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परी_लोक_की_हाई-टेक_जेल.m4a
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- 0:00–0:02अगर बावा का एक जोका तक प्राक्रतिक ना हो।
- 0:02–0:03आप बलकुल
- 0:03–0:07और जाएक पेड की पत्यो को लिए भी बाकाएडा किसी लब से विशीनो के जर ये क्रित्रिम हवाज चोडनी पडे।
- 0:07–0:08एक दम सही कहा।
- 0:08–0:13अगर देखान बागाईदा किसी लब से मशीनो के जर ये क्रित्रिम हवाई चोडनी पडे.
- 0:13–0:14एक दम सही कहा.
- 0:14–0:20और जाए एक बहुती खुबसुरत सा, रंभिरंगा और एक दम सुरक्षिद दिखने वाला जो परी लोक है,
- 0:20–0:24अगदी खुब सुरत सा रंभिरंगा और इक दं सुरक्षिद दिखने वाला जो परीलोक है
- 0:25–0:30वो असल मे एक बेहद हाईटेक और बिना सुरज वाली सक्त निग्रानी वाली जेल हो.
- 0:30–0:33अग, और आजकी इस गेहिं चर्चा मे,
- 0:33–0:35अँ आँ आँ एसे ही एक चोकाने वाले रहें से से
- 0:35–0:36परडा उटाने वाले है.
- 0:36–0:39बिलकुल, हमारी आजकी इस चर्चा का जो केंद्र है,
- 0:39–0:42वो है गजेंद्र ताकृर की एक बेहत दिल्चस्प और
- 0:42–0:44आँ बहुस तरी एक कहानी,
- 0:44–0:47जिसका नाम है शून्यो वन तरारी में परी लोक
- 0:47–0:49और ये कोई आम जादूई कहानी नहीं है ना?
- 0:49–0:52मतलब ये कहानी बहुतिक मिग्यान, पर्यावरन
- 0:52–0:56और एक रहसे मैं दिस्टोपियन दुनिया के दागुं से बूनी गय है
- 0:56–1:06अज का हमारा मुक्या उदेश़ भी आई है, इसी तिलिस्म को समजना है, कि कैसी ये पूरी के पूरी लोग कता अचानक से विग्यान कता में बडल जाती है.
- 1:07–1:11इस कहानी के तुब सबसे बडी खुभी है ना, वो इसकी शिरुवात में ही चुपी है.
- 1:12–1:13अचा वो कैसे?
- 1:13–1:17मतलव कहानी सीदे किसी जादूई दुन्या में नहीं कुडती
- 1:17–1:22बलकी इसकी शुर्वात एक बहुत जमीन से जुडी
- 1:22–1:25और बहुत ही मानवी अवदारना से होती है
- 1:25–1:28जिसे अक्षर मुट्फी कहा गया है
- 1:28–1:30आख्षर मुट्फी वाला हिस्था
- 1:30–1:34मैंने जब पड़ा तो मुझे भी बहुत मार मेग लगा.
- 1:34–1:38है ना? एक दादी हैं जो ओम नाम के बच्चे को कहनी सूनारे है.
- 1:38–1:41लिकि वो सर्व बोल कर नी सूनारे है.
- 1:41–1:46बलकी अपनी उंगलियों से उस बच्चे की हतेली पर अख्षर उकेर रही है.
- 1:46–1:50बिल्कुल और ये आख्शर मुठ्थी का विचार स्व्वाशाया व्याक्रद का ज्यान नहीं है
- 1:51–1:57मदलब जब एक दादी अपनी उंगलीो से बच्छे के हाथ पर कुछ गड़्ती है तो वो एक शाररिक्स परष होता है
- 1:57–2:01बवावनाउ का एक सीदा और जैविक रहस्तान्तरन है.
- 2:01–2:05एक दूम सही. ये अनसानियत का सबसे शुद रूप है.
- 2:05–2:09और इसे अगर हम एक छोडे बड़े नजर्ये से देखे,
- 2:09–2:14तो लेक्हक ने बहुत चालाकी से इस जैविक गर्माहत को कहानी की शिरुात में रख्खा है.
- 2:27–2:31तो ये विरोदा बास बहुत थेजी सिचुबहेगा
- 2:32–2:37आख्शर मुथफी की जैविक दुन्या बनाम परिलोग की क्रित्रिम दुन्या की एक बहुती शान्दर प्रस्ताँना है
- 2:38–2:43तो चली उस जैविक दुन्या से निकल कर उस रहेस यम आई सफर पर चलते है
- 2:43–2:45तो कहनी की मुखे पात्र है आस्था,
- 2:45–2:47जो एक दस साल की भेहत जिग्यासु बची है,
- 2:47–2:50वो चनना के पेडों के जुर्मुट में आम भीन ने गये हैं.
- 2:50–2:52आप और वो अपनी दुन्या में मगन है.
- 2:52–2:54बलकों, मगन है और तभी आप चानक,
- 2:54–2:58काले कवों का एक जुन उस पर बयानक तरीके से हमला कर दिता है.
- 2:58–3:02और फिर खुद को बचाने की जड़ो जहद में आस्ता बहगती है,
- 3:02–3:06और एक पुराने पेड के विषाल काले खोकल में गिर जाती है.
- 3:06–3:10और यहे यहे से टीक इसी पल से इस कहानी में वो होता है,
- 3:10–3:12जिसे हम यतारत का तुटना कैसकते है.
- 3:12–3:15आप, क्योंकि वो गिरना कोई आम गिरना नहीं ताना ता है.
- 3:15–3:18तो गुरुत्वा करश्श्वन अपना काम करता है.
- 3:18–3:21हवा की तेज सर सराहत होती है,
- 3:21–3:23और कानो में दबाओ बनता है.
- 3:23–3:26पेट में भी एक अजीब सी गुदगूदी या दर पैदा होता है.
- 3:26–3:27आप.
- 3:27–3:30लेकिन दिल्चास बात ये है कि उस खोकल में गिरते वकत
- 3:31–3:33आस्ता के सात यासा कुछ भी नहीं हूँँँ.
- 3:33–3:37और यही बात कहनी को तरंद तेक साँँईच्छन का रूभ दिलिती है.
- 3:37–3:42अगर में ज्द्रूशे की कलपना करूम, तो ये किसी गेरे कौए में गिरने जैसा नहीं ता.
- 3:42–3:46बलकी ये तो अंट्रिक्ष में तेरतेवे अंट्रिक्ष्यात्रीं जैसा था.
- 3:46–3:49जीरो ग्रवेटी यानी बार हींता का अनुबहव.
- 3:49–3:53एक दम, आस था को अपने शरीर का कोई वजनी मेंसुस नी हो रा था.
- 3:53–3:55उगर रूई के फाहे से भी हलकी हो गगे थी.
- 3:56–4:00उसने अपने हाथ प्यलाए, तो उसे लगा जेसे उसके पंक खूल गयों.
- 4:00–4:03न कोई हवाग का प्रती रोद, न कोई जबद का.
- 4:03–4:08वो सब से बडी बात, समें का जो प्रवाथा वो पुरी तरा से विक्रुथ होगया ता
- 4:08–4:13उसे लगा जैसे उसे उसे उस खोकल में गिरतेवे लगबबक दो गंटे भीद गयों
- 4:13–4:17और ये गुरुत्टा कश्यन और समें का तुटना आना
- 4:17–4:19ये जादूई चमतकार नहीं है.
- 4:19–4:20तु फिर क्या है?
- 4:20–4:27ये इस बात का पहला बडा संकेत है, कि इस लोक में प्रक्रती के हर नियम को
- 4:27–4:28रहक कर लिया गया है.
- 4:28–4:30रहक कर लिया गया है?
- 4:30–4:33आप जब आस्ता उस खोखल से गुजरती है,
- 4:33–4:37तो वास्तों में एक आयाम से तुसरे आयाम में जा रही है.
- 4:37–4:41यानी एक बिल्कुल ही नेद दीमेंशन में प्रवेश कर रही हैं
- 4:41–4:45जहां हमारे ब्रमान्ड के बहुतिकी के नियम लागुइ नहीं होते
- 4:45–4:48बिल्कुल और फिर उसका लान्टिंग का तरीका देख्ये
- 4:48–4:52तो गान्ती गिरने के बाद वो किसी कुर्दूरी
- 4:52–5:22तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
- 5:22–5:52आप दो बगर बारत बारत बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार �
- 5:52–5:54अगर सबसे कथोर नियम बताता है
- 5:54–5:56वो कहता है कि तपरी लोक मे आते ही
- 5:56–6:00हर जीव इनसानो की तरज तब रव बोलने लकता है
- 6:00–6:03ये बात सुनने में भहले ही आम लगे
- 6:03–6:04लिकिन
- 6:04–6:07आखा ये सरफ एक समवाद का तरीका नहीं है
- 6:07–6:09अगर इसे मनोविग्यानिक नजर्ये से देखें,
- 6:10–6:13तो ये जीवो के दिमाग की प्रोग्रमिंग बडलने जैसा है.
- 6:13–6:14बलकुल.
- 6:14–6:18और सिल्फ दिमागी नहीं इस दुन्यां के पर्यावरन के नियम भी किसी
- 6:19–6:20लब में लिखे लकते है.
- 6:20–6:22ज़ेसे तूराकोस के पंको के रंग
- 6:22–6:24आचा? पंको में क्या जीप था?
- 6:24–6:26वो बताता है, कि
- 6:26–6:29उसके पंको का हरा रंग तो पक्का है
- 6:29–6:31लेकिन जो लाल रंग है
- 6:31–6:33वो बारिष के पानी में गुलन शील है
- 6:33–6:35मतलब अगर पानी पडा
- 6:35–6:37तो लाल रंग बहने लगेगा
- 6:37–6:43वाप्रे, ये कैसा प्राक्रतिक जीव है जिसके रंग पानी सिदूल जाते है?
- 6:43–6:48आप और फिर वहां की सडखें आस्था और तूराकोज जब वहां की सडखों पर कदम रकते हैं,
- 6:48–6:51तो शरीर अपने अप फिसलने लकता है
- 6:51–6:51और वो भी
- 6:51–6:55तो बवादाग बद्याग बादाग बादाग बादाग बादाग
- 6:55–6:58बद्याग बादाग बादाग बादाग
- 6:58–7:01बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग
- 7:01–7:03बादाग बादाग बादाग बादाग
- 7:03–7:06बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग
- 7:06–7:09उनके सात एक दंक मारने वाली द्रागन प्लाई
- 7:09–7:11और बिना दंक वाली तितली भी जुड़ जाती है
- 7:12–7:13जो साँक इस पीट से उनके सात फिसल रही है
- 7:14–7:16बहुत ही अजीब सी तस्वीर बनती है दिमाग में
- 7:17–7:19लेकिन इन सब चमतकारों के भीच
- 7:19–7:23मेरे दिमाग में बहुती बुन्यादी वेग्यानिक सवाल अटग्या था
- 7:23–7:24कुन सावाल
- 7:24–7:28वुँई बात बुजे सबसे जादा परिशान करी थी
- 7:28–7:32वो ये थी के अगर उस दून्या का आस्मान सपेद है
- 7:32–7:37वहां कोई सुरज है ही नहीं तो प्रकाश तन्सलेशिन यानी फोटो सिंटिसस कैसे हो रहें
- 7:37–7:40ये एक बहुथ ही शान्दार और सतीक सवाल है
- 7:40–7:47मतलव हम ने बच्पन से विग्यान में पडाए के सूरज की रोशनी के बिना पूड़े अपना खाना नहीं बना सकते, अखसिजन नहीं बन सकती.
- 7:47–7:51तो फिर ये पुरा एकोसिस्टम ये जीवन चल कैसे रहा है.
- 7:51–7:57और दिल्च्छास बात ये है, कहानी में आस्था भी तूराकोस थीक यही सवाल पूचती है.
- 7:57–8:00कुकि वो खोडे खब जिग्यासु बच्ची है.
- 8:00–8:01तूराकोस क्या जबाब देता है?
- 8:01–8:03तूराकोस जबाब देता है ना,
- 8:03–8:07वो इस लोक के पूरे दाचे को बेनकाब कर देता है
- 8:07–8:12वो बताता है, कि इस लोक में हमारे जैसी पारंपर एक फसले नहीं उगाए जाती
- 8:12–8:15यहां गेहु चावल या मक्के के केट नहीं है
- 8:15–8:16तो फिर क्या है वाँ?
- 8:16–8:18यहां उरजा के केट हैं
- 8:18–8:21बिना दूपके उगाई जाने वाली उर्जा
- 8:22–8:27उर्जा के खेट सुनकर एसा लगता है, ज़से, किसीने प्रक्रती को एक मशीन में तबदील कर दिया हो.
- 8:28–8:31बिलकुल, अगर हम वेग्यानिक रूप से इसकी कलपना करें,
- 8:31–8:37तो शायद यह है क्रित्रिम प्रकाश संसलेशन जीो धर्मल एनरजी
- 8:37–8:41यह किसी उन्नत रासाइनिक संसलेशन का परिनाम है.
- 8:41–8:42आँ, मुमकिन है.
- 8:42–8:46लेकिन यहां सवाल यह नहीं कि एक कैसे हो रहा है.
- 8:46–8:50बलकी सवाल यह है कि यह ख्यों हो रहा है.
- 8:50–8:51क्या मतलप?
- 8:51–9:05बडलब जब आप किसी समाज का खाना और उसकी उर्जा एक केंद्री क्रित्रिम प्रनाली से पैदा करते हैं तो आप दर सल उस पुरी आबादी पर पुर्ड नियंट्रिंच तापिट कर लेते हैं
- 9:05–9:06औ, समज गया
- 9:06–9:12आप आँ ये जादू नहीं है, यह किसी अथ्यदेख उच्टक्निक और क्रित्रम बुद्दिमत्ता,
- 9:12–9:18यानी आई दुरा चलाया जारा आँ एक वानिप्ष्ट्ट्वार एक इको सिस्टम है.
- 9:18–9:24और ये निंट्रन कितना गेरा और खोफनाख है, ये हमें कहानी के अगले हिसे में पता चलता है.
- 9:24–9:28आस्ता को एक रहे समएई उतरी दिवार के बारे में बताया जाता है.
- 9:28–9:29उतरी दिवार?
- 9:29–9:34रहा, तूरेकोस बताता है, कि उतर दिशाम में एक बेहत विशाल दिवार है,
- 9:34–9:36जिसके पीछे एक रेगिस्टान है
- 9:36–9:38और सबसे चोंकाने वाद यह आद यह गे
- 9:38–9:41कबई वहाँ भी खेथ हूँ आगर थे देख
- 9:41–9:45तुब वो कुडे का पहाद बहुत बड़ा होगया तुवसे चपाने किलिए विशाल दिवार करी कर दीगी.
- 9:46–9:50ये एक बहुत फीख़वा और यतार्ट वादी पर्यावरनी ए सत्ते है,
- 9:51–9:54जिसे एक लोग कता के आवरन में चपाकर पेष किया गया है.
- 9:55–9:56बिलकु.
- 9:56–9:58तो बवादी प्र्यावरनी या सत्ते है,
- 9:58–10:01जिसे एक लोग कता के आवरन में चिपाकर पेष किया गया है.
- 10:01–10:02बलकुल.
- 10:02–10:05लिकिन मैं यहां थोडा अलग नजरया रकना चाहूंगी.
- 10:05–10:09जरा सोची ए, क्या हमारी आदूनिक दुन्या भी तीक अजा ही नहीं कर रही है?
- 10:09–10:10कैसे?
- 10:26–10:56अगनी गलतियों और अपने कच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्�
- 10:56–10:58उगोकलों के जरहे यहां आँसकते हैं
- 10:58–10:59यहें
- 10:59–11:03लेकिन अगर किसी को वापिस अपनी जन्या में जाना हो
- 11:03–11:07तो उसके लिए आख की पुतली और आंगुटे के निशान
- 11:07–11:10यानी कोरनिया और फिंग प्रिंट लेकिणिशन की जरुद रहती है
- 11:10–11:12आच्छा बायो मेट्रिक्स
- 11:12–11:15जब मैंने ये पड़ा तो मुझे लगा ये सर्फ कॉई जादूई पोटल नहीं है
- 11:15–11:20ये तो एक अत्यदिक सुरक्षित अंप्राष्ट्री हवाई दे के अमग्रेशन सिस्टम जैसा है
- 11:20–11:26ताकि, एश्या के पोटल से आया वक्ती गल्ती से अफ्रीका के दर्वाजे से बहारना निकल जाए.
- 11:26–11:29अपका ये एप एमिग्रेशन वाला उदारन बहुर थीक है,
- 11:29–11:33लिक येन मैं ये से एक कदम और आगे ले जाना चाहूंगी.
- 11:33–11:34वो कैसे?
- 11:34–11:37ये स्र्फ एक एक एम्मेग्रेश्ट्सिस्तम नहीं है
- 11:37–11:40ये एक बायो लोगिकल फायर वाल है
- 11:40–11:47जैसे उ, हम अपने कम्ठुटर में अंटीवाईरिस डालते है ताकि कोई बाहरी या अनदिक्रिट स्व्फ्ट्वर
- 11:47–11:49हमारे सिस्तम को खराब नकर दे
- 11:49–11:50राए एक दम
- 11:50–11:55तीक वैसे ये बायोमेट्रिक निकास प्रनाली सुनिष्चित कर रही है,
- 11:55–11:59कि इस पूरी तरह से निंद्रित क्रित्रिम एको सिस्टम में,
- 11:59–12:04कोई भी प्राक्रितिक या आप्रत्याशि तत्व ग़बबडी नपहला सके.
- 12:04–12:06बाप्रे ये तो बहुत इतग्डा सिस्टम है.
- 12:06–12:36आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� �
- 12:36–12:38पूरी तरा से खत्म होचका है
- 12:38–12:40वो किसी को दस नहीं सकता
- 12:40–12:43साथी, अज्ट्रेलिया का हमेशा हसने वाला
- 12:43–12:45कुका बुरा पकषी भी वहाँ है
- 12:45–12:49लेकिन, वो भी अब यिनसानो कितरा बात कर रहे है
- 12:49–12:51सुनकर एक पल किले लकता है कि वाँ
- 12:51–12:53कितनी शानतिपोब दूनिया है
- 12:53–12:56उगर आप एक जीव का बगाद नहीं सकता, सब सुब सुवषित है.
- 12:56–13:00देखने में ये एक आदर्ष और अहिंसक समाच लकता है.
- 13:00–13:05शाएद खोई तर्खबी दे की रानी की एक महान उपलबदी है.
- 13:05–13:08एक आसी दुन्या जहां कोई हिंसा नहीं, कोई खत्रा नहीं.
- 13:08–13:10उपर से तो एसा ही लकते है
- 13:10–13:12लेकिन जरा गेहराई से सुच्छीए
- 13:12–13:16एक मामबा साप बिना अपने जेहर के क्या है
- 13:16–13:20उसका जेहर ही, उसका विकास, उसका प्रक्रितिक अस्तित्व है
- 13:20–13:21बलकुल सही बात है
- 13:21–13:24अगर आप एक जीव का मूल स्वबहाउ चीन लेते है
- 13:24–13:28उसे इंसानो कितरा सोचने पर मजबोर कर देते हैं
- 13:28–13:30तो ये शानती नहीं हैं
- 13:30–13:31तो ये क्या है?
- 13:31–13:33ये प्रक्रती की एक तरह की लोबोटमी है
- 13:33–13:36जहां एक थोपे गय निंट्रन के तहत
- 13:36–13:39सब को एक ही साचे में ड़ाल दिया गया है
- 13:39–13:42वो में ये तो सच में रोंटे कड़े कर देने वाला विचार है
- 13:42–13:45मतलब आप पुरी तरा सुरक्षित तो है
- 13:45–13:47लेकिन आप असल में आप ही नहीं है
- 13:47–13:50आपका वजुध मिता दिया डया है एक दम
- 13:50–13:54और निंट्रन का ये अंदादूंदर दाचा
- 13:54–13:56वहांके शेहरों की बसाववट में भी बहुत साव जलकता है.
- 13:57–14:01वो पूरा परी लोग सात आंदर दनूशी रंगो की कतारो में बतावा है.
- 14:01–14:02सात रंगो में?
- 14:02–14:06राँ, सब कुछ एक दम सलीके से जैमितिय रूप से विवस्तित.
- 14:06–14:11बेगनी रंग वेग्यानिको के लिए आरक्षित है, गेरा नीला रंग सेना के लिए है।
- 14:11–14:13वडल पूरा मिलिट्री योर खलास वाला सिस्टम.
- 14:13–14:16बलकल. और नीले रंग के लाके में स्कूल और विष्व विद्ध्याल है,
- 14:16–14:19हरा रंग पोदो पर शोद करने के लिए है,
- 14:19–14:22पीला रंग समानो के अस्पताल और शोद के लिए
- 14:22–14:26और गेरा लाल रंग वहां के निवासियों के गरों के लिए तटी की आगया है
- 14:26–14:28रंगों का ये सक्त बत्वारा
- 14:28–14:31एक बेहत कथोर नोकर शाही
- 14:31–14:34यहनी एक पूँन सथ्टावादी वेविस्ता कुदरषाता है
- 14:34–15:04आप ख़ब इस बगर दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा �
- 15:04–15:09और उस महीला का नाम सूने, यूनिकोन 999995745
- 15:09–15:12आरे बाप रे मदलब यूनिकोन के बाद स्रिफ नमबर?
- 15:12–15:16आर वो महीला आस्ठा को बताती है कि खोखल चे गिरने वाले
- 15:16–15:20रहर जीव का लेकोड तुरन्त बागनी लआप के जर्ये रानी तक पहुट चाता है
- 15:20–15:24बतलग जबखते ही सिस्तम को पता चल जाता है कि कोन आया है
- 15:24–15:27बलकल और ये नाम यूनिकोन और नमबर
- 15:27–15:30कोई पहचान नहीं, कोई परिवार का नाम नहीं
- 15:30–15:32बस एक देटा पोईंट
- 15:32–15:37और यही पर हमें कहानी के शिर्वात में बताए गय उस अक्षर मुट्धी वाद को वापस याद करना च़िये.
- 15:37–15:39हाँ वो दादी और बच्छे वाद.
- 15:39–15:45दादी जब बच्छे के हाद पर अक्षर गर रेए थी तो वो एक पहचान एक अनसानी गर्माहत का प्रितिक ता.
- 15:45–15:49अगर यहां यहां पहचान के नाम पर स्रफ एक लंभी सी संख्या है
- 15:49–15:51एक दम सही तुलना है
- 15:51–15:58यह नाम करन प्रनाली व्यक्ती की निज्टा को उसकी आत्मा को पुरी तरह से कुचल देती है
- 15:58–16:02जब हर गत्विदिए पर, हर सांस पर नजज़ रख्छी जारी हो
- 16:02–16:06तो वहां स्वतन्त्रता का ब्रम तो हो सकता है
- 16:06–16:08लेकिन आस्ली आजादी नहीं होती
- 16:08–16:09बलक्ल
- 16:09–16:13आस्ली आजादी तो बहुत दूर की बाते है वहां तो प्रक्रती भी आजाद नहीं है
- 16:13–16:17पुरी कहनी पडतेवाग जो बात मुज अंदर तक परशान कर रही थी
- 16:17–16:20वो ये ती के वहां हवा का एक प्राक्रतिक जोंका तक नहीं है
- 16:20–16:22हवा भी क्रित्रिम है
- 16:22–16:22हाँ
- 16:22–16:25कहानी में साफ बताया आगया है के केवल हरी लब में
- 16:25–16:28विषेश तुबों के जर ये हवाज छोडी जाती है
- 16:28–16:29और वो बी सर्फ इस लिए
- 16:29–16:31ताकि वाई पोड़ों पर जो शोद होगा है
- 16:31–16:33उसकी पत्तिया हिल सकें
- 16:33–16:36बाकी पुरे लोक में कही कोई हवानी है
- 16:36–16:37ए तो बहुती गुटन बरा माहाल है
- 16:37–16:39जब मैंने ये पडा तो मैं सोचने लगा
- 16:39–16:41क्या ये वाखे वो खुबसुरत परी लोक है
- 16:41–16:43जिसकी कहानिया दादी नानी सूनाती है
- 16:43–16:47मुझे तु ये एक हाईटेक दिस्टोप्यन जेल लगी
- 16:47–16:51जहाई प्राक्रतिक सुन्दरता बस एक निरजीव तस्वीर बन कर रहागे है
- 16:51–16:54जिस में जान फुकने के ले भी मशीनो का बतन दबाना परता है
- 16:54–16:55एक दम सही का
- 16:55–16:58अप बलकुल सही दिशा में सुच रहे हैं.
- 16:58–17:01और इसी लिए कहानी का क्लाईमाक्स,
- 17:01–17:05यानी कहानी का सब से बड़ा और चोकाने वाला रहें स्या,
- 17:05–17:08उ इसी क्रित्रम्ता के खिलाग एक जोड़ार तमाचा है.
- 17:08–17:10आचा, क्लाईमाक्स में क्या होता है?
- 17:10–17:15एक आजी गटना गटी है, जु रानी के पूरे आजेय नियन्त्रन को चुनाती देती है.
- 17:15–17:20और वो है चलने वाले पेडों की बगावत.
- 17:20–17:21चलने वाले पेड?
- 17:21–17:25मतल पेडों अपनी ज़ने जमीन से निकालनी है, और वो सच में चलने लगे?
- 17:25–17:26हा!
- 17:26–17:31उसी हरी लब में, जहां टुबो से हवाच रोग जाती थी और पबडों पर शोद होता था
- 17:31–17:34वहां कुछ पेडों एक इसी टरह चलना सीक लिया
- 17:34–17:35औरे वाख
- 17:35–17:39लेकिन यहां सब से महत्वोपोण बात यह नहीं के वो चलने लगें
- 17:39–17:42बलकी ये है की चलने के बाद उने वो ने क्या किया?
- 17:42–17:49वो पेड इस क्रित्रिम सुरक्षिद, रंग भिरंगी और सर्विलन्स से गिरी दुन्या से बाग निकलें.
- 17:49–17:50और वो बाखकर कहांगे?
- 17:50–17:53वो उस विशाल उत्तरी दिवार को पार करके
- 17:53–17:58उस अंदेरे, जेहरीले और कुडे वाले रेगिस्तान की तरफ चले गय.
- 17:58–17:58क्या बात कर है?
- 18:00–18:02ये बात किसी के भी दिमाग को सुन्न कर सकती है.
- 18:02–18:06मतलब एक अजी जगग, जगा क्रित्रिम हवा है, कोई भीमारी नहीं है.
- 18:06–18:13पूरी तरह सुवक्षित महाल है, वहाहासे पेड जो सद्धियो तक एकी जगा कड़े रहने कि जाने जाते हैं,
- 18:13–18:16वो खुद बाग रहें. बिलकुल. और वो भी एक दम्तिंग क्राून की तरव.
- 18:16–18:21यह यह यह पूरी कहानी का सबसे गेरा और दाशनिक अर्थ है.
- 18:21–18:28यह इस बात का प्रतीक है, कि जीवन और प्रक्रती को आप कभी भी पुरी तरा से निंद्रत नहीं कर सकते.
- 18:28–18:30जीवन अपनी रहा कोजी लेता है.
- 18:30–18:33आप, जीवन अपनी आजादी कोजी लेता है.
- 18:33–18:39उन पेडों के लिए वो खुपसुरत रंग भिरंगा परी लोक एक दमगोटू जेल बन चुका था
- 18:39–18:47एक जीवन्त पेड के लिए एक जेह्रीला कूडे का देर उस सुरक्षिद जेल से कही जाडा बहतर है
- 18:47–18:52कुकी उस कूडे के देर में कम से कम वे अपनी मरजी से उग तो सकते है,
- 18:52–18:54अपनी मरजी से जी तो सकते है.
- 18:54–18:55प्रक्रती का विद्रोज.
- 18:55–19:00हाँ? प्रक्रती उस पोण नियंतरन उस क्रित्रिम विवस्था के खिलाद
- 19:00–19:02अपना अनतिम विद्रोज कर रही है.
- 19:02–19:32वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 19:32–19:34अगर भी अपनी दुन्या के हकीकत बनती जारे है?
- 19:34–19:36इक दम सही निशकर्ष है
- 19:36–19:39इस कहानी ने बहुत्ये खुबसुर्टी से यह स्थापिट किया है
- 19:39–19:43कि जब हम तकनीक के जर यह सब कुछ निंद्रित करने की
- 19:43–19:46रहार खट्रे को कहत्न करने की कोशिष करते है
- 19:46–19:50तो अम अंजाने में जीवन की मुल आत्मा को ही मार देते हैं
- 19:50–19:53आँ... प्रक्रुतिक चीजें क्यों खतम हो जाती है
- 19:53–19:57प्रक्रुतिक दुन्या की अनिष्चित्ता, उसका खत्रा
- 19:57–20:01और उसका बेतर तीब हूना ही, उसकी अस्ली सुन्दरता है
- 20:01–20:09पून सुरक्षा की कीमत अगर पून गुलामी है, तो प्रक्रती हमेशा गुलामी के खब बगाववत करेगी.
- 20:09–20:17और ग्यान को साहित्ते को इस तरह की गेराई में जाकर देखना, सच्में हमारे नजरये को बहुत व्यापक बना देता है.
- 20:17–20:19रँग भी रगे गर कितने जादूई है
- 20:19–20:26लेकिन अंतक आते आते आते उस जादूगे पीछे का तकनी की और दिस्टोप्यन काला सथ सामने आजाता है
- 20:26–20:31बिलकुल जो चीजे बाहर से बहुत सुरक्षित विवस्तित दिक्ती है
- 20:31–20:34वे अन्दर से उतनी खोख्ली हूँ सकती है
- 20:47–21:17अब इस चर्चा के अन्त में एक अईसा विचार जो मुझे इस कहानी को पडने के बाद से लगा तार जगजोर रहा है, वो में यां चोरना चाहूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 21:17–21:26तो तो तो बग़ादी की कीमड दूनिया की सब से खुबसुरत तो सुरक्षित कैद से भी बहुत जादा है।
- 21:26–21:28ये एक बहुत यी गहरा सवाल है।
- 21:28–21:31तब हैं कि आज भी चर्चा को यही विराम देते हैं
- 21:31–21:33तबही की अस्ली शुर्वात है?
- 21:33–21:35इसी विचारो तेजक सवाल के साथ
- 21:35–21:38आज की चर्चा को यही विराम देते हैं
- 21:38–21:40सुचने के लिए सच में बहुत कुच है
Plain text
अगर बावा का एक जोका तक प्राक्रतिक ना हो। आप बलकुल और जाएक पेड की पत्यो को लिए भी बाकाएडा किसी लब से विशीनो के जर ये क्रित्रिम हवाज चोडनी पडे। एक दम सही कहा। अगर देखान बागाईदा किसी लब से मशीनो के जर ये क्रित्रिम हवाई चोडनी पडे. एक दम सही कहा. और जाए एक बहुती खुबसुरत सा, रंभिरंगा और एक दम सुरक्षिद दिखने वाला जो परी लोक है, अगदी खुब सुरत सा रंभिरंगा और इक दं सुरक्षिद दिखने वाला जो परीलोक है वो असल मे एक बेहद हाईटेक और बिना सुरज वाली सक्त निग्रानी वाली जेल हो. अग, और आजकी इस गेहिं चर्चा मे, अँ आँ आँ एसे ही एक चोकाने वाले रहें से से परडा उटाने वाले है. बिलकुल, हमारी आजकी इस चर्चा का जो केंद्र है, वो है गजेंद्र ताकृर की एक बेहत दिल्चस्प और आँ बहुस तरी एक कहानी, जिसका नाम है शून्यो वन तरारी में परी लोक और ये कोई आम जादूई कहानी नहीं है ना? मतलब ये कहानी बहुतिक मिग्यान, पर्यावरन और एक रहसे मैं दिस्टोपियन दुनिया के दागुं से बूनी गय है अज का हमारा मुक्या उदेश़ भी आई है, इसी तिलिस्म को समजना है, कि कैसी ये पूरी के पूरी लोग कता अचानक से विग्यान कता में बडल जाती है. इस कहानी के तुब सबसे बडी खुभी है ना, वो इसकी शिरुवात में ही चुपी है. अचा वो कैसे? मतलव कहानी सीदे किसी जादूई दुन्या में नहीं कुडती बलकी इसकी शुर्वात एक बहुत जमीन से जुडी और बहुत ही मानवी अवदारना से होती है जिसे अक्षर मुट्फी कहा गया है आख्षर मुट्फी वाला हिस्था मैंने जब पड़ा तो मुझे भी बहुत मार मेग लगा. है ना? एक दादी हैं जो ओम नाम के बच्चे को कहनी सूनारे है. लिकि वो सर्व बोल कर नी सूनारे है. बलकी अपनी उंगलियों से उस बच्चे की हतेली पर अख्षर उकेर रही है. बिल्कुल और ये आख्शर मुठ्थी का विचार स्व्वाशाया व्याक्रद का ज्यान नहीं है मदलब जब एक दादी अपनी उंगलीो से बच्छे के हाथ पर कुछ गड़्ती है तो वो एक शाररिक्स परष होता है बवावनाउ का एक सीदा और जैविक रहस्तान्तरन है. एक दूम सही. ये अनसानियत का सबसे शुद रूप है. और इसे अगर हम एक छोडे बड़े नजर्ये से देखे, तो लेक्हक ने बहुत चालाकी से इस जैविक गर्माहत को कहानी की शिरुात में रख्खा है. तो ये विरोदा बास बहुत थेजी सिचुबहेगा आख्शर मुथफी की जैविक दुन्या बनाम परिलोग की क्रित्रिम दुन्या की एक बहुती शान्दर प्रस्ताँना है तो चली उस जैविक दुन्या से निकल कर उस रहेस यम आई सफर पर चलते है तो कहनी की मुखे पात्र है आस्था, जो एक दस साल की भेहत जिग्यासु बची है, वो चनना के पेडों के जुर्मुट में आम भीन ने गये हैं. आप और वो अपनी दुन्या में मगन है. बलकों, मगन है और तभी आप चानक, काले कवों का एक जुन उस पर बयानक तरीके से हमला कर दिता है. और फिर खुद को बचाने की जड़ो जहद में आस्ता बहगती है, और एक पुराने पेड के विषाल काले खोकल में गिर जाती है. और यहे यहे से टीक इसी पल से इस कहानी में वो होता है, जिसे हम यतारत का तुटना कैसकते है. आप, क्योंकि वो गिरना कोई आम गिरना नहीं ताना ता है. तो गुरुत्वा करश्श्वन अपना काम करता है. हवा की तेज सर सराहत होती है, और कानो में दबाओ बनता है. पेट में भी एक अजीब सी गुदगूदी या दर पैदा होता है. आप. लेकिन दिल्चास बात ये है कि उस खोकल में गिरते वकत आस्ता के सात यासा कुछ भी नहीं हूँँँ. और यही बात कहनी को तरंद तेक साँँईच्छन का रूभ दिलिती है. अगर में ज्द्रूशे की कलपना करूम, तो ये किसी गेरे कौए में गिरने जैसा नहीं ता. बलकी ये तो अंट्रिक्ष में तेरतेवे अंट्रिक्ष्यात्रीं जैसा था. जीरो ग्रवेटी यानी बार हींता का अनुबहव. एक दम, आस था को अपने शरीर का कोई वजनी मेंसुस नी हो रा था. उगर रूई के फाहे से भी हलकी हो गगे थी. उसने अपने हाथ प्यलाए, तो उसे लगा जेसे उसके पंक खूल गयों. न कोई हवाग का प्रती रोद, न कोई जबद का. वो सब से बडी बात, समें का जो प्रवाथा वो पुरी तरा से विक्रुथ होगया ता उसे लगा जैसे उसे उसे उस खोकल में गिरतेवे लगबबक दो गंटे भीद गयों और ये गुरुत्टा कश्यन और समें का तुटना आना ये जादूई चमतकार नहीं है. तु फिर क्या है? ये इस बात का पहला बडा संकेत है, कि इस लोक में प्रक्रती के हर नियम को रहक कर लिया गया है. रहक कर लिया गया है? आप जब आस्ता उस खोखल से गुजरती है, तो वास्तों में एक आयाम से तुसरे आयाम में जा रही है. यानी एक बिल्कुल ही नेद दीमेंशन में प्रवेश कर रही हैं जहां हमारे ब्रमान्ड के बहुतिकी के नियम लागुइ नहीं होते बिल्कुल और फिर उसका लान्टिंग का तरीका देख्ये तो गान्ती गिरने के बाद वो किसी कुर्दूरी तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � आप दो बगर बारत बारत बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार बाद्बार � अगर सबसे कथोर नियम बताता है वो कहता है कि तपरी लोक मे आते ही हर जीव इनसानो की तरज तब रव बोलने लकता है ये बात सुनने में भहले ही आम लगे लिकिन आखा ये सरफ एक समवाद का तरीका नहीं है अगर इसे मनोविग्यानिक नजर्ये से देखें, तो ये जीवो के दिमाग की प्रोग्रमिंग बडलने जैसा है. बलकुल. और सिल्फ दिमागी नहीं इस दुन्यां के पर्यावरन के नियम भी किसी लब में लिखे लकते है. ज़ेसे तूराकोस के पंको के रंग आचा? पंको में क्या जीप था? वो बताता है, कि उसके पंको का हरा रंग तो पक्का है लेकिन जो लाल रंग है वो बारिष के पानी में गुलन शील है मतलब अगर पानी पडा तो लाल रंग बहने लगेगा वाप्रे, ये कैसा प्राक्रतिक जीव है जिसके रंग पानी सिदूल जाते है? आप और फिर वहां की सडखें आस्था और तूराकोज जब वहां की सडखों पर कदम रकते हैं, तो शरीर अपने अप फिसलने लकता है और वो भी तो बवादाग बद्याग बादाग बादाग बादाग बादाग बद्याग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग बादाग उनके सात एक दंक मारने वाली द्रागन प्लाई और बिना दंक वाली तितली भी जुड़ जाती है जो साँक इस पीट से उनके सात फिसल रही है बहुत ही अजीब सी तस्वीर बनती है दिमाग में लेकिन इन सब चमतकारों के भीच मेरे दिमाग में बहुती बुन्यादी वेग्यानिक सवाल अटग्या था कुन सावाल वुँई बात बुजे सबसे जादा परिशान करी थी वो ये थी के अगर उस दून्या का आस्मान सपेद है वहां कोई सुरज है ही नहीं तो प्रकाश तन्सलेशिन यानी फोटो सिंटिसस कैसे हो रहें ये एक बहुथ ही शान्दार और सतीक सवाल है मतलव हम ने बच्पन से विग्यान में पडाए के सूरज की रोशनी के बिना पूड़े अपना खाना नहीं बना सकते, अखसिजन नहीं बन सकती. तो फिर ये पुरा एकोसिस्टम ये जीवन चल कैसे रहा है. और दिल्च्छास बात ये है, कहानी में आस्था भी तूराकोस थीक यही सवाल पूचती है. कुकि वो खोडे खब जिग्यासु बच्ची है. तूराकोस क्या जबाब देता है? तूराकोस जबाब देता है ना, वो इस लोक के पूरे दाचे को बेनकाब कर देता है वो बताता है, कि इस लोक में हमारे जैसी पारंपर एक फसले नहीं उगाए जाती यहां गेहु चावल या मक्के के केट नहीं है तो फिर क्या है वाँ? यहां उरजा के केट हैं बिना दूपके उगाई जाने वाली उर्जा उर्जा के खेट सुनकर एसा लगता है, ज़से, किसीने प्रक्रती को एक मशीन में तबदील कर दिया हो. बिलकुल, अगर हम वेग्यानिक रूप से इसकी कलपना करें, तो शायद यह है क्रित्रिम प्रकाश संसलेशन जीो धर्मल एनरजी यह किसी उन्नत रासाइनिक संसलेशन का परिनाम है. आँ, मुमकिन है. लेकिन यहां सवाल यह नहीं कि एक कैसे हो रहा है. बलकी सवाल यह है कि यह ख्यों हो रहा है. क्या मतलप? बडलब जब आप किसी समाज का खाना और उसकी उर्जा एक केंद्री क्रित्रिम प्रनाली से पैदा करते हैं तो आप दर सल उस पुरी आबादी पर पुर्ड नियंट्रिंच तापिट कर लेते हैं औ, समज गया आप आँ ये जादू नहीं है, यह किसी अथ्यदेख उच्टक्निक और क्रित्रम बुद्दिमत्ता, यानी आई दुरा चलाया जारा आँ एक वानिप्ष्ट्ट्वार एक इको सिस्टम है. और ये निंट्रन कितना गेरा और खोफनाख है, ये हमें कहानी के अगले हिसे में पता चलता है. आस्ता को एक रहे समएई उतरी दिवार के बारे में बताया जाता है. उतरी दिवार? रहा, तूरेकोस बताता है, कि उतर दिशाम में एक बेहत विशाल दिवार है, जिसके पीछे एक रेगिस्टान है और सबसे चोंकाने वाद यह आद यह गे कबई वहाँ भी खेथ हूँ आगर थे देख तुब वो कुडे का पहाद बहुत बड़ा होगया तुवसे चपाने किलिए विशाल दिवार करी कर दीगी. ये एक बहुत फीख़वा और यतार्ट वादी पर्यावरनी ए सत्ते है, जिसे एक लोग कता के आवरन में चपाकर पेष किया गया है. बिलकु. तो बवादी प्र्यावरनी या सत्ते है, जिसे एक लोग कता के आवरन में चिपाकर पेष किया गया है. बलकुल. लिकिन मैं यहां थोडा अलग नजरया रकना चाहूंगी. जरा सोची ए, क्या हमारी आदूनिक दुन्या भी तीक अजा ही नहीं कर रही है? कैसे? अगनी गलतियों और अपने कच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्� उगोकलों के जरहे यहां आँसकते हैं यहें लेकिन अगर किसी को वापिस अपनी जन्या में जाना हो तो उसके लिए आख की पुतली और आंगुटे के निशान यानी कोरनिया और फिंग प्रिंट लेकिणिशन की जरुद रहती है आच्छा बायो मेट्रिक्स जब मैंने ये पड़ा तो मुझे लगा ये सर्फ कॉई जादूई पोटल नहीं है ये तो एक अत्यदिक सुरक्षित अंप्राष्ट्री हवाई दे के अमग्रेशन सिस्टम जैसा है ताकि, एश्या के पोटल से आया वक्ती गल्ती से अफ्रीका के दर्वाजे से बहारना निकल जाए. अपका ये एप एमिग्रेशन वाला उदारन बहुर थीक है, लिक येन मैं ये से एक कदम और आगे ले जाना चाहूंगी. वो कैसे? ये स्र्फ एक एक एम्मेग्रेश्ट्सिस्तम नहीं है ये एक बायो लोगिकल फायर वाल है जैसे उ, हम अपने कम्ठुटर में अंटीवाईरिस डालते है ताकि कोई बाहरी या अनदिक्रिट स्व्फ्ट्वर हमारे सिस्तम को खराब नकर दे राए एक दम तीक वैसे ये बायोमेट्रिक निकास प्रनाली सुनिष्चित कर रही है, कि इस पूरी तरह से निंद्रित क्रित्रिम एको सिस्टम में, कोई भी प्राक्रितिक या आप्रत्याशि तत्व ग़बबडी नपहला सके. बाप्रे ये तो बहुत इतग्डा सिस्टम है. आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� � पूरी तरा से खत्म होचका है वो किसी को दस नहीं सकता साथी, अज्ट्रेलिया का हमेशा हसने वाला कुका बुरा पकषी भी वहाँ है लेकिन, वो भी अब यिनसानो कितरा बात कर रहे है सुनकर एक पल किले लकता है कि वाँ कितनी शानतिपोब दूनिया है उगर आप एक जीव का बगाद नहीं सकता, सब सुब सुवषित है. देखने में ये एक आदर्ष और अहिंसक समाच लकता है. शाएद खोई तर्खबी दे की रानी की एक महान उपलबदी है. एक आसी दुन्या जहां कोई हिंसा नहीं, कोई खत्रा नहीं. उपर से तो एसा ही लकते है लेकिन जरा गेहराई से सुच्छीए एक मामबा साप बिना अपने जेहर के क्या है उसका जेहर ही, उसका विकास, उसका प्रक्रितिक अस्तित्व है बलकुल सही बात है अगर आप एक जीव का मूल स्वबहाउ चीन लेते है उसे इंसानो कितरा सोचने पर मजबोर कर देते हैं तो ये शानती नहीं हैं तो ये क्या है? ये प्रक्रती की एक तरह की लोबोटमी है जहां एक थोपे गय निंट्रन के तहत सब को एक ही साचे में ड़ाल दिया गया है वो में ये तो सच में रोंटे कड़े कर देने वाला विचार है मतलब आप पुरी तरा सुरक्षित तो है लेकिन आप असल में आप ही नहीं है आपका वजुध मिता दिया डया है एक दम और निंट्रन का ये अंदादूंदर दाचा वहांके शेहरों की बसाववट में भी बहुत साव जलकता है. वो पूरा परी लोग सात आंदर दनूशी रंगो की कतारो में बतावा है. सात रंगो में? राँ, सब कुछ एक दम सलीके से जैमितिय रूप से विवस्तित. बेगनी रंग वेग्यानिको के लिए आरक्षित है, गेरा नीला रंग सेना के लिए है। वडल पूरा मिलिट्री योर खलास वाला सिस्टम. बलकल. और नीले रंग के लाके में स्कूल और विष्व विद्ध्याल है, हरा रंग पोदो पर शोद करने के लिए है, पीला रंग समानो के अस्पताल और शोद के लिए और गेरा लाल रंग वहां के निवासियों के गरों के लिए तटी की आगया है रंगों का ये सक्त बत्वारा एक बेहत कथोर नोकर शाही यहनी एक पूँन सथ्टावादी वेविस्ता कुदरषाता है आप ख़ब इस बगर दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा दीगा � और उस महीला का नाम सूने, यूनिकोन 999995745 आरे बाप रे मदलब यूनिकोन के बाद स्रिफ नमबर? आर वो महीला आस्ठा को बताती है कि खोखल चे गिरने वाले रहर जीव का लेकोड तुरन्त बागनी लआप के जर्ये रानी तक पहुट चाता है बतलग जबखते ही सिस्तम को पता चल जाता है कि कोन आया है बलकल और ये नाम यूनिकोन और नमबर कोई पहचान नहीं, कोई परिवार का नाम नहीं बस एक देटा पोईंट और यही पर हमें कहानी के शिर्वात में बताए गय उस अक्षर मुट्धी वाद को वापस याद करना च़िये. हाँ वो दादी और बच्छे वाद. दादी जब बच्छे के हाद पर अक्षर गर रेए थी तो वो एक पहचान एक अनसानी गर्माहत का प्रितिक ता. अगर यहां यहां पहचान के नाम पर स्रफ एक लंभी सी संख्या है एक दम सही तुलना है यह नाम करन प्रनाली व्यक्ती की निज्टा को उसकी आत्मा को पुरी तरह से कुचल देती है जब हर गत्विदिए पर, हर सांस पर नजज़ रख्छी जारी हो तो वहां स्वतन्त्रता का ब्रम तो हो सकता है लेकिन आस्ली आजादी नहीं होती बलक्ल आस्ली आजादी तो बहुत दूर की बाते है वहां तो प्रक्रती भी आजाद नहीं है पुरी कहनी पडतेवाग जो बात मुज अंदर तक परशान कर रही थी वो ये ती के वहां हवा का एक प्राक्रतिक जोंका तक नहीं है हवा भी क्रित्रिम है हाँ कहानी में साफ बताया आगया है के केवल हरी लब में विषेश तुबों के जर ये हवाज छोडी जाती है और वो बी सर्फ इस लिए ताकि वाई पोड़ों पर जो शोद होगा है उसकी पत्तिया हिल सकें बाकी पुरे लोक में कही कोई हवानी है ए तो बहुती गुटन बरा माहाल है जब मैंने ये पडा तो मैं सोचने लगा क्या ये वाखे वो खुबसुरत परी लोक है जिसकी कहानिया दादी नानी सूनाती है मुझे तु ये एक हाईटेक दिस्टोप्यन जेल लगी जहाई प्राक्रतिक सुन्दरता बस एक निरजीव तस्वीर बन कर रहागे है जिस में जान फुकने के ले भी मशीनो का बतन दबाना परता है एक दम सही का अप बलकुल सही दिशा में सुच रहे हैं. और इसी लिए कहानी का क्लाईमाक्स, यानी कहानी का सब से बड़ा और चोकाने वाला रहें स्या, उ इसी क्रित्रम्ता के खिलाग एक जोड़ार तमाचा है. आचा, क्लाईमाक्स में क्या होता है? एक आजी गटना गटी है, जु रानी के पूरे आजेय नियन्त्रन को चुनाती देती है. और वो है चलने वाले पेडों की बगावत. चलने वाले पेड? मतल पेडों अपनी ज़ने जमीन से निकालनी है, और वो सच में चलने लगे? हा! उसी हरी लब में, जहां टुबो से हवाच रोग जाती थी और पबडों पर शोद होता था वहां कुछ पेडों एक इसी टरह चलना सीक लिया औरे वाख लेकिन यहां सब से महत्वोपोण बात यह नहीं के वो चलने लगें बलकी ये है की चलने के बाद उने वो ने क्या किया? वो पेड इस क्रित्रिम सुरक्षिद, रंग भिरंगी और सर्विलन्स से गिरी दुन्या से बाग निकलें. और वो बाखकर कहांगे? वो उस विशाल उत्तरी दिवार को पार करके उस अंदेरे, जेहरीले और कुडे वाले रेगिस्तान की तरफ चले गय. क्या बात कर है? ये बात किसी के भी दिमाग को सुन्न कर सकती है. मतलब एक अजी जगग, जगा क्रित्रिम हवा है, कोई भीमारी नहीं है. पूरी तरह सुवक्षित महाल है, वहाहासे पेड जो सद्धियो तक एकी जगा कड़े रहने कि जाने जाते हैं, वो खुद बाग रहें. बिलकुल. और वो भी एक दम्तिंग क्राून की तरव. यह यह यह पूरी कहानी का सबसे गेरा और दाशनिक अर्थ है. यह इस बात का प्रतीक है, कि जीवन और प्रक्रती को आप कभी भी पुरी तरा से निंद्रत नहीं कर सकते. जीवन अपनी रहा कोजी लेता है. आप, जीवन अपनी आजादी कोजी लेता है. उन पेडों के लिए वो खुपसुरत रंग भिरंगा परी लोक एक दमगोटू जेल बन चुका था एक जीवन्त पेड के लिए एक जेह्रीला कूडे का देर उस सुरक्षिद जेल से कही जाडा बहतर है कुकी उस कूडे के देर में कम से कम वे अपनी मरजी से उग तो सकते है, अपनी मरजी से जी तो सकते है. प्रक्रती का विद्रोज. हाँ? प्रक्रती उस पोण नियंतरन उस क्रित्रिम विवस्था के खिलाद अपना अनतिम विद्रोज कर रही है. वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� अगर भी अपनी दुन्या के हकीकत बनती जारे है? इक दम सही निशकर्ष है इस कहानी ने बहुत्ये खुबसुर्टी से यह स्थापिट किया है कि जब हम तकनीक के जर यह सब कुछ निंद्रित करने की रहार खट्रे को कहत्न करने की कोशिष करते है तो अम अंजाने में जीवन की मुल आत्मा को ही मार देते हैं आँ... प्रक्रुतिक चीजें क्यों खतम हो जाती है प्रक्रुतिक दुन्या की अनिष्चित्ता, उसका खत्रा और उसका बेतर तीब हूना ही, उसकी अस्ली सुन्दरता है पून सुरक्षा की कीमत अगर पून गुलामी है, तो प्रक्रती हमेशा गुलामी के खब बगाववत करेगी. और ग्यान को साहित्ते को इस तरह की गेराई में जाकर देखना, सच्में हमारे नजरये को बहुत व्यापक बना देता है. रँग भी रगे गर कितने जादूई है लेकिन अंतक आते आते आते उस जादूगे पीछे का तकनी की और दिस्टोप्यन काला सथ सामने आजाता है बिलकुल जो चीजे बाहर से बहुत सुरक्षित विवस्तित दिक्ती है वे अन्दर से उतनी खोख्ली हूँ सकती है अब इस चर्चा के अन्त में एक अईसा विचार जो मुझे इस कहानी को पडने के बाद से लगा तार जगजोर रहा है, वो में यां चोरना चाहूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� तो तो तो बग़ादी की कीमड दूनिया की सब से खुबसुरत तो सुरक्षित कैद से भी बहुत जादा है। ये एक बहुत यी गहरा सवाल है। तब हैं कि आज भी चर्चा को यही विराम देते हैं तबही की अस्ली शुर्वात है? इसी विचारो तेजक सवाल के साथ आज की चर्चा को यही विराम देते हैं सुचने के लिए सच में बहुत कुच है