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विद्यापति_एब्सर्ड_नाटक_आ_झाड़ूदारक_समीक्षा.m4a

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Part 6 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 6
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  1. 0:00–0:06गजिंद्र ताकुरक एह शोद आलेक में अबसर्ड आटक, विद्यापतिक एतिहासिक पहचान,
  2. 0:06–0:11आलोग कवि जारुदार के एक सुत में बन्दवाक नीक प्रयास भीले चे,
  3. 0:11–0:16ता आव हम्रा सब सीदे एह समगरी मुख्छि समीच्षा पर चले चे.
  4. 0:16–0:20आप दोगा दोशा तापू पर पहुज गल हुए,
  5. 0:20–0:23हमरा इबात बहुत गाराई से महसुज भेल,
  6. 0:23–0:27जकन हम आप दोशा तापू पर पहुज गल हूए,
  7. 0:27–0:30अमरा इबात बहुत गाराई से महसुज भेल,
  8. 0:30–0:32जकन हम आप पहुज भेल,
  9. 0:32–0:39वा नो अंट्री मा प्रवेश सं विद्यापती पर अवेत छी तोग्रा लागत चे जना उ आं
  10. 0:39–0:43आआ जना उ कोनो दोसर तापू पर पहुज गेल हुए
  11. 0:43–0:46हमरा इबाद बहुत गाराई से महसुज भेल
  12. 0:46–0:50जकन हम इया लेक पडी रहल चलूए तपहिल प्रती सत हिस्सा
  13. 0:50–0:56पूर्नत्य उत्तर आदूनिक दर्षन, अबसर्ट रंग मंच और उकर विदम्मना पर केंद्रिच्छल.
  14. 0:56–1:01सत्या, हम्रो मस्तिष्क उही दाश्निक विमर्ष्छ मे पूरा रमीगल्चल.
  15. 1:01–1:08आओकर बाद बिना कोनो पूर्व सुचनाक, हम्रा लोकनी अचानक चोदवम शताबदिक मिठिला में आबी जाएची.
  16. 1:08–1:12मने जते विद्यापतिक पहचानक अतिहासिक विमर्ष चली रहा लगचे.
  17. 1:12–1:15रहा आप, इकोनो सामान न बदलाव नहेच,
  18. 1:15–1:20इपाथक के लेल एक्ता जेना कहु जंप कट जका एज बुजल येने.
  19. 1:20–1:24एक्दम. हम्रा इपुजबा मे बहुत समेलागल,
  20. 1:24–1:28जे लेक्ध इदून्नु अलगल अगब की एक कर रहल चती.
  21. 1:28–1:34तीख कहल हूँ. तक एज जे पाथक का मस्तिष्ट एक्ता लैमे काज करे देज.
  22. 1:34–1:42जखन आहा उक्रा एक्ता विषैए से दोसर विषैए पर लोग जाएची, ता आहा कि उक्रा बाद दिखाई बाख हो इच्छाए.
  23. 1:42–1:45आप एक्ता रास्ता बने बाख हो इच्छाए.
  24. 1:45–1:49लेक्खलक बहुत पैग एतिहासिक तत्फ्या आसाहित्तिक समज आएच.
  25. 1:49–2:19अग, ये अग, ये अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ
  26. 2:19–2:23उ पाथकक के एक ता जधका नहीं दबाक प्रयास को रहल चती.
  27. 2:23–2:26बहासा के चे, मुदा हम्रा एबुजबाक चाही,
  28. 2:26–2:29जे लेक्खकक अंतिम उद्देश्य की आचे.
  29. 2:29–2:31लेक्खक उद्देश्य आचे,
  30. 2:31–2:34विद्या पतिक अस्ली पहच्चान की स्तापित करव,
  31. 2:34–2:37अप्व्ववर्ती इतिहास कारक खंदन करव.
  32. 2:37–2:38एक दम सत्यः.
  33. 2:38–2:40ता आब देख हूँ,
  34. 2:40–2:42जाहा पात्खक जटका दोका,
  35. 2:42–2:43अख्रा भटका देप,
  36. 2:43–2:47तो औहाँ गंभीर अतिहासिक तरक दरी पहुचत कोना.
  37. 2:47–2:48हा, इता चे.
  38. 2:48–2:57जद्का देनाई एक्ता कलात्मक प्रुवोग बहुसकी तची मुदेक्ता अकादमिक वाश्वोद परक निबंद में इपात्धक विमुख कोडई तची.
  39. 2:57–3:12तएकर समवदानक लिल नातकक खन्डक अन्त में एक ता सपश्ट त्रन्जिशन वह कहो संक्रमन परग्राव जोडबाक सुजाव अचे जे पात्खक इबतावे आचे जे इदुनो विषय मुलता एके ही थेक.
  40. 3:12–3:14तएक यी संक्रमन परग्राव कोना काजकरत?
  41. 3:14–3:21माने, हमरा सब वेटिंग़्वर गोडो का वलादिमिर अस्टागूना के सीदे विद्यापती सो कोना जोडी सकैईच्छें.
  42. 3:21–3:26आ, हमरा सबह के निरद्खता वप्रतीक्षा का थीम पर केंद्रित हे बाख चाही.
  43. 3:26–3:28आच्छ, निरद्खता पर.
  44. 3:28–3:34अदाह्रनक लिल अबसर्ट नाटक में मानव जीवनक निरथक्ता
  45. 3:34–3:38और इतिहास में महाकवी विद्यापती के पाग पहिराक
  46. 3:38–3:41हुनक अस्ली लोग परिचानक के मितावक निरथक्ता के
  47. 3:41–3:44एक संगे जोडल जासके तिछेई
  48. 3:44–3:48लेखख एता एक ता रोचक साद्रिष्ष्प्रस्तुत का सकेच्छती
  49. 3:48–3:53उलिक सकेच्छती जाही तरह आपसर्ट नातक पात्र
  50. 3:53–3:55बिना कोना उदेश्षक भात जोहत अच्छट है
  51. 3:55–3:57तहीना इतिहास से हो
  52. 3:57–4:00एक ता कल्पित विद्यापती के गडिक
  53. 4:00–4:03आस्ली लोक परम्पराग भाट जोबा के भिस्री गेल अचे
  54. 4:03–4:05यी बहुथ सशक्त चे
  55. 4:05–4:07वाए, यी हो कहल जासके तचे
  56. 4:07–4:12जे, योरप दूईतिया विष्विद्धाख बाद अपन अस्तितवक विदम बना के
  57. 4:12–4:14आबसर्ड नाटक मे देखलक
  58. 4:14–4:19मुदा मैत्ली साहित्य, अपने तिहास कविदम मना के सद्यों से जीद आवी रहल चे,
  59. 4:19–4:22जदे एक ता लोक कवी के दरबारी बना दिल गले है.
  60. 4:22–4:25बलकोल, एक दम सही पक्डलो.
  61. 4:25–4:29इस शुन्लाक बाद पाटकक के तुरन समझ में आवी जात,
  62. 4:29–4:32जे उ आप सर नाटक की एक पडी रहल जल.
  63. 4:32–4:36आआ, अख्रा एबुजायत जे एकोनो अलक तापू नहीं अचे.
  64. 4:36–4:40बलकी इप उगी अगी अटिहासिक नाटकक दार्षनिक आदार थेक
  65. 4:40–4:43जकर पर्दा फाश लेखक करवाग जारहल चती.
  66. 4:43–4:50एक्दम, एज़़ सपाथक के एक तद सन्तुष्टी भेटत आ अ अ अगामेक हिस्सा लेल तगयार बोजाएत.
  67. 4:50–4:58मुदा भुजलिये ने जकन हम्रा सब अदिहासिक खन्ड में प्रवेश करे ची ता एक ता नव समस्या थाड बोजाएत छे.
  68. 4:58–4:59की समस्या?
  69. 4:59–5:05अटिहासिक विमर्ष्के समय बाशाक श्यली में अचानक उग्रता अव्यंग्यका प्रवेश
  70. 5:05–5:09शोद कर अकाद्दमिक गंभीर्ता के प्रभवित करेत अचे
  71. 5:09–5:12यहे कर दो सर पएइख कमजोरी अचे
  72. 5:12–5:16अदिया आभी का निबंदख तोण पूरा बदली जाई टचे
  73. 5:16–5:24जखन लेखक रामनात जा वा रामव्रिक्ष भेनीपूरी सन पूर्वक्ती विद्वाना क्चन्दन करेच्छती, तो उ बहुत अक्रोषिद बहुजाईच्छती.
  74. 5:24–5:24शत्यद
  75. 5:24–5:29विस्मयादी बोदधचिन माने एक्स्कलमेशन मारक कब भर्मार भूजाईत छे होते.
  76. 5:29–5:32तीख्षन शब्दावली के प्रियोग होगा लागत अचे
  77. 5:32–5:32एक दम
  78. 5:32–5:34मुदा एक तब आद कहो
  79. 5:34–5:37की लेखख का की क्रोद जायस नहीं अचे
  80. 5:37–5:41सदियो सा एक तब महाकविक अस्ली पहचान के मिता दिलगे लेचे
  81. 5:41–5:42जग कोनो शोद करता के
  82. 5:42–5:45इटिहासिक अननयाए बहेते चे
  83. 5:45–5:48तो उकर भाशा मे अक्रोश आबई तश्वाभवी कच्छे
  84. 5:48–5:49आखव, श्वाभवी कच्छे
  85. 5:49–5:53कि हम्रा सब हुंकर भावना के दबाबक प्रयास नहीं करहल ची
  86. 5:53–5:54नहीं, नहीं
  87. 5:54–5:56हम एन इक रहल ची
  88. 5:56–5:58जे लेकख क्रोद जाएज नहीं चा
  89. 5:58–6:00हुंकर भावना
  90. 6:00–6:02पूर्नता सत्या दार्कि कच्छ।
  91. 6:02–6:05मुदा हम बात कर रहल ची प्रभाव क।
  92. 6:05–6:06आच्छा प्रभाव क।
  93. 6:06–6:10आआ, मनो विग्यानक स्थर पर विचार करू
  94. 6:10–6:13जकन आहा कोनो निबंद में क्रोदित होगत ची
  95. 6:13–6:15या व्यंगे कर आई ची
  96. 6:15–6:20तब पाथक कद्यान आहाक कतत्ये से हद्टकर आहाक कबावना पर चली जाई तच्छ.
  97. 6:20–6:26मने उस शोचे लगे तच्छ जे लेक्ख क पुर्वा ग्रहसक ग्रसिच छती बुजलों?
  98. 6:26–6:27एक दम.
  99. 6:27–6:35अख्शेप आ व्यंग्यक श्धान पर अकादमिक तटस्त्ता अप्रमानक प्रयोग के आरो बड़ही बाक अवश्ख्ता आच्छे.
  100. 6:35–6:43अक्रोश अहाक तर्क के कमजोर करईतच, जक्शन की अकादमिक तटस्त्ता अहाक अजे बनादेच.
  101. 6:43–6:53इब भूजवामे ता आभी रहल अची, मुदा जक्ञन आहाके कोनो स्तापित जूथे के तुडवाबा कचे, तकी तनी मनी अक्रामकता आवश्शक नहीं आची.
  102. 6:53–6:55आँ, कोना?
  103. 6:55–7:05मैं, जै हम केवल इगाब, जै इगाबात गलत अच्छ, तो उकर प्रभाव उत्टेक नहीं परत, जित्ते इग कहबामे जै इगता एटिहासेग च्छल अच्छ.
  104. 7:05–7:10मुदद्त्त्या स्वयम सबसे पहज अक्रामक अस्ट्रच्हने
  105. 7:10–7:13जकन आहा कहेख ची, जे ये एक टा च्फलच्छ,
  106. 7:13–7:16ता आहा अपन निशकर्ष पाटक पर थोपी रहल ची.
  107. 7:16–7:20ता एकर बदला मे की करबाक चाही.
  108. 7:20–7:24एकर बदला मे आहा पाटक के उसाख्छ दिखाओ,
  109. 7:24–7:27जाई सपात्ख स्वयं कही उतहे, जे एट चलज
  110. 7:27–7:29अगो
  111. 7:29–7:34अदाहरन कलेल, बेनी पूरी वा रामनात जाग का अलोचना करबाक लेल,
  112. 7:34–7:40विस्मयादी बोदख छिन्ह वा तीछना शब्दावलीक प्रयोग कबदला में,
  113. 7:40–7:43सीदे तोर पर कीर्तिलताक उद्दरन
  114. 7:43–7:45वा जोती रीश्वर कवरन रतनाकर में
  115. 7:45–7:49देल गेल भिदापत नाज का एतियासिक साख्षके
  116. 7:49–7:51उनका लोकनिक कतन संगे
  117. 7:51–7:53समानानतर रुप सराखी का
  118. 7:53–7:55कहन्दन कयल जासके तच्छ
  119. 7:55–7:57मैं आहा कहवा करता हैज्
  120. 7:57–8:00जे हम्रा पुर्वोवर्ती विद्वानक कतन
  121. 8:00–8:04आम्मूल अतिहासिक सक्छके आमने सामने कहडा कदे बाखचाही.
  122. 8:04–8:05भिल्ल्कुल.
  123. 8:05–8:06आहा लिकु,
  124. 8:06–8:08रामनाद जाक एनिशकर्श,
  125. 8:08–8:12जे विद्यापती केवल एक ता दरबारी अ समस्क्रितनिष्ट कवी चलाह,
  126. 8:12–8:20उ जोती रीश्वर्क वरन रतनाकर मे उपलड भिदापत नाज का विवरन सर सीदे तोर पर तकराई तच्छ.
  127. 8:20–8:22आई ता बहुत विस्पष्ट आएज.
  128. 8:22–8:28वरन रतनाकर विस्पष्ट रूप सर एक ता लोक परमपराक उपस्थिती प्रमानेत करे तच्छ.
  129. 8:28–8:32बस यते भे एत्या कोनो विस्मयादी भूदख चिनन नहीं आएज,
  130. 8:32–8:35कोनो गारी नहीं आएज, कोनो व्यंग्य नहीं आएज.
  131. 8:35–8:42मुदा इवाग के देनी पूरी वर रामनात जागतंक के जडे सकाती दैथा चिन.
  132. 8:42–8:44इबात हम भूजी रहल ची आब.
  133. 8:44–8:46जखन हम अक्रोषित भखर लिखाईत ची,
  134. 8:46–8:50तहम सामने वालाके अपन बचाव करबाक मोका देची.
  135. 8:50–8:52एक दम सत्या.
  136. 8:52–8:57मुदा जखन हम केवल जोतरीष्वरक पोठिक पन्ना खोल के सामने राखे देची,
  137. 8:57–8:59तो अकर कोनो काटने चे.
  138. 8:59–9:04इजे कोल्डवात ततस्त्तर्क अची ने इबेशी मारा कची.
  139. 9:04–9:08आँ, इब लेखक के एक तब हावोक व्यक्ती से बड़ल के,
  140. 9:08–9:13एक तगमभीर अकाद्मिक शोद करताक रूप में स्थापित करे तची.
  141. 9:13–9:18जे कर बात के कोनो अकाद्मिक संस्थान खारिज नहें कर सके तची.
  142. 9:29–9:38अद्राद्दार अद्राज्देव मंडलक संदर्भ में देलगल तर्क के मुक्य साहित्तिक विमर्षक संग पुडत्ह एकिक्रित करबाक आवश्व्टा ची.
  143. 9:38–9:41इद्तीसर पैग कमजोरी अची.
  144. 9:41–9:44आई, इई एक ता बहुत महतपोण बिन्दू ची.
  145. 9:44–9:46अम इमान्दारी से कहेथ ची
  146. 9:46–9:48जकन हम निबंद पड़ेद पड़ेद
  147. 9:48–9:50एही हिस्सापर पहुच लगु
  148. 9:50–9:52ता हम्रा लागल जेना
  149. 9:52–9:54मुक्य निबंद कतम बहगे लच
  150. 9:54–9:56अम कोनो परिषिष्ट
  151. 9:56–9:58वाजेक्रा अंगरेजी में
  152. 9:58–10:00अपन्टिक्स कहेथ ची
  153. 10:00–10:02हम्रा से हो यही लागल चल
  154. 10:02–10:07माने विद्यापतिक अटिहासिक विमर्ष इते गमभीर चल
  155. 10:07–10:10जे अकर बाद लोग कवी जाडुदार
  156. 10:10–10:15जे अपन गावक चोबट्या आ आदी दूर पर नव विद्धा गड़े चती
  157. 10:15–10:18हुनक चर्चा एक दम्स अलक थलग लागल
  158. 10:18–10:20हम्रा इप्रष्न परशान करेत रहल,
  159. 10:20–10:23जे विद्यापतिक उही मद्ध्यकालीन विमर्ष्छ में
  160. 10:23–10:27इआदूनिक लोग कवी अचानक सक्ये काभी गेला.
  161. 10:27–10:30यहे तल लेक्खक सबसे पहेख चुनोती अचाभ.
  162. 10:30–10:35जेक्रा पात्ख एक ता द्रेक्त जान्कारी वा परिषिष्ट मानी रहलच
  163. 10:35–10:38उ दरसल एही पूरा शोदख चरमोद कर्ष
  164. 10:38–10:40वा क्लामेक्स फसके चल
  165. 10:40–10:42औह, क्लामेक्स? कोना?
  166. 10:42–10:46आ, लेक्ख एई अस्पष्ट करबाक प्रयास कराल चती
  167. 10:46–10:50जे विद्यापतिक अस्ली परमपरा, दर्बारी पोठी में नहीं
  168. 10:50–10:52बलकी लोक कंथ में जिन्दा है.
  169. 10:52–10:56मुदा ईबात इस पश्ट रूप से च्थापित नहीं भेल.
  170. 10:56–10:58आप, उब लिखल निगल तीक सर.
  171. 10:58–11:00ता एक रा सुरहाया बलाक लेल,
  172. 11:00–11:04ज़ारुदार अ राज्देव मन्दलक स्रिजनक्के
  173. 11:04–11:06वोही समानान्तर परम्पराकक
  174. 11:06–11:09आदूनिक विस्तारक रूप में स्तापित्यल्जाई
  175. 11:09–11:13जकर चर्चा विद्यापती का संदर्भ में भेलगचा
  176. 11:13–11:15तंकी हम्रा एई भुज्वाख चाही
  177. 11:15–11:17जे लेखकक द्रिष्टी में
  178. 11:30–11:33उदाहेनक लेल लेखा की स्पष्ट करएत जैना महाकवी विद्यापती के लोक कंत माने विद्यापतनाच जिया कराखलक,
  179. 11:33–11:38तहीना जारुदार सन लोक कवी के इत्बा दिनदरी अभीजात्ते वर्ग कुपेख्षाग बादो समाजक मेंजाग.
  180. 11:38–11:41अदाहेनक लेल लेखा की स्पस्ट करएत
  181. 11:41–11:43जैना महाकवी विद्यापती के
  182. 11:43–11:47लोकखन्त माने विद्यापतनाच जीया कर अखलक
  183. 11:47–11:49तहीना जाडुदार सन लोकवी के
  184. 11:49–11:54तविद्यापती के लोक कंथ माने विद्यापतनाच जीया कर अक्लक
  185. 11:54–11:59तविना जाडुदार सन लोक कवी के इत्बा दिन दरी अभीजात्यवर्ग कुपेख्षाग
  186. 11:59–12:02बादो समाजक मुल सकती अपने संगे रकने चा.
  187. 12:02–12:06इएक ता बहुत सुन्दर नेरेटिव आक वा कत्धाक्रम बनेतेशा
  188. 12:07–12:09मुदा एकरा शब्द में कोना उतारल जाए
  189. 12:09–12:12जे पात्धक शीथा समझ में आबे
  190. 12:12–12:14मने एकर कोनो थो सुपाए?
  191. 12:14–12:19आप आते लेक्ख जाडू दारक नाम में जी जाडू अची
  192. 12:19–12:23उक्रा टेक्ता रूपक, वा मेटटवर जका प्रयोग कर सकत चे.
  193. 12:23–12:25जाडू के रूपक जका.
  194. 12:25–12:29जाडू दारक्हरा जाडू रूपक के सीदे तोर पर,
  195. 12:29–12:33विद्यापतिक इतिहास पर लागल दूरी के साफ करभाग,
  196. 12:33–12:37प्रतिकात्मक आस्त्रक्रूप में प्रस्तुत कैल जासकतच्
  197. 12:37–12:39अहो, ये तब बहुत गजब बात कहलो है
  198. 12:39–12:43कल्पना करू लेक्ख्चान निबंद क अंत में इग्छेत
  199. 12:43–12:50जे इतिहासक जे पन्ना विद्यापतिक अस्ली लोक स्वरूप पर दूरी दोदे लक
  200. 12:50–12:58उक्रा साव करवाक लिल, आजुक संदरव में राम्दे प्रसाद मन्डलक इज्जाडू एक ता अनीवार्या अजार अच्छी.
  201. 12:58–12:59वाए.
  202. 12:59–13:02इज्जाडू केवल चोगित्या के दूर नहीं बहारे तच्छे.
  203. 13:02–13:08इसाहित्तिकर उही अबसर्ट विदंबना के से हो बहरी का साव कर दे तचे
  204. 13:08–13:09वाख
  205. 13:09–13:11इआकल्पनी रूप से प्रभाव कारी आचे
  206. 13:11–13:14मनेजन निबंद एही तरा समाप्त होगी तचे
  207. 13:14–13:18तपाथक जे वेटिंग फोर गोडो से अपन यात्रा शुरू केने चल
  208. 13:18–13:22अईही ज़ाडू पर आबीकर अपन पुन तापा बी लेत.
  209. 13:22–13:25एक्दम. उक्रा बुजाएत जे इत तीनो कहन्द,
  210. 13:25–13:29अपसर्ड नाटक, विद्या पतिक इतिहास, अज़्ाडू दार,
  211. 13:29–13:31वास्तप में एक ही गब ची.
  212. 13:31–13:35इत इक ता समपूरन आगोल आकार दिए देलकाई सोद के
  213. 13:35–13:37यहे तलक्ष आची हम्रा सवक
  214. 13:37–13:42कोनो गंवेर निबंदध के केवल तत्यका संकलन नही
  215. 13:42–13:46बल की एक ता सुगतित विचार यात्रा हे बाखचा ही भुजलियने
  216. 13:46–13:47एक दम सत्यद
  217. 13:47–13:53जब वाँदा उख्रा प्रस्तुद कर्वाग जे मास्तूशिल पच्यने उईही में किचु काज कर्वाग काब शकताचे.
  218. 13:53–13:58सही कहलू, आई हम्रा सव एहे सामगरीक विस्तित अद्द्यान कहलू,
  219. 13:58–14:00अद्तीन चामुख्य बिन्दू पर विचार कहलू.
  220. 14:00–14:06अज्दियापतिक एतिहास्इक पहीचाना के प्रतिक्षा अनिरद्धाख्तासन मजबुत वैचारिक दधागासन जोडब.
  221. 14:06–14:08अप पहिल बहुत जरुरी एची.
  222. 14:08–14:13दो सर एतिहास्इक खंडना में उग्रता अव्यंग्यक बढ़ला में
  223. 14:13–14:20अविद्यापतिक अटिहासिक पहीचाना के प्रतिक्षा अनिरद्धक्तासन मजबूत वैचारिक दधगासन जोडब.
  224. 14:20–14:22आव, उपहिल बहुत जरूरी आची.
  225. 14:22–14:26तो सर अटिहासिक खंडना मे उग्रता अव्यंगय कबडला मे
  226. 14:26–14:30अकादमिक तट्ध्हस्तता अप्राथमिक साख्ष्य,
  227. 14:30–14:32जेना वरन रतना कर, उक्रा अपनावेसा,
  228. 14:32–14:35शोदख के विष्वसनियता कोना बड़ेट अच्छे,
  229. 14:35–14:36उक्रा भुजभ.
  230. 14:36–14:37इक्दम.
  231. 14:37–14:39लोकक विक्यन परइषिष्ट नहीं,
  232. 14:39–14:46बलकी समानान्तर परम्पराके आदूनिक कडी आनिबंदख के चरमोद करष के रूप में स्तापित करव.
  233. 14:46–14:52हम्रा पुन्विश्वासेच जि जकन एह बदलाव सब के एह निबंद में समाहित कल जातेई,
  234. 14:52–14:56तए नो किवल अकादमिक रूप सा अजीएप हो जातेई,
  235. 14:56–15:00बलकी कोनग भी पाथके बान्द कर रक्वा में पुडता सब्फल हैत.
  236. 15:00–15:03आआ, और हम श्रोता सा आग्रा कराएच्छी,
  237. 15:03–15:06जे एह सुज्याओ सबखक आपन रच्ना में समाहित कै,
  238. 15:06–15:09एक राएव परिष्क्रित कर्थक,
  239. 15:09–15:12अन्व रूप में पुना हम्रा सब के लग पठाव थी,
  240. 15:12–15:15जाही सा एप रम्रा सब आरो आगु विचार कर सक्छी.
  241. 15:15–15:17एक दाम पठाव थी अपुना.
  242. 15:17–15:19आख शोद महत्व पुरनेच,
  243. 15:19–15:22बस अकर शिलप पर एक भिर पुना विचार करू.
  244. 15:22–15:27इत्बेख संग आए के इचर्चा हम्रा सबयते समाप्त करएची

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गजिंद्र ताकुरक एह शोद आलेक में अबसर्ड आटक, विद्यापतिक एतिहासिक पहचान, आलोग कवि जारुदार के एक सुत में बन्दवाक नीक प्रयास भीले चे, ता आव हम्रा सब सीदे एह समगरी मुख्छि समीच्षा पर चले चे. आप दोगा दोशा तापू पर पहुज गल हुए, हमरा इबात बहुत गाराई से महसुज भेल, जकन हम आप दोशा तापू पर पहुज गल हूए, अमरा इबात बहुत गाराई से महसुज भेल, जकन हम आप पहुज भेल, वा नो अंट्री मा प्रवेश सं विद्यापती पर अवेत छी तोग्रा लागत चे जना उ आं आआ जना उ कोनो दोसर तापू पर पहुज गेल हुए हमरा इबाद बहुत गाराई से महसुज भेल जकन हम इया लेक पडी रहल चलूए तपहिल प्रती सत हिस्सा पूर्नत्य उत्तर आदूनिक दर्षन, अबसर्ट रंग मंच और उकर विदम्मना पर केंद्रिच्छल. सत्या, हम्रो मस्तिष्क उही दाश्निक विमर्ष्छ मे पूरा रमीगल्चल. आओकर बाद बिना कोनो पूर्व सुचनाक, हम्रा लोकनी अचानक चोदवम शताबदिक मिठिला में आबी जाएची. मने जते विद्यापतिक पहचानक अतिहासिक विमर्ष चली रहा लगचे. रहा आप, इकोनो सामान न बदलाव नहेच, इपाथक के लेल एक्ता जेना कहु जंप कट जका एज बुजल येने. एक्दम. हम्रा इपुजबा मे बहुत समेलागल, जे लेक्ध इदून्नु अलगल अगब की एक कर रहल चती. तीख कहल हूँ. तक एज जे पाथक का मस्तिष्ट एक्ता लैमे काज करे देज. जखन आहा उक्रा एक्ता विषैए से दोसर विषैए पर लोग जाएची, ता आहा कि उक्रा बाद दिखाई बाख हो इच्छाए. आप एक्ता रास्ता बने बाख हो इच्छाए. लेक्खलक बहुत पैग एतिहासिक तत्फ्या आसाहित्तिक समज आएच. अग, ये अग, ये अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ उ पाथकक के एक ता जधका नहीं दबाक प्रयास को रहल चती. बहासा के चे, मुदा हम्रा एबुजबाक चाही, जे लेक्खकक अंतिम उद्देश्य की आचे. लेक्खक उद्देश्य आचे, विद्या पतिक अस्ली पहच्चान की स्तापित करव, अप्व्ववर्ती इतिहास कारक खंदन करव. एक दम सत्यः. ता आब देख हूँ, जाहा पात्खक जटका दोका, अख्रा भटका देप, तो औहाँ गंभीर अतिहासिक तरक दरी पहुचत कोना. हा, इता चे. जद्का देनाई एक्ता कलात्मक प्रुवोग बहुसकी तची मुदेक्ता अकादमिक वाश्वोद परक निबंद में इपात्धक विमुख कोडई तची. तएकर समवदानक लिल नातकक खन्डक अन्त में एक ता सपश्ट त्रन्जिशन वह कहो संक्रमन परग्राव जोडबाक सुजाव अचे जे पात्खक इबतावे आचे जे इदुनो विषय मुलता एके ही थेक. तएक यी संक्रमन परग्राव कोना काजकरत? माने, हमरा सब वेटिंग़्वर गोडो का वलादिमिर अस्टागूना के सीदे विद्यापती सो कोना जोडी सकैईच्छें. आ, हमरा सबह के निरद्खता वप्रतीक्षा का थीम पर केंद्रित हे बाख चाही. आच्छ, निरद्खता पर. अदाह्रनक लिल अबसर्ट नाटक में मानव जीवनक निरथक्ता और इतिहास में महाकवी विद्यापती के पाग पहिराक हुनक अस्ली लोग परिचानक के मितावक निरथक्ता के एक संगे जोडल जासके तिछेई लेखख एता एक ता रोचक साद्रिष्ष्प्रस्तुत का सकेच्छती उलिक सकेच्छती जाही तरह आपसर्ट नातक पात्र बिना कोना उदेश्षक भात जोहत अच्छट है तहीना इतिहास से हो एक ता कल्पित विद्यापती के गडिक आस्ली लोक परम्पराग भाट जोबा के भिस्री गेल अचे यी बहुथ सशक्त चे वाए, यी हो कहल जासके तचे जे, योरप दूईतिया विष्विद्धाख बाद अपन अस्तितवक विदम बना के आबसर्ड नाटक मे देखलक मुदा मैत्ली साहित्य, अपने तिहास कविदम मना के सद्यों से जीद आवी रहल चे, जदे एक ता लोक कवी के दरबारी बना दिल गले है. बलकोल, एक दम सही पक्डलो. इस शुन्लाक बाद पाटकक के तुरन समझ में आवी जात, जे उ आप सर नाटक की एक पडी रहल जल. आआ, अख्रा एबुजायत जे एकोनो अलक तापू नहीं अचे. बलकी इप उगी अगी अटिहासिक नाटकक दार्षनिक आदार थेक जकर पर्दा फाश लेखक करवाग जारहल चती. एक्दम, एज़़ सपाथक के एक तद सन्तुष्टी भेटत आ अ अ अगामेक हिस्सा लेल तगयार बोजाएत. मुदा भुजलिये ने जकन हम्रा सब अदिहासिक खन्ड में प्रवेश करे ची ता एक ता नव समस्या थाड बोजाएत छे. की समस्या? अटिहासिक विमर्ष्के समय बाशाक श्यली में अचानक उग्रता अव्यंग्यका प्रवेश शोद कर अकाद्दमिक गंभीर्ता के प्रभवित करेत अचे यहे कर दो सर पएइख कमजोरी अचे अदिया आभी का निबंदख तोण पूरा बदली जाई टचे जखन लेखक रामनात जा वा रामव्रिक्ष भेनीपूरी सन पूर्वक्ती विद्वाना क्चन्दन करेच्छती, तो उ बहुत अक्रोषिद बहुजाईच्छती. शत्यद विस्मयादी बोदधचिन माने एक्स्कलमेशन मारक कब भर्मार भूजाईत छे होते. तीख्षन शब्दावली के प्रियोग होगा लागत अचे एक दम मुदा एक तब आद कहो की लेखख का की क्रोद जायस नहीं अचे सदियो सा एक तब महाकविक अस्ली पहचान के मिता दिलगे लेचे जग कोनो शोद करता के इटिहासिक अननयाए बहेते चे तो उकर भाशा मे अक्रोश आबई तश्वाभवी कच्छे आखव, श्वाभवी कच्छे कि हम्रा सब हुंकर भावना के दबाबक प्रयास नहीं करहल ची नहीं, नहीं हम एन इक रहल ची जे लेकख क्रोद जाएज नहीं चा हुंकर भावना पूर्नता सत्या दार्कि कच्छ। मुदा हम बात कर रहल ची प्रभाव क। आच्छा प्रभाव क। आआ, मनो विग्यानक स्थर पर विचार करू जकन आहा कोनो निबंद में क्रोदित होगत ची या व्यंगे कर आई ची तब पाथक कद्यान आहाक कतत्ये से हद्टकर आहाक कबावना पर चली जाई तच्छ. मने उस शोचे लगे तच्छ जे लेक्ख क पुर्वा ग्रहसक ग्रसिच छती बुजलों? एक दम. अख्शेप आ व्यंग्यक श्धान पर अकादमिक तटस्त्ता अप्रमानक प्रयोग के आरो बड़ही बाक अवश्ख्ता आच्छे. अक्रोश अहाक तर्क के कमजोर करईतच, जक्शन की अकादमिक तटस्त्ता अहाक अजे बनादेच. इब भूजवामे ता आभी रहल अची, मुदा जक्ञन आहाके कोनो स्तापित जूथे के तुडवाबा कचे, तकी तनी मनी अक्रामकता आवश्शक नहीं आची. आँ, कोना? मैं, जै हम केवल इगाब, जै इगाबात गलत अच्छ, तो उकर प्रभाव उत्टेक नहीं परत, जित्ते इग कहबामे जै इगता एटिहासेग च्छल अच्छ. मुदद्त्त्या स्वयम सबसे पहज अक्रामक अस्ट्रच्हने जकन आहा कहेख ची, जे ये एक टा च्फलच्छ, ता आहा अपन निशकर्ष पाटक पर थोपी रहल ची. ता एकर बदला मे की करबाक चाही. एकर बदला मे आहा पाटक के उसाख्छ दिखाओ, जाई सपात्ख स्वयं कही उतहे, जे एट चलज अगो अदाहरन कलेल, बेनी पूरी वा रामनात जाग का अलोचना करबाक लेल, विस्मयादी बोदख छिन्ह वा तीछना शब्दावलीक प्रयोग कबदला में, सीदे तोर पर कीर्तिलताक उद्दरन वा जोती रीश्वर कवरन रतनाकर में देल गेल भिदापत नाज का एतियासिक साख्षके उनका लोकनिक कतन संगे समानानतर रुप सराखी का कहन्दन कयल जासके तच्छ मैं आहा कहवा करता हैज् जे हम्रा पुर्वोवर्ती विद्वानक कतन आम्मूल अतिहासिक सक्छके आमने सामने कहडा कदे बाखचाही. भिल्ल्कुल. आहा लिकु, रामनाद जाक एनिशकर्श, जे विद्यापती केवल एक ता दरबारी अ समस्क्रितनिष्ट कवी चलाह, उ जोती रीश्वर्क वरन रतनाकर मे उपलड भिदापत नाज का विवरन सर सीदे तोर पर तकराई तच्छ. आई ता बहुत विस्पष्ट आएज. वरन रतनाकर विस्पष्ट रूप सर एक ता लोक परमपराक उपस्थिती प्रमानेत करे तच्छ. बस यते भे एत्या कोनो विस्मयादी भूदख चिनन नहीं आएज, कोनो गारी नहीं आएज, कोनो व्यंग्य नहीं आएज. मुदा इवाग के देनी पूरी वर रामनात जागतंक के जडे सकाती दैथा चिन. इबात हम भूजी रहल ची आब. जखन हम अक्रोषित भखर लिखाईत ची, तहम सामने वालाके अपन बचाव करबाक मोका देची. एक दम सत्या. मुदा जखन हम केवल जोतरीष्वरक पोठिक पन्ना खोल के सामने राखे देची, तो अकर कोनो काटने चे. इजे कोल्डवात ततस्त्तर्क अची ने इबेशी मारा कची. आँ, इब लेखक के एक तब हावोक व्यक्ती से बड़ल के, एक तगमभीर अकाद्मिक शोद करताक रूप में स्थापित करे तची. जे कर बात के कोनो अकाद्मिक संस्थान खारिज नहें कर सके तची. अद्राद्दार अद्राज्देव मंडलक संदर्भ में देलगल तर्क के मुक्य साहित्तिक विमर्षक संग पुडत्ह एकिक्रित करबाक आवश्व्टा ची. इद्तीसर पैग कमजोरी अची. आई, इई एक ता बहुत महतपोण बिन्दू ची. अम इमान्दारी से कहेथ ची जकन हम निबंद पड़ेद पड़ेद एही हिस्सापर पहुच लगु ता हम्रा लागल जेना मुक्य निबंद कतम बहगे लच अम कोनो परिषिष्ट वाजेक्रा अंगरेजी में अपन्टिक्स कहेथ ची हम्रा से हो यही लागल चल माने विद्यापतिक अटिहासिक विमर्ष इते गमभीर चल जे अकर बाद लोग कवी जाडुदार जे अपन गावक चोबट्या आ आदी दूर पर नव विद्धा गड़े चती हुनक चर्चा एक दम्स अलक थलग लागल हम्रा इप्रष्न परशान करेत रहल, जे विद्यापतिक उही मद्ध्यकालीन विमर्ष्छ में इआदूनिक लोग कवी अचानक सक्ये काभी गेला. यहे तल लेक्खक सबसे पहेख चुनोती अचाभ. जेक्रा पात्ख एक ता द्रेक्त जान्कारी वा परिषिष्ट मानी रहलच उ दरसल एही पूरा शोदख चरमोद कर्ष वा क्लामेक्स फसके चल औह, क्लामेक्स? कोना? आ, लेक्ख एई अस्पष्ट करबाक प्रयास कराल चती जे विद्यापतिक अस्ली परमपरा, दर्बारी पोठी में नहीं बलकी लोक कंथ में जिन्दा है. मुदा ईबात इस पश्ट रूप से च्थापित नहीं भेल. आप, उब लिखल निगल तीक सर. ता एक रा सुरहाया बलाक लेल, ज़ारुदार अ राज्देव मन्दलक स्रिजनक्के वोही समानान्तर परम्पराकक आदूनिक विस्तारक रूप में स्तापित्यल्जाई जकर चर्चा विद्यापती का संदर्भ में भेलगचा तंकी हम्रा एई भुज्वाख चाही जे लेखकक द्रिष्टी में उदाहेनक लेल लेखा की स्पष्ट करएत जैना महाकवी विद्यापती के लोक कंत माने विद्यापतनाच जिया कराखलक, तहीना जारुदार सन लोक कवी के इत्बा दिनदरी अभीजात्ते वर्ग कुपेख्षाग बादो समाजक मेंजाग. अदाहेनक लेल लेखा की स्पस्ट करएत जैना महाकवी विद्यापती के लोकखन्त माने विद्यापतनाच जीया कर अखलक तहीना जाडुदार सन लोकवी के तविद्यापती के लोक कंथ माने विद्यापतनाच जीया कर अक्लक तविना जाडुदार सन लोक कवी के इत्बा दिन दरी अभीजात्यवर्ग कुपेख्षाग बादो समाजक मुल सकती अपने संगे रकने चा. इएक ता बहुत सुन्दर नेरेटिव आक वा कत्धाक्रम बनेतेशा मुदा एकरा शब्द में कोना उतारल जाए जे पात्धक शीथा समझ में आबे मने एकर कोनो थो सुपाए? आप आते लेक्ख जाडू दारक नाम में जी जाडू अची उक्रा टेक्ता रूपक, वा मेटटवर जका प्रयोग कर सकत चे. जाडू के रूपक जका. जाडू दारक्हरा जाडू रूपक के सीदे तोर पर, विद्यापतिक इतिहास पर लागल दूरी के साफ करभाग, प्रतिकात्मक आस्त्रक्रूप में प्रस्तुत कैल जासकतच् अहो, ये तब बहुत गजब बात कहलो है कल्पना करू लेक्ख्चान निबंद क अंत में इग्छेत जे इतिहासक जे पन्ना विद्यापतिक अस्ली लोक स्वरूप पर दूरी दोदे लक उक्रा साव करवाक लिल, आजुक संदरव में राम्दे प्रसाद मन्डलक इज्जाडू एक ता अनीवार्या अजार अच्छी. वाए. इज्जाडू केवल चोगित्या के दूर नहीं बहारे तच्छे. इसाहित्तिकर उही अबसर्ट विदंबना के से हो बहरी का साव कर दे तचे वाख इआकल्पनी रूप से प्रभाव कारी आचे मनेजन निबंद एही तरा समाप्त होगी तचे तपाथक जे वेटिंग फोर गोडो से अपन यात्रा शुरू केने चल अईही ज़ाडू पर आबीकर अपन पुन तापा बी लेत. एक्दम. उक्रा बुजाएत जे इत तीनो कहन्द, अपसर्ड नाटक, विद्या पतिक इतिहास, अज़्ाडू दार, वास्तप में एक ही गब ची. इत इक ता समपूरन आगोल आकार दिए देलकाई सोद के यहे तलक्ष आची हम्रा सवक कोनो गंवेर निबंदध के केवल तत्यका संकलन नही बल की एक ता सुगतित विचार यात्रा हे बाखचा ही भुजलियने एक दम सत्यद जब वाँदा उख्रा प्रस्तुद कर्वाग जे मास्तूशिल पच्यने उईही में किचु काज कर्वाग काब शकताचे. सही कहलू, आई हम्रा सव एहे सामगरीक विस्तित अद्द्यान कहलू, अद्तीन चामुख्य बिन्दू पर विचार कहलू. अज्दियापतिक एतिहास्इक पहीचाना के प्रतिक्षा अनिरद्धाख्तासन मजबुत वैचारिक दधागासन जोडब. अप पहिल बहुत जरुरी एची. दो सर एतिहास्इक खंडना में उग्रता अव्यंग्यक बढ़ला में अविद्यापतिक अटिहासिक पहीचाना के प्रतिक्षा अनिरद्धक्तासन मजबूत वैचारिक दधगासन जोडब. आव, उपहिल बहुत जरूरी आची. तो सर अटिहासिक खंडना मे उग्रता अव्यंगय कबडला मे अकादमिक तट्ध्हस्तता अप्राथमिक साख्ष्य, जेना वरन रतना कर, उक्रा अपनावेसा, शोदख के विष्वसनियता कोना बड़ेट अच्छे, उक्रा भुजभ. इक्दम. लोकक विक्यन परइषिष्ट नहीं, बलकी समानान्तर परम्पराके आदूनिक कडी आनिबंदख के चरमोद करष के रूप में स्तापित करव. हम्रा पुन्विश्वासेच जि जकन एह बदलाव सब के एह निबंद में समाहित कल जातेई, तए नो किवल अकादमिक रूप सा अजीएप हो जातेई, बलकी कोनग भी पाथके बान्द कर रक्वा में पुडता सब्फल हैत. आआ, और हम श्रोता सा आग्रा कराएच्छी, जे एह सुज्याओ सबखक आपन रच्ना में समाहित कै, एक राएव परिष्क्रित कर्थक, अन्व रूप में पुना हम्रा सब के लग पठाव थी, जाही सा एप रम्रा सब आरो आगु विचार कर सक्छी. एक दाम पठाव थी अपुना. आख शोद महत्व पुरनेच, बस अकर शिलप पर एक भिर पुना विचार करू. इत्बेख संग आए के इचर्चा हम्रा सबयते समाप्त करएची

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