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जुम्मा_आ_छिन्नमस्ताक_गहीर_साहित्यिक_समीक्षा.m4a
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- 0:00–0:13आई हम सब विदेह सदेव 2018 में प्रकाषित जुम्मा कता आच्छिन्मस्ता उपन्यासक मारमिक अन्षक समिक्षा करहल ची, जी सद्मे आमानबीः संगर्ष पर केंद्रित अच्छी.
- 0:13–0:43आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� �
- 0:43–0:51अगला पारग्राव मैं बिना कुनो चे तावनिक अ भाल्या कालक एक ता भीबवध्स गटना का बीच खसी परे तचे.
- 0:51–0:58सही बात अचे ये अचानक चलां पाठक कब भावनात्मक लगे पूरी तरह से तोडी देची.
- 0:58–1:03आ, जखन कोनो द्रिष्च बिना कोनो ट्रन्जिशन का बडलगतची,
- 1:03–1:08तो पाथक का मस्तिष्ख उही नव परीवेश के समजें मैं किचु शन लगतची,
- 1:08–1:12आ, उही भीच कजे भावनात्मक तार्तम्या चे उखण्डित भोजाई टचे.
- 1:12–1:18ता हमर सुजावही जी वर्त्मानक कोनो सपष्त समवेदी अनुबहव,
- 1:18–1:21जे करा हम सब सेंसरी त्रिगर कहेच्छी,
- 1:21–1:26अग्रा अतीट के जगावे लेल एक ता स्वाभावेक पुलक रूप में उप्योग करूए।
- 1:26–1:29आप, एकर थोस उदारन के रूप में,
- 1:29–1:35अस्पतालक उजर उचाईनी, उजर देवाल, वा दोक्तरक उजर कोटके देखी,
- 1:35–1:40प्रिया के अचानक दाईमा का उजर साडिक कर समरन भह सकेटछी.
- 1:40–1:46वा! बाले कालक उजर पन्टी पर लागल खूनक दबबा कर स्म्रती,
- 1:46–1:48उक्रा मस्तिष्क मे आबी सकेटछी.
- 1:48–1:53एक रहें क्राईक्ता सिनेमाटेक क्रोस्टेट जका भुजल जासके तची
- 1:53–1:56बलकुल, जटे दिश्ष एक दंबडली जाई तची
- 1:56–2:01मुदा भावनाक तन्तु उजजर रंक माद्यम सों जुडल रहें तची
- 2:01–2:06मुदा की इए उजजर रंक प्रती कनी कलीषे नहीं भोजाएत
- 2:06–2:13आप आप आशा आची जे साहित्ते में रंगक माद्यम सों स्म्रिती के त्रिगर करब बहुत आम आची.
- 2:13–2:17आप माने आहन पाटख जे एई विशे एक विषे शग्या चती,
- 2:17–2:21अख्राई ई बहुत यान्त्रिक वा इंजीनिर्द लागी सकेई तची.
- 2:21–2:30अम्रा लागे तची जे विज्वल सो भेसी गंद, माने स्मेल, आगात के भेसी यतार्थवादी दंखसो ट्रिगर कर सकेई तची.
- 2:30–2:33अव, वाअ, यी बहुत नीक विचार अची.
- 2:33–2:39अस्पतालक दवाएक तीखा गंद, इस्प्रित वा फिनाल का महक,
- 2:39–2:46उक्रा बाल्या काला कोनो म्रित्युक द्रष्य सा जोडल कोनो विषेष्ट गंद दिस्ला जासके तची.
- 2:46–2:52एक्दम गंद को प्योग निष्ष्ट रूपसा बेसी आदिम अश्क्तिषाली होई तची.
- 2:52–3:02इवही ना एजना आहा बाट्स गुज्री रहल ची आचानक दूपादिक कगंद आहाके बीस साल पहनक दूर्गापुजक भीड में लोग जाए तची.
- 3:02–3:06आप एटाई तरक काज नहीं करे तची.
- 3:06–3:09बस गंद आसीधा इस्म्रती.
- 3:09–3:19जखन हम सब एही तरहके समवेदी संकेत उप्योख करे ची, तः इ लेख्यक के द्रिषे बदल्वाग एक तारकिक आदार दे तची.
- 3:19–3:25आप पाट्यक कहने नहीं लागे तची, जे लेख्यक उक्रा जबर्दस्ती अटीत मे द्हकेल रहल्चाती.
- 3:25–3:31बलकी पाटख्या लागे तची जे प्रिया का अचेतन मन उक्रा अटीत में लोजा रहल चती
- 3:31–3:35या तार्थ वादक द्रिष्टी सा इबहुत महत्वुपुन नची
- 3:35–3:39इस्म्रती कभीो काल क्रमानुसार नई चलगे तची
- 3:39–3:44इह भाँ बाद्गरेट का अस्पताल में प्रिया के सुई लगे ताईची,
- 3:44–3:50तो उई सु एक तीखा चुबहन, उक्रा भाल्या कालग कुनो तीखा दर्द सा जोडी सके ताईची.
- 3:50–3:54आजा अब दरी, आहा वर्त मानक बहुतिक यतार थागे,
- 3:54–3:58उक्रा बाल्या काल कुनो तिखा दर्द सा जोडी सकेता ची
- 3:58–4:02आजा जाब दरी, आहा वर्त मानक बहुतिक यथार्ठा के
- 4:02–4:06अटीत कबहुतिक यथार्ठा कोनो तोस चीज जेना गंद
- 4:06–4:10द्हनी वस परष सा न नहीं जोडव, ता दरी फ्लाश्बैक
- 4:10–4:40वाग्या बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद
- 4:40–4:43अगर अद्यागा बादित लोगाबाक लिल पर्यापत अच्छे
- 4:43–4:46अईसा कत्खाख प्रवाह बादित नहीं होई तच्छे
- 4:46–4:47एक दम सही
- 4:47–4:50अजगन हम सब इस्मिरती के त्रिगर करे लेल
- 4:50–4:52समवेदी वस्तुक बात करे लची
- 4:52–4:56तए नियम मात्र द्रुष्यवागंद दध्री सीमित नहीं आची
- 4:56–4:59द्हनीप से हो उत्वे शक्ती शाली आची
- 4:59–5:03आई आई हमरा सीदे जुमा कताक उही द्रुष्य दिस लोजाई तची
- 5:04–5:08जते एक ता फोंकोलक द्हनी पैग भावनात्मक भुचाल लाभी दे तची
- 5:08–5:21भिलकुल, जुम्म्म कताक समवादात्मक अन्श्छ मे विशेश रुब से मक्का मस्जित के विस्वोटक प्रसंग में भावनात्मक गतिके और अदिक प्रभाव शाली बनाईबाक अवश्च्च्ता अची.
- 5:21–5:36इते जे अस्पष्ट कमजोरी अची ओई जे कताक अन्त में मक्का मस्जिद में बम विस्वोट से माएक अस्था तुटनाय अदर मात्र एक ता चोट प्वों समवादस से वेक्त बहल अचे.
- 5:36–5:40आ, माएक अस्था प्वों पक अछे चती जे उई मस्जिद में नहीं जायब.
- 5:40–5:46इसम्वाद जतिक वजन्दार अची उक्रा प्रभाव उतिक नहीं आबिपाभी रहल अची.
- 5:46–5:54मने एक तदारमिक और आस्थावान अस्त्री के आचानक इगब जे भाग्वान गर सुरक्छित नहीं अची
- 5:54–5:57इएक्ता बहुत पैग वेचारिक भूचाल अचे
- 5:57–6:00मुदा इवर्तमान रूप में बहुत सतही लागगे तचे
- 6:01–6:03इएक्ता एहन चान अची
- 6:03–6:06जते पात्र कष समपूरन जीवन दर्षन डही रहल अचे
- 6:07–6:08हम सुजावी आची
- 6:08–6:10जे समवादक संगे-संगे
- 6:10–6:16बेटा के महसुज भेल माएक शारीरिक आमान्सिक स्तितिक सुख्ष्म विव्रन जोडू।
- 6:16–6:20जहां से दरक ग़राई शारीरिक रूप से सिहो महसुज होए,
- 6:20–6:24मात्र जे बाजल जारहल अच्छे उप पर्याप्त न नहीं अच्छी,
- 6:24–6:30जे अपने अगर बाहर लाभे परत एकर थो सुदारन एब हो सकाईत आची
- 6:30–6:35जे जखन भेटा फोन पर माएक कामपित सुर सुनाइत आची
- 6:35–6:42तो अखर अदिन यादाबेई जखन माएक सुर अजान वा नमाजक लेल कतिक द्रड अनुशासित
- 6:42–6:48अब उई मजजित के नाम सुन्ताई कोना होकर स्वर दरे खंदित बहुर है लची इदेखु
- 6:49–6:53बेटा होई कापेच स्वर में आतर एक ता दरपोक माएक नहीं
- 6:54–6:56बल की आस्था के खंदर होईत महसुस करईया
- 6:56–7:04इव रोदा भास पहनेक लैबद रस्वर अवर्तमानक खन्दित स्वर इसंवाद के बहुत गेरा बनादेद.
- 7:04–7:07मुदा आई हम्रायते कनी भिशार आभी रहा लगछी.
- 7:07–7:13लेखग के ते सोची सके चतीन जे तेलीफोंट पर एक ता अपात कालिन संवाद चली रहा लगछी.
- 7:13–7:17बम्बिस्पोड भेल अची, चारो दिस आफ्रा तफ्री अची.
- 7:17–7:18आव उ तो अची.
- 7:18–7:20तो आहन आरज्यन्सी के भीच,
- 7:20–7:24जाम सब भेटा के अतीद कल लेबद्द नमाजग किस्म्रितिक चिन्तन करेल चोर देव,
- 7:24–7:26तकी कताग गती दीमा ने बजेद.
- 7:26–7:31इदर बहुत स्वबहावी कची जिस म्रिती चिन्तन गती के अव्रुद्ध कर सकई तची.
- 7:31–7:36मुदा सहिते में अर्जेन्सीक अर्ठ, हमेशा पात्रांक भाग्दोर ने होई तची.
- 7:36–7:38माने मनूवेग्यानेक इस्टर पर.
- 7:38–7:44अपात कालन इस्तिती के भीच जगन कोनु पैग सद्मा लागे तची,
- 7:44–7:48तची समय मनोवेग्यानिक रूपसन दिमा बहुजायत ची.
- 7:48–7:53इछिन्तन कोनु पैग, मोनोलोग, वदाशनिक परग्राफ नही हे दे.
- 7:53–7:57इक रहाम एक ता भिजलिक चमक जगा मबुजी सकए ची.
- 7:57–8:06बुजलिय, माने एक ता एहन्तीवर विचार, जे एक चन मे आबी का चली जाई, मुदा सब किच सपष्ट कर दै.
- 8:06–8:14तीक उही ना, लेखग के मात्र एक ता सतीक विषेशन, वा एक ता चोट तुलनात्मक वाखे कावषकता अची.
- 8:14–8:23जेना उ आवाज जे हमेशा फजर्क नमाज मे एक्ता अटूट लेजका गुजेच्छल, आई काईचक तुक्डाजका कापी रहल चल.
- 8:23–8:33बाज बस एत भे इस समवादग के गती के नहीं रोकत, मुदा उही दरक प्रभवक के हाजार गुना बहादेत.
- 8:33–8:38इएक तच्छोट, दार्दार, अप्रन्त आबेवाला चिन्तन अची
- 8:38–8:45जखन पात्ख इप भदद, तो उ सम्वादक सत्धहसन नीचा उतरीका, पात्रक आत्मा गावग के दिखठ.
- 8:45–8:48इब बहुत प्रभाँशाली तरीका आचे
- 8:48–8:53आसल में, जखन हम पात्रक शाररिक प्रतिक्रिया जना आवाजक कापनाई,
- 8:53–8:59उक्र उकर मनोवेग्यनिक इतिहाँस सजोडेची तकन समवाद जीवन्त भाउते थाची.
- 8:59–9:06हम्रा ए माने परत, जे पात्ख के मात्र सुचना नहीं जे बम पटल आमाई दर गेल ही.
- 9:06–9:13पात्खे यी महसुस करवाक अची जे ओही भम विस्पोटस सा माएक भीत्र की की तूटल अची.
- 9:13–9:18आप इछ छोट-छोट कंत्रास्ट औही तूटन के पन्ना पर उतारे तचे.
- 9:18–9:22आब भावनात्मक यतार्थ वादक एही भिन्दुसा आगा बड़ेद,
- 9:22–9:52अद्राद्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्
- 9:52–9:56उगर खुर्ता आपन मनुविग्यनिक दार कुदाईताई तची
- 9:56–9:59उ मात्रे एक तक केरिकेचर बनी का रही जाईताई तची
- 9:59–10:02जेखर चब पाथक के नफ्रत करबाकाची
- 10:02–10:05मुदा यत्फार्त जीवन में विषेष्कर
- 10:05–10:09उगर उगर क्रूर्ता एक तरफा नहीं लागाए।
- 10:09–10:12एक दम एक तोस उदाहरन क्रूप में
- 10:12–10:16जखन नरिंद्र तका प्र्याएक देख पर फेके चेज्टॉग
- 10:16–10:20उगर उगर उगर ख्डिए तरफा नहीं जेगाए।
- 10:20–10:25अद्रालतास उप्जल हीन भावनाक कोनो सुख्ष्म संकेत देल जाएचल?
- 10:25–10:28जाएचा अकर क्रूरता एक तरफा नहीं लागाए.
- 10:28–10:29एक दम.
- 10:29–10:35एकर तोस उदाहरन क्रूप में जखन नरिंद्र तका प्र्याक देइच पर फेके चे,
- 10:35–10:39तो एक ता चोटका विद्रन जोडल जासकेत आची,
- 10:39–10:45जे कोना एही हाच सा उ ककनो प्र्याक पहल चोटकमाई पर उक्रा साभाशी दिलके चल.
- 10:45–10:50आप, उही समें प्र्या उक्रा सा नीचा चल, तो उदार पती चल.
- 10:50–10:55मुदा अब जखन प्रियाक सपलता उक्रा से पेग बहुगे लची
- 10:55–11:00तो उही सपलतास उबजल असुरक्षा उक्रा एद्तेख हिंसक बना देला कची
- 11:00–11:04जे उप पैसा फेख रहा लची मातर अपन वर्चस्वु इस्थापित करे लेल
- 11:04–11:08इं मनो वग्यानिक परत चरित्र के बहुत वास्तविक बनावोद
- 11:08–11:12मुदा, आहां हम एक ता जोखिम देखी रहल ची
- 11:12–11:14जक्रापर लेखख के विचार करभा के चाही
- 11:14–11:14की?
- 11:15–11:18की नरिद्र के चरित्र के एता नरम के लासें
- 11:18–11:20वा उकर असुरक्षा देखा देलासें
- 11:20–11:23प्र्याके उक्रा चुडवा के निरने क्मजोर्ता नहीं बहुजाएत.
- 11:23–11:26आ, इक ता वाजब प्रष्न ची.
- 11:26–11:30मने जों पाथक, नरेंद्र के एक ता पीडेत,
- 11:30–11:33या असुरक्छत वक्तिक रूप में देखाए त,
- 11:33–11:36जे समाजक पित्र सत्तात्मक दबाव,
- 11:36–11:39वह अपन हीन भावना संक्रसित अची,
- 11:39–11:41तकी प्रियाक विद्रो अनुचेत,
- 11:41–11:43वह निश्ठूरता नहीं लागे लागत.
- 11:43–11:47हम्रा एही विचार सा पोरन असहमती अची.
- 11:47–11:48आचा?
- 11:48–11:51रहा, इबहुत पैग भ्रम अची,
- 11:51–11:53जे पात्र के जटल पनेबाक अर्ठ,
- 11:53–11:57अखर नरम करव वा अखर अप्राद के कम करव होई तची.
- 11:57–12:01बरु हमर माना बची जे एकता यतार्थ वादी
- 12:01–12:05असुरक्षित चरित्र कहिन्सा और भेशी दरावनी
- 12:05–12:07और कथरनाग होई तची.
- 12:07–12:10अहो, माने असुरक्षास अपजल हिन्सा
- 12:10–12:12बेशी अनिष्चित होई तची.
- 12:23–12:30अखर अप्रादख जडीक के सब शबत करते चे तीक अहिना इप्रियाक निरनयक कमजोर नहीं करते अखर अवर अदिक तारकिक आम मस्वुत पन्वोध.
- 12:30–12:33उक्रा शान्त करभ असमबव अची.
- 12:33–12:38आहा कहवाक अर्थ हैच जे असुरक्षा उक्रा अप्रादख के जायाज न नहीं बनोतेस,
- 12:38–12:41बलकी उक्र अप्रादख जडी के सपष्ट करत अचे.
- 12:41–12:45तीक अहिना इप्रियाक निरनयक कमजोर नहीं करत,
- 12:45–12:50बलकी उकर आवर अदेक तारकिक आम मस्वूथ पन्वोद
- 12:50–12:52जक्हन प्रिया एबुजिजात,
- 12:52–12:56जे नरिंद्रक एप हिंसक रुप कोनो शने क्रोद नहीं
- 12:56–12:59बलकी उकर भीतरक गहीर असुरक्षक परनाम अचे.
- 12:59–13:06एक ता एहन असुरक्शा जक्रा प्रिया आपन कोनो समज़ोतास टीक नहीं का सके तची.
- 13:06–13:12तखन उकर गर चुडवाक निरने एक तारकिक अनिवारिता बनी जाए तचे.
- 13:12–13:19प्र्याकिन इह्सास होईत आचे, जे उ जतेक सफल हैते, नरिंद्रक असुरक्शा उत्बे हिंसक्रूप लेद.
- 13:19–13:24इबोद प्रियाक विद्रोज के एक ता बवद्धिक अपरिपक्वा आदार देताचे.
- 13:24–13:29नहीं, जे मात्र एक ता शराभी वा पागल पती के चुडबा का कलिषे?
- 13:29–13:31इविमर्ष बहुत गही रचे.
- 13:31–13:42असल में जक्ञन हम सब खलनायकके मात्र एक ता दानब बनबाक प्रलोबनस बचएत ची, तकन हम सब पाठकके एक दादिक प्रामानिक मानवी अनववदेट ची.
- 13:42–13:47वैवाजेख हिन्सा प्राया शक्ती अनियन्त्रन का मनोवेग्यानिक खेल होगी तची.
- 13:47–13:55जखन नरेंद्र पईसा फेकगत अची, तो ओ प्रिया के शारेरिक रूप से नहीं, बलकी मनोवेग्यानिक रूप से चोट पोचावाई चाहे तची.
- 13:55–14:02ओ, इदेखावे चाहत ची, जि तोफर सपलता खम्रा लेल कोनो मोल नहीं अची.
- 14:02–14:15लेखवज़ एह बिन्दूप द्यान दे थी, जि नरेंद्र का बाशा अवकर सारिरी क्हाव बाव में एक ता खोख्लापन अची, एक ता दिखावा आची, ता द्रिष्ष बहुत बेसी तीखा बोजगेद.
- 14:15–14:19आई केवल नरेंद्र के चरित्र चित्रनक बात नही आची
- 14:19–14:22इप प्रियाक चरित्र के सो हो उचाई दे तची
- 14:22–14:27आई, जखन विरोदी मज्भूत आया थार्थ वादी होगताची
- 14:27–14:31तची नायक के संगर्ष उत्वे पैग मानल जाए तची
- 14:31–14:40ज़न्रेंद्र मात्र एक ता कार्टून खलनाया कची, तप्रियाक उक्रासा अलग होईभ स्वाबिक अची, उही में कोनो विषे सहास नही आची.
- 14:40–14:46मुदा जखन्रेंद्र एक ता जटिल असुरक्षिद मुदा कदरनाक वक्ती आची,
- 14:46–14:53जिक्रा प्रिया कखनो प्रेम करे चल, तक्खन उक्रा चोडव एक तब बहुत भारी असासिक कदम बन जाएत ची.
- 14:54–14:59एक दम यी सब बिन्दु असल मे एक पैग चित्रक निरमान करे ची.
- 14:59–15:03चाहे उ चिन्न मस्ता में काल खंडक सन्रषनात्मक प्रवा हुए,
- 15:03–15:06यो मा में सम्वादक बहावनात्मक गती हुई
- 15:06–15:09वा नरेंद्रजका पात्र्क मनोवे ज्यानिक जतिलता हुई
- 15:10–15:13यी सब कि चु अंतता पात्कक अनुबाव के
- 15:13–15:15गेर करबाक लेल अची
- 15:15–15:17लेकख के यी मोन रखबाक चाही
- 15:17–15:20जे पात्क के केवल सुचना नहीं चाही
- 15:20–15:26उखरा उज़ि सद्मा उज़ि दर आ उज़ि असुरक्षा के महसुस करवा कची.
- 15:26–15:32ता अई य गहन समिक्षा मुखे रूप से तीन प्रमुख बिन्दूपर केंद्रित रहेल.
- 15:32–15:39पहल रचनाकक सन रचनात्मक संक्रमन के सहेज बनेवाक लेल द्रिष्य परिवर्तनक समें
- 15:39–16:09अद ते सर नकारात्मक पात्रक पतिक्रियाक पाच्फुक असुरक्शा आहीन भावना के स्पष्ट करूर्ता याठार्दार्वाग़्ाई पाच्फुक अप्ष्ट करूर्टा याठार्दार्दाई पाच्फुक अप्ष्ट करूर्टा याठार्दाई पाच्फुक अप्ष
- 16:09–16:39अद्ब बाद्बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद
- 16:39–16:50अब अगाँ बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बा
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आई हम सब विदेह सदेव 2018 में प्रकाषित जुम्मा कता आच्छिन्मस्ता उपन्यासक मारमिक अन्षक समिक्षा करहल ची, जी सद्मे आमानबीः संगर्ष पर केंद्रित अच्छी. आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� � अगला पारग्राव मैं बिना कुनो चे तावनिक अ भाल्या कालक एक ता भीबवध्स गटना का बीच खसी परे तचे. सही बात अचे ये अचानक चलां पाठक कब भावनात्मक लगे पूरी तरह से तोडी देची. आ, जखन कोनो द्रिष्च बिना कोनो ट्रन्जिशन का बडलगतची, तो पाथक का मस्तिष्ख उही नव परीवेश के समजें मैं किचु शन लगतची, आ, उही भीच कजे भावनात्मक तार्तम्या चे उखण्डित भोजाई टचे. ता हमर सुजावही जी वर्त्मानक कोनो सपष्त समवेदी अनुबहव, जे करा हम सब सेंसरी त्रिगर कहेच्छी, अग्रा अतीट के जगावे लेल एक ता स्वाभावेक पुलक रूप में उप्योग करूए। आप, एकर थोस उदारन के रूप में, अस्पतालक उजर उचाईनी, उजर देवाल, वा दोक्तरक उजर कोटके देखी, प्रिया के अचानक दाईमा का उजर साडिक कर समरन भह सकेटछी. वा! बाले कालक उजर पन्टी पर लागल खूनक दबबा कर स्म्रती, उक्रा मस्तिष्क मे आबी सकेटछी. एक रहें क्राईक्ता सिनेमाटेक क्रोस्टेट जका भुजल जासके तची बलकुल, जटे दिश्ष एक दंबडली जाई तची मुदा भावनाक तन्तु उजजर रंक माद्यम सों जुडल रहें तची मुदा की इए उजजर रंक प्रती कनी कलीषे नहीं भोजाएत आप आप आशा आची जे साहित्ते में रंगक माद्यम सों स्म्रिती के त्रिगर करब बहुत आम आची. आप माने आहन पाटख जे एई विशे एक विषे शग्या चती, अख्राई ई बहुत यान्त्रिक वा इंजीनिर्द लागी सकेई तची. अम्रा लागे तची जे विज्वल सो भेसी गंद, माने स्मेल, आगात के भेसी यतार्थवादी दंखसो ट्रिगर कर सकेई तची. अव, वाअ, यी बहुत नीक विचार अची. अस्पतालक दवाएक तीखा गंद, इस्प्रित वा फिनाल का महक, उक्रा बाल्या काला कोनो म्रित्युक द्रष्य सा जोडल कोनो विषेष्ट गंद दिस्ला जासके तची. एक्दम गंद को प्योग निष्ष्ट रूपसा बेसी आदिम अश्क्तिषाली होई तची. इवही ना एजना आहा बाट्स गुज्री रहल ची आचानक दूपादिक कगंद आहाके बीस साल पहनक दूर्गापुजक भीड में लोग जाए तची. आप एटाई तरक काज नहीं करे तची. बस गंद आसीधा इस्म्रती. जखन हम सब एही तरहके समवेदी संकेत उप्योख करे ची, तः इ लेख्यक के द्रिषे बदल्वाग एक तारकिक आदार दे तची. आप पाट्यक कहने नहीं लागे तची, जे लेख्यक उक्रा जबर्दस्ती अटीत मे द्हकेल रहल्चाती. बलकी पाटख्या लागे तची जे प्रिया का अचेतन मन उक्रा अटीत में लोजा रहल चती या तार्थ वादक द्रिष्टी सा इबहुत महत्वुपुन नची इस्म्रती कभीो काल क्रमानुसार नई चलगे तची इह भाँ बाद्गरेट का अस्पताल में प्रिया के सुई लगे ताईची, तो उई सु एक तीखा चुबहन, उक्रा भाल्या कालग कुनो तीखा दर्द सा जोडी सके ताईची. आजा अब दरी, आहा वर्त मानक बहुतिक यतार थागे, उक्रा बाल्या काल कुनो तिखा दर्द सा जोडी सकेता ची आजा जाब दरी, आहा वर्त मानक बहुतिक यथार्ठा के अटीत कबहुतिक यथार्ठा कोनो तोस चीज जेना गंद द्हनी वस परष सा न नहीं जोडव, ता दरी फ्लाश्बैक वाग्या बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद्याग बाद अगर अद्यागा बादित लोगाबाक लिल पर्यापत अच्छे अईसा कत्खाख प्रवाह बादित नहीं होई तच्छे एक दम सही अजगन हम सब इस्मिरती के त्रिगर करे लेल समवेदी वस्तुक बात करे लची तए नियम मात्र द्रुष्यवागंद दध्री सीमित नहीं आची द्हनीप से हो उत्वे शक्ती शाली आची आई आई हमरा सीदे जुमा कताक उही द्रुष्य दिस लोजाई तची जते एक ता फोंकोलक द्हनी पैग भावनात्मक भुचाल लाभी दे तची भिलकुल, जुम्म्म कताक समवादात्मक अन्श्छ मे विशेश रुब से मक्का मस्जित के विस्वोटक प्रसंग में भावनात्मक गतिके और अदिक प्रभाव शाली बनाईबाक अवश्च्च्ता अची. इते जे अस्पष्ट कमजोरी अची ओई जे कताक अन्त में मक्का मस्जिद में बम विस्वोट से माएक अस्था तुटनाय अदर मात्र एक ता चोट प्वों समवादस से वेक्त बहल अचे. आ, माएक अस्था प्वों पक अछे चती जे उई मस्जिद में नहीं जायब. इसम्वाद जतिक वजन्दार अची उक्रा प्रभाव उतिक नहीं आबिपाभी रहल अची. मने एक तदारमिक और आस्थावान अस्त्री के आचानक इगब जे भाग्वान गर सुरक्छित नहीं अची इएक्ता बहुत पैग वेचारिक भूचाल अचे मुदा इवर्तमान रूप में बहुत सतही लागगे तचे इएक्ता एहन चान अची जते पात्र कष समपूरन जीवन दर्षन डही रहल अचे हम सुजावी आची जे समवादक संगे-संगे बेटा के महसुज भेल माएक शारीरिक आमान्सिक स्तितिक सुख्ष्म विव्रन जोडू। जहां से दरक ग़राई शारीरिक रूप से सिहो महसुज होए, मात्र जे बाजल जारहल अच्छे उप पर्याप्त न नहीं अच्छी, जे अपने अगर बाहर लाभे परत एकर थो सुदारन एब हो सकाईत आची जे जखन भेटा फोन पर माएक कामपित सुर सुनाइत आची तो अखर अदिन यादाबेई जखन माएक सुर अजान वा नमाजक लेल कतिक द्रड अनुशासित अब उई मजजित के नाम सुन्ताई कोना होकर स्वर दरे खंदित बहुर है लची इदेखु बेटा होई कापेच स्वर में आतर एक ता दरपोक माएक नहीं बल की आस्था के खंदर होईत महसुस करईया इव रोदा भास पहनेक लैबद रस्वर अवर्तमानक खन्दित स्वर इसंवाद के बहुत गेरा बनादेद. मुदा आई हम्रायते कनी भिशार आभी रहा लगछी. लेखग के ते सोची सके चतीन जे तेलीफोंट पर एक ता अपात कालिन संवाद चली रहा लगछी. बम्बिस्पोड भेल अची, चारो दिस आफ्रा तफ्री अची. आव उ तो अची. तो आहन आरज्यन्सी के भीच, जाम सब भेटा के अतीद कल लेबद्द नमाजग किस्म्रितिक चिन्तन करेल चोर देव, तकी कताग गती दीमा ने बजेद. इदर बहुत स्वबहावी कची जिस म्रिती चिन्तन गती के अव्रुद्ध कर सकई तची. मुदा सहिते में अर्जेन्सीक अर्ठ, हमेशा पात्रांक भाग्दोर ने होई तची. माने मनूवेग्यानेक इस्टर पर. अपात कालन इस्तिती के भीच जगन कोनु पैग सद्मा लागे तची, तची समय मनोवेग्यानिक रूपसन दिमा बहुजायत ची. इछिन्तन कोनु पैग, मोनोलोग, वदाशनिक परग्राफ नही हे दे. इक रहाम एक ता भिजलिक चमक जगा मबुजी सकए ची. बुजलिय, माने एक ता एहन्तीवर विचार, जे एक चन मे आबी का चली जाई, मुदा सब किच सपष्ट कर दै. तीक उही ना, लेखग के मात्र एक ता सतीक विषेशन, वा एक ता चोट तुलनात्मक वाखे कावषकता अची. जेना उ आवाज जे हमेशा फजर्क नमाज मे एक्ता अटूट लेजका गुजेच्छल, आई काईचक तुक्डाजका कापी रहल चल. बाज बस एत भे इस समवादग के गती के नहीं रोकत, मुदा उही दरक प्रभवक के हाजार गुना बहादेत. इएक तच्छोट, दार्दार, अप्रन्त आबेवाला चिन्तन अची जखन पात्ख इप भदद, तो उ सम्वादक सत्धहसन नीचा उतरीका, पात्रक आत्मा गावग के दिखठ. इब बहुत प्रभाँशाली तरीका आचे आसल में, जखन हम पात्रक शाररिक प्रतिक्रिया जना आवाजक कापनाई, उक्र उकर मनोवेग्यनिक इतिहाँस सजोडेची तकन समवाद जीवन्त भाउते थाची. हम्रा ए माने परत, जे पात्ख के मात्र सुचना नहीं जे बम पटल आमाई दर गेल ही. पात्खे यी महसुस करवाक अची जे ओही भम विस्पोटस सा माएक भीत्र की की तूटल अची. आप इछ छोट-छोट कंत्रास्ट औही तूटन के पन्ना पर उतारे तचे. आब भावनात्मक यतार्थ वादक एही भिन्दुसा आगा बड़ेद, अद्राद्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द् उगर खुर्ता आपन मनुविग्यनिक दार कुदाईताई तची उ मात्रे एक तक केरिकेचर बनी का रही जाईताई तची जेखर चब पाथक के नफ्रत करबाकाची मुदा यत्फार्त जीवन में विषेष्कर उगर उगर क्रूर्ता एक तरफा नहीं लागाए। एक दम एक तोस उदाहरन क्रूप में जखन नरिंद्र तका प्र्याएक देख पर फेके चेज्टॉग उगर उगर उगर ख्डिए तरफा नहीं जेगाए। अद्रालतास उप्जल हीन भावनाक कोनो सुख्ष्म संकेत देल जाएचल? जाएचा अकर क्रूरता एक तरफा नहीं लागाए. एक दम. एकर तोस उदाहरन क्रूप में जखन नरिंद्र तका प्र्याक देइच पर फेके चे, तो एक ता चोटका विद्रन जोडल जासकेत आची, जे कोना एही हाच सा उ ककनो प्र्याक पहल चोटकमाई पर उक्रा साभाशी दिलके चल. आप, उही समें प्र्या उक्रा सा नीचा चल, तो उदार पती चल. मुदा अब जखन प्रियाक सपलता उक्रा से पेग बहुगे लची तो उही सपलतास उबजल असुरक्षा उक्रा एद्तेख हिंसक बना देला कची जे उप पैसा फेख रहा लची मातर अपन वर्चस्वु इस्थापित करे लेल इं मनो वग्यानिक परत चरित्र के बहुत वास्तविक बनावोद मुदा, आहां हम एक ता जोखिम देखी रहल ची जक्रापर लेखख के विचार करभा के चाही की? की नरिद्र के चरित्र के एता नरम के लासें वा उकर असुरक्षा देखा देलासें प्र्याके उक्रा चुडवा के निरने क्मजोर्ता नहीं बहुजाएत. आ, इक ता वाजब प्रष्न ची. मने जों पाथक, नरेंद्र के एक ता पीडेत, या असुरक्छत वक्तिक रूप में देखाए त, जे समाजक पित्र सत्तात्मक दबाव, वह अपन हीन भावना संक्रसित अची, तकी प्रियाक विद्रो अनुचेत, वह निश्ठूरता नहीं लागे लागत. हम्रा एही विचार सा पोरन असहमती अची. आचा? रहा, इबहुत पैग भ्रम अची, जे पात्र के जटल पनेबाक अर्ठ, अखर नरम करव वा अखर अप्राद के कम करव होई तची. बरु हमर माना बची जे एकता यतार्थ वादी असुरक्षित चरित्र कहिन्सा और भेशी दरावनी और कथरनाग होई तची. अहो, माने असुरक्षास अपजल हिन्सा बेशी अनिष्चित होई तची. अखर अप्रादख जडीक के सब शबत करते चे तीक अहिना इप्रियाक निरनयक कमजोर नहीं करते अखर अवर अदिक तारकिक आम मस्वुत पन्वोध. उक्रा शान्त करभ असमबव अची. आहा कहवाक अर्थ हैच जे असुरक्षा उक्रा अप्रादख के जायाज न नहीं बनोतेस, बलकी उक्र अप्रादख जडी के सपष्ट करत अचे. तीक अहिना इप्रियाक निरनयक कमजोर नहीं करत, बलकी उकर आवर अदेक तारकिक आम मस्वूथ पन्वोद जक्हन प्रिया एबुजिजात, जे नरिंद्रक एप हिंसक रुप कोनो शने क्रोद नहीं बलकी उकर भीतरक गहीर असुरक्षक परनाम अचे. एक ता एहन असुरक्शा जक्रा प्रिया आपन कोनो समज़ोतास टीक नहीं का सके तची. तखन उकर गर चुडवाक निरने एक तारकिक अनिवारिता बनी जाए तचे. प्र्याकिन इह्सास होईत आचे, जे उ जतेक सफल हैते, नरिंद्रक असुरक्शा उत्बे हिंसक्रूप लेद. इबोद प्रियाक विद्रोज के एक ता बवद्धिक अपरिपक्वा आदार देताचे. नहीं, जे मात्र एक ता शराभी वा पागल पती के चुडबा का कलिषे? इविमर्ष बहुत गही रचे. असल में जक्ञन हम सब खलनायकके मात्र एक ता दानब बनबाक प्रलोबनस बचएत ची, तकन हम सब पाठकके एक दादिक प्रामानिक मानवी अनववदेट ची. वैवाजेख हिन्सा प्राया शक्ती अनियन्त्रन का मनोवेग्यानिक खेल होगी तची. जखन नरेंद्र पईसा फेकगत अची, तो ओ प्रिया के शारेरिक रूप से नहीं, बलकी मनोवेग्यानिक रूप से चोट पोचावाई चाहे तची. ओ, इदेखावे चाहत ची, जि तोफर सपलता खम्रा लेल कोनो मोल नहीं अची. लेखवज़ एह बिन्दूप द्यान दे थी, जि नरेंद्र का बाशा अवकर सारिरी क्हाव बाव में एक ता खोख्लापन अची, एक ता दिखावा आची, ता द्रिष्ष बहुत बेसी तीखा बोजगेद. आई केवल नरेंद्र के चरित्र चित्रनक बात नही आची इप प्रियाक चरित्र के सो हो उचाई दे तची आई, जखन विरोदी मज्भूत आया थार्थ वादी होगताची तची नायक के संगर्ष उत्वे पैग मानल जाए तची ज़न्रेंद्र मात्र एक ता कार्टून खलनाया कची, तप्रियाक उक्रासा अलग होईभ स्वाबिक अची, उही में कोनो विषे सहास नही आची. मुदा जखन्रेंद्र एक ता जटिल असुरक्षिद मुदा कदरनाक वक्ती आची, जिक्रा प्रिया कखनो प्रेम करे चल, तक्खन उक्रा चोडव एक तब बहुत भारी असासिक कदम बन जाएत ची. एक दम यी सब बिन्दु असल मे एक पैग चित्रक निरमान करे ची. चाहे उ चिन्न मस्ता में काल खंडक सन्रषनात्मक प्रवा हुए, यो मा में सम्वादक बहावनात्मक गती हुई वा नरेंद्रजका पात्र्क मनोवे ज्यानिक जतिलता हुई यी सब कि चु अंतता पात्कक अनुबाव के गेर करबाक लेल अची लेकख के यी मोन रखबाक चाही जे पात्क के केवल सुचना नहीं चाही उखरा उज़ि सद्मा उज़ि दर आ उज़ि असुरक्षा के महसुस करवा कची. ता अई य गहन समिक्षा मुखे रूप से तीन प्रमुख बिन्दूपर केंद्रित रहेल. पहल रचनाकक सन रचनात्मक संक्रमन के सहेज बनेवाक लेल द्रिष्य परिवर्तनक समें अद ते सर नकारात्मक पात्रक पतिक्रियाक पाच्फुक असुरक्शा आहीन भावना के स्पष्ट करूर्ता याठार्दार्वाग़्ाई पाच्फुक अप्ष्ट करूर्टा याठार्दार्दाई पाच्फुक अप्ष्ट करूर्टा याठार्दाई पाच्फुक अप्ष अद्ब बाद्बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद अब अगाँ बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बाज़ादा बा