.
- 10:45–10:46एक दम सही.
- 10:46–11:16वुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 11:16–11:19सदालेल मित्र, मतलप फ्रेंज फरेवर
- 11:19–11:23रहा, पिन्दिन्ती अशोग कुमार दोरा लिखे गय इस उपन्यास का
- 11:23–11:28मैठिली अनुवाद इस गरन्त का एक भेहद एहम हिस्सा है.
- 11:28–11:30रहा, किस बारे मेहें यो पन्यास?
- 11:30–11:34यहा एक आफी कहानी है, जो आदूनेक कानुनो और
- 11:34–11:39पारम्प्रेक जीवन्श्यली के भीच्टे बयानाक तक्राव को बहुत बरीकी से अकेरती है.
- 11:39–11:40आच्छ?
- 11:40–11:48यह कहानी कलंदर समुदाय के एक व्यकती, इमाम और उसके प्रषिक्षित भालु शादूल के इर्द-गिर्द बूमती है.
- 11:48–12:18वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 12:18–12:24अग, बाप्रे. मड़ब किसी वातानु कुलित कमरे में बैटकर जानवरों के अदिकारों के लिए कानुन पास कर दिया जाता है.
- 12:24–12:27और कागस पर यह कानुन बहत प्रगती शील लक सकता है.
- 12:27–12:30लेकिन जमीन पर इमाम किलिए रातु रात एक तबाही बन कर आता है.
- 12:30–12:32ये बालो के बिचुडने की बावुक कहानी नहीं है
- 12:32–12:33तो ये क्या है?
- 12:33–12:38ये इस बात का दस्तावेज है कि कैसे बिना जमीनी हकीकत को समजे बनाएगे कानून
- 12:38–12:42एक पूरे समुदाए की पीर्द्यो पूरानी कलाएगे
- 12:42–12:43उसे कानुन के बखषा किसे समजेगी?
- 12:43–12:44नहीं समच सकते.
- 12:45–12:50ये उपन्या स्थ एक आद्मी और भालो के बिछुडने की बावुक कहानी नहीं है.
- 12:50–12:51तो ये क्या है?
- 12:51–12:56ये इस बात कदस्तावेज है कि कैसे बिना जमीनी हकीकत को समजे बनाएगे कानुन
- 12:56–13:06इक पुरे समवदाय की पीडियो पुरानी कला उनकी पहचान और उनकी आजीविका को एक जटके में अवैप और अप्रादी गोषित कर देते हैं
- 13:06–13:08वाखई, ये बहुत बहयानक है
- 13:08–13:12और इस कहानी की मनोवेग यानी गेराई ही इसे इतना प्रभाव शाली बनाती है
- 13:12–13:18जब राजजी की सट्ता एक गरीब हाशे पर कडे वियक्ती की आजीवी का चीन लेती है,
- 13:18–13:23तो उसके परीवार के वीटर जो दर्म संकत अटक्राव पैडा होता है,
- 13:23–13:26लेक्हक ने उसे बहुत सुक्ष्मता से पक्डा है.
- 13:26–13:31ये मानव मनोवे ग्यान और समाजिक दबावो का एक बहतरी इंचित्रन है
- 13:31–13:33क्या अईसी और भी रच्नाय है इस ग्रन्त में?
- 13:33–13:36आप बलकुल इसी तरा की मनोवे ग्यान एक उतल पुतल
- 13:36–13:40हमें ग्रन्त में शामिल अने रच्नायो में बी देखने को मिलती है
- 13:40–13:41जैसे की?
- 13:41–13:44कन्नर सहिट्तिकार अशोख हिगरे की रच्ना अनहार
- 13:44–13:47अनहार, जिसकारत है अन्दकार
- 13:47–13:50अग, और गुज्राती सहिट्तिकार दलपत चोहान की कहानी
- 13:50–13:53दर का उलेक यहा करना बहुत प्रासंगिक है
- 13:53–13:55अनहार और दर
- 13:55–14:01उंग, दोनो ही शीर्षक अपने आप मैं, मानव मन की गेहरी पर्थो की और इशारा करते हैं.
- 14:01–14:04बलकुल, ये रच्नाय इस बात को स्थापिद करती है,
- 14:04–14:07के चाहे वो गुज्रात का कोई दलित पात्र हो,
- 14:07–14:09या करनातक के किसी गाँउक्ती.
- 14:09–14:16समाजिक दबावों के तहत पड़ा होने वाला मानवीर दर और अंदकार बाशा की सीमाइ नहीं मानता
- 14:16–14:17एक दम सही
- 14:17–14:23दलपद चोहान की रच्नाय विषेश रूप से गुज्राती दलिट साहिट्ति में एक मील का पत्धर है
- 14:23–14:25वो किस तरा कर दर द़ दिखाती है?
- 14:25–14:28वो उस खोफ और अस्तिटव के संकत को सामने लाती है
- 14:28–14:31जो सद्यों के दमन से पैडा होता है
- 14:31–14:36अग जब ये कहानिया दूस्तर ये अनुवाद के माद्धिम से मेठली में पहुषती है
- 14:36–14:41तो वे एक नई पाटक वर्ग के सामने यें गेरे मनुवग्याने की अठार्तों को खोल देती हैं
- 14:41–14:42बिल्कोल
- 14:42–14:44अप तक हम ने जिन अनुवाडों की बाट की
- 14:44–14:47चाहे वो तेलगु से हो कनणर से या गुज्राती से
- 14:47–14:49विसवही उस दूस्त्रिया प्रक्रिया से गुजरे हैं,
- 14:49–14:52जाह अंगरेजी ने एक मद्ध्यस्त या पुल का काम किया.
- 14:52–14:53अग, तूटिया प्रोस्स्स.
- 14:53–14:58लेकिन स्रोथ समगरी हमें पहुती दिल्च्स्प अप्वाद की रई जाती है.
- 14:58–15:28और आद बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा
- 15:28–15:32यहां अंग्रेजी के पुल की अवषकता इसली नहीं पडी,
- 15:32–15:36कुकि मेठली और भोजपूरी बहुगलिक, भशाई,
- 15:36–15:39और सांस्क्रितिक रूप से एक दुच्रे के बहुत करीब हैं आ?
- 15:39–15:43बलकुल करीब है, दोनो ही बशाई पुर्वान्चल और भिहार के
- 15:43–15:46विस्त्रत सान्स्क्रितिक पर इद्रिष्ख्य का हिसा है
- 15:46–15:49जहां लोग परम्पराये आपस में समवाद करती रही हैं
- 15:49–15:53जब दो बाशाये सान्स्क्रितिक रुप से तनी करीब हों
- 15:53–15:57तो सीदे अनुवाद में इक अलगी स्तरकी मिठास और परामानिकता जाती हो गी
- 15:57–15:58एक दम
- 16:13–16:15वाखई ये सीदा समवाद इस बात का भी प्रमाण है,
- 16:15–16:19कि जब दो पडोसी बाशा है एक दुसरे के साहित्ति को अपनाती है,
- 16:19–16:22वागई ये सीदा समवाद इस बात का भी प्रमान है
- 16:22–16:26कि जब दो पडोसी बहाशा है एक दुसरे के साहित्ति को अपनाती है
- 16:26–16:29तो अनवाद महेज एक अकादमिक अबभ्यास नहीं रहे जाता
- 16:29–16:59बड़ा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा �
- 16:59–17:01कश्मीरी साहित्तिदक
- 17:01–17:04कश्मीरी साहित्तिद को इस में शामिल करना
- 17:04–17:07इस संग्रह के खष्टिच को पूरी तरह से खोल देता है
- 17:07–17:09उंँं, कश्मीर
- 17:09–17:12जिसका नाम सुनते ही बरव से दھके पहाडो के साथ साथ
- 17:12–17:16इक आजीब सी उदासी और दर्द का भी अजास होता है
- 17:16–17:46अर कश्मीरी सहिटे का एक अपनाही मिजाज है, जो वहांके बूगोल और इतिहाज से बहुत गेराई से जोडा हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 17:46–17:50वाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद
- 17:50–17:53बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद
- 17:53–17:56बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद
- 17:56–18:00बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद
- 18:00–18:02बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद
- 18:02–18:04वेदना के साथ मिला देते हैं
- 18:04–18:12जब आप सूफी वाद की उस शान्ती और वहां के मुझुदा यदार्त के दर्द को एक साथ देकते हैं
- 18:12–18:15तो एक बहुती तीवर कावे का जन्म होता होगा
- 18:15–18:19एक दम सही और इन कविताओ को मेठली में लाना
- 18:19–18:23खुद विद्यापती के बख्ती और शिंगार रस्की गवाहर रही है,
- 18:23–18:25एक बहुत ही अनुथा प्रयोग है.
- 18:25–18:29ये तो डो गलग-बलक आद्यात्मिक और सांस्क्रितिक भूम्यों का मिलन हो गया?
- 18:29–18:30रहा, बलकुल.
- 18:30–18:32उब आप बवाशी बवासी मज्दूरों की पीडा
- 18:32–18:34ये सब कुछ एक ही किता अप के पन्नो मिसे मिताया है
- 18:34–18:35और सब से बड़ी बात
- 18:35–18:36ये सब एक बाशा
- 18:36–18:37मेठली के भीटर
- 18:37–18:38जीवन्त हो अथाए
- 18:38–18:40आजके समें के बाशा लगा
- 18:40–18:45गड़ात के दलितों का वोड़र जो सद्यों के उप्टीडन से उपजा है
- 18:45–18:48उडिसा के अदिवासीवों की अपने जंगलों को बचाने की जद्दोजहद
- 18:48–18:51और भोच्पूरी के प्रवासी मस्धूरों की पीडा
- 18:51–18:54ये सब कुछ एक ही किता अपके पन्नो मिसे मिताया है
- 18:54–18:59और सबसे बड़ी बात, ये सब एक भाशा मेठली के भीतर जीवन्त हो टाए.
- 18:59–19:07आज के समें में जहां हम हर दिन, सोचल मीट्या और खबरों के रूप में सुचनाउ के बोज्तले दबे रेतें,
- 19:07–19:13ये गरन्त्हुस शूर से अलग एक गेह्रा, दिहीमा और अर्थपूर न्यान प्रदान करता है.
- 19:13–19:18गजिंद्र ताकृर समग्र खंड दोग को अगर हम एक निशकरष के रूप में देखें,
- 19:18–19:21तो ये सरफ एक पुस्ता के अनवादो का संग्रह नहीं है.
- 19:21–19:22तो क्या है?
- 19:22–19:26ये सच्छ में एक खिडकी है, एक आसी खिडकी,
- 19:26–19:28जिसे खोल कर कोईभी मैठली पाठख,
- 19:28–19:32पूरे भारत की सांसकरतिक, सामाजेक और मनोवेग्यानेक जतिलताओ को,
- 19:32–19:35उनके सबसे नगन और यतारत रुप में देक सकता है.
- 19:35–19:36विलकोल.
- 19:36–19:38ये गरन्त ये साभित करता है,
- 19:38–19:42कि अनुवाद केवल पुस्तकालेव में सहेजकर रकने वाली चीज़ नहीं है.
- 19:42–19:44आप, वल कि ये वो जीवित माद्यम है,
- 19:44–19:48जिसे हम गर बेटे आलग �alag samajoh ki peeda,
- 19:48–19:51उनके संगरष और उनके जीवन दर्षन को समज चकते है.
- 19:51–19:53ये हाशियो पर पडी आवाजो को,
- 19:53–20:23उगर देटा अगर अगर तो बज़ागा प्रजागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो ज़ागा तो ज़ागा तो ज़ागा तो
- 20:23–20:53तब दव़़ बवाशाशा ये जोब बवाशाशा बवाशाशा बवाशाशाशा बवाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशा�
- 20:53–21:15अज़े आज आज आज में अपनी शेत्री अबजाँँगे भीच अंग्रेजी के बिना या अंग्रेजी के माद्धियम सही अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अ�
Plain text
जब हम बहुगलिक नक्षे देकते हैं तो अच्सर राज्जों की सीमायो और �alag lag rang to dik jathe हैं आप बलकुल लेकिन कोई भी काग्जी नक्षा ये नी बता सकता कि उन सीमाव के बितर रहने वाले लोगों की आसल पीडा क्या है आप सईई बात है उनके संगर्ष क्या हैं या... उनके हसी में कुई सद्यो पुरानी कहानी चुपी हैं और यहीं पर साहिद दे काम आता है एक दम लिकिन अनुवाद को लेकरना लोगों के एक अजीप सी दारना है मलगब आम तोर पे अनुवाद को तो बस एक बाशा से दुसरी बाशा में, शब्दो को बडलनेके बहुत यह अंत्रिक प्रक्रिया मन लिया जाता है. आप, जैसे कोई मशीन काम कर रही हो. वोई तो, एक दिशनरी उठाई शब्द का अर्थ खोजा और उसे दुसरी बाशा में लिग दिया. बलकी पूरी की पूरी संस्क्रिती सद्यों के संगर्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष यहे किताब मतलब इसका पैमाना ही अपने आप में इसे एक एतिहासिक धस्तावेज बनाता है आशीश अंच नहार दवार संपादित है और इसे विदिह प्रकाशन ने चापा है सही कहाए और पता है यहे महेजे किताब नहीं है इसके भीतर, चोडा गद्य, और चोबीस पद्ध्यखन्ध है बाप्रे, यतना सारा कंटेंट एकी जगा? आँ, और वो भी बारत के अलगलक कोनो से इस मित्तेलगु, उडिया, गुज्राती, कननड, भोज्पूरी और कष्मीरी साहिते की श्रेष्ट रच्नाों को विब्रीत परिस्तियो में भी मैठली के दीप को प्रज्वलित रख्खा है. जिस समरपन तो अपने अपने बहुत कुछ कहता है. ये केवल अन्या बहाशाँ के साहित्ति को मैठली में लाने का प्रैास नहीं लग़्ा मुजे. तो क्या लग़्ा है? अद या बज़ाद के प्रज़ाज को इतना विस्त्रत करने कोशिष या जागा वो पुरे बारत की दध़कन को अपने भीटर मैंसुच कर सके. ये समवर्पन तो अपने आपने बहुत कुछ कहता है बिल्कुल ये केवल अन्या बाशाव के साहित्ते को मेत्ली मेलाने का प्रास नहीं लगा मुजे तो क्या लग रहे? मदलब ये मेत्ली बाशा के ख्षितज को इतना विस्त्रित करने की कोशिष है ज़ाँ वो पुरे बारत की दधगन को अपने भीटर मैंसुच कर सके बहुत कुब कहा आपने एक तरा का संसक्रितिक अभी लेग है ये आपने पलडते ही कशमीर की वादियों से लेकर तिलन्दाना के गाँ तक का सबर्ताय की आजा सके. लेकिन इस में बहुत बढी व्यवाहरिक चनोती भी थी. कैसी चनोती? अब दिखे तिल्गो की अपनी एक अलग लै है, उडिया की अपनी एक विषिष्ट मिट्ती की महेख है, इन सब को मेठली में डालने किलिए, जिस प्रक्रिया का इस्तमाल हुए, वो बहुत ध्यान कीचती है. आच्छ, तो स्रोथ समगरी इसके बारे में क्या बताती है? स्रोथ बताते है, कि ये एक द्वीस तर्या प्रक्रिया, यानी तूट्यर प्रूस्से से गुज्रा है तूट्यर प्रूस्स, मतलब सीद हनुवाद नहीं हूँ नहीं, और ये अनुवाद दर्षन का एक बहुत ही व्यवावारिक, लेकिन जटिल पहलू है, बहुबाशी देश में सबसे बड़ी समस्या पता है किया होती है? आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� � अग, ज़ेसे तेलुगु साहिति किलिए पी जे लक्ष्मी और के पुषोटम ने ये पुल बनाया. गुजाति किलिए हिमांक तिसाईने काम किया. और उडिया किलिए? उडिया साहिति को अंगरेजी में लाने की जिम्दारी, गोपा नायक और शेलेन राउत्रे जैसे दिगगजोने उठाए. तो इन लोगोने मूल रचनाो को अंग्रेजी का जामा पहनाया और फिर उस अंग्रेजी अनुवाद को आदार बनागर गजेंदर ताकृरने उनहे मेठिली मेडाला. इक दम सही समजे आप. लेकिन यार याएक समस्स्या है क्या? जब कवीदा तेलगु से अंग्रेजी में जाती है तो उच्की जमीनी बड़जाती है ना? हा ये तो है और फिर जब उग्रेजी से मेठिली में आती है तो ये मुझे बच्पन कि उस तेलट्फों गेम या चाईनीज विस्पर्स जैसा लकता है अच्छा जाई बात कब अद्वर बन जाता है निलकुल एक विक्ती ने कान में कुछ कहा दूसरे ने तीस्रे को और अंत तक पूँष्ते पाथ का अर्थी बडल गया ये खत्रा तो रहता है अनुवाद में वोगी अंग्रेजी ये एक बहुत्टी गलोबल बाशा है उसकी अपनी एक सम्तल करने वाली प्रक्रती है तो खषेत्री एक खुर्दरे पन को मिता सकती है आप साथी के रहें? अगर तिल्गु का कोई तेट्क्रामेईद मुहावरा अंग्रेजी के किसी शहरी शब्दमे बड़ा और फिर मैठली में गया तो उसका मूल सार उसकी वो स्थानी खनक तो रास्ते में खोजानी चाही है अद्विज्यान की सबसे बडी पहेली एह यह आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई आई � इक बहुती टोस दाचागत समादान निकाला गया पुस्तक के अंत में बाकाईदा एक विषेश शब्दावली यानी गलोसरी दीगाई है औरे वागलोसरी ये शब्दावली उन शब्दो को सन्रक्षित करती है जो किसी विष्ट संसक्रती, क्षेट्र या राश्ट्रेता की पहचान है तो उसका मतलव है कि शब्दावली एक तरे के लंगर का का खाम करती है बिल्ट्खुल सती कुप्मा है ये एक लंगर? अगर वाकी की सन्रच्ना अंग्रेजी से होतेवे मेठली तक पहुचने में बडल भी जाए तो भी वो सांस्क्रितिक लंगर अपनी जगगसे नहीं हिलता अगर कोई अज़ा शब्द है जो किसी खास रस्म, किसी खास कपड़ या किसी विषेश भावना को दरषाता है जिसका ना तो अंग्रेजी में कोई सतीक नवाद है और नहीं मेठिली में इग्जाक्ली तो उसे जबर दस्ती बडला नहीं गया उसे उसी मूल रूप में रखा गया और शब्दावली में उसका संदरब सपश्ट कर दिया गया ये वागगे उस तेलट्फून गेम वाले खद्रे का एक बहुत ही अकाडमिक और प्रमानिक तोड है और पता है ये केवल शब्डों को बचाने की बात नहीं है तो और क्या हैस्में? ये उन पहचानो को बचाने की बात है, जो उन शब्दो से जुडी हैं. जब अनुवादक स्थानियता के गंद को बरकरार रकने के लिए तनी महनत कर रहे है, तो ये देखना और भी दिल्चास्प हो जाता है कि उनोने अनुवाद किलिए चुना किसे है यही पर पुस्तक कमूल दर्षन बहुत सबष्ष्ट रूप से सामने आता है गरन्त में एक जगा मेठली में लिखा है अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ� अदिवाँ तो बग़ाज़ नहीं तो बग़ाज़ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़्ाच़् अप से बड़ा प्रमाड है और वा, कोन है वो कवाएत्रिया? जैसे जे सुभद्रा और चलब पली स्वरुपरानी इन कविताएं कविता इस में शामिल है और इनके विषे क्या है? इनके विषे कोई सामान ने विमर्ष नहीं है ये स्त्री शरीर, याँशोशन और गेहरी ज़ड़े जमाचुके समाजिक उपीडन के किलाफ एक सीदा और दारदार प्रतिरोद है. तेलगु दलित कवितावों का मेतली में आना, तो बाशा इस्टर पर भी एक बड़ा प्रयोग लग लग रहे है मुजे. बिल्कुल, मैत्ली साहिते की अपनी एक बहुती सम्रिध पारम्परेक और शास्त्रिय प्रिष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट् उदिया साहित्ते के हिस्थे में जब हम आदिवासी कवी बबरत माँजी की कवितावो को देखते हैं, तो इक अलक टरह का यधारत सामने आता है. बबरत माँजी उनकी कविता है किस बारे में? ये एक साहित्तिक चूनोती है, जो वेवस्तासे सवाल पूच रहे है. और उज़े लगता है कि ये चूनोती केवल तिलगु साहित्तिय दक सीमित नहीं हो गी? बलकुल नहीं. उडिया साहित्ते के हिससे में जब हम आदिवासी कवी बबरत माँजी की कविताओ को देखते हैं, तो इक अलक तरह का यधारत सामने आता है. बबरत माँजी. उनकी कविताई किस बारे में? उनकी कविताई आदिवासी जीवन उनके जंगलो से उनके जोडाव उदाव और उनकी पहचान की राजनीती का दस्तावेज हैं आदिवासी किले जंगल सुफ पेर नहीं होतें वोसका पुरा ब्रम्माण्द होतें सही गहा और जब उस ब्रम्माण्ट पर बहरी दुनिया का अतिक्रमण होता है तो जो संगर्ष जन लेता है बभरत माजी की कविताय उस संगर्ष की आवाज है कमाल की बात है? अजी कुछ कहनिया भी है के अस में? हाई, इसी कडी में कोल कलूरी इनोच और विनोदीनी जैसे लेकुको की तेलोगु दलित लगु कदाए भी आती हैं अच्छा, ये कहनीया क्या बयां करती हैं? ये समाजिक भेद्बाव को किसी उबदेश की तरह नहीं बलके रोज मर्रा की क्रूर सच्चाए की तरह पेश करती हैं साहित्तिकः सबसे शक्तिषारी रूप वही होता है, जो समाज के उस आईने को सामने रख्खे जिसे अकसर लोग देखना नहीं चाहते. इं दलित और आदीवासी रसनाव को अनुवाद के लिए चुनकर, ये गरन्त तो एक तरन से मेठली पाट्कों के सामने पूरे भारत के समाजिक याठार्त का एक विस्त्रत कैन्वास खूल रहें. बिल्कुल ये एक स्पष निरने है कि अनुवाद सर्फ राज दर्बारो की कहानियो या आमुर दर्षन का नहीं होगा. बल कि जमीन पर लडी जारही रोज मर्रा की लडायों का होगा. एक दम सही. वुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� सदालेल मित्र, मतलप फ्रेंज फरेवर रहा, पिन्दिन्ती अशोग कुमार दोरा लिखे गय इस उपन्यास का मैठिली अनुवाद इस गरन्त का एक भेहद एहम हिस्सा है. रहा, किस बारे मेहें यो पन्यास? यहा एक आफी कहानी है, जो आदूनेक कानुनो और पारम्प्रेक जीवन्श्यली के भीच्टे बयानाक तक्राव को बहुत बरीकी से अकेरती है. आच्छ? यह कहानी कलंदर समुदाय के एक व्यकती, इमाम और उसके प्रषिक्षित भालु शादूल के इर्द-गिर्द बूमती है. वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� अग, बाप्रे. मड़ब किसी वातानु कुलित कमरे में बैटकर जानवरों के अदिकारों के लिए कानुन पास कर दिया जाता है. और कागस पर यह कानुन बहत प्रगती शील लक सकता है. लेकिन जमीन पर इमाम किलिए रातु रात एक तबाही बन कर आता है. ये बालो के बिचुडने की बावुक कहानी नहीं है तो ये क्या है? ये इस बात का दस्तावेज है कि कैसे बिना जमीनी हकीकत को समजे बनाएगे कानून एक पूरे समुदाए की पीर्द्यो पूरानी कलाएगे उसे कानुन के बखषा किसे समजेगी? नहीं समच सकते. ये उपन्या स्थ एक आद्मी और भालो के बिछुडने की बावुक कहानी नहीं है. तो ये क्या है? ये इस बात कदस्तावेज है कि कैसे बिना जमीनी हकीकत को समजे बनाएगे कानुन इक पुरे समवदाय की पीडियो पुरानी कला उनकी पहचान और उनकी आजीविका को एक जटके में अवैप और अप्रादी गोषित कर देते हैं वाखई, ये बहुत बहयानक है और इस कहानी की मनोवेग यानी गेराई ही इसे इतना प्रभाव शाली बनाती है जब राजजी की सट्ता एक गरीब हाशे पर कडे वियक्ती की आजीवी का चीन लेती है, तो उसके परीवार के वीटर जो दर्म संकत अटक्राव पैडा होता है, लेक्हक ने उसे बहुत सुक्ष्मता से पक्डा है. ये मानव मनोवे ग्यान और समाजिक दबावो का एक बहतरी इंचित्रन है क्या अईसी और भी रच्नाय है इस ग्रन्त में? आप बलकुल इसी तरा की मनोवे ग्यान एक उतल पुतल हमें ग्रन्त में शामिल अने रच्नायो में बी देखने को मिलती है जैसे की? कन्नर सहिट्तिकार अशोख हिगरे की रच्ना अनहार अनहार, जिसकारत है अन्दकार अग, और गुज्राती सहिट्तिकार दलपत चोहान की कहानी दर का उलेक यहा करना बहुत प्रासंगिक है अनहार और दर उंग, दोनो ही शीर्षक अपने आप मैं, मानव मन की गेहरी पर्थो की और इशारा करते हैं. बलकुल, ये रच्नाय इस बात को स्थापिद करती है, के चाहे वो गुज्रात का कोई दलित पात्र हो, या करनातक के किसी गाँउक्ती. समाजिक दबावों के तहत पड़ा होने वाला मानवीर दर और अंदकार बाशा की सीमाइ नहीं मानता एक दम सही दलपद चोहान की रच्नाय विषेश रूप से गुज्राती दलिट साहिट्ति में एक मील का पत्धर है वो किस तरा कर दर द़ दिखाती है? वो उस खोफ और अस्तिटव के संकत को सामने लाती है जो सद्यों के दमन से पैडा होता है अग जब ये कहानिया दूस्तर ये अनुवाद के माद्धिम से मेठली में पहुषती है तो वे एक नई पाटक वर्ग के सामने यें गेरे मनुवग्याने की अठार्तों को खोल देती हैं बिल्कोल अप तक हम ने जिन अनुवाडों की बाट की चाहे वो तेलगु से हो कनणर से या गुज्राती से विसवही उस दूस्त्रिया प्रक्रिया से गुजरे हैं, जाह अंगरेजी ने एक मद्ध्यस्त या पुल का काम किया. अग, तूटिया प्रोस्स्स. लेकिन स्रोथ समगरी हमें पहुती दिल्च्स्प अप्वाद की रई जाती है. और आद बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा यहां अंग्रेजी के पुल की अवषकता इसली नहीं पडी, कुकि मेठली और भोजपूरी बहुगलिक, भशाई, और सांस्क्रितिक रूप से एक दुच्रे के बहुत करीब हैं आ? बलकुल करीब है, दोनो ही बशाई पुर्वान्चल और भिहार के विस्त्रत सान्स्क्रितिक पर इद्रिष्ख्य का हिसा है जहां लोग परम्पराये आपस में समवाद करती रही हैं जब दो बाशाये सान्स्क्रितिक रुप से तनी करीब हों तो सीदे अनुवाद में इक अलगी स्तरकी मिठास और परामानिकता जाती हो गी एक दम वाखई ये सीदा समवाद इस बात का भी प्रमाण है, कि जब दो पडोसी बाशा है एक दुसरे के साहित्ति को अपनाती है, वागई ये सीदा समवाद इस बात का भी प्रमान है कि जब दो पडोसी बहाशा है एक दुसरे के साहित्ति को अपनाती है तो अनवाद महेज एक अकादमिक अबभ्यास नहीं रहे जाता बड़ा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा � कश्मीरी साहित्तिदक कश्मीरी साहित्तिद को इस में शामिल करना इस संग्रह के खष्टिच को पूरी तरह से खोल देता है उंँं, कश्मीर जिसका नाम सुनते ही बरव से दھके पहाडो के साथ साथ इक आजीब सी उदासी और दर्द का भी अजास होता है अर कश्मीरी सहिटे का एक अपनाही मिजाज है, जो वहांके बूगोल और इतिहाज से बहुत गेराई से जोडा हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ वाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद वेदना के साथ मिला देते हैं जब आप सूफी वाद की उस शान्ती और वहां के मुझुदा यदार्त के दर्द को एक साथ देकते हैं तो एक बहुती तीवर कावे का जन्म होता होगा एक दम सही और इन कविताओ को मेठली में लाना खुद विद्यापती के बख्ती और शिंगार रस्की गवाहर रही है, एक बहुत ही अनुथा प्रयोग है. ये तो डो गलग-बलक आद्यात्मिक और सांस्क्रितिक भूम्यों का मिलन हो गया? रहा, बलकुल. उब आप बवाशी बवासी मज्दूरों की पीडा ये सब कुछ एक ही किता अप के पन्नो मिसे मिताया है और सब से बड़ी बात ये सब एक बाशा मेठली के भीटर जीवन्त हो अथाए आजके समें के बाशा लगा गड़ात के दलितों का वोड़र जो सद्यों के उप्टीडन से उपजा है उडिसा के अदिवासीवों की अपने जंगलों को बचाने की जद्दोजहद और भोच्पूरी के प्रवासी मस्धूरों की पीडा ये सब कुछ एक ही किता अपके पन्नो मिसे मिताया है और सबसे बड़ी बात, ये सब एक भाशा मेठली के भीतर जीवन्त हो टाए. आज के समें में जहां हम हर दिन, सोचल मीट्या और खबरों के रूप में सुचनाउ के बोज्तले दबे रेतें, ये गरन्त्हुस शूर से अलग एक गेह्रा, दिहीमा और अर्थपूर न्यान प्रदान करता है. गजिंद्र ताकृर समग्र खंड दोग को अगर हम एक निशकरष के रूप में देखें, तो ये सरफ एक पुस्ता के अनवादो का संग्रह नहीं है. तो क्या है? ये सच्छ में एक खिडकी है, एक आसी खिडकी, जिसे खोल कर कोईभी मैठली पाठख, पूरे भारत की सांसकरतिक, सामाजेक और मनोवेग्यानेक जतिलताओ को, उनके सबसे नगन और यतारत रुप में देक सकता है. विलकोल. ये गरन्त ये साभित करता है, कि अनुवाद केवल पुस्तकालेव में सहेजकर रकने वाली चीज़ नहीं है. आप, वल कि ये वो जीवित माद्यम है, जिसे हम गर बेटे आलग �alag samajoh ki peeda, उनके संगरष और उनके जीवन दर्षन को समज चकते है. ये हाशियो पर पडी आवाजो को, उगर देटा अगर अगर तो बज़ागा प्रजागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो बज़ागा तो ज़ागा तो ज़ागा तो ज़ागा तो तब दव़़ बवाशाशा ये जोब बवाशाशा बवाशाशा बवाशाशाशा बवाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशाशा� अज़े आज आज आज में अपनी शेत्री अबजाँँगे भीच अंग्रेजी के बिना या अंग्रेजी के माद्धियम सही अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अज़े अ�