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चार_उत्तर-आधुनिक_नाटक.mp4
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- 0:00–0:05अजिवन का कोई अस्ली अड़ है, या हम सब बस एक भेतुकी दोड में बाग रहे हैं.
- 0:05–0:11आजके इस खास विष्लेशन में हम चार असे बहतरीन उतर आदूनिक नाटकों पर बाद करेंगे,
- 0:11–0:15जिनों आदूने क्रण्मच्की पूरी दुन्या को जग्ग्जोर कर रड्दिया
- 0:15–0:19इन नाटकों लेग कहनी कहने के पुराने तरीकों को बिलकुल तोर दिया
- 0:19–0:23और हमें आफी बेच्यान करने वाली सच्चाईई से रुभूरु कर आया
- 0:23–0:25अगशर नजर अंदास कर देते हैं.
- 0:25–0:29तो चल ये बिना किसी देरी के इस दिल्चश्प सफर की शुवात करते हैं.
- 0:29–0:33ये पूरी चर्चा एक बहुती शान्दार स्रोथ पर अदारित है.
- 0:33–0:36हम मैठली एजरनल विदेह में प्रकाषित,
- 0:36–1:06अज भी बज़ाँ बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बा
- 1:06–1:11अगर अबसर्टिष्ट थ्टेटर या भेतु के रंगमच का मुल तत्व क्या है?
- 1:11–1:15तो शुरू करते हैं हमारे पहले विशाय से चार उत्तर आदूनिक नातक
- 1:15–1:18जरा इस ताईमलाईं पर गूर कीजी है
- 1:18–1:25ये देखना वाखे एहरान करने वाला है कि कैसे ये उत्तर आदूनिक नाथ्तिया अन्दोलन अदी सदी से भी ज़ादा समय तक विकसित होता रहा.
- 1:25–1:29बात उन्निस सुबावन में फ्रेंच नाटक वेटिंग फोगोडो से शुरू हुती है.
- 1:29–1:35फिर उन्नीसु अप्टावन में अंग्रेजी में दब बरदे पाटी, उन्नीसु बासत में बंदाली में एवम एंदर जीत,
- 1:35–1:41और अक्फ्र कार, तो हाँजार आप में में प्यठली नातक नो अंट्री माप्रविष तक पहुषती है.
- 1:41–1:45दश्वक बदलते गय, बाशाहे बदलती गय, संसकरतिया अलगते है,
- 1:45–1:47लेकिन इनसान के खाली पन का वो मुल दर्द,
- 1:47–1:49हर जगा बिलकुल एक जैसा था.
- 1:49–1:52आगे बरते है, वेटिंग फर गोडो की तरणफ.
- 1:52–1:54इस नाटक ने तो सच में,
- 1:54–1:57नाटकों के सारे स्थापित नियम ही पलड़ दिये थे
- 1:57–2:00उननीसो भावन की इस फ्रेंच ट्राजी कोमटी के पीछे
- 2:00–2:03सम्योल बेकेट का दूर दरषी दिमाग था
- 2:03–2:05सुच्छिए, श्टेज पर सिथ पाच पात्र हैं
- 2:05–2:09वलादिमिर, अस्ट्रगोन, पोजो, लकी और एक लगका.
- 2:09–2:12और ये सब एक सुन्सान बंजर सडगपर हैं.
- 2:12–2:13कोई बडी खटना नहीं हो रही है.
- 2:13–2:16अजा लकता है जैसे समय बिलकुल थेहर्सा गया है.
- 2:16–2:18उनके पास करने के लिए कुछ नहीं है.
- 2:18–2:20सिवाये एक अंतहीन अंतजार के
- 2:20–2:23और इस नाटक की सबसे ड़ावनी सच्चाई
- 2:23–2:25इसकी यही चक्रियः प्रक्रती है
- 2:25–2:27यहा असल में कुछ नहीं होता
- 2:27–2:30पहले अंक में हम देकते हैं कि वलादेमिर और आस्टरगोन
- 2:30–2:32बस इदर उदर की बाते कर के समय काट रहे हैं
- 2:32–2:34फिर पता चलता है कि गोडोक कल आएगा.
- 2:34–2:36दूसरे अंक में क्या होता है?
- 2:36–2:38फिर से वही अंतदार,
- 2:38–2:40सब कुछ भीलक्ल वैसा ही दोर आया जाता है.
- 2:40–2:42लेकिन सबसे बडी विडंबना यह एक,
- 2:42–2:44कि पात्र अपना कल बूल चुके हैं.
- 2:44–2:46वे एक आसे लूप में फस गए हैं,
- 3:02–3:06मैक کا एक बोरिंग सा बोर्टिंग हाँस है और स्टैनली वहार रहा है.
- 3:06–3:10लेकिन फिर गोलडबग और मैक आन नाम के दो अजीप से लोग आते है,
- 3:10–3:13वे अचानक स्टैनली से बिना स्वर पैर की पुच्ताच शूरू कर देते हैं,
- 3:13–3:17अगली सटनली को बिना किसी वजा बताए वहां से लेजाया जाता है.
- 3:17–3:20तो यहां आप हम सोचने पर मजबूर हो जाते है.
- 3:20–3:23क्या सटनली ने सच्छ में कोई अप्राद किया था?
- 3:23–3:26या फिर असली दिकत उसका गैर अन्रुप्तवाद,
- 3:26–3:29अद्वाँद्दाद, या थी तब आप प्रज्दाद,
- 3:29–3:32या प्रज्दाद, या प्रज्दाद, या प्रज्दाद,
- 3:32–3:35या प्रज्दाद, या प्रज्दाद, या प्रज्दाद,
- 3:35–3:38या प्रज्दाद, या प्रज्दाद, या प्रज्दाद,
- 3:38–3:42बादल सरकार का ये 1962 का बिंगुली नाटक एक बहुत ही दिलचस्प मेता नरेटिव है.
- 3:42–3:46इस में के लेक्वडर्षोगों के बीज से ही चार लोगो को अपने पाट्र बनाने किले चुनता है.
- 3:46–3:49तब दिज़ाएक ये गैसाचे में फित नहीं बैट्टा.
- 3:49–3:52हमारा तीसरा के चाडी हमें सीडे भारत लेयाता है.
- 3:52–3:55हम बात कर रहे हैं एवम एन्रजीत की.
- 3:55–4:01बादल सरकार का ये नाटक बिंगुली नाटक एक बहुत ही दिल्चस्प मेता नरेटिव है.
- 4:01–4:06इस में लेक्खड़शकों के भीज से ही चार लोगों को अपने पात्र बनाने किले चुनता है.
- 4:06–4:10लेकिन उन में से एक वक्ती आम नाम रक्ने से साफ मना कर देता है.
- 4:10–4:13वो अड़ जाता है कि उसे एंद्रजीत कहा जाए.
- 4:13–4:22नाटक का शीर्षक एवम एंद्रजीत, जिस का मतलब है, और एंद्रजीत इसी मुख्यपात्र का प्रतीक है, तो भीर से अलग अपनी एक बहिचान बना चाता है.
- 4:23–4:25यहां एक बहुती साफ कंट्रास दिखने को मिलता है.
- 4:25–4:32अपने बदलाव के सपने देखता है, और बस एक आम चहरा बनकर रहे जाने के खलाव पूरी ताकत से लड़ रहा है.
- 4:32–4:37लेकिन इस कहानी कष्थ सबसे दरदनाक सच इस एक पंकती मेच्पा है.
- 4:37–4:41आमल, विमल, कमल, और अपने जीट भी.
- 4:41–4:45अज़ इक आम चेरा बनकर रहे जाने के खलाप पुरी ताकत से लड़ रहा है.
- 4:45–4:49लेकिन इस कहानी कषब सबसे दरदनाक सच इस एक पंकती में चफा है.
- 4:50–4:53आमल, विमल, कमल, और एंदरजीट भी.
- 4:54–4:57आखिर कार हमारे उस विद्द्रोही एंदरजीट को भी अजास जाता है,
- 5:11–5:20उदें आराएंट सिंग नची केता का ये 2008 का मेठली नाटक बेतूके पनकु सीदे मोद के बात की दुन्या में लेजाता है.
- 5:20–5:27यहां स्वर्ग या नर्ख के दर्वाजे पर अंतदार कर रही आतमाओ का एक बहुत ही हास्यास्पद और आराजक मिष्रन है.
- 5:27–5:31एक सादारन चोर है, जिसे अपनी चोरी पर बड़ा गर्व है.
- 5:31–5:35एक पोकित मार है, जो अपने चोटे काम को लेकर दिफैंसेव हो रहा है.
- 5:35–5:40कमाल की बात तो यह कि लोग मरने के बाद भी अपनी राजनीती और पुर्वाग रहे नहीं चोर पाए है.
- 5:40–5:44एक नेता वहाद ही लेट पूछता है और वी अपी त्रीटमड मागता है
- 5:44–5:49वही एक वाम पन्ती विचारक उसे मुझत के बाद भी बहार से समर्ठन दे रहा है
- 5:49–5:53और एक अभी नेता है जो वहाजा कर अपनी जाती का उपनाम अपने की खोशिष कर रहा है
- 5:53–5:58अद तो तब हो जाती है, जब एक जिन्दा भीमा एजन्ट वहान नया मरकेट तलाश ने पहुट जाता है.
- 5:59–6:02नन्दी और भ्रिंगी दो मरे हुए प्रेमियो की शादी करवा रहे हैं.
- 6:03–6:06मुझत के दर्वाजी के बाहर भी एक विएपी लाईन बन गई है.
- 6:06–6:11ये नाटक समाज के हर पहलू पूरी निश्पक्ष्ता से एक तीका व्यंग करता है.
- 6:11–6:15अईन्सान मरने के बाद भी नाटकर शाही और भ्रश्टाचार से नहीं बच्छ बाया है,
- 6:15–6:18हालात आसे हैं कि खुद यमराज और चित्रगुप्त कहते हैं,
- 6:18–6:21अब सिस्टमपर उनकभी कोई कन्त्रोल नहीं रहा
- 6:21–6:25और फेर आता है इस पूरे नातक कस सबसे वडा तूएस्त
- 6:25–6:28जिस दर्वाजे के बाहर यह सब लडजग़ रहे हैं
- 6:28–6:30यम राज और चित्रगुप्त बताते हैं
- 6:30–6:33कि वो दर्वाजा कभी सवर्ग का थाही नहीं
- 6:33–6:36वो तो बस उस साईन बोड की गलत फैमी थी
- 6:36–6:40जिस पर असल में नो अंट्री जानी प्रवेश निशेद लिखा था
- 6:40–6:42चलिये अब इन सारी कड्यों को जोडते हैं
- 6:42–6:46हमारा आख्री विशे है अबसर्टिस्ट फीर्टर का मुल्त तत्व
- 6:46–6:51इंच्छारो पूरी तरह से अलग नाटको को एक साद देखने पर हमें क्या समजाता है?
- 6:51–6:55अबसर्टिस �theater, यानी बहाव प्रदान, निरर्ठठक नाटक,
- 6:55–6:58पारमपरे कहानियों के तैन्यमों को भिल्कुल नकार देता है.
- 6:58–7:01इन में कुई शुर्वात, मद्ध्या या सुखद अंत नहीं होता.
- 7:01–7:04इसके बजाए ये नाटेक हमे सीदे उस अंतिजार,
- 7:04–7:07उस होव, भीर का हिस्सा बनने की गुतन
- 7:07–7:10और नोकर शाही की उस अर्तहीं अराजजक्ता के सामने
- 7:10–7:13कडा कर देते हैं, जो मानव अस्तितु का
- 7:13–7:18स्रोट सामगरी से अन्वादित यह एक वाग के इस पूरे दर्शन को बहुत ही खुबसुर्ती से समेटता है.
- 7:19–7:22ताला मन पर लगा है, लेकिन बोड पर नो एंट्री लिखा है.
- 7:22–7:24लेकिन बोड़ पर नो अंट्री लिखा है.
- 7:24–7:27इसका मतलब है किछो रुकावटे हैं, चो सीमाए हैं,
- 7:27–7:30वे अकसर हमारे अपने दिमाक की उपज होती हैं.
- 7:30–7:32लेकिन हम उनहे इस ब्रम्मान्द पर थोप देते हैं.
- 7:32–7:35ये मानकर के दून्या ही आँई आगे नहीं बडने दे रही हैं
- 7:35–7:38तो अंत में एक सवाल जो हम सब को हुथ से पुचना चाहीं
- 7:38–7:40आजके इस आदूनिक समाज में
- 7:40–7:43हमारी इस भाग्दोड भरी जिन्दिगी में
- 7:43–7:47अम सब किन प्रतिकात्मक नो अंट्री बोड़्स के सामने अंतिजार कर रहे हैं.
- 7:47–7:51जिन्धिगी का कितना बड़ा हिस्सा उन दर्वाजो के बाहर लाईन में लगने में भी जाता है,
- 7:51–7:54जो वास्तव में कभी खुलने किले बने ही नहीं ते.
- 7:54–7:58अदाशनिक सबर मिश शामिल होने के लिए बहुत बहुत द्डण्निवाद
Plain text
अजिवन का कोई अस्ली अड़ है, या हम सब बस एक भेतुकी दोड में बाग रहे हैं. आजके इस खास विष्लेशन में हम चार असे बहतरीन उतर आदूनिक नाटकों पर बाद करेंगे, जिनों आदूने क्रण्मच्की पूरी दुन्या को जग्ग्जोर कर रड्दिया इन नाटकों लेग कहनी कहने के पुराने तरीकों को बिलकुल तोर दिया और हमें आफी बेच्यान करने वाली सच्चाईई से रुभूरु कर आया अगशर नजर अंदास कर देते हैं. तो चल ये बिना किसी देरी के इस दिल्चश्प सफर की शुवात करते हैं. ये पूरी चर्चा एक बहुती शान्दार स्रोथ पर अदारित है. हम मैठली एजरनल विदेह में प्रकाषित, अज भी बज़ाँ बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बा अगर अबसर्टिष्ट थ्टेटर या भेतु के रंगमच का मुल तत्व क्या है? तो शुरू करते हैं हमारे पहले विशाय से चार उत्तर आदूनिक नातक जरा इस ताईमलाईं पर गूर कीजी है ये देखना वाखे एहरान करने वाला है कि कैसे ये उत्तर आदूनिक नाथ्तिया अन्दोलन अदी सदी से भी ज़ादा समय तक विकसित होता रहा. बात उन्निस सुबावन में फ्रेंच नाटक वेटिंग फोगोडो से शुरू हुती है. फिर उन्नीसु अप्टावन में अंग्रेजी में दब बरदे पाटी, उन्नीसु बासत में बंदाली में एवम एंदर जीत, और अक्फ्र कार, तो हाँजार आप में में प्यठली नातक नो अंट्री माप्रविष तक पहुषती है. दश्वक बदलते गय, बाशाहे बदलती गय, संसकरतिया अलगते है, लेकिन इनसान के खाली पन का वो मुल दर्द, हर जगा बिलकुल एक जैसा था. आगे बरते है, वेटिंग फर गोडो की तरणफ. इस नाटक ने तो सच में, नाटकों के सारे स्थापित नियम ही पलड़ दिये थे उननीसो भावन की इस फ्रेंच ट्राजी कोमटी के पीछे सम्योल बेकेट का दूर दरषी दिमाग था सुच्छिए, श्टेज पर सिथ पाच पात्र हैं वलादिमिर, अस्ट्रगोन, पोजो, लकी और एक लगका. और ये सब एक सुन्सान बंजर सडगपर हैं. कोई बडी खटना नहीं हो रही है. अजा लकता है जैसे समय बिलकुल थेहर्सा गया है. उनके पास करने के लिए कुछ नहीं है. सिवाये एक अंतहीन अंतजार के और इस नाटक की सबसे ड़ावनी सच्चाई इसकी यही चक्रियः प्रक्रती है यहा असल में कुछ नहीं होता पहले अंक में हम देकते हैं कि वलादेमिर और आस्टरगोन बस इदर उदर की बाते कर के समय काट रहे हैं फिर पता चलता है कि गोडोक कल आएगा. दूसरे अंक में क्या होता है? फिर से वही अंतदार, सब कुछ भीलक्ल वैसा ही दोर आया जाता है. लेकिन सबसे बडी विडंबना यह एक, कि पात्र अपना कल बूल चुके हैं. वे एक आसे लूप में फस गए हैं, मैक کا एक बोरिंग सा बोर्टिंग हाँस है और स्टैनली वहार रहा है. लेकिन फिर गोलडबग और मैक आन नाम के दो अजीप से लोग आते है, वे अचानक स्टैनली से बिना स्वर पैर की पुच्ताच शूरू कर देते हैं, अगली सटनली को बिना किसी वजा बताए वहां से लेजाया जाता है. तो यहां आप हम सोचने पर मजबूर हो जाते है. क्या सटनली ने सच्छ में कोई अप्राद किया था? या फिर असली दिकत उसका गैर अन्रुप्तवाद, अद्वाँद्दाद, या थी तब आप प्रज्दाद, या प्रज्दाद, या प्रज्दाद, या प्रज्दाद, या प्रज्दाद, या प्रज्दाद, या प्रज्दाद, या प्रज्दाद, या प्रज्दाद, या प्रज्दाद, बादल सरकार का ये 1962 का बिंगुली नाटक एक बहुत ही दिलचस्प मेता नरेटिव है. इस में के लेक्वडर्षोगों के बीज से ही चार लोगो को अपने पाट्र बनाने किले चुनता है. तब दिज़ाएक ये गैसाचे में फित नहीं बैट्टा. हमारा तीसरा के चाडी हमें सीडे भारत लेयाता है. हम बात कर रहे हैं एवम एन्रजीत की. बादल सरकार का ये नाटक बिंगुली नाटक एक बहुत ही दिल्चस्प मेता नरेटिव है. इस में लेक्खड़शकों के भीज से ही चार लोगों को अपने पात्र बनाने किले चुनता है. लेकिन उन में से एक वक्ती आम नाम रक्ने से साफ मना कर देता है. वो अड़ जाता है कि उसे एंद्रजीत कहा जाए. नाटक का शीर्षक एवम एंद्रजीत, जिस का मतलब है, और एंद्रजीत इसी मुख्यपात्र का प्रतीक है, तो भीर से अलग अपनी एक बहिचान बना चाता है. यहां एक बहुती साफ कंट्रास दिखने को मिलता है. अपने बदलाव के सपने देखता है, और बस एक आम चहरा बनकर रहे जाने के खलाव पूरी ताकत से लड़ रहा है. लेकिन इस कहानी कष्थ सबसे दरदनाक सच इस एक पंकती मेच्पा है. आमल, विमल, कमल, और अपने जीट भी. अज़ इक आम चेरा बनकर रहे जाने के खलाप पुरी ताकत से लड़ रहा है. लेकिन इस कहानी कषब सबसे दरदनाक सच इस एक पंकती में चफा है. आमल, विमल, कमल, और एंदरजीट भी. आखिर कार हमारे उस विद्द्रोही एंदरजीट को भी अजास जाता है, उदें आराएंट सिंग नची केता का ये 2008 का मेठली नाटक बेतूके पनकु सीदे मोद के बात की दुन्या में लेजाता है. यहां स्वर्ग या नर्ख के दर्वाजे पर अंतदार कर रही आतमाओ का एक बहुत ही हास्यास्पद और आराजक मिष्रन है. एक सादारन चोर है, जिसे अपनी चोरी पर बड़ा गर्व है. एक पोकित मार है, जो अपने चोटे काम को लेकर दिफैंसेव हो रहा है. कमाल की बात तो यह कि लोग मरने के बाद भी अपनी राजनीती और पुर्वाग रहे नहीं चोर पाए है. एक नेता वहाद ही लेट पूछता है और वी अपी त्रीटमड मागता है वही एक वाम पन्ती विचारक उसे मुझत के बाद भी बहार से समर्ठन दे रहा है और एक अभी नेता है जो वहाजा कर अपनी जाती का उपनाम अपने की खोशिष कर रहा है अद तो तब हो जाती है, जब एक जिन्दा भीमा एजन्ट वहान नया मरकेट तलाश ने पहुट जाता है. नन्दी और भ्रिंगी दो मरे हुए प्रेमियो की शादी करवा रहे हैं. मुझत के दर्वाजी के बाहर भी एक विएपी लाईन बन गई है. ये नाटक समाज के हर पहलू पूरी निश्पक्ष्ता से एक तीका व्यंग करता है. अईन्सान मरने के बाद भी नाटकर शाही और भ्रश्टाचार से नहीं बच्छ बाया है, हालात आसे हैं कि खुद यमराज और चित्रगुप्त कहते हैं, अब सिस्टमपर उनकभी कोई कन्त्रोल नहीं रहा और फेर आता है इस पूरे नातक कस सबसे वडा तूएस्त जिस दर्वाजे के बाहर यह सब लडजग़ रहे हैं यम राज और चित्रगुप्त बताते हैं कि वो दर्वाजा कभी सवर्ग का थाही नहीं वो तो बस उस साईन बोड की गलत फैमी थी जिस पर असल में नो अंट्री जानी प्रवेश निशेद लिखा था चलिये अब इन सारी कड्यों को जोडते हैं हमारा आख्री विशे है अबसर्टिस्ट फीर्टर का मुल्त तत्व इंच्छारो पूरी तरह से अलग नाटको को एक साद देखने पर हमें क्या समजाता है? अबसर्टिस �theater, यानी बहाव प्रदान, निरर्ठठक नाटक, पारमपरे कहानियों के तैन्यमों को भिल्कुल नकार देता है. इन में कुई शुर्वात, मद्ध्या या सुखद अंत नहीं होता. इसके बजाए ये नाटेक हमे सीदे उस अंतिजार, उस होव, भीर का हिस्सा बनने की गुतन और नोकर शाही की उस अर्तहीं अराजजक्ता के सामने कडा कर देते हैं, जो मानव अस्तितु का स्रोट सामगरी से अन्वादित यह एक वाग के इस पूरे दर्शन को बहुत ही खुबसुर्ती से समेटता है. ताला मन पर लगा है, लेकिन बोड पर नो एंट्री लिखा है. लेकिन बोड़ पर नो अंट्री लिखा है. इसका मतलब है किछो रुकावटे हैं, चो सीमाए हैं, वे अकसर हमारे अपने दिमाक की उपज होती हैं. लेकिन हम उनहे इस ब्रम्मान्द पर थोप देते हैं. ये मानकर के दून्या ही आँई आगे नहीं बडने दे रही हैं तो अंत में एक सवाल जो हम सब को हुथ से पुचना चाहीं आजके इस आदूनिक समाज में हमारी इस भाग्दोड भरी जिन्दिगी में अम सब किन प्रतिकात्मक नो अंट्री बोड़्स के सामने अंतिजार कर रहे हैं. जिन्धिगी का कितना बड़ा हिस्सा उन दर्वाजो के बाहर लाईन में लगने में भी जाता है, जो वास्तव में कभी खुलने किले बने ही नहीं ते. अदाशनिक सबर मिश शामिल होने के लिए बहुत बहुत द्डण्निवाद