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अमर_बाबा__कमला_नदी_के_रक्षक.mp4
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- 0:00–0:04आईए, आज एक बहदी दिल्चस्प और गेरी कता की दुन्या में चलते हैं.
- 0:04–0:07आमर भाबा कमला नदी के रक्षत.
- 0:07–0:11इस विष्लेषन में हम मित्ला की उस अद्बूत लोग कता को समजंगे,
- 0:11–0:15जहां प्रक्रती अईन्सान और दर्म आपस में इतने गेरे गुन्तेवे हैं,
- 0:30–0:32नक्षे के हिस्थे के तोर पर नहीं देखा जाता
- 0:32–0:35इनहें साक्शात जीवन देने वाली देवी माना जाता है
- 0:36–0:37जिनका इस पूरी जमीन पर
- 0:37–0:40एक बहुत ही गेरा अद्धियातमिक प्रभाव है
- 0:40–0:43तो चलिए इस प्रस्तावना से शुरू करते हैं
- 0:43–0:44माता और देवी
- 0:44–0:49आई एक देकते हैं के कैसे कमला नदी एक ही समय में एक पूजनिया देवी भी हैं
- 0:49–0:53और एक बेहत बहावुक कर देने वाली अनसानी कहानी का केंद्र भी
- 0:53–0:56अब जरा एस दून्या की कलपना कीजे
- 0:56–0:59यहा का पूरा समाज लोगों की रोसमर्रा की जिन्दगी
- 0:59–1:04तो उगर बाबा की पूरी कहानी इसी एक बहुती गेरे और दुखधविरोदाबास पर तिकी है.
- 1:04–1:06किसी की रक्षा करना जरूरी तो है,
- 1:06–1:11या किनारे पर बसे लोग, सब कुछ एक भेहत खुबसुरत और संदूलित दुन्या का हिस्सा लकते है।
- 1:12–1:16सुरक्षा की एक कहानी, फिर भी सुरक्षा की अपनी कीमत होती है.
- 1:17–1:22आमर बाभा की पूरी कहानी इसी एक बहुती गेरे और दूखध विरोदा भास पर टिकी है.
- 1:22–1:25किसी की रक्षा करना ज़रूरी तो है,
- 1:25–1:26लेकिन सच कहें तो,
- 1:26–1:30सच्चे सहस की अकसर एक बहुत भारी कीमट चुकानी परती है.
- 1:30–1:34एक असी कीमट जीद की खुषी कहतम होने के सद्यो बात भी,
- 1:34–1:36लोगो के दिलो में चुपती रहती है.
- 1:36–1:38कमला नदी का जन,
- 1:38–1:41कहानी की शुवात में हालात हमेशा इतने अच्छे नहीं रही ते
- 1:41–1:45बलकी यह कता एक अज़्े बहयानक संकत से शुग वुड़ी है
- 1:45–1:48जिस ने एक बहुत बड़े चमतकार के लिये रास्ता तट्यार किया
- 1:48–1:50जर अज्वक्त के बारे में सुचीए
- 1:50–1:52जब ये नदी थी ही नहीं
- 1:52–1:54हालात सच मे बहुत खोफनाक थे
- 1:54–1:58मित्ला की जमीन पूरी तरह सुख कर पट चुके थे
- 1:58–2:00बारिश का नामो निशान नहीं ता
- 2:00–2:02इस भयानक सुखे ने
- 2:02–2:04कभी हरे बरे रहने वाले केतो को
- 2:04–2:06एक दं वीरान कर दिया था
- 2:06–2:08गाँँगे सारे कुए सुक चुके ते
- 2:09–2:09सच में
- 2:10–2:13ये जीवन और म्रत्टिव के भीच की एक बयानक जंग थे
- 2:13–2:14लेकिन फिर
- 2:14–2:17जैसे सुक्वी दर्ती की दर्द भरी पुकार सूंकर
- 2:18–2:20पहाडो का सीना चीरते हुए
- 2:20–2:21कमला नदी फुट पडी
- 2:21–2:25उस्छने सुखी दरकती जमीन को अपने पानी से सीज दिया
- 2:25–2:26और देकते ही देकते क्या हूँँ?
- 2:26–2:33पानी, हरे बरे केट, और गाओ के गाटो पर बच्छो की वो प्यारी सी हसी वापस लोटाए.
- 2:33–2:39ज़ाई ज़ाई से कमला गुजरी मानो वहाई सोया हुए जीवन अचानक जूम कर जागुथा.
- 2:39–2:41किसान मला और सदबहाओ.
- 2:41–2:48इस चमतकारी जन्के बाद, नदी के किनारोपर जो समाज बसा वो बहत कुबसुरत और संटूलित था,
- 2:48–2:52जो पूरी तरहा से इस नदी के दिये हुए जीवन्दान पटे का हूँआ था
- 2:52–2:58इस चन्तूलन को आप कमला के दो बेटों, किसान और मलाः के जर ये बहुत अच्छी तरे समथ सकते हैं
- 2:58–3:03बहुर होते ही एक तरफ किसान अपना हल लेकर केतो की तरफ निकल परता है
- 3:03–3:07तो दूस्री तरव मलाः अपना जा लेकर गाड की ओर.
- 3:07–3:10और जब शाम होती है, तो दोनो के गरो में,
- 3:10–3:14नदी के दिये हुए इनहीं रोज मर्रा के उपाहरो की महेंक उत्ती है.
- 3:14–3:16एक दं परफेक ताल मेल.
- 3:16–3:18और अगर बात मलाःो की करें,
- 3:18–3:22तो उनके ले कमला सर्फेक नदी नहीं, बलकी उनकी पूरी दून्या थी
- 3:22–3:25उनकी नाव जैसे देवी की पालकी ती
- 3:25–3:29लेहरो की आवास उनके बच्छो किले लोगी का काम करती ती
- 3:29–3:31गाड एक अईसी पवित्र जगे बन गया था
- 3:31–3:33जहां मुंदन के पहले बाल
- 3:33–3:36नहीं तब आद्ला का पतन, लेकिन जैसा कि हम जानते हैं,
- 3:36–3:39शान्ति और श्वद्धा का ये सुनहेरा दोर,
- 3:39–3:41हमेशा कि लिए नहीं रहने वाला था.
- 3:41–3:44जल्द ही इस शान्त दुन्या में एक बहुती आहिंकारी
- 3:44–3:46और हिंसक खत्राम मड़्ाने लगा.
- 3:46–3:52जल्दी इस शान्त दुन्या मे एक बहुत्ही आहिंकारी और हिंसक खत्रा मंड्राने लगा.
- 3:52–3:58सुखे के संकट से लेकर इस खृशाल जीवन तक कषवर एक दम सीदा और प्राक्रतिक ता.
- 3:58–4:01लेकिन तभी अंट्री होती है बैदला की.
- 4:01–4:06ये वो अईन्सान ता जिसने सीदे देवी नदी पर ही जबरदस चादित होपने की जुर्रत कर दी.
- 4:06–4:10ज़र अच्छी एग, सद्यों से चले आरहे इतने पवित्र रिष्टे के भीच,
- 4:10–4:16बवज्ते के बीच बएदला का ये गवंड पूरी स्थापिद वेवस्ता को तबाह करने वाला एक बयानक कदम दा.
- 4:16–4:46इस गववन्द का नतीजा क्या हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 4:46–4:50उगने बाद़ाद का उगने आखर में नाय मिल गया हो.
- 4:50–4:52दर्म का तराजु
- 4:52–4:57हमारा या विष्लेशन यहापर एक बहुत्थी दिल्चस पोर गमभीर मोड लिता है.
- 4:57–5:02किकि देखही ए, ये सर्फ किसी हीरो की जीद की आम कहानी नहीं है.
- 5:02–5:05ये स्र्व किसी हीरो की जीद की आम कहानी नहीं है
- 5:05–5:08बलकी हमारे कीए गय करमों के नतीजों पर
- 5:08–5:10एक बहुत ही गहरा दार्षनिक चिन्तन है.
- 5:11–5:13इस कहानी के बारी पन को समजने के लिए
- 5:13–5:15हमें द्रम को समजना होगा.
- 5:15–5:17द्रम, यानी सच्चाए, संतुलन
- 5:17–5:21और निर्दोशों की रक्षा करने का हमारा सबसे पविट्र कर्टव्ये
- 5:21–5:26और यही वो कर्टव्ये ता, जिसने आमर्सिंको उस संटुलन को वापस लाने किलिए
- 5:26–5:31बैद्ला का वड करने पर मजबोर कर दिया, उसे हर हाल में येग करना ही ता
- 5:31–5:39सुरक्षा द्र्म है फिर भी सुरक्षा के नाम पर बहाया गया निर्दोश रक्त एक किवन्दन्ती को हमेशा के लिए उडास चोर देता है.
- 5:40–5:43ये लाईन इस पूरी जीट को एक दम अलग नजर्ये से दिखाती है.
- 5:43–5:49ये उस बात को मानती है कि हिन्सा भले ही वो कितनी भी सही या जरूरी क्यो नहो,
- 5:49–5:53हमेशा अपने पीचे दुख का एक गेरा डाग चोर जाती है.
- 5:53–5:58तल्वार का गाओ सिव शरीर पर नहीं, बलकि उस पूरी कठा की आतमा पर बिलकता है.
- 5:58–6:04खेर आज की बात करें, तो वो नदी आज भी वहां के लोगो के लिए माता ही है.
- 6:04–6:09लोग बाराने पर उस से खृफ काते है, सुखे में उस से पानी की मिन्नते करते है,
- 6:09–6:14और हर चोटे बडे त्योहार पर उसके गातों पर वैसे ही दिये जलाए जाते है,
- 6:14–6:17ज़ेसे बैदला के आने से पहले जलाए जाते थे.
- 6:17–6:20इस पूरी गटना की सबसे गहरी चाप
- 6:20–6:23आज भी पुराने मलाहो के दिलो में जिन्दा है.
- 6:23–6:26जब वे आज आमर भाबा की मजार पर दिये जलाते है,
- 6:26–6:28तो वे एक साथ दो प्रार्टनाए करते हैं.
- 6:28–6:36पहली प्रार्त्ना, आगे की सुवक्षा के लिए, और दूस्री, उस हिन्सा के लिए ख्षमा मागने की, जो उस सुवक्षा को पाने के लिए करनी पडी थी.
- 6:36–6:41कितनी गेरी बात है ना, जब सुवक्षा के लिए हिन्सा की आवष्षक्ता होती है,
- 6:41–6:45तो हम न्याय और खशमा के तराजू को कैसे संथूलित करते हैं?
- 6:45–6:50इस विष्लेशन्ड के अंथ में ये सवाल हमें बहुत ही गेहरी सुच में चोड जाता है.
- 6:50–6:53जब किसी पवित्र चीस को बचाने के लिए,
- 6:53–6:55हत्यार उठाना मजबोई बन जाए,
- 6:55–7:00तो कोई भी समाज उस नियाय और उसके बारी दुख के भीच कैसे संटूलन बनाएगा?
- 7:01–7:07ये एक अईसा सवाल है तो कहानी ख़त्म होने के बाद भी हमारे और आपके जेहन में लंबे समय तक गुईचता रहेगा.
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आईए, आज एक बहदी दिल्चस्प और गेरी कता की दुन्या में चलते हैं. आमर भाबा कमला नदी के रक्षत. इस विष्लेषन में हम मित्ला की उस अद्बूत लोग कता को समजंगे, जहां प्रक्रती अईन्सान और दर्म आपस में इतने गेरे गुन्तेवे हैं, नक्षे के हिस्थे के तोर पर नहीं देखा जाता इनहें साक्शात जीवन देने वाली देवी माना जाता है जिनका इस पूरी जमीन पर एक बहुत ही गेरा अद्धियातमिक प्रभाव है तो चलिए इस प्रस्तावना से शुरू करते हैं माता और देवी आई एक देकते हैं के कैसे कमला नदी एक ही समय में एक पूजनिया देवी भी हैं और एक बेहत बहावुक कर देने वाली अनसानी कहानी का केंद्र भी अब जरा एस दून्या की कलपना कीजे यहा का पूरा समाज लोगों की रोसमर्रा की जिन्दगी तो उगर बाबा की पूरी कहानी इसी एक बहुती गेरे और दुखधविरोदाबास पर तिकी है. किसी की रक्षा करना जरूरी तो है, या किनारे पर बसे लोग, सब कुछ एक भेहत खुबसुरत और संदूलित दुन्या का हिस्सा लकते है। सुरक्षा की एक कहानी, फिर भी सुरक्षा की अपनी कीमत होती है. आमर बाभा की पूरी कहानी इसी एक बहुती गेरे और दूखध विरोदा भास पर टिकी है. किसी की रक्षा करना ज़रूरी तो है, लेकिन सच कहें तो, सच्चे सहस की अकसर एक बहुत भारी कीमट चुकानी परती है. एक असी कीमट जीद की खुषी कहतम होने के सद्यो बात भी, लोगो के दिलो में चुपती रहती है. कमला नदी का जन, कहानी की शुवात में हालात हमेशा इतने अच्छे नहीं रही ते बलकी यह कता एक अज़्े बहयानक संकत से शुग वुड़ी है जिस ने एक बहुत बड़े चमतकार के लिये रास्ता तट्यार किया जर अज्वक्त के बारे में सुचीए जब ये नदी थी ही नहीं हालात सच मे बहुत खोफनाक थे मित्ला की जमीन पूरी तरह सुख कर पट चुके थे बारिश का नामो निशान नहीं ता इस भयानक सुखे ने कभी हरे बरे रहने वाले केतो को एक दं वीरान कर दिया था गाँँगे सारे कुए सुक चुके ते सच में ये जीवन और म्रत्टिव के भीच की एक बयानक जंग थे लेकिन फिर जैसे सुक्वी दर्ती की दर्द भरी पुकार सूंकर पहाडो का सीना चीरते हुए कमला नदी फुट पडी उस्छने सुखी दरकती जमीन को अपने पानी से सीज दिया और देकते ही देकते क्या हूँँ? पानी, हरे बरे केट, और गाओ के गाटो पर बच्छो की वो प्यारी सी हसी वापस लोटाए. ज़ाई ज़ाई से कमला गुजरी मानो वहाई सोया हुए जीवन अचानक जूम कर जागुथा. किसान मला और सदबहाओ. इस चमतकारी जन्के बाद, नदी के किनारोपर जो समाज बसा वो बहत कुबसुरत और संटूलित था, जो पूरी तरहा से इस नदी के दिये हुए जीवन्दान पटे का हूँआ था इस चन्तूलन को आप कमला के दो बेटों, किसान और मलाः के जर ये बहुत अच्छी तरे समथ सकते हैं बहुर होते ही एक तरफ किसान अपना हल लेकर केतो की तरफ निकल परता है तो दूस्री तरव मलाः अपना जा लेकर गाड की ओर. और जब शाम होती है, तो दोनो के गरो में, नदी के दिये हुए इनहीं रोज मर्रा के उपाहरो की महेंक उत्ती है. एक दं परफेक ताल मेल. और अगर बात मलाःो की करें, तो उनके ले कमला सर्फेक नदी नहीं, बलकी उनकी पूरी दून्या थी उनकी नाव जैसे देवी की पालकी ती लेहरो की आवास उनके बच्छो किले लोगी का काम करती ती गाड एक अईसी पवित्र जगे बन गया था जहां मुंदन के पहले बाल नहीं तब आद्ला का पतन, लेकिन जैसा कि हम जानते हैं, शान्ति और श्वद्धा का ये सुनहेरा दोर, हमेशा कि लिए नहीं रहने वाला था. जल्द ही इस शान्त दुन्या में एक बहुती आहिंकारी और हिंसक खत्राम मड़्ाने लगा. जल्दी इस शान्त दुन्या मे एक बहुत्ही आहिंकारी और हिंसक खत्रा मंड्राने लगा. सुखे के संकट से लेकर इस खृशाल जीवन तक कषवर एक दम सीदा और प्राक्रतिक ता. लेकिन तभी अंट्री होती है बैदला की. ये वो अईन्सान ता जिसने सीदे देवी नदी पर ही जबरदस चादित होपने की जुर्रत कर दी. ज़र अच्छी एग, सद्यों से चले आरहे इतने पवित्र रिष्टे के भीच, बवज्ते के बीच बएदला का ये गवंड पूरी स्थापिद वेवस्ता को तबाह करने वाला एक बयानक कदम दा. इस गववन्द का नतीजा क्या हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ उगने बाद़ाद का उगने आखर में नाय मिल गया हो. दर्म का तराजु हमारा या विष्लेशन यहापर एक बहुत्थी दिल्चस पोर गमभीर मोड लिता है. किकि देखही ए, ये सर्फ किसी हीरो की जीद की आम कहानी नहीं है. ये स्र्व किसी हीरो की जीद की आम कहानी नहीं है बलकी हमारे कीए गय करमों के नतीजों पर एक बहुत ही गहरा दार्षनिक चिन्तन है. इस कहानी के बारी पन को समजने के लिए हमें द्रम को समजना होगा. द्रम, यानी सच्चाए, संतुलन और निर्दोशों की रक्षा करने का हमारा सबसे पविट्र कर्टव्ये और यही वो कर्टव्ये ता, जिसने आमर्सिंको उस संटुलन को वापस लाने किलिए बैद्ला का वड करने पर मजबोर कर दिया, उसे हर हाल में येग करना ही ता सुरक्षा द्र्म है फिर भी सुरक्षा के नाम पर बहाया गया निर्दोश रक्त एक किवन्दन्ती को हमेशा के लिए उडास चोर देता है. ये लाईन इस पूरी जीट को एक दम अलग नजर्ये से दिखाती है. ये उस बात को मानती है कि हिन्सा भले ही वो कितनी भी सही या जरूरी क्यो नहो, हमेशा अपने पीचे दुख का एक गेरा डाग चोर जाती है. तल्वार का गाओ सिव शरीर पर नहीं, बलकि उस पूरी कठा की आतमा पर बिलकता है. खेर आज की बात करें, तो वो नदी आज भी वहां के लोगो के लिए माता ही है. लोग बाराने पर उस से खृफ काते है, सुखे में उस से पानी की मिन्नते करते है, और हर चोटे बडे त्योहार पर उसके गातों पर वैसे ही दिये जलाए जाते है, ज़ेसे बैदला के आने से पहले जलाए जाते थे. इस पूरी गटना की सबसे गहरी चाप आज भी पुराने मलाहो के दिलो में जिन्दा है. जब वे आज आमर भाबा की मजार पर दिये जलाते है, तो वे एक साथ दो प्रार्टनाए करते हैं. पहली प्रार्त्ना, आगे की सुवक्षा के लिए, और दूस्री, उस हिन्सा के लिए ख्षमा मागने की, जो उस सुवक्षा को पाने के लिए करनी पडी थी. कितनी गेरी बात है ना, जब सुवक्षा के लिए हिन्सा की आवष्षक्ता होती है, तो हम न्याय और खशमा के तराजू को कैसे संथूलित करते हैं? इस विष्लेशन्ड के अंथ में ये सवाल हमें बहुत ही गेहरी सुच में चोड जाता है. जब किसी पवित्र चीस को बचाने के लिए, हत्यार उठाना मजबोई बन जाए, तो कोई भी समाज उस नियाय और उसके बारी दुख के भीच कैसे संटूलन बनाएगा? ये एक अईसा सवाल है तो कहानी ख़त्म होने के बाद भी हमारे और आपके जेहन में लंबे समय तक गुईचता रहेगा.