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विद्यापति_एक_छथि_वा_दुइ.m4a
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- 0:00–0:10सादारन तया जक्शन हम सब कोनो पुरान अटिहासिक तैल चित्र के देखाईची, तो उएक ता अस्पपष्ट अन्वार देखाईवी तशी, देबेबेट में आहाएक स्वागत अछी.
- 0:10–0:16इक्दम, आ उएक ता इस्तिर आक्रती होगे ता ची बुजल या जक्रा युँंसा लोक सत्तिमानत आभी रहा लगची.
- 0:16–0:22आ, मुदा जक्चन उईच्त्रके आ अख्स्रे मशीन के नीचा राखल जाई ता चे,
- 0:22–0:28तक कईो काल एक ता दोसर, नितान्त भिन अन्वारक रूप रेक्ह उभरी कसामने आभी जाईताची.
- 0:28–0:33सहीगव, जे आक्रती सद्यों सा एक तक उलीन विक्ती भुजा एक चल,
- 0:33–0:36उ वास्तब में के क्रो दोसरक चित्र प्रमाने थोईताची.
- 0:36–0:41अर इक यह खेल चित्रक नहीं हमरा लोकनिक एतिहाँसक सत्ते आची
- 0:41–0:47आए हमर सबक विशय आची मैठली सहित्यक सबसा पैगश्तम् महाकवी विद्यापती
- 0:47–0:53गजेंद्र थाखुरक नवप्रकाशित पुस्तक मैठली समिक्षा शास्त्र बाग्दुई
- 0:53–0:55एक ता ब्यंकर प्रष्न ताड करे ताची
- 0:55–0:58एक ता बहुत आवश्यक प्रष्न
- 0:58–1:02की पदावली कर जण मानस का गीत लिखाई चला
- 1:02–1:07अ संस्क्रित वा अवहथ का जण मानस का जण जण जण राज दर्बारक पन्दिच चला
- 1:07–1:09इदूनु वास्तब में दूई भिन्न वेक्ति चला?
- 1:09–1:12हमर वस्पष्ट मानने आची
- 1:12–1:15जे एक इगगी प्रतिभाशाली रच्नाकारक भीतर
- 1:15–1:19लोक समवेदना आद्दरबारी शास्त्रेता दूनु रही सकाईता ची
- 1:19–1:23आमित्लाक पन्जी प्रबंद कजे अकाट्ट्य अटियासिक्ता आची
- 1:23–1:29मने तक्रा कोनो नव विमर्ष्शक आदार पर पुणत नकारल नहीं जासकाईत आची
- 1:29–1:34मुदा हमर मानाई आची जि सताक नीचा एक ता गाडल गेल सत्ती आची
- 1:34–1:36जक्रा आव उजागर हेवाक चाही
- 1:49–1:54अबिजात्ति वर्ग द़ारा संस्क्रितक राजपन्दित विद्ध्या पतिक संज्दिल्येल।
- 1:55–2:00देखु, ये एक ता अथ्यंत क्रान्तिकारिया किछ हद दरी विच्लित करे वाला दाविया ची
- 2:00–2:03हम आपन वेचारि कादार स्पष्ट करे ची
- 2:03–2:10महान साहित्तिक रच्ना में वेविद्य स्वबावी का ची, उजलिये, मानो मस्तिस को खुनो एक ता साचा में बान्दल निरहाता ची.
- 2:10–2:13आ, उत चाई, मुदा...
- 2:13–2:19माने जो एक ता राज पन्दित संस्क्रित में दरबारी अ साहित्तिक मान दन्दक रच्ना कराल चत्ती,
- 2:19–2:23अपन आश्रे दाता शिव्सिंक के स्तृती गाएं कराल चत्ती
- 2:23–2:27तो उ आम जन मानसक भाशा में पडावली की एक नहीं लिख सके चत्ती
- 2:27–2:28की एक ताई?
- 2:28–2:32महान कविक परिचायक त यही है जे उ दरबारस से लोक
- 2:32–2:36जोप्री दरीग भाशा असम्वेदना के अपन शब्द दोसके
- 2:36–2:39एही संगे, हमरा लोकनी लग
- 2:39–2:41पनजी प्रबंधन का सद्यो पुरान
- 2:41–2:43लिखित एतिहासिक प्रमान अचे
- 2:43–2:46मुदा एतिहासिक प्रमानक व्याख्या
- 2:46–2:49पन्जी में विद्यापती ताकूल का सपष्ट उलेक है ची
- 2:49–2:54एक्ड आहन दस्तावेजी करन जे वैग्यानिक अ सामाजिक रूप से प्रमानित आची
- 2:54–2:57तक्रा मात्र एही आदार पर खन्डित का देनाई
- 2:57–3:01जो सहित्तिक स्वरग भिन्न आची तरक संगत नही आची
- 3:01–3:08रूको, एते हमर एक ता गोर आपती आचे, आहाजकरा सहितिक स्वरक भिन्नता मात्र कही रहल ची,
- 3:08–3:14अकोनो चिट्पृ विशयक परिवरतन नही आची, उस समपूरन वर्ग चेतना कटक्रहत आची.
- 3:14–3:16वर्ग चेतना कटक्रहत? कोना?
- 3:16–3:21पूस्तक अस्पाश्ट रूप्स, स्रोटक आदार पर इरे खांकित करे तची,
- 3:21–3:25जे संस्क्रित आवहध्खक विद्यापती जखन लिखे च्छतिन,
- 3:25–3:29तखन हुनक चिन्ता पुनता हई अभी जात्या आची.
- 3:29–3:34कीर्तिलता पडू, उताय उ मुस्लिम अक्रमन से त्रस्त चथिन
- 3:34–3:36आई उई ता एतिहासिक संदर भच्छल
- 3:36–3:42सत्य, मुदा उ जनेव तुटबा पर आमन्दिरक भ्रष्ट लेबा पर विलाप करे चथिन
- 3:42–3:47इविश्व्द्ध्रूब से एक तक कुलीन पन्दितक हाहाकार आची
- 3:47–3:50जकर सत्ता अदर्म संकत मे आची
- 3:50–3:54दो सर्दिस जक्हन आहा पडावलिक विद्यापती के पड़ेच्छी
- 3:54–3:55तो उतै की आची
- 3:55–3:58श्रिंगार आची प्रक्रती आची
- 3:58–4:00उतै सर्वहाराक उलास आची
- 4:00–4:04ग्रामिन जीवनक उन्मुक्त प्रेम अची, खेद खलियानक गमग अची.
- 4:04–4:11पदावली में एक उलीनत्ता वादी हाँकार, तूर्क अक्रमनक भ्यक कतो अची, नही अची.
- 4:11–4:15मुदा आहा की इप्तर्कत सहित्यक मुल भावना के हेट का रहाल आची
- 4:15–4:21आहा कही रहाल ची, जे दरबारी पन्दित आम जन माना सक दर्द नहीं लिख सकही तची
- 4:21–4:22हम कही रहाल ची जे
- 4:22–4:23के
- 4:23–4:29एक्ता सम्वेदन्शील रच्नाकार अपन महल सा बाहरक जीवन नहीं देखे सकैता ची.
- 4:29–4:31इतिहास में आहन अने कुदारना ची,
- 4:31–4:38जते कुलीन वर्गक रच्नाकार सीमान्त समाजक जीवन के अछ्ट्यन्त प्रमाडिक्ता संगे अभीवेक्त के ने चतीन.
- 4:38–4:42मुदा भाही दिश्टे गरन आब हो गायल यदार्त में अंतर होई तची
- 4:42–4:53देखू, जो हम आहाकतर कमानी ली, तकंता कोनो पूरुश रचना कार इस्ट्रीक विरा वा उकर मान्सिक अवस्ताक वरनन लिखते नही सके तची
- 4:53–4:57अगे उज़्ादिए वर्गक सीमा में बान्दव कवित्वोक अबमुल्यन आची
- 4:57–4:59आहा जे समानबुती के गब कार रहल ची
- 4:59–5:01अई में एक ता उज्चका वर्गक लोक नीचा देखी का दैया देखा रहल ची
- 5:01–5:31तो बद्यागा बाद्यागा बाद्यागा लोक नीचा देखी का दैयादे का रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहाग
- 5:31–6:01अगदियापत नाच शोचु आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� �
- 6:01–6:13विद्यापतनाच के आहाके बुजहाई ता जे एक ता राज पन्दितक संस्क्रित निष्ट रच्ना के सर्व राहारा समुदाय आट शताब दी दरी आपन प्रानजे का सहेज का राखत
- 6:13–6:15ये एक ता रोचक द्रिष्टी कोन आची
- 6:15–6:20विद्यापत्तिक रच्ना में राज पन्दित कुद्धाक अबहाव इस्सिद कराई तच्ये,
- 6:20–6:23जे पदावलिक विद्यापति समबबत बावर जाती,
- 6:23–6:26वकोनो अन्न्न्सीमान्त वर्ग च्छला.
- 6:26–6:29एक ता समानांतर लोग परमपराक अंख च्ल,
- 6:29–6:32जक्रा मुख्य्दारा से अल्गे राखल गेल चिल.
- 6:32–6:35आच्छा, आहा विद्यापत नाज का गब कैलू,
- 6:35–6:38उएक ता महत्फुर संस्क्रूतिक द्ड्रोहर आची.
- 6:38–6:41मुदा हम्रा पंजीक विग्यान पर बात करवाग आची.
- 6:41–6:44आहा अटिहासिक दस्ता वेजी करन के
- 6:44–6:46अद्दा नजरन्दाज कर हैं जी
- 6:46–6:48अद्दा नजरन्दाज नहीं कर हैं जी
- 6:48–6:49अद्दा
- 6:49–6:52अद्दा लोकनिक लग रमाना जाजग का मुडधन ने विद्वानक शोद है जी
- 6:52–6:55पनजी प्रबंद में उपलब्द विद्यापती ताकृ
- 6:55–6:59आपन्जी कोनो राजा कस्तूती में लिखल गेल पोती नहीं आची
- 6:59–7:04अद वन्शावलीक एक ता कथोर विकेंद्द्री क्रित पद्द्धी आची
- 7:04–7:07सव्राथ सबह में हाजारो लोग जुडद चिला
- 7:07–7:10पन्जी कार लोकनी एक गोटाक जन्म, म्रित्त्य।
- 7:10–7:12अगर पिता गनपती ठाखुरक नाम,
- 7:12–7:14अगर आश्रेदाताक संग,
- 7:14–7:16उनक खाल कहन्डक मिलान,
- 7:16–7:18अगर रचनाक संग बहरहल अची,
- 7:18–7:20उक्रा कोना कहारिज कोडी,
- 7:20–7:22की एते पैह पंजी करन प्रनाली में
- 7:22–7:24एक ता सून्यो जित आप लगा,
- 7:24–7:27यग पन्जी में स्पष्ट रूप से विद्यापतिक वन्शावली
- 7:27–7:29हुणकर पिता गन्पती ताकुरक नाम
- 7:29–7:31हुणकर आश्रे दाताक संग
- 7:31–7:34हुणक काल क्हन्डक मिलान हुणकर रचनाक संग भरहल अची
- 7:35–7:36तो उक्रा कोना कहरिज को दी
- 7:36–7:44की एते पैंजी करन पनाली में एक ता सूनियोज़ित शव्दिंट्र रचल गेल, ता की एक ता ग्रामिल कवी के चूरायल जासके है?
- 7:44–7:49शव्दिंट्र नहीं, एक रा एतिहासिक विन्योग कहल जाईत छी.
- 7:49–7:53आई इतिहास मे इकोना होई तजी से बूजबक आवश्यक अची
- 7:53–7:56इतिहासिक विन्योग कोना
- 7:56–7:59देखो, पन्जी कार अपन्धाम सही चला
- 7:59–8:01उवन्शावली राखच्चला
- 8:01–8:04मुदा पन्जी मे इक कताउ नहीं लिखाल अची
- 8:04–8:08जे मने यी विद्यापती तखर पदावली कर अचना किलने
- 8:08–8:10गजेंद्र तखर सपष्ट करे चतिन
- 8:10–8:12जे यी ब्रहम कोना पैदा बहल
- 8:12–8:14तई यी ब्रहम कते साएल
- 8:14–8:16उनीशम स्ताब्दिक उत्रार्द में
- 8:16–8:19बंगालक विद्वान राज क्रिष्न मुख्वाद्याय
- 8:19–8:26अनगेंद्रनात गुप्त जक्ठन यसिद्ध केलनेज जे विद्ध्यापती कोनो बंगाली वैश्नव कवी नाए,
- 8:26–8:30बलकी मैठली कवी चत्फीन तकन की बहल?
- 8:30–8:33तकन एक ता गरवक अनुवोती बहल मित्छला में.
- 8:33–8:35गर्व नहीं, एक ता चट्पती मचल.
- 8:35–8:41बंगाल से इप्रमाड़े लाक बाद, मित्छिलाक स्थानिय अबर्जात्ते वर्ग सोच्लग,
- 8:41–8:46जे आई महान कवी जक्कर दंका पूरा बंगाल में भाज रहा लग जी,
- 8:46–8:52उता हमर छेट्रक्षत्षतिन, मुदा हमर कुलीन इतिहास में ता इस्थापित नहीं च्थिन.
- 8:52–8:56मैं आहा कहे चाहची जे उकरा बाद उसब नाम कोजलक
- 8:56–8:57एक दम
- 8:57–9:01एकर बाद स्थान्या कुलीन वर्ग आपन पोठी पक्रा पल्तानाई शुरूके लक
- 9:01–9:07ओते हुनका पनजी में विद्यापती ताकृर नामक एक ता राज पनदित आमन्त्रिक नाम भेट्गेल
- 9:07–9:11बज़्ीक उईग्ती के पडावलिक कविख संग जोडव गलत अची
- 9:11–9:14ये देख नाम के लोकः पदावलिक मुल कवी से जोडी तेलक
- 9:14–9:18ये बहुत पैक बात कही रहाल ची हैं
- 9:18–9:24जे मुल सरवाहर कवी सद्यों सा लोग कंट मे भिदापत नाच मे जीविच्छला
- 9:24–9:27उनका मात्ठापर कुलींताक पाग पहरा कर
- 9:27–9:30रातो रात हम्मर विद्यपती बना लिल गेल.
- 9:30–9:32पंजीग गलत नहीं आची.
- 9:32–9:36पंजीग उई व्यक्ती के पडावली कविक संग जोडब गलत आची.
- 9:36–9:39आजा कगोप सुन में तब रहुत क्रान्तिकारी लागे तची.
- 9:39–9:41मुदा वेवनरीक रूपसे यी असमबवूजाई दखी.
- 9:42–9:43की यी समबव चे,
- 9:43–9:45जे कोनो समपोण समाज रातो रात,
- 9:45–9:47अपन लोग कवी के भिसरी जाए,
- 9:47–9:49अखोनो दरबारी कवी के अकर अस्थान दोदे.
- 9:50–9:52इतिहास में आना भेल अच्छे.
- 9:52–9:53आना कोना समबव अच्छी?
- 9:53–10:00जि मितलाक लोक मानी ले लक, जि हुनक भिदापत नाच्वाला कवी असल में राजा शिवसिंक के दर्वाराक पंगिच्सुती,
- 10:00–10:04जि कुनो सरवारा कवी से हुनक रचना चिनके कुनो कुलीनक नाम दोडे लगेल,
- 10:04–10:07तव उईही सर्वाहारा समाज में कुनो तब द्रोब है तुई
- 10:07–10:08हम्राई भताओ
- 10:08–10:10इतिहास में कुनो एहन उदारन अची
- 10:10–10:13जटे समप्वड़ा समाज कच्यतना के एही तरह से
- 10:13–10:15एटेक आसानी से बड़ल गे लोग।
- 10:15–10:16बिल्कुल अची
- 10:16–10:20अगर अद्यन्त सतिक और अकाटे साद्द्रिष्च देल गेल अची
- 10:21–10:22शिव वा महादेवक उदारन
- 10:22–10:24महादेव? उखोना?
- 10:24–10:27विचार करु, महादेव मुलता हके चला है
- 10:28–10:32औरे परमपराक, वैदिख ब्रामबहर परमपराक देवता नहीं चला है
- 10:32–10:36उ जंगल, पहाडक, निवासी, श्मशान में भास करे वाला,
- 10:36–10:42भस्मलगवेवाला, गेर ब्रामबाण, आ आदिवासी समाजक मोल देव्स्ता चला है,
- 10:42–10:44जक्रा कि राथ कहल जाएत अची.
- 10:44–10:46आप यह तो लोक कता आप पुरान में आची.
- 10:46–10:53मुदा कालानतर में की भेल, जखन हुनक लोक प्रियता अजन मानस पर हुनक प्रभाओ एतेक प्रगाड़ भोगेल,
- 10:53–10:58जोक्रन नकारना असमबभोगेल, तकन कुलीन वेदिक परमपरा हुनक अपनाले लक,
- 10:58–11:01हुनक वेदिक पन्त में समनलित कैले ले ले ले ले.
- 11:01–11:04आँ उनक त्री देव में स्थान बेटल
- 11:04–11:08एक दम उनक समपोन रूप सा अभीजात्य करन कयल गल
- 11:08–11:11की उते कोनो लिखित विद्रो भेल? आई
- 11:11–11:17थी को ही ना, पदावलिक विद्यापती जे भिदापत नाज असमानातर लोग परमपरा किस्च्सा चला
- 11:17–11:21अद्या पतिक सर्वाहारा स्वर के पाग पहरा का दर्बारी बनादेल्गल
- 11:21–11:26देखो बाग्हम्वर के जना रेश्मी वस्त्रस द्हापक प्रैस्भेल
- 11:26–11:31तहीना विद्या पतिक सर्वाहारा स्वर के पाग पहरा का दर्बारी बनादेल्गल
- 11:31–11:35अद्र्वाग कत्ते अप्रमानेत लिखित इतिहास में अन्तर हुए ताची
- 11:35–11:38वहांकी सिद्धान्त तकन दन्स जैइताची
- 11:38–11:42जकन हम पदावलिक भनिताची ताची ताची
- 11:42–11:46वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी
- 11:46–11:49वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी
- 11:49–11:55अदा देवग कत्ते आप्रमानेत लिखित इतिहास में अंतर हुए तची
- 11:55–11:58वहां की सिद्धान्त तकन दन्स जैइत ची
- 11:58–12:03जकन हम पदावलिक भनीता अथात कविताक अन्तिम पातिक बात करे ची
- 12:03–12:05भनीता उतसब से पैग
- 12:05–12:06उता सब से पैग
- 12:06–12:10पदावलिक सेक्डो पद में सपष्ष्ट रूप से राजा सिव्सिंक आनाम आँची
- 12:10–12:15भनही विद्ध्यापती सुनु बर्जोवती चिल्मै राजा शिव्सिंक
- 12:15–12:20जब पदावलिक कवी कुनु भाभर जातिक वा सरवाहारा गामग लोग छला हा
- 12:20–12:24तो उ इन्वार वंच्कर आजा सिव्सिंक कनाम आपन भनीता में की इक दिता है
- 12:24–12:26एकर सपष्ट कारन अची
- 12:26–12:35एकता सादारन ग्रामीन कवी राजाक शैयन कक्ष और हुंकर प्रेम के एतेक सुख्ष्मतम वरनन कोना का सकत अची
- 12:35–12:41एकर अत्रिक्त भिस्पी गाम के दान के ताम्र्पत्र अखनो अची जि विद्यापती के देल गेल चल,
- 12:41–12:46इदक कोनो दर्बारी पन्दितक हे बाक छोस निर्विवाद प्रमान अची.
- 12:46–12:50ताम्र्पत्रग प्रमान के हम खन्दित नहीं करोजीए.
- 12:50–12:55अम्त स्वयम कही रहल शीए, जी विद्यापती तख्कृर एक ता एतिहासिक विक्ती चला,
- 12:55–12:59उशिव सिंकर राज सलाकार चला, उनका भिस्पी गाम भेटल चल.
- 12:59–13:01तफ फेर विवाद की अची?
- 13:01–13:04विवाद यी अची, जे की उप पडावली लिखलन ही.
- 13:04–13:13नहां, आहां भनी ताक गब करेत ची, भनी ताक प्रक्षेप सहिते तिहास कष्बसे पुरान असामान्य केल आची, भुजल्ये?
- 13:13–13:15माने, लिपिकार नाम बदलल नहीं.
- 13:15–13:20एक दम, जखन कुलीन वर्ग कोनो लोक कवी के आत्मसात करेत ची,
- 13:20–13:34वा जखन कोनो दर्बारी लिपिकार उही मोखिक लोक गीत के बूजबत्र वा तालपत्र पर लिखगत अछी, ता अपन आश्वेदाता राजाक नाम उही में जोडी देट अछी, ताकी राजा प्रसन नहोती.
- 13:34–13:40इकोनो पैग शड्यंट्र नहीं दर्भारी चाटुकारी तक एक ता सामान ने प्रक्रिया अची.
- 13:40–13:44मुदा इत केवल अनमान भेल जिल लिपिकार राजाक नाम जोडी दिलनी.
- 13:44–13:50इके वल अन्मान नहीं चे, स्रोथ समगरेक भाशा वेग्यानेक विष्लेशन एकरा पुष्ट करे चे.
- 13:50–13:58संस्क्रित गरन्त जैना, पूरुष परिक्षा, वा कीर्ती लता में, रच्नाकारक कनाम विद्यापती तख्कृर ख्रिता लिख्लज,
- 13:58–14:03अदे खख्कुर उपादी स्पष्ट रूप से कुलीन्ता का परीजाया कच्
- 14:03–14:04अदे अच्छी
- 14:04–14:07मुदा जक्हन आहा पदावली देखे च्छी
- 14:07–14:10तो उदे मात्र विद्यापती अच्छ ख्छुर नहीं
- 14:10–14:13एक ता आर बहुत महत्वपोन पाडी अच्छी
- 14:13–14:19जे विद्यापती के विद्रोही बनवएद अच्छी देसील भैना सब जन मीट्हा
- 14:19–14:23आखात देसी बाशा सब के मीट्ह लगे तची
- 14:23–14:28बिल्कुल कि दरबारी संसक्रित परमपराक कोनो उदभद विद्वान
- 14:28–14:58पन् सम्पुन जीवन संस्क्रित तक वर्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्
- 14:58–15:03अजे हमहाके बातके कुष्चनकले मान लियें ता यहो इस पस्ट होई तची
- 15:03–15:07जे कीर्तिलता में जे राजनिति का समाजिक चिंता आची
- 15:07–15:10उईक ता स्तापिद विवस्ता के बचे बाक चट पती आची
- 15:10–15:14जगन की पदावली में एक ता एहन उन्मुकत आची
- 15:14–15:16जिस्वाजिक बन्दन से मुक्तचल
- 15:16–15:17मुदा
- 15:17–15:20अग्ड़नो इ मानब कटेन लागर लागा लगी
- 15:20–15:22जि इ दोनु अलग व्यक्ती चला
- 15:22–15:24हमर मान नाई आई आची
- 15:24–15:26जि इक ता पैग कविक मान्सिक विकास
- 15:26–15:28वद्दुविदा बहसा के तची
- 15:28–15:30मान्सिक विकास कोना
- 15:30–15:34अगान रष्नकार एक संगे परमपर वादी अग्क्रान्तिकारी दुन्नुभासके तची
- 15:34–15:37जे वक्ती जवानिमे श्रिंगारक पदाउली लिखलनी
- 15:37–15:40अहो समबह वची जे प्रोड़ावस्तामे राज्जक पतन भेखी के
- 15:40–15:43संस्क्रित आवहत में विलाप के नहो थी
- 15:43–15:47देखु मनोविग्यान अ समाज्चास्त्र एक्रा नहीं माने तच्ये
- 15:47–15:49जे एक एक वेक्ती आपन जीवन में
- 15:49–15:52दूईता एहन नितान्त भिन्न
- 15:52–15:54बलकी विरोदी वर्ग चितना जीए
- 15:54–15:57जकन हम मेही पाग के हता के दिखे च्ये
- 15:57–16:00तकन हम्रा एक ता एहन कवी भीटे तच्ये
- 16:13–16:18इतिहाँ सदाई विजेता आ अबिजात्य वर्ग दवारा अपन सूविदाखले लिखल जाईता चे
- 16:18–16:21दर्बारी पन्दिता कितिहाँस ताम्रपत्र में लिखल गेल
- 16:22–16:26मुदा सरवाहारा का इतिहाँस उही विदापत नाच मिसुरक्षित रहीगेल
- 16:26–16:31जक्रा आए दरी कुलीन समाज आपन मुख्यदारा मिशामिल नहीं के लक.
- 16:31–16:32इबहुत बिचारनी आची.
- 16:32–16:37गजिंद्र ताकृर का पुस्तक एही मान एतिहास के शब्द दोरहाल आची.
- 16:37–16:40इकोनो एक ता कविक पहचानक प्रषनमात्र नहीं आची.
- 16:40–16:50उगर बोद्दिक समपड़ा अगर लोक साहित्तिक अदिकारक प्रश्नची जक्र सएयो वर्ष्न सदभाईल गेला ची.
- 16:50–16:56रम्रा लागे तची जे आब हम सब आएगान विमर्षक अन्तिम पडाओ पर आभीगेल ची
- 16:56–17:13अगेल ची एई समपुन मन्ठन के समट तैद, हमी कहब जी साहित्तिक चेतना आईतिहासक दस्तावेजी करनक इद्वन्द जे गजंदर ठाकूल अपन पुस्तक में उठेलान इची अ मैठली साहित आईतिहासक एक ता नव अ अत्तनत गम्दी रायाम अची.
- 17:13–17:14इक्दम सही काली
- 17:14–17:16पदावलिक सरवहारा स्वर
- 17:16–17:19जते ग्रामिन जीवनक उलास अदर्द अचे
- 17:19–17:21अ संस्क्रित ग्रन्त्ख दर्बारी चिन्ता
- 17:21–17:24इभिन्नता वास्तब में हम्रा लोक्निके
- 17:24–17:26विचार कर्वापर विवष करे तचे
- 17:26–17:30पन्जीक अटियाशिक्ता आताम्र पत्रपन्धाम सत्टे भोसकेत अचे
- 17:30–17:32मुदा उई पन्जीक विद्ट्यापती तख्कृर
- 17:32–17:35आप पदावलिक जन्कवी विद्ट्यापती एक चती वादुई
- 17:35–17:38इप्रष्ना पूर्व जका बंद नहीर हल
- 17:38–17:39बलक्ल नहीं
- 17:39–17:46इक ता खुला ज्वलन्त विमर्ष अचे, जटे लिक्रित दिहास आम मोखेक तिहास आमने सामने तार्ड आचे.
- 17:46–17:54सत्ते जे हु चाहे एक विद्यापती हो थी, वदुई चाहे एतिहासिक दस्तावेज पुन सत्ते हु वम मोखेक परम्परा.
- 17:54–17:58मुदाप पदावली में अंप्र नहिज जे सीमान समाज का दुक दर्ध अचे
- 17:58–18:02आजे विदाप नाच जाका समानानतर परमपराक अस्तित्वा चे
- 18:02–18:05तक्रा आप कोन अस्तिती में चुपाल नहीं जासके तचे
- 18:05–18:07आआ, उता हम वाने चे
- 18:07–18:11पाग पाज्ठा के जे एतिहासिक असान्सक्रतिक राजनितिया चे
- 18:11–18:16उख्रा चिन्हनाई अबुजनाई आए कसमई में अप्तिन्द आवश्यक अचे
- 18:16–18:17निष्छित रुप से
- 18:17–18:20इविमर्ष उही ऐक्स्रे मशीन जका रहल
- 18:20–18:27जे विद्या पतिक सद्यों से स्तापिट चित्रक नीचा एक ता समानान्तर परमपरा कनुहार के उजागर के लक.
- 18:27–18:34मुदग कोनो चित्र असलीय चे की कुलीन पन्दित अस्सर्वहारा कवी मिलाक रेहत चित्र बनाइत चे
- 18:34–18:39वैक्ता चित्र अटिहासिक रूप से दूसर के मिटेबाक सून्योजित प्रैआश्चल
- 18:39–18:44इएक्ता एरहन प्रश्नेः शे जगर उत्र प्रत्तेख पात्ठ की स्वैम खुज्बाग चाही
- 18:44–18:48एक्दम आई निरने हम आपन सुदिश रोता लोकनी पर चोडे चे
- 18:48–18:57आहा लोकनी गजेंदर ठाकुरक मैठली समीख्षा शास्त्र, बहाग दुई, स्वैम पडू, स्रोज समगरी पर विचार करू, आपन निषकर्ष निकालू.
- 18:57–19:01सत्यक अन्वेश्वनक यात्र निरन्तर चलई त्रहवाख चाही.
- 19:01–19:05दबेट में हमरा लोकनिक संच ज़ुदवा क्लेल, आहा सब के बहुत-बहुत दश्नेवाद
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सादारन तया जक्शन हम सब कोनो पुरान अटिहासिक तैल चित्र के देखाईची, तो उएक ता अस्पपष्ट अन्वार देखाईवी तशी, देबेबेट में आहाएक स्वागत अछी. इक्दम, आ उएक ता इस्तिर आक्रती होगे ता ची बुजल या जक्रा युँंसा लोक सत्तिमानत आभी रहा लगची. आ, मुदा जक्चन उईच्त्रके आ अख्स्रे मशीन के नीचा राखल जाई ता चे, तक कईो काल एक ता दोसर, नितान्त भिन अन्वारक रूप रेक्ह उभरी कसामने आभी जाईताची. सहीगव, जे आक्रती सद्यों सा एक तक उलीन विक्ती भुजा एक चल, उ वास्तब में के क्रो दोसरक चित्र प्रमाने थोईताची. अर इक यह खेल चित्रक नहीं हमरा लोकनिक एतिहाँसक सत्ते आची आए हमर सबक विशय आची मैठली सहित्यक सबसा पैगश्तम् महाकवी विद्यापती गजेंद्र थाखुरक नवप्रकाशित पुस्तक मैठली समिक्षा शास्त्र बाग्दुई एक ता ब्यंकर प्रष्न ताड करे ताची एक ता बहुत आवश्यक प्रष्न की पदावली कर जण मानस का गीत लिखाई चला अ संस्क्रित वा अवहथ का जण मानस का जण जण जण राज दर्बारक पन्दिच चला इदूनु वास्तब में दूई भिन्न वेक्ति चला? हमर वस्पष्ट मानने आची जे एक इगगी प्रतिभाशाली रच्नाकारक भीतर लोक समवेदना आद्दरबारी शास्त्रेता दूनु रही सकाईता ची आमित्लाक पन्जी प्रबंद कजे अकाट्ट्य अटियासिक्ता आची मने तक्रा कोनो नव विमर्ष्शक आदार पर पुणत नकारल नहीं जासकाईत आची मुदा हमर मानाई आची जि सताक नीचा एक ता गाडल गेल सत्ती आची जक्रा आव उजागर हेवाक चाही अबिजात्ति वर्ग द़ारा संस्क्रितक राजपन्दित विद्ध्या पतिक संज्दिल्येल। देखु, ये एक ता अथ्यंत क्रान्तिकारिया किछ हद दरी विच्लित करे वाला दाविया ची हम आपन वेचारि कादार स्पष्ट करे ची महान साहित्तिक रच्ना में वेविद्य स्वबावी का ची, उजलिये, मानो मस्तिस को खुनो एक ता साचा में बान्दल निरहाता ची. आ, उत चाई, मुदा... माने जो एक ता राज पन्दित संस्क्रित में दरबारी अ साहित्तिक मान दन्दक रच्ना कराल चत्ती, अपन आश्रे दाता शिव्सिंक के स्तृती गाएं कराल चत्ती तो उ आम जन मानसक भाशा में पडावली की एक नहीं लिख सके चत्ती की एक ताई? महान कविक परिचायक त यही है जे उ दरबारस से लोक जोप्री दरीग भाशा असम्वेदना के अपन शब्द दोसके एही संगे, हमरा लोकनी लग पनजी प्रबंधन का सद्यो पुरान लिखित एतिहासिक प्रमान अचे मुदा एतिहासिक प्रमानक व्याख्या पन्जी में विद्यापती ताकूल का सपष्ट उलेक है ची एक्ड आहन दस्तावेजी करन जे वैग्यानिक अ सामाजिक रूप से प्रमानित आची तक्रा मात्र एही आदार पर खन्डित का देनाई जो सहित्तिक स्वरग भिन्न आची तरक संगत नही आची रूको, एते हमर एक ता गोर आपती आचे, आहाजकरा सहितिक स्वरक भिन्नता मात्र कही रहल ची, अकोनो चिट्पृ विशयक परिवरतन नही आची, उस समपूरन वर्ग चेतना कटक्रहत आची. वर्ग चेतना कटक्रहत? कोना? पूस्तक अस्पाश्ट रूप्स, स्रोटक आदार पर इरे खांकित करे तची, जे संस्क्रित आवहध्खक विद्यापती जखन लिखे च्छतिन, तखन हुनक चिन्ता पुनता हई अभी जात्या आची. कीर्तिलता पडू, उताय उ मुस्लिम अक्रमन से त्रस्त चथिन आई उई ता एतिहासिक संदर भच्छल सत्य, मुदा उ जनेव तुटबा पर आमन्दिरक भ्रष्ट लेबा पर विलाप करे चथिन इविश्व्द्ध्रूब से एक तक कुलीन पन्दितक हाहाकार आची जकर सत्ता अदर्म संकत मे आची दो सर्दिस जक्हन आहा पडावलिक विद्यापती के पड़ेच्छी तो उतै की आची श्रिंगार आची प्रक्रती आची उतै सर्वहाराक उलास आची ग्रामिन जीवनक उन्मुक्त प्रेम अची, खेद खलियानक गमग अची. पदावली में एक उलीनत्ता वादी हाँकार, तूर्क अक्रमनक भ्यक कतो अची, नही अची. मुदा आहा की इप्तर्कत सहित्यक मुल भावना के हेट का रहाल आची आहा कही रहाल ची, जे दरबारी पन्दित आम जन माना सक दर्द नहीं लिख सकही तची हम कही रहाल ची जे के एक्ता सम्वेदन्शील रच्नाकार अपन महल सा बाहरक जीवन नहीं देखे सकैता ची. इतिहास में आहन अने कुदारना ची, जते कुलीन वर्गक रच्नाकार सीमान्त समाजक जीवन के अछ्ट्यन्त प्रमाडिक्ता संगे अभीवेक्त के ने चतीन. मुदा भाही दिश्टे गरन आब हो गायल यदार्त में अंतर होई तची देखू, जो हम आहाकतर कमानी ली, तकंता कोनो पूरुश रचना कार इस्ट्रीक विरा वा उकर मान्सिक अवस्ताक वरनन लिखते नही सके तची अगे उज़्ादिए वर्गक सीमा में बान्दव कवित्वोक अबमुल्यन आची आहा जे समानबुती के गब कार रहल ची अई में एक ता उज्चका वर्गक लोक नीचा देखी का दैया देखा रहल ची तो बद्यागा बाद्यागा बाद्यागा लोक नीचा देखी का दैयादे का रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहागा रहाग अगदियापत नाच शोचु आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� � विद्यापतनाच के आहाके बुजहाई ता जे एक ता राज पन्दितक संस्क्रित निष्ट रच्ना के सर्व राहारा समुदाय आट शताब दी दरी आपन प्रानजे का सहेज का राखत ये एक ता रोचक द्रिष्टी कोन आची विद्यापत्तिक रच्ना में राज पन्दित कुद्धाक अबहाव इस्सिद कराई तच्ये, जे पदावलिक विद्यापति समबबत बावर जाती, वकोनो अन्न्न्सीमान्त वर्ग च्छला. एक ता समानांतर लोग परमपराक अंख च्ल, जक्रा मुख्य्दारा से अल्गे राखल गेल चिल. आच्छा, आहा विद्यापत नाज का गब कैलू, उएक ता महत्फुर संस्क्रूतिक द्ड्रोहर आची. मुदा हम्रा पंजीक विग्यान पर बात करवाग आची. आहा अटिहासिक दस्ता वेजी करन के अद्दा नजरन्दाज कर हैं जी अद्दा नजरन्दाज नहीं कर हैं जी अद्दा अद्दा लोकनिक लग रमाना जाजग का मुडधन ने विद्वानक शोद है जी पनजी प्रबंद में उपलब्द विद्यापती ताकृ आपन्जी कोनो राजा कस्तूती में लिखल गेल पोती नहीं आची अद वन्शावलीक एक ता कथोर विकेंद्द्री क्रित पद्द्धी आची सव्राथ सबह में हाजारो लोग जुडद चिला पन्जी कार लोकनी एक गोटाक जन्म, म्रित्त्य। अगर पिता गनपती ठाखुरक नाम, अगर आश्रेदाताक संग, उनक खाल कहन्डक मिलान, अगर रचनाक संग बहरहल अची, उक्रा कोना कहारिज कोडी, की एते पैह पंजी करन प्रनाली में एक ता सून्यो जित आप लगा, यग पन्जी में स्पष्ट रूप से विद्यापतिक वन्शावली हुणकर पिता गन्पती ताकुरक नाम हुणकर आश्रे दाताक संग हुणक काल क्हन्डक मिलान हुणकर रचनाक संग भरहल अची तो उक्रा कोना कहरिज को दी की एते पैंजी करन पनाली में एक ता सूनियोज़ित शव्दिंट्र रचल गेल, ता की एक ता ग्रामिल कवी के चूरायल जासके है? शव्दिंट्र नहीं, एक रा एतिहासिक विन्योग कहल जाईत छी. आई इतिहास मे इकोना होई तजी से बूजबक आवश्यक अची इतिहासिक विन्योग कोना देखो, पन्जी कार अपन्धाम सही चला उवन्शावली राखच्चला मुदा पन्जी मे इक कताउ नहीं लिखाल अची जे मने यी विद्यापती तखर पदावली कर अचना किलने गजेंद्र तखर सपष्ट करे चतिन जे यी ब्रहम कोना पैदा बहल तई यी ब्रहम कते साएल उनीशम स्ताब्दिक उत्रार्द में बंगालक विद्वान राज क्रिष्न मुख्वाद्याय अनगेंद्रनात गुप्त जक्ठन यसिद्ध केलनेज जे विद्ध्यापती कोनो बंगाली वैश्नव कवी नाए, बलकी मैठली कवी चत्फीन तकन की बहल? तकन एक ता गरवक अनुवोती बहल मित्छला में. गर्व नहीं, एक ता चट्पती मचल. बंगाल से इप्रमाड़े लाक बाद, मित्छिलाक स्थानिय अबर्जात्ते वर्ग सोच्लग, जे आई महान कवी जक्कर दंका पूरा बंगाल में भाज रहा लग जी, उता हमर छेट्रक्षत्षतिन, मुदा हमर कुलीन इतिहास में ता इस्थापित नहीं च्थिन. मैं आहा कहे चाहची जे उकरा बाद उसब नाम कोजलक एक दम एकर बाद स्थान्या कुलीन वर्ग आपन पोठी पक्रा पल्तानाई शुरूके लक ओते हुनका पनजी में विद्यापती ताकृर नामक एक ता राज पनदित आमन्त्रिक नाम भेट्गेल बज़्ीक उईग्ती के पडावलिक कविख संग जोडव गलत अची ये देख नाम के लोकः पदावलिक मुल कवी से जोडी तेलक ये बहुत पैक बात कही रहाल ची हैं जे मुल सरवाहर कवी सद्यों सा लोग कंट मे भिदापत नाच मे जीविच्छला उनका मात्ठापर कुलींताक पाग पहरा कर रातो रात हम्मर विद्यपती बना लिल गेल. पंजीग गलत नहीं आची. पंजीग उई व्यक्ती के पडावली कविक संग जोडब गलत आची. आजा कगोप सुन में तब रहुत क्रान्तिकारी लागे तची. मुदा वेवनरीक रूपसे यी असमबवूजाई दखी. की यी समबव चे, जे कोनो समपोण समाज रातो रात, अपन लोग कवी के भिसरी जाए, अखोनो दरबारी कवी के अकर अस्थान दोदे. इतिहास में आना भेल अच्छे. आना कोना समबव अच्छी? जि मितलाक लोक मानी ले लक, जि हुनक भिदापत नाच्वाला कवी असल में राजा शिवसिंक के दर्वाराक पंगिच्सुती, जि कुनो सरवारा कवी से हुनक रचना चिनके कुनो कुलीनक नाम दोडे लगेल, तव उईही सर्वाहारा समाज में कुनो तब द्रोब है तुई हम्राई भताओ इतिहास में कुनो एहन उदारन अची जटे समप्वड़ा समाज कच्यतना के एही तरह से एटेक आसानी से बड़ल गे लोग। बिल्कुल अची अगर अद्यन्त सतिक और अकाटे साद्द्रिष्च देल गेल अची शिव वा महादेवक उदारन महादेव? उखोना? विचार करु, महादेव मुलता हके चला है औरे परमपराक, वैदिख ब्रामबहर परमपराक देवता नहीं चला है उ जंगल, पहाडक, निवासी, श्मशान में भास करे वाला, भस्मलगवेवाला, गेर ब्रामबाण, आ आदिवासी समाजक मोल देव्स्ता चला है, जक्रा कि राथ कहल जाएत अची. आप यह तो लोक कता आप पुरान में आची. मुदा कालानतर में की भेल, जखन हुनक लोक प्रियता अजन मानस पर हुनक प्रभाओ एतेक प्रगाड़ भोगेल, जोक्रन नकारना असमबभोगेल, तकन कुलीन वेदिक परमपरा हुनक अपनाले लक, हुनक वेदिक पन्त में समनलित कैले ले ले ले ले. आँ उनक त्री देव में स्थान बेटल एक दम उनक समपोन रूप सा अभीजात्य करन कयल गल की उते कोनो लिखित विद्रो भेल? आई थी को ही ना, पदावलिक विद्यापती जे भिदापत नाज असमानातर लोग परमपरा किस्च्सा चला अद्या पतिक सर्वाहारा स्वर के पाग पहरा का दर्बारी बनादेल्गल देखो बाग्हम्वर के जना रेश्मी वस्त्रस द्हापक प्रैस्भेल तहीना विद्या पतिक सर्वाहारा स्वर के पाग पहरा का दर्बारी बनादेल्गल अद्र्वाग कत्ते अप्रमानेत लिखित इतिहास में अन्तर हुए ताची वहांकी सिद्धान्त तकन दन्स जैइताची जकन हम पदावलिक भनिताची ताची ताची वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी वहांकी अदा देवग कत्ते आप्रमानेत लिखित इतिहास में अंतर हुए तची वहां की सिद्धान्त तकन दन्स जैइत ची जकन हम पदावलिक भनीता अथात कविताक अन्तिम पातिक बात करे ची भनीता उतसब से पैग उता सब से पैग पदावलिक सेक्डो पद में सपष्ष्ट रूप से राजा सिव्सिंक आनाम आँची भनही विद्ध्यापती सुनु बर्जोवती चिल्मै राजा शिव्सिंक जब पदावलिक कवी कुनु भाभर जातिक वा सरवाहारा गामग लोग छला हा तो उ इन्वार वंच्कर आजा सिव्सिंक कनाम आपन भनीता में की इक दिता है एकर सपष्ट कारन अची एकता सादारन ग्रामीन कवी राजाक शैयन कक्ष और हुंकर प्रेम के एतेक सुख्ष्मतम वरनन कोना का सकत अची एकर अत्रिक्त भिस्पी गाम के दान के ताम्र्पत्र अखनो अची जि विद्यापती के देल गेल चल, इदक कोनो दर्बारी पन्दितक हे बाक छोस निर्विवाद प्रमान अची. ताम्र्पत्रग प्रमान के हम खन्दित नहीं करोजीए. अम्त स्वयम कही रहल शीए, जी विद्यापती तख्कृर एक ता एतिहासिक विक्ती चला, उशिव सिंकर राज सलाकार चला, उनका भिस्पी गाम भेटल चल. तफ फेर विवाद की अची? विवाद यी अची, जे की उप पडावली लिखलन ही. नहां, आहां भनी ताक गब करेत ची, भनी ताक प्रक्षेप सहिते तिहास कष्बसे पुरान असामान्य केल आची, भुजल्ये? माने, लिपिकार नाम बदलल नहीं. एक दम, जखन कुलीन वर्ग कोनो लोक कवी के आत्मसात करेत ची, वा जखन कोनो दर्बारी लिपिकार उही मोखिक लोक गीत के बूजबत्र वा तालपत्र पर लिखगत अछी, ता अपन आश्वेदाता राजाक नाम उही में जोडी देट अछी, ताकी राजा प्रसन नहोती. इकोनो पैग शड्यंट्र नहीं दर्भारी चाटुकारी तक एक ता सामान ने प्रक्रिया अची. मुदा इत केवल अनमान भेल जिल लिपिकार राजाक नाम जोडी दिलनी. इके वल अन्मान नहीं चे, स्रोथ समगरेक भाशा वेग्यानेक विष्लेशन एकरा पुष्ट करे चे. संस्क्रित गरन्त जैना, पूरुष परिक्षा, वा कीर्ती लता में, रच्नाकारक कनाम विद्यापती तख्कृर ख्रिता लिख्लज, अदे खख्कुर उपादी स्पष्ट रूप से कुलीन्ता का परीजाया कच् अदे अच्छी मुदा जक्हन आहा पदावली देखे च्छी तो उदे मात्र विद्यापती अच्छ ख्छुर नहीं एक ता आर बहुत महत्वपोन पाडी अच्छी जे विद्यापती के विद्रोही बनवएद अच्छी देसील भैना सब जन मीट्हा आखात देसी बाशा सब के मीट्ह लगे तची बिल्कुल कि दरबारी संसक्रित परमपराक कोनो उदभद विद्वान पन् सम्पुन जीवन संस्क्रित तक वर्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च् अजे हमहाके बातके कुष्चनकले मान लियें ता यहो इस पस्ट होई तची जे कीर्तिलता में जे राजनिति का समाजिक चिंता आची उईक ता स्तापिद विवस्ता के बचे बाक चट पती आची जगन की पदावली में एक ता एहन उन्मुकत आची जिस्वाजिक बन्दन से मुक्तचल मुदा अग्ड़नो इ मानब कटेन लागर लागा लगी जि इ दोनु अलग व्यक्ती चला हमर मान नाई आई आची जि इक ता पैग कविक मान्सिक विकास वद्दुविदा बहसा के तची मान्सिक विकास कोना अगान रष्नकार एक संगे परमपर वादी अग्क्रान्तिकारी दुन्नुभासके तची जे वक्ती जवानिमे श्रिंगारक पदाउली लिखलनी अहो समबह वची जे प्रोड़ावस्तामे राज्जक पतन भेखी के संस्क्रित आवहत में विलाप के नहो थी देखु मनोविग्यान अ समाज्चास्त्र एक्रा नहीं माने तच्ये जे एक एक वेक्ती आपन जीवन में दूईता एहन नितान्त भिन्न बलकी विरोदी वर्ग चितना जीए जकन हम मेही पाग के हता के दिखे च्ये तकन हम्रा एक ता एहन कवी भीटे तच्ये इतिहाँ सदाई विजेता आ अबिजात्य वर्ग दवारा अपन सूविदाखले लिखल जाईता चे दर्बारी पन्दिता कितिहाँस ताम्रपत्र में लिखल गेल मुदा सरवाहारा का इतिहाँस उही विदापत नाच मिसुरक्षित रहीगेल जक्रा आए दरी कुलीन समाज आपन मुख्यदारा मिशामिल नहीं के लक. इबहुत बिचारनी आची. गजिंद्र ताकृर का पुस्तक एही मान एतिहास के शब्द दोरहाल आची. इकोनो एक ता कविक पहचानक प्रषनमात्र नहीं आची. उगर बोद्दिक समपड़ा अगर लोक साहित्तिक अदिकारक प्रश्नची जक्र सएयो वर्ष्न सदभाईल गेला ची. रम्रा लागे तची जे आब हम सब आएगान विमर्षक अन्तिम पडाओ पर आभीगेल ची अगेल ची एई समपुन मन्ठन के समट तैद, हमी कहब जी साहित्तिक चेतना आईतिहासक दस्तावेजी करनक इद्वन्द जे गजंदर ठाकूल अपन पुस्तक में उठेलान इची अ मैठली साहित आईतिहासक एक ता नव अ अत्तनत गम्दी रायाम अची. इक्दम सही काली पदावलिक सरवहारा स्वर जते ग्रामिन जीवनक उलास अदर्द अचे अ संस्क्रित ग्रन्त्ख दर्बारी चिन्ता इभिन्नता वास्तब में हम्रा लोक्निके विचार कर्वापर विवष करे तचे पन्जीक अटियाशिक्ता आताम्र पत्रपन्धाम सत्टे भोसकेत अचे मुदा उई पन्जीक विद्ट्यापती तख्कृर आप पदावलिक जन्कवी विद्ट्यापती एक चती वादुई इप्रष्ना पूर्व जका बंद नहीर हल बलक्ल नहीं इक ता खुला ज्वलन्त विमर्ष अचे, जटे लिक्रित दिहास आम मोखेक तिहास आमने सामने तार्ड आचे. सत्ते जे हु चाहे एक विद्यापती हो थी, वदुई चाहे एतिहासिक दस्तावेज पुन सत्ते हु वम मोखेक परम्परा. मुदाप पदावली में अंप्र नहिज जे सीमान समाज का दुक दर्ध अचे आजे विदाप नाच जाका समानानतर परमपराक अस्तित्वा चे तक्रा आप कोन अस्तिती में चुपाल नहीं जासके तचे आआ, उता हम वाने चे पाग पाज्ठा के जे एतिहासिक असान्सक्रतिक राजनितिया चे उख्रा चिन्हनाई अबुजनाई आए कसमई में अप्तिन्द आवश्यक अचे निष्छित रुप से इविमर्ष उही ऐक्स्रे मशीन जका रहल जे विद्या पतिक सद्यों से स्तापिट चित्रक नीचा एक ता समानान्तर परमपरा कनुहार के उजागर के लक. मुदग कोनो चित्र असलीय चे की कुलीन पन्दित अस्सर्वहारा कवी मिलाक रेहत चित्र बनाइत चे वैक्ता चित्र अटिहासिक रूप से दूसर के मिटेबाक सून्योजित प्रैआश्चल इएक्ता एरहन प्रश्नेः शे जगर उत्र प्रत्तेख पात्ठ की स्वैम खुज्बाग चाही एक्दम आई निरने हम आपन सुदिश रोता लोकनी पर चोडे चे आहा लोकनी गजेंदर ठाकुरक मैठली समीख्षा शास्त्र, बहाग दुई, स्वैम पडू, स्रोज समगरी पर विचार करू, आपन निषकर्ष निकालू. सत्यक अन्वेश्वनक यात्र निरन्तर चलई त्रहवाख चाही. दबेट में हमरा लोकनिक संच ज़ुदवा क्लेल, आहा सब के बहुत-बहुत दश्नेवाद