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दो_विद्यापति_और_पहचान_की_चोरी.m4a
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- 0:00–0:06अगर किसी रहस्यमएई जासुसी उपन्यास की कलपना की जाए, तो कहानी शाएद कुछ इस तरा शुरू हो सकती है.
- 0:06–0:09मतलब एक बहुत बडा और प्रस्छद अईतिहास्च इक नायक है.
- 0:09–0:12बलकुल, एक यासा इनसान जिसे पुरी दुनिया जानती है.
- 0:12–0:42तो आप दो बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर ब�
- 0:42–1:12तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
- 1:12–1:16उसल जाने किलिये आज हम इन भेहत दिलचस्प दस्टावेजों की गेराई में उतर रहें
- 1:17–1:19आज हमारे पास गजंदर ताकुर दवार रचित
- 1:20–1:22मैठली साहेते और आलोचना पर आदारे तिक
- 1:22–1:25बहुत्ती विस्त्रत रीशच और नोट्स का संकलन है
- 1:25–1:27वुई बहुत यी महत्वबूं स्रोथ है
- 1:27–1:32आज का हमारा मिशन साहिति की दुन्या के कुछ सबसे बड़े रहस्स्सियो
- 1:32–1:34जीवन की आजीबो गरी बिसंगतियो
- 1:34–1:35यानी उसके बेटुके पन
- 1:35–1:39और इतिहास में हुई पहचान की एक बहुत बडी चूरी को जागर करना है
- 1:39–1:40इक दन.
- 1:40–1:43तो तीके, इसे तोडविस्तार से समझते हैं
- 1:43–1:45कुकी ये दस्तावे स्रफ किताबों के बात नहीं करता
- 1:46–1:49ये सीदे तोर पर इस बात से ज़ोगा है के हम दुन्या को कैसे देकते हैं?
- 1:49–1:53अगर हम गजेंदर ताकृर के इस पूरे काम को इक व्यापक नजर्ये से देखें
- 1:53–1:56तो एक बात बहुत साफ उबर कर आती है
- 1:56–1:59साहिते कभी भी सिझ पन्नो पर लिखी गइ सुंदर कहानियो
- 1:59–2:03या कविताएग कषंग्रै बहर नहीं रहा है
- 2:03–2:03बिलकुल नहीं
- 2:03–2:13ये हमेशा से समाचके छिपे हुए सच, सद्ता के तक्राव, और पूरी समाचक विवस्ता की खोकली सच्चाई को बेनाप करने का आईना रहा है.
- 2:13–2:21तो आज हम जिस सफर पर निकल रहे हैं उत्तर आदूनिक नापकों के उस अजीब गरीब और भेपु के संसार से शुरू होगा.
- 2:21–2:28और फिर इतिहास के उस अंदेरे मोड जाएगा जाएगा जाएग पूरी संसक्रती की यादों के सात यक बहुत बडाग खेल खेला गया.
- 2:28–2:30ये सफर बहुती रोमान्चाख होने आगा है.
- 2:30–2:34तो जलिया सब से बहुत बहात करते हैं जीवन की विसंगती
- 2:34–2:35यानी अबसर्टिटी की.
- 2:35–2:37हमारे नोट्स में उत्तर आदूनिक
- 2:37–2:41या कहलें पोस्ट मोडर नाटकों का एक बहुती शान्दार विष्लेशन दिया गया है.
- 2:41–2:44जी इस में कुछ भादी बहतेरीन उदाहरन है.
- 2:44–2:46हा, मुख्योरुप से चार नाटकों का जेकर है.
- 2:46–2:49सम्मौल बेक्कित का मशुर फ्रेंच नाटक,
- 2:49–2:51वेटिंग फ़गोडो जो उनिस्वबावन में आया.
- 2:51–2:54फिर हेरोल्ट पिंटर का अंगरेजी नाटक,
- 2:54–2:57तब बर्ट्टे पाटी जो उन्नीस्वाट्टावन मे आया
- 2:57–3:02उसके बादल सरकार का बांगला नाटक यवम एंद्र जीत उन्नीस्वासट से
- 3:02–3:06और अंत मे उदै नारायं सिंग नची केता का तोजार आप मे आया
- 3:06–3:36अदर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर ब
- 3:36–3:40यह थी ख़े होगर किसी गोडो नाम के वेक्ती का इंतिटार कर रहे हैं
- 3:40–3:42और वो इंतिटार कभी खटमी नहीं होता
- 3:42–3:46वही तो वे क्यो इंतिटार कर रहे हैं, गोडो काँन है
- 3:46–3:49वो आएगा भी अ नहीं ये दर्षोगो को अंत टक नहीं पता चलता
- 3:49–3:54अगर यही इसकी खास्यत है. ये जीवन की उसी निरद्धखता को दर्षाता है,
- 3:54–3:57जहां इनसान बस किसी चमतकार का इंतजार करता है.
- 3:57–4:02जो शायद कभी हो ही ना. ख़ेर, यहां से बाद सच्छ में बहुत दिल्चास पोचाती है.
- 4:02–4:08जब हम उदैन आराईन सिंग नची केता के नो आप रविष्क के प्लोट को देकते हैं
- 4:08–4:11और वो नाटक तो सच में एक अलगी स्तर पर हैं
- 4:11–4:15बलकोल, गुडो का अंतजार फिर भी तोडा दाशनिक लगता है
- 4:15–4:18लेकिन ये मैठली नाटक तो जैसे हास्य विदंबना
- 4:18–4:21अब ना अब बेटु के पण का एक चरम स्तर है.
- 4:21–4:23मलव इसकी सेटिंग ही इतनी कमाल की है.
- 4:23–4:26ये स्वर्ग या नर्ख के दर्वाजे पर सेट है.
- 4:26–4:29जी एक अईसा दर्वाजा जहां जाने का फैस्ला होना है.
- 4:29–4:32और उस दर्वाजे पर एक बड़ा सा बोड लगा है.
- 4:32–4:35अगर बाज़े बाज़े के बाहर जो लाईन लगी है,
- 4:35–4:38उस में कुन-कुन कड़ा है, ये जानना बहुत मजदार है।
- 4:38–4:41वूम्रत लोगों की कतार अपने आप में,
- 4:41–4:45हमारे पूरे समाज का एक सुख्ष्म रूप है,
- 4:45–4:48उस लाईन में समाज का हर तब का मोझुद है।
- 4:48–4:51उस लैंँ में समाज का हर तब का मोझुद है.
- 4:51–4:51सविका?
- 4:51–4:55वहां एक चोर है, एक उचकका है, एक पोकेट मार है.
- 4:55–4:59उनके तीक पीछे एक व्यापारी या बाजारी कडा है.
- 4:59–5:01उसी कतार में एक राजनेता है.
- 5:01–5:05और एक वामपन्ती कारे करता भी अपनी बारी का अंटिटार कर रहे है?
- 5:05–5:11और यहां ये सपष्ट करना जरूरी है के नाटक में राजनेता और वामपन्ती कारे करता
- 5:11–5:14बस अलगलक पात्रो के रूप में कतार में करे हैं,
- 5:14–5:16जो समाज की विविदिता को दिखाते हैं.
- 5:16–5:18सब ही एकी नियाती के सामने कड़े हैं
- 5:18–5:21भिलकोल, म्रित्यों की सी विचार दरम में भेदबाव नहीं करती
- 5:21–5:23और एक म्रित बहिनेत आभी तो है वहां
- 5:24–5:26जो मरने के बाज सब से पहले अपना उपनाम चोडना चाता है
- 5:26–5:30कुकि उसने जीवन बहर अपनी जाती अर पहचान के बोज कोटाया है
- 5:30–5:32यह बहुत ही गेरा प्रतीक है
- 5:32–5:35लेकिन सच कहुत तो जिस पात्रेन मुझे सब से जाडा चूंकाया
- 5:35–5:36वो एक एलएची एजिन्ट है
- 5:36–5:39हा ये हिस सा बहुती हास्यास्पद है
- 5:39–5:43मतलब वो व्यक्ती मराभी नहीं है, वो जीविट है,
- 5:43–5:46लेकिन वो स्वर्ग या नर्ग के उस दर्वाजे पर इसले पहुज गया है,
- 5:46–5:49किवकि वो भीमा बेचने किले नै बाजार की तलाश कर रहा है.
- 5:49–5:54ये सुन्ने में जितना मजदार लकता है, अगर गेराई से सोचें तो उतना ही दरावना भी है.
- 5:54–5:58मैं पुरी तरह सहमत हूँ, इस एलाइसी एजन्ट का वहां होना,
- 5:58–6:01वास्तव में एक बहुत गेरा तन्ज है.
- 6:01–6:08यह दिकाता है कि हमारी जो आदूनिक पूंजीवादी विवस्ता है, जो बाजारवाद है, वो किसी सीमा को नहीं मानता.
- 6:08–6:10उसे बस मुनाफे से मतलब है.
- 6:10–6:13बलकल, उसे जीवन और म्रित्यो से कोई लेना देना नहीं है,
- 6:13–6:15उसे बस आपना ग्राहक चाहीए
- 6:15–6:18चाहे वो नर्क के दर्वाजे पर ही क्यो न मिले
- 6:18–6:21ये आदूनिक मनुष्षकी उस विटम्बना को दर्षाता है
- 6:21–6:24जाए उसकी पूरी पहचान सर्फ एक सेल्स मैन
- 6:24–6:26या एक उपबहोकता बन कर रह गगे है
- 6:26–6:27सही बात है
- 6:27–6:32अद उस लैंके भीतर गटना क्रम चल रहा है, वो तो और भी बेटुका है.
- 6:32–6:37वो पोकेट मार ने के बाद भी आदत से मजबूर हो कर दूसरों की जेभे काट रहा है.
- 6:37–6:38आदते मरती नहीं है ना?
- 6:38–6:42अगर अगर नहीं अप यापक संदरप से जोड़ कर देखे,
- 6:42–6:46तो नाटक में यम्राज और चित्रगुप्त का चित्रन बहुत कुछ कहता है.
- 6:46–7:16वी आवाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बा
- 7:16–7:19बिल्ल्कुल नहीं, इसे दर्षको को पताट चलता है,
- 7:19–7:22कि वो दारी असल में कोई देविय चीज नहीं ती,
- 7:22–7:25बलकी सर्फ एक मेखव था, एक दिखावा था.
- 7:25–7:27तो क्या इसका मतलब यह एक यी सत्ता यह आठटोरीटी,
- 7:27–7:29चाए दून्या में हो यह दून्या के पार,
- 7:29–7:32वो ज़़ तब एक मुख़ा है
- 7:32–7:34एक दम सही समजे आप
- 7:34–7:36और यम राज का हल भी कुछ आज़ा ही है
- 7:36–7:40वे अपनी उस दरावनी भूमिका से पूरी तरह उब चुके है
- 7:40–7:42आप ने पडा था कि वो एक अजीब उलजन में पचजाते हैं
- 7:42–7:43आप
- 7:43–7:49वे एक म्रित महिला पात्र के सात एक अजीब सी रोमान्ते कुल्जन में पहस जाते,
- 7:49–7:51वे उस महिला को एक चाभी देते हैं.
- 7:52–7:54ये चाभी कोई सादारन चाभी नहीं है,
- 7:54–7:56ये मन का ताला कुलने की चाभी है.
- 7:57–7:58लिकिन विटम बना देख है.
- 7:58–7:59क्या होता है?
- 7:59–8:02मनकत आला कुलने के बाद भी सामने जो दर्वाजा है
- 8:02–8:05उस पर अभी भी नो एंट्री ही लिखा है
- 8:05–8:06बाब रहें
- 8:06–8:08ये उपुमा बहुती शान्दार है
- 8:08–8:13तो वह ख्या ये सभी पात्र ब्रम्हांद के एक अज़े वेटिंग रूम में फफसे हैं
- 8:13–8:14यसका कोई निकासी नी है?
- 8:14–8:16बलकोल, अज़ा ही लकता है.
- 8:16–8:18अज़ा है हमारी आदूनिक नाकर शाही
- 8:18–8:21या बिरो क्रेसी के बलकोल समान नी है?
- 8:21–8:24मडलब हम सरकारी दफ्तरो के बहार एक लाईन में ख़े रते हैं
- 8:24–8:27एक काउंटर से तुसरे काउंटर पर भेजे आते हैं
- 8:27–8:29यह भी नहीं तो बवाज़ा कब बज़ागा नहीं।
- 8:29–8:32नाटक में एक जगागा चित्र गुप खुप खुद यह रहे से उजागर करते हैं
- 8:32–8:35कि यह दरवाजा किसी पिषले युग में खुलता था
- 8:35–8:38लिकिन अब यह भी हमेशा के लिए बन्द होँच्टूका है
- 8:38–9:08यह तो बवाजा पर पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवा
- 9:08–9:11नाटको की कालपनिक विसंगतियों को सुनकर तो दिमाग गूम जाता है
- 9:11–9:14अचा लकता ज़से लेखा केरे हूं की यह दूनिया ही बेटु की है
- 9:14–9:16इसलि यह साहित ते भी बेटुका होना चैए यह
- 9:16–9:18नाटको की कालपनिक विसंगतियों को सुनकर तो दिमाग गूम जाता है.
- 9:18–9:48अगर बद्यागा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा
- 9:48–9:52या राजनीती के किसी भी विद्यार्ठी को हिला कर रग देगा.
- 9:52–9:55रीसर्ज ये बहुत फीच्टाने वाले सत्तिएका
- 9:55–9:58तो से तिहासिक तरको के साथ खलासा करता है.
- 9:58–9:59तो वसत्ति क्या है?
- 9:59–10:03वसत्ति ये है की इतिहास में वास्तम में एक नहीं
- 10:03–10:08बलकी दो बिलकोल गलग-गलग विद्ध्यापती थे
- 10:08–10:10तोड़ रुकी है, तो विद्ध्यापती, सच्छ में
- 10:10–10:12ये तो हैरान करने वाला है
- 10:12–10:14जो भी सहिट्ते या इतिहास को थोड़ा वी जानता है
- 10:14–10:17अपने विद्द्यापती का नाम एक महान कवी के रूब में ज़ोर सूना है
- 10:17–10:20ये दो रगलग लोगों का क्या रहे से हैं?
- 10:20–10:21ज़र आई से विस्तार से समझाएए़।
- 10:21–10:22जरूर!
- 10:22–10:25गजेंद्र ताकृर के दस्ताविस के अनुसार
- 10:25–10:28जिस एक चवी को आज दून्या जानती है
- 10:44–10:46ये दरभार में सन्रक्षन प्राप्त कवी ते,
- 10:46–10:49इंके एक बहुत बडी विषेष्टा ये थी,
- 10:49–10:52कि ये संस्क्रित और अवहत बाशा में लिखते ते.
- 10:52–10:57आम आम एक चीज नचणचागूंगा क्योकि ये बाशावाला पहलू,
- 10:57–10:59शाएद बहुत से लोगों के लिए नया हो.
- 11:14–11:16यानी आम लोग इसे नहीं बोलते थे?
- 11:16–11:19जी भलकल नहीं या आम जन्ता की बाशा नहीं ती
- 11:19–11:23ये दर्बारो में पन्दितों और सामन्तों के भीच अस्तमाल होती थी.
- 11:23–11:26तो जो दर्बारी कवी विद्द्या पती तख्कृ थे
- 11:26–11:28उनो नी इसी कुलीन बाशा में
- 11:28–11:32कीर्ती लता, कीर्ती पताका, और पूरुष परिक्षा जैसी रच्नाय लिखीं
- 11:32–11:33हम, समज रहा हूँ
- 11:33–11:39इन किताबो में बहुत फी आभी जात्य, कुलीन, और यहां तक जातिवादी सोच चलकती है
- 11:39–11:43वे अपने आश्वे दाताओ यानी राजाँ का गुणगान करते थे
- 11:43–11:46समच गया यानी वे सत्ता के बहुत करीब ते
- 11:46–11:50लेकिन फिर दुस्रे विद्यापती कों ते
- 11:50–11:52दुस्रे थे मूल महाकवी विद्यापती
- 11:52–11:56दस्ता वेज में ये तारकिक रूप से सिथ द्खिया गया है
- 11:56–12:00की ये दर्बारी कवी विद्यापती से बहुत पहले होए थे
- 12:00–12:05यानी जो तीरीश्वर जिनका समए बारासो पचतर से तेरासो पचास है
- 12:05–12:06उनसे भी पूर्व के थे
- 12:06–12:08औरे वाज यान दे काफी पहले?
- 12:08–12:13रहान, ये समबवता, हजाम या नाई जाती से समबंद रकते थे
- 12:13–12:16जो की समाज का एक बहुत ही निचला
- 12:16–12:19या हाश्ये पर रहने वाला तबका माना जाता ता.
- 12:19–12:20और सबसे बड़ी बात
- 12:20–12:23प्रज़ित या अवहात में नहीं
- 12:23–12:25बलकी सीदे लोगो की बाशा
- 12:25–12:27तेट मेठली में गीट रचे.
- 12:27–12:28या बात है.
- 12:28–12:31इनहोने apne prasiddh rachna padavli ke maadhyum se
- 12:31–12:34आम जन्ता, सर्वाहारा वर्ख की पीडा
- 12:34–12:38और आजीवीका के लिए होने वाले प्रवास के दर्ट को लिखा
- 12:38–12:41इनके गीट सद्यों से आम लोगो के भीच
- 12:41–12:45भिदापत आज के रूप में लोग परमप्रा में गाए जाते रहे हैं
- 12:45–12:50ये तो आज ज़े से आज की किसी बड़े कोरप्रेट पाब्स्टार या दरबारी लेखखने
- 12:50–12:56किसी गुम्नाम लोक कलाकार के पूरे जीवन उसके काम उसकी रचनाँ को चुराएक अपना नाम दे दिया हो.
- 12:56–12:58बलकुल ये एक दन वैसा ही है.
- 12:58–13:01लेकिन समाज के शक्तिषाली वर्ग ने ये किया कैसे?
- 13:02–13:05मिरा मतलब है, अंटरनेट या मास मीट्या से पहले के दोर में
- 13:05–13:08कोई एक पूरी पहचान को कैसे मिता सकता है?
- 13:08–13:12ये इतिहास को अपने पक्ष में मोडने की एक बहुत फीजग जित
- 13:12–13:16अर गेरी प्रक्रिया थी. दर असल कुलीन वर्ग ने जब ये देखा,
- 13:16–13:19कि मूल लोक कवी विद्यापती की पडावली के गीत,
- 13:19–13:23आम जन्ता के भीच अतने ज्यादा लोक प्रियो हो चुके है,
- 13:23–13:27कि उने मिताया नहीं जासकता, तो उनो ले एक दुस्रा रास्ता अपनाया.
- 13:27–13:28कुन सा रास्ता?
- 13:28–13:31उनहों उस काम को मिताने के बजाए,
- 13:31–13:33उस कवी की पहजान को ही हाईजैक कर लिया.
- 13:33–13:36उनहों उस मूल लोक कवी की पहजान पर
- 13:36–13:38एक कुलीन पाग पहनादी.
- 13:38–13:40आम ये पाग क्या है?
- 13:40–13:42पाग एक विषेश प्रकार की पगडी है.
- 13:42–13:48जो उस शमे सामंट्वाद, कुलींता और उच्वर्ग के वर्च्छस्वका प्रतीक मानी जाती ती.
- 13:48–13:53सत्तादारी वर्ग ने उस लोक कवी को एक कुलींडाचे मे फिट कर दिया.
- 13:53–13:54आच्छा और फिर?
- 13:54–13:58प्रचारित कर दिया कि संसक्रित और अवहध्त लिखने वाले
- 13:58–13:59कुलीं दर्बारी विद्ध्यापती
- 13:59–14:01और मेठीली में पदावली रचने वाले
- 14:01–14:05लोक कवी विद्ध्यापती दोनो एक ही अन्सान है
- 14:05–14:06बापरे!
- 14:06–14:09यानि उनो लोग गलग लोगो के जीवन को मिलागग
- 14:09–14:12इतिहास की किताबो किलिए एक ही वेक्ती कष्ड़ा कर दिया
- 14:12–14:15ये तो किसी की पुरी विरासत को निगल जाने जैसा है
- 14:15–14:16तीख आजा ही हूँँँँँ
- 14:16–14:20और इस जुट को सद्यों तक सच बनाए रखने किलिए
- 14:20–14:23सर्फ इतिहास से चेडचार काफी नहीं फीग
- 14:23–14:26दर्म और मिठ्खों का सहारा भी लिया गया.
- 14:26–14:30इस कुलीनता को और पवित्र और देविये साभित करने के लिए
- 14:30–14:32एक बहुत बडा मिठ्खग गरा गया.
- 14:32–14:35आपने शाएद वो उगना वाली लोग कता सूनी होगी?
- 14:35–14:37हा, हा. वो काहनी तो कापी मशूर है.
- 14:37–14:42जिस में का जाता है कि बवागवान शिव, स्वायम विद्यापती की बवकती से प्रसन होगर,
- 14:42–14:46उनके यहां उगना नामक नावकर का रूब दारन कर के काम करने आते हैं.
- 14:46–14:52जी भिलकुल. लेकिन दस्तावेज ये स्पष्ट करता है कि ये कता बहुत बाद में जोडी गए.
- 14:52–14:53ये कोई सैयोग नहीं था
- 14:54–14:58ये कता इसली ए गड़ी ग़ी ताकी उस दरबारी विद्ध्यापती को एक देविय,
- 14:59–15:01पवित्रा और चमतकारी स्वरुप दिया जा सके.
- 15:01–15:02वं...
- 15:03–15:04सब कुछ एक साजिश का हिस्था का.
- 15:04–15:04आप.
- 15:04–15:23जब कि अपने आपनी महन्ता सावित करने के लिए किसी देवियए चमतकार की जरूरत नहीं तुई कि उनका चमतकार उनकी कविता की उसच्च्चाई में ता जो सीदे लोगों के दिलो में उतरती थी.
- 15:23–15:26लेकिन यहां एक तारकिक सवाल उगता है.
- 15:26–15:30अगर कोई वेक्ती इन दोनों के रषनावों को गेराइ से पड़े,
- 15:30–15:33तो क्या बाशा और भावनावों का अंतर ये नी बतादेता,
- 15:33–15:35कि ये दो बिलकुल अलगले लोगो के विचार है?
- 15:35–15:38मलगद क्या साहित्ते क्या आलोचकों को ये कभी नजर निया है?
- 15:38–15:45ये बहुत ही सतीक बिन्दू उठाया आपने और इसका विष्लेशन स्रोद दस्टावेज में बहुत गेराई से किया गया है.
- 15:45–15:49दस्टावेज भिदेस्या या प्रवास गीप का बहुत ही मार्में कुदारन देता है.
- 15:49–15:50आचा?
- 15:50–15:53मूल विद्या पती के गीतो में रोजी रोटी के लिए,
- 15:53–15:56पेट पालने के लिए पर्देज जाने की जो पीडा है,
- 15:56–16:00एक पती के दूर जाने पर पतनी का जो दर्द और असुरक्षा की बहावना है,
- 16:00–16:03वो बहुत ही गेरी और विषुद्द मानवीय है.
- 16:03–16:09आ, जेसे रेशवच में उस कविता का जिक्र है, जहाँ एक यूवा महला केरे एक,
- 16:09–16:15के उसकपती परदेस चला गया है. राद बहुत अंदेरी है और गाँ में चोरों का दर है.
- 16:15–16:17वो किसी राहगीर से केरे एक, वो वहां नारुके.
- 16:17–16:24बलकुल वे पंक्तिया है, हम जूभती पती गलाह विदेस राती अंदार गामबच्छोर.
- 16:24–16:29इन चोती सी पंक्तियो में पूरे सरवाहारा वर्ग का दर्द छिपा है.
- 16:29–16:37ये उस आम आदमी का सच है, जिसका पती बारा बारा वर्षों के लिए आजीविका की तलाश में गर चोडक चला गया है.
- 16:37–16:41और पीछे चोडगाई महिला असुरक्षा और अकेले पन से जुज रही है.
- 16:41–16:46यह कोई दर्बार में बैटकर कलपना कर के लिखिगगे गे कविता नहीं है
- 16:46–16:46एक दम सहीं
- 16:46–16:51और इसके विप्रीद दर्बारी कवी विद्ध्यापती के रच्चान है कैसी है
- 16:51–16:54दुस्री और जो दर्बारी कवी विद्ध्यापती तख्कृर है
- 16:54–16:57उनकी संसक्रित या अवहत रच्नाँ में
- 16:57–17:00आम आदमी के इस प्रवास की कोई पीडा नहीं है
- 17:00–17:02पेट की बूक का कोई जिक्र नहीं है
- 17:02–17:03या अवहत रच्नाँ में आप आप आप आप प्रवास की कोई पीडा नहीं है
- 17:03–17:09या अवहत रच्नाँ में यहां तक लिकते है
- 17:09–17:13के आखुलीन विक्ती दया का अदिकारी नहीं है
- 17:13–17:19उनके अनुसार सुंदर्ता और योगिता सर्फ आमीर और विषिष्ट वर्ग की बपोती है
- 17:19–17:21ये तो बहुती कछ्फोर विचार है
- 17:21–17:22बिल्कुल
- 17:22–17:25अप कोई भी तारके किनसान ये सोट सकता है
- 17:25–17:29कि जो व्यक्ती एक जगा आमाद्मी के दर्द पर रोरा है,
- 17:29–17:33वो दुस्री जगा उसी आमाद्मी को द्या के लाइक बी नहीं समझ्झ्झा,
- 17:33–17:34ये कैसे समबहवै?
- 17:34–17:38इन दोनो की सोच में जीवन को देखने के नजरीय में
- 17:38–17:40जमीन आस्मान का अंतर है,
- 17:40–17:43जो साफ बताता है कि ये दो गलग लोग है
- 17:43–17:44वाखई
- 17:44–17:48इस सरे अटियासिक विष्लेशन को समजने के बाद दिमाग में बड़ा सवाल आता है
- 17:48–17:50तो इस सब का असल में क्या मतलव है
- 17:50–17:54जब विद्यापती जैसे महान लोग कवी की पहचान को
- 17:54–17:56आम जनता की उस आवाज को
- 17:56–17:59कुलीन वर्ग दूरा इस तरा सफाइइ से चुरालिया गया
- 17:59–18:01और उसे दर्बारी रंग देदिया गया
- 18:02–18:04मेरे मतलब है देदिया गया
- 18:04–18:09तो फिर उस सर्व हारा वर्ग और आम जन्ता की अस्ली, तीखी और विद्रोही आवाज
- 18:09–18:11मैतली साइथ ते में वापस कैसे आई?
- 18:11–18:17ये इतिहास का एक नियम है, किसी भी आवास को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता.
- 18:17–18:21जब भी कोई व्यवस्ता बहुत जाडा हावी हो जाती है,
- 18:21–18:25या सच्चाई पर जुट का परदा बहुत बारी हो जाता है,
- 18:25–18:29तो उसी समाच के भीतर से कोई एसा स्वर फुटता है,
- 18:29–18:32जूस्सारी गंद्गी को साव करने की ताकत रकता है
- 18:32–18:34और यही से प्रवेश होता है
- 18:34–18:36राम देवप्रसाद मंडल का
- 18:36–18:38जेने साहित्तिक की दुन्या में
- 18:38–18:40जहाडुदार के नाम से जाना जाता है
- 18:40–18:41जहाडुदार
- 18:41–18:44ये उपनाम ही अपने आप में कितना शान्दार
- 18:44–18:45अनोखा और अक्रामग है,
- 18:45–18:48नोट्स के नुसार इने मैठली का पहला जन कवी,
- 18:48–18:51यानी सीदे तोर पर जन्ता का कवी माना जाता है,
- 18:51–18:54और इनोने पारमपर एक मीटी और कोमल कविताये लिखने के बजाए,
- 18:54–18:58ज़ादु नाम की एक बलकु नहीं साहित्तिक विदा काविषकार ही कर डाला
- 18:58–19:01और यहां सब से दिलचस्प बात यह है
- 19:01–19:05कि उनोने अपनी इस विदा का नाम जादु ही क्यो रख्खा
- 19:05–19:09दस्तावेज में इस रूपक को बहुत कुबसुर्ती से समजगया गया है
- 19:09–19:14बात ये है कि आप एक बहुत गंदे कीचर से बफरे आंगन को
- 19:14–19:17किसी गुलाप के फुल से या रेश्मि कपड़ से साफ नहीं कर सकते.
- 19:17–19:20बलकुलने, उसके लिए कुछ कठोर चाहीग.
- 19:20–19:23एक दम अगर गंदगी है, अगर समाज में सदन है,
- 19:23–19:30तो उसे साव करने किलिए एक कदोर, चुबने वाली और खुडरी जाडू की ही जरूरत होती है.
- 19:30–19:38जाडूदार ने समाज की बुरायों, अंद विष्वासों, खोखले आदरशों, और पैसे के लालगच को बुहार ने,
- 19:38–19:41पूरी तरे से साथ करने किलिए,
- 19:41–19:43इस तीकी शेली को हत्यार बनाया.
- 19:43–19:46ये तो बहुती विद्रोही और क्रान्तिकारी सोच है.
- 19:46–19:49दस्तावेज में उनकी एक कविता की पंक्ती का
- 19:49–19:51बहुत जोर देकर उलेख की आगया है.
- 19:51–19:53हम्रा बिनुज जगत सूना चै.
- 19:53–19:58जिसका मदलब है कि मेरे बिना ये पुरा संसार सूना या शून्या है
- 19:58–20:00ये आत्मविष्वास तो गजब का है
- 20:00–20:01बहुत गजब का है
- 20:01–20:07क्या ये उस कुलीन पाक संसक्रिति का पुरी तरसे बहिशकारिया रीजक्षन नहीं है जिसके बारे में हम ने अभी बात की
- 20:07–20:09जिसने हमेशा महनत कष्लोगों को हाशीए पे रखा.
- 20:09–20:14भिलकुल, ये उसी दमनकारी विवस्था के मुपर सीदा जवाब है.
- 20:14–20:19ये उस सर्वाहारा मस्दूर औरश्रम जीवी वरग का वो जगावा अत्म विष्वास है.
- 20:19–20:28ज़व ये समच चुका है के मेरे पसीने और मेरी महनत के बिना ये पूरी दुन्या ये सारी अथध विवस्ता और ये सारे दरबार शुन्य है.
- 20:28–20:32ज़ारुदार की कमका है, ये बिलकुल सबष्ट कर देती है,
- 20:32–20:39कि अब समाज को आस्मान से किसी भग्वान राम के चमतकारी तीरों की चलने का,
- 20:39–20:43या किसी इश्वर ये अवतार के आकर नियाय करने का अंतजार नहीं है.
- 20:43–20:46यह नहीं वे कह रहें है, कि उदार किलिए,
- 20:46–20:50उगना जैसे चमतकार या किसी भीतर के अंद विष्वास की अप कोई जगा नहीं हैं
- 20:50–20:52एक दम सही उनका सबष्ट मानना था
- 20:52–20:57कि समाज की समस्याओ का समादान किसी सवर्ग से नहीं आएगा
- 20:57–21:02बलकी खुद आम लोगों को अपनी कथोर सच्चाईयों का सामना कर के निकालना होगा
- 21:02–21:03सईबाद है
- 21:03–21:07उनहोंने देखा कि लोग पैसे के लालच में रोगी बन गय है
- 21:07–21:10कौरीतियों और अंद विश्वासों के जोगी बन गय है
- 21:10–21:15इस समाजिग भीमारी का ईलाज कोई मनत्र या चमतकार नहीं हो सकता
- 21:15–21:20बलकी यतार्त की वो जाडू हो सकती है जो सारी दूल को उडादे
- 21:20–21:25इनोने अपनी कविता को वातानुकुलित कम्रों या दरबारों से निकाल कर
- 21:25–21:29खेतों की मेडों और गाँउके चोराहों पर ख़ागगर दिया.
- 21:29–21:32जहां वो सीदे आम जन्मानस के पसीने से जुडती थी.
- 21:32–21:34या अधबुत सफर रहा है ये,
- 21:34–21:39अगर आजके इस पूरी चरचा के दागों को एक साथ पिरोया जाए,
- 21:39–21:44तो हमने श्वर्वाद की थी उत्तर अदूनिक नाटकों के उस भेतुके वेटिंग रूम से,
- 21:44–21:49जहां अन्सान बिना किसी वजा के बसे एक बंद दर्वाजे के सामने कभडा है.
- 21:49–21:52जी, वहां से हम इतिहास के अस्ली पन्नो में उत्रे,
- 21:52–22:01ज़ाहा नहीं देखाए के कैसे विवस्ठाने विद्द्यापती जैसे महान लोग कवी की इतिहासिक पहचान को चुराख़र एक दरबारी साचे में फिट कर दिया.
- 22:01–22:03सर्फ अपनी सत्ता कायम रकने के लिए.
- 22:03–22:08अर अंद में हमने जाडू दार की उस विद्डरो ही जाडू कविता को देखा,
- 22:08–22:13जिसने उस सारी एतिहासेक और समाजिक गंद्गी को साथ करने का बीडा उटाया.
- 22:13–22:17और ये पूरी यात्रा हमें ये सुचने पर मजबोर करती है,
- 22:17–22:19कि साहित ये वास्तव में क्या है?
- 22:19–22:23ये केबल आल्मारियो मेरे किताबो के पन्नो तक्सीमित नहीं ये
- 22:23–22:27ये समाज पर नियंट्रन करने, इतिहास को अपने फ़दे के
- 22:27–22:31हिसाप से मोडने और फिर उसी नियंट्रन से आजादी पाने की
- 22:31–22:35लडाई का एक बहुत यीवन्त मैधान है. बिलकल ये जानकार्या तभी
- 22:35–22:41बबज़न भी मुल्लिवान है, जब हम इने समजें, और इस आलोचनात्मक नजर्ये को अपने जीवन में लागु करे.
- 22:42–22:46इस से एक बगड़ बडी सीख ये भी मिलती है, कि हम जो इतिहास पडते है,
- 22:46–22:49उकसर उनही लोगं दवारा तगयार किया जाता है,
- 22:49–22:50जो सथ्ता में बैटे होते हैं.
- 22:51–22:56इसलिये हमें हमें अज़्ा अदिकार एक इतिहास पर सवाल उठाने की आदर डालनी चाही है.
- 22:56–22:59और सच कहुथो यही आलोच नात्मक सोच,
- 22:59–23:02आज की दुन्या में हमारा सब से बड़ा हद्यार है
- 23:02–23:04जब तक हम प्रश्न नहीं करेंगे
- 23:04–23:07हम उसी नो आन्ट्री वाले दर्वाजे के सामने कष्डी
- 23:07–23:09उस भेतु की भीड़ का ही हिस्वा बने रहेंगे
- 23:10–23:10बिलकु से ही
- 23:10–23:14अब इस पूरी चर्चा से एक अजा विचार निकल कर आता है,
- 23:14–23:16जो किसी को भी गेराई से सोचने पर मजबोर कर दे.
- 23:16–23:21चर्चा की शुर्वात में हम ने एक जासुसी कहानी के प्लोट का जिकर किया था,
- 23:21–23:24ज़हां 2 गलग गलोगों को मिलाखर एक बना दिया गया ता
- 23:24–23:25जी बिलकुल
- 23:25–23:28तो अगर इस बात पे गवर किया जाए
- 23:28–23:30कि अगर एक पूरी संसक्रिती
- 23:30–23:33तो भिलकुल गलग गलग
- 23:33–23:36अप्यासेग रस्तियों को मिलाखर सदियों के लिए एक बना सकती है
- 23:36–23:39केवल उनकी सांस्क्रितिक सम्रती के पहनावे को बडलकर,
- 23:39–23:44तो सोची ए, हमारे इतियास की किताबो में दरज एसे और कितने महान नायक
- 23:44–23:48या कलाकार हुंगे, जो असल में किसी एक इनसान के नहीं
- 23:48–23:51बलकी कई अलग-ालग लोगों के चुराय हुए चेहरों से मिलकर बने है.
- 24:06–24:08अप्से जोरी बात, सवाल उठाते रही है.
Plain text
अगर किसी रहस्यमएई जासुसी उपन्यास की कलपना की जाए, तो कहानी शाएद कुछ इस तरा शुरू हो सकती है. मतलब एक बहुत बडा और प्रस्छद अईतिहास्च इक नायक है. बलकुल, एक यासा इनसान जिसे पुरी दुनिया जानती है. तो आप दो बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर ब� तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � उसल जाने किलिये आज हम इन भेहत दिलचस्प दस्टावेजों की गेराई में उतर रहें आज हमारे पास गजंदर ताकुर दवार रचित मैठली साहेते और आलोचना पर आदारे तिक बहुत्ती विस्त्रत रीशच और नोट्स का संकलन है वुई बहुत यी महत्वबूं स्रोथ है आज का हमारा मिशन साहिति की दुन्या के कुछ सबसे बड़े रहस्स्सियो जीवन की आजीबो गरी बिसंगतियो यानी उसके बेटुके पन और इतिहास में हुई पहचान की एक बहुत बडी चूरी को जागर करना है इक दन. तो तीके, इसे तोडविस्तार से समझते हैं कुकी ये दस्तावे स्रफ किताबों के बात नहीं करता ये सीदे तोर पर इस बात से ज़ोगा है के हम दुन्या को कैसे देकते हैं? अगर हम गजेंदर ताकृर के इस पूरे काम को इक व्यापक नजर्ये से देखें तो एक बात बहुत साफ उबर कर आती है साहिते कभी भी सिझ पन्नो पर लिखी गइ सुंदर कहानियो या कविताएग कषंग्रै बहर नहीं रहा है बिलकुल नहीं ये हमेशा से समाचके छिपे हुए सच, सद्ता के तक्राव, और पूरी समाचक विवस्ता की खोकली सच्चाई को बेनाप करने का आईना रहा है. तो आज हम जिस सफर पर निकल रहे हैं उत्तर आदूनिक नापकों के उस अजीब गरीब और भेपु के संसार से शुरू होगा. और फिर इतिहास के उस अंदेरे मोड जाएगा जाएगा जाएग पूरी संसक्रती की यादों के सात यक बहुत बडाग खेल खेला गया. ये सफर बहुती रोमान्चाख होने आगा है. तो जलिया सब से बहुत बहात करते हैं जीवन की विसंगती यानी अबसर्टिटी की. हमारे नोट्स में उत्तर आदूनिक या कहलें पोस्ट मोडर नाटकों का एक बहुती शान्दार विष्लेशन दिया गया है. जी इस में कुछ भादी बहतेरीन उदाहरन है. हा, मुख्योरुप से चार नाटकों का जेकर है. सम्मौल बेक्कित का मशुर फ्रेंच नाटक, वेटिंग फ़गोडो जो उनिस्वबावन में आया. फिर हेरोल्ट पिंटर का अंगरेजी नाटक, तब बर्ट्टे पाटी जो उन्नीस्वाट्टावन मे आया उसके बादल सरकार का बांगला नाटक यवम एंद्र जीत उन्नीस्वासट से और अंत मे उदै नारायं सिंग नची केता का तोजार आप मे आया अदर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर बाद्टर ब यह थी ख़े होगर किसी गोडो नाम के वेक्ती का इंतिटार कर रहे हैं और वो इंतिटार कभी खटमी नहीं होता वही तो वे क्यो इंतिटार कर रहे हैं, गोडो काँन है वो आएगा भी अ नहीं ये दर्षोगो को अंत टक नहीं पता चलता अगर यही इसकी खास्यत है. ये जीवन की उसी निरद्धखता को दर्षाता है, जहां इनसान बस किसी चमतकार का इंतजार करता है. जो शायद कभी हो ही ना. ख़ेर, यहां से बाद सच्छ में बहुत दिल्चास पोचाती है. जब हम उदैन आराईन सिंग नची केता के नो आप रविष्क के प्लोट को देकते हैं और वो नाटक तो सच में एक अलगी स्तर पर हैं बलकोल, गुडो का अंतजार फिर भी तोडा दाशनिक लगता है लेकिन ये मैठली नाटक तो जैसे हास्य विदंबना अब ना अब बेटु के पण का एक चरम स्तर है. मलव इसकी सेटिंग ही इतनी कमाल की है. ये स्वर्ग या नर्ख के दर्वाजे पर सेट है. जी एक अईसा दर्वाजा जहां जाने का फैस्ला होना है. और उस दर्वाजे पर एक बड़ा सा बोड लगा है. अगर बाज़े बाज़े के बाहर जो लाईन लगी है, उस में कुन-कुन कड़ा है, ये जानना बहुत मजदार है। वूम्रत लोगों की कतार अपने आप में, हमारे पूरे समाज का एक सुख्ष्म रूप है, उस लाईन में समाज का हर तब का मोझुद है। उस लैंँ में समाज का हर तब का मोझुद है. सविका? वहां एक चोर है, एक उचकका है, एक पोकेट मार है. उनके तीक पीछे एक व्यापारी या बाजारी कडा है. उसी कतार में एक राजनेता है. और एक वामपन्ती कारे करता भी अपनी बारी का अंटिटार कर रहे है? और यहां ये सपष्ट करना जरूरी है के नाटक में राजनेता और वामपन्ती कारे करता बस अलगलक पात्रो के रूप में कतार में करे हैं, जो समाज की विविदिता को दिखाते हैं. सब ही एकी नियाती के सामने कड़े हैं भिलकोल, म्रित्यों की सी विचार दरम में भेदबाव नहीं करती और एक म्रित बहिनेत आभी तो है वहां जो मरने के बाज सब से पहले अपना उपनाम चोडना चाता है कुकि उसने जीवन बहर अपनी जाती अर पहचान के बोज कोटाया है यह बहुत ही गेरा प्रतीक है लेकिन सच कहुत तो जिस पात्रेन मुझे सब से जाडा चूंकाया वो एक एलएची एजिन्ट है हा ये हिस सा बहुती हास्यास्पद है मतलब वो व्यक्ती मराभी नहीं है, वो जीविट है, लेकिन वो स्वर्ग या नर्ग के उस दर्वाजे पर इसले पहुज गया है, किवकि वो भीमा बेचने किले नै बाजार की तलाश कर रहा है. ये सुन्ने में जितना मजदार लकता है, अगर गेराई से सोचें तो उतना ही दरावना भी है. मैं पुरी तरह सहमत हूँ, इस एलाइसी एजन्ट का वहां होना, वास्तव में एक बहुत गेरा तन्ज है. यह दिकाता है कि हमारी जो आदूनिक पूंजीवादी विवस्ता है, जो बाजारवाद है, वो किसी सीमा को नहीं मानता. उसे बस मुनाफे से मतलब है. बलकल, उसे जीवन और म्रित्यो से कोई लेना देना नहीं है, उसे बस आपना ग्राहक चाहीए चाहे वो नर्क के दर्वाजे पर ही क्यो न मिले ये आदूनिक मनुष्षकी उस विटम्बना को दर्षाता है जाए उसकी पूरी पहचान सर्फ एक सेल्स मैन या एक उपबहोकता बन कर रह गगे है सही बात है अद उस लैंके भीतर गटना क्रम चल रहा है, वो तो और भी बेटुका है. वो पोकेट मार ने के बाद भी आदत से मजबूर हो कर दूसरों की जेभे काट रहा है. आदते मरती नहीं है ना? अगर अगर नहीं अप यापक संदरप से जोड़ कर देखे, तो नाटक में यम्राज और चित्रगुप्त का चित्रन बहुत कुछ कहता है. वी आवाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बाँ बा बिल्ल्कुल नहीं, इसे दर्षको को पताट चलता है, कि वो दारी असल में कोई देविय चीज नहीं ती, बलकी सर्फ एक मेखव था, एक दिखावा था. तो क्या इसका मतलब यह एक यी सत्ता यह आठटोरीटी, चाए दून्या में हो यह दून्या के पार, वो ज़़ तब एक मुख़ा है एक दम सही समजे आप और यम राज का हल भी कुछ आज़ा ही है वे अपनी उस दरावनी भूमिका से पूरी तरह उब चुके है आप ने पडा था कि वो एक अजीब उलजन में पचजाते हैं आप वे एक म्रित महिला पात्र के सात एक अजीब सी रोमान्ते कुल्जन में पहस जाते, वे उस महिला को एक चाभी देते हैं. ये चाभी कोई सादारन चाभी नहीं है, ये मन का ताला कुलने की चाभी है. लिकिन विटम बना देख है. क्या होता है? मनकत आला कुलने के बाद भी सामने जो दर्वाजा है उस पर अभी भी नो एंट्री ही लिखा है बाब रहें ये उपुमा बहुती शान्दार है तो वह ख्या ये सभी पात्र ब्रम्हांद के एक अज़े वेटिंग रूम में फफसे हैं यसका कोई निकासी नी है? बलकोल, अज़ा ही लकता है. अज़ा है हमारी आदूनिक नाकर शाही या बिरो क्रेसी के बलकोल समान नी है? मडलब हम सरकारी दफ्तरो के बहार एक लाईन में ख़े रते हैं एक काउंटर से तुसरे काउंटर पर भेजे आते हैं यह भी नहीं तो बवाज़ा कब बज़ागा नहीं। नाटक में एक जगागा चित्र गुप खुप खुद यह रहे से उजागर करते हैं कि यह दरवाजा किसी पिषले युग में खुलता था लिकिन अब यह भी हमेशा के लिए बन्द होँच्टूका है यह तो बवाजा पर पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवाजा पर बवा नाटको की कालपनिक विसंगतियों को सुनकर तो दिमाग गूम जाता है अचा लकता ज़से लेखा केरे हूं की यह दूनिया ही बेटु की है इसलि यह साहित ते भी बेटुका होना चैए यह नाटको की कालपनिक विसंगतियों को सुनकर तो दिमाग गूम जाता है. अगर बद्यागा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा या राजनीती के किसी भी विद्यार्ठी को हिला कर रग देगा. रीसर्ज ये बहुत फीच्टाने वाले सत्तिएका तो से तिहासिक तरको के साथ खलासा करता है. तो वसत्ति क्या है? वसत्ति ये है की इतिहास में वास्तम में एक नहीं बलकी दो बिलकोल गलग-गलग विद्ध्यापती थे तोड़ रुकी है, तो विद्ध्यापती, सच्छ में ये तो हैरान करने वाला है जो भी सहिट्ते या इतिहास को थोड़ा वी जानता है अपने विद्द्यापती का नाम एक महान कवी के रूब में ज़ोर सूना है ये दो रगलग लोगों का क्या रहे से हैं? ज़र आई से विस्तार से समझाएए़। जरूर! गजेंद्र ताकृर के दस्ताविस के अनुसार जिस एक चवी को आज दून्या जानती है ये दरभार में सन्रक्षन प्राप्त कवी ते, इंके एक बहुत बडी विषेष्टा ये थी, कि ये संस्क्रित और अवहत बाशा में लिखते ते. आम आम एक चीज नचणचागूंगा क्योकि ये बाशावाला पहलू, शाएद बहुत से लोगों के लिए नया हो. यानी आम लोग इसे नहीं बोलते थे? जी भलकल नहीं या आम जन्ता की बाशा नहीं ती ये दर्बारो में पन्दितों और सामन्तों के भीच अस्तमाल होती थी. तो जो दर्बारी कवी विद्द्या पती तख्कृ थे उनो नी इसी कुलीन बाशा में कीर्ती लता, कीर्ती पताका, और पूरुष परिक्षा जैसी रच्नाय लिखीं हम, समज रहा हूँ इन किताबो में बहुत फी आभी जात्य, कुलीन, और यहां तक जातिवादी सोच चलकती है वे अपने आश्वे दाताओ यानी राजाँ का गुणगान करते थे समच गया यानी वे सत्ता के बहुत करीब ते लेकिन फिर दुस्रे विद्यापती कों ते दुस्रे थे मूल महाकवी विद्यापती दस्ता वेज में ये तारकिक रूप से सिथ द्खिया गया है की ये दर्बारी कवी विद्यापती से बहुत पहले होए थे यानी जो तीरीश्वर जिनका समए बारासो पचतर से तेरासो पचास है उनसे भी पूर्व के थे औरे वाज यान दे काफी पहले? रहान, ये समबवता, हजाम या नाई जाती से समबंद रकते थे जो की समाज का एक बहुत ही निचला या हाश्ये पर रहने वाला तबका माना जाता ता. और सबसे बड़ी बात प्रज़ित या अवहात में नहीं बलकी सीदे लोगो की बाशा तेट मेठली में गीट रचे. या बात है. इनहोने apne prasiddh rachna padavli ke maadhyum se आम जन्ता, सर्वाहारा वर्ख की पीडा और आजीवीका के लिए होने वाले प्रवास के दर्ट को लिखा इनके गीट सद्यों से आम लोगो के भीच भिदापत आज के रूप में लोग परमप्रा में गाए जाते रहे हैं ये तो आज ज़े से आज की किसी बड़े कोरप्रेट पाब्स्टार या दरबारी लेखखने किसी गुम्नाम लोक कलाकार के पूरे जीवन उसके काम उसकी रचनाँ को चुराएक अपना नाम दे दिया हो. बलकुल ये एक दन वैसा ही है. लेकिन समाज के शक्तिषाली वर्ग ने ये किया कैसे? मिरा मतलब है, अंटरनेट या मास मीट्या से पहले के दोर में कोई एक पूरी पहचान को कैसे मिता सकता है? ये इतिहास को अपने पक्ष में मोडने की एक बहुत फीजग जित अर गेरी प्रक्रिया थी. दर असल कुलीन वर्ग ने जब ये देखा, कि मूल लोक कवी विद्यापती की पडावली के गीत, आम जन्ता के भीच अतने ज्यादा लोक प्रियो हो चुके है, कि उने मिताया नहीं जासकता, तो उनो ले एक दुस्रा रास्ता अपनाया. कुन सा रास्ता? उनहों उस काम को मिताने के बजाए, उस कवी की पहजान को ही हाईजैक कर लिया. उनहों उस मूल लोक कवी की पहजान पर एक कुलीन पाग पहनादी. आम ये पाग क्या है? पाग एक विषेश प्रकार की पगडी है. जो उस शमे सामंट्वाद, कुलींता और उच्वर्ग के वर्च्छस्वका प्रतीक मानी जाती ती. सत्तादारी वर्ग ने उस लोक कवी को एक कुलींडाचे मे फिट कर दिया. आच्छा और फिर? प्रचारित कर दिया कि संसक्रित और अवहध्त लिखने वाले कुलीं दर्बारी विद्ध्यापती और मेठीली में पदावली रचने वाले लोक कवी विद्ध्यापती दोनो एक ही अन्सान है बापरे! यानि उनो लोग गलग लोगो के जीवन को मिलागग इतिहास की किताबो किलिए एक ही वेक्ती कष्ड़ा कर दिया ये तो किसी की पुरी विरासत को निगल जाने जैसा है तीख आजा ही हूँँँँँ और इस जुट को सद्यों तक सच बनाए रखने किलिए सर्फ इतिहास से चेडचार काफी नहीं फीग दर्म और मिठ्खों का सहारा भी लिया गया. इस कुलीनता को और पवित्र और देविये साभित करने के लिए एक बहुत बडा मिठ्खग गरा गया. आपने शाएद वो उगना वाली लोग कता सूनी होगी? हा, हा. वो काहनी तो कापी मशूर है. जिस में का जाता है कि बवागवान शिव, स्वायम विद्यापती की बवकती से प्रसन होगर, उनके यहां उगना नामक नावकर का रूब दारन कर के काम करने आते हैं. जी भिलकुल. लेकिन दस्तावेज ये स्पष्ट करता है कि ये कता बहुत बाद में जोडी गए. ये कोई सैयोग नहीं था ये कता इसली ए गड़ी ग़ी ताकी उस दरबारी विद्ध्यापती को एक देविय, पवित्रा और चमतकारी स्वरुप दिया जा सके. वं... सब कुछ एक साजिश का हिस्था का. आप. जब कि अपने आपनी महन्ता सावित करने के लिए किसी देवियए चमतकार की जरूरत नहीं तुई कि उनका चमतकार उनकी कविता की उसच्च्चाई में ता जो सीदे लोगों के दिलो में उतरती थी. लेकिन यहां एक तारकिक सवाल उगता है. अगर कोई वेक्ती इन दोनों के रषनावों को गेराइ से पड़े, तो क्या बाशा और भावनावों का अंतर ये नी बतादेता, कि ये दो बिलकुल अलगले लोगो के विचार है? मलगद क्या साहित्ते क्या आलोचकों को ये कभी नजर निया है? ये बहुत ही सतीक बिन्दू उठाया आपने और इसका विष्लेशन स्रोद दस्टावेज में बहुत गेराई से किया गया है. दस्टावेज भिदेस्या या प्रवास गीप का बहुत ही मार्में कुदारन देता है. आचा? मूल विद्या पती के गीतो में रोजी रोटी के लिए, पेट पालने के लिए पर्देज जाने की जो पीडा है, एक पती के दूर जाने पर पतनी का जो दर्द और असुरक्षा की बहावना है, वो बहुत ही गेरी और विषुद्द मानवीय है. आ, जेसे रेशवच में उस कविता का जिक्र है, जहाँ एक यूवा महला केरे एक, के उसकपती परदेस चला गया है. राद बहुत अंदेरी है और गाँ में चोरों का दर है. वो किसी राहगीर से केरे एक, वो वहां नारुके. बलकुल वे पंक्तिया है, हम जूभती पती गलाह विदेस राती अंदार गामबच्छोर. इन चोती सी पंक्तियो में पूरे सरवाहारा वर्ग का दर्द छिपा है. ये उस आम आदमी का सच है, जिसका पती बारा बारा वर्षों के लिए आजीविका की तलाश में गर चोडक चला गया है. और पीछे चोडगाई महिला असुरक्षा और अकेले पन से जुज रही है. यह कोई दर्बार में बैटकर कलपना कर के लिखिगगे गे कविता नहीं है एक दम सहीं और इसके विप्रीद दर्बारी कवी विद्ध्यापती के रच्चान है कैसी है दुस्री और जो दर्बारी कवी विद्ध्यापती तख्कृर है उनकी संसक्रित या अवहत रच्नाँ में आम आदमी के इस प्रवास की कोई पीडा नहीं है पेट की बूक का कोई जिक्र नहीं है या अवहत रच्नाँ में आप आप आप आप प्रवास की कोई पीडा नहीं है या अवहत रच्नाँ में यहां तक लिकते है के आखुलीन विक्ती दया का अदिकारी नहीं है उनके अनुसार सुंदर्ता और योगिता सर्फ आमीर और विषिष्ट वर्ग की बपोती है ये तो बहुती कछ्फोर विचार है बिल्कुल अप कोई भी तारके किनसान ये सोट सकता है कि जो व्यक्ती एक जगा आमाद्मी के दर्द पर रोरा है, वो दुस्री जगा उसी आमाद्मी को द्या के लाइक बी नहीं समझ्झ्झा, ये कैसे समबहवै? इन दोनो की सोच में जीवन को देखने के नजरीय में जमीन आस्मान का अंतर है, जो साफ बताता है कि ये दो गलग लोग है वाखई इस सरे अटियासिक विष्लेशन को समजने के बाद दिमाग में बड़ा सवाल आता है तो इस सब का असल में क्या मतलव है जब विद्यापती जैसे महान लोग कवी की पहचान को आम जनता की उस आवाज को कुलीन वर्ग दूरा इस तरा सफाइइ से चुरालिया गया और उसे दर्बारी रंग देदिया गया मेरे मतलब है देदिया गया तो फिर उस सर्व हारा वर्ग और आम जन्ता की अस्ली, तीखी और विद्रोही आवाज मैतली साइथ ते में वापस कैसे आई? ये इतिहास का एक नियम है, किसी भी आवास को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता. जब भी कोई व्यवस्ता बहुत जाडा हावी हो जाती है, या सच्चाई पर जुट का परदा बहुत बारी हो जाता है, तो उसी समाच के भीतर से कोई एसा स्वर फुटता है, जूस्सारी गंद्गी को साव करने की ताकत रकता है और यही से प्रवेश होता है राम देवप्रसाद मंडल का जेने साहित्तिक की दुन्या में जहाडुदार के नाम से जाना जाता है जहाडुदार ये उपनाम ही अपने आप में कितना शान्दार अनोखा और अक्रामग है, नोट्स के नुसार इने मैठली का पहला जन कवी, यानी सीदे तोर पर जन्ता का कवी माना जाता है, और इनोने पारमपर एक मीटी और कोमल कविताये लिखने के बजाए, ज़ादु नाम की एक बलकु नहीं साहित्तिक विदा काविषकार ही कर डाला और यहां सब से दिलचस्प बात यह है कि उनोने अपनी इस विदा का नाम जादु ही क्यो रख्खा दस्तावेज में इस रूपक को बहुत कुबसुर्ती से समजगया गया है बात ये है कि आप एक बहुत गंदे कीचर से बफरे आंगन को किसी गुलाप के फुल से या रेश्मि कपड़ से साफ नहीं कर सकते. बलकुलने, उसके लिए कुछ कठोर चाहीग. एक दम अगर गंदगी है, अगर समाज में सदन है, तो उसे साव करने किलिए एक कदोर, चुबने वाली और खुडरी जाडू की ही जरूरत होती है. जाडूदार ने समाज की बुरायों, अंद विष्वासों, खोखले आदरशों, और पैसे के लालगच को बुहार ने, पूरी तरे से साथ करने किलिए, इस तीकी शेली को हत्यार बनाया. ये तो बहुती विद्रोही और क्रान्तिकारी सोच है. दस्तावेज में उनकी एक कविता की पंक्ती का बहुत जोर देकर उलेख की आगया है. हम्रा बिनुज जगत सूना चै. जिसका मदलब है कि मेरे बिना ये पुरा संसार सूना या शून्या है ये आत्मविष्वास तो गजब का है बहुत गजब का है क्या ये उस कुलीन पाक संसक्रिति का पुरी तरसे बहिशकारिया रीजक्षन नहीं है जिसके बारे में हम ने अभी बात की जिसने हमेशा महनत कष्लोगों को हाशीए पे रखा. भिलकुल, ये उसी दमनकारी विवस्था के मुपर सीदा जवाब है. ये उस सर्वाहारा मस्दूर औरश्रम जीवी वरग का वो जगावा अत्म विष्वास है. ज़व ये समच चुका है के मेरे पसीने और मेरी महनत के बिना ये पूरी दुन्या ये सारी अथध विवस्ता और ये सारे दरबार शुन्य है. ज़ारुदार की कमका है, ये बिलकुल सबष्ट कर देती है, कि अब समाज को आस्मान से किसी भग्वान राम के चमतकारी तीरों की चलने का, या किसी इश्वर ये अवतार के आकर नियाय करने का अंतजार नहीं है. यह नहीं वे कह रहें है, कि उदार किलिए, उगना जैसे चमतकार या किसी भीतर के अंद विष्वास की अप कोई जगा नहीं हैं एक दम सही उनका सबष्ट मानना था कि समाज की समस्याओ का समादान किसी सवर्ग से नहीं आएगा बलकी खुद आम लोगों को अपनी कथोर सच्चाईयों का सामना कर के निकालना होगा सईबाद है उनहोंने देखा कि लोग पैसे के लालच में रोगी बन गय है कौरीतियों और अंद विश्वासों के जोगी बन गय है इस समाजिग भीमारी का ईलाज कोई मनत्र या चमतकार नहीं हो सकता बलकी यतार्त की वो जाडू हो सकती है जो सारी दूल को उडादे इनोने अपनी कविता को वातानुकुलित कम्रों या दरबारों से निकाल कर खेतों की मेडों और गाँउके चोराहों पर ख़ागगर दिया. जहां वो सीदे आम जन्मानस के पसीने से जुडती थी. या अधबुत सफर रहा है ये, अगर आजके इस पूरी चरचा के दागों को एक साथ पिरोया जाए, तो हमने श्वर्वाद की थी उत्तर अदूनिक नाटकों के उस भेतुके वेटिंग रूम से, जहां अन्सान बिना किसी वजा के बसे एक बंद दर्वाजे के सामने कभडा है. जी, वहां से हम इतिहास के अस्ली पन्नो में उत्रे, ज़ाहा नहीं देखाए के कैसे विवस्ठाने विद्द्यापती जैसे महान लोग कवी की इतिहासिक पहचान को चुराख़र एक दरबारी साचे में फिट कर दिया. सर्फ अपनी सत्ता कायम रकने के लिए. अर अंद में हमने जाडू दार की उस विद्डरो ही जाडू कविता को देखा, जिसने उस सारी एतिहासेक और समाजिक गंद्गी को साथ करने का बीडा उटाया. और ये पूरी यात्रा हमें ये सुचने पर मजबोर करती है, कि साहित ये वास्तव में क्या है? ये केबल आल्मारियो मेरे किताबो के पन्नो तक्सीमित नहीं ये ये समाज पर नियंट्रन करने, इतिहास को अपने फ़दे के हिसाप से मोडने और फिर उसी नियंट्रन से आजादी पाने की लडाई का एक बहुत यीवन्त मैधान है. बिलकल ये जानकार्या तभी बबज़न भी मुल्लिवान है, जब हम इने समजें, और इस आलोचनात्मक नजर्ये को अपने जीवन में लागु करे. इस से एक बगड़ बडी सीख ये भी मिलती है, कि हम जो इतिहास पडते है, उकसर उनही लोगं दवारा तगयार किया जाता है, जो सथ्ता में बैटे होते हैं. इसलिये हमें हमें अज़्ा अदिकार एक इतिहास पर सवाल उठाने की आदर डालनी चाही है. और सच कहुथो यही आलोच नात्मक सोच, आज की दुन्या में हमारा सब से बड़ा हद्यार है जब तक हम प्रश्न नहीं करेंगे हम उसी नो आन्ट्री वाले दर्वाजे के सामने कष्डी उस भेतु की भीड़ का ही हिस्वा बने रहेंगे बिलकु से ही अब इस पूरी चर्चा से एक अजा विचार निकल कर आता है, जो किसी को भी गेराई से सोचने पर मजबोर कर दे. चर्चा की शुर्वात में हम ने एक जासुसी कहानी के प्लोट का जिकर किया था, ज़हां 2 गलग गलोगों को मिलाखर एक बना दिया गया ता जी बिलकुल तो अगर इस बात पे गवर किया जाए कि अगर एक पूरी संसक्रिती तो भिलकुल गलग गलग अप्यासेग रस्तियों को मिलाखर सदियों के लिए एक बना सकती है केवल उनकी सांस्क्रितिक सम्रती के पहनावे को बडलकर, तो सोची ए, हमारे इतियास की किताबो में दरज एसे और कितने महान नायक या कलाकार हुंगे, जो असल में किसी एक इनसान के नहीं बलकी कई अलग-ालग लोगों के चुराय हुए चेहरों से मिलकर बने है. अप्से जोरी बात, सवाल उठाते रही है.