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मैथिली_समीक्षाशास्त्र (3).mp4
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- 0:00–0:07नमस्कार, आऔ सीथा प्रवेष करी च्ये गजेंद्र ताकुरक एक ता बहुत प्रसिद्ध्पोतिक विष्लेशन में, मैठली समिक्षा शास्ट्र,
- 0:07–0:12इआदूनिक शेत्रिय साहित्य, विषेषकर मैठली साहित्यक मुल्यांकनक लेल,
- 0:12–0:15एक ता मास्ट्ट्क्लास्सन अचे, एक अर ग़ाई में जाएब,
- 0:15–0:18तब भूजब छी साहित्यक अस्ली परख कोना होएचे.
- 0:18–0:22हमरा सबख आवग, चच्च्च्च्च्रूप रिख्खा किछ एदरष अजी.
- 0:22–0:24पहले देखखब मेत्ली समिक्ष्षाक आदार,
- 0:24–0:28परी विहनी कताग विष्छलेशन, उकर बाद लगु कता आदूनिकता,
- 0:28–0:33पद्यक मान्दन्द आ अन्द्द में भार्ते सुन्दरे शास्त्रक अद्बुत प्र्योग।
- 0:33–0:37ता आव शुरू करे ची पहल्क्शन्चा मैठिली समिक्षाक आदार.
- 0:37–0:45ये ते सवसे रोचक बात यी अचे जे लेखख साहित्यक अलग अलग रूपक विकास पर एक दम सीदा बात कर इच्छतिन.
- 0:45–0:49माने जेना जेना विद्धा बदलत, उक्रा परखबाक नियम सहो बदलत.
- 0:49–0:53एक ता उपन्यास, एक ता चोट कता, और एक ता कवीता.
- 0:53–0:57सबिक मुल्यांकन एक लाटी से नहीं हाकल जासकता ची बूजलोने.
- 0:57–1:03आब बडे ची दूसर खन्ध दिश जी आचे विहनी कताक विष्लेशन.
- 1:03–1:08तई बुजबाग बड जरूरी एची जे मैत्हिल साइत ते में भीहनी कता मानिग की आची.
- 1:08–1:12इकर सीमा मात्र एक सचार पन्नाक मानलगेल चे
- 1:12–1:15एक्दम सगन एकदम कसेल
- 1:15–1:20आए ही कारने एकर लिखबाग आए एकर समिक्षा करबाक तरीका बिल्ल्कल बडली जायत चेक
- 1:20–1:24लेखगक एक ता बडू नीक चितावनी आची आपे
- 1:24–1:29कहे च्था दिन जग वेहनी कथा में गधनाक पुडन श्रिंखला नहीं अची,
- 1:29–1:32तो ओँ सिनेमाक अईटम गिट्सन भाई कर अईगा दजी तची.
- 1:32–1:37मने व्यान्त ततनी कल लिल खी ज्लेद, मुदा कोनो अस्थाई प्रभाव नहीं चूरत,
- 1:37–1:42तैं इकोनो फूसिक छूटकुला नही बहसके तछी एक रपूरन आज्जोर्दार हो भाग चाही.
- 1:42–1:48ता असल विहनी कता क समेख सकोना होए, एकर लिल किष बात पर द्यान देवक जरूरी आचे.
- 1:48–1:52की औही में गतनाक तेवर अपुरन श्रिंखला चे?
- 1:52–1:56के उ पड़े कर पात्खेन मोन मुक्त बहुर रहा लगचे?
- 1:56–2:00की उ समाजिक सम्रस्ता अन्याए दिस लजा रहा लगचे?
- 2:00–2:03इता नीक विहनी कता उही के मनल जायत,
- 2:03–2:09जे समाज मे आत्म विष्वास अच्वरित्र निरमाणक संदेश एक्दम तिख्ष्नता सदो सके.
- 2:09–2:13आद आबी जाओ तीसर क्यणद पर, लगु कता और अधुनिकता
- 2:13–2:17वीनी कता सदाईरा तनी पैख करी तबे तची लगु कता
- 2:17–2:21इजटल समाजिक राजने तिक बात राखबाक लेल एक तब बडग कनवास देई तची
- 2:21–2:29आईते लेक्खक बिना कोनो पक्ष्पात के पश्च्वी समिक्षाक दूता अलग-गलक चष्मा के मेठली लगु कता पर लगा के देखे चतें.
- 2:29–2:35एक दिस अच्छे माक्स्वाद आनालीवाद, जे समाजक आर्थिक दाचा वर्ग संगष्ष्पर किंद्रे तच्छे.
- 2:35–2:39अदो सर्दिस अचे उत्तर अदूनिक्तवाद अविक्हन्दन्वाद
- 2:39–2:42जि बहाशा आप पूड सत्टिपर सबार्ठाड करे तच्छे
- 2:42–2:47इ गलग-गलक चच्मा कता क बलको नव-नव परद हम्रा सबक सोजा खोली दिट च्छे
- 2:47–2:51अई ते लेक्हक समिक्षक सब परे करारा प्रहार करे चती,
- 2:51–2:57हुईंका सपष्ट कहब चन, जे हे भाई समिक्षक के मोल रचनाक मुल्यांकन कर बाग चाही,
- 2:57–3:02समिक्षक बहाने आपन पांडिक्तिः वा विद्वता दिखावे से बच्वाग चाही.
- 3:02–3:11अगावे से बच्वाख चाही, समिक्षा हमेशा कताक मोल भावना से जुडल रहे, नाई के अकादमिक आहंकार चमके बाख सादन बनी जाए.
- 3:11–3:14इक रा एक ता उदारन सबूजी
- 3:14–3:18जे ना एक ता बड़ाई मस्वूथ जोडग के लेल पलंग बनवैता ची
- 3:18–3:20आ दोसर बड़ाई कलात्मक्ता के लेल
- 3:20–3:23तैना समीक्षक के से हो इदेखबाक चाही जे
- 3:23–3:28औई विषेश लेक्खक उदेश्छ आग काजक तरीका की च्येक
- 3:28–3:32वम सब एक्केता कदोर नीम सब कतापर नै थूपी सकत्ची.
- 3:32–3:35गदिसं आब कविता देस गुरेजची.
- 3:35–3:38खंद चार पद्यक मान्दन्द.
- 3:38–3:40इब भात बड़ दिल्चस पच्छे.
- 3:40–3:44पोटिक लेक्ख एते कोनो संकोच नहीं कैने चाती.
- 3:44–3:47उसी दे ब्लाक मेल साहित्तिक अगब करे चाती
- 3:47–3:48इकी तिक
- 3:48–3:52इओस थितितिक जदे सुखायल मुख्यदारा में लोक
- 3:52–3:56एक दोसर की समीख्षा, मात्र पूरसकार अप्रतिष्था पाभे ले करे चाती
- 3:56–4:01जकन पीट खोखबल वास्तविक साहित्तिक मुल्यंकनक जगल लोलेत
- 4:14–4:18अब आवी जाँ अन्तिम और सब से बेसी गेहर क्हन्द पर,
- 4:18–4:22क्हन्द पाच बारती ये सुन्दर ये शास्त्र कप प्रेयोग,
- 4:22–4:25सब सब अब हले गब करी रास सिद्ध्धान तक,
- 4:25–4:29बहरत मूनी के नाते शास्त्र करी अप प्रेवाद,
- 4:29–4:33अब आवी जाँ अन्तिम और सबसे बशी गेहर कहन्द पर
- 4:33–4:36खन्द पाच बारती ये सवन्दर ये शास्ट्र कप प्रेयोग
- 4:36–4:39सब सबहले गब करी रज सिद्द्धान तक
- 4:39–4:42बहरत मूनी के नाते शास्ट्र सा आयल एई सिद्द्धान
- 4:42–4:50ब्रत्मुनी के नाते शास्त्रसा आयल एज सिद्धान्त, सम्यिख्षक के मात्र कत्ठा वस्तू वब प्लोट् देख्बाक्लिल नहीं कहताची.
- 4:50–4:56इगहताची जे उही गेहर भावनात्मक अनुबूती के पक्डू जे कोनो कविता वा कत्ठा पडला बाद,
- 4:56–5:26पात्ख के मुन में इक्दम स्थाई रूप से बसी जाएच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च
- 5:26–5:31अप देखे ची जे इसब सिद्धान्त पोठी के अन्तिम निशकर्ष दहरी कोना लग जाएत ची
- 5:31–5:35इता एक ता दोहरी समीख्षा पद्धिक कमाल देखवाग नाद्वाग
- 5:35–5:38रच्नाक सुन्दर्ता आ अद्ध दूनों के बडवाई दच्छी
- 5:38–5:41एकर प्रेजोग इस निष्चित करे दच्छी
- 5:41–5:44जे उप्मा रूपक जिरन काव्यात्मक सुन्दर्ताक मुल्यांकन
- 5:44–5:46कविताक अस्ली संदेश सा जोडी का कर्यल जाए
- 5:46–5:52आप देखे ची जे एई सब सिद्धान्त पोठी के अंतिम निशकर्ष दही कोना लग जाए तची
- 5:52–5:56एता एक ता दोहुरी समीख्शा पद्ध्धीक कमाल देखवा में अवे तची
- 5:56–6:03बच्छुजीजका कवी सबह कविताक मुल्यांकन एक दिस माक्स्वाद आ उत्तर आदुनिक्ता वादक यत्हार्त सकल जाईतची
- 6:03–6:09आ टीक उही समय, उकर मुल्यांकन रस अस्वोट सिद्धान्त के प्रेुक सभी कल जाईतची
- 6:09–6:16इप्राजीन पूर्वी परमपरा, आ एक दम आदूनेक पष्च्वी उपकरनक भीच का खाई के पाट्वाक एक अदबूत प्रयास अची.
- 6:16–6:20विदे मैठली साहित त्यान्दोलनक इई उह प्रयास थेक,
- 6:20–6:27जकर मुख्य उदेश्य अची मैठली साहित्ते के जीवन्तराखब आवो कर पाती पातीक गहन विष्लेशन करव.
- 6:27–6:31आप तरक पोथी कुनो सामान ने समिक्षा बहरी आची,
- 6:31–6:34यब भाशा अ साहित्ते के सन्रक्षिट करबाक
- 6:34–6:37एक ता बहुत पएग आ महत्वपोण काज्थेक
- 6:37–6:41इस साभित करे तची जे अपन छेत्रिया साहित्ते सहु
- 6:41–6:46कतोर से कतोर विष्लेषनक लेल पोडन रूपेण तएयार अचे
- 6:46–6:50आ अन्त में हम सब एक ता गमभीर प्रश्नपर विचार करी,
- 6:50–6:53जना-जना वेश्वी करन तेजी सब लगी रहाल जे,
- 6:53–6:57आ बाशा सब पर विलुप्तिक खत्रा मन्डा रहाल जे,
- 6:57–7:00तकन शेत्री ये साहित्य आपन विष्ष्च्ट बाशाई इ,
- 7:00–7:03अस्व्दर्या प्यचान बचाईबक लिल कोना विखसित हेते?
- 7:04–7:06इमात्र साहित्यक गबने आची?
- 7:06–7:10इधम्रा सबके सान्सक्रितिक प्यचानक अस्तित्वक प्रष्न आची.
- 7:10–7:14जिक्रापर विचार करब आयुक समय में अप्यंत अवष्चक है.
- 7:14–7:15ता सोच्वाईपर?
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नमस्कार, आऔ सीथा प्रवेष करी च्ये गजेंद्र ताकुरक एक ता बहुत प्रसिद्ध्पोतिक विष्लेशन में, मैठली समिक्षा शास्ट्र, इआदूनिक शेत्रिय साहित्य, विषेषकर मैठली साहित्यक मुल्यांकनक लेल, एक ता मास्ट्ट्क्लास्सन अचे, एक अर ग़ाई में जाएब, तब भूजब छी साहित्यक अस्ली परख कोना होएचे. हमरा सबख आवग, चच्च्च्च्च्रूप रिख्खा किछ एदरष अजी. पहले देखखब मेत्ली समिक्ष्षाक आदार, परी विहनी कताग विष्छलेशन, उकर बाद लगु कता आदूनिकता, पद्यक मान्दन्द आ अन्द्द में भार्ते सुन्दरे शास्त्रक अद्बुत प्र्योग। ता आव शुरू करे ची पहल्क्शन्चा मैठिली समिक्षाक आदार. ये ते सवसे रोचक बात यी अचे जे लेखख साहित्यक अलग अलग रूपक विकास पर एक दम सीदा बात कर इच्छतिन. माने जेना जेना विद्धा बदलत, उक्रा परखबाक नियम सहो बदलत. एक ता उपन्यास, एक ता चोट कता, और एक ता कवीता. सबिक मुल्यांकन एक लाटी से नहीं हाकल जासकता ची बूजलोने. आब बडे ची दूसर खन्ध दिश जी आचे विहनी कताक विष्लेशन. तई बुजबाग बड जरूरी एची जे मैत्हिल साइत ते में भीहनी कता मानिग की आची. इकर सीमा मात्र एक सचार पन्नाक मानलगेल चे एक्दम सगन एकदम कसेल आए ही कारने एकर लिखबाग आए एकर समिक्षा करबाक तरीका बिल्ल्कल बडली जायत चेक लेखगक एक ता बडू नीक चितावनी आची आपे कहे च्था दिन जग वेहनी कथा में गधनाक पुडन श्रिंखला नहीं अची, तो ओँ सिनेमाक अईटम गिट्सन भाई कर अईगा दजी तची. मने व्यान्त ततनी कल लिल खी ज्लेद, मुदा कोनो अस्थाई प्रभाव नहीं चूरत, तैं इकोनो फूसिक छूटकुला नही बहसके तछी एक रपूरन आज्जोर्दार हो भाग चाही. ता असल विहनी कता क समेख सकोना होए, एकर लिल किष बात पर द्यान देवक जरूरी आचे. की औही में गतनाक तेवर अपुरन श्रिंखला चे? के उ पड़े कर पात्खेन मोन मुक्त बहुर रहा लगचे? की उ समाजिक सम्रस्ता अन्याए दिस लजा रहा लगचे? इता नीक विहनी कता उही के मनल जायत, जे समाज मे आत्म विष्वास अच्वरित्र निरमाणक संदेश एक्दम तिख्ष्नता सदो सके. आद आबी जाओ तीसर क्यणद पर, लगु कता और अधुनिकता वीनी कता सदाईरा तनी पैख करी तबे तची लगु कता इजटल समाजिक राजने तिक बात राखबाक लेल एक तब बडग कनवास देई तची आईते लेक्खक बिना कोनो पक्ष्पात के पश्च्वी समिक्षाक दूता अलग-गलक चष्मा के मेठली लगु कता पर लगा के देखे चतें. एक दिस अच्छे माक्स्वाद आनालीवाद, जे समाजक आर्थिक दाचा वर्ग संगष्ष्पर किंद्रे तच्छे. अदो सर्दिस अचे उत्तर अदूनिक्तवाद अविक्हन्दन्वाद जि बहाशा आप पूड सत्टिपर सबार्ठाड करे तच्छे इ गलग-गलक चच्मा कता क बलको नव-नव परद हम्रा सबक सोजा खोली दिट च्छे अई ते लेक्हक समिक्षक सब परे करारा प्रहार करे चती, हुईंका सपष्ट कहब चन, जे हे भाई समिक्षक के मोल रचनाक मुल्यांकन कर बाग चाही, समिक्षक बहाने आपन पांडिक्तिः वा विद्वता दिखावे से बच्वाग चाही. अगावे से बच्वाख चाही, समिक्षा हमेशा कताक मोल भावना से जुडल रहे, नाई के अकादमिक आहंकार चमके बाख सादन बनी जाए. इक रा एक ता उदारन सबूजी जे ना एक ता बड़ाई मस्वूथ जोडग के लेल पलंग बनवैता ची आ दोसर बड़ाई कलात्मक्ता के लेल तैना समीक्षक के से हो इदेखबाक चाही जे औई विषेश लेक्खक उदेश्छ आग काजक तरीका की च्येक वम सब एक्केता कदोर नीम सब कतापर नै थूपी सकत्ची. गदिसं आब कविता देस गुरेजची. खंद चार पद्यक मान्दन्द. इब भात बड़ दिल्चस पच्छे. पोटिक लेक्ख एते कोनो संकोच नहीं कैने चाती. उसी दे ब्लाक मेल साहित्तिक अगब करे चाती इकी तिक इओस थितितिक जदे सुखायल मुख्यदारा में लोक एक दोसर की समीख्षा, मात्र पूरसकार अप्रतिष्था पाभे ले करे चाती जकन पीट खोखबल वास्तविक साहित्तिक मुल्यंकनक जगल लोलेत अब आवी जाँ अन्तिम और सब से बेसी गेहर क्हन्द पर, क्हन्द पाच बारती ये सुन्दर ये शास्त्र कप प्रेयोग, सब सब अब हले गब करी रास सिद्ध्धान तक, बहरत मूनी के नाते शास्त्र करी अप प्रेवाद, अब आवी जाँ अन्तिम और सबसे बशी गेहर कहन्द पर खन्द पाच बारती ये सवन्दर ये शास्ट्र कप प्रेयोग सब सबहले गब करी रज सिद्द्धान तक बहरत मूनी के नाते शास्ट्र सा आयल एई सिद्द्धान ब्रत्मुनी के नाते शास्त्रसा आयल एज सिद्धान्त, सम्यिख्षक के मात्र कत्ठा वस्तू वब प्लोट् देख्बाक्लिल नहीं कहताची. इगहताची जे उही गेहर भावनात्मक अनुबूती के पक्डू जे कोनो कविता वा कत्ठा पडला बाद, पात्ख के मुन में इक्दम स्थाई रूप से बसी जाएच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च अप देखे ची जे इसब सिद्धान्त पोठी के अन्तिम निशकर्ष दहरी कोना लग जाएत ची इता एक ता दोहरी समीख्षा पद्धिक कमाल देखवाग नाद्वाग रच्नाक सुन्दर्ता आ अद्ध दूनों के बडवाई दच्छी एकर प्रेजोग इस निष्चित करे दच्छी जे उप्मा रूपक जिरन काव्यात्मक सुन्दर्ताक मुल्यांकन कविताक अस्ली संदेश सा जोडी का कर्यल जाए आप देखे ची जे एई सब सिद्धान्त पोठी के अंतिम निशकर्ष दही कोना लग जाए तची एता एक ता दोहुरी समीख्शा पद्ध्धीक कमाल देखवा में अवे तची बच्छुजीजका कवी सबह कविताक मुल्यांकन एक दिस माक्स्वाद आ उत्तर आदुनिक्ता वादक यत्हार्त सकल जाईतची आ टीक उही समय, उकर मुल्यांकन रस अस्वोट सिद्धान्त के प्रेुक सभी कल जाईतची इप्राजीन पूर्वी परमपरा, आ एक दम आदूनेक पष्च्वी उपकरनक भीच का खाई के पाट्वाक एक अदबूत प्रयास अची. विदे मैठली साहित त्यान्दोलनक इई उह प्रयास थेक, जकर मुख्य उदेश्य अची मैठली साहित्ते के जीवन्तराखब आवो कर पाती पातीक गहन विष्लेशन करव. आप तरक पोथी कुनो सामान ने समिक्षा बहरी आची, यब भाशा अ साहित्ते के सन्रक्षिट करबाक एक ता बहुत पएग आ महत्वपोण काज्थेक इस साभित करे तची जे अपन छेत्रिया साहित्ते सहु कतोर से कतोर विष्लेषनक लेल पोडन रूपेण तएयार अचे आ अन्त में हम सब एक ता गमभीर प्रश्नपर विचार करी, जना-जना वेश्वी करन तेजी सब लगी रहाल जे, आ बाशा सब पर विलुप्तिक खत्रा मन्डा रहाल जे, तकन शेत्री ये साहित्य आपन विष्ष्च्ट बाशाई इ, अस्व्दर्या प्यचान बचाईबक लिल कोना विखसित हेते? इमात्र साहित्यक गबने आची? इधम्रा सबके सान्सक्रितिक प्यचानक अस्तित्वक प्रष्न आची. जिक्रापर विचार करब आयुक समय में अप्यंत अवष्चक है. ता सोच्वाईपर?