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मैथिली_साहित्य_और_रचना_का_विज्ञान.m4a
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- 0:00–0:30अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ�
- 0:30–1:00अगर बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा ब�
- 1:00–1:30सहित्ति की दून्या की एक पुथी गंभीर और मैं कहुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 1:30–1:32किसी को रोना आया उसने कागस पर कुछ लाइने लिग दी
- 1:32–1:34और बस वो कविता बन गे
- 1:34–1:35सही बात है
- 1:35–1:37हमें लगता है की अगर एक इमारत बनानी है
- 1:37–1:40तब तो एक आरकेटेक्ट और भ्लुपन की जुर्वात है
- 1:40–1:43लेकिन साहित्ते में किसी विग्यानिया अंजनेरिं की कोई जगा नहीं है
- 1:43–1:46पर आज हम जिस रोत में गोता लगाने वाले है ना
- 1:46–1:48वो इस पूरी सोच को ज़र से उखार फिखता है
- 1:48–1:50एक दम सही कहा आपने
- 1:50–1:53आज हम गजेंद्र ताकृ दूरा लिखित
- 1:53–1:59और पलडवी प्रकाशन से चफी पुस्तक, मैठली समिक्षा शास्ट्र पर चर्चा कर रहे हैं.
- 1:59–2:03इस पूरी चर्चा का मिशन या उदेश बहुत ही दिल्चास्त है.
- 2:03–2:09ये किताब हमें दिखाती है, कि कैसे मैठली जैसी एक शेत्री यबहाशा,
- 2:09–2:14जब वेश्विक सहिट्यों को अपनाती है, चाहे वो जापानी हाईकू हो,
- 2:14–2:19पश्च्मी देशुं की लगु कताई हो, या अरभी फार्सी की गजल हो,
- 2:19–2:21तो वो उने जीों का त्यों नहीं उठालेती.
- 2:21–2:23मदब कोपी पेस नी करती.
- 2:23–2:29बलक्कि वो उने अपनी भाशाशा के विज्यान में डालती है, उनकि लिए बहुत कडे नियम बनाती है,
- 2:29–2:33और अपना खुद का एक पुरा समीखषा शास्त्र गरती है.
- 2:33–2:35ये वाखए बहुत रोमान चक है.
- 2:35–2:38मडलब ये सर्फ कोई ग्रामर या व्याक्रन की खाश नी है.
- 2:38–2:45ये आसल में ये सीखने का एक शोटकत है कि कोई भी भाशा बहरी विचारों को कैसे भीटर समहत करती है
- 2:45–2:47वो भी आपनी मुल आत्मा को खोई बिना
- 2:47–2:49तो चली ये एसको थोड़क खूलते है
- 2:49–2:52इस यात्रा की शुर्वात सब से चोटी कहानीो से करते हैं
- 2:52–2:57मेरे एक सीदा सा सवाल है, हम आम तोर पर चोटी कहानी उसे मानते है, जो जल्दी कहतम होगा है.
- 2:57–3:00तो किया किसी कहानी को सर्फ उसकी लंबाई से नापा जाते है?
- 3:00–3:07वह यह एक बहुत ही आम गलत फहमी है, और यही पर यह पुस्ता कपना गनिद सामने रकती है.
- 3:07–3:13गजेंद्र ताकृर जीने गद्द्य की लंबाई क्यादार पर एक बहुती सतीग थाचा दिया है.
- 3:13–3:14अचा दाचा कैसा?
- 3:14–3:17उदारन किलिए, मेठली में विहनी कता,
- 3:17–3:20जिसे हम आग्रेजी में फलाष्ट्ष्ट्चन कहते है,
- 3:20–3:23उसकी सीमा केवल 1 से 4 प्रिष्टके भीच तैखी गईगेईईईई
- 3:23–3:25सर्फ एक से 4 प्रिज
- 3:25–3:29जी है, इसके बाद लगु कता दीए, जो 3 से 4 प्रिष्टकी होती है
- 3:29–3:33फिर दीग कता, 15 से 20 प्रिष्टकी
- 3:33–3:37और जो उपन्यास होता है, वो 60 से लेकर 500 प्रिष्टक कहोता है
- 3:37–3:40लिकिन अगर कोई वेहनी कता केवल एक या दो पनने की है
- 3:40–3:43तो उस में कोई लेक हक कितनी ही बात कहलेगा
- 3:43–3:47मिरे मतलब है क्या इतने कम शबडो में कोई गेरा प्रभाव चोडा जा सकता है
- 3:47–3:52और यही पर जेम्स जोइस की मशुर किताब धबलिनर्स का जिक राता है
- 3:52–3:59वेहनी कता की आत्मा सर्फ उसकी कम लंबाई नहीं है, उसका सब से एहम तत्व है, अपीफेनी.
- 3:59–4:04रूकिये, अपीफेनी, इसका क्या मतलवे? क्या ये किसी टरका जादूई चन होता है?
- 4:04–4:09आप इसे एक बोदधिक या बहावनात्मक दमाका कैसकते है?
- 4:09–4:10अपी फेनी का मतलब है.
- 4:10–4:12अचानक से किसी सत्ते का बोद होना.
- 4:12–4:13अचा.
- 4:13–4:16मान लिजे कोई कहानी बहुत ही समाने तरीके से चल रही है.
- 4:16–4:19लेकिन अचानक कहानी के अन्त में,
- 4:19–4:23एक ही पल में, किसी एक वागके से पात्र को,
- 4:23–4:24और पडने वाले को भी.
- 4:24–4:29जीवन के किसी बहुत गेरे सच्च का एक जडके में अहसाज होता है,
- 4:29–4:31जैसे आखों से कोई पट्टी खुल गयो.
- 4:31–4:34अहो! मतलव अगर उस एक से चार पन्ने की कहानी में,
- 4:34–4:36ये एपी फेनी वाला शवन नहीं है तो?
- 4:36–4:38तो वो विजनी कता है ही नहीं.
- 4:38–4:39क्या बाथ है?
- 4:39–4:46अगर अम इसे एक उदानद से समजे, तो किसे अम कै सकते हैं के एक विहनी कता किसी फास्ट फुट शनाक की तरा नहीं हैं,
- 4:46–4:53जिसे बस चलते फिर तेखालिया और भूल गे, बलकी ये एक हाई कोलती एसप्रसो शोट की तरा है,
- 4:53–4:56मात्रा में ये बहुत कम होता है, लेक्हक को बहुत महनत करनी परती है.
- 4:56–4:59किताब में ये चेतावनी भी दीगाई है.
- 4:59–5:00कैसी चेतावनी?
- 5:00–5:05अकसर लेक्हकों के मन में कोई विचार आता है, और उने दर लगता है कि लिए वो ये से बहुल नजाएं.
- 5:05–5:07लेक्हक को बहुत महनत करनी परती है
- 5:07–5:09किताब में खेतावनी भी दीगे है
- 5:09–5:10कैसी खेतावनी
- 5:10–5:12अकसर लेक्हकों के मन में कोई विचार आता है
- 5:13–5:15और उने दर लकता है कि कही वो इसे बहुल न जाएं
- 5:16–5:18तो वे तुरन्त उसे कागस पर उतार देते हैं
- 5:18–5:20लेकिन बिना पकाए
- 5:20–5:23यानी बिना अपने दिमाग में उसे सीजने दिये
- 5:23–5:26उसे तुरन्त विलक्षन कता मान लेना गलत है.
- 5:27–5:29मलड़ उस में कुछ मिसिंग रहे जाता है?
- 5:29–5:31जी. उस में स्थाई तत्व हूना चाहिए.
- 5:31–5:33स्ताई तत्व यानी की
- 5:33–5:35वो कहानी समय के साथ भी प्रसंगिक रहे है.
- 5:35–5:42बिल्कुल, अगर वो स्थाई तत्व नहीं है, तो वो कहानी बस इक चुट्कूला या हास्स्या कनिका बनकर रहे जाती है.
- 5:42–5:49आज की समय में हम देकते है, कि उत्तर अदूनिक्ता और विख्ण्डन्वाद जैसे विचार लगु कठाव में आरही है.
- 5:49–5:51अग, बहुत अथद, जैसे आप के पास एक पुरानी गड़ी है,
- 5:51–5:54और आप उसे खोल कर उसके पुर्जों को अलगलग कर कर के दिखते है,
- 5:54–5:56कि ये काम कैसे करती है.
- 5:56–5:57बलकल.
- 5:57–6:00विखखन्डन्वाद साहिट्ते में यही करता है.
- 6:00–6:03तो आद रद थक ज़े से आप के पास एक पुरानी गड़ी है
- 6:03–6:06और आप उसे खोल कर उसके पुर्जों को अलगलग कर के दिकते है,
- 6:06–6:09कि ये काम कैसे करती है. बिलकोल.
- 6:09–6:11विखखन्दन्वाद साहिते में यही करता है.
- 6:11–6:16ये पुरानी मानितावों को खोल कर उनके विरोद हबासो को सामने लाता है.
- 6:16–6:18लेकिन किताप में जो बात कही गई है,
- 6:18–6:22वो ये है के अगर कोई लेक्हक केवल रीआक्तिव है.
- 6:22–6:25मदलप सिव समाज के किसी गठना पर तुरंट परतिक्रिया देदी.
- 6:25–6:29और वो प्रो आक्तिव होकर उस विचार को गेहराई नहीं दे रहा है
- 6:29–6:32तो कहानी अपना प्रभाउ को देती हैं
- 6:32–6:35और मुझे लकते है शवट इसली हमे वो तोतेवली कहानी नमाजे शुक्राना
- 6:35–6:38और उस जल्दवाज समीक शक्का उदारन देखने को मिला
- 6:38–6:39एक दम सही
- 6:39–6:42जब हमारे पस नियमो के समज नहीं होती,
- 6:42–6:46तो हमें लिए खिन्सक कहानी को भी शान्ती का संदेश बतादेते हैं.
- 6:46–6:48खड़, गदे से पद्धि की तरफ चलते हैं.
- 6:48–6:50कहानीो में तो लेक्ध के पास पन्नो की तोड़ी आजादी होती है.
- 6:50–6:52लेकिं जब हम कविता की बात करते हैं,
- 6:52–6:54ज़हां शबद और भी कम हो जाते हैं,
- 6:54–6:56तो क्या ये नीम और भी सक्थ हो जाते हैं?
- 6:56–6:58पहुत ज्यादा सक्थ.
- 6:58–7:00गजिंदर ठाकृर की इस पुस्तक का रूख,
- 7:00–7:02कविताओं को लेकर है,
- 7:02–7:03वो बहुत ही कडा है.
- 7:03–7:06आजकल हम देकते हैं कि नव कविता का चलन बड़गया है
- 7:06–7:09जिसे मुक्त चंद या फ्रीवर्स कैते हैं
- 7:09–7:10आजके नव कविता का चलन बडगया है, जिसे मुक्त चंद या फ्रीवर्स कैते हैं
- 7:10–7:13या ताल नही होती, बस पंक्तिया होती है.
- 7:13–7:17बलकुल, लेकिन ये पुस्तक स्पर्ष रूप से गूष्चना करती है,
- 7:17–7:21के बिना चंद के लिखी गय रच्चना कविता है ही नहीं.
- 7:21–7:24उसे सीदे सीदे गद्दे की श्रेनी में दھकेल दिया गया है.
- 7:24–7:28कविता किले ले और चन्द कहोना अनिवारे शर्थ है
- 7:28–7:30लिकिन यार ये तो एक तरा की पबंदी हुई ना
- 7:30–7:34मतलब हमेशा कहा जाता है कि कविता दिल से निकलती है
- 7:34–7:35आजाद होती है
- 7:35–7:40तो क्या इतने सारे नियम कविता की उस मूल आजादी का दमनी गोडनाते
- 7:40–7:44उज़़ बवाप को पुरी आजादी मिलजाए, तो वो बस हवामे उड़जाएगी.
- 7:44–7:47लेकिन जब हम उसी बवाप को एक प्रशर कुकर के कडे नियमो में कैद कर देते हैं,
- 7:47–7:53तो वही बवाप इतनी ताकतवर हो जाती है, के सीटी बजाती है, और खाना पका देती है.
- 7:53–7:55तो वो बस हवा में उड़जाएगी.
- 7:55–7:58लेकिं जब हम उसी बहाप को
- 7:58–8:01एक प्रशर कुकर के कडे नियमो में कैद कर देते हैं.
- 8:01–8:04तो वही बहाप इतनी ताकत वर हो जाती है,
- 8:04–8:07के सी टी बजाती है, और खाना पका देती है.
- 8:07–8:10तो क्या न्यम भी उसी प्रश्व्व कुए कितर की तरा है?
- 8:10–8:17बहुत इशान्दार न्फ्वाग जी एं बिल्कुल आजादी को चीनते नहीं बलकि उसे एक दिशा देते हैं
- 8:17–8:23और इसी ताकत को समजाने के लिए, पुस्तक में भरत्री हरी के स्फोट सिदान्त का सहरा लिया लिया जा है.
- 8:23–8:27ये स्फोट सिदान्त ये कुछ विस्फोट जैसा लग रहे मुझे.
- 8:27–8:30बलकुल, वो असल में अर्थ का विस्फोटी है.
- 8:30–8:33ये सिद्धान्त कहता है कि जब हम कोई वागके सुन्तेना,
- 8:33–8:36तो हमें उसका एड़ एक अक्षर कर के समज नहीं आता.
- 8:36–8:40पूरा का पूरा शब्द्या वागक्या हमारे दिमाग में एक साथ फुटता है,
- 8:40–8:42एक बस्ट होता है.
- 8:42–8:44अच्छाँ, ये से अचानक से पूरी तस्वीर सामने आजाती है.
- 8:44–8:47आच्छाँ, और जब कविता में च्छन्द होता है,
- 8:47–8:50लैई होती है, तो ये स्पोट और भी तेज होता है.
- 8:50–8:53इसके साती बभरत मुनु के रस सिद्दान्त कभी जिकर है.
- 8:53–8:56अगर कविता में रस नहीं है,
- 9:12–9:14अदिकोंग को सामले रख़े हैं।
- 9:14–9:15वीलकुल
- 9:15–9:17टाब में वामपनती और दक्षनपनती विचारदारों पर
- 9:17–9:20एक बहुत ही दिलचस्प टिपपनी की गये नहां
- 9:20–9:22जी हा आदूने कविताव में अकसर माखस्वाद
- 9:22–9:25या नारीवाद जैसे विदेशी विचारो को शामिल किया जाता है
- 9:25–9:27पुस्तक का तर किये है
- 9:27–9:30कि अगर यं विदेशी समवेदनों का आयाद किया जाता है
- 9:30–9:33लेकिन विस्ठानिय जमीनी हकीकत से नहीं जुडती
- 9:33–9:37जैसे मेठली भाशा और संसक्रिती के लुप्त होने का संकत
- 9:37–9:40बिल्कुल, अगर वो दर्द नहीं हैं तो कविता में दार नहीं आती.
- 9:40–9:43और इसी पर लेक हक ने एक बहुत फीटी तीखा सवाल पूचा है.
- 9:43–9:49उनो नहीं का है कि अगर कोई लेक हक अपनी आजीवीका किले दक्षन पन्त पर निरभर है,
- 9:49–9:53तो वाम पक्ष के पक्ष में लिखिए उसकी कविता में अस्लीदार कैसे आएगी?
- 9:53–9:57ये पुरी तरह से स्झनात्मक इमान्दारी का सबाल है
- 9:57–10:00मतलब अगर आप अप स्थ दिकावे किले लिख्च्टे है
- 10:00–10:02तो वो कविता कभी दिल तक नहीं पहुचेगी
- 10:02–10:03सहीं का
- 10:03–10:06अगर ज़े मजबुत नहीं हैं तो विदेशी प्वौल खुष्बू नहीं दिसकते हैं.
- 10:06–10:07क्यर?
- 10:07–10:10यहां पर आकर बाथ सच्मे बहुत दिल्चास्पो जाती है.
- 10:10–10:13क्योकि अगर निमो की कडाई की ही बात हो रही है,
- 10:13–10:17तो ज़े सबसे कडे निमोवाली विदा की तरव बडदते हैं, गजल.
- 10:17–10:18गजल.
- 10:18–10:23ये देखना सच में हैरत नगेज है, कि कैसे अरभी और फारसी की एक विदाने,
- 10:23–10:28मैठली भाशा में अपना एक पुरा कपुरा विग्यान या शास्तर ही विखसित कर लिया.
- 10:28–10:33बिल्कुल, पुस्तक में में ब्याठली गजल शास्त्र का बहुत विस्तिरत वरनन है
- 10:33–10:36गजल में उन्नीस अरभी बहर होते है
- 10:36–10:39यहा में चाहूंगा कि हम इसे थोडा आम भाशामे समझें
- 10:39–10:41ये बहर क्या बला है
- 10:41–10:44और गजल में जो काफिया और दीप कज्गर होता है
- 10:44–10:45वो सब क्या है?
- 10:45–10:50दिक्ये, बहर को आप संगीट की दून का दाचा मान सकते हैं.
- 10:50–10:53जैसे हर गीट एक खास ताल पर चलता है,
- 10:53–10:58वैसे ही गजल की हर लाईन एक खास बहर या मीटर पर चलती है.
- 10:58–11:01इस में शब्दों के वजन को नापा जाता है.
- 11:01–11:02अचा.
- 11:02–11:07लेख्हक ने इन अरभी बहरों को बारतिये शास्त्रिये संगीट कि सुरों
- 11:07–11:09जैसे सारे गवम और हमारी तालों
- 11:09–11:13जैसे कहर्वा या तीन ताल कि साथ जोड दिया है.
- 11:13–11:15वाज, और काफिया और रदीप क्या होते हैं?
- 11:15–11:19काफ्या वो शब्द हैं जो तुगबंदी करता है
- 11:19–11:20यह राईमिंग वोड़
- 11:20–11:25और रदीप वो शब जो हर शेर के अंथ में बिल्खुल ज्यों का त्यों दोराया जाता है
- 11:25–11:30अगर किसी गजल में बहर, काफ्या और रदीप का सती किस्तिमाल नहीं है
- 11:30–11:34तो पुस्तक उसे आजाद गजल कहेकर सिरे से नकार देती हैं
- 11:34–11:36तो अगर मैं गजल के इस भेहर की तुलना
- 11:36–11:39एक बिल्टिंके आखिटेक्च्ट्रल ब्लूप्रिंट से करूं
- 11:39–11:41तो आप दिवारों का रंग बदल सकते हैं
- 11:41–12:11अगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर ब�
- 12:11–12:13लेकिन क्या ये थोडी जीद नहीं है?
- 12:14–12:18गजल तो वुर्दु और्फार्सी से आईए, तो वुर्दु के शब तो आएंगे हैं आ?
- 12:18–12:21ये एक बहुत्टी महत्वपों सवाल कड़ा करता है.
- 12:21–12:25लेकिन ये जीद नहीं है, ये बाशा के अस्तित्व की लड़ाई है.
- 12:25–12:29पूस्तक एक बहुत्ती रोचक भाशा ही तत्ति सामने रक्ती है
- 12:29–12:32मैतिली भाशा की ध्वन्यात्मक शुद्धा
- 12:32–12:34यानी फूनेटिक प्योरेटी
- 12:34–12:35इसका क्या अर्थ हूँ?
- 12:35–12:40इसका अर्थ है कि मैतिली में जो लिखा जाता है बिलकोल वही बोला जाता है
- 12:40–12:43जैसे हिंदी में एक शबद है समपत्ती
- 12:43–12:45हा, समपत बोल देते है, हम लोग भोलचाल में
- 12:45–12:49सही कहा, हम आखरी की एकी मात्रा कहा जाते है
- 12:49–12:52लेकिन मैठिली में अगर समपती लिखा है,
- 12:52–12:57तो उसे पूरा स, म, प, ए, त, ही बोला जाएगा
- 12:57–13:01अहो! मतलब भाशा पने एक एक अकशर कपूरा हिसाब रकती है.
- 13:01–13:05जी! इसिलिये उर्दू हिंदी शब्दों को हटाकर,
- 13:05–13:07शुद्द मैठिली का अस्तिमाल करना,
- 13:07–13:12एक शेत्रय भाशा का अपनी पहचान बचाने का बहुत ही वेग्णानिक तरीका है.
- 13:12–13:13क्या बात है!
- 13:13–13:18और मुझे लकता है, अक्षरो के इस गनित का सबसे बहेतरीन रुप तब देखने को मिलता है,
- 13:18–13:22जब हमारी चर्चा अरभी फारसी से उडान बरकर सीदे जापान पुचती है.
- 13:22–13:23हैखु
- 13:23–13:24बलकु रहे खु
- 13:24–13:28कैसे एक बाशा विदेशी दाचे में खुद को डालने के लिए,
- 13:43–13:46तज़ियो बाशो इसके सबसे महान कवी माने जाते हैं
- 13:46–13:49और यहां गजेन्र तबाखुर का वो बड़ा दावा आता है,
- 13:49–13:52कि तमिल को चोडगर, देवनागरी और मितलाक्षर लिप्या
- 13:52–13:54हैईकु किले दुन्या में सबसे उप्योखते हैं
- 13:54–13:55जी बलकुल
- 13:55–13:58लेकिन यार मुझे एक बाज नहीं आती, अंग्रेजी क्यो नहीं?
- 13:58–14:01तुक्कि अंग्रेजी या अन्ने बहाशाव में,
- 14:01–14:03सिलबल की गिनती बहुत पेचीडा होती है.
- 14:03–14:06अंग्रेजी का शब्द लीजी ए, फाईर.
- 14:06–14:08कुछ कहींगे अस में एक सिलबल है,
- 14:08–14:10अर कुछ कहेंगे डो है, फाई अर.
- 14:10–14:13अर, उच्चारन जगा के साब से बड़ल जाता है.
- 14:13–14:17बिलकुल, जिस से पाथ साथ पाच की गिन्ती गड़बडा जाती है.
- 14:17–14:21लेकिन मेठिली की लिप्यान्तरन व्यवस्ता इतनी सतीक है,
- 14:21–14:25कि ये गिन्ती पूरी तरड़ से गनित्य सतिक्ता कि सात कि जासक्ती है
- 14:25–14:29शब्द अगर आग है तोस में दोही अख्षर हूँँँँँँँँँँँ
- 14:29–14:31मतलप कोई कन्फुज्झन नहीं
- 14:31–14:33लेकिन फिर से वही आजादी वाला सवाल आता है
- 14:33–14:37अगर एक कवी उंगलियो पर पाज साथ पाज अख्षर गिन राया,
- 14:37–14:41तो क्या इतनी सक्त गिन्ती करते करते बहावनाई नी बूल जायगा?
- 14:41–14:44उंँ यही तो कला की चुनाती है
- 14:44–14:49सीमिध सन्सादनो में ब्रमहांड जैसी गेहरी बात कहे देना ही
- 14:49–14:51एक हैको कवी को महान बनाता है
- 14:51–14:53निम एक पिंज्रा नहीं है
- 14:53–14:55बलकी एक लेंस की तरा है
- 14:55–14:58जैसे हम बच्पन में लेंसे कागस जलाते थे
- 14:58–14:59बलकल वही
- 14:59–15:02जब सुरच की किरने बिखरी होती हैं, तो सरफ रोशनी देती हैं
- 15:02–15:06लेकिन लेंस से गुजरते ही, वो एक बिन्दूपर केंद्रित होकर,
- 15:06–15:08कागस पर आग पैडा कर देती हैं.
- 15:08–15:13नियम उसी तरा प्रकाष को केंद्रित कर के साहिते में आग पैडा करते हैं.
- 15:13–15:18वाज! नियम कला को रोकते नहीं, बलकी उसे फोकस देतें.
- 15:19–15:21तो इस सब का अखिर मतलब क्या है?
- 15:21–15:24आजकी इस विमर्ष को समठते वे अम कैसकते हैं,
- 15:24–15:27कि हम एक आजके योग में हैं जाए नियम कला रहा हैं,
- 15:27–15:30बहुगत जेदा सुचना है.
- 15:30–15:31विचारों को आमर बनाता है.
- 15:43–15:48आज जब आट्टिशल अट्टेलगेंस कुछी सेक्टन्डो में बहाशा का अनुवात कर रहा है
- 15:48–15:51और वेश्विक साहिते को एक जैसा बनारा है
- 15:51–15:55तो सुचने वाली बात ये है कि क्या मेठली जैसी बहाशागों के
- 15:55–15:59ये बेहत, सुक्षम और गनतिये शन्द बच पाएंगे
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अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ� अगर बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा ब� सहित्ति की दून्या की एक पुथी गंभीर और मैं कहुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� किसी को रोना आया उसने कागस पर कुछ लाइने लिग दी और बस वो कविता बन गे सही बात है हमें लगता है की अगर एक इमारत बनानी है तब तो एक आरकेटेक्ट और भ्लुपन की जुर्वात है लेकिन साहित्ते में किसी विग्यानिया अंजनेरिं की कोई जगा नहीं है पर आज हम जिस रोत में गोता लगाने वाले है ना वो इस पूरी सोच को ज़र से उखार फिखता है एक दम सही कहा आपने आज हम गजेंद्र ताकृ दूरा लिखित और पलडवी प्रकाशन से चफी पुस्तक, मैठली समिक्षा शास्ट्र पर चर्चा कर रहे हैं. इस पूरी चर्चा का मिशन या उदेश बहुत ही दिल्चास्त है. ये किताब हमें दिखाती है, कि कैसे मैठली जैसी एक शेत्री यबहाशा, जब वेश्विक सहिट्यों को अपनाती है, चाहे वो जापानी हाईकू हो, पश्च्मी देशुं की लगु कताई हो, या अरभी फार्सी की गजल हो, तो वो उने जीों का त्यों नहीं उठालेती. मदब कोपी पेस नी करती. बलक्कि वो उने अपनी भाशाशा के विज्यान में डालती है, उनकि लिए बहुत कडे नियम बनाती है, और अपना खुद का एक पुरा समीखषा शास्त्र गरती है. ये वाखए बहुत रोमान चक है. मडलब ये सर्फ कोई ग्रामर या व्याक्रन की खाश नी है. ये आसल में ये सीखने का एक शोटकत है कि कोई भी भाशा बहरी विचारों को कैसे भीटर समहत करती है वो भी आपनी मुल आत्मा को खोई बिना तो चली ये एसको थोड़क खूलते है इस यात्रा की शुर्वात सब से चोटी कहानीो से करते हैं मेरे एक सीदा सा सवाल है, हम आम तोर पर चोटी कहानी उसे मानते है, जो जल्दी कहतम होगा है. तो किया किसी कहानी को सर्फ उसकी लंबाई से नापा जाते है? वह यह एक बहुत ही आम गलत फहमी है, और यही पर यह पुस्ता कपना गनिद सामने रकती है. गजेंद्र ताकृर जीने गद्द्य की लंबाई क्यादार पर एक बहुती सतीग थाचा दिया है. अचा दाचा कैसा? उदारन किलिए, मेठली में विहनी कता, जिसे हम आग्रेजी में फलाष्ट्ष्ट्चन कहते है, उसकी सीमा केवल 1 से 4 प्रिष्टके भीच तैखी गईगेईईईई सर्फ एक से 4 प्रिज जी है, इसके बाद लगु कता दीए, जो 3 से 4 प्रिष्टकी होती है फिर दीग कता, 15 से 20 प्रिष्टकी और जो उपन्यास होता है, वो 60 से लेकर 500 प्रिष्टक कहोता है लिकिन अगर कोई वेहनी कता केवल एक या दो पनने की है तो उस में कोई लेक हक कितनी ही बात कहलेगा मिरे मतलब है क्या इतने कम शबडो में कोई गेरा प्रभाव चोडा जा सकता है और यही पर जेम्स जोइस की मशुर किताब धबलिनर्स का जिक राता है वेहनी कता की आत्मा सर्फ उसकी कम लंबाई नहीं है, उसका सब से एहम तत्व है, अपीफेनी. रूकिये, अपीफेनी, इसका क्या मतलवे? क्या ये किसी टरका जादूई चन होता है? आप इसे एक बोदधिक या बहावनात्मक दमाका कैसकते है? अपी फेनी का मतलब है. अचानक से किसी सत्ते का बोद होना. अचा. मान लिजे कोई कहानी बहुत ही समाने तरीके से चल रही है. लेकिन अचानक कहानी के अन्त में, एक ही पल में, किसी एक वागके से पात्र को, और पडने वाले को भी. जीवन के किसी बहुत गेरे सच्च का एक जडके में अहसाज होता है, जैसे आखों से कोई पट्टी खुल गयो. अहो! मतलव अगर उस एक से चार पन्ने की कहानी में, ये एपी फेनी वाला शवन नहीं है तो? तो वो विजनी कता है ही नहीं. क्या बाथ है? अगर अम इसे एक उदानद से समजे, तो किसे अम कै सकते हैं के एक विहनी कता किसी फास्ट फुट शनाक की तरा नहीं हैं, जिसे बस चलते फिर तेखालिया और भूल गे, बलकी ये एक हाई कोलती एसप्रसो शोट की तरा है, मात्रा में ये बहुत कम होता है, लेक्हक को बहुत महनत करनी परती है. किताब में ये चेतावनी भी दीगाई है. कैसी चेतावनी? अकसर लेक्हकों के मन में कोई विचार आता है, और उने दर लगता है कि लिए वो ये से बहुल नजाएं. लेक्हक को बहुत महनत करनी परती है किताब में खेतावनी भी दीगे है कैसी खेतावनी अकसर लेक्हकों के मन में कोई विचार आता है और उने दर लकता है कि कही वो इसे बहुल न जाएं तो वे तुरन्त उसे कागस पर उतार देते हैं लेकिन बिना पकाए यानी बिना अपने दिमाग में उसे सीजने दिये उसे तुरन्त विलक्षन कता मान लेना गलत है. मलड़ उस में कुछ मिसिंग रहे जाता है? जी. उस में स्थाई तत्व हूना चाहिए. स्ताई तत्व यानी की वो कहानी समय के साथ भी प्रसंगिक रहे है. बिल्कुल, अगर वो स्थाई तत्व नहीं है, तो वो कहानी बस इक चुट्कूला या हास्स्या कनिका बनकर रहे जाती है. आज की समय में हम देकते है, कि उत्तर अदूनिक्ता और विख्ण्डन्वाद जैसे विचार लगु कठाव में आरही है. अग, बहुत अथद, जैसे आप के पास एक पुरानी गड़ी है, और आप उसे खोल कर उसके पुर्जों को अलगलग कर कर के दिखते है, कि ये काम कैसे करती है. बलकल. विखखन्डन्वाद साहिट्ते में यही करता है. तो आद रद थक ज़े से आप के पास एक पुरानी गड़ी है और आप उसे खोल कर उसके पुर्जों को अलगलग कर के दिकते है, कि ये काम कैसे करती है. बिलकोल. विखखन्दन्वाद साहिते में यही करता है. ये पुरानी मानितावों को खोल कर उनके विरोद हबासो को सामने लाता है. लेकिन किताप में जो बात कही गई है, वो ये है के अगर कोई लेक्हक केवल रीआक्तिव है. मदलप सिव समाज के किसी गठना पर तुरंट परतिक्रिया देदी. और वो प्रो आक्तिव होकर उस विचार को गेहराई नहीं दे रहा है तो कहानी अपना प्रभाउ को देती हैं और मुझे लकते है शवट इसली हमे वो तोतेवली कहानी नमाजे शुक्राना और उस जल्दवाज समीक शक्का उदारन देखने को मिला एक दम सही जब हमारे पस नियमो के समज नहीं होती, तो हमें लिए खिन्सक कहानी को भी शान्ती का संदेश बतादेते हैं. खड़, गदे से पद्धि की तरफ चलते हैं. कहानीो में तो लेक्ध के पास पन्नो की तोड़ी आजादी होती है. लेकिं जब हम कविता की बात करते हैं, ज़हां शबद और भी कम हो जाते हैं, तो क्या ये नीम और भी सक्थ हो जाते हैं? पहुत ज्यादा सक्थ. गजिंदर ठाकृर की इस पुस्तक का रूख, कविताओं को लेकर है, वो बहुत ही कडा है. आजकल हम देकते हैं कि नव कविता का चलन बड़गया है जिसे मुक्त चंद या फ्रीवर्स कैते हैं आजके नव कविता का चलन बडगया है, जिसे मुक्त चंद या फ्रीवर्स कैते हैं या ताल नही होती, बस पंक्तिया होती है. बलकुल, लेकिन ये पुस्तक स्पर्ष रूप से गूष्चना करती है, के बिना चंद के लिखी गय रच्चना कविता है ही नहीं. उसे सीदे सीदे गद्दे की श्रेनी में दھकेल दिया गया है. कविता किले ले और चन्द कहोना अनिवारे शर्थ है लिकिन यार ये तो एक तरा की पबंदी हुई ना मतलब हमेशा कहा जाता है कि कविता दिल से निकलती है आजाद होती है तो क्या इतने सारे नियम कविता की उस मूल आजादी का दमनी गोडनाते उज़़ बवाप को पुरी आजादी मिलजाए, तो वो बस हवामे उड़जाएगी. लेकिन जब हम उसी बवाप को एक प्रशर कुकर के कडे नियमो में कैद कर देते हैं, तो वही बवाप इतनी ताकतवर हो जाती है, के सीटी बजाती है, और खाना पका देती है. तो वो बस हवा में उड़जाएगी. लेकिं जब हम उसी बहाप को एक प्रशर कुकर के कडे नियमो में कैद कर देते हैं. तो वही बहाप इतनी ताकत वर हो जाती है, के सी टी बजाती है, और खाना पका देती है. तो क्या न्यम भी उसी प्रश्व्व कुए कितर की तरा है? बहुत इशान्दार न्फ्वाग जी एं बिल्कुल आजादी को चीनते नहीं बलकि उसे एक दिशा देते हैं और इसी ताकत को समजाने के लिए, पुस्तक में भरत्री हरी के स्फोट सिदान्त का सहरा लिया लिया जा है. ये स्फोट सिदान्त ये कुछ विस्फोट जैसा लग रहे मुझे. बलकुल, वो असल में अर्थ का विस्फोटी है. ये सिद्धान्त कहता है कि जब हम कोई वागके सुन्तेना, तो हमें उसका एड़ एक अक्षर कर के समज नहीं आता. पूरा का पूरा शब्द्या वागक्या हमारे दिमाग में एक साथ फुटता है, एक बस्ट होता है. अच्छाँ, ये से अचानक से पूरी तस्वीर सामने आजाती है. आच्छाँ, और जब कविता में च्छन्द होता है, लैई होती है, तो ये स्पोट और भी तेज होता है. इसके साती बभरत मुनु के रस सिद्दान्त कभी जिकर है. अगर कविता में रस नहीं है, अदिकोंग को सामले रख़े हैं। वीलकुल टाब में वामपनती और दक्षनपनती विचारदारों पर एक बहुत ही दिलचस्प टिपपनी की गये नहां जी हा आदूने कविताव में अकसर माखस्वाद या नारीवाद जैसे विदेशी विचारो को शामिल किया जाता है पुस्तक का तर किये है कि अगर यं विदेशी समवेदनों का आयाद किया जाता है लेकिन विस्ठानिय जमीनी हकीकत से नहीं जुडती जैसे मेठली भाशा और संसक्रिती के लुप्त होने का संकत बिल्कुल, अगर वो दर्द नहीं हैं तो कविता में दार नहीं आती. और इसी पर लेक हक ने एक बहुत फीटी तीखा सवाल पूचा है. उनो नहीं का है कि अगर कोई लेक हक अपनी आजीवीका किले दक्षन पन्त पर निरभर है, तो वाम पक्ष के पक्ष में लिखिए उसकी कविता में अस्लीदार कैसे आएगी? ये पुरी तरह से स्झनात्मक इमान्दारी का सबाल है मतलब अगर आप अप स्थ दिकावे किले लिख्च्टे है तो वो कविता कभी दिल तक नहीं पहुचेगी सहीं का अगर ज़े मजबुत नहीं हैं तो विदेशी प्वौल खुष्बू नहीं दिसकते हैं. क्यर? यहां पर आकर बाथ सच्मे बहुत दिल्चास्पो जाती है. क्योकि अगर निमो की कडाई की ही बात हो रही है, तो ज़े सबसे कडे निमोवाली विदा की तरव बडदते हैं, गजल. गजल. ये देखना सच में हैरत नगेज है, कि कैसे अरभी और फारसी की एक विदाने, मैठली भाशा में अपना एक पुरा कपुरा विग्यान या शास्तर ही विखसित कर लिया. बिल्कुल, पुस्तक में में ब्याठली गजल शास्त्र का बहुत विस्तिरत वरनन है गजल में उन्नीस अरभी बहर होते है यहा में चाहूंगा कि हम इसे थोडा आम भाशामे समझें ये बहर क्या बला है और गजल में जो काफिया और दीप कज्गर होता है वो सब क्या है? दिक्ये, बहर को आप संगीट की दून का दाचा मान सकते हैं. जैसे हर गीट एक खास ताल पर चलता है, वैसे ही गजल की हर लाईन एक खास बहर या मीटर पर चलती है. इस में शब्दों के वजन को नापा जाता है. अचा. लेख्हक ने इन अरभी बहरों को बारतिये शास्त्रिये संगीट कि सुरों जैसे सारे गवम और हमारी तालों जैसे कहर्वा या तीन ताल कि साथ जोड दिया है. वाज, और काफिया और रदीप क्या होते हैं? काफ्या वो शब्द हैं जो तुगबंदी करता है यह राईमिंग वोड़ और रदीप वो शब जो हर शेर के अंथ में बिल्खुल ज्यों का त्यों दोराया जाता है अगर किसी गजल में बहर, काफ्या और रदीप का सती किस्तिमाल नहीं है तो पुस्तक उसे आजाद गजल कहेकर सिरे से नकार देती हैं तो अगर मैं गजल के इस भेहर की तुलना एक बिल्टिंके आखिटेक्च्ट्रल ब्लूप्रिंट से करूं तो आप दिवारों का रंग बदल सकते हैं अगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर ब� लेकिन क्या ये थोडी जीद नहीं है? गजल तो वुर्दु और्फार्सी से आईए, तो वुर्दु के शब तो आएंगे हैं आ? ये एक बहुत्टी महत्वपों सवाल कड़ा करता है. लेकिन ये जीद नहीं है, ये बाशा के अस्तित्व की लड़ाई है. पूस्तक एक बहुत्ती रोचक भाशा ही तत्ति सामने रक्ती है मैतिली भाशा की ध्वन्यात्मक शुद्धा यानी फूनेटिक प्योरेटी इसका क्या अर्थ हूँ? इसका अर्थ है कि मैतिली में जो लिखा जाता है बिलकोल वही बोला जाता है जैसे हिंदी में एक शबद है समपत्ती हा, समपत बोल देते है, हम लोग भोलचाल में सही कहा, हम आखरी की एकी मात्रा कहा जाते है लेकिन मैठिली में अगर समपती लिखा है, तो उसे पूरा स, म, प, ए, त, ही बोला जाएगा अहो! मतलब भाशा पने एक एक अकशर कपूरा हिसाब रकती है. जी! इसिलिये उर्दू हिंदी शब्दों को हटाकर, शुद्द मैठिली का अस्तिमाल करना, एक शेत्रय भाशा का अपनी पहचान बचाने का बहुत ही वेग्णानिक तरीका है. क्या बात है! और मुझे लकता है, अक्षरो के इस गनित का सबसे बहेतरीन रुप तब देखने को मिलता है, जब हमारी चर्चा अरभी फारसी से उडान बरकर सीदे जापान पुचती है. हैखु बलकु रहे खु कैसे एक बाशा विदेशी दाचे में खुद को डालने के लिए, तज़ियो बाशो इसके सबसे महान कवी माने जाते हैं और यहां गजेन्र तबाखुर का वो बड़ा दावा आता है, कि तमिल को चोडगर, देवनागरी और मितलाक्षर लिप्या हैईकु किले दुन्या में सबसे उप्योखते हैं जी बलकुल लेकिन यार मुझे एक बाज नहीं आती, अंग्रेजी क्यो नहीं? तुक्कि अंग्रेजी या अन्ने बहाशाव में, सिलबल की गिनती बहुत पेचीडा होती है. अंग्रेजी का शब्द लीजी ए, फाईर. कुछ कहींगे अस में एक सिलबल है, अर कुछ कहेंगे डो है, फाई अर. अर, उच्चारन जगा के साब से बड़ल जाता है. बिलकुल, जिस से पाथ साथ पाच की गिन्ती गड़बडा जाती है. लेकिन मेठिली की लिप्यान्तरन व्यवस्ता इतनी सतीक है, कि ये गिन्ती पूरी तरड़ से गनित्य सतिक्ता कि सात कि जासक्ती है शब्द अगर आग है तोस में दोही अख्षर हूँँँँँँँँँँँ मतलप कोई कन्फुज्झन नहीं लेकिन फिर से वही आजादी वाला सवाल आता है अगर एक कवी उंगलियो पर पाज साथ पाज अख्षर गिन राया, तो क्या इतनी सक्त गिन्ती करते करते बहावनाई नी बूल जायगा? उंँ यही तो कला की चुनाती है सीमिध सन्सादनो में ब्रमहांड जैसी गेहरी बात कहे देना ही एक हैको कवी को महान बनाता है निम एक पिंज्रा नहीं है बलकी एक लेंस की तरा है जैसे हम बच्पन में लेंसे कागस जलाते थे बलकल वही जब सुरच की किरने बिखरी होती हैं, तो सरफ रोशनी देती हैं लेकिन लेंस से गुजरते ही, वो एक बिन्दूपर केंद्रित होकर, कागस पर आग पैडा कर देती हैं. नियम उसी तरा प्रकाष को केंद्रित कर के साहिते में आग पैडा करते हैं. वाज! नियम कला को रोकते नहीं, बलकी उसे फोकस देतें. तो इस सब का अखिर मतलब क्या है? आजकी इस विमर्ष को समठते वे अम कैसकते हैं, कि हम एक आजके योग में हैं जाए नियम कला रहा हैं, बहुगत जेदा सुचना है. विचारों को आमर बनाता है. आज जब आट्टिशल अट्टेलगेंस कुछी सेक्टन्डो में बहाशा का अनुवात कर रहा है और वेश्विक साहिते को एक जैसा बनारा है तो सुचने वाली बात ये है कि क्या मेठली जैसी बहाशागों के ये बेहत, सुक्षम और गनतिये शन्द बच पाएंगे