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समीक्षाशास्त्र__वेदसँ_मैथिली.mp4

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Part 4 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 4
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  1. 0:00–0:02आई जि खास विष्लेषन में स्वागत अछि।
  2. 0:02–0:08आई हम सब समिक्षा शास्ट्र, यानी साहित्तेक आलोचना का उई दुन्या में प्रवेश कर रहूल ची,
  3. 0:08–0:11जते सुख्ष्म सलग, ब्रिहदिस्टर दरी इदेखभ,
  4. 0:11–0:14जि कुन्ना कुन्नो पात्या का अख्शन्डथा,
  5. 0:14–0:20इतिहाज आस समपुन संस्क्रिती के आकार दैता चे, इक ता बर गेहर याट्रा चे.
  6. 0:20–0:25ता अव गब करेच्छी, आएक रूप रेखाग, हम सब शुवात करव विदे मैठली आन्दोलन्स,
  7. 0:25–0:30तक्राबाद वेद में शुद्रक प्रसंग, पश्च्च्मी विद्वान सब के अनुवादग किच पैग द्रूटी,
  8. 0:30–0:34माटिक भासन की आलोचना, रामायन का काव्या यान्द्रिकी,
  9. 0:34–0:38और अन्त में आदूनिक मैठ्ली सहितेक सुलबता पर चर्चा करब.
  10. 0:38–0:44इस वब किचु एक ता सुत्र में बान्धल अची, जे कुना साहित्तेक समिक्शा सत्तेके पुनर स्तापित करे तची.
  11. 0:45–0:49तचलू पहल विशेजन श्री गनेश करे ची विदे हमेठली आन्दोलन,
  12. 0:49–1:19अद्बूँग बाश्ट्ट्टीग आप बाशा ये बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा
  13. 1:19–1:22अगर मुल मन्त्र मानुशी मिहस संट्क्रताम
  14. 1:23–1:24अगर सोजा आरत है ची
  15. 1:24–1:27जी कतोर धिजितल संद्रक्षनक माधियम सा
  16. 1:27–1:29मानव संट्रती के उच आस्व्रक्षत करव
  17. 1:30–1:31इस श्रव भाशा कगबने चै
  18. 1:32–1:34समपोरन संट्रक्षनक कगब चै
  19. 1:34–1:44आब बड़े ची दो सर अद्ध्याएदिस, वेद में शुद्र, अदे हम सब देखाए जे साहितिक समिक्षा कोना प्रारंबेख समाजेक सन्रच्नाक सत्तिके सोथा लावेद अची.
  20. 1:44–1:53अख्सर लोक के मन में ब्रहम रहाद अची, मुदजकन प्रामानिक वेदिग ग्रन्त सबके सही संदरभ में अनुवाद होई चे, तद तस्वीर बिलकुल अलक भिटेचे.
  21. 1:53–1:56रिग्वेदक दसम मन्डलक इप्रस्संग स्पष्ट करे तची
  22. 1:56–1:59जि शुद्रक कोनु अप्मान जनक वर्ग नहीं चती
  23. 1:59–2:03उ ब्रम्हान्दिय श्रीरक उ आवश्षक आ आदार बूद पैर चतिन
  24. 2:03–2:06जिस समपून मानव परिवारक बार बिल्खुल औहिना उठावे चती
  25. 2:06–2:08जना पैर श्रीरक बार उठावैचे.
  26. 2:08–2:12इक तब बड़े गेहेर अंतर समवन्धक चित्री प्रस्थ। करेता ची.
  27. 2:12–2:14ब्रमान ने शरीरक कलपना करू.
  28. 2:14–2:18ब्रमन ज्यानक्लेल सम्राद पूरुष्चक मुग्छती,
  29. 2:18–2:21शत्रीः न्याय अरक्षाक्लेल बाह चती,
  30. 2:21–2:28वैश्य, बोजन आद्धनक लेल जांग, आशुद्र, सहाएक सेवा आजिविको पारजनक लेल पैरच्ठी.
  31. 2:28–2:35मुल गब यह जे इच्छारु सामाजिक विवस्ता समान रूप से प्रजापतिक अविनाश्षी अंग मानल गेल अच्छे.
  32. 2:35–2:39कोनो वर्ग कम वा भेसी नही थब क महत्व बनाबर चे.
  33. 2:39–2:43तेसर विश्य अच्य, पश्चमी विद्वान सब कक अनुवादक त्रूटी.
  34. 2:43–2:49इविश्य दिखावे तचे, जे कोना शरुवाती अनुवादक सब से अर्थ कक अनर्थ बहगिन.
  35. 2:49–2:54निस्पक्ष रूप सा पाथ्ध्या प्रमान के न जाची तब भद आश्चर्या हूए तची
  36. 2:54–2:57व्ड विट्नीक अथर्वेद अनुवाद के ले जाएं
  37. 2:57–3:02औ मूल संस्क्रिच्ष्व्द मिह कल लाक्षनिक संदर्ब बिल्कुल नहीं भूज्सकला
  38. 3:02–3:06उ एक रा थार भो कपे शाब करव अनुवादित कर्दिलन,
  39. 3:06–3:10जखन की पन्टित साथवली करक सही अनुवाद श्पष्ट करे तची,
  40. 3:10–3:14जे एकर अर्थ वास्टव में बादर्क वर्षाक बोच्धार होई तची,
  41. 3:14–3:20संदर्ब का अबहाव में कोना पैग गडबडी बहुसकट अची से एक ता सतीक उदार अचे
  42. 3:20–3:23एक ता और गंभीर अनुवादेक त्रूटी भेल एच्टी कोल ब्रुक्सां
  43. 3:23–3:30अग, रिग वेदक एक तश्वूक्त के गलत तरीका सा, विद्वादाह अधात सती प्रताके स्विक्रती देवेवाला न्यम मानी लेल है।
  44. 3:30–3:38सोची सके चे कतिक पैक ब्रहम, बाग में एचच भिल्सन जहन विद्वान शारनचार्या की प्रामानिक तिपनिक अदार पर एक रसुदाल है,
  45. 3:38–3:42और इस पष्ट के लेनी जे एहे सुक्त में विद्वादाग के कोनो लेक अच्छे नहीं,
  46. 3:42–3:45तसमिक्शाश्त्र एते सत्ति उजागर करेता ची.
  47. 3:46–3:49आप प्राचीन ग्रन्त सबसनिक्लिक, चोथ खण्ड मे अबेच्छे,
  48. 3:50–3:55माटिक भासन का अलोचना, इस समकालीन मेठली लगु कता का एक तसुंदर यात्रा चे.
  49. 3:55–4:00जग्दानन जहादवरर अचित माटिक भासन नामक एकठामे प्रवेश करी.
  50. 4:00–4:05इगे दार प्रसाध आहुनक पुत्र विबुक एक तब रोचक कता ची.
  51. 4:05–4:11बा बेटा कोना माटिक बरतन सह, मुर्तिकला अफेर श्टील दरिक बदलएत बजारक माँगच संग,
  52. 4:11–4:15अगर बाद्दाग मांगग संग संगर्ष करे चती से एक अदख मुलाची
  53. 4:15–4:19एक अदख कवस्तुनिष्ट समिक्षा करिला पर दूनु पक्ष सोजा अबएत चे
  54. 4:19–4:24सकरात्मक पक्ष एई जे कथा उप्योगिता से कला दरिक विकास के नीक जगा देखावे तची
  55. 4:24–4:28अगर देखागा देखावे तची पारमपरिक शिल्प के विकास के चिननित करे तची
  56. 4:28–4:32मुदा नकरात्मक पक्ष एई आची जे पिता लगतार पुट्र काज में दोष निकाले च्छी
  57. 4:32–5:02अगर देखाँ बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई �
  58. 5:02–5:04अरोला के मिला कबनाई तची
  59. 5:04–5:07एकर सबसे अदबुत विषेश्ता इए आची
  60. 5:07–5:11जे एकर शुर्वात आ अन्त एक्दम समान शब्दसा होई च्या
  61. 5:11–5:13इको लो सादारन काज नई च्या
  62. 5:13–5:17बलकी कवी सबखलेल एक्टा कटिन गनित जगा च्या
  63. 5:17–5:22अख्काव ये अख्श्डद्टा का आदार बनवे तची इ आंग तेरा
  64. 5:22–5:27दोहा कप पहल चरन में बलकल तेरा मात्रा होनाए अनिवार्या चे
  65. 5:27–5:34एक हु मात्रा कम वा भेशी भेल ता बुजू अकर चंदो बंग अर्ठाद सन्रचनात्मक त्रूटी मानल जाते
  66. 5:34–5:40इक्दम गनितिया सा टीक्ता, कठोर समपादना कावष्षक्ता कते खच्छाए से एते सपाष्ट बहुजाई तची.
  67. 5:40–5:45पहलुक मैठिली अकादमिक संसकरन में चंदो भंग का अनेक त्रूटी च्छले.
  68. 5:45–5:48मुदा बाद मे, साहित्ते अकादमिक जे संस्करनायल,
  69. 5:48–5:50जक्रा राम देवजा समपादित केलनी,
  70. 5:50–5:52उही में कमाल भेल अची.
  71. 5:52–5:54उ गेराई से समपादन का क,
  72. 5:54–5:57लाल दासक सही गनित्य अच्ठन्द के भेर सस्थाँपित केलनी.
  73. 5:57–5:59इप रमानित कराई तची,
  74. 5:59–6:03जे मात्र शब्दक नहीं बलके च्चन्दक रक्षाक रब से हो,
  75. 6:03–6:06साहित्तेक समिक्षाक एक ता प्रमुक्ह अंग च्चे.
  76. 6:06–6:09आब व्याकरन अच्चन्दक दून्या सब बाहर निक्ली का,
  77. 6:09–6:12च्टम अ अंतिम ख्ण्द दिस बड़े ची,
  78. 6:12–6:14सुलभ मैत्फिली साहित्यद.
  79. 6:14–6:22इदेखेट छी जे एई साहित्ति काज सबख सन्रक्षन अ समीक स्वाख आदूनिक समाज पर की प्रभाव पडी रहल चे.
  80. 6:22–6:27दिजितल आखाइविं कोना भहोतिक आब भोगोलिक सीमा के पार कर रहल ची
  81. 6:27–6:30शे हम सब नेपाल आब भारत के एक जोट्ता से देख सकै ची.
  82. 6:30–6:42ये जिजिटल पहल च़े से दूनु देशके मेठली पाथक आविद्वान सब के एक ता साजा मंच पर लावे रहल अची, जे काज पहले कठंचल से आब अब अब अब अब कर रहल अची.
  83. 6:42–6:46इसी मारहित दिजितल प्लाट्फोम इसुनिष्चित करेई तची
  84. 6:46–6:50जे रहाज देव मंडल आ एम प्रकाष धाजाका
  85. 6:50–6:52आदूनिक छेत्रिया लेक्ख सबखकाज
  86. 6:52–6:54वेश्विक स्तर पर सुरक्षित रहे.
  87. 6:54–6:57इसे नस च्फ साहितेक पहुज बड़े तची
  88. 6:57–7:01बल की मैठलिक विस्तार पुरा विष्वदरी भही रहे लची.
  89. 7:01–7:06इदिजिटल सन्रक्षन आदूनिक विष्य सबख नीव से हो बने बे तच्छे.
  90. 7:06–7:09उदाहरन ले ले ले एम प्रकाष जाक बाल गजल देखू.
  91. 7:09–7:12जही में एक ता गुलाभी बारभी डोल के
  92. 7:12–7:16आदूनिक भाजारक अपभूक्ता वादक प्रतीक बनाए का प्रस्तुत काईल्गल चे
  93. 7:16–7:17कमालक कल्पनाचे
  94. 7:17–7:19आराज्देव मंडलक कविता
  95. 7:19–7:22बाड्ख प्रभाव आज समाजिक बडलाव के
  96. 7:22–7:24एक्दम यतार्थ रूपे दर्षावे तच्छी
  97. 7:24–7:25इनव शेली
  98. 7:25–7:26अनव विषे
  99. 7:42–7:45उरी रूप सा उकर भविश्षक अस्टिट्वक निर्मान से हो करे तची
  100. 7:46–7:48प्राछीन वेज्जला का आदूनिक कविता दरिक
  101. 7:48–7:51इयात्रा देख है तची जे पाट्छे प्रामानिकता
  102. 7:51–7:53कोना मानव संसक्रितिक मुख्या आदार चे
  103. 7:54–7:56अगेर प्रष्नक संगे आएकी चर्चा

Plain text

आई जि खास विष्लेषन में स्वागत अछि। आई हम सब समिक्षा शास्ट्र, यानी साहित्तेक आलोचना का उई दुन्या में प्रवेश कर रहूल ची, जते सुख्ष्म सलग, ब्रिहदिस्टर दरी इदेखभ, जि कुन्ना कुन्नो पात्या का अख्शन्डथा, इतिहाज आस समपुन संस्क्रिती के आकार दैता चे, इक ता बर गेहर याट्रा चे. ता अव गब करेच्छी, आएक रूप रेखाग, हम सब शुवात करव विदे मैठली आन्दोलन्स, तक्राबाद वेद में शुद्रक प्रसंग, पश्च्च्मी विद्वान सब के अनुवादग किच पैग द्रूटी, माटिक भासन की आलोचना, रामायन का काव्या यान्द्रिकी, और अन्त में आदूनिक मैठ्ली सहितेक सुलबता पर चर्चा करब. इस वब किचु एक ता सुत्र में बान्धल अची, जे कुना साहित्तेक समिक्शा सत्तेके पुनर स्तापित करे तची. तचलू पहल विशेजन श्री गनेश करे ची विदे हमेठली आन्दोलन, अद्बूँग बाश्ट्ट्टीग आप बाशा ये बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा अगर मुल मन्त्र मानुशी मिहस संट्क्रताम अगर सोजा आरत है ची जी कतोर धिजितल संद्रक्षनक माधियम सा मानव संट्रती के उच आस्व्रक्षत करव इस श्रव भाशा कगबने चै समपोरन संट्रक्षनक कगब चै आब बड़े ची दो सर अद्ध्याएदिस, वेद में शुद्र, अदे हम सब देखाए जे साहितिक समिक्षा कोना प्रारंबेख समाजेक सन्रच्नाक सत्तिके सोथा लावेद अची. अख्सर लोक के मन में ब्रहम रहाद अची, मुदजकन प्रामानिक वेदिग ग्रन्त सबके सही संदरभ में अनुवाद होई चे, तद तस्वीर बिलकुल अलक भिटेचे. रिग्वेदक दसम मन्डलक इप्रस्संग स्पष्ट करे तची जि शुद्रक कोनु अप्मान जनक वर्ग नहीं चती उ ब्रम्हान्दिय श्रीरक उ आवश्षक आ आदार बूद पैर चतिन जिस समपून मानव परिवारक बार बिल्खुल औहिना उठावे चती जना पैर श्रीरक बार उठावैचे. इक तब बड़े गेहेर अंतर समवन्धक चित्री प्रस्थ। करेता ची. ब्रमान ने शरीरक कलपना करू. ब्रमन ज्यानक्लेल सम्राद पूरुष्चक मुग्छती, शत्रीः न्याय अरक्षाक्लेल बाह चती, वैश्य, बोजन आद्धनक लेल जांग, आशुद्र, सहाएक सेवा आजिविको पारजनक लेल पैरच्ठी. मुल गब यह जे इच्छारु सामाजिक विवस्ता समान रूप से प्रजापतिक अविनाश्षी अंग मानल गेल अच्छे. कोनो वर्ग कम वा भेसी नही थब क महत्व बनाबर चे. तेसर विश्य अच्य, पश्चमी विद्वान सब कक अनुवादक त्रूटी. इविश्य दिखावे तचे, जे कोना शरुवाती अनुवादक सब से अर्थ कक अनर्थ बहगिन. निस्पक्ष रूप सा पाथ्ध्या प्रमान के न जाची तब भद आश्चर्या हूए तची व्ड विट्नीक अथर्वेद अनुवाद के ले जाएं औ मूल संस्क्रिच्ष्व्द मिह कल लाक्षनिक संदर्ब बिल्कुल नहीं भूज्सकला उ एक रा थार भो कपे शाब करव अनुवादित कर्दिलन, जखन की पन्टित साथवली करक सही अनुवाद श्पष्ट करे तची, जे एकर अर्थ वास्टव में बादर्क वर्षाक बोच्धार होई तची, संदर्ब का अबहाव में कोना पैग गडबडी बहुसकट अची से एक ता सतीक उदार अचे एक ता और गंभीर अनुवादेक त्रूटी भेल एच्टी कोल ब्रुक्सां अग, रिग वेदक एक तश्वूक्त के गलत तरीका सा, विद्वादाह अधात सती प्रताके स्विक्रती देवेवाला न्यम मानी लेल है। सोची सके चे कतिक पैक ब्रहम, बाग में एचच भिल्सन जहन विद्वान शारनचार्या की प्रामानिक तिपनिक अदार पर एक रसुदाल है, और इस पष्ट के लेनी जे एहे सुक्त में विद्वादाग के कोनो लेक अच्छे नहीं, तसमिक्शाश्त्र एते सत्ति उजागर करेता ची. आप प्राचीन ग्रन्त सबसनिक्लिक, चोथ खण्ड मे अबेच्छे, माटिक भासन का अलोचना, इस समकालीन मेठली लगु कता का एक तसुंदर यात्रा चे. जग्दानन जहादवरर अचित माटिक भासन नामक एकठामे प्रवेश करी. इगे दार प्रसाध आहुनक पुत्र विबुक एक तब रोचक कता ची. बा बेटा कोना माटिक बरतन सह, मुर्तिकला अफेर श्टील दरिक बदलएत बजारक माँगच संग, अगर बाद्दाग मांगग संग संगर्ष करे चती से एक अदख मुलाची एक अदख कवस्तुनिष्ट समिक्षा करिला पर दूनु पक्ष सोजा अबएत चे सकरात्मक पक्ष एई जे कथा उप्योगिता से कला दरिक विकास के नीक जगा देखावे तची अगर देखागा देखावे तची पारमपरिक शिल्प के विकास के चिननित करे तची मुदा नकरात्मक पक्ष एई आची जे पिता लगतार पुट्र काज में दोष निकाले च्छी अगर देखाँ बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई बाद्टाई � अरोला के मिला कबनाई तची एकर सबसे अदबुत विषेश्ता इए आची जे एकर शुर्वात आ अन्त एक्दम समान शब्दसा होई च्या इको लो सादारन काज नई च्या बलकी कवी सबखलेल एक्टा कटिन गनित जगा च्या अख्काव ये अख्श्डद्टा का आदार बनवे तची इ आंग तेरा दोहा कप पहल चरन में बलकल तेरा मात्रा होनाए अनिवार्या चे एक हु मात्रा कम वा भेशी भेल ता बुजू अकर चंदो बंग अर्ठाद सन्रचनात्मक त्रूटी मानल जाते इक्दम गनितिया सा टीक्ता, कठोर समपादना कावष्षक्ता कते खच्छाए से एते सपाष्ट बहुजाई तची. पहलुक मैठिली अकादमिक संसकरन में चंदो भंग का अनेक त्रूटी च्छले. मुदा बाद मे, साहित्ते अकादमिक जे संस्करनायल, जक्रा राम देवजा समपादित केलनी, उही में कमाल भेल अची. उ गेराई से समपादन का क, लाल दासक सही गनित्य अच्ठन्द के भेर सस्थाँपित केलनी. इप रमानित कराई तची, जे मात्र शब्दक नहीं बलके च्चन्दक रक्षाक रब से हो, साहित्तेक समिक्षाक एक ता प्रमुक्ह अंग च्चे. आब व्याकरन अच्चन्दक दून्या सब बाहर निक्ली का, च्टम अ अंतिम ख्ण्द दिस बड़े ची, सुलभ मैत्फिली साहित्यद. इदेखेट छी जे एई साहित्ति काज सबख सन्रक्षन अ समीक स्वाख आदूनिक समाज पर की प्रभाव पडी रहल चे. दिजितल आखाइविं कोना भहोतिक आब भोगोलिक सीमा के पार कर रहल ची शे हम सब नेपाल आब भारत के एक जोट्ता से देख सकै ची. ये जिजिटल पहल च़े से दूनु देशके मेठली पाथक आविद्वान सब के एक ता साजा मंच पर लावे रहल अची, जे काज पहले कठंचल से आब अब अब अब अब कर रहल अची. इसी मारहित दिजितल प्लाट्फोम इसुनिष्चित करेई तची जे रहाज देव मंडल आ एम प्रकाष धाजाका आदूनिक छेत्रिया लेक्ख सबखकाज वेश्विक स्तर पर सुरक्षित रहे. इसे नस च्फ साहितेक पहुज बड़े तची बल की मैठलिक विस्तार पुरा विष्वदरी भही रहे लची. इदिजिटल सन्रक्षन आदूनिक विष्य सबख नीव से हो बने बे तच्छे. उदाहरन ले ले ले एम प्रकाष जाक बाल गजल देखू. जही में एक ता गुलाभी बारभी डोल के आदूनिक भाजारक अपभूक्ता वादक प्रतीक बनाए का प्रस्तुत काईल्गल चे कमालक कल्पनाचे आराज्देव मंडलक कविता बाड्ख प्रभाव आज समाजिक बडलाव के एक्दम यतार्थ रूपे दर्षावे तच्छी इनव शेली अनव विषे उरी रूप सा उकर भविश्षक अस्टिट्वक निर्मान से हो करे तची प्राछीन वेज्जला का आदूनिक कविता दरिक इयात्रा देख है तची जे पाट्छे प्रामानिकता कोना मानव संसक्रितिक मुख्या आदार चे अगेर प्रष्नक संगे आएकी चर्चा

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