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मैथिली_साहित्यमे_छन्दक_अनुशासन_आ_यथार्थ.m4a
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- 0:00–0:03विमर्शक य मंच देबेट में आग्स्वागत आचे
- 0:04–0:08आई हम सब कल्पना करल च्ये एक ता उपनैत मौन्सूनी कोसी नदिक
- 0:09–0:12एक ता एंजिन्यरक लेल उई नदिक बादक पानी
- 0:12–0:15मात्र एक ता अनियंट्रत अराजकता आचे
- 0:15–0:19इक दम जावद्धरी उक्रा कोनो कंक्रीत तदबंद मे नहीं बानल जाए.
- 0:19–0:26आ, तीखवे ना. जावद्धरी उक्रा एक ता ज्यामेती ए रुपसा सती का कत्फोर नहर मे नहीं बानल जाए.
- 0:26–0:31जगन उ पानी नियम असन्रजना के मानेत तर्बाईनस सगुदरे दच,
- 0:31–0:34तकने उ प्रकाश अ उर्जा उत्पन न करे दच,
- 0:34–0:39भूज्लू शाहित दे में से हो च्यंद अव्याक्रन उही तर्बाईनस काछ करे दच.
- 0:39–0:42मुदा दिखु, हम एकरा दसर दिससद दिखाएची.
- 0:42–0:45उही किसान कलेल जकर खेट सुखल अची.
- 0:45–0:49वा, माने, उही लोका कलेल जकर गर बादी में भस्यार हल अची.
- 0:49–0:52नदी कोनो एंजिनेरिंके समस्या वग गनी तिय समेगर न नहीं थिक.
- 0:52–0:55ता आहा के द्रिष्टी विन्दुसो उकी थेख.
- 0:55–0:57इक ता आदिम शक्ती आची.
- 0:57–1:01पानिक आस्ली महत्ता उकर उन्मुक्त यतार्ठ अव वेग में आची.
- 1:01–1:06उही कंक्रीट के देवाल में नहीं जे उकर बानवावा के लेल बनाल गेल आची.
- 1:06–1:11जखन पानी देवाल तूरी कबाहर वगट आईत ची, तकने वोकर आस्ली यतार ज्फार्ट सामने ववगट ची.
- 1:11–1:19तु सन्रच्नाक अनुशासन आर भावनाक उन्मुक्त प्रवाह की भीचक इजे अंतर ध्वन्ववची,
- 1:19–1:22उत्ते सां हमर आएदारिक इवमर्ष प्रारम ब होईत छे
- 1:23–1:28आए हम सब गजेंद्र ठाकृ रचित मेठली समिक्षा शास्ट्रपर आदारित
- 1:28–1:32एक तक गंभीर मुदा प्रासंगेक विषेपर चर्चा करो हल छी
- 1:32–1:38जे मैठली साहित्यक आलोचनात्मक सिद्धान्त आर विद्धागत रूपान्त्रन्ट पर किन्ध्रित अचे.
- 1:38–2:08ये खडम हमर भहसत मुख्य प्रष्न इय जे आदूनिक मेठली कविता विषेशकर आयातित विदा जिना गजल आर हाएकू में की चन्द आर भहरक कदोर सन्रचनात्मक निम पालन भेसी आवशक ची वा भाव रस आसमकालीन समाजेक राजनेतिक यदार्त जिना माख्सवादि
- 2:08–2:11उगर बीना रच्ना आपन मुल पह्चान गूमा देताचे.
- 2:11–2:13आः, हमर इमान बच्छे,
- 2:13–2:16जे यद्यपी शन्रच्ना महध्तोपूर नाची,
- 2:16–2:19मुदा कोन रच्नाक अस्ली शक्ती,
- 2:19–2:21उकर भाशिक स्फोट, रसानु भूती,
- 2:21–2:28उकर बाशिक स्वोट रसानु भूति आ उत्र सन्रच्ना वादि येवं सामाजिक यतार्ठ में नहीं तचे.
- 2:29–2:35जेना सीमान्त्रिक्रुतक संगर्ष इसप प्राया कत्होर नियम से मुक्त बहुकः बेशी मुखर होई तचे.
- 2:36–2:38माने नियम रानिकारक बहुजाई तची?
- 2:38–2:42माने, नीम रानिकारक बाजाई तची
- 2:42–2:45देखो, नीम एक ता सीमादरी तीक अच्छे
- 2:45–2:49मुदा जक्छन अ बावके कुट भीलाईजका बाशद दे
- 2:49–2:51तकन हा उ रानिकारक बाजाई तची
- 2:51–2:53औ, हम भूजे राल ची
- 2:53–2:56जे आहा आन के ख सोचे राल ची
- 2:56–2:59मुदा हमरा एक ता भिन्न द्रुष्टिकोन राइक हन देवू
- 2:59–3:03मैठिले समिक्षा शास्ट्र स्पष्ट रूप से गजल कलेल बहर
- 3:04–3:06अर्ठात च्चन्द आ अर्कान
- 3:06–3:10अर्ठात मात्रा विदान की अनिवारिता पर विषेश बल देई ताछे
- 3:10–3:11मुदा की
- 3:11–3:12एक मिनेट
- 3:12–3:16जे स्रोता गजल तकनीक शब्द से परिछित नहे चती
- 3:16–3:18हुनकलेल हम तनिक सपष्ट कर दी
- 3:18–3:22गजल में एक तनिष्चित सांगीतिक लैय होगे तच्छे
- 3:22–3:24जक्रा बहर कहल जायत ची
- 3:24–3:29आश्वद के उही लैय में फिट कर वाके गनित के अरकान कहे चती
- 3:29–3:30आई तव्याक्रनिक परिवाशा भेल
- 3:31–3:33इग्रन्त स्पष्ट करे तच्छि
- 3:33–3:35जे बिना बहरक गजल
- 3:35–3:39मात्र गजल सन कविता भगगर रही जाए तच्छि
- 3:39–3:41मेठली में जी आजाद गजल
- 3:41–3:43या बे बहर गजल्क जे
- 3:43–3:45एक तब्रामक परमपरा आईल
- 3:45–3:50उक्रा इस समिक्षा शास्त्र तारकिक रूप से खंडित करे थाची.
- 3:50–3:53मुदा केवल गजल नहीं हैएकूकलेल से हो.
- 3:53–3:59एक दम हैएकूकलेल पाच सात पाच अख्षर वासे लिबल केर
- 3:59–4:02वारनिक चंदक कर कड़ाई सवकालत के लेचे.
- 4:02–4:04रुका रुका.
- 4:04–4:06हमहा के दे तोकब
- 4:06–4:08इपाच सात पाचकर नियम जहां
- 4:08–4:10हैकु कलेल कहर राल ची
- 4:10–4:12वोकर वास्तविक्ता की अचे
- 4:12–4:16की मेठली में अईना काचकर तची जेना जापानी में
- 4:16–4:17वास्तविक्ता इचे
- 4:17–4:19जे एकर एक ता वेग्यानिक कारन अचे
- 4:19–4:27मैंई, देवनागरी आ मेतलिक ध्हनिक शुद्धा, मेतली में लिखल जाईता ची, सई भाजल जाईता ची.
- 4:27–4:34जिना, जगम हैखोग पहल पाती में लिखव, बाडही कब पानी तई पाच अख्षर भेल.
- 4:34–4:36आख्षर तई पाच पेल.
- 4:36–4:44तजापानी विद्धा जखन मेठली मेवाई तची तवोकडधधाचा के मेठलीक दोनिक संग सामनजस सबैसावे परएचे.
- 4:44–4:54एही लिल व्याक्रनिक आज्चन्द शास्त्री अनुशासन विषेश कध रस्वदीर गख सतीक प्रेोग कोनो से हो विदा का प्रान थिक.
- 4:54–4:57प्राड ये तब बहुत पएख दवाज ही
- 4:57–5:04इक्दम प्राड थेख, बिना एकर रचना आपन रूप और आत्मा दूनू गूमा देतची
- 5:04–5:11अंचिनार अखर जका सहितिक मंज, जे मैठ्ली गजल में बहरक प्रयोग अनिवार्य की लक,
- 5:11–5:19उकर सुपर नाम इभेल, जे आदिनिग गजल कार सब निंआमबद गजल लिख्जल लगला विदाक शुद्दता बचल रहेल.
- 5:19–5:26दिखु, इएक ता गंभीर तर कच्छे, आ अईचिन हार अख्चर किर योग्दान के हम नकारी नहीं रहो लग ची.
- 5:26–5:31मुदा, मावकरव, हम एबात पूड़्त मानबाकले तटयार नहीं ची,
- 5:31–5:34ज़ व्याक्रनक कथोरता ही विद्हाक आत्मा थिक.
- 5:34–5:37ता अहाक द्रिष्टी बिन्दुसा विद्हाक आत्मा की थिक.
- 5:37–5:38अद्रात्मा की थिख?
- 5:38–5:39हमर तर की आची,
- 5:39–5:43जे आलोचना शास्त्र मात्र व्याक्रनक के गनित नहीं थिख.
- 5:43–5:45गरन्त में स्वेम माक्स वाद,
- 5:45–5:46फेमिनिनिसम,
- 5:46–5:47वाननारी वाद,
- 5:47–5:48उतर आदूनिक्तावाद,
- 5:48–5:52आज्जाग देरिदा के विक्हन्दन्वाद के विस्त्रिच चर्चा आची
- 5:52–5:52आज्जाग देरिदा के विक्हन्दन्वाद के विस्त्रिच चर्चा आची
- 5:52–5:53आज्जाग चर्चा आची
- 5:53–5:55तई यसब सिद्धान्त की कोई तची
- 5:55–6:00इसब सिद्धान्त बाशा आ आर्थ के तरलता पर बल देतची
- 6:00–6:03विक्हन्दन्वाद आर्थात दीकन्स्ट्ट्चन की कोहेतची
- 6:03–6:10इग कोहेतची जे कोनो पात वर टेक्स्ट केर एक ता निस्चित पातर पर लिखल आर्थ नहीं होएतची
- 6:10–6:40आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ�
- 6:40–6:44बारतिय स्पोट सिद्धान्त के चर्चा करोत ची जे भरत्री हरी दुरा देल गेल ची
- 6:44–6:47आँ, स्पोट सिद्धान्त बड रोचक अची
- 6:47–6:50जे श्रोता इस सिद्धान्त पहिल बार सूनी रहल चाती
- 6:50–6:54उनका बुजे वाक लेल हम एक रा एक ता उदाहरन से कही ची
- 6:54–7:00सबोट मने हुई तची पुटनायवा प्रस्पूटी तोईब जना एक तपपका पुटेट ची
- 7:00–7:02जना दी पावली में
- 7:02–7:05इक दम जखन आहाकोनो कवीटा सूनाई ची
- 7:05–7:11ता आहाक मस्तिषक एक अक्षर वा मात्रा के जोड का अर्ठ ने निकाले तची
- 7:11–7:15अगर अगाक मन में एक एसंव श्फोट जगा प्रस्पूटित होई तची
- 7:16–7:22साहित्ते में सिमान्ती क्रित का संगर्ष, बाडेक विखिषिका, वेवस्ताक विद्रुप्ता दे खायब
- 7:23–7:27इसब सन्रचनात्मक नियम सब कतो बेशी महत्वा पुरनाची
- 7:27–7:31मुदा इसद्ता गद्दमे से हो दे खाल जासके तचिना?
- 7:31–7:34मुदा कविताक प्रभाब भेसी होई तची.
- 7:34–7:39साहिट्ते गनी तक सुत्र नहीं मानब अनुबुतिक दर्पंठेक.
- 7:39–7:42जगन एक ता कवि बाडक त्रासद दर्द लिखि रहल अची,
- 7:42–7:45तकन उ पाज सात पाज मात्रागिनत
- 7:45–7:48वा आपन दर्द की स्फोटक रूप में बहर आनत.
- 7:48–7:50आहा के एबिन्दू,
- 7:50–7:53जि साहित्य मानव अनुबूते एक दर्पन ठेक
- 7:53–7:54इक्ऩे नीक छे.
- 7:54–7:55मुड़ा देखो,
- 7:55–7:57दर्पना कलेल सो, सीसाक,
- 7:57–7:59इक ता निष्षत अकार,
- 7:59–8:01मुताई आप पालश आवश्षक होई थेख
- 8:01–8:02पालश?
- 8:02–8:05आआ, नहीं ता प्रतिवम् विक्रत बहजाई तची
- 8:05–8:09सरकस कदरपन मे देखाल अनोहार किहन लागे तची
- 8:09–8:10औआँ आँा के भुजले आची
- 8:10–8:12आँँ श्पोट के बात के लों
- 8:12–8:16मुदा उस्पोट से होता शब्दक माद्ध्यम से ही होई तची
- 8:16–8:19आश्व्दक अनुशासन व्याक्रन से अवे तची
- 8:19–8:22ता की व्याक्रन बिना अर्थ नहीं निकली सके तची
- 8:22–8:25हम आहा से एक ता सीथा प्रष्न करे ची
- 8:25–8:34जगजल मे रदीप, काफिया, अब हर जना रमल, वहाजजगगगगगगगगगगगनीत्यन्याम निकाल दिल जाए,
- 8:34–8:40तक उविद्धा अपन आरभी फार्सी वबहार्तिय सांगीतिक मुल से पूनता कट नहीं जायत.
- 8:40–8:44मने, आहा कही रहल ची जे उगजल रहभे नहीं करत.
- 8:55–9:01अद्थात तुक्बन्दी गजल के गजल बनावे तची यी हम माने तची
- 9:01–9:05मुदा आहा रमल आहाजज बहरक जे बात का रहल ची
- 9:05–9:09उ आरभी फारसी भाशाक दून्यात्मक प्रक्रती के आदार पर बनल आची
- 9:09–9:10तकी भेल
- 9:10–9:15की आहा विचार केने ची, जे मैठली क आपन एक ता विषिछ्ट उच्चारन साईली आची?
- 9:15–9:16कोना?
- 9:16–9:20की मैठली गजल उई बहर में नहीं लिखल जासके तचे?
- 9:20–9:23हमर ता इ मानब अची जे कुब नीक से लिखल जासके तचे?
- 9:23–9:27लिखल जा सकेत अची, मुदा अकर एक ता की मच चुका वेप अची?
- 9:27–9:31उदारनाक लेल, मैठली में शब्द कुछारनक अपन मिट्हास अची,
- 9:31–9:36जना अच्छीकर उच्छारन, हम सब अ एच्छ़ जगा करे ची
- 9:36–9:39वा रातीकर उच्छारन राइत करे ची
- 9:39–9:40तीन स्वर
- 9:40–9:43आई तव अच्छे, हम सव स्वर के ताने देची
- 9:43–9:49एक दम, उड़ू वा अरभी में रात मात्रे एक या दू मात्राक शव्द अच्छद अई
- 9:49–9:54मुदा मैठली में, रा एप एक्ता प्रलंबिद दूनी आचाई.
- 9:54–10:01एप दूनियात्मक विषेष्ता मैठली के अरभी पारसी वा उर्दूजका पुन्तबिन करे तची.
- 10:01–10:07आब आख बहर के नियम कहे तची, जहांके अरभी चन्दक फिसाँप से मात्रा रखबा कची.
- 10:07–10:09जी आवश्ख अची विद्धाक लेल
- 10:09–10:14इत उईना भेल जे एक ता चोखुट खृता के गोल भिद्टी में जबर्दस्ती तोकल जाए,
- 10:14–10:19जाए एक ता विदिषी साचा में में प्रद्टी जबर्दस्ती कोचल जाए,
- 10:19–10:22ता आदे शब्दक किनारे के काटे परत आ उईप प्रक्रिया में
- 10:22–10:25में में वेठलिक सुआभाविक सुगन्द हे राया जाएत
- 10:25–10:29औग, इच्छो खुट खुन्ता अग ओल भिट्टी वाला उपमा बहुर उचक आची
- 10:29–10:36सत्तिया ची, लेक्हक स्वैं भार्त्य सावन्दरे शास्त्र अभभरत्मूनिक रस्सिद्धान्त कर चर्चा किने चाती.
- 10:36–10:41रस्सिद्धान्त के अनुसार, जटे इस्थाई भावक रस्रुप में परनत होए प्मुख्या ची,
- 10:41–10:43उते बहर्के गनिद गोन बजायत ची.
- 10:43–10:48अस्ली गजल उआची जे स्रोटा क्हिदा में रस उपन्न करेद
- 10:48–10:51हम इ मानेच छी चे रस महतुपूर्न आचे
- 10:51–10:53मुदा हमेक्रा दूसर रूप में देखाची
- 10:53–10:55साचा विदेशी बह सकेचे
- 10:55–10:58मुदा जकन आहां कोन विदा के आयाथ करेची
- 10:58–11:02ता आहा के उकर अत्मक सम्मान करे परे चे.
- 11:02–11:04मुदा आत्मा बाव अची, नियम नहीं.
- 11:04–11:07नहीं नहीं, जो आहा टेनिस खेल रहल ची,
- 11:07–11:09ता आहा ई नहीं नहीं कहा सके ची,
- 11:09–11:13जहामर कोट गोल आचे, ता हम क्रिकित का बेट से खेलब,
- 11:13–11:15मेतली समिक्षा शास्त्र मैं,
- 11:15–11:45सन्रच्नावाद, अद्धात, स्ट्रक्ष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्�
- 11:45–11:48उगवी के यान्त्रिक ने बना देताची एक ता मशीन जगा.
- 11:49–11:50एक दम नहीं.
- 11:50–11:54बलकी अनुशासन हीनता के लेक्हक अस्पष्ट रूब से
- 11:54–11:57सुखायल मुख्य दारा कही आलोचना के ने चतें.
- 11:57–12:01एक अनुशासन हीनता कवी रख के आल्ट्सी बना देताची.
- 12:01–12:06जगन नियमे रहता थी, तखशन कभी आपन रचनात्मकता के चरम पर पहुचाई तखशी.
- 12:06–12:11माने आपन ख़ी रहाल ची, जे चुनोती से रचना निक्रे था ची?
- 12:11–12:16आपन उशब्द खोजाई तखची, बाशा कशीमा के विस्तार दई तखची,
- 12:16–12:20ताकि उ नियमक परिदि में रही का बहेतरीं भाव्ड़ कर सके
- 12:20–12:24शीमा से ही स्रिजनक चुनोति उत्पन होई ता ची
- 12:24–12:27हम आगा का अनुसासन वाला बात भूजी रहल ची
- 12:27–12:31और इस सत्या ची जे नियम एक ता शीमा दरी कवी के निखार अइ ता ची
- 12:31–12:34मुदा एताई हमेक्ता बलगर प्रतिवाद करेची.
- 12:34–12:35की?
- 12:35–12:37लेखाक केवल सन्रचनावाद पर नहीं रूकाईच्छतिन.
- 12:37–12:42उ पाट्खा भिखंदन वादी और अतिहासिक विसलेशन कर स्यो वकालत करेच्छतिन.
- 12:42–12:50जखन नाम रोलाम बार्द कर सिद्धान्त लेखकक म्रिट्तिव अथात देखफ दाद्धार केर बाद कर इची तक्ञन की होई तच्छे?
- 12:50–12:51आहा अस्पष्ट करो
- 12:51–12:55लेखकक म्रिट्तिव कर अर्थ यह नहीं जे लेखकक प्रान निक्लीगेल
- 12:55–13:25उगर आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ�
- 13:25–13:27साहित्तिक इगाज अचे?
- 13:27–13:30तो उई समे में कि उपात्त्तक इगणडद,
- 13:30–13:34जे कविता में हरस्वा अदिर्ग के मात्रा सही अचे वा नहीं,
- 13:34–13:37कि उपाज सात पाच के सिलेबल गणडद, नहीं.
- 13:37–13:38मुदा?
- 13:38–13:43तक्हन, संग्रचनात्मक छंद्शास्त्र्यनियम एक ता ज़द बादा नहीं भोजाई तच्छी.
- 13:43–13:46जक्हन, नियम भाओ के प्रतिबंदित करे लागे,
- 13:46–13:49वा यत्हार्ठ के विक्त करवा में बादध बने,
- 13:49–13:52तक्हन, उ नियम सहित्यक लेल हानिकारक भोजाई तच्छी.
- 13:52–14:22मारक्स्वादी समिक्षा द्र्ष्टी इगगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेईईईईई
- 14:22–14:26उप्रभाव उभी लए उछन्द उभी नियम साभई तची,
- 14:26–14:34वो बवर जगा का साचा में दलए तखने उ उतक्रिष्ट पद्ध बने तखने कीवक, मुक्त चन्द में कीवक नहीं।
- 14:34–14:40की यहां के लएगत अची जे जे यहां बात करो हो लगजी यो गद्ध्यमे नहीं कहल जासके तची
- 14:40–14:44अगर विलास एह लेल कही रहाल चीयकता हम्रा बज्बाग दियो
- 14:44–14:49कविताक तुकान्ता चंद अखर अगर अगगद्द्देसा अलग करे तची
- 14:49–14:53इखोनो आए का लिएक बात नहीं फिक, वेद की समह सदेख हूँ
- 14:53–14:57अगर विलास एह लेल कही रहाल ची, कियकत,
- 14:57–15:01हम्रा बज्बाग दियो, कविताक तुकानता च्शन्द,
- 15:01–15:04अखर अखर विलास अगर गद्द्दिसा �alag kare tachi,
- 15:04–15:08इखोनो आए का लिक बात नहीं फिक, वेद की समैसा देखु,
- 15:08–15:16वेदिक च्चन्द जना गायत्री अट्रिष्टूप के रूदारन देद ग्रन्त इस्पष्ट करे तची, जे नियम तो वेदक समेंसा जी.
- 15:16–15:18वेदिक च्चन्द क अपन महत्ता आची.
- 15:18–15:32आप ज़ा ब बवावी सब किच रहीत तद वेद मन्त्र चंदबद किएक लिखल गल, किएक उक्रा एक ता विषिच्त स्वर में गाबल जाएत ची, कारनचे नियमा लेए रच्ना के कालजेई बनावेत ची, उस्म्रिति में बैइश जातची.
- 15:32–15:35अम आहा के अटियासिक परप्रेक्षिक सम्मान कर अची
- 15:35–15:39वेदक मन्त्र निश्छित रूप से चन्दक उत्क्रिष्ट उदारन अची
- 15:39–15:41मुदवर्तमान यधार्त किचु अवर अची
- 15:41–15:43ग्रन्त मे बेटी बनली पहाड
- 15:43–15:46वा सिमान्तिक्रत संगरस पर लिखल कविता सब का उदारन दिल गे लाची.
- 15:46–15:49रा नव विमर्षक कविता सब.
- 15:49–15:53इग कविता सब मागस्वादी वा नारीवादी पात में अट्ट्द्द उद्क्रिस्ट मान लिए लाची.
- 15:53–15:56कि एक कि अपन पास थ पाज के निमक कारन,
- 15:56–15:58वाखी कोनो विषिष्ट अरकान किर कारन? नहीं
- 15:58–15:59तक्का कर कारन
- 15:59–16:01बलकी अपन टीक्षना
- 16:01–16:02आवाम चेतना
- 16:02–16:04आस्विथ समभावना किर कारन
- 16:04–16:06हमर तरक यह जी
- 16:06–16:07जे लोकि कनुबूती
- 16:07–16:09जो चंदक पाबंदी में फसी जाएत
- 16:09–16:11तो पलायन वादी भोजाएत
- 16:11–16:15पलायन्वादी कोना बहुजाएत, नियम तोखरा मजबूती देतची
- 16:15–16:23उ एह लेल पलायन्वादी भहुजात कियक, तक कवी आपन मूल विषे सद्यान हताक, केवर शब्दक गनित मिलावा में लागे जात,
- 16:23–16:29वन्चितक संगर्ष, गरीभी, अख्रान्तिक अवासके नियमक सिक्री में बन्धल नहीं जासके तची.
- 16:29–16:30मदख क्रान्तिक...
- 16:30–16:37इक इक इक ता मस्दूरक पसीना के रमल, वाहजज बहरक मात्रा सन नहीं तोलल जासके तची.
- 16:37–16:43जखन उ मज्दूरक दर्द के स्फोथ होई तची, तो व्याक्रनेग दिवाल तोडिक बाहर अबेत आची.
- 16:43–16:49आजे आहा उक्रा दिवाल में बान्दबाक प्रयास करब, तो दर्द नकली या आप्टिफिश्यल लागे लागे ता.
- 16:49–17:05देवालक बिना गरक कल्पना केल जासकी तची आहा दर्द के बहर आबे दियो मुदोकर एक ता अकारत देवेत परतना, स्वोट सिद्धन तक आहा जे बात करहे ची उ यतार थचे जे भर्त्रिहरी अर्खक्त प्रस्पूटन के महतृपून माने चती.
- 17:05–17:06आह, उ माने चती.
- 17:06–17:36मुदा उहु मानेच चती, जे वरन अपत सबहक लग लग तरी पूछे तची, अथा तचन्रचनात उतो हुविद्य मानेच छी, भरत्रि हरी व्याकरन के दरशन मानेच चती, उक्रा सब भागेत नही चती, मैतली समएक्षा सास्त्र इस्पष्ट करे तची, जे मैतली भासाग
- 17:36–17:46जखन मैठली में अंछिनार अखिरते प्रभाँसां शुद्धबार में गजल लिखखल जाए लागल, तवूक्रा प्रभाँ कते गुवेशी तिख्षन अगंभीर भेल.
- 17:46–17:55अहां क्रान्तिक बात करे ची मुदा इतिहाँ साक्षी अचे जे उतक्रिष्ट क्रान्तिकारी साहिते से हो कडा अनुशासनक उपज रहल अचे.
- 17:55–17:59जेना की चाहे उ फैजेहमत फैस के गजल हो,
- 17:59–18:01वा कोनो अनने क्रान्तिकारी कविक्रच्ना,
- 18:01–18:05उ नियम कभित्तर रही का ही नियम परप्रहार करे तची.
- 18:05–18:08बिना लाय औनियमक, क्रान्तिक आवास
- 18:08–18:10केवल कोलाहल बनी कर रही जाए तची.
- 18:10–18:15खोलाहल अग्रान्ती में अंतर अच्छी यी हम पुरनता हमानेच्छी
- 18:15–18:19मुदा क्रान्ती के दर्बार के दर्बारी गायन नहीं बनायल जासकएद
- 18:19–18:22मैठली समिक्षा सास्त्रमे जटैई चंदक चर्चा आच्छी
- 18:22–18:27उते उत्तर आदुनिक्ता वा पोस्ट मोडनिजम अविखन्दन वादक से हो
- 18:27–18:30नव समिक्षा दिस्टिक रूप में अस्तापेत कल गिला जी.
- 18:30–18:35तग्रन्त एहो संकेट देई तख्छी जे अवाम चेतना कवीता जकन
- 18:35–18:37च्चन्द मुक्त भाईकल लिखल जाईताची
- 18:37–18:40ता उस शीदे पाथक विर्दे साजुरईताची
- 18:40–18:42च्चन्दक अगरा कच्नो कच्नो
- 18:42–18:44एतेक हावी भाईजाईताची
- 18:44–18:47च्वि आपन मुल वक्तवेसा बद्की जाईताची
- 18:47–18:49मात्र काफिया रदीप मिलानक चक्कर में
- 18:49–18:52एक कविक कम्зोरी भहसकटची तची विदाक नहीं
- 18:52–18:54आहा स्वेम सोचुं
- 18:54–18:55जखन कोनो कविके
- 18:55–18:58पूंजीवादक विरोद में गजल लिखवाग अची
- 18:58–19:00मुदा उकर द्यान इखोजब में नागल अची
- 19:00–19:02जे अन्तिम शब्द अची के संग
- 19:02–19:04गछ्छी वा मच्छी को ना मिलाल जाए,
- 19:04–19:07तकी उकर विमर्स हलका नहीं बहाँ जाए तची.
- 19:07–19:09आचेत गछ्छी वा मच्छी.
- 19:09–19:11की आहाके नहीं लगे तची,
- 19:11–19:13जे एक्ता क्रित्रिम बहर के आग्रह,
- 19:13–19:15कवी के यतारत सदूर के,
- 19:15–19:17इक ता बवद्धिक व्याम्दिस दखे लिट देईताई तखी.
- 19:17–19:22दिक हु, बवद्धिक व्याम आख कलात्मक कोशल में अंतर अच्छी,
- 19:22–19:26कलात्मक कोशल कवी के उतक्क्रिष्ट बनावे तची,
- 19:26–19:29जग काफिया मिलायाब इते एक सहज रहीत,
- 19:29–19:33तद सव कियो गालिब वा विद्ध्यापती बनीजाईत बुजलो.
- 19:33–19:34आँ यी तच्छी.
- 19:34–19:39हमी माने च्छी, जि साहित में विद्रोही स्वर आन नव विमर्ष आवश्षक अची,
- 19:39–19:42आँ समाज के एक ता नव दिशा देई तच्छी.
- 19:42–19:46मुदा इविमर्ष जखन गजल वा हैकु जखा विषिष्ट विद्हा मे आवे,
- 19:46–19:52तो उक्रा औही विद्हाक सन्रषनात्मक, अर्ठात बहर आमात्रा के सम्मान करवाक चाही.
- 19:52–19:55मुदा जा सम्मान करवा मे भाँ मरी जाए तक?
- 19:55–20:08जा आहा के नियम तोडवा कची, जा आहा के केवल पूंजीवादक विरोद करवा कची, मुदा नियम अक संग नही, ता आहा नववविधाक आविष्कार करू, गद्दे कविता लिखू, मुदा गजलक नाम पर गजलक आत्मा के निमारू.
- 20:08–20:12ये अग ता नीक बात थची
- 20:12–20:16मैठिली समिक्षा शास्त्र, पारम परागत छन्द शास्त्र
- 20:16–20:20और आदूनिक पास्चात्य, ये वंभारतिय दर्षनक
- 20:20–20:23यक तजटिल संगम अची
- 20:23–20:26इग ग्रन्त श्पष्ट करे थची
- 20:26–20:29जे नियम वद्ध्धा और आदूनिक विमर्ष
- 20:29–20:59आजा आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ
- 20:59–21:29यताश्व यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश
- 21:29–21:33बादिक, त्रास्ती, वा आदूनिक विसंगती के
- 21:33–21:35हाईकु वा गजल में डालैत छी,
- 21:35–21:38तव उ जापानी वा अरभी साचा में
- 21:38–21:40मैत्लिक, मातिक, सुगन्द भरी रहाल होईताची
- 21:40–21:42आओ सुगन्द महत्व पूरनाची
- 21:42–21:46औँ सुगन्द व्याक्रन के गडइत से बेशी महत्व पूरनाची
- 21:46–21:50साहित या अंतता हिर्दैद हरी पूवच्बाक ले लिखल जाईताची
- 21:50–21:54मात्र समिक्षाक पोठी में सही साभीत होईबाक लेल नहीं
- 21:54–21:55सत्या चे
- 21:55–22:02हमर आ आँाई की बाहस वस्तुता मैत्ली समिक्षाशास्त्र के उहे विशाल परप्रेखषे के देखा रहल आची
- 22:02–22:06जटे एक दिस पिंगल आच्चन्दक कथोर विग्यान आची
- 22:06–22:10तो तो सर्दिस उत्तर आदूनिक्ता आमाक्स्वात के उन्मुक्त यतार्त्
- 22:10–22:14तुनू पक्ष के आपन-पन गामभीर्य आतर्क आची
- 22:14–22:16तुनू आवश्षक आची
- 22:16–22:19समवेदना आची, जे साहित्ते कलेल आपरिहारिया ची
- 22:19–22:24मुदा हम एद निरने आपन प्रबददष्वोटा पर चूडेएची,
- 22:24–22:30जे उसाहित में व्याक्रनक उही गनी तक के भीसी महत्वोपुन मानेच्छती,
- 22:30–22:32जे विद्धाके कालो तीरन बनावेटची,
- 22:32–22:40वा बहावनाक उही प्रवाहक के जे प्ततकालेक यतार्त के स्फोट जका सामने लावे तच्छी
- 22:40–22:51इग्रन्त गजिन्द्र ताकुरक, मेत्हली समिक्षास्शास्त्र, अद्यान के लेल एक्ता विशाल च्यत्र है ची, जदे दुनूके एक संवज्बाक प्रयास कोईल येला चे.
- 22:51–22:53एक्दम सत्या
- 22:53–22:56जगन हम सब आई यी विमर्ष आरंब केने रहे
- 22:56–22:58ता हम सब नदी आननहरक उपमा देने रही
- 22:58–23:00आहक तरक सुनी कल लगगत आफ़ी
- 23:00–23:03जे शाएद नीक साइथ्ते ओव आची
- 23:03–23:05जक नदीक वेग से हो अक्षुन रहे
- 23:05–23:06आननहरक तटबंद से हो
- 23:06–23:08अखरा एक ता सहिद दिशाद पावे
- 23:08–23:10एक दम सतीक
- 23:10–23:12नियम अ विद्रोग कर इशन्तुलन ही
- 23:12–23:14सहिट्तिक महान बनावे तची
- 23:14–23:16मुदा इखवजतेक सहज जची
- 23:16–23:18सहिट्तिक दरातर पर
- 23:18–23:20एक रा उतारव उत्बे कटिन
- 23:20–23:22हम्रा इमाना में कुनु संकोछ नहीं
- 23:22–23:27जे आजाक मत्रिक अनुशाशन्वलात्तर्क साहित्ते के एक देगरी माप्रदान करे ताची
- 23:27–23:33आव उही कठेन संधर्श में साहित्ते का वास्तविक सुन्दरे नुकायल आचे
- 23:33–23:39जगनो बाड़ का उफनेद नदीक पानी नहर का कंक्क्रीट देवालस्ता कराई ताचे
- 23:39–23:41अजे उर्जा उत्पन हुएतचे
- 23:41–23:45से हुर्जा मेठली समिक्षा शास्त्र का किंद्र में आई ची
- 23:46–23:51आहा नदी के प्रात्मिक्ता दियव या नहर के मुदसत इए ची
- 23:51–23:54जे प्रकाश दूनुके संगर सही उत्पन नहोगी तची
- 23:54–24:00श्रूताव्रिंद इप्रकाश आहाक कविचार में कुना प्रज्वलित होई तची इआहापर निरभर अची.
- 24:00–24:04विमर्शक इएट्रा एखे समाप्त नहीं होई तची,
- 24:04–24:08बलके आहाक मन में अक्ता नव प्रष्नक कसंग आरमभ होई तची.
- 24:08–24:11हमरा सब संजुडवा कलेल बहुत-बहुत द्धन्निवाद
Plain text
विमर्शक य मंच देबेट में आग्स्वागत आचे आई हम सब कल्पना करल च्ये एक ता उपनैत मौन्सूनी कोसी नदिक एक ता एंजिन्यरक लेल उई नदिक बादक पानी मात्र एक ता अनियंट्रत अराजकता आचे इक दम जावद्धरी उक्रा कोनो कंक्रीत तदबंद मे नहीं बानल जाए. आ, तीखवे ना. जावद्धरी उक्रा एक ता ज्यामेती ए रुपसा सती का कत्फोर नहर मे नहीं बानल जाए. जगन उ पानी नियम असन्रजना के मानेत तर्बाईनस सगुदरे दच, तकने उ प्रकाश अ उर्जा उत्पन न करे दच, भूज्लू शाहित दे में से हो च्यंद अव्याक्रन उही तर्बाईनस काछ करे दच. मुदा दिखु, हम एकरा दसर दिससद दिखाएची. उही किसान कलेल जकर खेट सुखल अची. वा, माने, उही लोका कलेल जकर गर बादी में भस्यार हल अची. नदी कोनो एंजिनेरिंके समस्या वग गनी तिय समेगर न नहीं थिक. ता आहा के द्रिष्टी विन्दुसो उकी थेख. इक ता आदिम शक्ती आची. पानिक आस्ली महत्ता उकर उन्मुक्त यतार्ठ अव वेग में आची. उही कंक्रीट के देवाल में नहीं जे उकर बानवावा के लेल बनाल गेल आची. जखन पानी देवाल तूरी कबाहर वगट आईत ची, तकने वोकर आस्ली यतार ज्फार्ट सामने ववगट ची. तु सन्रच्नाक अनुशासन आर भावनाक उन्मुक्त प्रवाह की भीचक इजे अंतर ध्वन्ववची, उत्ते सां हमर आएदारिक इवमर्ष प्रारम ब होईत छे आए हम सब गजेंद्र ठाकृ रचित मेठली समिक्षा शास्ट्रपर आदारित एक तक गंभीर मुदा प्रासंगेक विषेपर चर्चा करो हल छी जे मैठली साहित्यक आलोचनात्मक सिद्धान्त आर विद्धागत रूपान्त्रन्ट पर किन्ध्रित अचे. ये खडम हमर भहसत मुख्य प्रष्न इय जे आदूनिक मेठली कविता विषेशकर आयातित विदा जिना गजल आर हाएकू में की चन्द आर भहरक कदोर सन्रचनात्मक निम पालन भेसी आवशक ची वा भाव रस आसमकालीन समाजेक राजनेतिक यदार्त जिना माख्सवादि उगर बीना रच्ना आपन मुल पह्चान गूमा देताचे. आः, हमर इमान बच्छे, जे यद्यपी शन्रच्ना महध्तोपूर नाची, मुदा कोन रच्नाक अस्ली शक्ती, उकर भाशिक स्फोट, रसानु भूती, उकर बाशिक स्वोट रसानु भूति आ उत्र सन्रच्ना वादि येवं सामाजिक यतार्ठ में नहीं तचे. जेना सीमान्त्रिक्रुतक संगर्ष इसप प्राया कत्होर नियम से मुक्त बहुकः बेशी मुखर होई तचे. माने नियम रानिकारक बहुजाई तची? माने, नीम रानिकारक बाजाई तची देखो, नीम एक ता सीमादरी तीक अच्छे मुदा जक्छन अ बावके कुट भीलाईजका बाशद दे तकन हा उ रानिकारक बाजाई तची औ, हम भूजे राल ची जे आहा आन के ख सोचे राल ची मुदा हमरा एक ता भिन्न द्रुष्टिकोन राइक हन देवू मैठिले समिक्षा शास्ट्र स्पष्ट रूप से गजल कलेल बहर अर्ठात च्चन्द आ अर्कान अर्ठात मात्रा विदान की अनिवारिता पर विषेश बल देई ताछे मुदा की एक मिनेट जे स्रोता गजल तकनीक शब्द से परिछित नहे चती हुनकलेल हम तनिक सपष्ट कर दी गजल में एक तनिष्चित सांगीतिक लैय होगे तच्छे जक्रा बहर कहल जायत ची आश्वद के उही लैय में फिट कर वाके गनित के अरकान कहे चती आई तव्याक्रनिक परिवाशा भेल इग्रन्त स्पष्ट करे तच्छि जे बिना बहरक गजल मात्र गजल सन कविता भगगर रही जाए तच्छि मेठली में जी आजाद गजल या बे बहर गजल्क जे एक तब्रामक परमपरा आईल उक्रा इस समिक्षा शास्त्र तारकिक रूप से खंडित करे थाची. मुदा केवल गजल नहीं हैएकूकलेल से हो. एक दम हैएकूकलेल पाच सात पाच अख्षर वासे लिबल केर वारनिक चंदक कर कड़ाई सवकालत के लेचे. रुका रुका. हमहा के दे तोकब इपाच सात पाचकर नियम जहां हैकु कलेल कहर राल ची वोकर वास्तविक्ता की अचे की मेठली में अईना काचकर तची जेना जापानी में वास्तविक्ता इचे जे एकर एक ता वेग्यानिक कारन अचे मैंई, देवनागरी आ मेतलिक ध्हनिक शुद्धा, मेतली में लिखल जाईता ची, सई भाजल जाईता ची. जिना, जगम हैखोग पहल पाती में लिखव, बाडही कब पानी तई पाच अख्षर भेल. आख्षर तई पाच पेल. तजापानी विद्धा जखन मेठली मेवाई तची तवोकडधधाचा के मेठलीक दोनिक संग सामनजस सबैसावे परएचे. एही लिल व्याक्रनिक आज्चन्द शास्त्री अनुशासन विषेश कध रस्वदीर गख सतीक प्रेोग कोनो से हो विदा का प्रान थिक. प्राड ये तब बहुत पएख दवाज ही इक्दम प्राड थेख, बिना एकर रचना आपन रूप और आत्मा दूनू गूमा देतची अंचिनार अखर जका सहितिक मंज, जे मैठ्ली गजल में बहरक प्रयोग अनिवार्य की लक, उकर सुपर नाम इभेल, जे आदिनिग गजल कार सब निंआमबद गजल लिख्जल लगला विदाक शुद्दता बचल रहेल. दिखु, इएक ता गंभीर तर कच्छे, आ अईचिन हार अख्चर किर योग्दान के हम नकारी नहीं रहो लग ची. मुदा, मावकरव, हम एबात पूड़्त मानबाकले तटयार नहीं ची, ज़ व्याक्रनक कथोरता ही विद्हाक आत्मा थिक. ता अहाक द्रिष्टी बिन्दुसा विद्हाक आत्मा की थिक. अद्रात्मा की थिख? हमर तर की आची, जे आलोचना शास्त्र मात्र व्याक्रनक के गनित नहीं थिख. गरन्त में स्वेम माक्स वाद, फेमिनिनिसम, वाननारी वाद, उतर आदूनिक्तावाद, आज्जाग देरिदा के विक्हन्दन्वाद के विस्त्रिच चर्चा आची आज्जाग देरिदा के विक्हन्दन्वाद के विस्त्रिच चर्चा आची आज्जाग चर्चा आची तई यसब सिद्धान्त की कोई तची इसब सिद्धान्त बाशा आ आर्थ के तरलता पर बल देतची विक्हन्दन्वाद आर्थात दीकन्स्ट्ट्चन की कोहेतची इग कोहेतची जे कोनो पात वर टेक्स्ट केर एक ता निस्चित पातर पर लिखल आर्थ नहीं होएतची आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� बारतिय स्पोट सिद्धान्त के चर्चा करोत ची जे भरत्री हरी दुरा देल गेल ची आँ, स्पोट सिद्धान्त बड रोचक अची जे श्रोता इस सिद्धान्त पहिल बार सूनी रहल चाती उनका बुजे वाक लेल हम एक रा एक ता उदाहरन से कही ची सबोट मने हुई तची पुटनायवा प्रस्पूटी तोईब जना एक तपपका पुटेट ची जना दी पावली में इक दम जखन आहाकोनो कवीटा सूनाई ची ता आहाक मस्तिषक एक अक्षर वा मात्रा के जोड का अर्ठ ने निकाले तची अगर अगाक मन में एक एसंव श्फोट जगा प्रस्पूटित होई तची साहित्ते में सिमान्ती क्रित का संगर्ष, बाडेक विखिषिका, वेवस्ताक विद्रुप्ता दे खायब इसब सन्रचनात्मक नियम सब कतो बेशी महत्वा पुरनाची मुदा इसद्ता गद्दमे से हो दे खाल जासके तचिना? मुदा कविताक प्रभाब भेसी होई तची. साहिट्ते गनी तक सुत्र नहीं मानब अनुबुतिक दर्पंठेक. जगन एक ता कवि बाडक त्रासद दर्द लिखि रहल अची, तकन उ पाज सात पाज मात्रागिनत वा आपन दर्द की स्फोटक रूप में बहर आनत. आहा के एबिन्दू, जि साहित्य मानव अनुबूते एक दर्पन ठेक इक्ऩे नीक छे. मुड़ा देखो, दर्पना कलेल सो, सीसाक, इक ता निष्षत अकार, मुताई आप पालश आवश्षक होई थेख पालश? आआ, नहीं ता प्रतिवम् विक्रत बहजाई तची सरकस कदरपन मे देखाल अनोहार किहन लागे तची औआँ आँा के भुजले आची आँँ श्पोट के बात के लों मुदा उस्पोट से होता शब्दक माद्ध्यम से ही होई तची आश्व्दक अनुशासन व्याक्रन से अवे तची ता की व्याक्रन बिना अर्थ नहीं निकली सके तची हम आहा से एक ता सीथा प्रष्न करे ची जगजल मे रदीप, काफिया, अब हर जना रमल, वहाजजगगगगगगगगगगगनीत्यन्याम निकाल दिल जाए, तक उविद्धा अपन आरभी फार्सी वबहार्तिय सांगीतिक मुल से पूनता कट नहीं जायत. मने, आहा कही रहल ची जे उगजल रहभे नहीं करत. अद्थात तुक्बन्दी गजल के गजल बनावे तची यी हम माने तची मुदा आहा रमल आहाजज बहरक जे बात का रहल ची उ आरभी फारसी भाशाक दून्यात्मक प्रक्रती के आदार पर बनल आची तकी भेल की आहा विचार केने ची, जे मैठली क आपन एक ता विषिछ्ट उच्चारन साईली आची? कोना? की मैठली गजल उई बहर में नहीं लिखल जासके तचे? हमर ता इ मानब अची जे कुब नीक से लिखल जासके तचे? लिखल जा सकेत अची, मुदा अकर एक ता की मच चुका वेप अची? उदारनाक लेल, मैठली में शब्द कुछारनक अपन मिट्हास अची, जना अच्छीकर उच्छारन, हम सब अ एच्छ़ जगा करे ची वा रातीकर उच्छारन राइत करे ची तीन स्वर आई तव अच्छे, हम सव स्वर के ताने देची एक दम, उड़ू वा अरभी में रात मात्रे एक या दू मात्राक शव्द अच्छद अई मुदा मैठली में, रा एप एक्ता प्रलंबिद दूनी आचाई. एप दूनियात्मक विषेष्ता मैठली के अरभी पारसी वा उर्दूजका पुन्तबिन करे तची. आब आख बहर के नियम कहे तची, जहांके अरभी चन्दक फिसाँप से मात्रा रखबा कची. जी आवश्ख अची विद्धाक लेल इत उईना भेल जे एक ता चोखुट खृता के गोल भिद्टी में जबर्दस्ती तोकल जाए, जाए एक ता विदिषी साचा में में प्रद्टी जबर्दस्ती कोचल जाए, ता आदे शब्दक किनारे के काटे परत आ उईप प्रक्रिया में में में वेठलिक सुआभाविक सुगन्द हे राया जाएत औग, इच्छो खुट खुन्ता अग ओल भिट्टी वाला उपमा बहुर उचक आची सत्तिया ची, लेक्हक स्वैं भार्त्य सावन्दरे शास्त्र अभभरत्मूनिक रस्सिद्धान्त कर चर्चा किने चाती. रस्सिद्धान्त के अनुसार, जटे इस्थाई भावक रस्रुप में परनत होए प्मुख्या ची, उते बहर्के गनिद गोन बजायत ची. अस्ली गजल उआची जे स्रोटा क्हिदा में रस उपन्न करेद हम इ मानेच छी चे रस महतुपूर्न आचे मुदा हमेक्रा दूसर रूप में देखाची साचा विदेशी बह सकेचे मुदा जकन आहां कोन विदा के आयाथ करेची ता आहा के उकर अत्मक सम्मान करे परे चे. मुदा आत्मा बाव अची, नियम नहीं. नहीं नहीं, जो आहा टेनिस खेल रहल ची, ता आहा ई नहीं नहीं कहा सके ची, जहामर कोट गोल आचे, ता हम क्रिकित का बेट से खेलब, मेतली समिक्षा शास्त्र मैं, सन्रच्नावाद, अद्धात, स्ट्रक्ष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्� उगवी के यान्त्रिक ने बना देताची एक ता मशीन जगा. एक दम नहीं. बलकी अनुशासन हीनता के लेक्हक अस्पष्ट रूब से सुखायल मुख्य दारा कही आलोचना के ने चतें. एक अनुशासन हीनता कवी रख के आल्ट्सी बना देताची. जगन नियमे रहता थी, तखशन कभी आपन रचनात्मकता के चरम पर पहुचाई तखशी. माने आपन ख़ी रहाल ची, जे चुनोती से रचना निक्रे था ची? आपन उशब्द खोजाई तखची, बाशा कशीमा के विस्तार दई तखची, ताकि उ नियमक परिदि में रही का बहेतरीं भाव्ड़ कर सके शीमा से ही स्रिजनक चुनोति उत्पन होई ता ची हम आगा का अनुसासन वाला बात भूजी रहल ची और इस सत्या ची जे नियम एक ता शीमा दरी कवी के निखार अइ ता ची मुदा एताई हमेक्ता बलगर प्रतिवाद करेची. की? लेखाक केवल सन्रचनावाद पर नहीं रूकाईच्छतिन. उ पाट्खा भिखंदन वादी और अतिहासिक विसलेशन कर स्यो वकालत करेच्छतिन. जखन नाम रोलाम बार्द कर सिद्धान्त लेखकक म्रिट्तिव अथात देखफ दाद्धार केर बाद कर इची तक्ञन की होई तच्छे? आहा अस्पष्ट करो लेखकक म्रिट्तिव कर अर्थ यह नहीं जे लेखकक प्रान निक्लीगेल उगर आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� साहित्तिक इगाज अचे? तो उई समे में कि उपात्त्तक इगणडद, जे कविता में हरस्वा अदिर्ग के मात्रा सही अचे वा नहीं, कि उपाज सात पाच के सिलेबल गणडद, नहीं. मुदा? तक्हन, संग्रचनात्मक छंद्शास्त्र्यनियम एक ता ज़द बादा नहीं भोजाई तच्छी. जक्हन, नियम भाओ के प्रतिबंदित करे लागे, वा यत्हार्ठ के विक्त करवा में बादध बने, तक्हन, उ नियम सहित्यक लेल हानिकारक भोजाई तच्छी. मारक्स्वादी समिक्षा द्र्ष्टी इगगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेईईईईई उप्रभाव उभी लए उछन्द उभी नियम साभई तची, वो बवर जगा का साचा में दलए तखने उ उतक्रिष्ट पद्ध बने तखने कीवक, मुक्त चन्द में कीवक नहीं। की यहां के लएगत अची जे जे यहां बात करो हो लगजी यो गद्ध्यमे नहीं कहल जासके तची अगर विलास एह लेल कही रहाल चीयकता हम्रा बज्बाग दियो कविताक तुकान्ता चंद अखर अगर अगगद्द्देसा अलग करे तची इखोनो आए का लिएक बात नहीं फिक, वेद की समह सदेख हूँ अगर विलास एह लेल कही रहाल ची, कियकत, हम्रा बज्बाग दियो, कविताक तुकानता च्शन्द, अखर अखर विलास अगर गद्द्दिसा �alag kare tachi, इखोनो आए का लिक बात नहीं फिक, वेद की समैसा देखु, वेदिक च्चन्द जना गायत्री अट्रिष्टूप के रूदारन देद ग्रन्त इस्पष्ट करे तची, जे नियम तो वेदक समेंसा जी. वेदिक च्चन्द क अपन महत्ता आची. आप ज़ा ब बवावी सब किच रहीत तद वेद मन्त्र चंदबद किएक लिखल गल, किएक उक्रा एक ता विषिच्त स्वर में गाबल जाएत ची, कारनचे नियमा लेए रच्ना के कालजेई बनावेत ची, उस्म्रिति में बैइश जातची. अम आहा के अटियासिक परप्रेक्षिक सम्मान कर अची वेदक मन्त्र निश्छित रूप से चन्दक उत्क्रिष्ट उदारन अची मुदवर्तमान यधार्त किचु अवर अची ग्रन्त मे बेटी बनली पहाड वा सिमान्तिक्रत संगरस पर लिखल कविता सब का उदारन दिल गे लाची. रा नव विमर्षक कविता सब. इग कविता सब मागस्वादी वा नारीवादी पात में अट्ट्द्द उद्क्रिस्ट मान लिए लाची. कि एक कि अपन पास थ पाज के निमक कारन, वाखी कोनो विषिष्ट अरकान किर कारन? नहीं तक्का कर कारन बलकी अपन टीक्षना आवाम चेतना आस्विथ समभावना किर कारन हमर तरक यह जी जे लोकि कनुबूती जो चंदक पाबंदी में फसी जाएत तो पलायन वादी भोजाएत पलायन्वादी कोना बहुजाएत, नियम तोखरा मजबूती देतची उ एह लेल पलायन्वादी भहुजात कियक, तक कवी आपन मूल विषे सद्यान हताक, केवर शब्दक गनित मिलावा में लागे जात, वन्चितक संगर्ष, गरीभी, अख्रान्तिक अवासके नियमक सिक्री में बन्धल नहीं जासके तची. मदख क्रान्तिक... इक इक इक ता मस्दूरक पसीना के रमल, वाहजज बहरक मात्रा सन नहीं तोलल जासके तची. जखन उ मज्दूरक दर्द के स्फोथ होई तची, तो व्याक्रनेग दिवाल तोडिक बाहर अबेत आची. आजे आहा उक्रा दिवाल में बान्दबाक प्रयास करब, तो दर्द नकली या आप्टिफिश्यल लागे लागे ता. देवालक बिना गरक कल्पना केल जासकी तची आहा दर्द के बहर आबे दियो मुदोकर एक ता अकारत देवेत परतना, स्वोट सिद्धन तक आहा जे बात करहे ची उ यतार थचे जे भर्त्रिहरी अर्खक्त प्रस्पूटन के महतृपून माने चती. आह, उ माने चती. मुदा उहु मानेच चती, जे वरन अपत सबहक लग लग तरी पूछे तची, अथा तचन्रचनात उतो हुविद्य मानेच छी, भरत्रि हरी व्याकरन के दरशन मानेच चती, उक्रा सब भागेत नही चती, मैतली समएक्षा सास्त्र इस्पष्ट करे तची, जे मैतली भासाग जखन मैठली में अंछिनार अखिरते प्रभाँसां शुद्धबार में गजल लिखखल जाए लागल, तवूक्रा प्रभाँ कते गुवेशी तिख्षन अगंभीर भेल. अहां क्रान्तिक बात करे ची मुदा इतिहाँ साक्षी अचे जे उतक्रिष्ट क्रान्तिकारी साहिते से हो कडा अनुशासनक उपज रहल अचे. जेना की चाहे उ फैजेहमत फैस के गजल हो, वा कोनो अनने क्रान्तिकारी कविक्रच्ना, उ नियम कभित्तर रही का ही नियम परप्रहार करे तची. बिना लाय औनियमक, क्रान्तिक आवास केवल कोलाहल बनी कर रही जाए तची. खोलाहल अग्रान्ती में अंतर अच्छी यी हम पुरनता हमानेच्छी मुदा क्रान्ती के दर्बार के दर्बारी गायन नहीं बनायल जासकएद मैठली समिक्षा सास्त्रमे जटैई चंदक चर्चा आच्छी उते उत्तर आदुनिक्ता वा पोस्ट मोडनिजम अविखन्दन वादक से हो नव समिक्षा दिस्टिक रूप में अस्तापेत कल गिला जी. तग्रन्त एहो संकेट देई तख्छी जे अवाम चेतना कवीता जकन च्चन्द मुक्त भाईकल लिखल जाईताची ता उस शीदे पाथक विर्दे साजुरईताची च्चन्दक अगरा कच्नो कच्नो एतेक हावी भाईजाईताची च्वि आपन मुल वक्तवेसा बद्की जाईताची मात्र काफिया रदीप मिलानक चक्कर में एक कविक कम्зोरी भहसकटची तची विदाक नहीं आहा स्वेम सोचुं जखन कोनो कविके पूंजीवादक विरोद में गजल लिखवाग अची मुदा उकर द्यान इखोजब में नागल अची जे अन्तिम शब्द अची के संग गछ्छी वा मच्छी को ना मिलाल जाए, तकी उकर विमर्स हलका नहीं बहाँ जाए तची. आचेत गछ्छी वा मच्छी. की आहाके नहीं लगे तची, जे एक्ता क्रित्रिम बहर के आग्रह, कवी के यतारत सदूर के, इक ता बवद्धिक व्याम्दिस दखे लिट देईताई तखी. दिक हु, बवद्धिक व्याम आख कलात्मक कोशल में अंतर अच्छी, कलात्मक कोशल कवी के उतक्क्रिष्ट बनावे तची, जग काफिया मिलायाब इते एक सहज रहीत, तद सव कियो गालिब वा विद्ध्यापती बनीजाईत बुजलो. आँ यी तच्छी. हमी माने च्छी, जि साहित में विद्रोही स्वर आन नव विमर्ष आवश्षक अची, आँ समाज के एक ता नव दिशा देई तच्छी. मुदा इविमर्ष जखन गजल वा हैकु जखा विषिष्ट विद्हा मे आवे, तो उक्रा औही विद्हाक सन्रषनात्मक, अर्ठात बहर आमात्रा के सम्मान करवाक चाही. मुदा जा सम्मान करवा मे भाँ मरी जाए तक? जा आहा के नियम तोडवा कची, जा आहा के केवल पूंजीवादक विरोद करवा कची, मुदा नियम अक संग नही, ता आहा नववविधाक आविष्कार करू, गद्दे कविता लिखू, मुदा गजलक नाम पर गजलक आत्मा के निमारू. ये अग ता नीक बात थची मैठिली समिक्षा शास्त्र, पारम परागत छन्द शास्त्र और आदूनिक पास्चात्य, ये वंभारतिय दर्षनक यक तजटिल संगम अची इग ग्रन्त श्पष्ट करे थची जे नियम वद्ध्धा और आदूनिक विमर्ष आजा आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ यताश्व यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश्व आप यताश बादिक, त्रास्ती, वा आदूनिक विसंगती के हाईकु वा गजल में डालैत छी, तव उ जापानी वा अरभी साचा में मैत्लिक, मातिक, सुगन्द भरी रहाल होईताची आओ सुगन्द महत्व पूरनाची औँ सुगन्द व्याक्रन के गडइत से बेशी महत्व पूरनाची साहित या अंतता हिर्दैद हरी पूवच्बाक ले लिखल जाईताची मात्र समिक्षाक पोठी में सही साभीत होईबाक लेल नहीं सत्या चे हमर आ आँाई की बाहस वस्तुता मैत्ली समिक्षाशास्त्र के उहे विशाल परप्रेखषे के देखा रहल आची जटे एक दिस पिंगल आच्चन्दक कथोर विग्यान आची तो तो सर्दिस उत्तर आदूनिक्ता आमाक्स्वात के उन्मुक्त यतार्त् तुनू पक्ष के आपन-पन गामभीर्य आतर्क आची तुनू आवश्षक आची समवेदना आची, जे साहित्ते कलेल आपरिहारिया ची मुदा हम एद निरने आपन प्रबददष्वोटा पर चूडेएची, जे उसाहित में व्याक्रनक उही गनी तक के भीसी महत्वोपुन मानेच्छती, जे विद्धाके कालो तीरन बनावेटची, वा बहावनाक उही प्रवाहक के जे प्ततकालेक यतार्त के स्फोट जका सामने लावे तच्छी इग्रन्त गजिन्द्र ताकुरक, मेत्हली समिक्षास्शास्त्र, अद्यान के लेल एक्ता विशाल च्यत्र है ची, जदे दुनूके एक संवज्बाक प्रयास कोईल येला चे. एक्दम सत्या जगन हम सब आई यी विमर्ष आरंब केने रहे ता हम सब नदी आननहरक उपमा देने रही आहक तरक सुनी कल लगगत आफ़ी जे शाएद नीक साइथ्ते ओव आची जक नदीक वेग से हो अक्षुन रहे आननहरक तटबंद से हो अखरा एक ता सहिद दिशाद पावे एक दम सतीक नियम अ विद्रोग कर इशन्तुलन ही सहिट्तिक महान बनावे तची मुदा इखवजतेक सहज जची सहिट्तिक दरातर पर एक रा उतारव उत्बे कटिन हम्रा इमाना में कुनु संकोछ नहीं जे आजाक मत्रिक अनुशाशन्वलात्तर्क साहित्ते के एक देगरी माप्रदान करे ताची आव उही कठेन संधर्श में साहित्ते का वास्तविक सुन्दरे नुकायल आचे जगनो बाड़ का उफनेद नदीक पानी नहर का कंक्क्रीट देवालस्ता कराई ताचे अजे उर्जा उत्पन हुएतचे से हुर्जा मेठली समिक्षा शास्त्र का किंद्र में आई ची आहा नदी के प्रात्मिक्ता दियव या नहर के मुदसत इए ची जे प्रकाश दूनुके संगर सही उत्पन नहोगी तची श्रूताव्रिंद इप्रकाश आहाक कविचार में कुना प्रज्वलित होई तची इआहापर निरभर अची. विमर्शक इएट्रा एखे समाप्त नहीं होई तची, बलके आहाक मन में अक्ता नव प्रष्नक कसंग आरमभ होई तची. हमरा सब संजुडवा कलेल बहुत-बहुत द्धन्निवाद