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मैथिली_समीक्षाशास्त्र (1).mp4
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- 0:00–0:06नमसकार, आजके इस दिल्चस्प विष्लेशन में, हम सीदे एक आईसे विष्यपर गोता लगाने वाले है,
- 0:06–0:11जो साहित्य को देखने का हमारा नजरिया पुरी तरहा से बड़ल सकता है.
- 0:12–0:16हम बात कर रहे है, गजेंद्र ताकृर की किताब मैठिली समिक्षा शास्त्र की.
- 0:16–0:46अब आप आप सुच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्�
- 0:46–0:49अपने बाज्च्की हमारी इस चर्चा का एक पटापट जाएजा ले ले ले थे हैं.
- 0:49–0:53हम शुर्वात करेंगे मैठिली समिक्षा शास्ट्र के परीचचय से,
- 0:53–0:56उसके बाद हम विहानी कता के सवरूप को समजेंगे,
- 0:56–1:01फिर हमारी बात होगी लगु कता और उसपर होने वाले आदूनेक विमर्ष्पर.
- 1:01–1:05इसके बाद हम पद्द साहिट्ते यानी कवीता के मुल्यांकन की तरव बडेंगे
- 1:05–1:11अर अंद में पाश्चात्ते और भारत्ये सिद्धान्तों का एक जबर्दस तुलनात्मक अद्दिन करींगे.
- 1:11–1:16बाग एक मेठिली समेख्षा शास्ट्र का परिच्चे ये साहित्तियक मुल्यांकन.
- 1:17–1:21अब सोचिये अगर हमे इतने विशाल मेठिली साहित्तिय को मापना हो,
- 1:21–1:25तो कैसे मापेंगे? हमारी ये बोद्धिक यात्रा यहीजेई से शुरो हूतीएः
- 1:25–1:30जहां रच्माउ को उनके बहुत इक आकार, यानी पन्नो की संख्या के अदार पर
- 1:30–1:36हलकुल सपष्ट रूप से बाटागया है. जैसे विहनी कता सुफ एक से चार पन्नो की हूतीः
- 1:36–1:38बग दो विहनी कता रक्स्वरूप सुक्श्म कता की कला
- 1:38–1:40चल ये अप सब से चोटे प्रारूप की बात करे अप
- 1:40–1:42दिए बदा लग्वाग बाद करे अप प्रारूप
- 1:42–1:44प्रारूप बाद करे अप प्रारूप प्रारूप
- 1:44–1:53ये स्र्व पन्नो की गिन्ती नहीं है, बलकी ये एक आलोचव को तुरन्द बता देता है, कि लेक्खक के पास अपनी बात कहने का कैनवस किना बड़ा है.
- 1:53–1:58चाहे वो चंद शब्डो की फ्लाश्विक्षन हो, या फिर कोई महाकाविय जैसा उपन्न्यास.
- 1:58–2:03बाग दो विहनी कता रक्स्वरूप सुख्ष्म कता की कला
- 2:03–2:07चल ये अप सब से चोटे प्रारूप की बात करते हैं
- 2:07–2:10ये जानना सच मुछ हेरान करने वाला है
- 2:10–2:15की एक से चार पन्नो की विहनी कता लिखना कोई बच्छो का खेल नहीं है
- 2:15–2:19ये कोई चुट्कुलाया चलते फिरते सुनाया गया किस्सा नहीं है,
- 2:19–2:23एक सच्ची विहनी कता में, जेम्स जोएस की रचनाउ की तरह,
- 2:23–2:27एक एपिफनी होनी चाहीं, मतलब अचानक से मिलने वाला कोई
- 2:27–2:31एसा गेरा ज्यान या एहसास जो अपको भीतर तक जगजोड दें.
- 2:31–2:34या एह सास जो आपको भीतर तक जगजोड दें.
- 2:34–2:39इसका पाटख के मन पर एक स्थाई मनो विज्यानिक प्रभाव परना बहुत जरूरी है.
- 2:39–2:42अगर बस जल भाजी में कुछ लिख दिया गया है,
- 2:42–2:45जिस में कोई तहेराव या गेराई नहीं है,
- 2:45–2:47तो वो विहनी कता कबही नहीं हो सकती.
- 2:48–2:50और इस मुष्किल कला को जमीन पर उतारने ले
- 2:50–2:52कुछ शहन्दार रचना कार है.
- 2:52–2:54दूर्गानन्द मंडल और आमिक मिष्रा.
- 2:54–2:56इन जैसे जमीनी स्थर के लेखगो ने
- 2:56–2:59इस विदा में सच्छ मुछ महारत हासिल की है.
- 2:59–3:02दूर्गानन जी की किस्ना मुन्षी जैसी रचनाव को ही ले ले लिजे,
- 3:02–3:04उनकी तेट, खाटी शब्डावली है,
- 3:04–3:07वो इस संख्षिब्तता के बारी भर्कम सिद्द्धान्त को,
- 3:07–3:10एक जीती जाएकती साहित टिक वास्टबिक्ता में बड़ देती है.
- 3:10–3:16ये लेखग हमे दिखाते हैं कि कैसे चंद सदेवेशव्दों कवार पूरी कि पूरी किताप पर भारी पर सकता है.
- 3:16–3:22बाग तीन लगु कता आ आदूनेक विमर्ष आदूनेक द्रष्टिकों
- 3:22–3:26आप थोडी लंभी कहानियों यानी लगु कतागों की अर मुडते है.
- 3:26–3:33यहां आलोचक का नजरया थोडा और प्यल जाता है और दून्या बहर की दाशनिक विचार्दाराव का इस्तमाल करता है.
- 3:33–3:38जैसे उत्तर आदूनिक्तावाद, अस्तिटवावाद, माक्स्वाद और नारीवाद.
- 3:38–4:08लेकिन दियान देने वाली बात यह एह कि आलोचक यह बड़े बढ़े पश्छिमी सिद्धानतो को पूरी तरह से तटस्ट होके बसे एक तूल की तरह अप अप अप आप एक देशान दारा का प्रचार करना नहीं बलकी मैठिली लगु कठावा में चुपे आदूनिक समाजि
- 4:08–4:10वाजे शुक्राना के समिक्षा से मिलता है,
- 4:10–4:14हुआ यूं कि कहानी में कहाजी साभ नमास बड़रे होते है,
- 4:14–4:19और तब ही पिंज्रे में बन देक तोता जोर-जोर से सीता राम चिलाने लकता है.
- 4:19–4:21हाजी साभ इतना जल्ला जाते है,
- 4:21–4:24कि पिंज़्े को दिवार पर तब तक पटक तखते हैं,
- 4:24–4:28जब तोता मर नहीं जाता. अब ज़रा सुची ए आलोचकने से क्या समजा?
- 4:28–4:33उनो हो ने बिना गज्राई में जाए इसे समप्रदा एक सोहार्द कप्रतीक मान लिया.
- 4:33–4:40बिल्कुल उल्ता है ना, यह में याद दिलाता है, के आलोच्टो को हमेशा सता से बहुत गेराई में जाकर देखना चाहीए.
- 4:40–4:44बाग चार, पद्ध साहित्यक मुल्लांकन, कविता के आलोच्चना.
- 4:44–4:49अब गद्द्द की दुन्या से निकल कर थोडा पद्द्द यहनी कविता की तरव चलते हैं
- 4:49–4:51यहनिम बलकल बडल जाते हैं
- 4:51–4:55यहां भाशा की बूनावद और अनसान की गेरी भावनाव का सीथा तक्राव होता है
- 4:55–4:58मनोज कुमार मंडल की एक बेहद मारमिक पंकती है
- 4:58–5:00अपन लगावलगाज पजजर ले लक.
- 5:00–5:04मतलव, जो पेड हमने खुद अपने हाथो से लगाया ता,
- 5:04–5:05उसीने पजजर का रूप ले लिया.
- 5:05–5:07ये सरफ एक पंखती नहीं है.
- 5:07–5:09ये मैठिली भाशा की कलात्मकता,
- 5:09–5:11और वहां की मिटी की अस्ली महेख है.
- 5:11–5:15ये साभित करता है कि चाहे हम कितनी भी बडी थ्योरीस की बात कर लें
- 5:15–5:20अस्ली जादू उसी कविता में है, जो सीदे लोक जीवन और मान्विय बहावनाउ से जुडती है.
- 5:20–5:25बाग पाज पाष्चात्या आब भार्तिय सिद्धान्त एक तुलनात्मक अद्ध्यायन
- 5:25–5:28अब इन कवितागो का सही सही मुल्यांकन कैसे हो?
- 5:28–5:31इसके लिए प्राचीन भारतिय संदर्यशास्त्र
- 5:31–5:35और आदूनिक पश्च्वी सिद्धान्तो के भीच एक जबर्दस्त तुल्ना की गए है.
- 5:35–5:38एक तरव ब हमारे पास भरत्मूनी का रस्सिद्धान्त
- 5:38–5:41रस्सिद्धान्त् और भर्ट्रहरी का श्पोट्सिद्धान्त है
- 5:41–5:46रस्सिद्धान्त ये देखता है कविता पडकर आपकी भीटर कुँन्सी बहावनाय उत्फी
- 5:46–5:50आपको क्या रस्मिला? वही श्पोट्सिद्धान्त ये समझता है
- 5:50–6:20अद्याँ बाश्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्�
- 6:20–6:24अप एक ही समेपर तीन बिल्कुल �alak चश्मो से देख सकते हैं
- 6:24–6:28माख्स वाद इस में वर्ग संगर्ष और समाच की खिच्टान देखेगा
- 6:28–6:32संच्रच्नावाद इसके शब्दो की बनाविट और व्याकरन को परखेगा
- 6:32–6:36रस्सिद्दान्त इसके भीतर शुपे सुन्दरे और आनन्द में दूप जाएगा.
- 6:36–6:40ये दिखाता है के एक श्रेष्ट सहिट्ट कितना बहु आयामी हो सकता है.
- 6:41–6:44आप जिस नजरये से देखेंगे वो आपको एक नया ही अर्थ देगा.
- 6:44–6:49अर इसी के साथ हम इस चर्चा के बलकुल अन्त में एक आजे सवाल पर आखर खडे हूते हैं,
- 6:49–6:51जो सुचने पर मजबूर कर देता है.
- 6:51–6:57सवाल ये है कि यादी मैठिली साहित्य, इन आयातित बहरी विचार दारावो के चकर में
- 6:57–6:59अपनी मिट्टी और अपनी ज़़ों से ज़ाव कूडे,
- 6:59–7:01तो क्या ये कविता कभी भी जिन्दा रहे पाएगी?
- 7:01–7:06बहरी सिद्धानत किसी साहित्य को समजने के बहतरीन औजार तो हो सकते हैं.
- 7:06–7:10लिकिन क्यावे बाशा की उस आसली देसी धड़कन को बचाए रक सकते हैं?
- 7:10–7:14ये एक आसा गेहरा सवाल है, जो हम सब को अपने साथ लेकर जाना जाहिए.
- 7:14–7:18इस पूरे विष्लेश्टर में मेरे साथ बने रहने किलि आपका बहुध-बहुध द्श्वाद.
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नमसकार, आजके इस दिल्चस्प विष्लेशन में, हम सीदे एक आईसे विष्यपर गोता लगाने वाले है, जो साहित्य को देखने का हमारा नजरिया पुरी तरहा से बड़ल सकता है. हम बात कर रहे है, गजेंद्र ताकृर की किताब मैठिली समिक्षा शास्त्र की. अब आप आप सुच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्� अपने बाज्च्की हमारी इस चर्चा का एक पटापट जाएजा ले ले ले थे हैं. हम शुर्वात करेंगे मैठिली समिक्षा शास्ट्र के परीचचय से, उसके बाद हम विहानी कता के सवरूप को समजेंगे, फिर हमारी बात होगी लगु कता और उसपर होने वाले आदूनेक विमर्ष्पर. इसके बाद हम पद्द साहिट्ते यानी कवीता के मुल्यांकन की तरव बडेंगे अर अंद में पाश्चात्ते और भारत्ये सिद्धान्तों का एक जबर्दस तुलनात्मक अद्दिन करींगे. बाग एक मेठिली समेख्षा शास्ट्र का परिच्चे ये साहित्तियक मुल्यांकन. अब सोचिये अगर हमे इतने विशाल मेठिली साहित्तिय को मापना हो, तो कैसे मापेंगे? हमारी ये बोद्धिक यात्रा यहीजेई से शुरो हूतीएः जहां रच्माउ को उनके बहुत इक आकार, यानी पन्नो की संख्या के अदार पर हलकुल सपष्ट रूप से बाटागया है. जैसे विहनी कता सुफ एक से चार पन्नो की हूतीः बग दो विहनी कता रक्स्वरूप सुक्श्म कता की कला चल ये अप सब से चोटे प्रारूप की बात करे अप दिए बदा लग्वाग बाद करे अप प्रारूप प्रारूप बाद करे अप प्रारूप प्रारूप ये स्र्व पन्नो की गिन्ती नहीं है, बलकी ये एक आलोचव को तुरन्द बता देता है, कि लेक्खक के पास अपनी बात कहने का कैनवस किना बड़ा है. चाहे वो चंद शब्डो की फ्लाश्विक्षन हो, या फिर कोई महाकाविय जैसा उपन्न्यास. बाग दो विहनी कता रक्स्वरूप सुख्ष्म कता की कला चल ये अप सब से चोटे प्रारूप की बात करते हैं ये जानना सच मुछ हेरान करने वाला है की एक से चार पन्नो की विहनी कता लिखना कोई बच्छो का खेल नहीं है ये कोई चुट्कुलाया चलते फिरते सुनाया गया किस्सा नहीं है, एक सच्ची विहनी कता में, जेम्स जोएस की रचनाउ की तरह, एक एपिफनी होनी चाहीं, मतलब अचानक से मिलने वाला कोई एसा गेरा ज्यान या एहसास जो अपको भीतर तक जगजोड दें. या एह सास जो आपको भीतर तक जगजोड दें. इसका पाटख के मन पर एक स्थाई मनो विज्यानिक प्रभाव परना बहुत जरूरी है. अगर बस जल भाजी में कुछ लिख दिया गया है, जिस में कोई तहेराव या गेराई नहीं है, तो वो विहनी कता कबही नहीं हो सकती. और इस मुष्किल कला को जमीन पर उतारने ले कुछ शहन्दार रचना कार है. दूर्गानन्द मंडल और आमिक मिष्रा. इन जैसे जमीनी स्थर के लेखगो ने इस विदा में सच्छ मुछ महारत हासिल की है. दूर्गानन जी की किस्ना मुन्षी जैसी रचनाव को ही ले ले लिजे, उनकी तेट, खाटी शब्डावली है, वो इस संख्षिब्तता के बारी भर्कम सिद्द्धान्त को, एक जीती जाएकती साहित टिक वास्टबिक्ता में बड़ देती है. ये लेखग हमे दिखाते हैं कि कैसे चंद सदेवेशव्दों कवार पूरी कि पूरी किताप पर भारी पर सकता है. बाग तीन लगु कता आ आदूनेक विमर्ष आदूनेक द्रष्टिकों आप थोडी लंभी कहानियों यानी लगु कतागों की अर मुडते है. यहां आलोचक का नजरया थोडा और प्यल जाता है और दून्या बहर की दाशनिक विचार्दाराव का इस्तमाल करता है. जैसे उत्तर आदूनिक्तावाद, अस्तिटवावाद, माक्स्वाद और नारीवाद. लेकिन दियान देने वाली बात यह एह कि आलोचक यह बड़े बढ़े पश्छिमी सिद्धानतो को पूरी तरह से तटस्ट होके बसे एक तूल की तरह अप अप अप आप एक देशान दारा का प्रचार करना नहीं बलकी मैठिली लगु कठावा में चुपे आदूनिक समाजि वाजे शुक्राना के समिक्षा से मिलता है, हुआ यूं कि कहानी में कहाजी साभ नमास बड़रे होते है, और तब ही पिंज्रे में बन देक तोता जोर-जोर से सीता राम चिलाने लकता है. हाजी साभ इतना जल्ला जाते है, कि पिंज़्े को दिवार पर तब तक पटक तखते हैं, जब तोता मर नहीं जाता. अब ज़रा सुची ए आलोचकने से क्या समजा? उनो हो ने बिना गज्राई में जाए इसे समप्रदा एक सोहार्द कप्रतीक मान लिया. बिल्कुल उल्ता है ना, यह में याद दिलाता है, के आलोच्टो को हमेशा सता से बहुत गेराई में जाकर देखना चाहीए. बाग चार, पद्ध साहित्यक मुल्लांकन, कविता के आलोच्चना. अब गद्द्द की दुन्या से निकल कर थोडा पद्द्द यहनी कविता की तरव चलते हैं यहनिम बलकल बडल जाते हैं यहां भाशा की बूनावद और अनसान की गेरी भावनाव का सीथा तक्राव होता है मनोज कुमार मंडल की एक बेहद मारमिक पंकती है अपन लगावलगाज पजजर ले लक. मतलव, जो पेड हमने खुद अपने हाथो से लगाया ता, उसीने पजजर का रूप ले लिया. ये सरफ एक पंखती नहीं है. ये मैठिली भाशा की कलात्मकता, और वहां की मिटी की अस्ली महेख है. ये साभित करता है कि चाहे हम कितनी भी बडी थ्योरीस की बात कर लें अस्ली जादू उसी कविता में है, जो सीदे लोक जीवन और मान्विय बहावनाउ से जुडती है. बाग पाज पाष्चात्या आब भार्तिय सिद्धान्त एक तुलनात्मक अद्ध्यायन अब इन कवितागो का सही सही मुल्यांकन कैसे हो? इसके लिए प्राचीन भारतिय संदर्यशास्त्र और आदूनिक पश्च्वी सिद्धान्तो के भीच एक जबर्दस्त तुल्ना की गए है. एक तरव ब हमारे पास भरत्मूनी का रस्सिद्धान्त रस्सिद्धान्त् और भर्ट्रहरी का श्पोट्सिद्धान्त है रस्सिद्धान्त ये देखता है कविता पडकर आपकी भीटर कुँन्सी बहावनाय उत्फी आपको क्या रस्मिला? वही श्पोट्सिद्धान्त ये समझता है अद्याँ बाश्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्� अप एक ही समेपर तीन बिल्कुल �alak चश्मो से देख सकते हैं माख्स वाद इस में वर्ग संगर्ष और समाच की खिच्टान देखेगा संच्रच्नावाद इसके शब्दो की बनाविट और व्याकरन को परखेगा रस्सिद्दान्त इसके भीतर शुपे सुन्दरे और आनन्द में दूप जाएगा. ये दिखाता है के एक श्रेष्ट सहिट्ट कितना बहु आयामी हो सकता है. आप जिस नजरये से देखेंगे वो आपको एक नया ही अर्थ देगा. अर इसी के साथ हम इस चर्चा के बलकुल अन्त में एक आजे सवाल पर आखर खडे हूते हैं, जो सुचने पर मजबूर कर देता है. सवाल ये है कि यादी मैठिली साहित्य, इन आयातित बहरी विचार दारावो के चकर में अपनी मिट्टी और अपनी ज़़ों से ज़ाव कूडे, तो क्या ये कविता कभी भी जिन्दा रहे पाएगी? बहरी सिद्धानत किसी साहित्य को समजने के बहतरीन औजार तो हो सकते हैं. लिकिन क्यावे बाशा की उस आसली देसी धड़कन को बचाए रक सकते हैं? ये एक आसा गेहरा सवाल है, जो हम सब को अपने साथ लेकर जाना जाहिए. इस पूरे विष्लेश्टर में मेरे साथ बने रहने किलि आपका बहुध-बहुध द्श्वाद.