MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID

बाल_गुरु__एक_सूक्ष्म_कथा.mp4

Not an editorially verified transcript. This text was generated automatically from the preserved recording and may contain recognition, language-detection, spelling, segmentation or name errors. Consult the source recording for authoritative content.
Collection
Part 4 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 4
Status
asr-draft
Human verified
No
Editorial review
not-reviewed
ASR model
small
Detected language
hi (0.990599)
Duration
6:11
Source
Open preserved recording

Timestamped machine output

  1. 0:00–0:13नमस्कार, सीदे श्रू करते हैं आमारी आज्ग की चर्चा, आज्ज हम किस्षागो गजिंद्र ताकृर की एक आज्ई कहानी पर गूर करने वाले है, जो कहने को तो बहुत चोटी है, लिकिन सच कहूँ तो इसकी गेराए कमाल की है.
  2. 0:13–0:20अम सीदे दिल्ली की भीडबार वाली जिन्दगी से निकल कर लोगो के बिल्कुल निजी और चोटे से सन्सार में जाएंगे,
  3. 0:20–0:26देखेंगे की कैसे इस बड़े से शहर की चोटी चोटी कहानिया जिन्दगी के सबसे बड़े सबग दे जाती हैं.
  4. 0:26–0:32तो जल्ये इस सफर पर निकलते हैं, श्रुवाद सक्रीन पर लिख रही इस बहतरीन लाईन से करते हैं.
  5. 0:32–0:38दियान दीजिगा, लगके का नाम एँ था, लगकी का नाम मनशा, दोनो के नाम इतने चोटे दे,
  6. 0:38–0:41कि अगर इने कागस पर लिखाजाए, तो आदी लाईन में आजाएंगे.
  7. 0:41–0:46पर कहानी के अंत तक ये दो चोटे नाम कुछ इतना बड़ा कहे जाएंगे,
  8. 0:46–0:49जिसे बयान करने में सबसे मोटी किताबे भी चोटी पर जाती हैं.
  9. 0:49–0:53जोर्दार है ना? आखर एसी कोंसी विशाल सीक है जो इन नने बच्छों ने दी,
  10. 0:53–0:56यही हमारा आजका सबसे बड़ा सवाल है.
  11. 0:56–0:59कहानी का जो आदार है, वो बड़ा दिल्चस्प है.
  12. 0:59–1:04दिल्ली, एक एसी जगा जाहा लगबभग हर कोई कही और से आखर बस के आखे.
  13. 1:04–1:08एक सच्ची मैग्रिन्ट सिटी, और यहा हमारा पूरा द्यान,
  14. 1:08–1:11शहर की एक तिपकल सी हाँँजिं कोलनी पर केंद्रित है.
  15. 1:11–1:15वही आम कोलनी जिसके भीचो भीच एक हरी गास वाला पार्ख होता है.
  16. 1:15–1:21बस यही वो जगा है. यही वो मन्च है, जहां से हमारी ये पुरी कहानी आकार लेगी.
  17. 1:21–1:27तो बहाग एक देली की हाँउजिं कोलनी समानता का ब्रम, यानी इल्जुजन अप सेमनिस.
  18. 1:27–1:31अगर थोड़ा दूर से देखें तो फर्फलात किसी जुडवा भाई जैसा दिकता है.
  19. 1:31–1:33कोई फर्फ नहीं कोई अलक पहचान नहीं,
  20. 1:33–1:37बस इईट अर पत्धर का एक बड़ासा यूनिफाम देर.
  21. 1:37–1:40लिकिन और येस कहानी का सबसे शांदार हिस्चा है.
  22. 1:40–1:44अगर थोड़ा दूर से देकेखे, तो हर फलात कीसी जुदवा भाई जैसा दिकता है.
  23. 1:44–1:46कोई फरक नहीं, कोई अलक पहचान नहीं,
  24. 1:47–1:50बस इईट और पत्धर का एक बड़ासा यूनिफाम देर.
  25. 1:51–1:54लिकिन और येस कहानी का सबसे शान्दार हिस्सा है.
  26. 1:54–1:59इन इग ज़ेसे जुडवाजों के तीक पीचे की कहानी बिलको लिया लग है.
  27. 1:59–2:05बाहर की इश्शान्ती और समान्ता के पीचे एक पूरी तरह से अलग संसक्रिती से बहरी दून्या बसती है.
  28. 2:05–2:08रवाग दो समान दर्वाजे अलक दून्या, औम और मनशा
  29. 2:08–2:11आए खीडे इन दर्वाजों के अंदर चलते हैं
  30. 2:11–2:14इन दोनो गरों का अंटर बड़ा हैरान करने वाला है
  31. 2:14–2:17एक फलाट के तीस्रे फ्लोर पर चलीए
  32. 2:17–2:20वहां पूरा का पूरा मिखला बसा हूँँआ है
  33. 2:20–2:50अदर बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब ब
  34. 2:50–2:54अब मन्चा के गर की एक और सच्चाई देकते हैं।
  35. 2:54–2:58उसकी माता पिता दोनो सुभे कामपर निकल जाते हैं।
  36. 2:58–3:01पीछे चुट जाता है एक खाली पन।
  37. 3:01–3:04और यही से आती है है हमारी कहानी के सबसे
  38. 3:04–3:07शान्द पर सबसे जरूरी किरदार की
  39. 3:07–3:08महुवा
  40. 3:08–3:12अदीशा से दलिया आई है, बैसे उसकी उम्रग खुद इतनी कम है,
  41. 3:12–3:16कि अगर वो गाँवे होती ना, तो खुद किसी किषी की गोद में खेल रही होती.
  42. 3:16–3:20बर यहा, इस अनजान शहर में उस ननिसी बच्ची के कंड़ो पर
  43. 3:20–3:50अदिए गोड में खेल रहुती पर यहां इस अनजान शहर में उस ननीसी बच्ची के कनडों पर एक दुसरी ननी बच्ची को पालनें की बड़ी जिम्डारी थोपी गईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई
  44. 3:50–3:54अब आते है पारक के हिस सिफर जो इस कहानी का तोडा इमोशनल पोईट है.
  45. 3:55–3:58दिन के वक्त पारक में जुला जूलने का ये मनजर देखिये.
  46. 3:59–4:03जब महुवा मनशा को जुला जूलाती है तो अखसर अजने में ही एक दून्गून गूनाती है.
  47. 4:04–4:05अपने उटीषा का एक गीत.
  48. 4:20–4:22अपनी मिट्ती अपने गर की याद
  49. 4:23–4:26और यहा एक आजी बात होती है, जो सीदे दिलपर लकती है
  50. 4:26–4:29जब मनशा बडी मासुमयत से पुछती है
  51. 4:29–4:31महुवा दिदी ये कुन्सा गीथ है
  52. 4:32–4:34तब महुवा की आवाज अचानक रुग चाती है
  53. 4:34–4:38बिल्कुल सन्नाटा वो मुस्कुराकर बस इतना कहती है ने गाँका
  54. 4:38–4:44और गी टीक वही खतम आजा लकता है जेसे गाँका नाम आते ही उसका गला बहर आया हो
  55. 4:44–4:47और एक भी सुर आगे निकलना ना मुमकिन हो या हो
  56. 4:47–4:54शाम दल रही है, और यही बताता है कि महुवा बाहरी दून्या के लिए कितनी इनविज़िबल या अद्रिष्ष है.
  57. 4:54–4:59असल में पारक में मुझुद बाकी बडों को उसका अस्ली नाम तक नहीं पता.
  58. 4:59–5:04उनके लिए वो कोई आजाद अन्सान नहीं बस मनशा की आया है.
  59. 5:04–5:12यानी एक आईसी बच्ची जिसकी कुद की पहचान, कुदका एक जाँ है, वो इन बड़ों की दून्या में पुरी तरहा से खो चुकी है.
  60. 5:12–5:17लेकिन रूकिये, इस अंदेरे के भीच एक चोटी सी उमीद की रोषनी भी है.
  61. 5:17–5:23इस पूरी भीड मे चब एक बडी इन्सान है जो महुवा को सच्छ मे एक व्यकती की तरा देकती है.
  62. 5:23–5:29अम की मा वो उसका अस्ली नाम जानती है और कभी कभी सने से उसको अपने पास बआतने का इशारा भी करती है.
  63. 5:29–5:35ये चोटा सा लगबग नाके बराबर लगने वाला काम अईन्सानित के नाते बहुत बड़ा माईने रकता है.
  64. 5:35–5:40तो इन सारी बातों और द्रिश्यों के बाद सीदे उस बड़े सवाल पर आते है.
  65. 5:40–5:42अगर अगर बटीग़ाँ बाल पर आते हैं.
  66. 5:42–5:45अँँ और मनशा जैसे मासुम बच्चे आखिर इस इतनी
  67. 5:45–5:48विशाल और बटीएग़गी कोलनी के बडों को,
  68. 5:48–5:51कुन्सा बडा और कराडा सबच्ष शिकाने वाले हैं.
  69. 5:51–5:53चोटी जिन्धिगियों की ये गेरी कथा,
  70. 5:53–5:56अगर आखर जिस निशकर्ष की तरफ इशारा कर रही है,
  71. 5:56–5:59उसने ज़रूर सोचने पर मजबूर कर दिया होगा, है ना?
  72. 5:59–6:04आखर सबसे मोटी किताबों से भी बडी सीक इं चोटे नामों से ही तो मिलनी है.
  73. 6:04–6:06इस पर जरूर विचार की जेगा.
  74. 6:06–6:08आजकी इस चर्चा में पस इतना ही

Plain text

नमस्कार, सीदे श्रू करते हैं आमारी आज्ग की चर्चा, आज्ज हम किस्षागो गजिंद्र ताकृर की एक आज्ई कहानी पर गूर करने वाले है, जो कहने को तो बहुत चोटी है, लिकिन सच कहूँ तो इसकी गेराए कमाल की है. अम सीदे दिल्ली की भीडबार वाली जिन्दगी से निकल कर लोगो के बिल्कुल निजी और चोटे से सन्सार में जाएंगे, देखेंगे की कैसे इस बड़े से शहर की चोटी चोटी कहानिया जिन्दगी के सबसे बड़े सबग दे जाती हैं. तो जल्ये इस सफर पर निकलते हैं, श्रुवाद सक्रीन पर लिख रही इस बहतरीन लाईन से करते हैं. दियान दीजिगा, लगके का नाम एँ था, लगकी का नाम मनशा, दोनो के नाम इतने चोटे दे, कि अगर इने कागस पर लिखाजाए, तो आदी लाईन में आजाएंगे. पर कहानी के अंत तक ये दो चोटे नाम कुछ इतना बड़ा कहे जाएंगे, जिसे बयान करने में सबसे मोटी किताबे भी चोटी पर जाती हैं. जोर्दार है ना? आखर एसी कोंसी विशाल सीक है जो इन नने बच्छों ने दी, यही हमारा आजका सबसे बड़ा सवाल है. कहानी का जो आदार है, वो बड़ा दिल्चस्प है. दिल्ली, एक एसी जगा जाहा लगबभग हर कोई कही और से आखर बस के आखे. एक सच्ची मैग्रिन्ट सिटी, और यहा हमारा पूरा द्यान, शहर की एक तिपकल सी हाँँजिं कोलनी पर केंद्रित है. वही आम कोलनी जिसके भीचो भीच एक हरी गास वाला पार्ख होता है. बस यही वो जगा है. यही वो मन्च है, जहां से हमारी ये पुरी कहानी आकार लेगी. तो बहाग एक देली की हाँउजिं कोलनी समानता का ब्रम, यानी इल्जुजन अप सेमनिस. अगर थोड़ा दूर से देखें तो फर्फलात किसी जुडवा भाई जैसा दिकता है. कोई फर्फ नहीं कोई अलक पहचान नहीं, बस इईट अर पत्धर का एक बड़ासा यूनिफाम देर. लिकिन और येस कहानी का सबसे शांदार हिस्चा है. अगर थोड़ा दूर से देकेखे, तो हर फलात कीसी जुदवा भाई जैसा दिकता है. कोई फरक नहीं, कोई अलक पहचान नहीं, बस इईट और पत्धर का एक बड़ासा यूनिफाम देर. लिकिन और येस कहानी का सबसे शान्दार हिस्सा है. इन इग ज़ेसे जुडवाजों के तीक पीचे की कहानी बिलको लिया लग है. बाहर की इश्शान्ती और समान्ता के पीचे एक पूरी तरह से अलग संसक्रिती से बहरी दून्या बसती है. रवाग दो समान दर्वाजे अलक दून्या, औम और मनशा आए खीडे इन दर्वाजों के अंदर चलते हैं इन दोनो गरों का अंटर बड़ा हैरान करने वाला है एक फलाट के तीस्रे फ्लोर पर चलीए वहां पूरा का पूरा मिखला बसा हूँँआ है अदर बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब बवाज़ाब ब अब मन्चा के गर की एक और सच्चाई देकते हैं। उसकी माता पिता दोनो सुभे कामपर निकल जाते हैं। पीछे चुट जाता है एक खाली पन। और यही से आती है है हमारी कहानी के सबसे शान्द पर सबसे जरूरी किरदार की महुवा अदीशा से दलिया आई है, बैसे उसकी उम्रग खुद इतनी कम है, कि अगर वो गाँवे होती ना, तो खुद किसी किषी की गोद में खेल रही होती. बर यहा, इस अनजान शहर में उस ननिसी बच्ची के कंड़ो पर अदिए गोड में खेल रहुती पर यहां इस अनजान शहर में उस ननीसी बच्ची के कनडों पर एक दुसरी ननी बच्ची को पालनें की बड़ी जिम्डारी थोपी गईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई अब आते है पारक के हिस सिफर जो इस कहानी का तोडा इमोशनल पोईट है. दिन के वक्त पारक में जुला जूलने का ये मनजर देखिये. जब महुवा मनशा को जुला जूलाती है तो अखसर अजने में ही एक दून्गून गूनाती है. अपने उटीषा का एक गीत. अपनी मिट्ती अपने गर की याद और यहा एक आजी बात होती है, जो सीदे दिलपर लकती है जब मनशा बडी मासुमयत से पुछती है महुवा दिदी ये कुन्सा गीथ है तब महुवा की आवाज अचानक रुग चाती है बिल्कुल सन्नाटा वो मुस्कुराकर बस इतना कहती है ने गाँका और गी टीक वही खतम आजा लकता है जेसे गाँका नाम आते ही उसका गला बहर आया हो और एक भी सुर आगे निकलना ना मुमकिन हो या हो शाम दल रही है, और यही बताता है कि महुवा बाहरी दून्या के लिए कितनी इनविज़िबल या अद्रिष्ष है. असल में पारक में मुझुद बाकी बडों को उसका अस्ली नाम तक नहीं पता. उनके लिए वो कोई आजाद अन्सान नहीं बस मनशा की आया है. यानी एक आईसी बच्ची जिसकी कुद की पहचान, कुदका एक जाँ है, वो इन बड़ों की दून्या में पुरी तरहा से खो चुकी है. लेकिन रूकिये, इस अंदेरे के भीच एक चोटी सी उमीद की रोषनी भी है. इस पूरी भीड मे चब एक बडी इन्सान है जो महुवा को सच्छ मे एक व्यकती की तरा देकती है. अम की मा वो उसका अस्ली नाम जानती है और कभी कभी सने से उसको अपने पास बआतने का इशारा भी करती है. ये चोटा सा लगबग नाके बराबर लगने वाला काम अईन्सानित के नाते बहुत बड़ा माईने रकता है. तो इन सारी बातों और द्रिश्यों के बाद सीदे उस बड़े सवाल पर आते है. अगर अगर बटीग़ाँ बाल पर आते हैं. अँँ और मनशा जैसे मासुम बच्चे आखिर इस इतनी विशाल और बटीएग़गी कोलनी के बडों को, कुन्सा बडा और कराडा सबच्ष शिकाने वाले हैं. चोटी जिन्धिगियों की ये गेरी कथा, अगर आखर जिस निशकर्ष की तरफ इशारा कर रही है, उसने ज़रूर सोचने पर मजबूर कर दिया होगा, है ना? आखर सबसे मोटी किताबों से भी बडी सीक इं चोटे नामों से ही तो मिलनी है. इस पर जरूर विचार की जेगा. आजकी इस चर्चा में पस इतना ही

← Transcript index