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मोती_दाईक_कथा.mp4

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Part 7 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 7
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  1. 0:00–0:05नमशकार, आई हम सब मिठिलाक एक ता आँन रदे सपरषी लोक कता पर बात करब,
  2. 0:05–0:11जे समरपन, समाजिक कलंक आ इश्वर्य आश्वर्वादक गेर सानस्क्रतिक पाग के खोलत अची.
  3. 0:11–0:15मोति दाए की कता कुनो सादारन कहनी नहीं आची,
  4. 0:15–0:18बलकी इआस्ता अबभाग्यक उसंगर्ष आजी
  5. 0:18–0:20जे कते कु पुष्ट सम्मित्हिलाक समाज में
  6. 0:20–0:22लोग के प्रिरना देत अवत रहा लगजी
  7. 0:22–0:24ता आव बिना कोनो देरी कें
  8. 0:24–0:27आई कताक विष्लेषन शुरू कर आजी
  9. 0:27–0:28आब इविचार करो
  10. 0:28–0:30के ना कहीो काल
  11. 0:30–0:34मात्र चादिना खूशी जीवन परिक पीरा के उतर बनी जाई दे आचे.
  12. 0:34–0:40इप पाती सूनी में जतक चोट लगता ची, एकर गेराई ओत्भे बेशी आची.
  13. 0:40–0:42है, हम सब जे कदाख विष्लेषन कोर ऐल ची,
  14. 0:42–0:46अकर पूरा भावनात्मक आदार एताईसा स्पष्ट बहुजाईता चि
  15. 0:46–0:49इं हम्रा सब के सोचने पर मजबोर को देता चि
  16. 0:49–0:52जे कखनो कखनो एक ता चोट सन सुख से हो
  17. 0:52–0:55जीवन एक सबसे पहग संथाप के कोना दो सके टा चि
  18. 0:56–0:57कमालक बाता चिए ना?
  19. 0:57–0:58ता
  20. 0:58–1:04इग ख़ाद श्रू होईत चे उजेनी गामसा जे मित्लाक एक ता महत्पुरन लिए लच.
  21. 1:04–1:07इग रंग बिरंग लोक कलापर टिक नजरी दियो.
  22. 1:07–1:12इग हमरा सब के उजेनी गामक दैनिक जीवन का एक दं भीज में लजाई थाई छी.
  23. 1:12–1:17इगाम कोनो बद पैग शहरत नहीं चल, मुदा अगर नाम दूर दूर दरी पसरल चल.
  24. 1:17–1:22आव उकर एक ता पैग कारंचल माता गाहल के प्रसिद धस ठान.
  25. 1:22–1:28गामक लोकक अतल विष्वास चल, जे माता गाहल के दरबार सा, कि यो खाली हात ने गरे टची.
  26. 1:28–1:34इद्रिश्छ उही सजीवता आलोक आस्थाक के बद्ड नीक जंका देखाई रहे लची
  27. 1:34–1:37अब इक ता बहुत दिल्चस्प कंटराश दिखू
  28. 1:37–1:41गव में एक दिस भहुतिक रूप से बहुत रास विभाजन चल
  29. 1:41–1:46आहीर तोली अलग, दोबी तोली अलग, सब कवपन अपन काज नदी गाडदधी अलग अलग.
  30. 1:46–1:49मुदा जखन लोक माता गाहिलग अस्थान पर,
  31. 1:49–1:54उई नीम गाचक नीचा जमा हूए चल, तो उते कोनो भेदा वेद ने रहे चल.
  32. 1:54–2:00उते एक्ता अद्वूत अद्यात्मिक एक्ता रहे चल, उते सब कियो एक्दम समान,
  33. 2:00–2:09इस पस्ट करे टची जि समाज जते क्हन्द में भिभक्त होए, आस्था उक्रा एक्सुत्र में बान दे टची, इस सच में एक्ता गहिर बात ची.
  34. 2:09–2:14आब हम सव आही कताक मुखे पात्र दिसे गूरेची जिनकर नामचल मोती दाई
  35. 2:14–2:17और जिनकर देनिक समर पन एक दम अद्वूट चल
  36. 2:17–2:19इच दिन मोती दाई
  37. 2:19–2:21जाती साओ दोभी चली
  38. 2:21–2:26मुदा गाँक लोग हुनका अट्यन्त सम्मान सा बबगतिन कहच चल
  39. 2:26–2:29जकर सोज अर्थ होईत अची सच्चा भक्त
  40. 2:29–2:32इबाद आपने आप में बहुत महत्पूरन अची
  41. 2:32–2:35समाजक निचुल का पाइदान पर रहत हो
  42. 2:35–2:37हुनक अद्यात्मिक उचाई
  43. 2:37–2:40हुनका सब के लेल वन्दनिये बना दिनिचल
  44. 2:40–2:42बूजुजे माता गाहिलक दर्बार में
  45. 2:42–2:46सब सा पहिल भोर कदीप हूनके हाँच्सा जरेच्छ
  46. 2:46–2:49जो हम सब हूनक दिनचर्या पर नजर दी,
  47. 2:49–2:52ता उ अत्तिंत कटिन शल रिकष्रम से बहल चल.
  48. 2:52–2:54भोर में नदी किनारे कप्राक बहंकर देर,
  49. 2:54–2:57दूपार में कडाकादार, गाम में कप्रा सुखाएप,
  50. 2:57–3:00आसाज में गावा गर-गर जाक कप्रा पूजवब
  51. 3:00–3:03देहक लेल इगाज कते को ठखा देने हार चल
  52. 3:03–3:05मुदा आत्माक लिल
  53. 3:05–3:08आत्माक लिल हूनक जीवन में जे चली रहाल चल
  54. 3:08–3:10उएक ता अलग स्तरक बातेच
  55. 3:10–3:12शरी रक एतेक ठखानेग बादो
  56. 3:12–3:14गाएल माता के स्थान पर
  57. 3:14–3:25वबवर में दीप जराबब, वोते साफ सफाई करव, वेदी के नव माटी से नीपब, अदूप, फूल, अरभा चावल च़ायब, इचल मोती दाएक आत्मा काज.
  58. 3:26–3:31उनका लेल इई आद्धियात्मिक सन्तुष्टी कोनो राजाक सिंगासन से हो पैग चल,
  59. 3:31–3:38उ इते काज इते प्रेम सकर जलिये, जे गाम भरी में उ भगतिन केर नाम से जानलजाय लगलिये,
  60. 3:38–3:40इह उनक सच्चा समर पन चल.
  61. 3:40–3:43मुदा, जेना की हम सब जनाइत छी,
  62. 3:43–3:45जीवना कोनो नको नको खोना में,
  63. 3:45–3:48एक ता गहीर दुक छूपल रही तची.
  64. 3:48–3:52मोदी दाएक जीवन में से हो एक ता मोन सन्ताब चल
  65. 3:52–3:59इरातिक अंदकार मोदी दाएको उही गुप्त सन्ताप के बहुत निक सा द्श्यमान कर हल अची
  66. 3:59–4:06विवाह ककते कवर्ष भीती चुकल चल, मुदा हुंकर कोक, सूना चल, हुंकर हात खाली चल
  67. 4:06–4:16इएक्ता आहन पीडा चल, जे उ केक्रो सा कहीने सके चली, उ अपन इभारी दुक, मात्र माता गाईल सा मान रूपे साजा करे चली.
  68. 4:16–4:23भोर में दीप किर बाती सोज कर इद काल, उ बस इह सोचे चली, जे माता सब की चु देखे चती.
  69. 4:23–4:27अगर अद्खार मैं सन्ताप वितर दरी पेट्धल चल
  70. 4:27–4:30ता एता एदई सबसा क्रूर बात इए आची
  71. 4:30–4:34जे गाँ के समाज में कोनो इस्ट्री के खाली हाथ के गननाय
  72. 4:34–4:35एक ता कतु वास्ट्विकता चल
  73. 4:36–4:38समाज हुंकर बाजपन के कलंक मान लिलक
  74. 4:39–4:40बुजी सकेईच्छी
  75. 4:40–4:44उनकर वेक्तिगत पीडा के समाज एक ता समाजिक दाग्म बडल देलक.
  76. 4:44–4:49समाजक नज्री में उ भक्तिन जरुर चली, मुदा की एक ता बाज भक्तिन.
  77. 4:49–4:53इशव्द कते क्छुभाइत होगेत, एकर हम सब बस कल्पना को सकेच्छी.
  78. 4:53–5:03मुदा फेर हूंकर जीवन में एक ता आहन मोड आएल जे च्शन रब रिक प्रकाष चाखा चल, जेकरा हम चे दिनक मत्रित्व कही सके ची.
  79. 5:03–5:11अंदेरा में जरेएत ये एक ता चोट सन मुदा सपष्ट प्रकाष, मोती दाएक के जीवन में आएल उही सन्ताने क्ततीक आची.
  80. 5:23–5:27अब ज़े हम बतावे जार हल ची उखर द्यान से सुनु
  81. 5:27–5:30उई चोडिनक माद्त्रित्त। सव आखिर की बडल।
  82. 5:30–5:34बाशा कस्तर पर इप परिवरतन चोट लागे सकत अचे
  83. 5:34–5:37बाश्ष़ आहन माजग कर बच्चा आब नहीं आचे
  84. 5:37–5:42अही वाज्ज़ सवाज़् आहन माँ जकर बच्चा आभ नहीं आचे
  85. 5:42–5:47मुदा समाजा हूंकर अपन हिर्द्यक लेल इदर्ति आ अकाश जत्टिक पेग अन्तर चल
  86. 5:47–5:50अही मात्र वाज्चा आब आब नहीं आचे
  87. 5:50–5:53इदर्तिया अकाश जत्तिक पेग अंतर चल
  88. 5:53–5:55उही मात्र चाउदिनक मात्रत्तु
  89. 5:55–5:57उनका परस समाजिक कलंख के
  90. 5:57–5:59हमेश ध्या क्ले दोदे लक
  91. 5:59–6:01उनकर शोग संटप्त रिड्द्यक लेल
  92. 6:01–6:03एकर अर्थ सब कुछ चल
  93. 6:03–6:05समाजक नजरी बदली गल चल
  94. 6:05–6:13एकर बाद मोतिदाएक जीवन कोना बदलल, उह उनका एक ता सामान ने भखत साम आमर भखत बना देत अची.
  95. 6:13–6:17मोतिदाएकी इसमरपान अनन्त अचक्रिये सवभावक चल.
  96. 6:17–6:22अपने बाद्ट्टागाईलक दर्वार से मुह नहीं रहीं
  97. 6:22–6:25बलकी अप्वेर सा उई इस्थान पर गुर लिया
  98. 6:25–6:29आब अब अपन दीप वा दूप दरी सीमित नहीं चलीं
  99. 6:29–6:35अब उ मात्र दीप वा दूप द़ी सिमित नहीं चलीया, बलकी हुनका माता गाई लग भावावे लागल.
  100. 6:35–6:40उ पूरे गामक दूखी अप पीडित लोक लेल एक ता अद्धियातमिक माध्यम बनी के लिया.
  101. 6:40–6:45इदेखा रहाल आची ज़े हुनके दुख हुनका अद्यात्मिक सकती के कते बेसी प्रभल कदे लग.
  102. 6:46–6:50जो हम सब मोती दायक विरासत के सन्शेप में देखी तो सब शपष्ट होई तची,
  103. 6:51–6:55जे पहल रहुनकर खाली हाथक जे कलंक चल, उो हमेशा लेल मिटगेल,
  104. 6:55–7:04तो आप दोज़ा बद्गे दोशर वो आपन शाररेक आव्यक्तिग दुख्ख के आद्द्यात्मिक सेवाक माद्ध्यम सब पार केर गिलि हा, अद्ती शर जे सबस वह महत्पूर न चे.
  105. 7:04–7:11आईदरी गाँ कवरिद्ध महला सब रहनकर कता औहन लोक क सुन्वैद चत्फीं जे औहन प्रकारक संटाः सग गुजरी रहल चत्फीं.
  106. 7:11–7:17रहनकर जीवन अब दूसर लेल सांट्वना अजीवनक अर्थ प्रदान करे तची इक ता पैग वीरासत छी.
  107. 7:17–7:22तब आन्त में एक ता गमभीर प्रष्न संगे हम इप्रस्तुती समाप्त करब.
  108. 7:22–7:26जब भाईगे कुनो आश्रवाद देवे से मना को देता ची,
  109. 7:26–7:50तकी सच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च

Plain text

नमशकार, आई हम सब मिठिलाक एक ता आँन रदे सपरषी लोक कता पर बात करब, जे समरपन, समाजिक कलंक आ इश्वर्य आश्वर्वादक गेर सानस्क्रतिक पाग के खोलत अची. मोति दाए की कता कुनो सादारन कहनी नहीं आची, बलकी इआस्ता अबभाग्यक उसंगर्ष आजी जे कते कु पुष्ट सम्मित्हिलाक समाज में लोग के प्रिरना देत अवत रहा लगजी ता आव बिना कोनो देरी कें आई कताक विष्लेषन शुरू कर आजी आब इविचार करो के ना कहीो काल मात्र चादिना खूशी जीवन परिक पीरा के उतर बनी जाई दे आचे. इप पाती सूनी में जतक चोट लगता ची, एकर गेराई ओत्भे बेशी आची. है, हम सब जे कदाख विष्लेषन कोर ऐल ची, अकर पूरा भावनात्मक आदार एताईसा स्पष्ट बहुजाईता चि इं हम्रा सब के सोचने पर मजबोर को देता चि जे कखनो कखनो एक ता चोट सन सुख से हो जीवन एक सबसे पहग संथाप के कोना दो सके टा चि कमालक बाता चिए ना? ता इग ख़ाद श्रू होईत चे उजेनी गामसा जे मित्लाक एक ता महत्पुरन लिए लच. इग रंग बिरंग लोक कलापर टिक नजरी दियो. इग हमरा सब के उजेनी गामक दैनिक जीवन का एक दं भीज में लजाई थाई छी. इगाम कोनो बद पैग शहरत नहीं चल, मुदा अगर नाम दूर दूर दरी पसरल चल. आव उकर एक ता पैग कारंचल माता गाहल के प्रसिद धस ठान. गामक लोकक अतल विष्वास चल, जे माता गाहल के दरबार सा, कि यो खाली हात ने गरे टची. इद्रिश्छ उही सजीवता आलोक आस्थाक के बद्ड नीक जंका देखाई रहे लची अब इक ता बहुत दिल्चस्प कंटराश दिखू गव में एक दिस भहुतिक रूप से बहुत रास विभाजन चल आहीर तोली अलग, दोबी तोली अलग, सब कवपन अपन काज नदी गाडदधी अलग अलग. मुदा जखन लोक माता गाहिलग अस्थान पर, उई नीम गाचक नीचा जमा हूए चल, तो उते कोनो भेदा वेद ने रहे चल. उते एक्ता अद्वूत अद्यात्मिक एक्ता रहे चल, उते सब कियो एक्दम समान, इस पस्ट करे टची जि समाज जते क्हन्द में भिभक्त होए, आस्था उक्रा एक्सुत्र में बान दे टची, इस सच में एक्ता गहिर बात ची. आब हम सव आही कताक मुखे पात्र दिसे गूरेची जिनकर नामचल मोती दाई और जिनकर देनिक समर पन एक दम अद्वूट चल इच दिन मोती दाई जाती साओ दोभी चली मुदा गाँक लोग हुनका अट्यन्त सम्मान सा बबगतिन कहच चल जकर सोज अर्थ होईत अची सच्चा भक्त इबाद आपने आप में बहुत महत्पूरन अची समाजक निचुल का पाइदान पर रहत हो हुनक अद्यात्मिक उचाई हुनका सब के लेल वन्दनिये बना दिनिचल बूजुजे माता गाहिलक दर्बार में सब सा पहिल भोर कदीप हूनके हाँच्सा जरेच्छ जो हम सब हूनक दिनचर्या पर नजर दी, ता उ अत्तिंत कटिन शल रिकष्रम से बहल चल. भोर में नदी किनारे कप्राक बहंकर देर, दूपार में कडाकादार, गाम में कप्रा सुखाएप, आसाज में गावा गर-गर जाक कप्रा पूजवब देहक लेल इगाज कते को ठखा देने हार चल मुदा आत्माक लिल आत्माक लिल हूनक जीवन में जे चली रहाल चल उएक ता अलग स्तरक बातेच शरी रक एतेक ठखानेग बादो गाएल माता के स्थान पर वबवर में दीप जराबब, वोते साफ सफाई करव, वेदी के नव माटी से नीपब, अदूप, फूल, अरभा चावल च़ायब, इचल मोती दाएक आत्मा काज. उनका लेल इई आद्धियात्मिक सन्तुष्टी कोनो राजाक सिंगासन से हो पैग चल, उ इते काज इते प्रेम सकर जलिये, जे गाम भरी में उ भगतिन केर नाम से जानलजाय लगलिये, इह उनक सच्चा समर पन चल. मुदा, जेना की हम सब जनाइत छी, जीवना कोनो नको नको खोना में, एक ता गहीर दुक छूपल रही तची. मोदी दाएक जीवन में से हो एक ता मोन सन्ताब चल इरातिक अंदकार मोदी दाएको उही गुप्त सन्ताप के बहुत निक सा द्श्यमान कर हल अची विवाह ककते कवर्ष भीती चुकल चल, मुदा हुंकर कोक, सूना चल, हुंकर हात खाली चल इएक्ता आहन पीडा चल, जे उ केक्रो सा कहीने सके चली, उ अपन इभारी दुक, मात्र माता गाईल सा मान रूपे साजा करे चली. भोर में दीप किर बाती सोज कर इद काल, उ बस इह सोचे चली, जे माता सब की चु देखे चती. अगर अद्खार मैं सन्ताप वितर दरी पेट्धल चल ता एता एदई सबसा क्रूर बात इए आची जे गाँ के समाज में कोनो इस्ट्री के खाली हाथ के गननाय एक ता कतु वास्ट्विकता चल समाज हुंकर बाजपन के कलंक मान लिलक बुजी सकेईच्छी उनकर वेक्तिगत पीडा के समाज एक ता समाजिक दाग्म बडल देलक. समाजक नज्री में उ भक्तिन जरुर चली, मुदा की एक ता बाज भक्तिन. इशव्द कते क्छुभाइत होगेत, एकर हम सब बस कल्पना को सकेच्छी. मुदा फेर हूंकर जीवन में एक ता आहन मोड आएल जे च्शन रब रिक प्रकाष चाखा चल, जेकरा हम चे दिनक मत्रित्व कही सके ची. अंदेरा में जरेएत ये एक ता चोट सन मुदा सपष्ट प्रकाष, मोती दाएक के जीवन में आएल उही सन्ताने क्ततीक आची. अब ज़े हम बतावे जार हल ची उखर द्यान से सुनु उई चोडिनक माद्त्रित्त। सव आखिर की बडल। बाशा कस्तर पर इप परिवरतन चोट लागे सकत अचे बाश्ष़ आहन माजग कर बच्चा आब नहीं आचे अही वाज्ज़ सवाज़् आहन माँ जकर बच्चा आभ नहीं आचे मुदा समाजा हूंकर अपन हिर्द्यक लेल इदर्ति आ अकाश जत्टिक पेग अन्तर चल अही मात्र वाज्चा आब आब नहीं आचे इदर्तिया अकाश जत्तिक पेग अंतर चल उही मात्र चाउदिनक मात्रत्तु उनका परस समाजिक कलंख के हमेश ध्या क्ले दोदे लक उनकर शोग संटप्त रिड्द्यक लेल एकर अर्थ सब कुछ चल समाजक नजरी बदली गल चल एकर बाद मोतिदाएक जीवन कोना बदलल, उह उनका एक ता सामान ने भखत साम आमर भखत बना देत अची. मोतिदाएकी इसमरपान अनन्त अचक्रिये सवभावक चल. अपने बाद्ट्टागाईलक दर्वार से मुह नहीं रहीं बलकी अप्वेर सा उई इस्थान पर गुर लिया आब अब अपन दीप वा दूप दरी सीमित नहीं चलीं अब उ मात्र दीप वा दूप द़ी सिमित नहीं चलीया, बलकी हुनका माता गाई लग भावावे लागल. उ पूरे गामक दूखी अप पीडित लोक लेल एक ता अद्धियातमिक माध्यम बनी के लिया. इदेखा रहाल आची ज़े हुनके दुख हुनका अद्यात्मिक सकती के कते बेसी प्रभल कदे लग. जो हम सब मोती दायक विरासत के सन्शेप में देखी तो सब शपष्ट होई तची, जे पहल रहुनकर खाली हाथक जे कलंक चल, उो हमेशा लेल मिटगेल, तो आप दोज़ा बद्गे दोशर वो आपन शाररेक आव्यक्तिग दुख्ख के आद्द्यात्मिक सेवाक माद्ध्यम सब पार केर गिलि हा, अद्ती शर जे सबस वह महत्पूर न चे. आईदरी गाँ कवरिद्ध महला सब रहनकर कता औहन लोक क सुन्वैद चत्फीं जे औहन प्रकारक संटाः सग गुजरी रहल चत्फीं. रहनकर जीवन अब दूसर लेल सांट्वना अजीवनक अर्थ प्रदान करे तची इक ता पैग वीरासत छी. तब आन्त में एक ता गमभीर प्रष्न संगे हम इप्रस्तुती समाप्त करब. जब भाईगे कुनो आश्रवाद देवे से मना को देता ची, तकी सच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च

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