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द_चाइल्ड_गुरु__छिपी_दुनिया.mp4

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Part 4 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 4
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  1. 0:00–0:08आजके इस विष्लेषन में हम गजेंदर ताकृर की एक भेहत कुपसुरत और सोचने पर मजबोर कर देने वाली कहानी, दिच्वाल गुरू यानी भाल गुरू के पन्नो को पल्तेंगे.
  2. 0:08–0:12कहानी की शुवात में हम दिल्ली की आमसी लगने वाली हाँउजिं कौलोनी में चलते हैं
  3. 0:12–0:17लेकिन यकीन मानी है, इन सादारन कंक्रीट की दिवारों के पीछे जो दुन्या सास ले रही है,
  4. 0:17–0:19वो बिलकल भी सादारन नहीं है.
  5. 0:19–0:22आईये गेराई से देकते है कि कैसे बाखती दोड़ी भीड में
  6. 0:22–0:24अनगिनत अनकही कहानिया बसती हैं
  7. 0:24–0:27तो चली ये सीदे इस कहानी की जर तक पूझते हैं
  8. 0:27–0:29ये एक लाईन पूरी कहानी का सार है
  9. 0:29–0:33उपर से देखने पर रहार फ्लाट एक जुडवाबहाई जैसा दिकता है
  10. 0:33–0:38लेकिन अंदर, हर दर्वाजे के पिछे एक आलक देश बसता है.
  11. 0:38–0:42जर ज़ा सुचिए, ये बात हमारे आजके शहरी जीवन पर कितनी सतिक बडट्ती है.
  12. 0:42–0:45बहार से सब कुछ एक जैसा, बिलकुल मशीन जैसा.
  13. 0:45–0:49लेकिन इसी एक रुप्ता के पीचे कितनी विविद्ता चिपी है, है ना?
  14. 0:49–0:52अब जरा इन इमारतो की बनाववट को देखिए,
  15. 0:52–0:55कतार दर कतार, एक ही रंग, एक ही आकार की बालकनिया,
  16. 0:55–0:57और बिलकुल एक जैसे दर्वाजे.
  17. 0:57–1:03उपर से देखने पर कोई बताही नहीं सकता के एक एक एट के बक्से और दुस्रे में कोई फरक भी है.
  18. 1:03–1:10बड़े शहरों की यही तो खास्यत है, चाहां हमारी आस्ली पहचान इन कोंक्रीट के जंगलों के पीछे पूरी तरहे से चिब जाती है.
  19. 1:10–1:15अर हाँ ये एक रूपता सर्फ दिन के उजाले तक लिए सीमित नहीं है
  20. 1:15–1:21रात के अंदेरे और चान्द की रूषनी में भी इन कोलोनिों का रूप बलकुल वैसा ही रहता है
  21. 1:21–1:24तीस्री मन्जल के एक फ्लाट को हिलीजीए, जाहा ओम का गर है.
  22. 1:24–1:26जैसे ही हम इस दर्वाजे के अंदर जाते है,
  23. 1:26–1:29लकता है मानो सीधे मिठला पहुट़गगे हूँ.
  24. 1:29–1:31चूलहे पर आर्वा चावल पकरा है.
  25. 1:31–1:40दर्वाजों के पीछे विवेद्देश आई ए बाहरी कनक्रीट से निकल कर इन इमारतों के भीटर की दून्या में कडम रकते हैं.
  26. 1:40–1:43तीस्री मन्जल के एक फलाट को ही लीजीए, जाहा एक एक एक वोम का गर है.
  27. 1:43–1:46जैसे ही हम इस दरवाजे के अंदर जाते है,
  28. 1:46–1:48लकता है मानो सीदे मिठला पहुज गय हो.
  29. 1:48–1:50चूले पर अर्वा चावल पकरा है.
  30. 1:50–1:52और बारिश के दिनो में,
  31. 1:52–1:56पूरे गर में तरूवा और तिल्कोर की सुन्दी-सुन्दी महेख फैल जाती है.
  32. 1:56–2:00लेकिन सब से खाज बात है, औम की मागे होटों से निकलने वाली मैठिली लोरिया,
  33. 2:00–2:04जो हवा में किसी जादूई दून की तरादी रहती हैं.
  34. 2:04–2:34अब दिक सामने वाले ब्लोक में चलते हैं, यहां मन्शा का गर हैं, और यह एक दम अलगी दूनिया है, पंजाब की दूनिया. यहां हर सुबह हवा में तदके की वो तीखी मजदार महें गुल जाती हैं. मन्शा के पिता जब पगरी बानते हैं, तो वो इतनी चमकदार होती ह
  35. 2:34–2:38अलक सांस्क्रतिक दुनिया एक ही कोंक्रीत के साचे में साथ-साथ मोजुद हैं.
  36. 2:39–2:41एक तरफ मिठला का पारंपरिग भोजन और सकून हैं.
  37. 2:42–2:44तो तुस्री तरफ पंजाब का जोश और तरके की महेंग.
  38. 2:44–2:48ये दोनो परिवार दिखने में जुडमा लगने वाले फ्राटो मे रहतें
  39. 2:48–2:51लेकिन इनकी असल दूनिया एक तुस्रे से मीलो दूर है
  40. 2:51–2:55यही तो हमारे शेहरी जिवन का सबसे खुबसुरत रहसे है
  41. 2:55–2:59खामोश दिएख भाल करने वाली अंदेका दिल
  42. 2:59–3:04अब वक तट एस कहानी के सबसे बावुक हिसे और इस पूरी वेवस्ता के अंदेके दिल से मिलने का.
  43. 3:05–3:09कहानी में बड़ाही दिलचस्प शब्द इस्तमाल हुए है, हातों की तीस्री जोडी.
  44. 3:10–3:12दर सल मन्शा के माता बिता डोनो काम पर जाते हैं.
  45. 3:12–3:18तो उनके जाने के बाड, मन्शा की दुनिया जिन हाथो में सुरक्षित रहती है, वो महुवा के हाथ है.
  46. 3:18–3:21महुवा उडीसा से आई एक बहुत ही कम उम्रकी लगी है.
  47. 3:21–3:26इतनी चोटी कि अगर वो अपने गाँ में होती, तो शाएद अब तक किसी की गोड में खिल रही होती.
  48. 3:42–3:44पार्क में गूमाने लिजाना.
  49. 3:44–3:47जब दक मन्शा के मम्मी पापा काम से नहीं लगताते,
  50. 3:47–3:49तब दक मन्शा की पूरी दुन्या
  51. 3:49–3:51महुवा की साडी के पलू की चाँम में
  52. 3:51–3:53बिलकुल महफुज रहती है.
  53. 3:53–3:55पार्क का वो सादारन सा जुला
  54. 3:55–3:57कैई मारमिक पलों का गवा है.
  55. 3:57–4:03जब महुवा मन्शा को जूले पर दखगा देती है, तो अकसर वो बने गाँँगा कोई गीद गुन गनाती है.
  56. 4:03–4:08वो दून बहुत मीठी होती है, लेकिन उस में एक हल्की सी उदासी भी चीपी होती है.
  57. 4:08–4:12ये उदासी उस गर की याद है, जो यहां से बग़ब पीचे चूट कया है.
  58. 4:13–4:18जैसे ही शाम दलने लकती है, जब मनचा महूवा से पुछती है कि वो कुनसा गीद कारी है,
  59. 4:19–4:22तो महूवा बस फीखी सी मुसकान के साथ केती है, मेरे गाउका,
  60. 4:22–4:52अगर की याद उसकी शब्दों पर हावी हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  61. 4:52–4:55वो हे उम की मा श़फ वही उसे महुवा केती हैं.
  62. 4:55–4:59इस खाली जूले और रात के आस्मान को देककर थोडी दे तेरने का मन करता है.
  63. 5:00–5:04या द्रिश शे उन तमाम छपी हुई जिंदिगियों की खामोश लैए को दरषाता है,
  64. 5:04–5:06जो हमारे साथ साथ चल रही हैं.
  65. 5:06–5:17शेहर की अदी दोड़ में नजाने कितनी महुवाई है, जो अपना बच्पन, अपनी पहचान, और अपने गाँँ की लोर्या पीचे चोडगर इन कनक्क्रीट के बक्सो में इक नहीं पीडी को बड़ा कर रही है.
  66. 5:17–5:20उनका जीवन एक दम शानत है, अकसर अंदेखा है,
  67. 5:20–5:24लेकिन सच कहुतो इस पूरी विवस्था के लिए सबसे जआदा जरूरी है।
  68. 5:24–5:27अब यहीं से कहानी एक बहुत ही आहम मोड लेती है.
  69. 5:27–5:30सोचने वाली बात है, कि क्या होता है?
  70. 5:30–5:33जब ये खामोश, अंदेखी दून्या,
  71. 5:33–5:34महुवा और इन बच्छों की दून्या
  72. 5:34–5:38बाहर के उन बड़ो की जटल और कठोर दून्या से तक्राती है.
  73. 5:38–5:41गजेंद्र ताकूल की कहानी यही कहत्म नहीं होती.
  74. 5:41–5:45ये तो बस उस शच की श्वर्वात है जो हमारी आदूनिक जीवन शली की नीव है.
  75. 5:45–5:49ये चर्चा हमे सोचने पर मजबोर करती है के हम अपने आस्मास को न चहरो को ज़ोर देखें
  76. 5:49–5:52जिने हम अखसर अंदेखा कर देते हैं
  77. 5:52–5:55बाकी की कहानी को स्वैम खोजने का सबर अब हम सभी किले खुला है
  78. 5:55–5:57आजके इस विष्लेषन में बस इतना ही

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आजके इस विष्लेषन में हम गजेंदर ताकृर की एक भेहत कुपसुरत और सोचने पर मजबोर कर देने वाली कहानी, दिच्वाल गुरू यानी भाल गुरू के पन्नो को पल्तेंगे. कहानी की शुवात में हम दिल्ली की आमसी लगने वाली हाँउजिं कौलोनी में चलते हैं लेकिन यकीन मानी है, इन सादारन कंक्रीट की दिवारों के पीछे जो दुन्या सास ले रही है, वो बिलकल भी सादारन नहीं है. आईये गेराई से देकते है कि कैसे बाखती दोड़ी भीड में अनगिनत अनकही कहानिया बसती हैं तो चली ये सीदे इस कहानी की जर तक पूझते हैं ये एक लाईन पूरी कहानी का सार है उपर से देखने पर रहार फ्लाट एक जुडवाबहाई जैसा दिकता है लेकिन अंदर, हर दर्वाजे के पिछे एक आलक देश बसता है. जर ज़ा सुचिए, ये बात हमारे आजके शहरी जीवन पर कितनी सतिक बडट्ती है. बहार से सब कुछ एक जैसा, बिलकुल मशीन जैसा. लेकिन इसी एक रुप्ता के पीचे कितनी विविद्ता चिपी है, है ना? अब जरा इन इमारतो की बनाववट को देखिए, कतार दर कतार, एक ही रंग, एक ही आकार की बालकनिया, और बिलकुल एक जैसे दर्वाजे. उपर से देखने पर कोई बताही नहीं सकता के एक एक एट के बक्से और दुस्रे में कोई फरक भी है. बड़े शहरों की यही तो खास्यत है, चाहां हमारी आस्ली पहचान इन कोंक्रीट के जंगलों के पीछे पूरी तरहे से चिब जाती है. अर हाँ ये एक रूपता सर्फ दिन के उजाले तक लिए सीमित नहीं है रात के अंदेरे और चान्द की रूषनी में भी इन कोलोनिों का रूप बलकुल वैसा ही रहता है तीस्री मन्जल के एक फ्लाट को हिलीजीए, जाहा ओम का गर है. जैसे ही हम इस दर्वाजे के अंदर जाते है, लकता है मानो सीधे मिठला पहुट़गगे हूँ. चूलहे पर आर्वा चावल पकरा है. दर्वाजों के पीछे विवेद्देश आई ए बाहरी कनक्रीट से निकल कर इन इमारतों के भीटर की दून्या में कडम रकते हैं. तीस्री मन्जल के एक फलाट को ही लीजीए, जाहा एक एक एक वोम का गर है. जैसे ही हम इस दरवाजे के अंदर जाते है, लकता है मानो सीदे मिठला पहुज गय हो. चूले पर अर्वा चावल पकरा है. और बारिश के दिनो में, पूरे गर में तरूवा और तिल्कोर की सुन्दी-सुन्दी महेख फैल जाती है. लेकिन सब से खाज बात है, औम की मागे होटों से निकलने वाली मैठिली लोरिया, जो हवा में किसी जादूई दून की तरादी रहती हैं. अब दिक सामने वाले ब्लोक में चलते हैं, यहां मन्शा का गर हैं, और यह एक दम अलगी दूनिया है, पंजाब की दूनिया. यहां हर सुबह हवा में तदके की वो तीखी मजदार महें गुल जाती हैं. मन्शा के पिता जब पगरी बानते हैं, तो वो इतनी चमकदार होती ह अलक सांस्क्रतिक दुनिया एक ही कोंक्रीत के साचे में साथ-साथ मोजुद हैं. एक तरफ मिठला का पारंपरिग भोजन और सकून हैं. तो तुस्री तरफ पंजाब का जोश और तरके की महेंग. ये दोनो परिवार दिखने में जुडमा लगने वाले फ्राटो मे रहतें लेकिन इनकी असल दूनिया एक तुस्रे से मीलो दूर है यही तो हमारे शेहरी जिवन का सबसे खुबसुरत रहसे है खामोश दिएख भाल करने वाली अंदेका दिल अब वक तट एस कहानी के सबसे बावुक हिसे और इस पूरी वेवस्ता के अंदेके दिल से मिलने का. कहानी में बड़ाही दिलचस्प शब्द इस्तमाल हुए है, हातों की तीस्री जोडी. दर सल मन्शा के माता बिता डोनो काम पर जाते हैं. तो उनके जाने के बाड, मन्शा की दुनिया जिन हाथो में सुरक्षित रहती है, वो महुवा के हाथ है. महुवा उडीसा से आई एक बहुत ही कम उम्रकी लगी है. इतनी चोटी कि अगर वो अपने गाँ में होती, तो शाएद अब तक किसी की गोड में खिल रही होती. पार्क में गूमाने लिजाना. जब दक मन्शा के मम्मी पापा काम से नहीं लगताते, तब दक मन्शा की पूरी दुन्या महुवा की साडी के पलू की चाँम में बिलकुल महफुज रहती है. पार्क का वो सादारन सा जुला कैई मारमिक पलों का गवा है. जब महुवा मन्शा को जूले पर दखगा देती है, तो अकसर वो बने गाँँगा कोई गीद गुन गनाती है. वो दून बहुत मीठी होती है, लेकिन उस में एक हल्की सी उदासी भी चीपी होती है. ये उदासी उस गर की याद है, जो यहां से बग़ब पीचे चूट कया है. जैसे ही शाम दलने लकती है, जब मनचा महूवा से पुछती है कि वो कुनसा गीद कारी है, तो महूवा बस फीखी सी मुसकान के साथ केती है, मेरे गाउका, अगर की याद उसकी शब्दों पर हावी हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ वो हे उम की मा श़फ वही उसे महुवा केती हैं. इस खाली जूले और रात के आस्मान को देककर थोडी दे तेरने का मन करता है. या द्रिश शे उन तमाम छपी हुई जिंदिगियों की खामोश लैए को दरषाता है, जो हमारे साथ साथ चल रही हैं. शेहर की अदी दोड़ में नजाने कितनी महुवाई है, जो अपना बच्पन, अपनी पहचान, और अपने गाँँ की लोर्या पीचे चोडगर इन कनक्क्रीट के बक्सो में इक नहीं पीडी को बड़ा कर रही है. उनका जीवन एक दम शानत है, अकसर अंदेखा है, लेकिन सच कहुतो इस पूरी विवस्था के लिए सबसे जआदा जरूरी है। अब यहीं से कहानी एक बहुत ही आहम मोड लेती है. सोचने वाली बात है, कि क्या होता है? जब ये खामोश, अंदेखी दून्या, महुवा और इन बच्छों की दून्या बाहर के उन बड़ो की जटल और कठोर दून्या से तक्राती है. गजेंद्र ताकूल की कहानी यही कहत्म नहीं होती. ये तो बस उस शच की श्वर्वात है जो हमारी आदूनिक जीवन शली की नीव है. ये चर्चा हमे सोचने पर मजबोर करती है के हम अपने आस्मास को न चहरो को ज़ोर देखें जिने हम अखसर अंदेखा कर देते हैं बाकी की कहानी को स्वैम खोजने का सबर अब हम सभी किले खुला है आजके इस विष्लेषन में बस इतना ही

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