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दीना_और_भदरी_की_गाथा.mp4

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Part 6 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 6
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  1. 0:00–0:04देखे निपाल के मितलाक शेटर की मिट्टी से जुडी एक आजी कमाल की लोक कता है,
  2. 0:04–0:07जो आज भी वहाँ में गूँजती है.
  3. 0:07–0:11आज के अज विष्लेषवन में हम उस प्राचीन कता की गेराएँ में उत्रेंगे.
  4. 0:11–0:13ये कहनी है जोगीया नगर गाँएकी
  5. 0:13–0:16और वहांके दो बेहद महां नाएकों की
  6. 0:16–0:18दीना और भादरी
  7. 0:18–0:20ये कोई आम कहनी नहीं है
  8. 0:20–0:22इस में असादारन ताकत है
  9. 0:22–0:23अटूट परिवारिक निष्टा है
  10. 0:23–0:26और देव्टाउ दूरा रचा गया एक आजाजाल है
  11. 0:26–0:29जिसे निकलना लगबभग ना मुमकिन ता.
  12. 0:29–0:32चल ये पहले इस बात पर गवर करते हैं.
  13. 0:32–0:35इस पूरी कथा के बावनात्मक सफर की नीव
  14. 0:35–0:37एक कडी सच्चाई पर टिकी है.
  15. 0:37–0:38कि जगा शकती होती है,
  16. 0:38–0:41वहां उसे तोडने की साजच भी ज़ोर होती है.
  17. 0:41–0:43सही सुना.
  18. 0:43–0:47ये स्वर्फ एक विचार नहीं है, बलकी एक अईसी कडी सच्चाई है,
  19. 0:47–0:51जो इस कहानी के हर एक मोड पर एक दंजाम साफ नजर आती है.
  20. 0:51–0:55एक अईसी ताकत जो किसी को नुक्सान नहीं पहुचान अचाती ती.
  21. 0:55–1:00लेकिन उसकी महांता ही आगे चलकर उसकी सबसे बडी धुश्वन बन गएग.
  22. 1:00–1:05तो बात आसी है कि जोग्यानगर गाँ की साद्गी अपने आपने बहुत कुछ कहती है.
  23. 1:05–1:11और सबसे दिल्च्छ बात यह एकिसी शाही कहन्दान, राजा या रानी की कहानी बilkul नहीं है.
  24. 1:11–1:15ये कहानी है उन सादारन मुस्साहर केतिहार मस्दूरों की
  25. 1:15–1:18जिनके नाम इस मिट्टी में इस कदर रचे बसे है,
  26. 1:18–1:21के आज भी जब कुडाल जमीन पर पर परती हैं तो
  27. 1:21–1:23दीना और भदारी का नाम गुझता है.
  28. 1:23–1:26ये लोग उस दर्टी के सच्च्छे बेटे ते,
  29. 1:26–1:30जिनोंने अपने कुन पसीने से मिट्टी में के नहीं जान्पूंग दी थी.
  30. 1:30–1:34अब पिन दोनो बहायो की पहचान एक दम सरल और सतीक थी.
  31. 1:34–1:39खेर इनके पास कोई बाँंग भालन्स, डूलत या बड़ी जमीन तो थी नहीं.
  32. 1:39–1:41इनकी सबसे बडी पूंजी क्या थी?
  33. 1:41–1:45इंका अपना शरीर और इंके भाजों की उआदबूद ताकत
  34. 1:45–1:49जिसके आगे कडी से कडी जमीन भी मों की तरा पिगल जाती ती.
  35. 1:49–1:54ये सच मे उनकी विष्छद पाअरानिक शकती का एक बहतरीन प्रतीक है,
  36. 1:54–1:58जो बिना किसी गहमन के बस दिन रात अपना कर्म करती ती.
  37. 1:58–2:04ज़रा इस ताकत का अंदाजा लगा ए, इनके शारी रिक शमता इस बाथ से ही समजा जाती है,
  38. 2:04–2:09की दोनो बहायो के पास एक एक कुदाल ती, और पताय उसका वजन कितना था?
  39. 2:09–2:12पूरे पाच मन, यानी लगबभक तोसो किलो.
  40. 2:12–2:18अगर एक आम अँन्सान इस कुदाल को सर्फ उठाने की कोशिष भी करेना, तो शाइत उसका कंदाई तुट जाए.
  41. 2:18–2:25लेकिन दीना और भेदारी के हातो में ये बहारी बरकं कुदाल किसी हलके खिलोने की तर नाचती ती.
  42. 2:25–2:26कमाल है ना?
  43. 2:26–2:31और इस आज सादारन ताकत का असर उनके काम पर कैसा दिकता ता?
  44. 2:31–2:33पूरा एक भीगा जमीन.
  45. 2:33–2:37सूरज निकलने के आगास के सात ही दोनो भाई केप में उतर जाते थे.
  46. 2:37–2:43और जैसे ही सूरज धलता एक ही दिन में वो पूरे एक भीगा केट की जुताए कर देते थे.
  47. 2:43–2:48जोब ही उने केथ में काम करते दिकता, बस हैरत से दान्तो तले उंगली दबालिता था.
  48. 2:48–2:53उनके बाजो में मानो किसी जवान भेल जैसी ठखान रहे ताकत थ फी.
  49. 2:53–2:56तो यहां सब से एहेम और समजने वाली बात यहे है,
  50. 2:56–3:00कि उनकी ये विशाल शकती किसी आहिंकार या गमन्द से नहीं
  51. 3:00–3:02बलकी दर्म से जुडी हूए ती
  52. 3:02–3:08जब उनकी मा निर्सो उनके हातू में पडे चाले देक्कर दूख से पुचती ती
  53. 3:08–3:10कि वो इतनी कडी महनत अकिर किम करते है?
  54. 3:10–3:13तो दीना हसते हुए एक भात कहता था
  55. 3:13–3:19मा, दर्ती भी तो हमारी मा है, उसकी सेवा करते हुए भला कोई कैसे तक सकता है?
  56. 3:19–3:25उनके लिए उनकी ताकत, उनकी रोटी थी, जीवन यापन का जर्या थी, कोई हत्यार नहीं?
  57. 3:25–3:29गर में पैसे बहले ही नहो, पर दर्म कोट-कोट कर बभरा था.
  58. 3:29–3:33चल ये अप देकते हैं कि कहानी में आगे क्या होता है?
  59. 3:33–3:36यहां आता है एक नया और थोड़ा ब्यानक मोड,
  60. 3:36–3:39जब इनका सामना एक बिल्कुली अलक दून्या से होता है.
  61. 3:39–3:41एक तरफ है हमारे दीना और भादरी,
  62. 3:41–3:46सच्चे, दर्मनिष्ट, और दर्ती की पुजा करने वाले सादारन मस्दूर
  63. 3:46–3:49और तीक इसके उलत, तुस्ची तरणफ है, जंजर गाँं के जमींदार,
  64. 3:49–3:54कनच्सिंग और उसकी पतनी भुद्धनी. इनके पास असीम दुलत का आम्बार है.
  65. 3:54–3:57लेकिन उस दोलत से कही बडा उनका आगंकार है
  66. 3:57–4:00और आगंकार से भी बडी है उनकी क्रूर्ता
  67. 4:00–4:04ये लोग दूसरों को अन्सान नहीं बस मवेशी यानी जान्वर समचते हैं
  68. 4:04–4:08जंजर गाँँ दूर से देखने में बहुत भव्यल अकता था
  69. 4:08–4:13पर उस भव्यता के पीछे इनहीं दोनो जमिन्दारों का खोफनाग दबदबा था
  70. 4:13–4:15कनव्सिंग और भुद्नी
  71. 4:15–4:19तोनो ही सच्चाई में, रज़ से जाडदा दूश्ट और लालची ते
  72. 4:19–4:24इनकी तीजोरिया बले ही बर गय हो, पर इनकी भुग कभी शान्त नहीं होती थी
  73. 4:24–4:28उनका शोशन किस हद तक ता? चलिये यसे थोडा बहतर समचते हैं.
  74. 4:28–4:33खेति हर मस्टूरो से पूरा दिन कोलू के बैल की तरा काम करवाया जाता.
  75. 4:33–4:35और मस्टूरी मिलती आदी.
  76. 4:35–4:40अगर किसीने बूल से भी शिकायत की, तो उस पर सीदे कोडे बरसाय जाते.
  77. 4:40–4:46सच कहुतो उस गाँकी फफसल के हर दाने में गरीब मस्धूरों के दुक और आसु मेले होते फे.
  78. 4:46–4:52और जब कनक्सिंके कानो में दीना और भादारी की अतुलनिया शक्ती की खवर पहुची,
  79. 4:52–4:55तो उसके मन में उनकी ताकत के लिये कोई सम्मान नहीं
  80. 4:55–4:58बलके एक शिकारी जैसा लालगच जागॉता.
  81. 4:58–5:02वो हर हाल में उने अपने केट में बेलो की तरा जोतना जाता ता,
  82. 5:02–5:05ता की उसकी फसल और दूलत दूगनी हो जाए.
  83. 5:05–5:09बास यही से रचा गया मुत का वो खदरनाग जाल
  84. 5:09–5:12जब दोनो बायोंने इस जमींदार के यहां
  85. 5:12–5:14गुलामी करने से साफ इंकार कर दिया
  86. 5:14–5:16तो भुदनी आचानक शान्त होगगग.
  87. 5:16–5:19लेकिन दियान रकने बात है,
  88. 5:19–5:20किसी क्रूर व्यक्ती की चुप्प्पी
  89. 5:20–5:23किसी शेर की दहार से ज्यादा बयानक होती है.
  90. 5:24–5:25उसने अन्नजल त्याग दिया
  91. 5:25–5:27और जंगल के देव्टा
  92. 5:27–5:29राजा सलेश के मनदिर में जागार
  93. 5:29–5:30एक कडी तबस्या शुरूकर दी.
  94. 5:31–5:33अब देव्टाओ के कानुन का नीम तो यही है,
  95. 5:33–5:35के वो तबस्वी का एरादा
  96. 5:35–5:38या नियत नहीं देकते, स्र्फ तबस्या की शक्ती देकते हैं.
  97. 5:39–5:42उसी का नतीजा ता कि राजा सलेश को प्रगट होना ही पडा,
  98. 5:42–5:44और एक आज्सा वर्दान देना पडा,
  99. 5:44–5:47जिसने सब कुछ हमेशा के लिए बड़ल कर रक्टिया.
  100. 5:47–5:54ये सच्चाई वाखई बहुत हिदारग है, वर्दान के उस अज़् सहनीः भोज्टले दबकर,
  101. 5:54–5:59सलहेश देव्टा खुद अपने सबसे प्रियबख्तों, दीना और भादारी को,
  102. 5:59–6:03अपने ही हातों मुत के मुमेड दھकेलने पर मजबूर होगगे.
  103. 6:03–6:07उन्होंने सपने के जर ये दोनो भायों को एक शिकार पराने का निमन्त्रन दिया.
  104. 6:07–6:13अप सोच्छे अगर बुलावा सीदे उस देव्टा का आए जो खुद उस जंगल का स्वामी है,
  105. 6:13–6:16तो इन महान नायकों को उस पर जरा भी शक कैसे होता?
  106. 6:16–6:22इक आँसा जाल बिच्छुका जिसकी रस्सी पकरने वाला स्वयम देवता भी उस में पुरी तरा बंदा हूँआ ता.
  107. 6:22–6:28अब यहां इस द्रुश्ठ में थोडा गवर करने वाली बात है कि सफर की मनोदशा कैसे बडलती है.
  108. 6:28–6:33एक तरव तो गाँ की वो परिछित, हिफाज़ात और शान्ती का सोम्यरोब दिकता है.
  109. 6:33–6:38पर, जैसे-जैसे हमारे नायक जंगल के सबसे गेरे हिस्से में आगे बड़ते है,
  110. 6:38–6:42माहाल अचानक से बेहत, खतरनाक और अजन्जान्सा होने लकता है.
  111. 6:42–6:48ये बदलता हूँ माहाल और रंग सीधे तोर पर उस आने वाले क्षत्रे का संकेद दे रहे है,
  112. 6:48–6:51जो जंगल के भीतर उनका बेसबरी से अंतदार कर रहा था.
  113. 6:51–6:56आई ये शिकार की यात्रा को तोडा क्रमबद तरीके से समझते हैं.
  114. 6:56–7:02भूर की पहली किरन के साथ अपनी मा निरसो का आशिर्वाद लेकर दोनो भाई निकल परते हैं.
  115. 7:02–7:07हला की मा का दिल कही ना कही आने वाले कहत्रे से गब्रा रहा था.
  116. 7:07–7:15सुबा होते- होते उनका जिगरी दोस जीतन यादव और भेहद अनुबवी चाचा भहुरान भी उनके साथ जोडजाते हैं.
  117. 7:15–7:21जीतन ने तो बना सोचे तुरन्त अपना धनुश उठालिया था कि भाई जाहा मेरे डोस जैंगे मैं भी वही जाँँगा.
  118. 7:21–7:51तो जो ब बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवा
  119. 7:51–8:00पूरे जंगल में ना किसी हेरन का जुंद ता, ना किसी चोटे से जानवर की आहत, बस उनके सिरों पर काले चम्गादरों का एक जुंद मंडरा रहा था.
  120. 8:00–8:04बलकुल वैसे जैसे रात के तुटेवे खाले तुक्डे हवामे उड़े हो.
  121. 8:04–8:10ये उस ब्यानक शव्यन्त्र की खमोशी ती जो अब अपने शिकार के बिल्ल्कुल करी पहोट चुका था.
  122. 8:10–8:14अब देखिए यहां कत्ठा का एक सबसे बड़ा सवाल पैडा हुता है,
  123. 8:14–8:18जो इस पूरे पोरानिक जाल का केंद्र बिन्दू है.
  124. 8:18–8:21उन महान नायकों को आखिर केसे हराया जासकता है,
  125. 8:21–8:24जिने सदियों की सबसे आज़ा सदारन ताकत मिली हो.
  126. 8:24–8:28जिनके बाजू में वो शकती हो, जो जीते जी पहार भी हिलादे,
  127. 8:28–8:32उने किसी आम शारीरे क्युद्ध में तो हराया एई नी जासकता है.
  128. 8:32–8:34तो फिर रास्ता क्या बचा?
  129. 8:34–8:36और इसका अकेला जवाब था
  130. 8:36–8:38चल, दोखा, फरेएब
  131. 8:38–8:40बुधनी बहुत अच्छी तरा जानती ती
  132. 8:40–8:42कि दीना और भादारी को ताकत के दंपर
  133. 8:42–8:44रहीज नहीं
  134. 8:44–8:46बलकी स्र्फ श्र्फ चल से ही माद दी जासकती है
  135. 8:46–8:48और टीक इसिलिय उसने
  136. 8:48–8:52उसने राजा सालेज से उस वर्दान में एक रूप बदलने वाली बगिन मागी थी
  137. 8:52–8:56एक आईसी शत्रू, जो अपनी अस्ली नियत को पूरी तरसे चूपा सके
  138. 8:57–8:58और एक महान योद्धा की अच्छाई
  139. 8:58–9:01और सहेज्टा का पूरा पूरा फ़दा उठा सके
  140. 9:01–9:09और आखिर कार जब आमना सामना हूँँ तो रूप बडलने वाली वो खोफनाक बागेन किसी खतरनाक जानवर के रूप में आई आई.
  141. 9:09–9:15नहीं वो आई बना किसी दाध या तेज नाहूंके एक चोटी सी मासुम पकता.
  142. 9:15–9:17यानी कबूतर जैसी चडिया के भेस में
  143. 9:17–9:18अप खुछ सुच्छिए
  144. 9:18–9:21एक वीर योद्धा की नजर हमेशा किसी
  145. 9:21–9:23शत्रू किसी कष्टरे को डूनती है ना
  146. 9:23–9:26एक चोटी सी निर्दोष चडिया पर भला वोवार क्यू करेंगे
  147. 9:26–9:29और यही वो सब से बडदेविये चल ता
  148. 9:29–9:34जिसने उनकी महांता और बहादूरी को उनी के खिलाव एक प्राणगातक हत्यार बना दिया.
  149. 9:34–9:38इस गिनोने चल का अंजाम बेहाद बेहाद दुगदाई रहा.
  150. 9:38–9:44तोनो महान नयक उस अंजान जंगल की मिट्टी पर हमेशा के लिए गिर परते हैं.
  151. 9:44–9:47अर उनकी मुद्की कबर देने कोई अन्सान नहीं
  152. 9:47–9:51वलकी उनकी आत्मारूप चाचा बहुरन के पास पहुचती है.
  153. 9:51–9:54दूर एक पेड के नीचे कड़े अंतिजार कर रहें
  154. 9:54–9:57उस अनुभवी योध दा चाचा बहुरन के हाथो से
  155. 9:57–10:01दुख कि मारे उनका प्यारा दनुष चुटकर जमीन पर गिर जाता है.
  156. 10:01–10:05लेकिन वही उनका सबसे वफदार डोस्त जीतन्यादव.
  157. 10:05–10:08वहां आकर ना रोता है ना चीखता है.
  158. 10:08–10:12वो बिनाए एक पल गवाए सच्ची डोस्ती का आक्धरी फर्ज निभाता है
  159. 10:12–10:17अगर तो बज़ाप अपने दोस्तों के शवों को अपने कंदे परुटाख़र वापिस गाँँगी और चल परता है.
  160. 10:18–10:22इस पूरी गाथा का अजाम एक बहेद गेरे विषेः पर सूझने को मजबूर कर देता है.
  161. 10:22–10:26सच्छी निष्था और दर्म की आखर क्या कीमच चुकानी परती है,
  162. 10:26–10:30जब नायकों को उनही देव्टाऊ दवारा रचे गय जाल में फसाद्या जाता है,
  163. 10:30–10:32जिनकी वो दिन राथ पूजा करते हैं.
  164. 10:32–10:35एक अनसान का लालगच और देव्टाऊ की मजबूरी,
  165. 10:35–10:38मजबूरी किस तरहा एक आईसी त्राजदी को जन दे सकती है,
  166. 10:38–10:40जो सद्धिों तक रुलादे.
  167. 10:40–10:42शाएद इस महान कताका,
  168. 10:42–10:44यही सबसे बड़ा और ज्वलन सवाल है.

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देखे निपाल के मितलाक शेटर की मिट्टी से जुडी एक आजी कमाल की लोक कता है, जो आज भी वहाँ में गूँजती है. आज के अज विष्लेषवन में हम उस प्राचीन कता की गेराएँ में उत्रेंगे. ये कहनी है जोगीया नगर गाँएकी और वहांके दो बेहद महां नाएकों की दीना और भादरी ये कोई आम कहनी नहीं है इस में असादारन ताकत है अटूट परिवारिक निष्टा है और देव्टाउ दूरा रचा गया एक आजाजाल है जिसे निकलना लगबभग ना मुमकिन ता. चल ये पहले इस बात पर गवर करते हैं. इस पूरी कथा के बावनात्मक सफर की नीव एक कडी सच्चाई पर टिकी है. कि जगा शकती होती है, वहां उसे तोडने की साजच भी ज़ोर होती है. सही सुना. ये स्वर्फ एक विचार नहीं है, बलकी एक अईसी कडी सच्चाई है, जो इस कहानी के हर एक मोड पर एक दंजाम साफ नजर आती है. एक अईसी ताकत जो किसी को नुक्सान नहीं पहुचान अचाती ती. लेकिन उसकी महांता ही आगे चलकर उसकी सबसे बडी धुश्वन बन गएग. तो बात आसी है कि जोग्यानगर गाँ की साद्गी अपने आपने बहुत कुछ कहती है. और सबसे दिल्च्छ बात यह एकिसी शाही कहन्दान, राजा या रानी की कहानी बilkul नहीं है. ये कहानी है उन सादारन मुस्साहर केतिहार मस्दूरों की जिनके नाम इस मिट्टी में इस कदर रचे बसे है, के आज भी जब कुडाल जमीन पर पर परती हैं तो दीना और भदारी का नाम गुझता है. ये लोग उस दर्टी के सच्च्छे बेटे ते, जिनोंने अपने कुन पसीने से मिट्टी में के नहीं जान्पूंग दी थी. अब पिन दोनो बहायो की पहचान एक दम सरल और सतीक थी. खेर इनके पास कोई बाँंग भालन्स, डूलत या बड़ी जमीन तो थी नहीं. इनकी सबसे बडी पूंजी क्या थी? इंका अपना शरीर और इंके भाजों की उआदबूद ताकत जिसके आगे कडी से कडी जमीन भी मों की तरा पिगल जाती ती. ये सच मे उनकी विष्छद पाअरानिक शकती का एक बहतरीन प्रतीक है, जो बिना किसी गहमन के बस दिन रात अपना कर्म करती ती. ज़रा इस ताकत का अंदाजा लगा ए, इनके शारी रिक शमता इस बाथ से ही समजा जाती है, की दोनो बहायो के पास एक एक कुदाल ती, और पताय उसका वजन कितना था? पूरे पाच मन, यानी लगबभक तोसो किलो. अगर एक आम अँन्सान इस कुदाल को सर्फ उठाने की कोशिष भी करेना, तो शाइत उसका कंदाई तुट जाए. लेकिन दीना और भेदारी के हातो में ये बहारी बरकं कुदाल किसी हलके खिलोने की तर नाचती ती. कमाल है ना? और इस आज सादारन ताकत का असर उनके काम पर कैसा दिकता ता? पूरा एक भीगा जमीन. सूरज निकलने के आगास के सात ही दोनो भाई केप में उतर जाते थे. और जैसे ही सूरज धलता एक ही दिन में वो पूरे एक भीगा केट की जुताए कर देते थे. जोब ही उने केथ में काम करते दिकता, बस हैरत से दान्तो तले उंगली दबालिता था. उनके बाजो में मानो किसी जवान भेल जैसी ठखान रहे ताकत थ फी. तो यहां सब से एहेम और समजने वाली बात यहे है, कि उनकी ये विशाल शकती किसी आहिंकार या गमन्द से नहीं बलकी दर्म से जुडी हूए ती जब उनकी मा निर्सो उनके हातू में पडे चाले देक्कर दूख से पुचती ती कि वो इतनी कडी महनत अकिर किम करते है? तो दीना हसते हुए एक भात कहता था मा, दर्ती भी तो हमारी मा है, उसकी सेवा करते हुए भला कोई कैसे तक सकता है? उनके लिए उनकी ताकत, उनकी रोटी थी, जीवन यापन का जर्या थी, कोई हत्यार नहीं? गर में पैसे बहले ही नहो, पर दर्म कोट-कोट कर बभरा था. चल ये अप देकते हैं कि कहानी में आगे क्या होता है? यहां आता है एक नया और थोड़ा ब्यानक मोड, जब इनका सामना एक बिल्कुली अलक दून्या से होता है. एक तरफ है हमारे दीना और भादरी, सच्चे, दर्मनिष्ट, और दर्ती की पुजा करने वाले सादारन मस्दूर और तीक इसके उलत, तुस्ची तरणफ है, जंजर गाँं के जमींदार, कनच्सिंग और उसकी पतनी भुद्धनी. इनके पास असीम दुलत का आम्बार है. लेकिन उस दोलत से कही बडा उनका आगंकार है और आगंकार से भी बडी है उनकी क्रूर्ता ये लोग दूसरों को अन्सान नहीं बस मवेशी यानी जान्वर समचते हैं जंजर गाँँ दूर से देखने में बहुत भव्यल अकता था पर उस भव्यता के पीछे इनहीं दोनो जमिन्दारों का खोफनाग दबदबा था कनव्सिंग और भुद्नी तोनो ही सच्चाई में, रज़ से जाडदा दूश्ट और लालची ते इनकी तीजोरिया बले ही बर गय हो, पर इनकी भुग कभी शान्त नहीं होती थी उनका शोशन किस हद तक ता? चलिये यसे थोडा बहतर समचते हैं. खेति हर मस्टूरो से पूरा दिन कोलू के बैल की तरा काम करवाया जाता. और मस्टूरी मिलती आदी. अगर किसीने बूल से भी शिकायत की, तो उस पर सीदे कोडे बरसाय जाते. सच कहुतो उस गाँकी फफसल के हर दाने में गरीब मस्धूरों के दुक और आसु मेले होते फे. और जब कनक्सिंके कानो में दीना और भादारी की अतुलनिया शक्ती की खवर पहुची, तो उसके मन में उनकी ताकत के लिये कोई सम्मान नहीं बलके एक शिकारी जैसा लालगच जागॉता. वो हर हाल में उने अपने केट में बेलो की तरा जोतना जाता ता, ता की उसकी फसल और दूलत दूगनी हो जाए. बास यही से रचा गया मुत का वो खदरनाग जाल जब दोनो बायोंने इस जमींदार के यहां गुलामी करने से साफ इंकार कर दिया तो भुदनी आचानक शान्त होगगग. लेकिन दियान रकने बात है, किसी क्रूर व्यक्ती की चुप्प्पी किसी शेर की दहार से ज्यादा बयानक होती है. उसने अन्नजल त्याग दिया और जंगल के देव्टा राजा सलेश के मनदिर में जागार एक कडी तबस्या शुरूकर दी. अब देव्टाओ के कानुन का नीम तो यही है, के वो तबस्वी का एरादा या नियत नहीं देकते, स्र्फ तबस्या की शक्ती देकते हैं. उसी का नतीजा ता कि राजा सलेश को प्रगट होना ही पडा, और एक आज्सा वर्दान देना पडा, जिसने सब कुछ हमेशा के लिए बड़ल कर रक्टिया. ये सच्चाई वाखई बहुत हिदारग है, वर्दान के उस अज़् सहनीः भोज्टले दबकर, सलहेश देव्टा खुद अपने सबसे प्रियबख्तों, दीना और भादारी को, अपने ही हातों मुत के मुमेड दھकेलने पर मजबूर होगगे. उन्होंने सपने के जर ये दोनो भायों को एक शिकार पराने का निमन्त्रन दिया. अप सोच्छे अगर बुलावा सीदे उस देव्टा का आए जो खुद उस जंगल का स्वामी है, तो इन महान नायकों को उस पर जरा भी शक कैसे होता? इक आँसा जाल बिच्छुका जिसकी रस्सी पकरने वाला स्वयम देवता भी उस में पुरी तरा बंदा हूँआ ता. अब यहां इस द्रुश्ठ में थोडा गवर करने वाली बात है कि सफर की मनोदशा कैसे बडलती है. एक तरव तो गाँ की वो परिछित, हिफाज़ात और शान्ती का सोम्यरोब दिकता है. पर, जैसे-जैसे हमारे नायक जंगल के सबसे गेरे हिस्से में आगे बड़ते है, माहाल अचानक से बेहत, खतरनाक और अजन्जान्सा होने लकता है. ये बदलता हूँ माहाल और रंग सीधे तोर पर उस आने वाले क्षत्रे का संकेद दे रहे है, जो जंगल के भीतर उनका बेसबरी से अंतदार कर रहा था. आई ये शिकार की यात्रा को तोडा क्रमबद तरीके से समझते हैं. भूर की पहली किरन के साथ अपनी मा निरसो का आशिर्वाद लेकर दोनो भाई निकल परते हैं. हला की मा का दिल कही ना कही आने वाले कहत्रे से गब्रा रहा था. सुबा होते- होते उनका जिगरी दोस जीतन यादव और भेहद अनुबवी चाचा भहुरान भी उनके साथ जोडजाते हैं. जीतन ने तो बना सोचे तुरन्त अपना धनुश उठालिया था कि भाई जाहा मेरे डोस जैंगे मैं भी वही जाँँगा. तो जो ब बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवाँ बवा पूरे जंगल में ना किसी हेरन का जुंद ता, ना किसी चोटे से जानवर की आहत, बस उनके सिरों पर काले चम्गादरों का एक जुंद मंडरा रहा था. बलकुल वैसे जैसे रात के तुटेवे खाले तुक्डे हवामे उड़े हो. ये उस ब्यानक शव्यन्त्र की खमोशी ती जो अब अपने शिकार के बिल्ल्कुल करी पहोट चुका था. अब देखिए यहां कत्ठा का एक सबसे बड़ा सवाल पैडा हुता है, जो इस पूरे पोरानिक जाल का केंद्र बिन्दू है. उन महान नायकों को आखिर केसे हराया जासकता है, जिने सदियों की सबसे आज़ा सदारन ताकत मिली हो. जिनके बाजू में वो शकती हो, जो जीते जी पहार भी हिलादे, उने किसी आम शारीरे क्युद्ध में तो हराया एई नी जासकता है. तो फिर रास्ता क्या बचा? और इसका अकेला जवाब था चल, दोखा, फरेएब बुधनी बहुत अच्छी तरा जानती ती कि दीना और भादारी को ताकत के दंपर रहीज नहीं बलकी स्र्फ श्र्फ चल से ही माद दी जासकती है और टीक इसिलिय उसने उसने राजा सालेज से उस वर्दान में एक रूप बदलने वाली बगिन मागी थी एक आईसी शत्रू, जो अपनी अस्ली नियत को पूरी तरसे चूपा सके और एक महान योद्धा की अच्छाई और सहेज्टा का पूरा पूरा फ़दा उठा सके और आखिर कार जब आमना सामना हूँँ तो रूप बडलने वाली वो खोफनाक बागेन किसी खतरनाक जानवर के रूप में आई आई. नहीं वो आई बना किसी दाध या तेज नाहूंके एक चोटी सी मासुम पकता. यानी कबूतर जैसी चडिया के भेस में अप खुछ सुच्छिए एक वीर योद्धा की नजर हमेशा किसी शत्रू किसी कष्टरे को डूनती है ना एक चोटी सी निर्दोष चडिया पर भला वोवार क्यू करेंगे और यही वो सब से बडदेविये चल ता जिसने उनकी महांता और बहादूरी को उनी के खिलाव एक प्राणगातक हत्यार बना दिया. इस गिनोने चल का अंजाम बेहाद बेहाद दुगदाई रहा. तोनो महान नयक उस अंजान जंगल की मिट्टी पर हमेशा के लिए गिर परते हैं. अर उनकी मुद्की कबर देने कोई अन्सान नहीं वलकी उनकी आत्मारूप चाचा बहुरन के पास पहुचती है. दूर एक पेड के नीचे कड़े अंतिजार कर रहें उस अनुभवी योध दा चाचा बहुरन के हाथो से दुख कि मारे उनका प्यारा दनुष चुटकर जमीन पर गिर जाता है. लेकिन वही उनका सबसे वफदार डोस्त जीतन्यादव. वहां आकर ना रोता है ना चीखता है. वो बिनाए एक पल गवाए सच्ची डोस्ती का आक्धरी फर्ज निभाता है अगर तो बज़ाप अपने दोस्तों के शवों को अपने कंदे परुटाख़र वापिस गाँँगी और चल परता है. इस पूरी गाथा का अजाम एक बहेद गेरे विषेः पर सूझने को मजबूर कर देता है. सच्छी निष्था और दर्म की आखर क्या कीमच चुकानी परती है, जब नायकों को उनही देव्टाऊ दवारा रचे गय जाल में फसाद्या जाता है, जिनकी वो दिन राथ पूजा करते हैं. एक अनसान का लालगच और देव्टाऊ की मजबूरी, मजबूरी किस तरहा एक आईसी त्राजदी को जन दे सकती है, जो सद्धिों तक रुलादे. शाएद इस महान कताका, यही सबसे बड़ा और ज्वलन सवाल है.

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