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गजेन्द्र_ठाकुरक_समीक्षाशास्त्र_आ_दू_टा_विद्यापति.m4a

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Part 4 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 4
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  1. 0:00–0:12आए हम्रा सब गजेंद्र ताकूरक मेठिली समीख्षा सास्त्र बाग्दू पर विमर्ष्कर हैल जते वेद क अन्वाद सलो क आदूनिक बाल कताथरी चर्चा आचे
  2. 0:12–0:17आए, और इई समगरी गहन शोद से बहरे ला चे
  3. 0:17–0:21मुदा हमर पहल दियान एकर सन्रच्ना अप्रवापर अची
  4. 0:21–0:24जे वर्तमान में अथ्यदिक खन्डित अची
  5. 0:24–0:29मने इविबिन युग आविद्धाक विषे सबख बीच पाथख के बद्का दैचे
  6. 0:30–0:32एक्दम सटी कवलोकन अची
  7. 0:32–0:35प्रस्त्त् समग्री में सन्देह नहीं जे गेहें विचार अच्छे,
  8. 0:35–0:39मुदग कम्जोरी इए अच्छे, जे प्राचीन, वेदिक, विष्लेशन,
  9. 0:39–0:43और आदहुनिक साहित्या के भीच कोनो सहज मार्ग नहीं अच्छे.
  10. 0:43–0:45आप, शुर्वात बहुत अकादमी कची.
  11. 0:45–0:48वेद में शुद्र का इस्थितिपर बहास अची,
  12. 0:48–0:55जिना रिग वेदक पूरुष सुक्त में पाँस अद्पति का अच्ट समाजक भार वाहन कर अची.
  13. 0:55–1:04बिल्कुल और तकर भाद पाश्चात्य विद्वान जैसा विटनी अखोल ब्रुक द्वारा केल गेल गलत अनुवादक का खन्दन से हो आची.
  14. 1:04–1:13मुदद्तकर तुरन्त बाद बिना कुनो चेता उनेक इजग्दानन्द जा मनुकेर भाल कता मातिक भासन का समिक्षा दिस मुडी जाएच्छे.
  15. 1:13–1:20आ, अते सफेर लाल्दासक रामायान में कुन्डलिया चंदक्स का विष्लेशन पर चली जाएच्छी.
  16. 1:20–1:23पात्ख एक्ता विश्यस दूसर विश्यप पर खस्ध थची?
  17. 1:23–1:25थच्लत नहीं ची
  18. 1:25–1:28पात्ख के एक्ता मनसिक जधका लगा थे ची
  19. 1:28–1:32उप्राचीन वेदक दर्षन में आपन मस्तिक्स लगा रहल होगी थे ची
  20. 1:32–1:35आप आप उक्रा अचानक आदोनिक कता दिस लो आबएच ची
  21. 1:35–1:40तज्जाव इए ज्जे विशे सबह के थीमेटिक रूप सजावू
  22. 1:40–1:43आर एक खंद सदोसर खंद में प्रवेश करेत काल
  23. 1:43–1:46एक तब श्पष्ट वेचारिक पूलक निरमान करू.
  24. 1:46–1:51माने एकोनो अपनाइत नदी के पार करबाक लेल
  25. 1:51–1:54अदारनाक लिल वेदिक अनुवादक खंद समाप्त भेला बाद
  26. 1:54–1:56आहा सीदे कथा पर नहीं जाू,
  27. 1:56–1:58एक ता अनुच्छेद जोडी सकत ची.
  28. 1:58–2:02जे इब दावेए, जे अटीत में वेद में भेल गलत व्याख्या,
  29. 2:02–2:04कोना आदूनिक काल में से हो,
  30. 2:04–2:34तब ज़ाग़ नद्वाग, नद्वाग नद्वाग, नद्वाग नद्वाग, नद्वाग नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद
  31. 2:34–2:37आहा आदूनिक सहित्यक समिक्षा दिश बडव.
  32. 2:37–2:38बलको.
  33. 2:38–2:42आहा पात्ख के मातिक बासन्दिस लोजा सके ची.
  34. 2:42–2:50आहा कही सके ची जे एताई लेक्षा इस्टील आ आन दातुवला कत्थ्यक विस्तार नहीं है बागजे चूक भेला ची.
  35. 2:50–2:52उसुक्ष्म पतनक अबहावच.
  36. 2:52–2:54इब बहुत इस्पस्त आची
  37. 2:54–2:56आजकन आहा लाल्दासक रमायण में
  38. 2:56–2:59कुंडल्या चंदक विसलेशन दिस बड़ब
  39. 2:59–3:03आहा फेर उही पुलके काज में लोसके ची नहीं
  40. 3:03–3:05आहा आहा लेख सके ची
  41. 3:05–3:08जे पाट्ध्यक के सुक्ष्मता सब पडबा की परमपरा
  42. 3:08–3:11केवल कत्यदरी सीमित नहीं आफ़ी,
  43. 3:11–3:12बलके चन्द शास्टर में
  44. 3:12–3:15मात्राक सती गनना में से हो
  45. 3:15–3:16प्रतिविम्बित होई तची.
  46. 3:16–3:18इ मात्र एक ता उपाया ची,
  47. 3:18–3:20मुदा एसा पूरा आलेक
  48. 3:20–3:21एक सुत्र में बनदा जाएत,
  49. 3:21–3:23पातख के भुजहान जाएत,
  50. 3:23–3:28जे इतीनो अद्याय असल में सुख्ष्म पत्हन अबिष्लेष्णक भिन-भिन प्रयोग अची.
  51. 3:28–3:30एक्दम सही कहलो.
  52. 3:30–3:32जगन लेक्ध इग कारन बतादेई च्थिन,
  53. 3:32–3:35जे हम वैदिक अनुवादक के गल्ती सा,
  54. 3:35–3:38बाल कता के गल्ती दिस की इग जार हल ची,
  55. 3:38–3:41तखन पात्ख के कुनो जधका नहीं लगाई तखुए.
  56. 3:41–3:49तव जेहिना विशयक भीछ पूलक काज महत्वपूरन अची, ततईना तोन वा स्वरक इस्तिरता से हो अवश्यक अची.
  57. 3:49–3:52आब सामग ग्रीक स्वर आश्यली पर बात करेची.
  58. 3:52–3:53आप सामग ग्रीक स्वर आश्यली पर बात करेची.
  59. 3:53–3:55आप, इबहुत आवष्शक अछी.
  60. 3:55–3:58एकर विष्लेशनात्मक तोन वर्तमान में,
  61. 3:58–4:02कथोर अकादमेक शोद आतीखा वेक्तिगत आख्ष्याप भीच,
  62. 4:02–4:04बड़ो असन्तूलित दंग से जुली रहे लगजी.
  63. 4:04–4:07जाहे से एकर गंभीर प्रभाव कंभ ही जाए तची.
  64. 4:07–4:17इपो थिक एक ता बहुत पैग विदंवना आचे, एक दिस लेखख लाल दासक रामायन में कुंडलिया चंदकेन बहुत विद्वता पून तरीका सवंजावे चतिं.
  65. 4:17–4:22अग, उ कुंडलियाक गनेत, मने 13-11 मात्राक तोहा,
  66. 4:22–4:27अग, 11-13 मात्राक रोला कमिष्रन के जना विष्लेषत कराएच्चती,
  67. 4:27–4:28उ सच्छ्मुच प्रशंसनी आची.
  68. 4:28–4:31मोदा कमजोरी अची जि दोसर्दिस,
  69. 4:31–4:34जखनो मेठली अकादमीक समपादक
  70. 4:34–4:37वा प्रोफ रीटर को अग्यान्ता पर बाद करे चती,
  71. 4:37–4:39तो उव्यक्तिगत हम्लापर उत्री जाए चती.
  72. 4:39–4:42राँ, हम्रा बुजल अची जहां कते जार है लची.
  73. 4:42–4:44मुन्नी काम तक एकान की
  74. 4:44–4:46जिन्दगीक मोल का आलोचनात्मक प्रसंग में
  75. 4:46–4:50मलिंग्या जी का जातिवादी रंग मनच पर से हो वेक्तिगट तिपनी आची.
  76. 4:50–4:56बिल्कु आओ तिपनी एक ता विद्वत्ता पून वा अकाटमिक तोन के
  77. 4:56–4:58खंडित कर दे चे.
  78. 4:58–5:04मुतहम एते एक्त प्रष्न थाल करा चाब, जा कोनो प्रूप रीटर क अग्यान्ता के कारन,
  79. 5:04–5:10कुन्डिल्या जा का जतिल चन्द भंग बहुर हल अच्छे, तक की लेक्ख क्रोद जाएज नहीं अच्छे.
  80. 5:10–5:20क्रोद बलक्ल जायद अच्छे, अज्झिम्बिदारी तैकरव से हो समिक्षाक एक ता काज अच्छे, मुदप्रष्न इए ची जे आहा उक्रा कोना अभिव्यक्त करहल ची.
  81. 5:20–5:27माने की समिक्षा शास्त्र में समपादक वा प्रूप रीटर के ओकर गल्तीक लेल जिमेदार तहराव ब गलत अचे.
  82. 5:27–5:35नहीं मुददजक्हन आहा एक ता अकाटमिक लेक में कोनो व्यकती के मुर्ख वा अग्यानी कहेट ची, ता लेक्ख गर्मा खसी जाए तची.
  83. 5:35–5:42आप पाथक के लगेत जे आहाग कोनो ब्यक्तिगत कुन्ता निकाली लहल ची वग गबशव कर रहल ची
  84. 5:42–5:50इक दम एकर कार ने आहाग जे आस्ली शोद अची ओखर विष्वसनियता पर सेहु प्रष्नचन लागी जाए ची
  85. 5:50–5:55तज़्जाओ एब हैल जे व्यक्तिगछ शिकायत वा अख्शेप के हताखग,
  86. 5:55–5:58उक्रा व्रहद, संस्तागत वा समाज्शास्त्रिया आलोचना क्रूब दियो.
  87. 5:58–6:02आजिक्रा हम्रा सव इंस्टिटुचनल क्रितिक कहेट छी,
  88. 6:02–6:05इएक ता बहुत नीक उपाया ची.
  89. 6:05–6:11मैंने, हमरा क्रोदा के वक्तिगत निशाना साहताक, बिवस्थागत क्हामी पर केंद्रित करवाक अची.
  90. 6:11–6:16एकर कोनो कंक्रीट उदाहरन्दी जे इपाठे में कोना बदलत?
  91. 6:16–6:22दिखो, मैठली अकाद्दमिक प्रुफ रीटर के अग्यानता से चन्धो बहंग भेलच.
  92. 6:22–6:26इब उगवाग बदला आहा किचु आन लिख सकैची
  93. 6:26–6:27जे ना की?
  94. 6:28–6:35आहा इब लिख सकैची जे संस्तागत अस्तर पर चंदश सास्त्र परमपराक सन्रक्षन में
  95. 6:35–6:39गंभीर चुक भेलच आहा इब दरक दास अची
  96. 6:39–6:44जे जगन अकादमिक संसता सब चन्दक गनित्य प्रक्रतिके नहीं भुजगे तची
  97. 6:44–6:47तची तची पात्य विक्रतिय उत्पन रही तची
  98. 6:47–6:49ओ, ये तबहुत निक लागल सूनी में
  99. 6:49–6:54आँसा आँहां कोनो एक ता वेक्ती विषेशक निशाना नहीं बना रहा हो थची
  100. 6:54–6:58बलकी एक ता पैग बेबस्थागत समस्यादेस इशारा करहल ची.
  101. 6:58–7:03एक दम और एब हाशाक पर्योग लेखख के एक ता क्रोदित व्यक्तिक बडला
  102. 7:03–7:07परमपराक रक्षक करोप में स्तापित करेता ची.
  103. 7:07–7:09आम लंगिया जी वला प्रसंग में,
  104. 7:09–7:11जटे जातिवादी रंग मंच का आरोपची
  105. 7:11–7:14औते इस समाज्शास्त्रीय आलोचना कोना काजकरत
  106. 7:14–7:18मलेंग्या जीक विक्तिगत नाम लोग का अख्षेप करबाग बढ़ा
  107. 7:18–7:20आहा एक अंकीक विष्लेषन में
  108. 7:20–7:23समकालीन मैठिली रंग मंच में
  109. 7:23–7:53समाज शास्त्रिये प्रत्विदित्व पर गंभीर विमष्क सकच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्
  110. 7:53–7:57या इजे गंभीरता प्रमानक बात हमरा सब केल हूं,
  111. 7:57–8:02उकर सबसे बेशी आवश्षकता अईपोतिक तेसर आ अन्तिम हिस्सा क्या इचे.
  112. 8:02–8:08तेसर अ सबसे महत्व पून मुद्डा सामागरेक पूनता अग केंद्र बिन्दूसा जोडा लग.
  113. 8:08–8:38अदो सर अज़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़
  114. 8:38–8:40अगर ब्रामड़ समाजक अंग चला
  115. 8:40–8:44जिनका बाद में पाग पहीरा कगमर विड्ध्ध्पती बनाले लिगे
  116. 8:44–8:49अई विक्ती उही राज पन्टित विड्ध्पती से पुरनता भिन्न चला
  117. 8:49–8:52जिस संसक्रित में ग्रन्त लिखच्छला
  118. 8:52–8:55वगेर ब्रामड समाजक अंग चला
  119. 8:55–9:00जिनका बाद में पाग पहिरा का हमर विद्यापती बना लेलगे
  120. 9:00–9:04आ ई व्यक्ती उही राज पन्दित विद्यापती से पुर्नता भिन्न चला
  121. 9:04–9:07जिस संस्क्रित में ग्रन्त लिखच्छला
  122. 9:07–9:09मुदा कमजोरी ई आची
  123. 9:09–9:16ये यी बाग एतियास्च्ष्ष्व दूनात्मक पट्धन्से बेशी प्रश्नात्मक श्यली पर निरभर आची.
  124. 9:16–9:22माने यी दावी मात्र किचु अनुत्तरित प्रश्नका बबर थागर आची, कोनो तोस प्रमाण नहाची.
  125. 9:22–9:29एक्दम आ अईतियासिक शोद में केवल प्रष्न पुषब एक्ता सिद्दान्त इस्थापित नहीं का सके तची
  126. 9:30–9:37जखन आ हा इतियासिक कोनो इस्थापित माननता कें चुनाती डएची ताहा के तोस पाथ्ठ्प्रमार देबपडदत
  127. 9:37–9:42मुदा जखन पुरान अस्थापित मानेताके तोडल जाई तची
  128. 9:42–9:44जे कर चोसो सालिक परमपराएज
  129. 9:44–9:48तकन शुर्वात ता सवाल पुछे कईये हूई तची नहीं की.
  130. 9:48–9:54राद, प्रशनात्मक शैली पाटख के सोच्बाक लिल्त मजबूर कब सकई तची
  131. 9:54–10:01मुदा पारमपरिक विद्वान एक्रा असानी से कुनो अकादमिक तज्वीजक बिना कहारिज कर देता.
  132. 10:01–10:06तस्सुजाओ इभेल जे एक रान्तिकारी सिद्द्धान तक कि प्रमानित कर बाकलेल
  133. 10:06–10:09एक ता अलग अ किन्द्रित उप्खंड बनाओ.
  134. 10:09–10:21बिल्कुल जाही में जोती रीश्वर, काल कहन्द, परम परा, आप पदावली, बनाम संस्क्रित गरन्तक साहित्तिक प्रमाण के आमने सामने राखी कषिद्ध काईल जाओ.
  135. 10:21–10:30मात्र इग कहब जब पदावली में सरवाहाराक दर्द अची असंख्रित गरन्ते में नहीं कि इई अक तन्नवद्रिष्टिक ले प्र्याप्त नहीं ची.
  136. 10:30–10:36नवद्रिष्टिक लेल इप्र्याप्त बहस्वक अगे तची. मुदा समीख्षा शास्ट्रक कपोथिक ले नहीं.
  137. 10:51–10:52इजाज कुना का सके ची?
  138. 10:52–10:56स्लम अग्रमन मन्द्र भ्रष्ट रहे बाग बात
  139. 10:56–10:58वर राजा कस्तुती आची.
  140. 10:58–11:01अग्तक्हन अख्रा सुजे एक्ता टेबल में
  141. 11:01–11:04पदावलीक उही विष्ष्ट पाती सुतुलना करू
  142. 11:04–11:06जते व्याह आध देसान्तर
  143. 11:06–11:09वा सर्व हराक दर्दक छित्रन अचे
  144. 11:09–11:10एक दम सही
  145. 11:10–11:12आहा के इदे खावबदत
  146. 11:12–11:14जे कीर्तिलता लिखनी हार
  147. 11:14–11:17व्यक्तेक सामाजिक अराजनितिक शब्दावली
  148. 11:17–11:19पदावली लिखनी हार
  149. 11:19–11:22व्यक्तेक शब्दावली से इत्तेक भिन अची
  150. 11:22–11:26जे तुनो एक दिमागक उपज भही नी सकेत छी.
  151. 11:26–11:29माने आहा चहे छी, जे तुनो गरन्तक शब्दावली,
  152. 11:30–11:33सरोकार अ समाजिक द्रस्टी कोनक समानांतर राखल जाओ,
  153. 11:34–11:36जाहे सब विषमता सपष्ट बहूसकेई.
  154. 11:36–11:42अग, और एकर अत्रिक्त आहा जूतिरी श्वरक संदर्भ के से हो विस्तार सब प्रयोग कर सके ची.
  155. 11:42–11:51जूतिरी श्वरक वरनन ग्रत्नाकर को उही अन्शक उद्द्रित करू जताई आई समानान्तर परमपराव लोक गायक सबख उलीक है ची.
  156. 11:51–11:59जखन आहा एक तिहासेक संदर्ब अ साहित्तिक साक्षष दूनु के मिलाका एक तदाचा तेर्खब तकन इतर्क अकाते बहुजाएत.
  157. 11:59–12:09बिल्कुल, आईसे यी सिद्धानत एक तब भावुग दाभीवा कुन्सप्रसी त्योरी से अड़े का, एक तग गंभीर अकाडमिक सथ्टे में बडली जाएत.
  158. 12:09–12:13जखन आहा अपन तर्क के साक्षे के आदार देची
  159. 12:13–12:16तकन विरोदी विचार वाला समीख्षा से हो
  160. 12:16–12:19आहा के साक्षे के अंदेखा नहीं कर पवेत अची
  161. 12:19–12:23अख्रा साक्षे के कार्टल पडद ची जे बहुते कठिन काज अची
  162. 12:23–12:30आई बहुत आविश्यक अची के एक ता लेखखक जे मोल विचार अची उसच्मुज बहुत क्रान्तिकारी आची.
  163. 12:30–12:37तद सन्शेप में कही तद गजंद्र थाख्कृर की सामगरी गजंशोद आ मोलिक विचार सबखक एक ता उत्किष्ट नमूना आचे.
  164. 12:37–12:44एकर प्रभावके और तीक्षन आधाते करबाकलेल तींता मुख्य काज काल जासकेई चे.
  165. 12:44–12:53आप, पहल विविद विष्या सबह के मने प्राषीन सलाक आदनिक दरी एक ता मज्भूथ वैचारिक लिंक वप पुल्फ माद्यम से जोडब.
  166. 12:53–13:05जाहिसा पात्खबिना बद्केल एक तनिरन्तर प्रवाहमे रहे, दो सर आलोचनाक स्वरक के व्यक्तिगत अक्षेप वा कुन्ता सा उठाक, संस्त्ठगत असद्द्ठन्तिक विमर्ष्धिस्लेब.
  167. 13:05–13:10तान्तिकारी सिद्धान्तके केवल प्रष्नात्मक शैली पण नहीं चोड,
  168. 13:10–13:13उक्रा सोजे पाथ्य सक्ष्य साप्रमानित करब.
  169. 13:13–13:16श्रोतासा हमर आग्रह अची,
  170. 13:16–13:19जे इग रच्नात्मक सुजावस सब के शामिल करत,
  171. 13:19–13:22अपन सामगरी के और परिष्क्रित करू,
  172. 13:22–13:27अपन समवर्दिध सामगरी के आगु से हु विमर्ष्कलेल हम्रा सब लग अवश्षे पठाव.

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आए हम्रा सब गजेंद्र ताकूरक मेठिली समीख्षा सास्त्र बाग्दू पर विमर्ष्कर हैल जते वेद क अन्वाद सलो क आदूनिक बाल कताथरी चर्चा आचे आए, और इई समगरी गहन शोद से बहरे ला चे मुदा हमर पहल दियान एकर सन्रच्ना अप्रवापर अची जे वर्तमान में अथ्यदिक खन्डित अची मने इविबिन युग आविद्धाक विषे सबख बीच पाथख के बद्का दैचे एक्दम सटी कवलोकन अची प्रस्त्त् समग्री में सन्देह नहीं जे गेहें विचार अच्छे, मुदग कम्जोरी इए अच्छे, जे प्राचीन, वेदिक, विष्लेशन, और आदहुनिक साहित्या के भीच कोनो सहज मार्ग नहीं अच्छे. आप, शुर्वात बहुत अकादमी कची. वेद में शुद्र का इस्थितिपर बहास अची, जिना रिग वेदक पूरुष सुक्त में पाँस अद्पति का अच्ट समाजक भार वाहन कर अची. बिल्कुल और तकर भाद पाश्चात्य विद्वान जैसा विटनी अखोल ब्रुक द्वारा केल गेल गलत अनुवादक का खन्दन से हो आची. मुदद्तकर तुरन्त बाद बिना कुनो चेता उनेक इजग्दानन्द जा मनुकेर भाल कता मातिक भासन का समिक्षा दिस मुडी जाएच्छे. आ, अते सफेर लाल्दासक रामायान में कुन्डलिया चंदक्स का विष्लेशन पर चली जाएच्छी. पात्ख एक्ता विश्यस दूसर विश्यप पर खस्ध थची? थच्लत नहीं ची पात्ख के एक्ता मनसिक जधका लगा थे ची उप्राचीन वेदक दर्षन में आपन मस्तिक्स लगा रहल होगी थे ची आप आप उक्रा अचानक आदोनिक कता दिस लो आबएच ची तज्जाव इए ज्जे विशे सबह के थीमेटिक रूप सजावू आर एक खंद सदोसर खंद में प्रवेश करेत काल एक तब श्पष्ट वेचारिक पूलक निरमान करू. माने एकोनो अपनाइत नदी के पार करबाक लेल अदारनाक लिल वेदिक अनुवादक खंद समाप्त भेला बाद आहा सीदे कथा पर नहीं जाू, एक ता अनुच्छेद जोडी सकत ची. जे इब दावेए, जे अटीत में वेद में भेल गलत व्याख्या, कोना आदूनिक काल में से हो, तब ज़ाग़ नद्वाग, नद्वाग नद्वाग, नद्वाग नद्वाग, नद्वाग नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद्वाग, नद आहा आदूनिक सहित्यक समिक्षा दिश बडव. बलको. आहा पात्ख के मातिक बासन्दिस लोजा सके ची. आहा कही सके ची जे एताई लेक्षा इस्टील आ आन दातुवला कत्थ्यक विस्तार नहीं है बागजे चूक भेला ची. उसुक्ष्म पतनक अबहावच. इब बहुत इस्पस्त आची आजकन आहा लाल्दासक रमायण में कुंडल्या चंदक विसलेशन दिस बड़ब आहा फेर उही पुलके काज में लोसके ची नहीं आहा आहा लेख सके ची जे पाट्ध्यक के सुक्ष्मता सब पडबा की परमपरा केवल कत्यदरी सीमित नहीं आफ़ी, बलके चन्द शास्टर में मात्राक सती गनना में से हो प्रतिविम्बित होई तची. इ मात्र एक ता उपाया ची, मुदा एसा पूरा आलेक एक सुत्र में बनदा जाएत, पातख के भुजहान जाएत, जे इतीनो अद्याय असल में सुख्ष्म पत्हन अबिष्लेष्णक भिन-भिन प्रयोग अची. एक्दम सही कहलो. जगन लेक्ध इग कारन बतादेई च्थिन, जे हम वैदिक अनुवादक के गल्ती सा, बाल कता के गल्ती दिस की इग जार हल ची, तखन पात्ख के कुनो जधका नहीं लगाई तखुए. तव जेहिना विशयक भीछ पूलक काज महत्वपूरन अची, ततईना तोन वा स्वरक इस्तिरता से हो अवश्यक अची. आब सामग ग्रीक स्वर आश्यली पर बात करेची. आप सामग ग्रीक स्वर आश्यली पर बात करेची. आप, इबहुत आवष्शक अछी. एकर विष्लेशनात्मक तोन वर्तमान में, कथोर अकादमेक शोद आतीखा वेक्तिगत आख्ष्याप भीच, बड़ो असन्तूलित दंग से जुली रहे लगजी. जाहे से एकर गंभीर प्रभाव कंभ ही जाए तची. इपो थिक एक ता बहुत पैग विदंवना आचे, एक दिस लेखख लाल दासक रामायन में कुंडलिया चंदकेन बहुत विद्वता पून तरीका सवंजावे चतिं. अग, उ कुंडलियाक गनेत, मने 13-11 मात्राक तोहा, अग, 11-13 मात्राक रोला कमिष्रन के जना विष्लेषत कराएच्चती, उ सच्छ्मुच प्रशंसनी आची. मोदा कमजोरी अची जि दोसर्दिस, जखनो मेठली अकादमीक समपादक वा प्रोफ रीटर को अग्यान्ता पर बाद करे चती, तो उव्यक्तिगत हम्लापर उत्री जाए चती. राँ, हम्रा बुजल अची जहां कते जार है लची. मुन्नी काम तक एकान की जिन्दगीक मोल का आलोचनात्मक प्रसंग में मलिंग्या जी का जातिवादी रंग मनच पर से हो वेक्तिगट तिपनी आची. बिल्कु आओ तिपनी एक ता विद्वत्ता पून वा अकाटमिक तोन के खंडित कर दे चे. मुतहम एते एक्त प्रष्न थाल करा चाब, जा कोनो प्रूप रीटर क अग्यान्ता के कारन, कुन्डिल्या जा का जतिल चन्द भंग बहुर हल अच्छे, तक की लेक्ख क्रोद जाएज नहीं अच्छे. क्रोद बलक्ल जायद अच्छे, अज्झिम्बिदारी तैकरव से हो समिक्षाक एक ता काज अच्छे, मुदप्रष्न इए ची जे आहा उक्रा कोना अभिव्यक्त करहल ची. माने की समिक्षा शास्त्र में समपादक वा प्रूप रीटर के ओकर गल्तीक लेल जिमेदार तहराव ब गलत अचे. नहीं मुददजक्हन आहा एक ता अकाटमिक लेक में कोनो व्यकती के मुर्ख वा अग्यानी कहेट ची, ता लेक्ख गर्मा खसी जाए तची. आप पाथक के लगेत जे आहाग कोनो ब्यक्तिगत कुन्ता निकाली लहल ची वग गबशव कर रहल ची इक दम एकर कार ने आहाग जे आस्ली शोद अची ओखर विष्वसनियता पर सेहु प्रष्नचन लागी जाए ची तज़्जाओ एब हैल जे व्यक्तिगछ शिकायत वा अख्शेप के हताखग, उक्रा व्रहद, संस्तागत वा समाज्शास्त्रिया आलोचना क्रूब दियो. आजिक्रा हम्रा सव इंस्टिटुचनल क्रितिक कहेट छी, इएक ता बहुत नीक उपाया ची. मैंने, हमरा क्रोदा के वक्तिगत निशाना साहताक, बिवस्थागत क्हामी पर केंद्रित करवाक अची. एकर कोनो कंक्रीट उदाहरन्दी जे इपाठे में कोना बदलत? दिखो, मैठली अकाद्दमिक प्रुफ रीटर के अग्यानता से चन्धो बहंग भेलच. इब उगवाग बदला आहा किचु आन लिख सकैची जे ना की? आहा इब लिख सकैची जे संस्तागत अस्तर पर चंदश सास्त्र परमपराक सन्रक्षन में गंभीर चुक भेलच आहा इब दरक दास अची जे जगन अकादमिक संसता सब चन्दक गनित्य प्रक्रतिके नहीं भुजगे तची तची तची पात्य विक्रतिय उत्पन रही तची ओ, ये तबहुत निक लागल सूनी में आँसा आँहां कोनो एक ता वेक्ती विषेशक निशाना नहीं बना रहा हो थची बलकी एक ता पैग बेबस्थागत समस्यादेस इशारा करहल ची. एक दम और एब हाशाक पर्योग लेखख के एक ता क्रोदित व्यक्तिक बडला परमपराक रक्षक करोप में स्तापित करेता ची. आम लंगिया जी वला प्रसंग में, जटे जातिवादी रंग मंच का आरोपची औते इस समाज्शास्त्रीय आलोचना कोना काजकरत मलेंग्या जीक विक्तिगत नाम लोग का अख्षेप करबाग बढ़ा आहा एक अंकीक विष्लेषन में समकालीन मैठिली रंग मंच में समाज शास्त्रिये प्रत्विदित्व पर गंभीर विमष्क सकच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च् या इजे गंभीरता प्रमानक बात हमरा सब केल हूं, उकर सबसे बेशी आवश्षकता अईपोतिक तेसर आ अन्तिम हिस्सा क्या इचे. तेसर अ सबसे महत्व पून मुद्डा सामागरेक पूनता अग केंद्र बिन्दूसा जोडा लग. अदो सर अज़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़ अगर ब्रामड़ समाजक अंग चला जिनका बाद में पाग पहीरा कगमर विड्ध्ध्पती बनाले लिगे अई विक्ती उही राज पन्टित विड्ध्पती से पुरनता भिन्न चला जिस संसक्रित में ग्रन्त लिखच्छला वगेर ब्रामड समाजक अंग चला जिनका बाद में पाग पहिरा का हमर विद्यापती बना लेलगे आ ई व्यक्ती उही राज पन्दित विद्यापती से पुर्नता भिन्न चला जिस संस्क्रित में ग्रन्त लिखच्छला मुदा कमजोरी ई आची ये यी बाग एतियास्च्ष्ष्व दूनात्मक पट्धन्से बेशी प्रश्नात्मक श्यली पर निरभर आची. माने यी दावी मात्र किचु अनुत्तरित प्रश्नका बबर थागर आची, कोनो तोस प्रमाण नहाची. एक्दम आ अईतियासिक शोद में केवल प्रष्न पुषब एक्ता सिद्दान्त इस्थापित नहीं का सके तची जखन आ हा इतियासिक कोनो इस्थापित माननता कें चुनाती डएची ताहा के तोस पाथ्ठ्प्रमार देबपडदत मुदा जखन पुरान अस्थापित मानेताके तोडल जाई तची जे कर चोसो सालिक परमपराएज तकन शुर्वात ता सवाल पुछे कईये हूई तची नहीं की. राद, प्रशनात्मक शैली पाटख के सोच्बाक लिल्त मजबूर कब सकई तची मुदा पारमपरिक विद्वान एक्रा असानी से कुनो अकादमिक तज्वीजक बिना कहारिज कर देता. तस्सुजाओ इभेल जे एक रान्तिकारी सिद्द्धान तक कि प्रमानित कर बाकलेल एक ता अलग अ किन्द्रित उप्खंड बनाओ. बिल्कुल जाही में जोती रीश्वर, काल कहन्द, परम परा, आप पदावली, बनाम संस्क्रित गरन्तक साहित्तिक प्रमाण के आमने सामने राखी कषिद्ध काईल जाओ. मात्र इग कहब जब पदावली में सरवाहाराक दर्द अची असंख्रित गरन्ते में नहीं कि इई अक तन्नवद्रिष्टिक ले प्र्याप्त नहीं ची. नवद्रिष्टिक लेल इप्र्याप्त बहस्वक अगे तची. मुदा समीख्षा शास्ट्रक कपोथिक ले नहीं. इजाज कुना का सके ची? स्लम अग्रमन मन्द्र भ्रष्ट रहे बाग बात वर राजा कस्तुती आची. अग्तक्हन अख्रा सुजे एक्ता टेबल में पदावलीक उही विष्ष्ट पाती सुतुलना करू जते व्याह आध देसान्तर वा सर्व हराक दर्दक छित्रन अचे एक दम सही आहा के इदे खावबदत जे कीर्तिलता लिखनी हार व्यक्तेक सामाजिक अराजनितिक शब्दावली पदावली लिखनी हार व्यक्तेक शब्दावली से इत्तेक भिन अची जे तुनो एक दिमागक उपज भही नी सकेत छी. माने आहा चहे छी, जे तुनो गरन्तक शब्दावली, सरोकार अ समाजिक द्रस्टी कोनक समानांतर राखल जाओ, जाहे सब विषमता सपष्ट बहूसकेई. अग, और एकर अत्रिक्त आहा जूतिरी श्वरक संदर्भ के से हो विस्तार सब प्रयोग कर सके ची. जूतिरी श्वरक वरनन ग्रत्नाकर को उही अन्शक उद्द्रित करू जताई आई समानान्तर परमपराव लोक गायक सबख उलीक है ची. जखन आहा एक तिहासेक संदर्ब अ साहित्तिक साक्षष दूनु के मिलाका एक तदाचा तेर्खब तकन इतर्क अकाते बहुजाएत. बिल्कुल, आईसे यी सिद्धानत एक तब भावुग दाभीवा कुन्सप्रसी त्योरी से अड़े का, एक तग गंभीर अकाडमिक सथ्टे में बडली जाएत. जखन आहा अपन तर्क के साक्षे के आदार देची तकन विरोदी विचार वाला समीख्षा से हो आहा के साक्षे के अंदेखा नहीं कर पवेत अची अख्रा साक्षे के कार्टल पडद ची जे बहुते कठिन काज अची आई बहुत आविश्यक अची के एक ता लेखखक जे मोल विचार अची उसच्मुज बहुत क्रान्तिकारी आची. तद सन्शेप में कही तद गजंद्र थाख्कृर की सामगरी गजंशोद आ मोलिक विचार सबखक एक ता उत्किष्ट नमूना आचे. एकर प्रभावके और तीक्षन आधाते करबाकलेल तींता मुख्य काज काल जासकेई चे. आप, पहल विविद विष्या सबह के मने प्राषीन सलाक आदनिक दरी एक ता मज्भूथ वैचारिक लिंक वप पुल्फ माद्यम से जोडब. जाहिसा पात्खबिना बद्केल एक तनिरन्तर प्रवाहमे रहे, दो सर आलोचनाक स्वरक के व्यक्तिगत अक्षेप वा कुन्ता सा उठाक, संस्त्ठगत असद्द्ठन्तिक विमर्ष्धिस्लेब. तान्तिकारी सिद्धान्तके केवल प्रष्नात्मक शैली पण नहीं चोड, उक्रा सोजे पाथ्य सक्ष्य साप्रमानित करब. श्रोतासा हमर आग्रह अची, जे इग रच्नात्मक सुजावस सब के शामिल करत, अपन सामगरी के और परिष्क्रित करू, अपन समवर्दिध सामगरी के आगु से हु विमर्ष्कलेल हम्रा सब लग अवश्षे पठाव.

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