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ओम_मन्शा_और_दीवारों_के_पार_दोस्ती.m4a
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- 0:00–0:06तो अगर हम एक बहुत बडी लिएब्रूरी की कलपना करें, इक अईसी लिएब्रूरी,
- 0:06–0:10जहाँ बाहर से हर किताब बलकुल एक जैसी दिकती है.
- 0:10–0:12आई एक दम एक रंग वरे एक आकार की जिल्द.
- 0:12–0:13बलकुल.
- 0:13–0:17मदलः कोई भी देखे तो लगेगा की सब कुछ एक साचे में डलावा है
- 0:17–0:47अगर अम दियान दें तो शेहरों की बडी बडी हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 0:47–0:49और आजके हमारे यस गेहन अद्धियन का जो पुरा फोकस है,
- 0:50–0:52उसी दिल्चस्प विरोदा भासको समझने पर है.
- 0:52–0:53एक दम सही.
- 0:53–0:56आज हम गजेंद्र ताकृ के लिखी कहानी,
- 0:57–0:59दिल्चाल्ट गुरू एम, मन्शा,
- 0:59–1:00और एक आईसा जवाब,
- 1:00–1:02जिसने बड़ों का भी सर्ज जूका दिया
- 1:02–1:05इसके कुछ अंच्छो पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं
- 1:05–1:07ये एक बहुती प्रसांगिक वश्य है
- 1:07–1:10खासकर दिल्ली जैसे महानगर की प्रिष्ट भूमी में
- 1:10–1:14हाँ, और हमारे इस चर्चा का मुक्छ्य लक्ष भी यही है
- 1:14–1:18ये दिकोट करना कि कैसे दिल्ली की एक सादारन्ची कोलुनी के भीतर,
- 1:18–1:24बच्छों की एक चोटी सी दुन्या पूरे भारत की विविद्ताका प्रतीक बन जाती है.
- 1:24–1:26और बच्च्पन की उस निश्छल मित्रताका भी.
- 1:26–1:29दिल्ली वैसे भी एक यह ज़ाहर है जहां,
- 1:29–1:33लगबबग रह अर अपनी ज़ने किसी और राजी में चोड कर आता है.
- 1:33–1:37बलक्खड लेखख ने शुवात मेही एक बहुत फीज़ सुक्ष्म बात कही है.
- 1:37–1:40मुक्के किरदार जो है औम और मनशा.
- 1:40–1:44उनके नाम इतने चोटे हैं की कागस पर लिखें तो शाएद आदी लाईन बी नावरे.
- 1:44–1:46आद बहुत इचोटे नाम है.
- 1:46–1:53लेकिन ये कहानी दिखाती है कि कैसे ये चोटे चोटे नाम समाज के उन भारी बरकम और जटिल दाचो को चुनाती देते हैं
- 1:53–1:56जिने वयस्कोंने बहुत महनत से कडा किया है
- 1:56–1:59वो जो लिएबरेरी वाली उप्मा हम ने दी थी नहीं
- 1:59–2:01अगर उसे आगे बड़ाये
- 2:01–2:06तो ये देखना बहुत दिल्चस थे की बाहरी वास्तूकला की एक रुप्ता के बावजुद
- 2:06–2:09अन्दर लोग अपनी संस्क्रिती को कैसे पक्डे रहते हैं?
- 2:09–2:11एक दं मस्बुती से पक्डे रहते हैं?
- 2:11–2:12यह जहां अँम रहेता है!
- 2:12–2:13आँ अँम का गर!
- 2:13–2:17दर्वाजा खुलते ही यसा लकता है जैसे दिल्ली पीचे चुट गगे हो
- 2:17–2:47उआद अद़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़�
- 2:47–3:17अग, उद्वाँ बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बा�
- 3:17–3:22यह एक सादारन सम्वोदन से जआदा नहीं एक गेहरे ज़ुडाव का प्रतीक लकता है.
- 3:22–3:27और इस गर की एक और हैं बात यह है कि यहां मातपिता दोनो काम काजी है.
- 3:27–3:31तो मतलब दोनो फ्लाट्ट्स जो बिल्टर की नक्षे में भिलको लेएक जैसे थे
- 3:31–3:34अदर से दो गलक गलक ताईम जोन में बड़ल चुके हैं
- 3:34–3:35और अलग अलक संसक्रतियो मे भी
- 3:35–3:36लेकिन...
- 3:37–3:39मुझे यहां एक शंका है
- 3:39–3:45मैं सोच रही ती के लोग अकसर अपने गरों को अपनी संसक्रतिय अपने कानपान के अजाब से चलाते हैं
- 3:45–3:47इस में दीवार कहडी करने वाली क्या बात है?
- 3:47–3:48वो तो है.
- 3:48–3:51मतलव ये तो बस अपनी ज़़ों से जोडे रहने का एक स्वाबाविक सारीका है ना?
- 3:51–3:54क्या लेक्ह किसे एक नकरात्मक द्रिष्टी कोन से देख़े हैं?
- 3:54–3:56ये एक बहुत ही वाजविप सवाल है.
- 3:56–4:00देखे अपनी ज़़ों से जोडे रहना अपने आपने कोई नकरात्मक बाद बलकोल नहीं
- 4:00–4:02समस्स्से अथ पब शुरू होती है
- 4:02–4:03जब
- 4:03–4:05जब वो एक सीमा बनजाएं
- 4:05–4:05भिल्कोल
- 4:05–4:09जब वो सांस्कोतिक जोडाव एक अद्रष्य सीमा रिखा बनजाता है
- 4:09–4:15लेखा कि आई अस्पष्ट करने की कोछिष कर रहे हैं कि वैस्खो की दूनिया अपनी पहचान के अईडबो में कितनी गेराई से कैद होछाती है
- 4:15–4:19वह मतलब वो अपने गरो को ही चोटे-चोटे देशो में बड़ल लेते हैं
- 4:19–4:21अब इस दिल्चास मोडाता है
- 4:21–4:23वाप्रे बहुत इक रूप से पास होने के बावजुद
- 4:23–4:25मनोवेग्यानिक रूप से ले एक दूस्रे से मीलो दूर है
- 4:25–4:27अब इस थिती में दिल्चास मोडाता है
- 4:27–4:29मन्शा के गर में जहां दों दून चाए प्रजाँज ना प्रजाँज
- 4:29–4:33लिकिन तुस्रों की संस्क्रती किले नके दर्वाजे अकसर बंदी रहते हैं
- 4:33–4:35ये एक प्रकार का मनोवैग्यानिक आल्गाव है
- 4:35–4:38जिस से शहर के लोग अपनी सुरक्षा मान लिते हैं
- 4:38–4:39बाप्रे!
- 4:39–4:41मतलब भाथिक रूप से पास होनेके बावजुद
- 4:41–4:44मनोवेग्यानिक रूप से ले एक दूस्रे से मीलो दूर है
- 4:44–4:45एक दम दूर
- 4:45–4:47अब इस थिती में लिए दिल्चस मोर आता है
- 4:48–4:51मन्शा के गर में जहां दोनो माता पता काम पर जाते है
- 4:51–4:53वहां दिन में बडाख आलीपन पेडा होटा होगा
- 4:53–4:54सुवहविक है
- 4:54–4:56सुबे होते ही दोनो अलगलक दिशाव में लिकल जाते हैं
- 4:56–4:59तो फें मनशा का दिन कैसे भीटता है
- 4:59–5:03और यही से कहानी का सबसे खमोष
- 5:03–5:07लेकिं शाथ सबसे जाड़ा प्रभाव डलने वाला किर्दार सामने आता है
- 5:07–5:08महुवा
- 5:08–5:11महुवा का किर्दार इस पूरी कहानी की दूरी है
- 5:11–5:13बहले यह उ सबसे कम बोलती हो
- 5:13–5:18महुवा को लेकरना, मैं अपनी उस उप्मा को तोडा और सपष्ट करना चाहूंगे
- 5:18–5:22वो इस कहानी में किसी फिल्म के बाग्डाउंच्कोर की तरा है
- 5:22–5:23बाग्डाूंच्कोर
- 5:23–5:24अच्छा
- 5:24–5:26अपने बाग्राँउन्च्कोर की खासीट क्या होती है
- 5:26–5:29जब तक वो बच्ता रहता है, किसी का द्यान उस पर नी जाता
- 5:29–5:32लोग स्वफ परदे पर चल रहे द्रिष्ष्यों को दिकते रहते है
- 5:32–5:33यह यह भात है
- 5:33–5:35अगर वो संगीत अचानाक बन दोजाए,
- 5:35–5:38तो पूरी फिल में दं भेजान लगने लकती है,
- 5:38–5:40सब कुछ अदूरा सा होजाता है.
- 5:40–5:43मंचा का पूरा दिन महुवा की साडी के पलूसे ही बन दा है.
- 5:43–5:47सुभे मंचा को अटाना, उसकी दो चोटिया गुतना,
- 5:47–5:49दूद गरम करना, शाम को पारक लेजाना,
- 5:49–5:51ये सब महुवा के इड़गर गूमता है.
- 5:51–5:54फिर भी महुवा को कोई पहचान नी मिलती.
- 5:54–5:59और ये पहचान ना मिलना ही उस बैक्रुंट्स्कोर वाली उपमा को इतना सतीक बनाता है.
- 5:59–6:01महुवा उडिसा से आईए.
- 6:01–6:06उसकी उम्र इतनी कम है की गाँ में होती तो शाएत खुद किसी की गोड में खेल रही होती.
- 6:06–6:08आप उखुद एक बच्ची है.
- 6:08–6:11लेकिन यहाँ उग बच्ची के जिम्मेदानी उठारी है.
- 6:11–6:12वो बहत कम बोलती है.
- 6:12–6:15लेकिन जब मनशा को जूला जूलाती है ना,
- 6:15–6:17तो उडीशा के उदास गीद गुन्गूनाती है
- 6:17–6:19और जब मन्शा पूछती है कि वो खागारी है
- 6:19–6:21तो महुवा बस मुस्कुर आकर केती है
- 6:21–6:22मेरे गाँका गीट
- 6:22–6:24और वो गीट वही आचानक रुक जाता है
- 6:24–6:26ये रुकना बहत कुछ कहता है
- 6:26–6:30उगीत का वो अचानक रुग जाना
- 6:30–6:33ये अज्सल अकता है जैसे अपनी यादो को
- 6:33–6:35जबर दस्ती दबाया जारा हो
- 6:35–6:35बलकल
- 6:35–6:38एक तरफ वो मन्शा के जीवन का इतना बडा हिस्सा है
- 6:39–6:41लेकिन कोलिनी के बाकी वायस को किलिए
- 6:41–6:43या जो बड़े लोग पाक में बड़े है
- 6:43–6:45उनके लिए उसका पना कोई वजुदी नहीं है?
- 6:45–6:48वि उसे सर्फ मन्शा की आया के के बुलाते हैं
- 6:48–6:52अगर अम कहानी के समाजिक तानेबाने को समजें,
- 6:52–6:56तो महुवा समाज के उस गेरे वर्ग भेथ को दर्षाती है,
- 6:56–7:01जिसे शहरी जीवन बहुत आसानी से समान ने मान लेता.
- 7:01–7:03समान ने मान लेता, हाँ.
- 7:03–7:06महुवा का वो अदूरा गीट, उस चीने हुए बच्पन,
- 7:06–7:16अदुरावागीत उस चीने हुए बच्पन और उस आगाद का प्रतीक है जो आर्थिक मजभूरी के कारन पैदा हुता है
- 7:17–7:20उसकर शरीर दिल्ली मे है वो एक शहरी दिनचरया का हिस्सा है
- 7:21–7:23लेक वान्सिक रुप से अज भी अज बने गाँ में ही रुकी हुए
- 7:23–7:27उएक आजी श्रमिक है, जिसे समाज काम के लित उ जरूरी मानता है,
- 7:27–7:30लेके न एक अँन्सान के रूप में पूरी तरदिश्ष कर देता है.
- 7:30–7:32अगर दिश्छ कर देता है.
- 7:32–7:36लेकिन अँ इस अद्श्षता के भीच एक अप्वाद भी है कहानी में.
- 7:36–7:37अँम की मा.
- 7:37–7:38अँम की मा.
- 7:38–7:41वो पूरी कोलनी में शाइद अकेली है,
- 7:41–7:43यो महुवा को उसके नाम से बुलाती है.
- 7:43–7:46अबि कभी वो महुवा को अपने पास बिटाती हैं और कहती हैं
- 7:46–7:47खालो बच्ची
- 7:47–7:48तुं खोड अभी एक बच्ची हो
- 7:48–7:51और ये सुनकर महुवा के आखू में चमक आजाती है
- 7:51–7:51बिलकुल
- 7:52–7:55लेकिन मेरा सवाल यहां यहां यहां कि क्या एम की मा
- 7:55–7:57तो बज्ची ही तो कहरी है
- 7:57–7:59आपको एसा क्यो लकता है
- 7:59–8:02क्योंकी समाजिक धाचा तो वही हैना
- 8:02–8:04महुवा अभी भी एक काम वाली ही है
- 8:04–8:07क्या हम अम की माखे एस चोटे से कदम को
- 8:07–8:09कुछ जादा ही महीमा मन्दित नहीं कर रे
- 8:09–8:11येक चुनोती देने वाला वीचार है
- 8:11–8:41तो तो बज़ाई बवादा बवादान बादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान ल
- 8:41–8:47उस वस्तु करन्द से उस अब्ज्टिकेशन से बहार निकाल रही है, जो बाकी कोलनी ने उस पर थोप दिया है.
- 8:47–8:52एक बच्छे में एक बच्छी को देखना, ना इस यर फ्रफ एक नोक्रानी को.
- 8:52–8:56यही तो बात है, यह दिखाता है के करूना किसी भी समाज़े दरजे से उपर उपर उट्ट्सकती है
- 8:56–9:00यह चोती सी बात महुवा के लिए बहुत बभ्वनात्मक सहारा बन जाती है
- 9:00–9:03यह नदर्या सच्छ में इस बात को बहुत सपष्ट कर देता है
- 9:03–9:07कबी कभी सब से चोटे लगने वाले कदम ही सब से जआदा प्रभाव डालते हैं
- 9:07–9:08बलकल सही का
- 9:08–9:15अब इन अलगलक सांसकतिक दिबों और महुवा की खमोज दूनिया से बाहर निकलकर
- 9:15–9:19कहानिया में उस जगा लेजाती है जाए यह यह सारी दिवारे गिर जाती हैं
- 9:19–9:21कोलिनी का वो गास्वला पार्क
- 9:21–9:24अग, कोलिनी के भीचो भीच्स्तित गास्वला पार्क
- 9:24–9:27ये पार्क शाम होते ही पुरी तरह से बड़ल जाता है
- 9:27–9:30जैसे ये कोई बच्चों की संसध हो
- 9:30–9:33ये पार्क एक ततस्ट श्रेत रहे, नूट्रिल टरीटरी
- 9:33–9:35अदर जोबी नीम जोभी सांस्क्रितिक सीमाय लागु होती है,
- 9:35–9:37वेस मेदान पराती खट्मो जाती है.
- 9:37–9:40और यहां अँम आपनी माग किसात आता है,
- 9:40–9:41और मनशा महुवा किसात.
- 9:41–9:42आँ.
- 9:42–9:45इस द्रिष्च्छ की कलपना करना ही बहुत सुखद है ना?
- 9:45–9:46मतलब,
- 9:46–9:49मित्फिला की संसक्रती में पला बड़ा एक बच्चा,
- 9:49–9:51पन्जाब की उज्जा से भगरी बच्ची,
- 9:51–9:54उरीशा के दर्द को समेटे हुए महुवा
- 9:54–9:56और दिल्ली की गास.
- 9:56–9:58पूरा भारत एकी समय में एकी जगापर मोजुद है,
- 9:58–10:00और एक साथ खेल राई.
- 10:00–10:02और सबसे बड़ी विड़ंबना देखगे
- 10:02–10:04कि आस पास बटे वयस्कों को
- 10:04–10:07इस बात कज़़ा भी इहसास नहीं है
- 10:07–10:10कि उनके सामने कितनी सहज्ता से
- 10:10–10:13विविद्धा का एक आदर श्रुब अकार लेगा है
- 10:13–10:14इसे ही तो ये यूट्वोप्या
- 10:14–10:16या आदर समाच कहा जा सकता है?
- 10:16–10:19चार साल के बच्छो की दूस्ती की सब से खुबसुरत बात पता है क्या उती है?
- 10:19–10:20क्या?
- 10:20–10:22कि इसका कोई क्यलेंडर नी होता
- 10:22–10:24इसकी कोई तारीख नी होती है
- 10:24–10:26बहुत गेरी बात है ये
- 10:26–10:28यह दोग दोग विप्रीत द्रूवों की तरा
- 10:28–10:29आई एक दम अलग
- 10:29–10:31अम बहुती शान्त है
- 10:31–10:32वआपनी दून में रहता है
- 10:32–10:33कम बोलता है
- 10:33–10:35और लेज त सी चीज़े बनाता रहता है
- 10:35–10:37दूस्री तरफ मन्चा है
- 10:37–10:39एक दम शब दूब दूवों की तरा
- 10:39–10:43उर ये भी देखे की उन दोनो का सवबहाव एक दूसरे से कितना अलग है
- 10:44–10:46बिलकोल दो विप्रीत द्रूवों की तरा
- 10:46–10:47आए एक दम अलग
- 10:47–10:49उम बहुती शान्त है
- 10:49–10:51वबनी दून मेरेथा है, कम बोलता है
- 10:52–10:53और रेथ सी चीजे बनाता रेता है
- 10:53–10:57दूस्री तरव मन्चा है एक दम शब्डों की फुल ज़डी
- 10:57–10:59और बहुत जल्दी गुस्सा हो जाने वली भी?
- 10:59–11:04आप, लेकिन ये विरोदा भास उनके भीश कोई खाई पेदा करने के बजाए
- 11:04–11:06उने और मस्वुती से जोडता है
- 11:06–11:08यही जोस्ती का सबसे दिल्चस पहलू है
- 11:23–11:27अपने ही बूने हुए शब्डों के जाल में या किसी जग़े में पहजजाती है,
- 11:27–11:30तो ओम बिना कुछ कहे, चुप्चाः जाकर उसका हाद ठामलेता है,
- 11:31–11:32और उसे शांथ कर देता है.
- 11:32–11:36अग, ये दिखाता है कि एक लडके और लडकी के भीच
- 11:36–11:39या दो गलग-गलक संस्क्रतिक प्रिष्ट भूम्यों के भीच
- 11:39–11:42प्राक्रतिक रूप से कोई दुष्मनिया विभाजन नहीं रहीं जाए.
- 11:42–11:45योखल नहीं, ये सारे विभाजन समाज दुबारा गड़े गाए.
- 11:45–11:47और ये मासुम्यत तब और भी गज़ेरी हो जाती है,
- 11:47–11:50जब ये सर्फ पार्की सीमा तक सीमित नहीं तेई रहती,
- 11:50–11:54बलकि उनके परिवारों के अंद्रूनी रिवाजों के भीतर भी प्रवेष कर जाती है.
- 11:54–11:57अम का पाच्वा जनम दिन निसका सब से बड़वादारन है.
- 11:57–12:01अँ, अम का जनम दिन इस कहानी का वो मुकाम है,
- 12:01–12:05जगा दोनो अलग अलग दूनिया एक पल किले पूरी तरह से एक होडाती है.
- 12:05–12:09अम का जनम दिन होता है, लिकिन मनशा किलिए ये किसी त्योहार से कम नही होता.
- 12:09–12:11अम की माज सुभह से ही तैयारियो में लगी है,
- 12:11–12:16अर वे खास रस्म कभी नहीं भूलती, मन्शा किलिये एक अलक से तोफा लाना.
- 12:16–12:20उनका ये सोचना कि क्या एक भीटी बिना तोफे के गर जाएगी?
- 12:20–12:21वह ये बहुत प्यारी लाईन एक.
- 12:21–12:28ये साभित करता है कि उनो ने मन्चा को अपने उस मित्लावाले दिबभे में बिना किसी शर्ट के सुएकार कर लिया है
- 12:28–12:34और उदर महुवा मन्चा को नहिला दूलारार मैं फ्रोक पहना कर समें से पहले ही ओम के दर्वाजे पर लिया थी है
- 12:34–12:39मन्शा गंती बज्ते ही आज़े अन्दर बाखती है ज़ैसे वो उसी गर का हिस्सा हो
- 12:39–12:43केग कातने के बाद का दिश्च इस पूरी प्रक्रिया का निशकर्ष
- 12:43–12:47वे दोनो बच्चे बाखी दून्या को बूलकर एक कोने में बैज्चाते है
- 12:47–12:50और एक दूस्रे को अपने हिस्से का केग खिलाते है
- 12:50–12:53यद्रिष्य स्तापित करता है कि दूस्ती कोई सिखाई जाने अगी चीज नहीं है
- 12:53–12:55ये बस हो जाती है
- 12:55–12:57और वयस्कों का काम सर्फितना है
- 12:57–13:01कि वे उस रिष्ते को पनपने किलिए एक सुरक्षित महाल दे
- 13:01–13:02जैसा ओम की माने दिया
- 13:02–13:04ये उनके जीवन का पाच्वा साल है
- 13:04–13:05और अगर नजर्या बडला जाए
- 13:05–13:08तो चार साल की उम्रमे शुभूई ये दूस्ती
- 13:08–13:10उनके ले पुरी जिन्दगी की दूस्ती के बरावर है
- 13:10–13:11लेकिन...
- 13:11–13:12उं...
- 13:12–13:15कोई भी आदर्ष दून्या हमेशा किले सुरक्षित नहीं रह सकती ना?
- 13:15–13:16दूर भागे से नहीं?
- 13:16–13:19इसी पाच्वे साल में कहानी एक अँईसा मोड लेती है,
- 13:19–13:22जो इस पूरी शान्ती को जगजोर कर रग देता है.
- 13:22–13:23नय परिवार का आना?
- 13:23–13:27अग, कोलनी में एक नहीं परिवार का आगमन होता है
- 13:27–13:30और उनके साथ एक नहीं बच्चा आता है, सुसें
- 13:30–13:34सुसें उमर में खुब आँम और मनशा से थुडा बड़ा है
- 13:34–13:36शारीरिक रुब से जाडद ताकतवर है
- 13:36–13:39और उसकी जबान भी काफी टेज है
- 13:39–13:41सुसें का प्रवेश यह खिर्दार का प्रवेश नहीं है
- 13:41–13:44यह एक बहुत बड़े बहारी तत्व का प्रवेश है
- 13:44–13:46जो यह उटोप्या को तोडने आया है
- 13:46–13:48वो खेलता कम है और बिगारता जाडा है
- 13:48–13:51किसी की साइकल की गंटी बजाके बाग जाना
- 13:51–13:53रेद के बने हुए महलो को लात मारकर तोर देना
- 13:53–13:58और सब से एहम बात बच्छो के नामो को बिगार कर उनका मजा कुडाना
- 13:58–13:59लेकिन एक मेंने तूग ये
- 13:59–13:59जी
- 13:59–14:02मुझे यहां थोडा विरोद दरज करना होगा
- 14:02–14:32बच्छे बच्छे बबच्छे बबच्छे बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब�
- 14:32–15:02अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ�
- 15:02–15:04सुसेन अनजाने में वयस्कूँ की उस दूनिया की नकल कर रहा है,
- 15:04–15:07जाहां ताकत का अस्तमाल कमजोरो को दबाने की लिक या जाता है.
- 15:07–15:09मतलो वो समाज का प्रतिन दिद्व कर रहा है,
- 15:09–15:13जो चीजो को जोडने के बजाए तोडने में विष्वास रहा है.
- 15:13–15:16बिल्कुल, जो समान्ता बदाश नि कर सकता
- 15:16–15:18और हर जगागा शक्ती प्रदर्षन को गूसा देना चाता है.
- 15:18–15:21आब ये बात पूरी तर एसे स्पष्ट होती है.
- 15:21–15:25मतलब जहां एँम और मन्चाने एक एसी दुनिया बनाइ ती
- 15:25–15:30जहां कोई बड़ा या चोटा नहीं था, कोई किसी पर हावी नहीं था
- 15:30–15:33वाई सुसेन आखर एक हैरारकी बनाने की कोशिष कर रहा है
- 15:33–15:36आई, एक पदानुक्रम, सुसेन वो सिस्तम है,
- 15:36–15:40जो बिना शर्ट वाली समान्ता को रहा ज़म नहीं कर पाता
- 15:40–15:47अप कहानी बिलकुल उस महाने पर कडी है, जहां इन दोनो विचार दाराव के भीच सीडा तक्राव होनाते है.
- 15:47–15:50अम और मनचा का सहयोग, बनाम सुसेंका संगर्ष.
- 15:50–15:51बिलकुल.
- 15:51–15:57और यही ही वो जगग है, जहां कहानी का शीर्षक दच्याल गुरू, अपने सब से गेरे अर्थ के साज्ट सामने आता है.
- 15:57–15:59आए ये शीर्षक ही एक बहुत बडा संकेत है.
- 15:59–16:03ये बताता है कि अगे जोभी होने वाला है, वो समाने नहीं होगा.
- 16:03–16:08तो अपनी इस चर्चा को समथ तेवे अगर हम पूरी तस्वीर को एक साथ देखें
- 16:08–16:12तो हमने उस बाहर से एक जैसी दिकने वाली कलोनी से शुर्वात की ती
- 16:12–16:15जो अंदर से सांस्क्रतिक दिबवो में बती हूँई
- 16:15–16:16आँँँ
- 16:16–16:22अमने देखा की कैसे वयस्कों ले खुद को अपनी कषेत्री पहचान की दिवारो में कैद कर लिया है
- 16:22–16:28और कैसे मववा जैसे लोगों को इस विवस्ता में पुरी तरा से अद्रिष्ष कर दिया जाता है
- 16:28–16:35अगे अगे अगे बी रेखा कि ओम और मनशा के रूप में एक अजी पीडी मोजुद है जो इन दिवारो को नहीं मानती.
- 16:35–16:44बलकुल उनकी दोस्ती जिसे ओम की माने अपनी करूना से सींचा है, बाशा, संसक्रती और वर्ग भेद की, हर सीमा को पार कर जाती है.
- 16:44–16:49अब इस खुबसुरत दून्या के सामने सुसेन के रूप में समाज की कथोरता अद नफ्रत कहुएग.
- 16:50–16:55कहानी यही रूग जाती है, लेकिन ये एक बहुत बडाग, विचारो तेजक प्रष्न चोड जाती है.
- 16:55–17:00या क्या सुसेन जेसे तत्वव, बच्पन की इस निष्छल दूनिया को हमेशा के लिए बरबात कर देंगे?
- 17:00–17:04या क्या समाज कदबाव, अम और मनशा को भी उसी कडवाहत से बहर देगा?
- 17:04–17:08या फिर, क्या अम और मनशा का वो बिना शर्ट वाला जुडाव?
- 17:08–17:12अगर एक इनसान के जीवन में वो कुन्सा दिन, कुन्सा जन्म दिन,
- 17:12–17:16या कुन्सा साल होता है, जब वो ओम या मनशा होना चोर देता है.
- 17:16–17:20सुसेन के भीतर रचे बसे उस समाजिक जेहर को काट पाएगी?
- 17:20–17:21और सबसे बड़ा सवाल यहे,
- 17:21–17:22कि अगर वे एसा कर पाए,
- 17:23–17:26तो क्या वे एक गुरू कितरा उन बड़ों को को ख़बक सबक सेखाएंगे?
- 17:26–17:27यही सोचने वाली बात है.
- 17:28–17:30आखर एक अनसान के जीवन में,
- 17:30–17:35वो कुन्सा दिन, कुन्सा जन्म दिन, या कुन्सा साल होता है
- 17:35–17:37जब वो ओम या मनशा होना चोर देता है
- 17:37–17:41और अपनी पहचान की दिवारें कड़ी करने वाला एक वयस्क बन जाता है
- 17:41–17:46बच्पन की वो मासुमित कब और कहा पीछे चुट जाती है
- 17:46–17:50की अनसान उन फलाट्स के बन दर्वाजों के पीछे खुद को कैद कर लेता है
- 17:50–17:51ये सच में बोद गेरा सवाल है
- 17:51–17:55आप और ये एक एसा सवाल है, जो सर्फ कहानी तक्सीमित नहीं है
- 17:55–17:58बलकी उस समाज के हर व्यक्ती के लिए है
- 17:58–18:02जो खुद को उन समान दिखने वाली इमार्तों का हिस्सा मानता है
- 18:02–18:03बलकु
- 18:03–18:07बविश्छ में जब भी किसी हाँउचिं कोलनी को बाहर से देखा जाए
- 18:07–18:10तो ये ज़रुर यादा ना चाहीए कि उन दिवारों के पीछे
- 18:10–18:17और उन गास्वाले पार्को में जो कहानिया बन रही है, उन में शाइद हमारी अपनी दुन्या की सच्चाए छिपी है.
- 18:17–18:18सईगा अपने.
- 18:18–18:22इसी विचार के साथ आजके खेहन अद्यान को हम यही विराम देते है,
- 18:22–18:26ने विचारों और नेई कहानिों की ये खोज आगे भी जारी रहेगी.
Plain text
तो अगर हम एक बहुत बडी लिएब्रूरी की कलपना करें, इक अईसी लिएब्रूरी, जहाँ बाहर से हर किताब बलकुल एक जैसी दिकती है. आई एक दम एक रंग वरे एक आकार की जिल्द. बलकुल. मदलः कोई भी देखे तो लगेगा की सब कुछ एक साचे में डलावा है अगर अम दियान दें तो शेहरों की बडी बडी हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ और आजके हमारे यस गेहन अद्धियन का जो पुरा फोकस है, उसी दिल्चस्प विरोदा भासको समझने पर है. एक दम सही. आज हम गजेंद्र ताकृ के लिखी कहानी, दिल्चाल्ट गुरू एम, मन्शा, और एक आईसा जवाब, जिसने बड़ों का भी सर्ज जूका दिया इसके कुछ अंच्छो पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं ये एक बहुती प्रसांगिक वश्य है खासकर दिल्ली जैसे महानगर की प्रिष्ट भूमी में हाँ, और हमारे इस चर्चा का मुक्छ्य लक्ष भी यही है ये दिकोट करना कि कैसे दिल्ली की एक सादारन्ची कोलुनी के भीतर, बच्छों की एक चोटी सी दुन्या पूरे भारत की विविद्ताका प्रतीक बन जाती है. और बच्च्पन की उस निश्छल मित्रताका भी. दिल्ली वैसे भी एक यह ज़ाहर है जहां, लगबबग रह अर अपनी ज़ने किसी और राजी में चोड कर आता है. बलक्खड लेखख ने शुवात मेही एक बहुत फीज़ सुक्ष्म बात कही है. मुक्के किरदार जो है औम और मनशा. उनके नाम इतने चोटे हैं की कागस पर लिखें तो शाएद आदी लाईन बी नावरे. आद बहुत इचोटे नाम है. लेकिन ये कहानी दिखाती है कि कैसे ये चोटे चोटे नाम समाज के उन भारी बरकम और जटिल दाचो को चुनाती देते हैं जिने वयस्कोंने बहुत महनत से कडा किया है वो जो लिएबरेरी वाली उप्मा हम ने दी थी नहीं अगर उसे आगे बड़ाये तो ये देखना बहुत दिल्चस थे की बाहरी वास्तूकला की एक रुप्ता के बावजुद अन्दर लोग अपनी संस्क्रिती को कैसे पक्डे रहते हैं? एक दं मस्बुती से पक्डे रहते हैं? यह जहां अँम रहेता है! आँ अँम का गर! दर्वाजा खुलते ही यसा लकता है जैसे दिल्ली पीचे चुट गगे हो उआद अद़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़� अग, उद्वाँ बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बा� यह एक सादारन सम्वोदन से जआदा नहीं एक गेहरे ज़ुडाव का प्रतीक लकता है. और इस गर की एक और हैं बात यह है कि यहां मातपिता दोनो काम काजी है. तो मतलब दोनो फ्लाट्ट्स जो बिल्टर की नक्षे में भिलको लेएक जैसे थे अदर से दो गलक गलक ताईम जोन में बड़ल चुके हैं और अलग अलक संसक्रतियो मे भी लेकिन... मुझे यहां एक शंका है मैं सोच रही ती के लोग अकसर अपने गरों को अपनी संसक्रतिय अपने कानपान के अजाब से चलाते हैं इस में दीवार कहडी करने वाली क्या बात है? वो तो है. मतलव ये तो बस अपनी ज़़ों से जोडे रहने का एक स्वाबाविक सारीका है ना? क्या लेक्ह किसे एक नकरात्मक द्रिष्टी कोन से देख़े हैं? ये एक बहुत ही वाजविप सवाल है. देखे अपनी ज़़ों से जोडे रहना अपने आपने कोई नकरात्मक बाद बलकोल नहीं समस्स्से अथ पब शुरू होती है जब जब वो एक सीमा बनजाएं भिल्कोल जब वो सांस्कोतिक जोडाव एक अद्रष्य सीमा रिखा बनजाता है लेखा कि आई अस्पष्ट करने की कोछिष कर रहे हैं कि वैस्खो की दूनिया अपनी पहचान के अईडबो में कितनी गेराई से कैद होछाती है वह मतलब वो अपने गरो को ही चोटे-चोटे देशो में बड़ल लेते हैं अब इस दिल्चास मोडाता है वाप्रे बहुत इक रूप से पास होने के बावजुद मनोवेग्यानिक रूप से ले एक दूस्रे से मीलो दूर है अब इस थिती में दिल्चास मोडाता है मन्शा के गर में जहां दों दून चाए प्रजाँज ना प्रजाँज लिकिन तुस्रों की संस्क्रती किले नके दर्वाजे अकसर बंदी रहते हैं ये एक प्रकार का मनोवैग्यानिक आल्गाव है जिस से शहर के लोग अपनी सुरक्षा मान लिते हैं बाप्रे! मतलब भाथिक रूप से पास होनेके बावजुद मनोवेग्यानिक रूप से ले एक दूस्रे से मीलो दूर है एक दम दूर अब इस थिती में लिए दिल्चस मोर आता है मन्शा के गर में जहां दोनो माता पता काम पर जाते है वहां दिन में बडाख आलीपन पेडा होटा होगा सुवहविक है सुबे होते ही दोनो अलगलक दिशाव में लिकल जाते हैं तो फें मनशा का दिन कैसे भीटता है और यही से कहानी का सबसे खमोष लेकिं शाथ सबसे जाड़ा प्रभाव डलने वाला किर्दार सामने आता है महुवा महुवा का किर्दार इस पूरी कहानी की दूरी है बहले यह उ सबसे कम बोलती हो महुवा को लेकरना, मैं अपनी उस उप्मा को तोडा और सपष्ट करना चाहूंगे वो इस कहानी में किसी फिल्म के बाग्डाउंच्कोर की तरा है बाग्डाूंच्कोर अच्छा अपने बाग्राँउन्च्कोर की खासीट क्या होती है जब तक वो बच्ता रहता है, किसी का द्यान उस पर नी जाता लोग स्वफ परदे पर चल रहे द्रिष्ष्यों को दिकते रहते है यह यह भात है अगर वो संगीत अचानाक बन दोजाए, तो पूरी फिल में दं भेजान लगने लकती है, सब कुछ अदूरा सा होजाता है. मंचा का पूरा दिन महुवा की साडी के पलूसे ही बन दा है. सुभे मंचा को अटाना, उसकी दो चोटिया गुतना, दूद गरम करना, शाम को पारक लेजाना, ये सब महुवा के इड़गर गूमता है. फिर भी महुवा को कोई पहचान नी मिलती. और ये पहचान ना मिलना ही उस बैक्रुंट्स्कोर वाली उपमा को इतना सतीक बनाता है. महुवा उडिसा से आईए. उसकी उम्र इतनी कम है की गाँ में होती तो शाएत खुद किसी की गोड में खेल रही होती. आप उखुद एक बच्ची है. लेकिन यहाँ उग बच्ची के जिम्मेदानी उठारी है. वो बहत कम बोलती है. लेकिन जब मनशा को जूला जूलाती है ना, तो उडीशा के उदास गीद गुन्गूनाती है और जब मन्शा पूछती है कि वो खागारी है तो महुवा बस मुस्कुर आकर केती है मेरे गाँका गीट और वो गीट वही आचानक रुक जाता है ये रुकना बहत कुछ कहता है उगीत का वो अचानक रुग जाना ये अज्सल अकता है जैसे अपनी यादो को जबर दस्ती दबाया जारा हो बलकल एक तरफ वो मन्शा के जीवन का इतना बडा हिस्सा है लेकिन कोलिनी के बाकी वायस को किलिए या जो बड़े लोग पाक में बड़े है उनके लिए उसका पना कोई वजुदी नहीं है? वि उसे सर्फ मन्शा की आया के के बुलाते हैं अगर अम कहानी के समाजिक तानेबाने को समजें, तो महुवा समाज के उस गेरे वर्ग भेथ को दर्षाती है, जिसे शहरी जीवन बहुत आसानी से समान ने मान लेता. समान ने मान लेता, हाँ. महुवा का वो अदूरा गीट, उस चीने हुए बच्पन, अदुरावागीत उस चीने हुए बच्पन और उस आगाद का प्रतीक है जो आर्थिक मजभूरी के कारन पैदा हुता है उसकर शरीर दिल्ली मे है वो एक शहरी दिनचरया का हिस्सा है लेक वान्सिक रुप से अज भी अज बने गाँ में ही रुकी हुए उएक आजी श्रमिक है, जिसे समाज काम के लित उ जरूरी मानता है, लेके न एक अँन्सान के रूप में पूरी तरदिश्ष कर देता है. अगर दिश्छ कर देता है. लेकिन अँ इस अद्श्षता के भीच एक अप्वाद भी है कहानी में. अँम की मा. अँम की मा. वो पूरी कोलनी में शाइद अकेली है, यो महुवा को उसके नाम से बुलाती है. अबि कभी वो महुवा को अपने पास बिटाती हैं और कहती हैं खालो बच्ची तुं खोड अभी एक बच्ची हो और ये सुनकर महुवा के आखू में चमक आजाती है बिलकुल लेकिन मेरा सवाल यहां यहां यहां कि क्या एम की मा तो बज्ची ही तो कहरी है आपको एसा क्यो लकता है क्योंकी समाजिक धाचा तो वही हैना महुवा अभी भी एक काम वाली ही है क्या हम अम की माखे एस चोटे से कदम को कुछ जादा ही महीमा मन्दित नहीं कर रे येक चुनोती देने वाला वीचार है तो तो बज़ाई बवादा बवादान बादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान लिए बवादान ल उस वस्तु करन्द से उस अब्ज्टिकेशन से बहार निकाल रही है, जो बाकी कोलनी ने उस पर थोप दिया है. एक बच्छे में एक बच्छी को देखना, ना इस यर फ्रफ एक नोक्रानी को. यही तो बात है, यह दिखाता है के करूना किसी भी समाज़े दरजे से उपर उपर उट्ट्सकती है यह चोती सी बात महुवा के लिए बहुत बभ्वनात्मक सहारा बन जाती है यह नदर्या सच्छ में इस बात को बहुत सपष्ट कर देता है कबी कभी सब से चोटे लगने वाले कदम ही सब से जआदा प्रभाव डालते हैं बलकल सही का अब इन अलगलक सांसकतिक दिबों और महुवा की खमोज दूनिया से बाहर निकलकर कहानिया में उस जगा लेजाती है जाए यह यह सारी दिवारे गिर जाती हैं कोलिनी का वो गास्वला पार्क अग, कोलिनी के भीचो भीच्स्तित गास्वला पार्क ये पार्क शाम होते ही पुरी तरह से बड़ल जाता है जैसे ये कोई बच्चों की संसध हो ये पार्क एक ततस्ट श्रेत रहे, नूट्रिल टरीटरी अदर जोबी नीम जोभी सांस्क्रितिक सीमाय लागु होती है, वेस मेदान पराती खट्मो जाती है. और यहां अँम आपनी माग किसात आता है, और मनशा महुवा किसात. आँ. इस द्रिष्च्छ की कलपना करना ही बहुत सुखद है ना? मतलब, मित्फिला की संसक्रती में पला बड़ा एक बच्चा, पन्जाब की उज्जा से भगरी बच्ची, उरीशा के दर्द को समेटे हुए महुवा और दिल्ली की गास. पूरा भारत एकी समय में एकी जगापर मोजुद है, और एक साथ खेल राई. और सबसे बड़ी विड़ंबना देखगे कि आस पास बटे वयस्कों को इस बात कज़़ा भी इहसास नहीं है कि उनके सामने कितनी सहज्ता से विविद्धा का एक आदर श्रुब अकार लेगा है इसे ही तो ये यूट्वोप्या या आदर समाच कहा जा सकता है? चार साल के बच्छो की दूस्ती की सब से खुबसुरत बात पता है क्या उती है? क्या? कि इसका कोई क्यलेंडर नी होता इसकी कोई तारीख नी होती है बहुत गेरी बात है ये यह दोग दोग विप्रीत द्रूवों की तरा आई एक दम अलग अम बहुती शान्त है वआपनी दून में रहता है कम बोलता है और लेज त सी चीज़े बनाता रहता है दूस्री तरफ मन्चा है एक दम शब दूब दूवों की तरा उर ये भी देखे की उन दोनो का सवबहाव एक दूसरे से कितना अलग है बिलकोल दो विप्रीत द्रूवों की तरा आए एक दम अलग उम बहुती शान्त है वबनी दून मेरेथा है, कम बोलता है और रेथ सी चीजे बनाता रेता है दूस्री तरव मन्चा है एक दम शब्डों की फुल ज़डी और बहुत जल्दी गुस्सा हो जाने वली भी? आप, लेकिन ये विरोदा भास उनके भीश कोई खाई पेदा करने के बजाए उने और मस्वुती से जोडता है यही जोस्ती का सबसे दिल्चस पहलू है अपने ही बूने हुए शब्डों के जाल में या किसी जग़े में पहजजाती है, तो ओम बिना कुछ कहे, चुप्चाः जाकर उसका हाद ठामलेता है, और उसे शांथ कर देता है. अग, ये दिखाता है कि एक लडके और लडकी के भीच या दो गलग-गलक संस्क्रतिक प्रिष्ट भूम्यों के भीच प्राक्रतिक रूप से कोई दुष्मनिया विभाजन नहीं रहीं जाए. योखल नहीं, ये सारे विभाजन समाज दुबारा गड़े गाए. और ये मासुम्यत तब और भी गज़ेरी हो जाती है, जब ये सर्फ पार्की सीमा तक सीमित नहीं तेई रहती, बलकि उनके परिवारों के अंद्रूनी रिवाजों के भीतर भी प्रवेष कर जाती है. अम का पाच्वा जनम दिन निसका सब से बड़वादारन है. अँ, अम का जनम दिन इस कहानी का वो मुकाम है, जगा दोनो अलग अलग दूनिया एक पल किले पूरी तरह से एक होडाती है. अम का जनम दिन होता है, लिकिन मनशा किलिए ये किसी त्योहार से कम नही होता. अम की माज सुभह से ही तैयारियो में लगी है, अर वे खास रस्म कभी नहीं भूलती, मन्शा किलिये एक अलक से तोफा लाना. उनका ये सोचना कि क्या एक भीटी बिना तोफे के गर जाएगी? वह ये बहुत प्यारी लाईन एक. ये साभित करता है कि उनो ने मन्चा को अपने उस मित्लावाले दिबभे में बिना किसी शर्ट के सुएकार कर लिया है और उदर महुवा मन्चा को नहिला दूलारार मैं फ्रोक पहना कर समें से पहले ही ओम के दर्वाजे पर लिया थी है मन्शा गंती बज्ते ही आज़े अन्दर बाखती है ज़ैसे वो उसी गर का हिस्सा हो केग कातने के बाद का दिश्च इस पूरी प्रक्रिया का निशकर्ष वे दोनो बच्चे बाखी दून्या को बूलकर एक कोने में बैज्चाते है और एक दूस्रे को अपने हिस्से का केग खिलाते है यद्रिष्य स्तापित करता है कि दूस्ती कोई सिखाई जाने अगी चीज नहीं है ये बस हो जाती है और वयस्कों का काम सर्फितना है कि वे उस रिष्ते को पनपने किलिए एक सुरक्षित महाल दे जैसा ओम की माने दिया ये उनके जीवन का पाच्वा साल है और अगर नजर्या बडला जाए तो चार साल की उम्रमे शुभूई ये दूस्ती उनके ले पुरी जिन्दगी की दूस्ती के बरावर है लेकिन... उं... कोई भी आदर्ष दून्या हमेशा किले सुरक्षित नहीं रह सकती ना? दूर भागे से नहीं? इसी पाच्वे साल में कहानी एक अँईसा मोड लेती है, जो इस पूरी शान्ती को जगजोर कर रग देता है. नय परिवार का आना? अग, कोलनी में एक नहीं परिवार का आगमन होता है और उनके साथ एक नहीं बच्चा आता है, सुसें सुसें उमर में खुब आँम और मनशा से थुडा बड़ा है शारीरिक रुब से जाडद ताकतवर है और उसकी जबान भी काफी टेज है सुसें का प्रवेश यह खिर्दार का प्रवेश नहीं है यह एक बहुत बड़े बहारी तत्व का प्रवेश है जो यह उटोप्या को तोडने आया है वो खेलता कम है और बिगारता जाडा है किसी की साइकल की गंटी बजाके बाग जाना रेद के बने हुए महलो को लात मारकर तोर देना और सब से एहम बात बच्छो के नामो को बिगार कर उनका मजा कुडाना लेकिन एक मेंने तूग ये जी मुझे यहां थोडा विरोद दरज करना होगा बच्छे बच्छे बबच्छे बबच्छे बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब� अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ� सुसेन अनजाने में वयस्कूँ की उस दूनिया की नकल कर रहा है, जाहां ताकत का अस्तमाल कमजोरो को दबाने की लिक या जाता है. मतलो वो समाज का प्रतिन दिद्व कर रहा है, जो चीजो को जोडने के बजाए तोडने में विष्वास रहा है. बिल्कुल, जो समान्ता बदाश नि कर सकता और हर जगागा शक्ती प्रदर्षन को गूसा देना चाता है. आब ये बात पूरी तर एसे स्पष्ट होती है. मतलब जहां एँम और मन्चाने एक एसी दुनिया बनाइ ती जहां कोई बड़ा या चोटा नहीं था, कोई किसी पर हावी नहीं था वाई सुसेन आखर एक हैरारकी बनाने की कोशिष कर रहा है आई, एक पदानुक्रम, सुसेन वो सिस्तम है, जो बिना शर्ट वाली समान्ता को रहा ज़म नहीं कर पाता अप कहानी बिलकुल उस महाने पर कडी है, जहां इन दोनो विचार दाराव के भीच सीडा तक्राव होनाते है. अम और मनचा का सहयोग, बनाम सुसेंका संगर्ष. बिलकुल. और यही ही वो जगग है, जहां कहानी का शीर्षक दच्याल गुरू, अपने सब से गेरे अर्थ के साज्ट सामने आता है. आए ये शीर्षक ही एक बहुत बडा संकेत है. ये बताता है कि अगे जोभी होने वाला है, वो समाने नहीं होगा. तो अपनी इस चर्चा को समथ तेवे अगर हम पूरी तस्वीर को एक साथ देखें तो हमने उस बाहर से एक जैसी दिकने वाली कलोनी से शुर्वात की ती जो अंदर से सांस्क्रतिक दिबवो में बती हूँई आँँँ अमने देखा की कैसे वयस्कों ले खुद को अपनी कषेत्री पहचान की दिवारो में कैद कर लिया है और कैसे मववा जैसे लोगों को इस विवस्ता में पुरी तरा से अद्रिष्ष कर दिया जाता है अगे अगे अगे बी रेखा कि ओम और मनशा के रूप में एक अजी पीडी मोजुद है जो इन दिवारो को नहीं मानती. बलकुल उनकी दोस्ती जिसे ओम की माने अपनी करूना से सींचा है, बाशा, संसक्रती और वर्ग भेद की, हर सीमा को पार कर जाती है. अब इस खुबसुरत दून्या के सामने सुसेन के रूप में समाज की कथोरता अद नफ्रत कहुएग. कहानी यही रूग जाती है, लेकिन ये एक बहुत बडाग, विचारो तेजक प्रष्न चोड जाती है. या क्या सुसेन जेसे तत्वव, बच्पन की इस निष्छल दूनिया को हमेशा के लिए बरबात कर देंगे? या क्या समाज कदबाव, अम और मनशा को भी उसी कडवाहत से बहर देगा? या फिर, क्या अम और मनशा का वो बिना शर्ट वाला जुडाव? अगर एक इनसान के जीवन में वो कुन्सा दिन, कुन्सा जन्म दिन, या कुन्सा साल होता है, जब वो ओम या मनशा होना चोर देता है. सुसेन के भीतर रचे बसे उस समाजिक जेहर को काट पाएगी? और सबसे बड़ा सवाल यहे, कि अगर वे एसा कर पाए, तो क्या वे एक गुरू कितरा उन बड़ों को को ख़बक सबक सेखाएंगे? यही सोचने वाली बात है. आखर एक अनसान के जीवन में, वो कुन्सा दिन, कुन्सा जन्म दिन, या कुन्सा साल होता है जब वो ओम या मनशा होना चोर देता है और अपनी पहचान की दिवारें कड़ी करने वाला एक वयस्क बन जाता है बच्पन की वो मासुमित कब और कहा पीछे चुट जाती है की अनसान उन फलाट्स के बन दर्वाजों के पीछे खुद को कैद कर लेता है ये सच में बोद गेरा सवाल है आप और ये एक एसा सवाल है, जो सर्फ कहानी तक्सीमित नहीं है बलकी उस समाज के हर व्यक्ती के लिए है जो खुद को उन समान दिखने वाली इमार्तों का हिस्सा मानता है बलकु बविश्छ में जब भी किसी हाँउचिं कोलनी को बाहर से देखा जाए तो ये ज़रुर यादा ना चाहीए कि उन दिवारों के पीछे और उन गास्वाले पार्को में जो कहानिया बन रही है, उन में शाइद हमारी अपनी दुन्या की सच्चाए छिपी है. सईगा अपने. इसी विचार के साथ आजके खेहन अद्यान को हम यही विराम देते है, ने विचारों और नेई कहानिों की ये खोज आगे भी जारी रहेगी.