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वीर_दीना_भदरीक_अमर_गाथा.m4a
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- 0:00–0:07निपालक जोग्यनगरक वीर्मुसहर भाई, दीना अबद्रिक अध्वूट कतापर यहमर्ट्वरिच सारान्षच्छी.
- 0:07–0:13ये अक्तर आहां आच्रज भरल गाता अची, जतै दुन्नु भाई अपन कजबेक शारिरिक ताकच्सा,
- 0:13–0:17अत्याचारी के दोर चवता कसदा लेल आमर बगगेला
- 0:17–0:21पहल दीना अभद्रिक पाकुरा में अपार शक्ती चल
- 0:21–0:27एतेख जे उ पाच्मनक भारी कुदारी से एक दिन में एक भीगा खेत जोट देच्छला
- 0:27–0:31मुदा जखं जंजार, गामक, क्रूर जमीदार, कनक्सिंग,
- 0:31–0:33उनका सब के शोशन करबाक प्रलोबन देलक,
- 0:33–0:36तो उच्व चाः अथ्याचार नहीं सहला.
- 0:36–0:39उख कनक्सिंके मारी पीट का बहगा देलनी.
- 0:39–0:43सोचु ता, जे ताकत हुनका लेल मात्र रोटीक जुगार चल,
- 0:43–0:47उआचानक सामाजिक विद्रो कतिक पाए गध्यार बनगेल.
- 0:47–0:50दो सर इविद्रो हुनका महंग परल
- 0:50–0:52आही अप्मानक बदला लेबाकलेल
- 0:52–0:54कनक सिंक पतनी भुदनी
- 0:54–0:57वन देवता राजा सलहेस के कत्होर तपस्या से प्रसन्नका
- 0:57–1:00दीना भद्रीक प्रान मांगी लेलक
- 1:00–1:02आब देवता वचन से बानल चला
- 1:02–1:04तो विववश्बच्चल सा
- 1:04–1:09इक्त कब्ती बागें पथाक कतःया जंगल में दुन्नुभाएक शिकार कर्वादेलनें
- 1:09–1:15इबड अच्रज के गबच्छे नहीं जे इक्त प्रतिग्या क्यागा देव्ताक न्याय से हो नीचा बगेल
- 1:15–1:19अंत तब वादो म्रित्त्योंकर कताक अंत नहीं चल
- 1:19–1:26मरलाक बादो दुन्नु भाएक आत्मा आपन माता निरसु के स्राद के लेल सामग्रीक विवस्ता का हूंकर सम्मान बच्वलने.
- 1:26–1:33औए अद्रिष्श्य रूप से एक्सोप प्चास से भेसी अट्याचारी के मारी का आपन मुसार समाजक मात उच्केलने.
- 1:33–1:39देखियो म्रित्त्यु कोना आही सादारन मस्दूर के समाजक आमर रक्षक बनादे लग.
- 1:39–1:42दीना मद्रिक इगाता प्रमानित करे दची,
- 1:42–1:45जच्छल से देख के तमारल जासके तची,
- 1:45–1:49मुदन्याय अस्वाभिमान ले लडएत आत्मा सदिकन आमर रहत ची.
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निपालक जोग्यनगरक वीर्मुसहर भाई, दीना अबद्रिक अध्वूट कतापर यहमर्ट्वरिच सारान्षच्छी. ये अक्तर आहां आच्रज भरल गाता अची, जतै दुन्नु भाई अपन कजबेक शारिरिक ताकच्सा, अत्याचारी के दोर चवता कसदा लेल आमर बगगेला पहल दीना अभद्रिक पाकुरा में अपार शक्ती चल एतेख जे उ पाच्मनक भारी कुदारी से एक दिन में एक भीगा खेत जोट देच्छला मुदा जखं जंजार, गामक, क्रूर जमीदार, कनक्सिंग, उनका सब के शोशन करबाक प्रलोबन देलक, तो उच्व चाः अथ्याचार नहीं सहला. उख कनक्सिंके मारी पीट का बहगा देलनी. सोचु ता, जे ताकत हुनका लेल मात्र रोटीक जुगार चल, उआचानक सामाजिक विद्रो कतिक पाए गध्यार बनगेल. दो सर इविद्रो हुनका महंग परल आही अप्मानक बदला लेबाकलेल कनक सिंक पतनी भुदनी वन देवता राजा सलहेस के कत्होर तपस्या से प्रसन्नका दीना भद्रीक प्रान मांगी लेलक आब देवता वचन से बानल चला तो विववश्बच्चल सा इक्त कब्ती बागें पथाक कतःया जंगल में दुन्नुभाएक शिकार कर्वादेलनें इबड अच्रज के गबच्छे नहीं जे इक्त प्रतिग्या क्यागा देव्ताक न्याय से हो नीचा बगेल अंत तब वादो म्रित्त्योंकर कताक अंत नहीं चल मरलाक बादो दुन्नु भाएक आत्मा आपन माता निरसु के स्राद के लेल सामग्रीक विवस्ता का हूंकर सम्मान बच्वलने. औए अद्रिष्श्य रूप से एक्सोप प्चास से भेसी अट्याचारी के मारी का आपन मुसार समाजक मात उच्केलने. देखियो म्रित्त्यु कोना आही सादारन मस्दूर के समाजक आमर रक्षक बनादे लग. दीना मद्रिक इगाता प्रमानित करे दची, जच्छल से देख के तमारल जासके तची, मुदन्याय अस्वाभिमान ले लडएत आत्मा सदिकन आमर रहत ची.