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अमर_बाबा__कमला_नदी_की_कथा.mp4
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- 0:00–0:06नमस्ते, आज हम मित्ला के हिर्दाय से जुडी एक बेहत गेरी और रोमाचक लोग कता में गोता लगाने वाले है.
- 0:06–0:12आमर भाबा की कता. ये कैसी जगा की कहानी है, जगा नदिया सर्ब बहते पानी का स्रोत नहीं है,
- 0:12–0:16बलके उने सक्षात देवी और मां मानकर पुजा जाता है.
- 0:16–0:20तो चल ये बिना किसी देवी के इस दिल्चष्प सफर की शुवात करते हैं.
- 0:21–0:23जरा इस विचार पर गवर की जिए,
- 0:23–0:25ये हमें बहुत सपष्ट रूप से बताता है कि,
- 0:25–0:28यहां कमला नदी कोई आम भगोलिक हिस्चा नहीं है.
- 0:28–0:32सदियों से वो एक जीती जागती साँस लेती हुई हस्ती है.
- 0:32–0:36इक आफी पालन हारमा है, जिसकी अपनी एक पुरी गाता है.
- 0:36–0:40तो आए सब से पहले इस बात को समचते हैं कि अच नदी को
- 0:40–0:42अदर शिताल मेल के साथ बसे हुए ते
- 0:42–0:45इन लोगों को नदी के पानी में एक माग के आचल जैसी ही
- 0:45–0:48तन्दी, कोमलता और असीम सुकून मिलता था
- 0:48–0:51लेके नदी के प्रती इस गेहरी और अटूट शद्दा को
- 0:51–0:54सच्मे समजने के लिए, हमें उस समय में
- 0:54–1:24बश़िज़ागा बारिष ने जैसे मुहुमूर लिया था और सारे कूए एकदम खाली पडे थे चारो तरफ बस एकी चीस ती निराशा का सन्नाटा और फिर जैसे दर्ट्टी पच्वाद पर प्रच्वाद प्रच्वाद प्रच्वाद प्रच्वाद प्रच्वाद प्रच्
- 1:24–1:26शान्ती की उस तदब का जवाब मिल गया
- 1:26–1:28कमला नदी का चन्म हुए
- 1:28–1:30पहाडो से उतरती हुई
- 1:30–1:32एक नई और चमकती जल्दारा
- 1:32–1:34जिसने सुखी जमीन की प्यास पुजाई
- 1:34–1:36और बंजर केटो को फिरसे
- 1:36–1:38हरा बभरा कर दिया
- 1:38–1:40इक लंभी नीन से जाग उटी हो.
- 1:40–1:48इसके बाद शान्ती का वो नेया युख श्रू हुए, जहाँ दो खाज समुडायो का पूरा जीवन इसी नेई नदी के इर्द-गिर्द गूमने लगा.
- 1:48–1:56ये दोनो समुडाय, किसान और मल्ला कमला मा के दो बेटो की तरा थे, जिनके भीच एक अधबुत सामनजस्सि था,
- 1:56–2:00सुबा होते ही किसान अपना हल लेकर केतों कि और निकल परता
- 2:00–2:03और मला हपना जाल लेकर गाड कि और
- 2:03–2:06रास्ते अलग थे, काम अलग थे
- 2:06–2:09लेकिन दोनो का जीवन एक ही श्रोथ से जुडा था
- 2:09–2:12मला हो के तो जैसे उनकी पूरी दुन्या ही कमला नदी थी
- 2:12–2:15उनकी नाउ कमला माकी पालगी का खाम करती थी
- 2:15–2:18और नदी की वो उड़्तिगिरती लेजरें
- 2:18–2:20उनके ले किसी मीटी लोगी से कम नहीं ती
- 2:20–2:24दिन का उजला प्रकाश हो, या रात का गेरा अंदेरा
- 2:24–2:26समय का चकर भले ही गूमता रहे,
- 2:26–2:29लेकिन उनका समरपन कभी नहीं बडलता था.
- 2:29–2:34वो नदी ही उनके अस्तित्व और उनकी गेहरी भक्ती का एक मात्र केंद्र बनी रही.
- 2:34–2:36ये रिष्ता इतना गेहरा था,
- 2:36–2:38कि नदी उने जो कुछ भी देती,
- 2:38–2:40वो से पूरी क्रितगितागे साथ सुभिकार करते.
- 2:40–2:44अर इसके बदले में वे अपनी पुँँश्वद्डा अरफिट करते थे
- 2:44–2:47यहां तकी माताएं अपने बच्चो के पहले बाल भी
- 2:47–2:49इनहीं पवित्र जलों को सवप्ते थी थी.
- 2:49–2:52ये वागगी एक अटूट संटुलन ता.
- 2:52–2:56यह बहतरीन सन्तुलन कईई सालो तक योंई बना रहा,
- 2:56–2:58पर यहां एक बहुत बड़ा सबाल कह़ा हुता है.
- 2:58–3:28आखर क्या हुता है, जब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अ
- 3:28–3:35तो दोल भी पीट दिया. इतने बड़े एहंकार का सामना करने के लिए अब जाहिर तोर पर एक नायक की जरूरत थी.
- 3:35–3:41इसके बाज जो भीशन तक्राव हूँँ उसकी उर्जा और आराजक्ता कलपना से परे थी.
- 3:41–3:44यो महा संग्राम था, ज़हा बेदला के हरेक दोखे
- 3:44–3:47और हरेक चाल को नायक आमर्सिंक ने
- 3:47–3:50एक एक कर के बूरी तरा चकना चूर कर दिया.
- 3:50–3:53ये लडाई अपने सबसे बहयानक चरम पर
- 3:53–3:55उसी गाट पर पूँची
- 3:55–3:57जहां से ये सारा बवाल शुरूव अ था
- 3:57–4:03आखरी प्रहार इतना जो़़दार दा, कि मानो पूरी दर्टी काँप उठी हो, और भेदिला दूल में मिल या,
- 4:03–4:08चारो तरफ बस कमला मा और आमर सिंकी जीट की जैजै कार गूँज रही ती.
- 4:08–4:13लेकिन रुकिये ये कत्फा किसी आम नायक की जीद की तरा यहां खफ्म नहीं होती,
- 4:13–4:19इसके बाज जो हुए उसका एक बहुत गेरा और भारी आसर आज भी महसुस की आजाता है.
- 4:19–4:23खत्रा तो तल चुका ता गातों पर दिये फिरसे टिम्टे माने लगे ते,
- 4:23–4:25और गाँ में शान्ती लोड आई दी.
- 4:25–4:29लेकिन रक्षा के नाम पर जो निर्दोश रक्ट बहाया गया
- 4:29–4:31उसने इस पूरी लोग कता को
- 4:31–4:34हमेशा के लिए एक अजीब सी उदासी के रंग में रंदिया.
- 4:34–4:37इस पूरी कता का सबसी बडा सबक यही है.
- 4:37–4:42तराजु को सही रखने में है, यह में बहुती शक्तिषाली विचार के साथ चोडजाता है,
- 4:42–4:45जर ज़ा सोची ए, पवित्र चीजों की रखषा करना,
- 4:45–4:48और उस रखषा के लिए चुकाएगे बारी कीमत के लिए,
- 4:48–4:52संतुलन बनाने, यहने तराजू को सही रखने में है
- 4:52–4:55यहने है एक बहुत शक्तिशाली विचार के साथ चोड जाता है
- 4:55–4:58ज़र शोची ए, पवित्र चीजों की रक्षा करना
- 4:58–5:00और उस रक्षा के लिए चुकाए गे बारी कीमद के लिए
- 5:00–5:15खषमा मागना इंदोनों के बीच का संटूलन कितना नाजुख हैं तो अगली बार जब आप किसी शांथ बहती नदी को देखें, तो ज़रूर विचार की जेगा कि वो अपने भीतर किन गेहरी कानियों को समेटे हुए हैं. इस चर्चा में हमारे सा जुडने किलिए आपका ब
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नमस्ते, आज हम मित्ला के हिर्दाय से जुडी एक बेहत गेरी और रोमाचक लोग कता में गोता लगाने वाले है. आमर भाबा की कता. ये कैसी जगा की कहानी है, जगा नदिया सर्ब बहते पानी का स्रोत नहीं है, बलके उने सक्षात देवी और मां मानकर पुजा जाता है. तो चल ये बिना किसी देवी के इस दिल्चष्प सफर की शुवात करते हैं. जरा इस विचार पर गवर की जिए, ये हमें बहुत सपष्ट रूप से बताता है कि, यहां कमला नदी कोई आम भगोलिक हिस्चा नहीं है. सदियों से वो एक जीती जागती साँस लेती हुई हस्ती है. इक आफी पालन हारमा है, जिसकी अपनी एक पुरी गाता है. तो आए सब से पहले इस बात को समचते हैं कि अच नदी को अदर शिताल मेल के साथ बसे हुए ते इन लोगों को नदी के पानी में एक माग के आचल जैसी ही तन्दी, कोमलता और असीम सुकून मिलता था लेके नदी के प्रती इस गेहरी और अटूट शद्दा को सच्मे समजने के लिए, हमें उस समय में बश़िज़ागा बारिष ने जैसे मुहुमूर लिया था और सारे कूए एकदम खाली पडे थे चारो तरफ बस एकी चीस ती निराशा का सन्नाटा और फिर जैसे दर्ट्टी पच्वाद पर प्रच्वाद प्रच्वाद प्रच्वाद प्रच्वाद प्रच्वाद प्रच् शान्ती की उस तदब का जवाब मिल गया कमला नदी का चन्म हुए पहाडो से उतरती हुई एक नई और चमकती जल्दारा जिसने सुखी जमीन की प्यास पुजाई और बंजर केटो को फिरसे हरा बभरा कर दिया इक लंभी नीन से जाग उटी हो. इसके बाद शान्ती का वो नेया युख श्रू हुए, जहाँ दो खाज समुडायो का पूरा जीवन इसी नेई नदी के इर्द-गिर्द गूमने लगा. ये दोनो समुडाय, किसान और मल्ला कमला मा के दो बेटो की तरा थे, जिनके भीच एक अधबुत सामनजस्सि था, सुबा होते ही किसान अपना हल लेकर केतों कि और निकल परता और मला हपना जाल लेकर गाड कि और रास्ते अलग थे, काम अलग थे लेकिन दोनो का जीवन एक ही श्रोथ से जुडा था मला हो के तो जैसे उनकी पूरी दुन्या ही कमला नदी थी उनकी नाउ कमला माकी पालगी का खाम करती थी और नदी की वो उड़्तिगिरती लेजरें उनके ले किसी मीटी लोगी से कम नहीं ती दिन का उजला प्रकाश हो, या रात का गेरा अंदेरा समय का चकर भले ही गूमता रहे, लेकिन उनका समरपन कभी नहीं बडलता था. वो नदी ही उनके अस्तित्व और उनकी गेहरी भक्ती का एक मात्र केंद्र बनी रही. ये रिष्ता इतना गेहरा था, कि नदी उने जो कुछ भी देती, वो से पूरी क्रितगितागे साथ सुभिकार करते. अर इसके बदले में वे अपनी पुँँश्वद्डा अरफिट करते थे यहां तकी माताएं अपने बच्चो के पहले बाल भी इनहीं पवित्र जलों को सवप्ते थी थी. ये वागगी एक अटूट संटुलन ता. यह बहतरीन सन्तुलन कईई सालो तक योंई बना रहा, पर यहां एक बहुत बड़ा सबाल कह़ा हुता है. आखर क्या हुता है, जब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अब अ तो दोल भी पीट दिया. इतने बड़े एहंकार का सामना करने के लिए अब जाहिर तोर पर एक नायक की जरूरत थी. इसके बाज जो भीशन तक्राव हूँँ उसकी उर्जा और आराजक्ता कलपना से परे थी. यो महा संग्राम था, ज़हा बेदला के हरेक दोखे और हरेक चाल को नायक आमर्सिंक ने एक एक कर के बूरी तरा चकना चूर कर दिया. ये लडाई अपने सबसे बहयानक चरम पर उसी गाट पर पूँची जहां से ये सारा बवाल शुरूव अ था आखरी प्रहार इतना जो़़दार दा, कि मानो पूरी दर्टी काँप उठी हो, और भेदिला दूल में मिल या, चारो तरफ बस कमला मा और आमर सिंकी जीट की जैजै कार गूँज रही ती. लेकिन रुकिये ये कत्फा किसी आम नायक की जीद की तरा यहां खफ्म नहीं होती, इसके बाज जो हुए उसका एक बहुत गेरा और भारी आसर आज भी महसुस की आजाता है. खत्रा तो तल चुका ता गातों पर दिये फिरसे टिम्टे माने लगे ते, और गाँ में शान्ती लोड आई दी. लेकिन रक्षा के नाम पर जो निर्दोश रक्ट बहाया गया उसने इस पूरी लोग कता को हमेशा के लिए एक अजीब सी उदासी के रंग में रंदिया. इस पूरी कता का सबसी बडा सबक यही है. तराजु को सही रखने में है, यह में बहुती शक्तिषाली विचार के साथ चोडजाता है, जर ज़ा सोची ए, पवित्र चीजों की रखषा करना, और उस रखषा के लिए चुकाएगे बारी कीमत के लिए, संतुलन बनाने, यहने तराजू को सही रखने में है यहने है एक बहुत शक्तिशाली विचार के साथ चोड जाता है ज़र शोची ए, पवित्र चीजों की रक्षा करना और उस रक्षा के लिए चुकाए गे बारी कीमद के लिए खषमा मागना इंदोनों के बीच का संटूलन कितना नाजुख हैं तो अगली बार जब आप किसी शांथ बहती नदी को देखें, तो ज़रूर विचार की जेगा कि वो अपने भीतर किन गेहरी कानियों को समेटे हुए हैं. इस चर्चा में हमारे सा जुडने किलिए आपका ब