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वेद_आ_विद्यापतिक_साहित्यिक_अपहरणक_कथा.m4a
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- 0:00–0:11आँ, कल्पना करू जे आहाक गाएक चोपाल पर एक टा क्रान्तिकारी कविच्छती, जे मतलब गरीब, विस्ठापेत आ आम लोकक दुख दर्ध पर गीत लिखाएट चती.
- 0:11–0:14आँ, जेक्रा लोक कुब गवेट अछी.
- 0:14–0:18उगदम लोक उनका गववेत अची उनकर बाज सजुड़े तची
- 0:18–0:21मुदा कविक मरत्तिव किछु सताब्दी बाद
- 0:21–0:23किछु सक्तिषाली लोक आवेच्छती
- 0:23–0:26आँ उनका राज दर्बारक पूशाक पैरा देच्छती
- 0:26–0:28माथ पर पाग रखे देच्छती
- 0:28–0:32अदून्या के कवछत्ति जे एददरबारी कविछलाए
- 0:32–0:37बाप्रे मने हुंकर विद्रोही कविता के राजबभक्तिग जीट बना देल जाईतची
- 0:37–0:41बलकुड, सुन्मे ये कुनो सुन्माक कथा लगे तचीने
- 0:41–0:44मुता की इसमबववची जे इतिहास में
- 0:44–0:46इस कुनो एक ता कविख संगनाई
- 0:46–0:49बलकी समपुन साहित्तिक परमपराख संबहलोया
- 0:49–0:51आई हमर एही विस्त्रिच चर्चा
- 0:51–0:53बडलब जगर हम सब दीभ डाईव कहे ची
- 0:53–0:57उईही साहितिक अपाहरनक गता आची
- 0:57–1:05आई आई जे परिद्रिष्या हा रक्लों ने वास्तम में साहित यक सबसे गंभीर डुखध यातार थाचे.
- 1:05–1:14आई हम्रा सबक सुज्या गजंद्र ताकर दवारा संपादित इपत्रिका विदे है के पितारा सलेल गेल मेठली समिक्षा शास्त्र अची.
- 1:14–1:16बाग्दू चैई नेखी
- 1:16–1:17आब भाग्दू
- 1:17–1:20आई कोनो समान ने समिक्शा ने आज
- 1:20–1:22ये येगटा बहुत गंभीर अनवेशन आची
- 1:22–1:25जे कोना प्राचीन कालक वेद सा लाग का
- 1:25–1:27मद्धे कालक कवी विद्द्यापती
- 1:27–1:30अफेर आदूनिक मेठली साहेतिदरी
- 1:30–1:35जे मुल पात है था था क्रा गलत अनुवाद समपाद किये अग्यानता
- 1:35–1:38और सांस्क्रितिक पुर्वाग्रह के कारने विक्रित कल गेल
- 1:38–1:41मतलब जे यदार्त शल तक्रा मरोडी दिल गेल
- 1:41–1:45इक दम, इश्रोत गरन्त एही बातक शल्ले चिकिच्सा करईता ची,
- 1:45–1:50जे हम जे साहित दे पडी रहल ची, वो कर सत्ते के कोना बडलल गेल.
- 1:50–1:53ता हमरा सब के श्रोता जे आएजे सोषल मीट्या पर,
- 1:53–1:56मतलब अंटरनेट पर दिन रात इपोस चब देखाएचतें,
- 1:56–2:01जे प्लाना प्राचीन ग्रन्त में इलिखिलची वा उलिखिलची
- 2:01–2:04वूनका लेल इचर्चा बहुत आख खुलने हारेतने
- 2:04–2:08आग टा आए क्या क्या लेलोक मुल पोठी नहीं पड़ेच छती
- 2:08–2:13जे अग अग विश्टक्रा अंपिम सत्ति मानी लएच छती
- 2:13–2:18बिल्कुल, ता आगा बड़ाय ची अ सब सा पहने चर्चा करे ची उ गरन्त का
- 2:18–2:21जगर सब सा भेसी गलड्ध्धाम सा प्रस्थुत के लेगे लाचा.
- 2:21–2:22वेद
- 2:22–2:25आखसर समाज में इदूस प्रचारित है,
- 2:25–2:30जे वेद में शुद्र आस्ट्रीक बह्यंकर अप्मान कहल गेल आची.
- 2:30–2:34मुदा इस समिक्षा शास्ट्र जे तत्ये सोजा रखाई तची,
- 2:34–2:37उता उता एक दोसर गब कही रहा लची.
- 2:37–2:43सत्ये कहलू, श्रोत ग्रन्त्ख लेकख एता बहुत सपष्ट प्रमान देच थी.
- 2:43–2:46जे जगन हम मुल वेदक मन्त्र पड़ट थी
- 2:46–2:49तव यतारत एक दम भिन्न लगगता थी
- 2:49–2:51तव मुल मन्त्र की कहे तची
- 2:51–2:53इपोती तरक रखगते री
- 2:53–2:56जे वेदक सन्देश अत्यंत समावेशी चल
- 2:56–2:58मदलप उदारनक लेल
- 2:58–3:01शुक्ल याजुर वेदक अद्याय छब्विस मंत्र दूई
- 3:01–3:03सपष्ट रूपा से कही तची
- 3:03–3:06जी वेदक यी कल्यान कारी वानी सबबखलेल आची
- 3:06–3:09सबबखलिल, मैंने कोनो भेद भाँ नहीं?
- 3:09–3:10कोनो भेद भाँ नहीं
- 3:10–3:20औई में सपष्ट लिखालाच, जे ईवानी, ब्रहम्माड, चत्रिया, वेश्या, शुद्र, आर्या, आए एतेदरी की अपरिचित लोकखलिल से हो आच.
- 3:20–3:26रूकु, अपरिचित लोककलेल से हो, इत बहुत गंभीर विरोदा बास अचे?
- 3:26–3:28आई, एक दंविरोदा बास अचे.
- 3:28–3:33जत समाज में एक दाबाश्चे इचली रहलाच जे वेद के श्रमन मात्र से,
- 3:33–3:36शुद्रक कान में सीसा दारबाक नीम चल,
- 3:36–3:41उत्तम् मुल्वेद स्वेम कही रहलाच जे इवानी सुद्रक लेल से हो आचे
- 3:41–3:44की इमात्र एक ठामक उलेक आचे?
- 3:44–3:47ने-ने, इखेवल एक ठाम नहें आचे
- 3:47–3:50विदेहेक एह समिक्षा सास्त्र में
- 3:50–3:53अत्र्व वेदक एक ता मंत्र क से हु संदर बदे ले लाची
- 3:53–3:56अठर्ववेद 1932.8
- 3:56–4:00जता बाकाईदा इप राथना केल गेल आची
- 4:00–4:08जे एईश्वर, हमरा ब्राहमन, क्षत्रिय, वेश्ष, शुद्र, सबहक प्रियबनाओ
- 4:08–4:11बाप्रे, तबहेर, इईब्रम कोनो पस्रल
- 4:11–4:18अखन एता एक ता सब सब पैग ब्रामक व्याख्या के चर्चा करब आवश्षक अची, जे सदिकन देल जाईता ची.
- 4:18–4:21उआख्छी पूरुश सुक्त का व्याख्या.
- 4:21–4:26आख्छा उवला जत कहल जाईता ची जे सुद्रक उपत्ती पैर सब हिल.
- 4:26–4:30अग्सर इखहे का अप्मानित केल जायता ची
- 4:30–4:35जे शुद्रक उप्त्ती पूरुश सुक्त में पैर सब धावल गेल अची
- 4:35–4:39अपैरक अप्त्त नीचा देख्ध वा अचुथ होनाय
- 4:39–4:41मुदा इदद अप्त्त का अनर्त भिल लागे टची
- 4:41–4:44वहामर जे स्रोत अचे उई एस पष्ट करे तचे
- 4:44–4:47जे शरीरक रचनात्मक उपमा में
- 4:47–4:50पैरस उद्पतिक अप्मान नहीं जे
- 4:50–4:51भिलकुल नहीं आची
- 4:51–4:54जब हम शरीर विग्यानक द्श्टिसा देखी
- 4:54–4:56तम दल पैर कुनो भी शरीर का आदार होगी तचे
- 4:56–4:59यह समपुर्न शरीर कबारवहन करे तची
- 4:59–5:01एक दम सतीक बात कहलुवा
- 5:01–5:04ताके एकर अर्थ इनहोवेल
- 5:04–5:08जे शुद्र के समाज्रूपी शरीर कबारवहन करे वाला
- 5:08–5:11आदार आपालकरूप में वरनित कहल गेल चल
- 5:11–5:15स्रूत टीक एही तरक के स्तापित करे तची
- 5:15–5:22पैर वन्चित नहीं आची, उतो गती इस्तिरता अ समपोझ समाजिक दाचा के बार उठाईबा कप्रतिक है.
- 5:22–5:28मुदा आब ये तए गमभीर प्रष्नो उठाईत ची जे जे मुल मन्त्र एटिक समावेशी चल.
- 5:28–5:34आप बुज़ेई ची विदेः पत्रिकाक एही समिक्षा शास्त्र में एकर दूता मुख्य कारन बतावल गेल आची.
- 5:34–5:40पहिल कारनक रूप में लेक्हक इदाभी करेत चतिन जे ज्यान पर एक आदिकार रक्वाक लेल मनूस्म्रती जका परवरती ग्रन्त सबक रच्नाभेल.
- 5:58–6:03अपन समाजिक वर्चस्व बने बाकलेल वेदक मुल वर्द्ध के मरोडल नी
- 6:03–6:07इतो वहना भेल, जेना कोनो बहुत नीक काजक चस्मा होया
- 6:07–6:10जक्रासन दुन्या स्पष्ट दिखाईत होया
- 6:10–6:12आप, मुदा अकर बाद
- 6:12–6:15उए उई दूरी के ही द्रिष्ष बूजी लेत अची
- 6:15–6:19परवर्ती व्याख्या कारक जे पूवाग्र हची
- 6:19–6:21उवास्तो मे उदूरी अची
- 6:21–6:22इक दम सही उपुमा आची
- 6:22–6:24मुदा आहा कहलू हूँ
- 6:24–6:27जे दूटा कारनाच, दोसर कारन की आच
- 6:27–6:28दोसर कारन की चल
- 6:28–6:32तो सर कारना ची पश्चिमी विद्वान लोकनिक अनुवाद
- 6:32–6:35जे पाश्चात्ते विद्वान भारत आयल चला
- 6:35–6:38उसब अपन अपनी वेशिक मान्सिक्ता कारने
- 6:38–6:41वेदक बहुत रास गलत अनुवाद केलनी
- 6:41–6:41अच्छा
- 6:41–6:45स्रोथ में, एक ता बहुत सचक्त उदारन देल गेल अचे.
- 6:45–6:48पीशल नामक एक ता पाश्चात्ते विद्वान चला.
- 6:48–6:52उ योश शब्द का अनुवाद की केलनी, इजान अब बहुत महत्वपुरन अचे.
- 6:52–6:55आ, योश शबद का वास्तविक अर्ठता,
- 6:55–6:58ज़हां तक हम जानेक ची यूटी होई तची
- 6:58–6:59सथ ते कहलू हूँ
- 6:59–7:02यूटी मुदा पिषल एकर अनुवाद
- 7:02–7:05वेश्या या दास कन्या कही के दादेलनी
- 7:05–7:08बापरे, एक ता सामान ने यूटी के वेश्या
- 7:08–7:10या दास कन्या बनादिप
- 7:10–7:13इतक अते कपएएख शाब्दिक हिन्सा आची
- 7:13–7:17इक्दम, आप सोचु एकर पाच्धा की मान्सिक्ता भहसकईत आची
- 7:17–7:21कोनो विद्वान जानी भुजका एतेख पैक भूल कियक करत
- 7:21–7:24रहा, इस कोनो भूलत नहीं लागी रहा लगी रहा लगी
- 7:24–7:29शोद ग्रन्त्ख्जे विवेच्ना आची अकर अनुसार ये कोनो भूल नहीं चल.
- 7:29–7:33ब्रितिष साम्राज्जे के बारत पर अपना शासन के नयाय संगत ठह्राब लेल
- 7:33–7:39यी दिखाए ब आवश्षक चल जे प्राचीन भार्तिय समाज नयतिक रूप सब पतन का गर्त मे चल.
- 7:39–7:47अहो, तजगा उ वेद में वेश्या वा दास कन्याजगा का शब्द क प्रछुट्ता देखाभे में सबल भाजाईच्चती.
- 7:47–7:52तवनका लेल एई सिद्गर अप सहच भाजाईट ची जे भार्तिय लोक असब्भ्यच्छला
- 7:52–7:55आँ उनका सब्व्य बनवाक लेल ब्रितिष शासनक आवश्व्टा चे
- 7:55–7:59तक भाग आप आची, जे ईग कुन भाशिक अग्यान्ता नहीं
- 7:59–8:03बलकी एक ता सु विचारित राजनी तिखष्शर्यंट्र चल
- 8:03–8:07बहरक लोक आपनी वेशिक मान्सिक्ता से अनुवाद के लहन
- 8:07–8:11अब भीत्रक किछ वर्ग आपन वर्चस्व बनाय वाले लिटी का लेक लहन.
- 8:11–8:13एक बम सही पकल लो आहा.
- 8:13–8:17मुदा इतब हिल प्राषीन ग्रन्तक बाह्यविरुपन,
- 8:17–8:21जगन इस संसक्रितिक अपहरन आपन समाजक भीतर होई तचे,
- 8:21–8:22तखन की होई तचे.
- 8:22–8:24अदजन खदरनाख होई तचे
- 8:24–8:26आई यी हम्रा सब के
- 8:26–8:28उई बिन्दू पर लड़ जाए तची
- 8:28–8:30जे हमर ही साब सं
- 8:30–8:33एश्रोट ग्रन्तक सबसा चौब्साच्वे वाला ही साच्चे
- 8:33–8:35मद्ध्खालीन मैठिली साहित कषवसे पएई गस्तमब
- 8:35–8:42अद्द्यकालीन मैठिली साहित कर सबसे पएी गस्तम्प बिद्यपती से जुडल विवाद
- 8:42–8:47राज पन्दित शब्दक नहीं बलकी कवीक पहचान का अपहरनक मुद्दा चे
- 8:47–8:49तस्रोथ की कहे कची बिद्यपतिक विषे में?
- 8:49–8:55एत आबिका इसमिक्षा शास्त्र एक ता बहुत पातर पोरु दावी करेता चे
- 8:55–8:58स्रोत में इगंबिर प्रशन उठावल गेल आचे
- 8:58–9:00जे पदावली लिखनिहार विद्यापती
- 9:01–9:03और संस्क्रित वा अवहत लिखनिहार
- 9:03–9:05राज पनदित विद्यापती तख्कुर
- 9:05–9:07वास्ताव में एके व्यक्ती छिला?
- 9:07–9:08रूको रूको
- 9:08–9:10एक रनीग जक्या समज्बाक आवष्च्ताचे
- 9:10–9:12पदावलीग विद्यापती
- 9:12–9:14जे सर्व भाहाराग
- 9:14–9:16आम लोकक पीना कवी च्ती
- 9:16–9:18जे प्या दे सांतर
- 9:18–9:20जेसा गीत लिखच्ती
- 9:20–9:22जता प्रवासक, गरीबीक
- 9:22–9:27अदो सर्दीज राज पन्दिद भिद्धापती जे पाग पहरे चला,
- 9:27–9:29जे संस्क्रित में ग्रन्त लिखच्छला,
- 9:29–9:33आम उसल्मानी आक्रमन्सा मंदिर्वा जनो ब्रष्टेवाक छिन्ता करे चला.
- 9:33–9:35बलक्ल, तुनु एक दम अलकु.
- 9:35–9:38मुदा की, इस समबव नहीं आची,
- 9:52–9:55जेना कविक बहुमुखी प्रतिबा होई तचीने?
- 9:55–9:57आहां की प्रशना स्वाभविक अची
- 9:57–10:00और बहुत लोग यी तरक दाए चतिन
- 10:00–10:04मुदा हमर जे स्रोट आचे उएकर बहुत तारकि क्हन्दन कर अच्छती
- 10:04–10:05अच्छा कोना?
- 10:05–10:11समिक्षा शास्त्रक लेक्खक दियानाक्रिष्ट करेच्ट ही जै जै तोनो एक यह व्यक्ती चला,
- 10:11–10:15तदूनो साहित्तमे एक तुस्रक संदर्भ कियाक नहीं आच्छी.
- 10:15–10:18अहो! मने क्रोस रेफ्रन्स नहीं आच्छी.
- 10:18–10:25इक्दम नहीं, पदावली में कतो कविक संस्क्रित वा अबहत्ख महान विद्वान हेबा कोनो दंबवा उल्लेक नहीं आची.
- 10:25–10:34संगे संस्क्रित गरन्ठा में कतो ईईओलेक नहीं आची, जे ओही कविकें मेचली पदावली लिखबा कारेने कोनो ख्याती बेटल आची.
- 10:34–10:36ये तज्द तश्चने नहीं चलों
- 10:36–10:38स्रोत शपष्ट करे तच्ची
- 10:38–10:40जे ये दुनो एक्दम समनान्तर परम्परा च्चती
- 10:40–10:42जे कर आपस में कोनो मेल नहीं आच्ची
- 10:42–10:44तक्की एकर ताद्पर्या ये आच्ची
- 10:44–10:46जे पदावली लिखनी हार विद्यापती
- 10:46–10:50अद्री लिखनी हार विद्यापती कोनो दोसर लोग कवी चला?
- 10:50–10:53स्रोथ ग्रन्त टीक एही दिश इशारा करईत अची
- 10:54–11:02लेक्हकक दावी अची जे पदावलिक परमपरा समबवता हा गेर ब्राम्हड वर्गक लोक परमपरा से जोडल चल
- 11:02–11:07समबवता भावर जातिसा, जकर चर्चा एही पोती में अची.
- 11:07–11:10मुदा फिर इसब एक कोना बहुगेल
- 11:10–11:14जक्हन बंगाल में विद्यापतिक पडावली बहुत लोक प्रिएबहेल,
- 11:14–11:17उते वैश्णो परमपरा में हुंका भजेबाक लागल,
- 11:17–11:21तक्हन बंगालक लोग उनका बंगाली माना लागल चला
- 11:21–11:25एही पर मित्लाक, भबुान वा ब्रामबर्ग द्वारा
- 11:25–11:28आनन्फानन में पंजिक विवरन निकाली का
- 11:28–11:31उक्रा संस्क्रत के गरन्त लिखनी हा राज पनदित विद्ध्या पती से
- 11:31–11:33जोड दिलगेल.
- 11:33–11:35तकि हुंका मेठिल सिद्ध्यकेल जासकेई
- 11:35–11:36एक्दम
- 11:36–11:39माने एक्टा लोक परमपरा के कवी के
- 11:39–11:42दर्बारी परमपरा में बान्दि दिलगेल
- 11:42–11:46जग्रा समाश शास्त्र में सांस्क्रितिक अपहरन कहल जायता ची
- 11:46–11:48इत अगर सीथा सीथाउदाहरन भेल
- 11:48–11:53उनका मात पर पाग पहराय का हम्मर विद्ध्यापती बना लेल गेल
- 11:53–11:57अ, मुदा इस्सा जे नुक्सान भेल उ बहत पेग आची
- 11:57–11:58की नुक्सान भेल
- 11:58–12:01नुक्सान इभेल जे लोग चेतना कवी के
- 12:01–12:04राज दर्बार के परिदी में बानी का
- 12:04–12:07अकर विद्रोही स्वर के कुंद कदेल गिलन
- 12:07–12:10जक्हन आहा कवी के अपनें उच्वर्ग
- 12:10–12:13वा दर्बारी परमपराक मानी लेच्छी
- 12:13–12:16तक्हन आहा अकर उही रच्ना सब के
- 12:16–12:18नजर अंदाज कदेची
- 12:18–12:21जे गरीभ कर सर्व हाराक दुक दर्द बयाबा करे थच्छी
- 12:21–12:35सत्ते कहलो, संसक्रतक विद्यापती मुसल्मानी आक्रमनस जनो आमन्दिर ब्रस्ट रबाक छिन्ता मेच अती, जकन की पदावलिक विद्यापती स्त्रीक विरह, गाम अगरी दी अप्रवासक पीडा लिक रहलाची.
- 12:35–12:44श्रोथ ग्रन्त कनुसार इदूनु कद्र चरोकार एक दंभें न ची, अएक रा एक कदे मेठलिक मुल आत्माक संण अन्याई चल.
- 12:44–12:50बाप्रे, इत बहल कविक पहिचानक अपहरन, मुदा जता हम आगा बडी रहल ची,
- 12:50–12:55उता हम्रा ही साथ साबक, सहित्तेकार, अ सम्पादक लोकनी के लेल,
- 12:55–12:58एक तब हुट पाटक संद्रचना के नष्ट कदेएक्षती.
- 12:58–12:59अच्ण्द वाला प्रक्रण.
- 12:59–13:00भिल्कुल.
- 13:00–13:03विदेज के एही समविक्षा शास्त्र में चर्चा आचे,
- 13:03–13:05जे कोना आदूनिक समपादक लोकनी
- 13:05–13:09अग्यान्ता वश मूल पातक सन्दचना के नष्ट कदेईच्छती
- 13:09–13:13ये प्रसंग चे कवी लाल्दास का मित्ला रामायन का
- 13:13–13:15ये बहुत तकनी की
- 13:15–13:17मुदा साहित्तिक द्रुष्टी सां
- 13:17–13:19अथ्यन्त महत्पूरन बिन्दू अची
- 13:19–13:24लाल्दास आपन मित्लारामायन में कुंदलिया चंदक प्रेउक केने चतिन
- 13:24–13:31जे लोग चंद शास्त्र नहीं जाने च्चतिन उनकाले ल बतादी जे कुंदलिया एक ता जटिल मात्रिक चंद चंद ची
- 13:31–13:34इदोहा औरोलाक मिष्रन होईता ची
- 13:34–13:40अग, और हम्रा जतादरी मों आची, एकर नियम बहुत कठोर होई तची,
- 13:40–13:43कुंडलिया माने कुंडल या गेरा, नहीं?
- 13:43–13:47सत्य कहलू, एकर नियम आची, जे दोहाक प्रत्हम शब्द,
- 13:47–13:51और रोलाक अंतिम शब्द एक्दम एके होई तची,
- 13:51–13:54जक्रा साए एक टक्चक्र वा कुंडल बनाईताची
- 13:54–13:58संगे मात्रा में रस्स्व अदीर्ग
- 13:58–14:02मतलब लगु अगु खुरू कदोर गनित्ये गडना होईताची
- 14:02–14:05एक ता निष्चित लैए होईताची
- 14:05–14:08जक्रा पर पुरा कविता आदारेत होईताची
- 14:08–14:10उदा स्रोथ गरन्त में इबतावल के लची
- 14:10–14:12जे मैठली अकाटमी
- 14:12–14:15अ साहित्तिया अकाटमीक जे नामी संपादक लोक्छला
- 14:15–14:16जेना राम्देव जा
- 14:17–14:18उवर्तनी के एक रूप
- 14:18–14:20अशुद्द करबाक फिरा में
- 14:20–14:23मात्राक उई गनितिय गनना के भिगारी दिल नहीं
- 14:23–14:28इत उहीना भेल जना कोनो अटिहासिक किला के सुन्दर बन्वाक लेल
- 14:28–14:33ओकर नक्काशीदार देवाल पर आदूनिक सिम्ट का प्लास्टर कदेल जाए.
- 14:33–14:35बह! की उप्मा दिल हूहा?
- 14:35–14:35अग!
- 14:35–14:38मतलब बहर से देख्वा में समपादक के लागेद
- 14:38–14:40जे दिवाल सम्तल अशुदद बहुगेल
- 14:40–14:44मुदा उकर अटिहासिक बनावेट उकर आत्मा
- 14:44–14:45तप प्लास्ट्रक नीच मरेगेल
- 14:46–14:48इछंद का हत्या कोना भेल
- 14:48–14:50उकर कोन उदारन अची स्रोथ में
- 14:50–14:51आठी आची ना
- 14:51–14:54स्रोथ गरन्त में एकर अस्पष्ट उदारन अची
- 14:54–14:57मूल पात में एक ता सब्द चल अगयाशिनी
- 14:57–14:59अच्छा अगयाशिनी
- 14:59–15:01संपादक लोकनी इसोचल ने
- 15:01–15:04जे मानक मेठली वा संसक्रत के शुद्टा के द्र्ष्टी से
- 15:04–15:07इश्ब्द अगनाशिनी हो वाग चाही
- 15:07–15:08मतलब पाप नाश करे वाली
- 15:08–15:12ता उ अगया शीनी के बदली को अगना शीनी को दलनी.
- 15:12–15:14मुदे एस दा मात्रा बदली गल है देक.
- 15:14–15:19इक दम जिना उशब्दक वर्तनी बदलनी उइ शब्दक मात्रा
- 15:19–15:23माने गुरु लगुक जे करम चल उबदली गल आपुरा चन्दो बहंग बहुगल.
- 15:23–15:29माने जे लैए दोहा से रोला मे जेबाक ले चाही चल, उ गनी तिया वजन तूती गेल?
- 15:29–15:31सपष्ट रूप सा.
- 15:31–15:35समिक चाश शास्ट्रेक लेखख एत इस थापित करिद चती,
- 15:35–15:39जिस सम्पादनक अर्थ, पूनर लेखन वा सुदार नही होईत ची.
- 15:39–15:41प्राचीन वा पारमपरिक पाटके,
- 15:41–15:45वोकर मोल ध्हन्यात्मक अ सन्चनात्मक रुप में
- 15:45–15:47सन्द्रक्ष्त करव कते क आवश्यक अची,
- 15:47–15:50इप्रसंग वोकर प्रत्ट्यक्ष प्रमान आची.
- 15:50–15:53भिल्कुल, जि सम्पादक के रथ भुजाएप जल,
- 15:53–15:57तो नीचा फुत नोड दसके चले, जे तहे कररत अगनाशीनी अची,
- 15:57–15:59मुदाहा कवी के मुल पाट से,
- 15:59–16:03उकर चंदग गनिट से चेर चारन नहीं का सके ची.
- 16:03–16:09आग्यानता वश समपादक लोकनें लालदासक पूरा महनत पर पानी प्हिरी दलनें.
- 16:09–16:16तप्राचीन गरन्त्ता कनुवाद से लोक्ड, विद्यापती के पहचान, आल लाल दास के चन्दक हत्या दरी.
- 16:16–16:20इस सब दे कहवैं तची, जि साहित सदेकन शक्तिषाली,
- 16:20–16:24वत अथा कतित विद्वान वर्क्के, रस्त चेप से जुज़ेद रहले ची.
- 16:24–16:29इक्दम, मुदा जकन हम विदेहे समिक्षा शाहित्रक अगिला क्ड में,
- 16:29–16:31आदूनिक मैठिली साहित्ते दिश देकाईची,
- 16:31–16:34तपरिब्रिष्ष बदलेई तनजर आवेचे.
- 16:34–16:34ओखना.
- 16:34–16:39लागे तची, जे आबक लेक्ख क्लोकने एह क्रित्रिमतास है,
- 16:39–16:42यह तोपल गेल शुद्ददा सब बहारावी रहल चाती.
- 16:42–16:46इविदेह समिक्षा शास्त्रक सबस आशावादी पक्षुची.
- 16:46–16:50लेक्खक अनुसार आदूनिक मेठिली साहित्ति में
- 16:50–16:53जे यतार्थवाद आस समाजिक विमर्ष आभी रहल चाय,
- 16:53–16:56उ वास्तव में उही समवनान्तर परमपरा कविस्तार अची
- 16:56–17:00जकर चर्चा विद्यापतिक पदावलिक संदरभ में भेलचल.
- 17:00–17:06माने आबक लेखख समाज कखु सत्तिके बिना कुनो लाग लपेट के
- 17:06–17:09बिना कुनो दरबारी अलंकार के सोजा राखी रहल चती.
- 17:09–17:17आँ, श्रोत में मुन्निकाम तक एक आंकी अच्छी जिन्दिगीक मोल का बहुत मारमिक चर्चा ची.
- 17:17–17:24जकन हम यी नाटक ककता सुनेट ची, तो लागगत अच्छे मेत्फिली साहित अब केवल गाम का चोपाल,
- 17:24–17:29नदिक किनारा मोँ पावन तिहार गीद दरे सीमित नहीं आची
- 17:29–17:32उतो विष्व व्यापी समस्यास लडी रहल चे
- 17:32–17:38एक दम, जिन्दिक मोल, मेटिकल माफिया अ फार्मस्टिकल भ्रष्टा चारपा एक ता करारा प्रहार आची
- 17:38–17:43एही नातक में, एक ता अटारा वरस्का गरीब यूवा आचे राम्रतन,
- 17:43–17:46जे रोजगार के लेल हिमाचल जाई तची.
- 17:46–17:49आर उत, दोक्त खुराना नामक एक ता पात्र आची,
- 17:49–17:54जे उक्रापर बिना जाने अवेद दवाएक परिक्षन करे चती.
- 17:54–18:00आ, आ, उही आवेद परिक्षनक कारन राम्रतनक म्रित्यो बहेजाई तचे
- 18:00–18:08श्रोत में इचर चाचे जे नाटक क सबसा सशक्त द्रिश तखन आवेट चे जखन कम्पनी का लोक
- 18:08–18:15राम्रतनक पिता भुखन के एक लाक तकक मोवजा दोका इमामला दबावा चाहते चे
- 18:15–18:18मुदा भूखन उ मुआवजा तूक्रादे चती
- 18:18–18:21भिल्कुल, उएग रही कही का तूक्रादे चती
- 18:21–18:27जे गरीब मनुश्षक देजानवर जका परिक्षने कले लिए नहीं आची
- 18:27–18:30बापरे, ये केवल एक ता पिता का विलाप नहीं आची
- 18:30–18:39समिक्षा शास्त्र का लेक्षार, इपूंजी वाद अब्रस्छ्ट्चिकित्सा विरुद्द्शोशित वर्ग का सशक्त विद्वोग का स्वर अच्छी.
- 18:39–18:42मुदा, एता हम एक ता प्रश्न कर चाहब.
- 18:42–18:43आग, कहु?
- 18:43–18:55के एही सव, साहित्ते का कलात्मकता नश्ट नहीं भाजाइत अची, की साहित्ते काज अची, की इव उई पागवाला एलीट परमपरासा, सीदा विद्रो हनही अची,
- 18:55–19:01जता साहित्ते केवल वाशा आब भद्र लोक का सुन्दर्य भोद्धरी सी मिच्छल.
- 19:01–19:03इप्रष्ट बहुत महत्वपुर्न अछी
- 19:03–19:07मुदा सोत ग्रन्त का लेक्ध, एक रा कलात्मक्ता का हरास नही,
- 19:07–19:11बलकी लोक चेतना का पुनर जाग्रन मानिच्छती.
- 19:11–19:14उनकर तर कछी, जे वास्तविक कला उव आछी,
- 19:14–19:16जे समाज के यतार्थ के प्रतिबिम्वित करे.
- 19:16–19:17अगो!
- 19:17–19:21गजद्र ताकुरक आपन उपन्यास सबख़ उदारन्सो
- 19:22–19:24एही तत्च्के पूष्ट करेता ची.
- 19:24–19:27हुंकर उपन्यास सहस्र भाडनी
- 19:28–19:32में दलित पात्र, जेना मुसहर, दोभी, दूसाद,
- 19:32–19:35किर जीवनेक जे सुख्श्म चित्रन आची,
- 19:35–19:43आँ उनीस्व सर्सट के अकालक जे राजनेतिक यादार्त अची उ मेतली सहित्ति में दुरलब चल.
- 19:43–19:49आँ, उनकर दोसर उपन्या सहस्र शीर्शा मेता कता आवर आगा बड़े ता अची नहीं की?
- 19:49–19:52एक दम, उही में एक दलीद गभईया चे,
- 19:52–20:00मोहन, जे सुचना के अदिकार, मतलब आर्टियाइक प्रयोग कई राजनेतिक चेतना जागभाईताची.
- 20:00–20:05माने, केवल रोना दोना नहीं, बलकी अदिकारक लेल कानूनी लडाई.
- 20:05–20:16आँ, इसब उदारन इदेखावाईत आची, जे नव लेखख यतार्ठ के क्रित्रिम भाशा वद्दरबारी परमपराग भोज्शा मुक्त कोर रहल चाती.
- 20:16–20:21इसाहित्य, समाज के ओही तल्ख यतार्त के हावास दो रहल अची,
- 20:21–20:26जेक्रा मुख्यदाराक पाग्वाला साहित्य अकसर नदरंदाज कर देच्छल.
- 20:26–20:34सत्ते कहल हूँ, अस्रोथ में, एक ता और बहुत सुन्दर अक्रान्तिकारी संग्रहक चर्चा ची, सजी आ रोपनी.
- 20:34–20:36आँ, लगु कत्ठा वाला
- 20:36–20:42आँ, दोक्ट प्रमोद कुमार दवारा सम्पादित ये फुट्टी तर भीहन कत्ठा लेक्खकक संग्रह आची
- 20:42–20:45भीहन कत्ठा मने बहुत चोट-चोट लगु कत्ठा
- 20:45–20:46जी भीजक समान होईता ची
- 20:46–20:50मुदा उही में पैंग गाज कक समभावना चिपल होईता ची
- 20:50–20:54आ ए संग्राक जी सबस पैग बाज स्रोत मेरेखंकित कहल गिल आची
- 20:54–20:57उई चे ही में फोटी खोट लेख्खमे से
- 20:57–20:59बीस गोट महिला लेखिका चाती
- 20:59–20:59बीस गोट?
- 20:59–21:00रहा!
- 21:00–21:01ये दब बहुत पधिग बात आची?
- 21:01–21:05एक दम जना मुन्नी कामत, आबाजा, रुभीजा
- 21:05–21:10मेतली साहित में आख्डा अपने आप में एक दब बआग समाजि करानती आची
- 21:10–21:14इद लेखि का सब केवल गर आंगन के गब नहीं लिखि रहाल ची थी
- 21:14–21:22इस संग्रा दिखावे तची जे भालश्वम, इस्त्रीवी मरश आप पर्यावरन्जका विषेप पर मेठली में कते गंभीर काज भार आची
- 21:22–21:27जेना उही में पोख्रीक सबहा नामक कताख चर्चा आची जे पर्यावरन्च नक्षन पर आची
- 21:27–21:33अब मेठली सबद्यक समाजक प्रतेक संगर्षके अपन शबद में उतारी रहा लाची
- 21:34–21:38तब समग्र रूप सजा हम विदे पत्रिकाक एह समएक्षा सास्त्र के देखी
- 21:38–21:41तई यस समपुन चर्चा हम्रा सब के यी दिखावे तची
- 21:41–21:45अगर बादग अग्यानतासा दूमिल केल जाईत रहलाच
- 21:45–21:51वेदक मंत्रस लोक विद्यापतिक पहचान, लाल दासक चंदक हत्या
- 21:51–21:54आमुन्नी काम तक यतार्ट्वादी नाटक दरी
- 21:54–21:59हम देखे ची जिश्व्द के बचायवाग, अग्यानतासा दूमिल केल जाईत रहलाच
- 21:59–22:08वेदक मन्त्रस लोकर विद्यापतिक पहचान, लाल दासक, चन्दक हत्या, आम मुन्नी काम तक यतार्त्वादी नातक दरी.
- 22:08–22:14हम देखे ची जी शब्द के बचायवाक अवक्रा मरोडबाक संगर्ष लगतार चली रहलाच.
- 22:14–22:24यही दीप डाईव सं इबात ते एक्दम स्पष्ट भगेल, जे हम जे कि चुप उत्ही में पड़ेच ची, उक्रा आग्मोन का अन्तिम सत्य न नाई मानी लेबाग चाही.
- 22:24–22:29उही चापिल शब्द क पाच्ठ से हो एक टा संगर्ष अचे, एक टा राजनीती एचे.
- 22:29–22:31ये उगडम सही
- 22:31–22:35जए इत्टिहास आजाइते लिखनी हार सदिक्हन सक्तिषाली वर्ग रहला ची
- 22:35–22:38तब इप प्रशन उप्वब बहुत प्रासंगिक अची
- 22:38–22:41जे आहा जे पडी रहल ची उखर स्रोथ की आचे
- 22:41–23:11अगा सब आपन गर का आलमारी में वा आपन काचक शोकेस में जे पोठी सजाकर आखने ची कि अखर अगर आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ
- 23:11–23:15अगिला बेर जक्फन कुनो प्राषीन पोठी, कुनो दार्मिग ग्रन्त,
- 23:15–23:18वन नव कविता पड़भ, तैई जरूर सोचब,
- 23:18–23:22जे इश्वद आहन्दरी पहुच्बाक लेल, केहन राजनेतिक,
- 23:22–23:25आस सांस्क्रितिक फिल्टर से गुज्रल अचे.
- 23:25–23:30अगी चश्मापलागल दूरीक है, सावकरभाक प्रयास जरूर करभ.
- 23:30–23:36एस सहित्तिक आसानस्क्रितिक अनवेशन में, हम्रा सब का संजुर बाकलेल, बहुत-बहुत दन्वाद.
Plain text
आँ, कल्पना करू जे आहाक गाएक चोपाल पर एक टा क्रान्तिकारी कविच्छती, जे मतलब गरीब, विस्ठापेत आ आम लोकक दुख दर्ध पर गीत लिखाएट चती. आँ, जेक्रा लोक कुब गवेट अछी. उगदम लोक उनका गववेत अची उनकर बाज सजुड़े तची मुदा कविक मरत्तिव किछु सताब्दी बाद किछु सक्तिषाली लोक आवेच्छती आँ उनका राज दर्बारक पूशाक पैरा देच्छती माथ पर पाग रखे देच्छती अदून्या के कवछत्ति जे एददरबारी कविछलाए बाप्रे मने हुंकर विद्रोही कविता के राजबभक्तिग जीट बना देल जाईतची बलकुड, सुन्मे ये कुनो सुन्माक कथा लगे तचीने मुता की इसमबववची जे इतिहास में इस कुनो एक ता कविख संगनाई बलकी समपुन साहित्तिक परमपराख संबहलोया आई हमर एही विस्त्रिच चर्चा बडलब जगर हम सब दीभ डाईव कहे ची उईही साहितिक अपाहरनक गता आची आई आई जे परिद्रिष्या हा रक्लों ने वास्तम में साहित यक सबसे गंभीर डुखध यातार थाचे. आई हम्रा सबक सुज्या गजंद्र ताकर दवारा संपादित इपत्रिका विदे है के पितारा सलेल गेल मेठली समिक्षा शास्त्र अची. बाग्दू चैई नेखी आब भाग्दू आई कोनो समान ने समिक्शा ने आज ये येगटा बहुत गंभीर अनवेशन आची जे कोना प्राचीन कालक वेद सा लाग का मद्धे कालक कवी विद्द्यापती अफेर आदूनिक मेठली साहेतिदरी जे मुल पात है था था क्रा गलत अनुवाद समपाद किये अग्यानता और सांस्क्रितिक पुर्वाग्रह के कारने विक्रित कल गेल मतलब जे यदार्त शल तक्रा मरोडी दिल गेल इक दम, इश्रोत गरन्त एही बातक शल्ले चिकिच्सा करईता ची, जे हम जे साहित दे पडी रहल ची, वो कर सत्ते के कोना बडलल गेल. ता हमरा सब के श्रोता जे आएजे सोषल मीट्या पर, मतलब अंटरनेट पर दिन रात इपोस चब देखाएचतें, जे प्लाना प्राचीन ग्रन्त में इलिखिलची वा उलिखिलची वूनका लेल इचर्चा बहुत आख खुलने हारेतने आग टा आए क्या क्या लेलोक मुल पोठी नहीं पड़ेच छती जे अग अग विश्टक्रा अंपिम सत्ति मानी लएच छती बिल्कुल, ता आगा बड़ाय ची अ सब सा पहने चर्चा करे ची उ गरन्त का जगर सब सा भेसी गलड्ध्धाम सा प्रस्थुत के लेगे लाचा. वेद आखसर समाज में इदूस प्रचारित है, जे वेद में शुद्र आस्ट्रीक बह्यंकर अप्मान कहल गेल आची. मुदा इस समिक्षा शास्ट्र जे तत्ये सोजा रखाई तची, उता उता एक दोसर गब कही रहा लची. सत्ये कहलू, श्रोत ग्रन्त्ख लेकख एता बहुत सपष्ट प्रमान देच थी. जे जगन हम मुल वेदक मन्त्र पड़ट थी तव यतारत एक दम भिन्न लगगता थी तव मुल मन्त्र की कहे तची इपोती तरक रखगते री जे वेदक सन्देश अत्यंत समावेशी चल मदलप उदारनक लेल शुक्ल याजुर वेदक अद्याय छब्विस मंत्र दूई सपष्ट रूपा से कही तची जी वेदक यी कल्यान कारी वानी सबबखलेल आची सबबखलिल, मैंने कोनो भेद भाँ नहीं? कोनो भेद भाँ नहीं औई में सपष्ट लिखालाच, जे ईवानी, ब्रहम्माड, चत्रिया, वेश्या, शुद्र, आर्या, आए एतेदरी की अपरिचित लोकखलिल से हो आच. रूकु, अपरिचित लोककलेल से हो, इत बहुत गंभीर विरोदा बास अचे? आई, एक दंविरोदा बास अचे. जत समाज में एक दाबाश्चे इचली रहलाच जे वेद के श्रमन मात्र से, शुद्रक कान में सीसा दारबाक नीम चल, उत्तम् मुल्वेद स्वेम कही रहलाच जे इवानी सुद्रक लेल से हो आचे की इमात्र एक ठामक उलेक आचे? ने-ने, इखेवल एक ठाम नहें आचे विदेहेक एह समिक्षा सास्त्र में अत्र्व वेदक एक ता मंत्र क से हु संदर बदे ले लाची अठर्ववेद 1932.8 जता बाकाईदा इप राथना केल गेल आची जे एईश्वर, हमरा ब्राहमन, क्षत्रिय, वेश्ष, शुद्र, सबहक प्रियबनाओ बाप्रे, तबहेर, इईब्रम कोनो पस्रल अखन एता एक ता सब सब पैग ब्रामक व्याख्या के चर्चा करब आवश्षक अची, जे सदिकन देल जाईता ची. उआख्छी पूरुश सुक्त का व्याख्या. आख्छा उवला जत कहल जाईता ची जे सुद्रक उपत्ती पैर सब हिल. अग्सर इखहे का अप्मानित केल जायता ची जे शुद्रक उप्त्ती पूरुश सुक्त में पैर सब धावल गेल अची अपैरक अप्त्त नीचा देख्ध वा अचुथ होनाय मुदा इदद अप्त्त का अनर्त भिल लागे टची वहामर जे स्रोत अचे उई एस पष्ट करे तचे जे शरीरक रचनात्मक उपमा में पैरस उद्पतिक अप्मान नहीं जे भिलकुल नहीं आची जब हम शरीर विग्यानक द्श्टिसा देखी तम दल पैर कुनो भी शरीर का आदार होगी तचे यह समपुर्न शरीर कबारवहन करे तची एक दम सतीक बात कहलुवा ताके एकर अर्थ इनहोवेल जे शुद्र के समाज्रूपी शरीर कबारवहन करे वाला आदार आपालकरूप में वरनित कहल गेल चल स्रूत टीक एही तरक के स्तापित करे तची पैर वन्चित नहीं आची, उतो गती इस्तिरता अ समपोझ समाजिक दाचा के बार उठाईबा कप्रतिक है. मुदा आब ये तए गमभीर प्रष्नो उठाईत ची जे जे मुल मन्त्र एटिक समावेशी चल. आप बुज़ेई ची विदेः पत्रिकाक एही समिक्षा शास्त्र में एकर दूता मुख्य कारन बतावल गेल आची. पहिल कारनक रूप में लेक्हक इदाभी करेत चतिन जे ज्यान पर एक आदिकार रक्वाक लेल मनूस्म्रती जका परवरती ग्रन्त सबक रच्नाभेल. अपन समाजिक वर्चस्व बने बाकलेल वेदक मुल वर्द्ध के मरोडल नी इतो वहना भेल, जेना कोनो बहुत नीक काजक चस्मा होया जक्रासन दुन्या स्पष्ट दिखाईत होया आप, मुदा अकर बाद उए उई दूरी के ही द्रिष्ष बूजी लेत अची परवर्ती व्याख्या कारक जे पूवाग्र हची उवास्तो मे उदूरी अची इक दम सही उपुमा आची मुदा आहा कहलू हूँ जे दूटा कारनाच, दोसर कारन की आच दोसर कारन की चल तो सर कारना ची पश्चिमी विद्वान लोकनिक अनुवाद जे पाश्चात्ते विद्वान भारत आयल चला उसब अपन अपनी वेशिक मान्सिक्ता कारने वेदक बहुत रास गलत अनुवाद केलनी अच्छा स्रोथ में, एक ता बहुत सचक्त उदारन देल गेल अचे. पीशल नामक एक ता पाश्चात्ते विद्वान चला. उ योश शब्द का अनुवाद की केलनी, इजान अब बहुत महत्वपुरन अचे. आ, योश शबद का वास्तविक अर्ठता, ज़हां तक हम जानेक ची यूटी होई तची सथ ते कहलू हूँ यूटी मुदा पिषल एकर अनुवाद वेश्या या दास कन्या कही के दादेलनी बापरे, एक ता सामान ने यूटी के वेश्या या दास कन्या बनादिप इतक अते कपएएख शाब्दिक हिन्सा आची इक्दम, आप सोचु एकर पाच्धा की मान्सिक्ता भहसकईत आची कोनो विद्वान जानी भुजका एतेख पैक भूल कियक करत रहा, इस कोनो भूलत नहीं लागी रहा लगी रहा लगी शोद ग्रन्त्ख्जे विवेच्ना आची अकर अनुसार ये कोनो भूल नहीं चल. ब्रितिष साम्राज्जे के बारत पर अपना शासन के नयाय संगत ठह्राब लेल यी दिखाए ब आवश्षक चल जे प्राचीन भार्तिय समाज नयतिक रूप सब पतन का गर्त मे चल. अहो, तजगा उ वेद में वेश्या वा दास कन्याजगा का शब्द क प्रछुट्ता देखाभे में सबल भाजाईच्चती. तवनका लेल एई सिद्गर अप सहच भाजाईट ची जे भार्तिय लोक असब्भ्यच्छला आँ उनका सब्व्य बनवाक लेल ब्रितिष शासनक आवश्व्टा चे तक भाग आप आची, जे ईग कुन भाशिक अग्यान्ता नहीं बलकी एक ता सु विचारित राजनी तिखष्शर्यंट्र चल बहरक लोक आपनी वेशिक मान्सिक्ता से अनुवाद के लहन अब भीत्रक किछ वर्ग आपन वर्चस्व बनाय वाले लिटी का लेक लहन. एक बम सही पकल लो आहा. मुदा इतब हिल प्राषीन ग्रन्तक बाह्यविरुपन, जगन इस संसक्रितिक अपहरन आपन समाजक भीतर होई तचे, तखन की होई तचे. अदजन खदरनाख होई तचे आई यी हम्रा सब के उई बिन्दू पर लड़ जाए तची जे हमर ही साब सं एश्रोट ग्रन्तक सबसा चौब्साच्वे वाला ही साच्चे मद्ध्खालीन मैठिली साहित कषवसे पएई गस्तमब अद्द्यकालीन मैठिली साहित कर सबसे पएी गस्तम्प बिद्यपती से जुडल विवाद राज पन्दित शब्दक नहीं बलकी कवीक पहचान का अपहरनक मुद्दा चे तस्रोथ की कहे कची बिद्यपतिक विषे में? एत आबिका इसमिक्षा शास्त्र एक ता बहुत पातर पोरु दावी करेता चे स्रोत में इगंबिर प्रशन उठावल गेल आचे जे पदावली लिखनिहार विद्यापती और संस्क्रित वा अवहत लिखनिहार राज पनदित विद्यापती तख्कुर वास्ताव में एके व्यक्ती छिला? रूको रूको एक रनीग जक्या समज्बाक आवष्च्ताचे पदावलीग विद्यापती जे सर्व भाहाराग आम लोकक पीना कवी च्ती जे प्या दे सांतर जेसा गीत लिखच्ती जता प्रवासक, गरीबीक अदो सर्दीज राज पन्दिद भिद्धापती जे पाग पहरे चला, जे संस्क्रित में ग्रन्त लिखच्छला, आम उसल्मानी आक्रमन्सा मंदिर्वा जनो ब्रष्टेवाक छिन्ता करे चला. बलक्ल, तुनु एक दम अलकु. मुदा की, इस समबव नहीं आची, जेना कविक बहुमुखी प्रतिबा होई तचीने? आहां की प्रशना स्वाभविक अची और बहुत लोग यी तरक दाए चतिन मुदा हमर जे स्रोट आचे उएकर बहुत तारकि क्हन्दन कर अच्छती अच्छा कोना? समिक्षा शास्त्रक लेक्खक दियानाक्रिष्ट करेच्ट ही जै जै तोनो एक यह व्यक्ती चला, तदूनो साहित्तमे एक तुस्रक संदर्भ कियाक नहीं आच्छी. अहो! मने क्रोस रेफ्रन्स नहीं आच्छी. इक्दम नहीं, पदावली में कतो कविक संस्क्रित वा अबहत्ख महान विद्वान हेबा कोनो दंबवा उल्लेक नहीं आची. संगे संस्क्रित गरन्ठा में कतो ईईओलेक नहीं आची, जे ओही कविकें मेचली पदावली लिखबा कारेने कोनो ख्याती बेटल आची. ये तज्द तश्चने नहीं चलों स्रोत शपष्ट करे तच्ची जे ये दुनो एक्दम समनान्तर परम्परा च्चती जे कर आपस में कोनो मेल नहीं आच्ची तक्की एकर ताद्पर्या ये आच्ची जे पदावली लिखनी हार विद्यापती अद्री लिखनी हार विद्यापती कोनो दोसर लोग कवी चला? स्रोथ ग्रन्त टीक एही दिश इशारा करईत अची लेक्हकक दावी अची जे पदावलिक परमपरा समबवता हा गेर ब्राम्हड वर्गक लोक परमपरा से जोडल चल समबवता भावर जातिसा, जकर चर्चा एही पोती में अची. मुदा फिर इसब एक कोना बहुगेल जक्हन बंगाल में विद्यापतिक पडावली बहुत लोक प्रिएबहेल, उते वैश्णो परमपरा में हुंका भजेबाक लागल, तक्हन बंगालक लोग उनका बंगाली माना लागल चला एही पर मित्लाक, भबुान वा ब्रामबर्ग द्वारा आनन्फानन में पंजिक विवरन निकाली का उक्रा संस्क्रत के गरन्त लिखनी हा राज पनदित विद्ध्या पती से जोड दिलगेल. तकि हुंका मेठिल सिद्ध्यकेल जासकेई एक्दम माने एक्टा लोक परमपरा के कवी के दर्बारी परमपरा में बान्दि दिलगेल जग्रा समाश शास्त्र में सांस्क्रितिक अपहरन कहल जायता ची इत अगर सीथा सीथाउदाहरन भेल उनका मात पर पाग पहराय का हम्मर विद्ध्यापती बना लेल गेल अ, मुदा इस्सा जे नुक्सान भेल उ बहत पेग आची की नुक्सान भेल नुक्सान इभेल जे लोग चेतना कवी के राज दर्बार के परिदी में बानी का अकर विद्रोही स्वर के कुंद कदेल गिलन जक्हन आहा कवी के अपनें उच्वर्ग वा दर्बारी परमपराक मानी लेच्छी तक्हन आहा अकर उही रच्ना सब के नजर अंदाज कदेची जे गरीभ कर सर्व हाराक दुक दर्द बयाबा करे थच्छी सत्ते कहलो, संसक्रतक विद्यापती मुसल्मानी आक्रमनस जनो आमन्दिर ब्रस्ट रबाक छिन्ता मेच अती, जकन की पदावलिक विद्यापती स्त्रीक विरह, गाम अगरी दी अप्रवासक पीडा लिक रहलाची. श्रोथ ग्रन्त कनुसार इदूनु कद्र चरोकार एक दंभें न ची, अएक रा एक कदे मेठलिक मुल आत्माक संण अन्याई चल. बाप्रे, इत बहल कविक पहिचानक अपहरन, मुदा जता हम आगा बडी रहल ची, उता हम्रा ही साथ साबक, सहित्तेकार, अ सम्पादक लोकनी के लेल, एक तब हुट पाटक संद्रचना के नष्ट कदेएक्षती. अच्ण्द वाला प्रक्रण. भिल्कुल. विदेज के एही समविक्षा शास्त्र में चर्चा आचे, जे कोना आदूनिक समपादक लोकनी अग्यान्ता वश मूल पातक सन्दचना के नष्ट कदेईच्छती ये प्रसंग चे कवी लाल्दास का मित्ला रामायन का ये बहुत तकनी की मुदा साहित्तिक द्रुष्टी सां अथ्यन्त महत्पूरन बिन्दू अची लाल्दास आपन मित्लारामायन में कुंदलिया चंदक प्रेउक केने चतिन जे लोग चंद शास्त्र नहीं जाने च्चतिन उनकाले ल बतादी जे कुंदलिया एक ता जटिल मात्रिक चंद चंद ची इदोहा औरोलाक मिष्रन होईता ची अग, और हम्रा जतादरी मों आची, एकर नियम बहुत कठोर होई तची, कुंडलिया माने कुंडल या गेरा, नहीं? सत्य कहलू, एकर नियम आची, जे दोहाक प्रत्हम शब्द, और रोलाक अंतिम शब्द एक्दम एके होई तची, जक्रा साए एक टक्चक्र वा कुंडल बनाईताची संगे मात्रा में रस्स्व अदीर्ग मतलब लगु अगु खुरू कदोर गनित्ये गडना होईताची एक ता निष्चित लैए होईताची जक्रा पर पुरा कविता आदारेत होईताची उदा स्रोथ गरन्त में इबतावल के लची जे मैठली अकाटमी अ साहित्तिया अकाटमीक जे नामी संपादक लोक्छला जेना राम्देव जा उवर्तनी के एक रूप अशुद्द करबाक फिरा में मात्राक उई गनितिय गनना के भिगारी दिल नहीं इत उहीना भेल जना कोनो अटिहासिक किला के सुन्दर बन्वाक लेल ओकर नक्काशीदार देवाल पर आदूनिक सिम्ट का प्लास्टर कदेल जाए. बह! की उप्मा दिल हूहा? अग! मतलब बहर से देख्वा में समपादक के लागेद जे दिवाल सम्तल अशुदद बहुगेल मुदा उकर अटिहासिक बनावेट उकर आत्मा तप प्लास्ट्रक नीच मरेगेल इछंद का हत्या कोना भेल उकर कोन उदारन अची स्रोथ में आठी आची ना स्रोथ गरन्त में एकर अस्पष्ट उदारन अची मूल पात में एक ता सब्द चल अगयाशिनी अच्छा अगयाशिनी संपादक लोकनी इसोचल ने जे मानक मेठली वा संसक्रत के शुद्टा के द्र्ष्टी से इश्ब्द अगनाशिनी हो वाग चाही मतलब पाप नाश करे वाली ता उ अगया शीनी के बदली को अगना शीनी को दलनी. मुदे एस दा मात्रा बदली गल है देक. इक दम जिना उशब्दक वर्तनी बदलनी उइ शब्दक मात्रा माने गुरु लगुक जे करम चल उबदली गल आपुरा चन्दो बहंग बहुगल. माने जे लैए दोहा से रोला मे जेबाक ले चाही चल, उ गनी तिया वजन तूती गेल? सपष्ट रूप सा. समिक चाश शास्ट्रेक लेखख एत इस थापित करिद चती, जिस सम्पादनक अर्थ, पूनर लेखन वा सुदार नही होईत ची. प्राचीन वा पारमपरिक पाटके, वोकर मोल ध्हन्यात्मक अ सन्चनात्मक रुप में सन्द्रक्ष्त करव कते क आवश्यक अची, इप्रसंग वोकर प्रत्ट्यक्ष प्रमान आची. भिल्कुल, जि सम्पादक के रथ भुजाएप जल, तो नीचा फुत नोड दसके चले, जे तहे कररत अगनाशीनी अची, मुदाहा कवी के मुल पाट से, उकर चंदग गनिट से चेर चारन नहीं का सके ची. आग्यानता वश समपादक लोकनें लालदासक पूरा महनत पर पानी प्हिरी दलनें. तप्राचीन गरन्त्ता कनुवाद से लोक्ड, विद्यापती के पहचान, आल लाल दास के चन्दक हत्या दरी. इस सब दे कहवैं तची, जि साहित सदेकन शक्तिषाली, वत अथा कतित विद्वान वर्क्के, रस्त चेप से जुज़ेद रहले ची. इक्दम, मुदा जकन हम विदेहे समिक्षा शाहित्रक अगिला क्ड में, आदूनिक मैठिली साहित्ते दिश देकाईची, तपरिब्रिष्ष बदलेई तनजर आवेचे. ओखना. लागे तची, जे आबक लेक्ख क्लोकने एह क्रित्रिमतास है, यह तोपल गेल शुद्ददा सब बहारावी रहल चाती. इविदेह समिक्षा शास्त्रक सबस आशावादी पक्षुची. लेक्खक अनुसार आदूनिक मेठिली साहित्ति में जे यतार्थवाद आस समाजिक विमर्ष आभी रहल चाय, उ वास्तव में उही समवनान्तर परमपरा कविस्तार अची जकर चर्चा विद्यापतिक पदावलिक संदरभ में भेलचल. माने आबक लेखख समाज कखु सत्तिके बिना कुनो लाग लपेट के बिना कुनो दरबारी अलंकार के सोजा राखी रहल चती. आँ, श्रोत में मुन्निकाम तक एक आंकी अच्छी जिन्दिगीक मोल का बहुत मारमिक चर्चा ची. जकन हम यी नाटक ककता सुनेट ची, तो लागगत अच्छे मेत्फिली साहित अब केवल गाम का चोपाल, नदिक किनारा मोँ पावन तिहार गीद दरे सीमित नहीं आची उतो विष्व व्यापी समस्यास लडी रहल चे एक दम, जिन्दिक मोल, मेटिकल माफिया अ फार्मस्टिकल भ्रष्टा चारपा एक ता करारा प्रहार आची एही नातक में, एक ता अटारा वरस्का गरीब यूवा आचे राम्रतन, जे रोजगार के लेल हिमाचल जाई तची. आर उत, दोक्त खुराना नामक एक ता पात्र आची, जे उक्रापर बिना जाने अवेद दवाएक परिक्षन करे चती. आ, आ, उही आवेद परिक्षनक कारन राम्रतनक म्रित्यो बहेजाई तचे श्रोत में इचर चाचे जे नाटक क सबसा सशक्त द्रिश तखन आवेट चे जखन कम्पनी का लोक राम्रतनक पिता भुखन के एक लाक तकक मोवजा दोका इमामला दबावा चाहते चे मुदा भूखन उ मुआवजा तूक्रादे चती भिल्कुल, उएग रही कही का तूक्रादे चती जे गरीब मनुश्षक देजानवर जका परिक्षने कले लिए नहीं आची बापरे, ये केवल एक ता पिता का विलाप नहीं आची समिक्षा शास्त्र का लेक्षार, इपूंजी वाद अब्रस्छ्ट्चिकित्सा विरुद्द्शोशित वर्ग का सशक्त विद्वोग का स्वर अच्छी. मुदा, एता हम एक ता प्रश्न कर चाहब. आग, कहु? के एही सव, साहित्ते का कलात्मकता नश्ट नहीं भाजाइत अची, की साहित्ते काज अची, की इव उई पागवाला एलीट परमपरासा, सीदा विद्रो हनही अची, जता साहित्ते केवल वाशा आब भद्र लोक का सुन्दर्य भोद्धरी सी मिच्छल. इप्रष्ट बहुत महत्वपुर्न अछी मुदा सोत ग्रन्त का लेक्ध, एक रा कलात्मक्ता का हरास नही, बलकी लोक चेतना का पुनर जाग्रन मानिच्छती. उनकर तर कछी, जे वास्तविक कला उव आछी, जे समाज के यतार्थ के प्रतिबिम्वित करे. अगो! गजद्र ताकुरक आपन उपन्यास सबख़ उदारन्सो एही तत्च्के पूष्ट करेता ची. हुंकर उपन्यास सहस्र भाडनी में दलित पात्र, जेना मुसहर, दोभी, दूसाद, किर जीवनेक जे सुख्श्म चित्रन आची, आँ उनीस्व सर्सट के अकालक जे राजनेतिक यादार्त अची उ मेतली सहित्ति में दुरलब चल. आँ, उनकर दोसर उपन्या सहस्र शीर्शा मेता कता आवर आगा बड़े ता अची नहीं की? एक दम, उही में एक दलीद गभईया चे, मोहन, जे सुचना के अदिकार, मतलब आर्टियाइक प्रयोग कई राजनेतिक चेतना जागभाईताची. माने, केवल रोना दोना नहीं, बलकी अदिकारक लेल कानूनी लडाई. आँ, इसब उदारन इदेखावाईत आची, जे नव लेखख यतार्ठ के क्रित्रिम भाशा वद्दरबारी परमपराग भोज्शा मुक्त कोर रहल चाती. इसाहित्य, समाज के ओही तल्ख यतार्त के हावास दो रहल अची, जेक्रा मुख्यदाराक पाग्वाला साहित्य अकसर नदरंदाज कर देच्छल. सत्ते कहल हूँ, अस्रोथ में, एक ता और बहुत सुन्दर अक्रान्तिकारी संग्रहक चर्चा ची, सजी आ रोपनी. आँ, लगु कत्ठा वाला आँ, दोक्ट प्रमोद कुमार दवारा सम्पादित ये फुट्टी तर भीहन कत्ठा लेक्खकक संग्रह आची भीहन कत्ठा मने बहुत चोट-चोट लगु कत्ठा जी भीजक समान होईता ची मुदा उही में पैंग गाज कक समभावना चिपल होईता ची आ ए संग्राक जी सबस पैग बाज स्रोत मेरेखंकित कहल गिल आची उई चे ही में फोटी खोट लेख्खमे से बीस गोट महिला लेखिका चाती बीस गोट? रहा! ये दब बहुत पधिग बात आची? एक दम जना मुन्नी कामत, आबाजा, रुभीजा मेतली साहित में आख्डा अपने आप में एक दब बआग समाजि करानती आची इद लेखि का सब केवल गर आंगन के गब नहीं लिखि रहाल ची थी इस संग्रा दिखावे तची जे भालश्वम, इस्त्रीवी मरश आप पर्यावरन्जका विषेप पर मेठली में कते गंभीर काज भार आची जेना उही में पोख्रीक सबहा नामक कताख चर्चा आची जे पर्यावरन्च नक्षन पर आची अब मेठली सबद्यक समाजक प्रतेक संगर्षके अपन शबद में उतारी रहा लाची तब समग्र रूप सजा हम विदे पत्रिकाक एह समएक्षा सास्त्र के देखी तई यस समपुन चर्चा हम्रा सब के यी दिखावे तची अगर बादग अग्यानतासा दूमिल केल जाईत रहलाच वेदक मंत्रस लोक विद्यापतिक पहचान, लाल दासक चंदक हत्या आमुन्नी काम तक यतार्ट्वादी नाटक दरी हम देखे ची जिश्व्द के बचायवाग, अग्यानतासा दूमिल केल जाईत रहलाच वेदक मन्त्रस लोकर विद्यापतिक पहचान, लाल दासक, चन्दक हत्या, आम मुन्नी काम तक यतार्त्वादी नातक दरी. हम देखे ची जी शब्द के बचायवाक अवक्रा मरोडबाक संगर्ष लगतार चली रहलाच. यही दीप डाईव सं इबात ते एक्दम स्पष्ट भगेल, जे हम जे कि चुप उत्ही में पड़ेच ची, उक्रा आग्मोन का अन्तिम सत्य न नाई मानी लेबाग चाही. उही चापिल शब्द क पाच्ठ से हो एक टा संगर्ष अचे, एक टा राजनीती एचे. ये उगडम सही जए इत्टिहास आजाइते लिखनी हार सदिक्हन सक्तिषाली वर्ग रहला ची तब इप प्रशन उप्वब बहुत प्रासंगिक अची जे आहा जे पडी रहल ची उखर स्रोथ की आचे अगा सब आपन गर का आलमारी में वा आपन काचक शोकेस में जे पोठी सजाकर आखने ची कि अखर अगर आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ अगिला बेर जक्फन कुनो प्राषीन पोठी, कुनो दार्मिग ग्रन्त, वन नव कविता पड़भ, तैई जरूर सोचब, जे इश्वद आहन्दरी पहुच्बाक लेल, केहन राजनेतिक, आस सांस्क्रितिक फिल्टर से गुज्रल अचे. अगी चश्मापलागल दूरीक है, सावकरभाक प्रयास जरूर करभ. एस सहित्तिक आसानस्क्रितिक अनवेशन में, हम्रा सब का संजुर बाकलेल, बहुत-बहुत दन्वाद.