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बाल_गुरु__अदृश्य_जीवन.mp4
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- 0:00–0:06नमस्कार, बालगुर। अद्रिष्ष्जीवन के एही विषेश प्रस्तुती में आपन सब गष्वागताएच.
- 0:06–0:11आजु आपन सब एक ता एहन खुबसुरत और भहु संस्क्रितिक कता में प्रवेश करव,
- 0:11–0:15जता शेजर के उ अ अन्सूना और अद्रिष्ष्सानुकालाएच
- 0:15–0:18बार सदेखी तब रिलकुल समान्ने लागे तएच
- 0:18–0:22मुद्दा भीतर में एक्रा अलग अलग रंग और रुप चिपलाएच
- 0:22–0:24तच्छलू बिना कोनो देरी के
- 0:24–0:26एही अद्बूद कहानी के पर्दा उठावी
- 0:26–0:29और देखी जे एही भारी भीड में
- 0:29–0:30कहां कहां आपन संसक्रिती
- 0:30–0:32और जीवन बसअई देएज.
- 0:32–0:34लगका के नाम चल औम
- 0:34–0:36और लगकी के नाम चल मनशा
- 0:36–0:38सुनामी बद सदहरन लागे देज
- 0:38–0:38है ना?
- 0:38–0:42कुनु पुराना पोठी के कता जिना तीक आहीना शुरू होए तेज
- 0:42–0:46मुद्दा इही चोट-चोट नाम में एक ता बद विशाल कता समया लेज
- 0:46–0:48देखू विशाल दून्या के कता कहा बाकलेल
- 0:48–0:52कहानी हमेशा चोट-चोट और व्यक्तिकत हिस्सापर आवे तेज
- 0:52–0:55अँ और मन्शा ज़्फ दूता नाम नहीं चाएत
- 0:55–0:58यही बदका शहर के दू अदबत रूप चाएत
- 0:58–1:02तीक आज, आओ एही में तोरा और गेराए से प्रवेश करी
- 1:02–1:05दिल्ली, एक अजसन शहर जता सब के उ,
- 1:05–1:09उदो तो तो तो तो तो अई लाएच न नहीं प्रवास्यन सबखषाहर
- 1:09–1:12एही शहर के एक तो आवास कोलोनी पर गवर करी
- 1:12–1:15जोमेटिकल रूप से बिलकोल एक समान दिखाई वाला
- 1:15–1:17एही उचुच फ्लाट सब
- 1:17–1:19एक रा भीच में एक तो हर्यार पारक आएच
- 1:19–1:22अद्र थिएक औहे पारके बीज में से हमार कता आके लाए चे
- 1:22–1:27उपर सदेखल जाय ता इएईट और पत्धर के बस इक ता जंगल जेका लागगत चे
- 1:27–1:29आएक के चका चोंट कराई वाला
- 1:29–1:32परन तु, कहानिके आस्ली मजाता आब आब आवे यतेच
- 1:32–1:46लेखख बडा सुन्दर बात लिखे च्छाइत, जे उपर सा देखला पर प्रतेग फ्लाट जुडवा भाईज़का लागतेच, मुदद भीटर, हर दर्वाजा के पच्जा एक तब फिन्न देश बसे थेच, की अदबुत कल पनाए ची, ने?
- 1:46–1:51एको तब बहर सब किच एक समान, एक रूप बिना कोन पहेचान के लागतेच,
- 1:51–1:58किन तु ज्येना ही दर्वाजा खोले तएच, तब वितर एक तब आलग और जिवंत संस्क्रतिक दून्या बहित थेच.
- 1:58–2:01एही विशम्ता रूब पर द्यान देबाख चाही,
- 2:01–2:06जे कोना अकार बार से एक एच मुदा भीटर के आत्मा बलकल भिन्नेच.
- 2:06–2:10और यी भात बडे निमन साहे इथाम दर साई रहा लाएच.
- 2:10–2:12उपर से शहर जतको अनजान लगाए,
- 2:12–2:14जब दीक नस्दीक से देखाएग,
- 2:14–2:17तप्रते एक पडोसी का पन आपन रंग देखाया एच
- 2:17–2:19कहा भीड भाडवाला उपर के चवी
- 2:19–2:20तीक खुपे खुप
- 2:20–2:24आबे का चोड बचा सबख जीवन्त गर के अस्लीएत में बड़ल जाए ताएच
- 2:24–2:26तो दर्वाजा, तो भिन्न भिन्न कता
- 2:26–2:28एक ओर उमएच
- 2:28–2:29और दूसर और मान्शा
- 2:29–2:32और दोनो आपन आपन गर कर दर्वाजा पर खडाच़द
- 2:32–2:34जना दू अलक देश आमने सामने कड़ा होगे
- 2:35–2:36इता एक तचमतकार जेगा आएच
- 2:37–2:39अब थोडा और थीख सतुलना करी यही दूगर के
- 2:40–2:42तीस्रा तल्लपा एक ता फलाट में
- 2:42–2:45मित्हिला बसेट्छल, हा, हा, अपना सब एक ओम के गर,
- 2:45–2:49और थीक उही के सामने वलाक में पन्जाब बसेटएझ,
- 2:49–2:51यी मन्शा के गर चल.
- 2:51–2:54औम के गर में चुलहा पर जता अर्वाच अर पकाए टएझ,
- 2:54–2:57उही तम, मन्शा के गर सा भूरे-भूरे चाूँएख,
- 2:57–2:59यानी तदका के सुगन्द आवगताएज
- 2:59–3:01कहा अलाग अलक प्रान्थ और मिट्टी के चवी
- 3:01–3:03एक चे टिकाने देखाएड अएज
- 3:03–3:06सच पुछिता जिना पूरा भारतिया चवी
- 3:06–3:08एक चोट सा कोलिनी में बैसगेल होगे
- 3:08–3:10कहानी में कुछ इहन वरनन आएज
- 3:10–3:14जि पड़ायते ही जिना सब किछ आखिन के समने आभी जातेएच.
- 3:14–3:16जरा कलपना करू
- 3:16–3:21बरखा के दिन में एम के गर सा टरूवा और तिलकूर के पता के महक उडच्छल.
- 3:21–3:23माई के मुसा निकलत कुछ चोट-चोट-गीत
- 3:23–3:25टीक आपन मेठली लोरी जेका.
- 3:25–3:31तुस्री योर मान्शा के पिता के मात्पर उपग्डी जे पग्डी बान्दला के बाद प्रतीथ हो चल,
- 3:31–3:35जिना भोर का चंकःट सुरज उनका मात्पर भाईस गयल होगे.
- 3:35–3:40मान्शा के माई जिसने सास सरदार जी बजाए चला उजिना कोनो नाम नही,
- 3:40–3:42प्रेम के संगीत लागे चल.
- 3:42–3:46यो वरनन एट्ता सजीव और अत्यंत प्यारा महाल के निर्मान कराई तएच,
- 3:46–3:48जे बतावे तएच की प्रवास में,
- 3:48–3:53आपन मिटी सा दूर, लोग आपन संसक्रिति के कना सहेजी के रखफ़एच.
- 3:53–3:58अब चलू कहानी में आगु बड़ाई और एक तब बड़ा महत्व पूरन विशेपर द्यान दिए.
- 3:58–4:05एही मोखा पर एक तब रोचक सवाल उठाएज अगेर मान्सा के पूरा दिन के चाभी कक्रा हात मेज.
- 4:05–4:09तुकि मान्सा के माईबापु दूयो दिन में काज पर बाहर चल जाए चला,
- 4:09–4:12ता अखिर उएक ता तीसर जोडा हात कखगर चले,
- 4:12–4:15जे पश्ष़ भूमी में रहाके परदा के पैसास़,
- 4:15–4:17इसारी बेवस्ता संभाराइ चल.
- 4:17–4:19उआन सुना सदश्य किए चल?
- 4:19–4:29तजबसे महतो पूरन्द भिन्दू यह एईच जे एही कहानी के सबस शान्त और सबस आवश्षक पात्रा जे इपुरा गर चलाई चल उचल महुवा
- 4:29–4:36यी महुवा उदीशा सा आयल चल, बस काज करेला, अगर अमर किच खास नहीं चल, बड चोट चल,
- 4:36–4:40अगर उआपन गाँम में रही ता शाएद अखनो कोनो आगन में खिलगद रही ती
- 4:40–4:46मुद्दा इही दिल्ली शहर में आयक अ वं मन्शा नामक एक ता चोट बच्ची के देखभाल कर आए तेछ
- 4:46–4:53इस शान्त, किन्तु अट्यन्त महतोपुर्न वेक्तित्वा उन असहाय परन्तु अनमोल पात्रा के दर्षार हालाएच,
- 4:53–4:56जेकर योग्दान देनिक जीवन में प्राय सब भिस्रागाए देच.
- 4:56–4:58इस समाथ समजीएन पवे देच.
- 4:58–5:02आव देखे महुवा के बारी कनदे पर की की जिम्मा चल?
- 5:02–5:04बोरे मान्सा के उठवाब,
- 5:04–5:07वो कर केश जार का थीक सा दूगो चोटी गुताब,
- 5:07–5:09दूद गरम कराब,
- 5:09–5:12और साज खाईन औही हर्यार पारक में लजाएब.
- 5:12–5:19जब तक मान्सा के माबाप लोटकर नहीं आबे चला, बची के पूरा दिन महूवा के साडी के आचल में काटे चल.
- 5:19–5:26एक तरा से देखी तई यो महनताएच, जे एही बडखा शहर के दिन चर्या चलाएच जरूराएच, जे सबसा जरूरी च्हाई.
- 5:26–5:32मुद्दा, इश्वम हमेशा अनसुना और अद्दिश्यर हाँई ताएज, कोई दियान नही देचाई.
- 5:32–5:38महुवा, बहुत काम बजाएच्छल, शान्त रहना ही, उकर सुभाओ बनी गेल चल.
- 5:38–5:41मुद्दा, जब अप पारक में, जुलापर मन्चा के जुलाएच्छल,
- 5:41–5:46तक कोखनो कोखनो आपना अदीसा के एक ता लोग गीत गुन्गूनाएत चल.
- 5:46–5:50अगीत बड मदूर चल, किन्तु कुछ उदास चल.
- 5:50–5:54चब मन्शा पुछेच चल जे, इग कोन गीताएच महुवा दिदी,
- 5:54–5:57तमहुवा मुस्कुराय का कहिच चल, हमर गाँके.
- 5:57–6:00अपन मिट्ती सा दूरी के पीडा के बड़्थीक सा बताएताएज
- 6:00–6:03प्रवास में लोक्कर पहचान कोना बडलिज़ाएज
- 6:03–6:06मिट्ती में मिलिज़ाएज से एही मुअका पर वर पस्त होगे आएज
- 6:06–6:14ये प्रवासी मज्दूर सबक अंदर के कसक और आपन मिटी सा दूरी के पीडा के बड़ थीक सा बताईताएच.
- 6:15–6:21प्रवास में लोक्कर पहचान कोना बदलिजाईच, मिटी में मिलिजाईच से एही मुका पर इस पस्थ होगे आएच.
- 6:21–6:26अपन अमके माई, एहा भूजना बड़ जरूरी आएच, जे विशाल भीड और विशाल शहर में,
- 6:26–6:30गरी प्रवासी के अव विश्तिकत पहचान कोना चीन लिल जाएताएच,
- 6:30–6:34बस एक सने हो खरूना से बभरल वकती ही उस नाम के बचाकर आखेताएच.
- 6:34–6:38अब अब अद्द में आपन सब के द्यान कताख के ओजी शुरु आत पर गुमाबाक चाही जहाँ सहम सब शुरू कैन अचलाउ
- 6:39–6:42जहाँ ताशहर के इच्चकर चून्थाएच उईपस्चाभूमी में एक दोसर शान्त आत्मा बसाइताएच
- 6:42–6:47अब अद्द न्द, अपन सब के द्यान कता के ओई शुरु आत पर गुमाबाक चाही,
- 6:47–6:49जहां सहम सब शुरू कैना चलाओ.
- 6:49–6:52जहां ता शहर के इच्चकार चून्थाएच,
- 6:52–6:54उईपश्चाब हूमी में एक दोसर,
- 6:54–6:56शांत आत्मा बसाइताएच.
- 6:56–6:58इहन में विचार करू,
- 7:12–7:15इसब मिल का कोन बड का कथा कहर रहाएच
- 7:15–7:18जे बडबड और मोटा पोठी सब हो नहीं समजा पवेताएच
- 7:19–7:22कि यही अनसूना जीवन ही शहर के आस्ली दधकनाएच
- 7:23–7:24एही बिशेपर ज़ोर विचार करव
- 7:25–7:27तब तक के लिलक आग्या दीो द्धन्निवाद
Plain text
नमस्कार, बालगुर। अद्रिष्ष्जीवन के एही विषेश प्रस्तुती में आपन सब गष्वागताएच. आजु आपन सब एक ता एहन खुबसुरत और भहु संस्क्रितिक कता में प्रवेश करव, जता शेजर के उ अ अन्सूना और अद्रिष्ष्सानुकालाएच बार सदेखी तब रिलकुल समान्ने लागे तएच मुद्दा भीतर में एक्रा अलग अलग रंग और रुप चिपलाएच तच्छलू बिना कोनो देरी के एही अद्बूद कहानी के पर्दा उठावी और देखी जे एही भारी भीड में कहां कहां आपन संसक्रिती और जीवन बसअई देएज. लगका के नाम चल औम और लगकी के नाम चल मनशा सुनामी बद सदहरन लागे देज है ना? कुनु पुराना पोठी के कता जिना तीक आहीना शुरू होए तेज मुद्दा इही चोट-चोट नाम में एक ता बद विशाल कता समया लेज देखू विशाल दून्या के कता कहा बाकलेल कहानी हमेशा चोट-चोट और व्यक्तिकत हिस्सापर आवे तेज अँ और मन्शा ज़्फ दूता नाम नहीं चाएत यही बदका शहर के दू अदबत रूप चाएत तीक आज, आओ एही में तोरा और गेराए से प्रवेश करी दिल्ली, एक अजसन शहर जता सब के उ, उदो तो तो तो तो तो अई लाएच न नहीं प्रवास्यन सबखषाहर एही शहर के एक तो आवास कोलोनी पर गवर करी जोमेटिकल रूप से बिलकोल एक समान दिखाई वाला एही उचुच फ्लाट सब एक रा भीच में एक तो हर्यार पारक आएच अद्र थिएक औहे पारके बीज में से हमार कता आके लाए चे उपर सदेखल जाय ता इएईट और पत्धर के बस इक ता जंगल जेका लागगत चे आएक के चका चोंट कराई वाला परन तु, कहानिके आस्ली मजाता आब आब आवे यतेच लेखख बडा सुन्दर बात लिखे च्छाइत, जे उपर सा देखला पर प्रतेग फ्लाट जुडवा भाईज़का लागतेच, मुदद भीटर, हर दर्वाजा के पच्जा एक तब फिन्न देश बसे थेच, की अदबुत कल पनाए ची, ने? एको तब बहर सब किच एक समान, एक रूप बिना कोन पहेचान के लागतेच, किन तु ज्येना ही दर्वाजा खोले तएच, तब वितर एक तब आलग और जिवंत संस्क्रतिक दून्या बहित थेच. एही विशम्ता रूब पर द्यान देबाख चाही, जे कोना अकार बार से एक एच मुदा भीटर के आत्मा बलकल भिन्नेच. और यी भात बडे निमन साहे इथाम दर साई रहा लाएच. उपर से शहर जतको अनजान लगाए, जब दीक नस्दीक से देखाएग, तप्रते एक पडोसी का पन आपन रंग देखाया एच कहा भीड भाडवाला उपर के चवी तीक खुपे खुप आबे का चोड बचा सबख जीवन्त गर के अस्लीएत में बड़ल जाए ताएच तो दर्वाजा, तो भिन्न भिन्न कता एक ओर उमएच और दूसर और मान्शा और दोनो आपन आपन गर कर दर्वाजा पर खडाच़द जना दू अलक देश आमने सामने कड़ा होगे इता एक तचमतकार जेगा आएच अब थोडा और थीख सतुलना करी यही दूगर के तीस्रा तल्लपा एक ता फलाट में मित्हिला बसेट्छल, हा, हा, अपना सब एक ओम के गर, और थीक उही के सामने वलाक में पन्जाब बसेटएझ, यी मन्शा के गर चल. औम के गर में चुलहा पर जता अर्वाच अर पकाए टएझ, उही तम, मन्शा के गर सा भूरे-भूरे चाूँएख, यानी तदका के सुगन्द आवगताएज कहा अलाग अलक प्रान्थ और मिट्टी के चवी एक चे टिकाने देखाएड अएज सच पुछिता जिना पूरा भारतिया चवी एक चोट सा कोलिनी में बैसगेल होगे कहानी में कुछ इहन वरनन आएज जि पड़ायते ही जिना सब किछ आखिन के समने आभी जातेएच. जरा कलपना करू बरखा के दिन में एम के गर सा टरूवा और तिलकूर के पता के महक उडच्छल. माई के मुसा निकलत कुछ चोट-चोट-गीत टीक आपन मेठली लोरी जेका. तुस्री योर मान्शा के पिता के मात्पर उपग्डी जे पग्डी बान्दला के बाद प्रतीथ हो चल, जिना भोर का चंकःट सुरज उनका मात्पर भाईस गयल होगे. मान्शा के माई जिसने सास सरदार जी बजाए चला उजिना कोनो नाम नही, प्रेम के संगीत लागे चल. यो वरनन एट्ता सजीव और अत्यंत प्यारा महाल के निर्मान कराई तएच, जे बतावे तएच की प्रवास में, आपन मिटी सा दूर, लोग आपन संसक्रिति के कना सहेजी के रखफ़एच. अब चलू कहानी में आगु बड़ाई और एक तब बड़ा महत्व पूरन विशेपर द्यान दिए. एही मोखा पर एक तब रोचक सवाल उठाएज अगेर मान्सा के पूरा दिन के चाभी कक्रा हात मेज. तुकि मान्सा के माईबापु दूयो दिन में काज पर बाहर चल जाए चला, ता अखिर उएक ता तीसर जोडा हात कखगर चले, जे पश्ष़ भूमी में रहाके परदा के पैसास़, इसारी बेवस्ता संभाराइ चल. उआन सुना सदश्य किए चल? तजबसे महतो पूरन्द भिन्दू यह एईच जे एही कहानी के सबस शान्त और सबस आवश्षक पात्रा जे इपुरा गर चलाई चल उचल महुवा यी महुवा उदीशा सा आयल चल, बस काज करेला, अगर अमर किच खास नहीं चल, बड चोट चल, अगर उआपन गाँम में रही ता शाएद अखनो कोनो आगन में खिलगद रही ती मुद्दा इही दिल्ली शहर में आयक अ वं मन्शा नामक एक ता चोट बच्ची के देखभाल कर आए तेछ इस शान्त, किन्तु अट्यन्त महतोपुर्न वेक्तित्वा उन असहाय परन्तु अनमोल पात्रा के दर्षार हालाएच, जेकर योग्दान देनिक जीवन में प्राय सब भिस्रागाए देच. इस समाथ समजीएन पवे देच. आव देखे महुवा के बारी कनदे पर की की जिम्मा चल? बोरे मान्सा के उठवाब, वो कर केश जार का थीक सा दूगो चोटी गुताब, दूद गरम कराब, और साज खाईन औही हर्यार पारक में लजाएब. जब तक मान्सा के माबाप लोटकर नहीं आबे चला, बची के पूरा दिन महूवा के साडी के आचल में काटे चल. एक तरा से देखी तई यो महनताएच, जे एही बडखा शहर के दिन चर्या चलाएच जरूराएच, जे सबसा जरूरी च्हाई. मुद्दा, इश्वम हमेशा अनसुना और अद्दिश्यर हाँई ताएज, कोई दियान नही देचाई. महुवा, बहुत काम बजाएच्छल, शान्त रहना ही, उकर सुभाओ बनी गेल चल. मुद्दा, जब अप पारक में, जुलापर मन्चा के जुलाएच्छल, तक कोखनो कोखनो आपना अदीसा के एक ता लोग गीत गुन्गूनाएत चल. अगीत बड मदूर चल, किन्तु कुछ उदास चल. चब मन्शा पुछेच चल जे, इग कोन गीताएच महुवा दिदी, तमहुवा मुस्कुराय का कहिच चल, हमर गाँके. अपन मिट्ती सा दूरी के पीडा के बड़्थीक सा बताएताएज प्रवास में लोक्कर पहचान कोना बडलिज़ाएज मिट्ती में मिलिज़ाएज से एही मुअका पर वर पस्त होगे आएज ये प्रवासी मज्दूर सबक अंदर के कसक और आपन मिटी सा दूरी के पीडा के बड़ थीक सा बताईताएच. प्रवास में लोक्कर पहचान कोना बदलिजाईच, मिटी में मिलिजाईच से एही मुका पर इस पस्थ होगे आएच. अपन अमके माई, एहा भूजना बड़ जरूरी आएच, जे विशाल भीड और विशाल शहर में, गरी प्रवासी के अव विश्तिकत पहचान कोना चीन लिल जाएताएच, बस एक सने हो खरूना से बभरल वकती ही उस नाम के बचाकर आखेताएच. अब अब अद्द में आपन सब के द्यान कताख के ओजी शुरु आत पर गुमाबाक चाही जहाँ सहम सब शुरू कैन अचलाउ जहाँ ताशहर के इच्चकर चून्थाएच उईपस्चाभूमी में एक दोसर शान्त आत्मा बसाइताएच अब अद्द न्द, अपन सब के द्यान कता के ओई शुरु आत पर गुमाबाक चाही, जहां सहम सब शुरू कैना चलाओ. जहां ता शहर के इच्चकार चून्थाएच, उईपश्चाब हूमी में एक दोसर, शांत आत्मा बसाइताएच. इहन में विचार करू, इसब मिल का कोन बड का कथा कहर रहाएच जे बडबड और मोटा पोठी सब हो नहीं समजा पवेताएच कि यही अनसूना जीवन ही शहर के आस्ली दधकनाएच एही बिशेपर ज़ोर विचार करव तब तक के लिलक आग्या दीो द्धन्निवाद